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देश बंटवारे का ज़हर चित्रित करता निर्मला भुराड़िया का उपन्यास ‘ज़हरखुरानी’

‘लेकिन इतनी बड़ी और भयावह घटना पर जो विराट हूक दिखनी चाहिए थी, वह‌ हिंदी के संसार में अदृश्य और अनुपस्थित है। यह कुछ शर्म की बात लगती है कि जब मानव-इतिहास की सबसे त्रासद घटना घट रही थी तो हिंदी के बड़े लेखक उसे दर्ज करना तो दूर, उसे ठीक से देख पाने में भी असमर्थ थे।’ पढ़ें सुपरिचित लेखक प्रियदर्शन की पूरी समीक्षा…

भारत-पाक बंटवारा मानवता के इतिहास के सबसे स्याह पन्नों में एक है- सबसे रक्तरंजित- जिसकी कहानी पता नहीं क्यों- हिंदी साहित्य में ढंग से दर्ज नहीं हुई।‌ ले-देकर यशपाल का ‘झूठा सच’ इकलौती कृति है जिसमें इस बंटवारे की भयावहता को हम कुछ पढ़‌‌ पाते हैं। इसके अलावा ‘तमस’ उस अंधेरे दौर के राजनीतिक छल-कपट को, सांप्रदायिकता के उभार को और उसके आगे पिसती-पिटती कातर मनुष्यता का मार्मिक बयान है। कुछ अन्य कहानियों-उपन्यासों‌ में बंटवारा एक ज़िक्र या संदर्भ की तरह आया है। कृष्णा सोबती के ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान तक’ में भी इसकी कुछ तस्वीरें हैं। लेकिन इतनी बड़ी और भयावह घटना पर जो विराट हूक दिखनी चाहिए थी, वह‌ हिंदी के संसार में अदृश्य और अनुपस्थित है। यह कुछ शर्म की बात लगती है कि जब मानव-इतिहास की सबसे त्रासद घटना घट रही थी तो हिंदी के बड़े लेखक उसे दर्ज करना तो दूर, उसे ठीक से देख पाने में भी असमर्थ थे।
लेकिन इतिहास शायद स्मृति का पीछा करता रहता है। या स्मृति इतिहास को अपनी जली हुई पीठ पर संभाले रहती है। बीते दिनों निर्मला भुराड़िया का उपन्यास ‘ज़हरखुरानी’ पढ़ते हुए उस सिहरन और भयावहता को महसूस करता रहा जो बंटवारे का असली अर्थ समझाने वाली कोई कहानी पैदा कर सकती है। निर्मला भुराड़िया ने बहुत विस्तार से विभाजन के दौर की हिंसा के असली मायने दर्ज किए हैं- अपने पुश्तैनी घर को न छोड़ने की ज़िद, अपनी ज़मीन बचाने के लिए जान देने का जज़्बा, भारत के लगभग नामुमकिन लगते बंटवारे से लेकर पाकिस्तान बनने की हक़ीक़त और इंसान के हिंदू मुसलमान सिख में बदल जाने की वहशत, सियासत और मज़हब के घोल से पैदा जुनून, एक हिंसा से ताक़त और वैधता पाती दूसरी हिंसा, एक नफ़रत से पैदा होती दूसरी नफरत, कटे हुए सिर, बिखरी हुई लाशें,‌औरतों के साथ होने वाली बर्बरता, हिंदू-सिख लाशों से भरी भारत आती ट्रेनें, मुस्लिम लाशों से भरी पाकिस्तान जाती ट्रेनें, जानवरों से भी बदतर जीवन जीने को मजबूर शरणार्थी, उनके कैंपों की नरक जैसी हालत, लगभग असंभव सी समाज-सेवा की कोशिश, पहचान छुपाने और बदलन के लिए कुछ भी कर गुज़रने की मजबूरी, परायों द्वारा लूटी जाती और अपनों द्वारा ठुकराई जाती औरतें, लाशों से पटे कुएं, खेतों में छुपे हत्यारे, लूटपाट का भयावह मंजर, इन सबके बीच और बावजूद एक-दूसरे को संभालने की कोशिश- उपन्यास जैसे पाठक को जकड़े रहता है, अवसन्न छोड़ जाता है।
