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जिस राजघराने में हुआ जाति के कारण अपमान, वर्षों बाद उसी महल में हुआ राजसी ठाठ के साथ सम्मान…कौन थे जोधपुर के “भंगी जाति के उपकुलपति” ?

राजस्थान की जोधपुर रियासत में कभी एक दलित बच्चे की माँ को उसकी जाति के कारण अपमान सहना पड़ा था। वक्त ने करवट ली और वर्षों बाद उसी रियासत की धरती पर उस बच्चे का राजसी सम्मान के साथ स्वागत हुआ। यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी प्रतीत होती है, लेकिन यह एक जीवंत सच है—उस दलित लेखक के जीवन का, जिसने अभाव, भेदभाव और संघर्षों के बावजूद हार नहीं मानी। अपने साहस, प्रतिभा, जिजीविषा और संकल्प-शक्ति के बल पर उन्होंने न केवल समाज में अलग पहचान बनाई, बल्कि उन कठोरतम परिस्थितियों को भी बदलकर रख दिया, जिन्होंने कभी उन्हें और उनके परिवार को अपमानित किया था.
वह दलित लेखक थे -श्याम लाल जैदिया! जिन्होंने अपनी आत्मकथा ‘एक भंगी कुलपति की अनकही कहानी’ में अपने नाटकीय जीवन के इस अद्भुत प्रसंग का बेहद मार्मिकता से उल्लेख किया है।


अपनी आत्मकथा में श्याम लाल जैदिया बताते हैं कि राजसी रियासतों में भंगी जाति के लोगों की स्थिति बहुत दुःखद थी। हर भंगी को जोधपुर की गलियों से गुजरते समय ‘पाइस’ शब्द चिल्लाना पड़ता था. ‘पाइस’ का अर्थ है दूरी रखना । वे यह भी बताते हैं कि उस दौर में अछूत समझे जाने वाले व्यक्तियों को गलियों में स्वतंत्र घूमने की आजादी तक नहीं थी। भंगी जाति के व्यक्ति अपने राजा को देख भी नहीं सकते थे क्योंकि वे नीच जाति के माने जाते थे।


अपने जीवन के एक अपमानजनक प्रसंग को याद करते हुए वे बताते हैं कि ‘ एक बार मेरी मां को सफाई कार्य हेतु किले में बुलाया गया। चूंकि वे नगरपालिका की कर्मचारी थीं, उन्हें इस कार्य हेतु वहां जाना था। मैं भी अपनी मां के साथ किले पर गया। कार्य पूरा करने के पश्चात जब हम किले से वापस लौट रहे थे तो एक घटना घटी जिससे मुझे एक सबक मिला। अचानक कुछ लोगों के साथ महाराजा वहां आ गए। कुछ कट्टरपंथी लोगों ने मेरी मां को पहचान लिया तथा वे हमें देख कर क्रोधित हो गए। वे जोर से चिल्लाने लगे, ‘पीछे हटो’, ‘यहां से तुरंत भाग जाओ’।मेरी मां आश्चर्य चकित रह गई। वे रास्ते से हटकर एक एकांत स्थान की ओर चली गईं।’

ऐसी अपमानजनक और भेदभावपूर्ण परिस्थितियों के बाद‌ भी श्याम जैदिया जी ने हार नहीं मानी और अपने में जीवन‌ में बड़ा मुकाम हासिल किया । अपनी आत्मकथा में वे बताते हैं कि सन् 1996 में वह जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के उपकुलपति बने। इस अवसर पर जोधपुर के महाराजा गजसिंह ने उन्हें शुभकामना संदेश भेजा था।
इस वर्ष महाराजा जोधपुर के जन्मदिन के शुभ अवसर पर उन्होंने जैदिया जी को उम्मेद भवन में रात्रि भोजन में सम्मिलित होने का आमंत्रण‌ भी भेजा था।


