साहित्य
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आसिफ़ अली मंसूरी की कविता
मैं देख रहा हूँ—सभ्यता की फटी हुई जेब सेगिरते जा रहे हैं मनुष्य के चीथड़े। धूल से सनी सड़कों परएक…
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व्यंग्य – भक्त सौभाग्य सिंह ठाकुर मध्यप्रदेश वाले
‘मैं किसी के बाप से डरता हूँ क्या ? मेरा सीना 28 इंच का ही सही लेकिन जितना है सालिड…
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फिल्म समीक्षा: अमर सिंह चमकीला : जर्रे से सितारा बनने की संगीतमय कहानी
‘यह दलित मजदूर धन्नी राम के पंजाब का एल्विश कहा जाना वाला मकबूल पंजाबी गायक अमर सिंह चमकीला बनने की…
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व्यंग्य- चाय फ्रॉम होम
‘मोदी जी को तो वसुधैव कुटुंबकम् के मानने वाले हैं । सब रिश्ते नाते, संबंध निभाने पड़ते हैं । फरवरी…
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व्यंग्य- ऑटो फेयर
‘यहाँ तो एक सामान्य बुलडोज़र तक इतना समझदार होता है कि वह अपराधी का धर्म, जाति, वस्त्र आदि पहचान कर…
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व्यंग्य- किससे किसकी रक्षा ?
‘ऐसे प्रोजेक्ट मोदी जी के अलावा और किसके हो सकते हैं ? कौन है जो इस लोक से बेखबर, दिन…
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जसिंता केरकेट्टा की कविता- सभ्यताओं के मरने की बारी
ऑक्सीजन की कमी सेबहुत-सी नदियाँ मर गईं पर किसी ने ध्यान नहीं दियाकि उनकी लाशें तैर रही हैं मरे हुए…
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व्यंग्य – लुंगी में लोकतंत्र
‘जब पेंट शर्ट पहनकर आये तब वोट डाल सके । कुछ तो खयाल रखा जाना चाहिए शालीनता और संस्कारों का…
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नरेश सक्सेना की कविता – सुनो चारुशीला
तुम अपनी दो आँखों से देखती हो एक दृश्यदो हाथों से करती हो एक काम दो पाँवों सेदो रास्तों पर…
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व्यंग्य – झूठ और बाललीला
‘इस कविता से बच्चे आज थोड़ी चीनी के लिए झूठ बोलना सीख रहे हैं कल को झूठ बोलकर नीरव मोदी,…
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