प्रो. रविकांत का लेख- दलित साहित्य के पचास साल

 

‘दलितों द्वारा दलितों के लिए लिखा जाने वाला दलित साहित्य दलितों के संघर्ष और चेतना का विमर्श है। दलित विमर्श सिर्फ एक साहित्यिक शैली नहीं है बल्कि यह अखिल भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन है।’ पढ़ें पूरा लेख…

दलित साहित्य मुक्ति का साहित्य है। सदियों से जारी शोषण और अन्याय के खिलाफ खड़े होकर दलित साहित्यकारों ने नकार, प्रतिरोध और आक्रोश को अभिव्यक्त किया। दलित साहित्य में फूलों की कोमलता नहीं, आग की तपिश है। उसमें दैहिक सौंदर्य नहीं भौतिक कुरूपता है, कामुकता नहीं जीवन का उजाड़ और ठूंठपन है। दलित साहित्य में कल्पित स्वर्गलोक की जगह दक्खिन टोले की बजबजाती सच्चाइयां हैं। दलित साहित्य में जीवन का संघर्ष, जाति का दंश, अपमान की यातना और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह है। इस विद्रोह की ज्वाला में दर्जनों हाथ वाले देवता और अवतारवादी ईश्वर जलकर भस्म हो गए। आखिर यह कैसा ईश्वर है जो हीराडोम के शब्दों में, ‘हमनी के दुःख भगवनओ न देखताजे, हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।’1जो ईश्वर ब्राह्मणवादी शोषण और उत्पीड़न को देखकर भी एक अछूत की शिकायत को अनसुनी करता है, उस ईश्वररूपी पाखंड और अंधविश्वास को दलित साहित्यकारों ने उखाड़ फेंका। उसने विवेक, विज्ञान और विकास का मार्ग चुना। संविधान के रास्ते शिक्षा के जरिए सम्मान, स्वाभिमान और संपत्ति हासिल करने के सपने देखे। उसने तोड़ डाली परंपरा और परतंत्रता की बेड़ियां, उजाड़ डाले मंदिर और मठ, खंडित कर डाली मूर्तियां, मिटा दिए पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक के मिथक। समस्त ब्राह्मणवादी बाधाओं को मिटाकर दलित साहित्य ने मनुष्यता का विमर्श खड़ा किया।

