स्त्रीद्वेषी समाज का अंतिम हथियार है चरित्र-हनन!
‘नेहा सिंह राठौर के साथ जो हुआ वह न सिर्फ हमारे समाज की गंदी मानसिकता को उजागर करता है बल्कि इस समय पतनोन्मुख मुख्यधारा की पत्रकारिता के स्त्री-विरोधी चरित्र का भी पर्दाफाश करता है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी स्त्री के साथ ऐसा हुआ है.’ पढ़ें पूरा आलेख…
पितृसत्तावादी समाज को जब एक बेखौफ स्त्री चुनौती देती है , तब उसे चुप कराने की हर संभव कोशिशों के बाद समाज का अंतिम हथियार उस स्त्री का चरित्र-हनन होता है. हालही में प्रसिद्ध लोक गायिका और राजनीतिक व्यंग्यकार नेहा सिंह राठौर के साथ भी यही हुआ जब देश के एक बड़े मीडिया चैनल ने नीचता की सारी हदें पार करते हुए उनके विषय में सेक्स रैकेट चलाने जैसी भ्रामक खबर चलाई. नेहा सिंह राठौर की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद सोशल मीडिया पर दो-तीन दिन जमकर हंगामा मचा. और भले उस मीडिया चैनल ने अब नेहा से माफी मांग ली हो पर एक प्रश्न ज्यों का त्यों है कि आखिर कब तक समाज में स्त्रियों को अपनी हक की आवाज़ उठाने के बदले ऐसे चरित्र-हनन सहने पड़ेंगे? इस प्रश्न की जटिलता इसी से समझी जा सकती है कि जब नेहा जैसी जानी-मानी सोशल मीडिया इंफ्ल्यूएंसर का ऐसा चरित्र-हनन हो सकता है, तब उन स्त्रियों की क्या स्थिति होगी जो सिर्फ अपने परिवार-गली-मुहल्ले और गांव-शहर तक सीमित है ?
समय बदला , समाज बदला , विचार बदले और तकनीकी बदली पर एक चीज़ कॉन्स्टेंट रही – स्त्रियों का चरित्र हनन! कभी उन्नीसवीं शताब्दी में स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखने के लिए अफ़वाहें उड़ाई जातीं थीं कि पढ़ी-लिखी स्त्रियां अपने पति को पशु बना कर अपना गुलाम बना लेती हैं. आज एक स्वतंत्र महिला को कभी वेश्या तो कभी इससे मिलती-जुलती ही कोई उपमा या विशेषण देकर चरित्र-हनन किया जाता है.
वैसे भी हमारे देश में स्त्रियों का चरित्र-हनन कोई नयी बात नहीं है. सीता से लेकर मीरा तक कोई स्त्री इससे बच नहीं सकी. आधुनिक युग में भी अस्सी के दशक के बाद शुरु हुए स्त्री-विमर्श को ‘ देह-विमर्श’ का नाम दे डाला गया और इन लेखिकाओं को भी कभी ‘कुलटा’ तो कभी ‘बदचलन’ तो कभी ऐसे ही कुछ और शब्दों से नवाज़ा गया. कुल मिलाकार हमारा समाज कभी स्त्रियों का अंतर्मन समझ ही नहीं पाया, न उसने समझने की कोशिश की, उसे सिर्फ देह से मतलब था , उसे वही दिखी , उसी पर छींटाकशी भी की गई, उसी से प्रेम भी किया गया.
बहरहाल , नेहा सिंह राठौर के साथ जो हुआ वह न सिर्फ हमारे समाज की गंदी मानसिकता को उजागर करता है बल्कि इस समय पतनोन्मुख मुख्यधारा की पत्रकारिता के स्त्री-विरोधी चरित्र का भी पर्दाफाश करता है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी स्त्री के साथ ऐसा हुआ है. इससे पहले जबसे आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा अपनी राजनीतिक छवि के साथ लाइमलाइट में आई हैं , उनके ऊपर पर अश्लील कमेंट करने वालों की सोशल मीडिया पर बाढ़ आ गई है. बस फर्क इतना है कि नेहा राठौर के साथ यह घटिया हरकत करने वाला एक मीडिया संस्थान है जबकि नेहा बोरा पर व्यक्तिगत रूप से लोग कीचड़ उछालते रहते है. दरअसल हमारे समाज में यह इतना नॉर्मलाइज हो गया कि शायद लोगों की कॉन्शियसनेस को यह हिट ही नहीं करता है. इसका सीधा कारण यह है कि इस देश का पितृसत्तावादी समाज हमेशा से स्त्री-द्वेषी रहा है. इसलिए ऐसी कोई घटना उसे भीतर से झकझोर नहीं पाती.
जब-जब समाज में कोई सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक या वैज्ञानिक परिवर्तन हुआ है , हम पाते हैं कि इसके दुष्प्रभावों में सबसे ज्यादा वल्नरेबल स्त्रियां ही रही हैं. इंटरनेट की लॉन्चिंग के बाद सोशल-मीडिया पर सबसे ज्यादा महिलाएं ही हिंसा की शिकार रही हैं. चाहे पिछले कुछ वर्षों में फेक आईडी बनाना हो या अब डीपफेक के इस्तेमाल से फेक वीडियो वायरल करना. कहना ही होगा कि इस समय स्त्रियों के सामने दोहरी चुनौती है. एक तरफ जहां हमारी जेन-जी लड़कियां सत्ता से लेकर साहित्य और समाज तक हर मोर्चे पर खड़ी स्त्री-विरोधी ताकतों को डट कर चुनौती दे रहीं हैं वहीं दूसरी तरफ निजी जिंदगी के साथ-साथ सोशल मीडिया पर होने वाले ऐसे चरित्र-हनन को लेकर भी सशंकित, सतर्क और चिंतित हैं.
-रोशनी रावत



