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गालियों का भी अपना समाजशास्त्र रहा है- प्रियदर्शन

‘सभ्यता और भाषा का रिश्ता बहुत अन्योन्याश्रित है- एक-दूसरे पर निर्भर। भाषा ने सभ्यता बनाई, सभ्यता ने भाषा बनाई। लेकिन सभ्यता की बसावट में सिर्फ़ सुंदर घर नहीं होते, नालियां भी होती हैं, गटर भी होते हैं जिनसे गंदगी बाहर निकलती है। ये नालियां न हों तो पूरा घर गटर में बदल जाए। गालियां शायद ऐसी ही नालियों का काम करती हैं- उनसे कई बार हमारे भीतर की घृणा निकल आती है, हम कुछ स्वस्थ हो जाते हैं। गालियों की तुक नालियों से यों ही नहीं मिलती।’ पढ़ें सुपरिचित लेखक प्रियदर्शन का पूरा आलेख…

लेखक प्रियदर्शन
लेखक प्रियदर्शन

गालियां नहीं देनी चाहिए- यह हम सब जानते हैं। लेकिन कभी न कभी हम सब गाली देते रहे हैं और सुनते भी रहे हैं। गालियां भी भाषा से ही निकली हैं। जिस भाषा ने हंसने, रोने, उदास होने, प्रेम करने, चोट खाने, मरहम लगा का ने के लिए हमें अनगिनत शब्द दिए, उसी भाषा ने हमें हमारी घृणा, हमारी जुगुप्सा, किसी के प्रति हमारी चिढ़ प्रगट करने के लिए गालियां भी विकसित कीं। इन गालियों के केंद्र में स्त्रियां क्यों हैं, मांएं-बहनें क्यों हैं? क्योंकि जिस समाज ने ये गालियां विकसित कीं, उसे यह एहसास था कि मां-बहन के नाम पर की जाने वाली चोट सबसे मर्मांतक चोट होती है। यानी इनमें इरादा जितना मां-बहन के अपमान का नहीं, उससे ज़्यादा उस व्यक्ति को आहत करने का होता है जिसे गालियां दी जाती हैं।
सभ्यता और भाषा का रिश्ता बहुत अन्योन्याश्रित है- एक-दूसरे पर निर्भर। भाषा ने सभ्यता बनाई, सभ्यता ने भाषा बनाई। लेकिन सभ्यता की बसावट में सिर्फ़ सुंदर घर नहीं होते, नालियां भी होती हैं, गटर भी होते हैं जिनसे गंदगी बाहर निकलती है। ये नालियां न हों तो पूरा घर गटर में बदल जाए। गालियां शायद ऐसी ही नालियों का काम करती हैं- उनसे कई बार हमारे भीतर की घृणा निकल आती है, हम कुछ स्वस्थ हो जाते हैं। गालियों की तुक नालियों से यों ही नहीं मिलती।
गालियों का भी अपना समाजशास्त्र रहा है। गालियां एक ही होती हैं, लेकिन उनके अर्थ बोलने वाले की हैसियत के हिसाब से बदलते रहते हैं। कई बार गालियां दबंग लोगों के विशेषाधिकार की सूचक होती हैं। ताकतवर आदमी कमज़ोर आदमी को गाली देता है- ज़मींदार अपने कारकून को, बॉस अपने कर्मचारी को। कई बार ये गालियां अपनी विफलता, अपनी अयोग्यता, अपने अन्याय को छुपाने के लिए भी जा जाती हैं और कई बार दूसरों को दिखाने के लिए कि उनके वर्चस्व को कोई चुनौती देगा तो वह गाली खाएगा। फिर गालियां तो बिल्कुल इस संघर्ष का पहला रूप होती हैं, अगले रूप ज़्यादा हिंसक और विध्वंसक होते हैं।
गालियां कमज़ोर भी देते हैं- अपने गुस्से में, अपनी हताशा में, अपनी बेबसी में- ज़्यादातर वे पीठ पीछे देते हैं। इन गालियों में लाचारी बोलती है- गाली देने के अलावा कुछ न कर सकने की टीस। कई बार लोग गाली देकर पिटने का जोखिम भी उठाते हैं- यह उनका प्रतिरोध होता है। वे जो सबसे मर्मांतक चोट पहुंचा सकते हैं, वह इन्हीं गालियों से संभव होती है। इसी के बाद किसी महाप्रतापी को भी इंस्टाग्राम की रील बनाने की ज़रूरत महसूस होने लगती है।