मनुवादी व्यवस्था में दलितों को शिक्षा, संपत्ति और शस्त्र से विहीन करके अछूत बना दिया गया। वर्ण व्यवस्था को हिंदू धर्मशास्त्रों- स्मृतियों द्वारा ईश्वरीय बना दिया गया। इस व्यवस्था के कुचक्र को तोड़ने के लिए धर्मशास्त्रों को खारिज करना आवश्यक था। डॉ अंबेडकर ने महाड़ चाबदार तालाब से पानी पीने के आंदोलन के दौरान 25 दिसंबर 1927 को मनुस्मृति का दहन किया। दलित साहित्यकारों ने बाबा साहब के विचारों और संघर्षों को साहित्य में अभिव्यक्ति दी। इंग्लैंड और अमेरिका स्थित दुनिया के दो सबसे मशहूर विश्वविद्यालयों से तालीम हासिल करके भारत लौटे डॉ. अम्बेडकर ने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान दलितों-वंचितों की सामाजिक आज़ादी के लिए लड़ाई छेड़ी। इसके बाद संविधान निर्माता और स्वतंत्र भारत के बतौर कानून मंत्री बाबा साहब ने दलितों, पिछड़ों और महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित किए। वंचितों के मसीहा डॉ. अंबेडकर ने दलितों को शिक्षा की रोशनी दी। दलित साहित्यकारों ने बाबा साहब के सपनों के किरदारों को रचा। गरीबी और अभाव में जीते, पल-पल अपमानित होते ऐसे दलित साहित्य के नायक बनते हैं, जो सवर्ण सामंतवाद और सत्तातंत्र से जूझते हुए तालीम हासिल करते हैं तथा सरकारी नौकरियों में बड़े औहदों पर पहुंचकर अपने समाज के लिए मिसाल बनते हैं। दलित साहित्यकारों के लिए बाबासाहब प्रेरणा ही नहीं पथप्रदर्शक भी हैं। डॉ अम्बेडकर ने साहित्यकारों को संबोधित करते हुए कहा था, “हमारे जीवन कर्तव्य और संस्कृति की ओर हमारा ध्यान नहीं है। अंतर्मुख होकर विचार करने से हमारे सामने वह भयावह स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कि हमारे जीवन मूल्य और सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने के लिए दलित साहित्यकारों को जागरूक और प्रयत्नशील हो जाना चाहिए। तुम्हारे उपन्यास, कथाओं की सीता, लक्ष्मण रेखा पार करके आगे जा चुकी है। दुर्योधन के दरबार में द्रौपदी का वस्त्रहरण हो रहा है। शकुंतला को दुष्यंत अपना सही परिचय नहीं दे रहा है। इसलिए शकुंतला को वनवास हो रहा है। ऐसी स्थिति में साहित्यकारों का मैं आह्वान करता हूं कि वे विभिन्न साहित्यिक विधाओं के द्वारा उदात्त जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक मूल्यों को रेखांकित करें। अपने लक्ष्य को मर्यादा में मत बांधो, उसे और अधिक विशाल बनने दो। वाणी का विस्तार करो। अपनी लेखनी को केवल अपने प्रश्नों तक सीमित मत रखो। उसे तेजस्वी बनाओ जिससे गांव में फैला अंधकार दूर हो सके। यह मत भूलो कि इस भारत देश में उपेक्षित दलितों का बहुत बड़ा विश्व है। अपनी रचनाओं द्वारा उनकी वेदना को समझकर उनके जीवन को उज्ज्वल बनाने की कोशिश करो। यही मानवता की सच्चाई है।”

दलितों द्वारा दलितों के लिए लिखा जाने वाला दलित साहित्य दलितों के संघर्ष और चेतना का विमर्श है। दलित विमर्श सिर्फ एक साहित्यिक शैली नहीं है बल्कि यह अखिल भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन है। इसका आरम्भ सर्वप्रथम मराठी में हुआ। ओमप्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में, “दलित साहित्य का सर्वप्रथम आगाज मराठी में हुआ। डॉ आंबेडकर के मुक्ति आंदोलन ने दलितों में एक नई चेतना पैदा की, जिसके फलस्वरुप दलित साहित्य की रचनात्मकता का उदय हुआ; जो मानवीय सरोकारों की अभिव्यक्ति बना। ऐसा साहित्य जिसमें दलितों की वाणी जो हजारों साल से मूक बनी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षणिक विद्वेष और नारकीय जीवन की दग्धताओं को वहन कर रही थी, मुखर होकर स्वाभिमान और अस्मिता की लड़ाई लड़ने के लिए सामने आकर खड़ी हो गई।” मराठी में दलित साहित्य के उद्भव पर टिप्पणी करते हुए चर्चित दलित लेखिका विमल थोराट ने लिखा है कि, “दलित साहित्य का उद्भव मराठी साहित्य में एक साहित्यिक, सामाजिक विद्रोह के रूप में हुआ है। जिसके माध्यम से दलित शोषित समाज का विद्रोह मुखरित हुआ है। जिसे अछूत कहकर सदियों तक मनुष्य जीवन की सभी आवश्यकताओं और सुविधाओं से वंचित रखा गया और जिसे केवल दुख, वेदना, गुलामी, अपमान आंसुओं से भरी जिंदगी बिताने के लिए विवश किया गया। हिंदू धर्म वर्ण-व्यवस्था ने जातियों के लिए कटघरे से निर्मित इस समाज व्यवस्था में उसे वह स्थान दिया, जो गांवों, नगरों के अहातों से दूर था और जहां केवल अंधकार ही अंधकार था। उसे अंधकार जीवन से निकालकर उनके जीवन में रोशनी लाने का कार्य डॉ. अंबेडकर ने किया।”

