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अनुशासन या सरकारी शिकंजा ? क्यों यूपी के विश्वविद्यालयों में ड्रेस कोड लागू करना चाहती है बीजेपी सरकार ?

‘मंत्री योगेंद्र उपाध्याय जिस ” सकारात्मकता , समरसता , अनुशासन और संस्कारित माहौल” की बात कर रहें हैं आखिर उसका क्या अर्थ है ? क्या यह सकारात्मकता और समरसता सबसे पहले उन राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखनी चाहिए जहाँ से ” गोली मारो सालों को ” जैसे हिंसक और सांप्रदायिक नारे लगाये जाते हैं ?’ पढ़ें रोशनी रावत का पूरा आलेख…

बीते दिनों उत्तर प्रदेश शासन‌ की ओर से एक कठोर और मनमाना आदेश जारी किया गया। 20 मई को एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अनिवार्य रूप से ड्रेस कोड लागू करने की बात कही। जिसके तुरंत बाद उ०प्र० उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने ” गुणवत्तापरक शिक्षा, सकारात्मक, अनुशासित और संस्कारित माहौल ” का हवाला देते हुए अनिवार्य ड्रेस कोड लागू करने का फरमान जारी कर दिया । बीजेपी सरकार के इस आदेश के बाद विपक्षी पार्टियों की तीखी प्रतिक्रिया देखनी मिली । हालांकि प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों पर जितनी चालाकी से सरकार शिकंजा कसने की कोशिश कर रही है, उसके विरोध में न तो विपक्षी पार्टियां ही उतरीं या न छात्र – संगठन । गौरतलब है कि यह आदेश ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने में एक साल से भी कम समय बचा है ।

दरअसल उच्च शिक्षण संस्थानों में अनिवार्य रूप से ड्रेस कोड लागू कर देना जितना सरल दिखता है उतना है नहीं। यह स्पष्ट रूप से संस्थानों को नियंत्रित करने, युवाओं की अभिव्यक्ति की आजादी छीनने और सांस्कृतिक विवधता को खत्म करने की साजिश है। यूनिवर्सिटीज़ और कॉलेज हमेशा‌ से देश के सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के गढ़ रहे हैं। औपनिवेशिक काल से लेकर स्वातंत्र्योत्तर भारत की राजनीति में उच्च शिक्षण संस्थानों के युवाओं का शासन-प्रशासन की नीतियों के समर्थन और विरोध-प्रदर्शनों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप रहा‌ है। देश के सभी वर्तमान राजनीतिक दलों में एक हिस्सा‌ उन नेताओं का भी है जो इन्हीं कॉलेजों से पॉलिटिक्स करते हुए मंत्रालयों की गद्दी तक पहुंचे हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अनिवार्य ड्रेस कोड सामाजिक- राजनीतिक चेतना से युक्त युवाओं को गुड-बॉय/गुड गर्ल बनाकर उन्हें बौद्धिक रूप से कमजोर करने की साजिश है? मंत्री योगेंद्र उपाध्याय जिस ” सकारात्मकता , समरसता , अनुशासन और संस्कारित माहौल” की बात कर रहें हैं आखिर उसका क्या अर्थ है ? क्या यह सकारात्मकता और समरसता सबसे पहले उन राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखनी चाहिए जहाँ से ” गोली मारो सालों को ” जैसे हिंसक और सांप्रदायिक नारे लगाये जाते हैं ? और इस “अनुशासन” शब्द की क्या परिभाषा होगी? यह ” संस्कारित माहौल ” क्या हो सकता है ? क्या अब युवाओं की शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ बच्चों की तरह पढ़ना और डिग्री लेकर कहीं नौकरी पाना रह जाएगा ? क्या उनके आलोचनात्मक विचारों को क्षीण कर उन्हें “अनुशासित छात्र” भर बना दिया जाएगा , जिनके पास न तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी ,‌न प्रशासनिक नीतियों की आलोचना की आजादी । क्योंकि “सकरात्मकता” और “अनुशासन” जैसे सब्जेक्टिव शब्दों की कोई सर्वमान्य और सर्वव्यापक परिभाषा तो‌ है‌ नहीं। ऐसे में यह कैसे तय होगा कि छात्रों के लिए क्या अनुशासन है क्या नहीं? क्या प्रशासनिक नीतियों का विरोध अनुशासनहीनता में आयेगा कि‌ नहीं? इन प्रश्नों का‌ उत्तर कौन देगा?

तार्किक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो उच्च शिक्षण संस्थानों में संरचनात्मक सुधारों, प्राध्यापकों के रिक्त पदों की भर्ती, कॉलेजों में लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का उद्देश्य पूरा हो‌ सकता है। इसके लिए ड्रेस कोड लागू कर यूनिवर्सिटीज और कॉलेज-विशेष के छात्रों को अलग से चिह्नित करने की आवश्यकता नहीं थी। देश-विदेश में कुछ गिने-चुने प्रोफेशनल कोर्सेज को छोड़कर कहीं भी इस तरह का ड्रेस कोड लागू नहीं है । ऐसे में जब बीजेपी के शीर्ष नेता भारत के विश्वविद्यालयों की तुलना अमेरिका और ब्रिटेन के आधुनिक , लोकतांत्रिक, स्वतंत्र, चेतनायुक्त और प्रगतिशील विश्वविद्यालयों से करते‌ हैं और देश‌ के विश्वविद्यालयों को उन जैसा‌ बनाने का वादा‌ करते हैं , तो यह सिर्फ एक झूठ और भ्रामक प्रचार भर लगता है।

-रोशनी रावत,

लेखिका लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं।

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