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जसिंता केरकेट्टा की कविता- सभ्यताओं के मरने की बारी

ऑक्सीजन की कमी से
बहुत-सी नदियाँ मर गईं

पर किसी ने ध्यान नहीं दिया
कि उनकी लाशें तैर रही हैं

मरे हुए पानी में अब भी
नदी की लाश के ऊपर

आदमी की लाश डाल देने से
किसी के अपराध पानी में घुल नहीं जाते

वे सब पानी में तैरते रहते हैं
जैसे नदी के साथ

आदमी की लाशें तैर रही हैं
मरे हुए पानी में अब भी

एक दिन जब सारी नदियाँ
मर जाएँगी ऑक्सीजन की कमी से

तब मरी हुई नदियों में तैरती मिलेंगी
सभ्यताओं की लाशें भी

नदियाँ ही जानती हैं
उनके मरने के बाद आती है

सभ्यताओं के मरने की बारी।

-जसिंता केरकेट्टा

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