वे कहते हैं कि ‘मैं महाराजा साहब के जन्मदिन समारोह में सम्मिलित होने में हिचकिचा रहा था क्योंकि मैंने सोचा कि चूंकि मैं एक अछूत भंगी जाति का व्यक्ति हूं, अतः लोग मेरे साथ किस प्रकार का व्यवहार करेंगे। इस बात की शंका मेरे मस्तिष्क में थी क्योंकि पार्टी में राजपरिवारों के बड़े-बड़े लोग शामिल होंगे।’
अपने जीवन‌ के इस अद्भुत अनुभव का वर्णन करते हुए वे बताते हैं कि जब वे उम्मेद भवन महाराजा से मिलने पहुंचे तो ‘मैंने महाराजा साहब को बधाई दी तथा उनके दीर्घायु होने एवं सुखी जीवन की कामना की। महाराजा गजसिंह ने मुस्कराते हुए मेरा स्वागत किया तथा मेरे साथ हाथ मिलाया। प्रथम बार मैं महाराजा साहब से मिला था। वे देखने में सुंदर, आकर्षक, उदार एवं विनम्र थे और जन साधारण में बहुत लोकप्रिय थे।


मेरी उत्सुकता तब अधिक जागृत हुई जब वे स्वयं केंद्रीय कक्ष (सेंट्रल हॉल) तक मेरे साथ-साथ आए और जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के एक कुलपति के रूप में मेरा परिचय राजपरिवार के सदस्यों से करवाया।’
श्याम जैदिया जी आगे लिखते हैं कि ‘ पर्याप्त उत्साह के साथ समारोह आरंभ हुआ।शाही दम्पत्ति की शुभकामना हेतु अनेक लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए। समारोह में सरकारी अधिकारी, जोधपुर तथा जयपुर के अभिजन समाज के सदस्य उपस्थित थे। महाराजा साहब ने स्वयं अपने लोगों को निर्देश दिया कि वे मेरा विशेष रूप से ख्याल रखें तथा वे स्वयं मेरे आवभगत का पूरा ख्याल रख रहे थे। मेहमानों को विभिन्न प्रकार के पेय एवं मदिरा प्रस्तुत की जा रही थीं। मैंने मात्र साधारण पेय स्वीकार किया।विभिन्न प्रकार के मांसाहारी भोजन जैसे मछली, मटन, चिकन आदि इतने अच्छे थे कि मुझे पर्याप्त पसंद आए। मैं महाराजा साहब के अपने प्रति व्यवहार एवं स्नेह से पर्याप्त आश्चर्यचकित था।’

वे कहते हैं‌ कि कुछ दिनों के बाद उन्होंने अपनी वृद्ध मां को जब सारी घटना सुनाई कि मैं महाराजा गजसिंह जी से उम्मेद भवन में मिलने गया था. (जहां मेरी मां ने भवन के निर्माण कार्य में, श्रमिक के रूप में कार्य किया था) तथा जोधपुर के अभिजात लोगों के साथ रात्रिभोज किया था। चिंता एवं उत्सुकतावश उन्होंने तुरंत मुझसे यह प्रश्न पूछा कि क्या मैं महाराजा साहब से मिला? उनसे हाथ मिलाया? तथा उनके साथ भोजन किया? मेरा उत्तर हां में था। तो भी उनको विश्वास नहीं हुआ। चूंकि उनको समाज के निम्न अछूतों में निम्नतम सोपान पर होने का कटु अनुभव स्वयं प्राप्त है, अतः वे इतिहास एवं समाज का जड़ से आकलन करने की बेहतर स्थिति में हैं।

श्याम जैदिया जी के महाराजा साहब से मिलने पर उनकी मां इतनी अधिक प्रसन्न हुई कि उन्होंने अपने हाथों को उनके चेहरे तथा सर पर रखा. उनकी मां ने उन्हें सुखी, संपन्न एवं दीर्घायु होने की प्रार्थना की। उनके लिए यह एक महान उपलब्धि थी क्योंकि उनका पुत्र मारवाड़ राज्य में प्रथम अछूत भंगी था जिसे दरबार साहब के हाथों इस प्रकार का सम्मान प्राप्त हुआ था।

श्याम लाल जैदिया अपने जीवन के इस अविस्मरणीय पल के विषय में कहते हैं कि ‘मैं अपने अतीत को याद कर रहा था, जब मैं तथा मेरी मां मेहरानगढ़ किले से निकाले गए थे। अनेक कठिनाइयां सही थीं तथा अछूत होने के नाते लोगों की गालियां बर्दाश्त की थीं। उसी अछूत भंगी युवक का एक कुलपति के रूप में उसी किले में, उसी राजघराने के द्वारा सम्मान किया जा रहा था।यह मेरे जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि थी जो दीर्घकाल तक सुखद रूप में मेरे स्मरण पटल पर रहेगी।’

-रोशनी रावत, लेखिका लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं.

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