निर्मला भुराड़िया इस बात को बहुत साफ़ ढंग से दर्ज करती हैं कि मज़हब के नाम पर की जाने वाली सियासत किस तरह इंसान को बांटती और तोड़ती चलती है। टकराव बस हिंदू मुसलमान का नहीं है, शिया-सुन्नी का भी है, अहमदिया का भी है, अगड़ी और पिछ़डी जातियों का भी है। वे यह भी देखती हैं कि बुरी तरह टूटने-बिखरने या बिल्कुल बर्बाद हो जाने के बावजूद मनुष्य खड़ा होने की कोशिश करता है, घर बनाता है, दुकान खोलता है और अंततः कहीं बसना चाहता है।
उपन्यास शुरू दरअसल बसने की कहानी से ही होता है। मंगल भवन नाम की एक इमारत से जिसमें एक संयुक्त परिवार रहता है। निर्मला बड़ी सूक्ष्मता से इस परिवार के अंतर्विरोधों की कथा भी दर्ज करती हैं- सबकी नज़र में सीधा, सुशील और आकर्षक बना मनोहर अपनी रिश्ते की बहनों के ही यौन शोषण की कोशिश करता है और लड़कियों की मांएं उनसे चुप रहने को ही कहती हैं। ठीक बगल के घर में पहले एक मुस्लिम परिवार और फिर एक सिख परिवार आ बसता है। ये सब बसने की कोशिश में हैं। सबकी पुरानी कथाएं हैं- कहीं से लुट कर, पिट कर, अपनों को गंवा कर एक ठिकाना खोजने की। उपन्यास में इतने सारे किरदार हैं कि कई बार उन्हें भूल‌ जाने का ख़तरा लगता है, लेकिन त्रासदी का एक बड़ा कोलाज इनसे बनता है- भारत-पाक बंटवारे का एक ‘गुएर्निका’, जिसमें फिर भी व्यक्तिगत कहानियां अलग से खुलती चलती हैं। मसलन सिंधी पोहेलाल और उनके परिवार की कहानी, गुरुबख्श और उसके खानदान की कहानी, चांद कौर की कहानी और बच्चे बंता सिंह की बेहद तकलीफ़देह कहानी, मिन्नी और उसके सवालों और उसकी सखियों की कहानी।
मिन्नी और उसकी सखियों की कहानी का धागा पकड़ कर निर्मला भुराड़िया उपन्यास को बिल्कुल मौजूदा समय तक ले आई हैं। इनमें आज का पाकिस्तान भी है और हिंदुस्तान भी। लंदन में बसा पाकिस्तानी परिवार हिंदुस्तानियों से रश्क करता है कि भारत में आधुनिकता और उदारता ज़्यादा है।‌ लेकिन बदलता भारत खुद को जिस मज़हबी अनुदारता की नई गर्त की ओर बढ़ता चला आ रहा है, उसकी ओर संकेत करने में लेखिका ने कोई गुरेज किया है। पशुरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा, टीवी चैनलों पर चल रही उन्मादी बहसें, फिर से राजनीति में धर्म के इतिहास का कुत्सित खेल- निर्मला भुराड़िया का यह उपन्यास एक तरह से हमें सावधान करता है कि हम किस राह पर जा रहे हैं।
यह सच है कि उपन्यास के इस आख़िरी हिस्से में पत्रकारिता वाली कुछ हड़बड़ी है,‌ लेकिन इस शिकायत के बावजूद यह हमारे समय का बेहद ज़रूरी उपन्यास है। क़ायदे से इसे जितनी चर्चा मिलनी चाहिए थी, मिल नहीं पाई है।

– प्रियदर्शन

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