अवाम का महबूब शायर बशीर बद्र
‘उनके जीवन की एक दुखद विडंबना यह भी रही कि अंतिम वर्षों में वे डिमेंशिया (स्मृति-लोप) जैसी बीमारी से जूझते रहे। जिस शायर ने यादों को इतने सुंदर और अविस्मरणीय शब्द दिए, वही धीरे-धीरे स्मृतियों के धुंधलके में खोता चला गया।’ पढ़ें शिव कुमार पटेल का पूरा आलेख…
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समंदर नहीं देखा
कल बशीर बद्र के देहांत की ख़बर जैसे ही देखा वैसे ही ये शेर यादों से निकलकर कौंधने लगा। कोई दस साल पहले की बात है। मैंने अपने जीवन में पहली बार कोई शेर सुना था और फिर इसे अपने मोबाइल पर सर्च करके पढ़ा। उस उम्र में इस शेर का का क्या अर्थ समझ में आया था नहीं कह सकता, लेकिन उसकी उदासी और उसकी संगीतात्मकता भीतर कहीं उतर गई थी। पहली बार लगा था कि यह केवल महफ़िलों की गाई जाने वाली कोई चीज नहीं; बल्कि व्यक्ति के अकेलेपन, उसकी यादों और उसके प्रेम को अभिव्यक्त करने की एक कोमल भाषा भी हो सकती है। उसके बाद शायरी की दुनिया में सबसे पहले बशीर बद्र ही मेरी पढ़ाई का हिस्सा बने।
बशीर बद्र केवल एक शायर नहीं थे; वे हिन्दी-उर्दू की साझा सांस्कृतिक विरासत की उन आख़िरी बड़ी आवाज़ों में थे जिनकी शायरी किताबों से ज़्यादा लोगों की बातचीत में जीवित है। बहुत कम शायर ऐसे होते हैं जिनके शेर लोग बिना किसी औपचारिक साहित्यिक पढ़ाई-लिखाई के भी याद रखते हैं। बशीर बद्र उन्हीं विरले शायरों में थे। उनकी शायरी की सबसे बड़ी ख़ासियत उसकी सहजता थी। उन्होंने कठिन उर्दू या दुरूह प्रतीकों के बजाय रोज़मर्रा की भाषा में हमारे अकेलेपन, प्रेम और यादों की दुनिया को एक आवाज़ दी। यही कारण है कि उनकी ग़ज़लें नई पीढ़ियों तक भी लगातार पहुँचती रहीं। उनकी भाषा में एक सादगी थी, एक लय थी | ऐसा लगता था जैसे कोई आत्मीय व्यक्ति धीरे-धीरे हमसे बात कर रहा हो। उनकी ग़ज़लों में प्रेम है, बिछोह है, यादें हैं, लेकिन सब कुछ एक संयमित ताप के साथ। वे चीखते नहीं बल्कि धीरे से याद आते हैं। उनके कुछ शेर हैं —
ख़ुश रहे या बहुत उदास रहे
ज़िन्दगी तेरे आस-पास रहे
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए
बशीर बद्र की ताक़त यही थी कि वे बहुत साधारण शब्दों में मनुष्य होने की सबसे मानीखेज बातें आसानी से कह देते थे। आज जब सार्वजनिक जीवन की भाषा लगातार आक्रामक और संवेदनहीन होती जा रही है, तब बशीर बद्र की शायरी को नए सिरे से पढ़े जाने की ज़रूरत है। वे हमें याद दिलाते हैं कि भाषा केवल सत्ता या प्रतिरोध का माध्यम नहीं होती; वह मनुष्य के भीतर बची हुई नरमी की भी जगह होती है। आज जब समूचे विश्व में ‘रुल-बेस्ड ऑर्डर’ ख़त्म हो चुका है, हिंसा और युद्ध कैसी स्थितियाँ अब चकित नहीं करती, हत्याएँ सामान्य लगने लगी हैं, तब बशीर बद्र का एक शेर सिर्फ साहित्य नहीं, बल्कि सामाजिक नैतिकता का बयान लगता है–
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
बशीर बद्र की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण यह भी था कि उन्होंने ग़ज़ल को केवल साहित्यिक महफ़िलों तक सीमित नहीं रहने दिया। उनके शेर मुशायरों से निकलकर आम लोगों की ज़िन्दगी में शामिल हो गए। प्रेमपत्रों में, डायरी के पन्नों में, कॉलेज की बातचीतों में, सोशल मीडिया के स्टेटस में — हर जगह उनकी उपस्थिति दिखाई देती है। बहुत-से लोग शायद ग़ज़ल की परंपरा के बारे में कुछ न जानते हों, लेकिन बशीर बद्र के दो-चार शेर उन्हें ज़रूर याद होंगे।
बशीर बद्र को पढ़ते हुए हमेशा लगता है कि वे बड़े दावों और घोषणाओं के शायर नहीं हैं। वे छोटी-छोटी चीज़ों में मनुष्य की संवेदना और गरिमा तलाशते हैं। उनकी शायरी में कोई नाटकीय क्रांति नहीं है, लेकिन मनुष्य के भीतर बची हुई कोमलता को बचाए रखने की एक शांत कोशिश ज़रूर है। इसी कारण उनकी ग़ज़लें बार-बार पढ़ी जाती हैं और आसानी से लम्बे समय तक जेहन में याद रहती हैं। शायद इसीलिए नामवर सिंह ने बशीर बद्र को ‘दुनिया में ग़ज़ल का सबसे मशहूर शायर’ कहा था।
इन सबसे परे बशीर बद्र का जीवन केवल नर्म भावनाओं की दुनिया नहीं था। उन्होंने अपने समय की त्रासदियों को भी झेला। 1987 के मेरठ के दंगों में उनका घर जल गया था। वह घटना उनके भीतर बहुत गहरे तक दर्ज हुई होगी। शायद तभी उन्होंने लिखा –
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
बाद में वे भोपाल आ गए, लेकिन विस्थापन का दर्द उनकी शायरी में बना रहा। इसी वजह से उनकी ग़ज़लों में घर, याद और बिछड़न का भाव इतने मार्मिक ढंग से सामने आता है। उनके जीवन की एक दुखद विडंबना यह भी रही कि अंतिम वर्षों में वे डिमेंशिया (स्मृति-लोप) जैसी बीमारी से जूझते रहे। जिस शायर ने यादों को इतने सुंदर और अविस्मरणीय शब्द दिए, वही धीरे-धीरे स्मृतियों के धुंधलके में खोता चला गया। यह दृश्य केवल दुखद नहीं, बल्कि गहनतम रूप में जीवन की निठुराई भी दिखाता है कि कैसे जीवन अंततः हर बड़े रचनाकार को उसकी अपनी ही रचना के सामने खड़ा कर देता है –
पलकें खोलो, देखो ज़रा
लाए हैं हम –
ख़्वाबों के तकिए
आँखों के बादल
मौसम के काँधे
पत्तों के आँचल
पलकें खोलो देखो ज़रा
लाए हैं हम
बातों के झरनें
आहट की बोली
बादल में बहती कश्ती अकेली
पेड़ों पे बारिश
पलकों का पानी
तुलसी के पीछे रातों की रानी
पलकें खोलो, देखो ज़रा
लाए हैं हम
(बशीर बद्र की एक नज़्म ‘लाए हैं हम’ का एक अंश)
-शिव कुमार पटेल