 मराठी, तमिल, मलयालम, कन्नड़, पंजाबी, बांग्ला से लेकर हिंदी आदि भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य का उत्थान हुआ। पिछले 50 सालों में दलित साहित्य ने अपनी विशिष्ट पहचान ही नहीं बनाई बल्कि आज यह मुख्य धारा का साहित्य है।

1970 के दशक में हिंदी में दलित लेखन की शुरुआत हुई। यह वो दौर था जब हिन्दू मिथकों का वामपंथीकरण हो रहा था। प्रगतिशीलता के नाम पर किसान मजदूर की तो बात हो रही थी, लेकिन जाति के प्रश्न पर सामूहिक चुप्पी थी। दलित साहित्य ने अपनी चीख से इस खामोशी को बेधा। फिर भी शुरुआती दौर में दलित साहित्य को कोई तवज्जो ही नहीं दी गई। तब दलित साहित्यकारों ने प्रगतिशीलों के प्रेरक तुलसीदास और प्रेमचंद पर हमले शुरू किए। उन्हें ब्राह्मणवादी मूल्यों का पोषक और सर्जक बताया। इसके बाद दलित साहित्य की तीखी आलोचना शुरू हुई। दलित साहित्य को घृणा और विद्वेष का साहित्य कहा गया। जबकि सच्चाई यह है कि दलित साहित्य हिंदू वर्णव्यवस्था में निहित नफरत और ऊंच नीच की भावना के नकार का साहित्य है। यह प्रेम और मनुष्यता का साहित्य है। 

दलित साहित्य निजी अनुभूति का साहित्य है। सदियों से पीड़ित दलितों की वेदना की अभिव्यक्ति दलित साहित्य में हुई है। गैर दलित इस यातना को कभी नहीं महसूस कर सकते।इसीलिए ज्योतिबा फुले ने कहा था कि ‘राख ही जानती है, जलने की पीड़ा। जो सहता है सो कहता है।’ दलित साहित्य में यातना से उपजे दर्द और वेदना की अभिव्यक्ति ही नहीं बल्कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था के प्रति आक्रोश भी है। दलित चेतना इस शोषणकारी व्यवस्था को जलाकर नष्ट करने को उद्धत है। जब जातिगत शोषण के खिलाफ दलित साहित्यकारों ने सवर्ण सामंती जातियों के वर्चस्व के हथकंडों और षड्यंत्रों को उजागर किया तो दलित साहित्य पर जातिवादी होने के आरोप लगाए जाने लगे। असल में, दलितों के शोषण का कारण जाति व्यवस्था है, तब दलित साहित्यकार जाति का समर्थन कैसे कर सकते हैं? दलित साहित्यकार और चिंतक डॉ. एन. सिंह ने ठीक लिखा है कि, “दलित साहित्य जातिवादी व्यवस्था का घोर विरोधी है, जबकि कुछ साहित्यकार और आलोचक उस पर जातीय वैमनस्य भड़काने और जातिवादी होने के आरोप लगाते हैं। लेकिन समझा जा सकता है कि जिस व्यक्ति ने जाति के कारण शताब्दियों तक अपमान की यातना को झेला हो वह जातिवादी कैसे हो सकता है? जातिवादी वह होगा जिसे अपनी संपूर्ण मूर्खता और अज्ञान के बावजूद जाति के कारण ही सम्मान मिला हो। अतः दलित साहित्य जातिवाद के उच्छेद के लिए सर्वात्मना प्रयत्नशील दृष्टिगोचर होता है।” वास्तव में, दलित साहित्य स्वतंत्रता, समानता और बंधुता का पक्षधर है। दलित साहित्य लोकतांत्रिक मूल्यों का पोषक और अंततः मानवतावादी है।

– रविकांत

Related Articles

Back to top button