व्यंग्य – अधम शरीर
‘ हम तो छह महिने लुंगी में रहने वाले, हफ्ते दस दिन में एक बार ट्रिमर से दाढ़ी खुरचने वाले है और तू हमें लज्जित इस तरह कर रहा है जैसे हम कोई 15 लाख का सूट पहने हुए हैं या दिन में दस बार नए नए महँगे परिधान बदलते हैं । ‘ पढ़ें रमेश जोशी का व्यंग्य…
हजामत बनवाए दो महिने हो गए । आजकल दिन बहुत जल्दी निकल आता है ।जब दुकान पर जाते हैं तो भीड़ लगी मिलती है । पहले वाला ज़माना तो रहा नहीं । अब तो कोई दाढ़ी बनवाता है तो भी उसमें सोलह शृंगार निकल आते हैं । और उसे किसी विशेष तरीके, नक्शे और डिजाइन में ऐसे सजाया जाता जैसे किसी मंगल यान का ड्रॉइंग बनाया जा रहा हो । कटिंग बनवाने वाला बाल भी रँगवाता है, भौहें भी सँवरवाता है जैसे कि किसी दुल्हिन या दूल्हे का मेकअप हो रहा हो । कई बार तो हम बात देखते देखते दुखी होकर लौट आते हैं । लेकिन अब चूंकि एक तो गरमी बढ़ गई दूसरे हमें मोदी जी की तरह लंबे बाल रखने की आदत नहीं । सो सबसे पहला नंबर लगाने के लिए साढ़े छह बजे ही चाय पीकर दुकान पर पहुँच गए । दुकानदार झाड़ू लगा रहा था । हमारा पहला नंबर ।
अब आराम से नहायेंगे, नाश्ता करेंगे । आये तो देखा तोताराम बैठा हुआ । हम कुछ कहें उससे पहले वही चालू हो गया, बोला- हो गया सोलह शृंगार, अब उबटन और लगा ले । लगता है तुझे ही अब ममता दीदी की जगह भाजपा के मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई जाएगी । या फिर मोदी जी या अमित शाह की जगह तुझे ही कोलकाता में रोड़ शो करना है । इस बुढ़ापे में भी इस नश्वर देह के प्रति इतना मोह ।
हमने कहा- आज तेरा व्यंग्य कुछ ज्यादा नहीं हो गया ? हम तो छह महिने लुंगी में रहने वाले, हफ्ते दस दिन में एक बार ट्रिमर से दाढ़ी खुरचने वाले है और तू हमें लज्जित इस तरह कर रहा है जैसे हम कोई 15 लाख का सूट पहने हुए हैं या दिन में दस बार नए नए महँगे परिधान बदलते हैं । जहाँ तक देह की बात है तो कौन कहता है कि देश नश्वर नहीं है । यह तो राम ने खुद कहा है । बालि के वध के बाद विलाप करती तारा से वे कहते हैं-
“छिति जल पावक गगन समीरा
पंच रचित अति अधम शरीरा”
बोला- और क्या ? सभी शरीर इन्हीं पाँच तत्वों से बने हैं इसलिए सब नश्वर हैं और अधम भी । जब तक इनमें कोई और विशिष्ट तत्त्व शामिल नहीं होता यह शरीर अधम और नश्वर ही रहेगा ।
हमने पूछा- क्या सभी मानव देहधारी अधम ही होते हैं ? इस अधमता से मुक्त होकर उत्तमता का कोई मार्ग उनके लिए नहीं है ?
बोला- है । एक और श्रेष्ठ तत्त्व । जैसे राम में रामत्त्व, कृष्ण में कृष्णत्त्व , बुद्ध में बुद्धत्त्व ।
हमने पूछा- क्या गाँधीत्त्वा , नेहरूत्त्व , पटेलत्त्व, भगत सिंहत्त्व, सुभाषत्त्व, कलामत्त्व आदि से काम नहीं चलेगा । मनुष्यत्त्व से काम चले तो हम थोड़ा मनुष्यत्त्व का तो दावा कर सकते हैं ।
बोला- कह नहीं सकता लेकिन अभी एक नया तत्त्व खोजा गया है । भारत के एक ज्ञान-विज्ञान प्रधान राज्य गुजरात के एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ‘महाराजा सयाजीराव गायकवाड विश्वविद्यालय, बड़ोदरा’ के समाजशास्त्र विभाग ने एक नया तत्त्व खोजा है- मोदीतत्त्व । उसका अध्ययन करने और उसे जीवन में उतारने के बाद यह जीवन अधम नहीं रहेगा ।
विश्वविद्यालय ऐसे ही मोदी को मक्खन लगाने के लिए ऐसा नहीं कर रहे हैं । इसके बारे में कोई 500-600 कबीर साफ कह गए हैं-
क्षिति जल पावक गगन समीरा
पंच रचित यह अधम सरीरा
छठवाँ ‘मोदी तत्व’ मिले तो
जन्म धन्य हो जाय कबीरा ।
हमने पूछा- तो फिर इस तत्त्व में किस सत्कर्म का सबसे अधिक योगदान और महत्व माना जाएगा ?
मगरमच्छ का बच्चा उठकर लाना, चाय बेचना, शादी करके पत्नी का परित्याग करना, भीख मांगना या दिन में चार बार नए नए वस्त्र धारण करना ।
बोला- नहीं ये तो कोई भी कर सकता है । प्रधानममंत्री बनकर सब संसाधन आत्मप्रशंसा और विज्ञापन में लगाए बिना यह नहीं हो सकता ।
हमने कहा- लेकिन यह टिकेगा कब तक ?
बोला- साफ बात है जब तक आप पद पर हैं । तूने वह कहानी सुनी कि नहीं ? जब नवाब साहब की कुतिया बीमार हुई तो सारा गाँव हालचाल पूछने आया लेकिन जब नवाब साहब मरे तो चार कंधे भी नहीं जुटे ।
यह चतुर चमचों का युग है मास्टर ।
हमने कहा- चल, लास्ट में तूने सच बोल दिया , यही दुनिया के व्यवहार का सार तत्त्व है । रुक, अभी चाय बनवाते हैं ।
– रमेश जोशी