गालियों का एक खेल और होता है। वह खेल सभ्यता ने भाषा के साथ किया है या भाषा ने सभ्यता के साथ किया है। इस सभ्यता ने सिखाया है कि भाषा कोई जड़ चीज़ नहीं होती। शब्दों के भी अर्थ बिल्कुल वही स्थिर नहीं होते जो शब्दकोश बताते हैं। हमारे रिश्तों के हिसाब से शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। तो गालियां दोस्तों के बीच भी चलती हैं। ये अचानक मीठी गालियां हो जाती हैं। बिल्कुल वही गालियां- लेकिन उनकी लैंगिक चुभन वहां गायब हो जाती है, गाली देने-सुनने वालों में एक भाईचारा सा बन जाता है। बेशक, दोस्तों के बीच चुहल में दी जाने वाली गालियां कई बार मुझे मर्दवाद के दोस्ताने जैसी लगती है- मूंछों पर ताव देते लोगों की आपसी आश्वस्ति कि इन गालियों से हमारा रिश्ता और प्रगाढ़ हो रहा है।
लेकिन जब गालियां इतनी आम हैं तो हम उनसे बचते क्यों हैं? हम क्यों चाहते हैं कि हमारे बच्चे गालियां न दें। हम क्यों इन गालियों को संस्कारों से जोड़ लेते हैं?
क्योंकि गालियों की दुनिया है तो नालियों की दुनिया ही। इस नाली में पांव न रखने पड़ें तो अच्छा। हम जैसे अपने घर साफ़-सुथरे रखना चाहते हैं, वैसे ही अपना या अपने बच्चों का मन भी साफ़ रखना चाहते हैं। लेकिन हमारे घरों में जैसे बाहर की धूल चली आती है, वैसे ही मन पर भी चली आती है। जैसे हम रोज़ घर बुहारते हैं, वैसे नैतिकता की झाड़ू लेकर रोज़ बच्चों का मन बुहारते हैं।
मुश्किल यह है कि घर की झाड़ू पुरानी होने पर तो हम बदल लेते हैं। नैतिकता की झाड़ू झड़ चुकी है या उसकी सींकें ख़त्म हो चुकी हैं- यह हमें पता नहीं चलता। हम इस सड़ी-गली झाड़ू से मन का घर साफ़ करने निकलते हैं- यह समझे बिना कि उसके लिए नई सींकें, नई झाड़ू चाहिए जो नए पर्यावरण की धूल को ठीक से बुहार सके। हम एक खोखली नैतिकता के व्यूह में घिरे रहते हैं और हमारी दुनिया गालियों से भरी रहती है।
यह सच है कि हमारी दुनिया बहुत बदल चुकी है। जब नहीं बदली थी तब भी समाज की पहचान करने वाले साहित्य में कई बार गालियां चली आती थीं। काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ बनारस नाम की उस सनातन नगरी का गाली-वृत्तांत ही है जो सभ्यता के हर दौर में बनी रही है- हमारी धार्मिक आस्थाओं का केंद्र रही है। राही मासूम रज़ा ने जब ‘आधा गांव’ लिखा तो उसमें भी कुछ गालियां चली आईं। उसे जोधपुर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से इसीलिए निकाल दिया गया कि उसमें गालियां थीं। लेकिन इन उपन्यासों से किसी शुद्धतावादी अभियान के तहत गालियां निकाल दी जातीं तो क्या उनमें जीवन बचा रहता? सच्चाई बची रहती?
एक तर्क यह हो सकता है कि इतनी सच्चाई क्यों देखना? यथार्थ का यह स्थूल रूप है। हम किसी के अंतरंग कक्षों में नहीं झांकते। लेकिन इंसानी तहज़ीब की फ़ितरत है कि सारे तर्क बेमानी हो जाते हैं। उसके भीतर का मनोविज्ञान कुछ ऐसा है कि वह जितना रोशनी की पहचान करना चाहता है, उससे ज़्यादा अंधेरों को जानना चाहता है।
हम गालियों से चाहे जितना भागें, वे हमारा पीछा करती रही हैं- अवचेतन में बसे कई अन्य प्रेतों की तरह। इस फ़र्क के साथ कि हमारे कई प्रेत अदृश्य होते हैं, गालियां सार्वजनिक होती हैं, वे हमारा भेद खोल देती हैं।
बीसवीं सदी में विकसित हुआ सिनेमा आज अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा माध्यम है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के रूप में वह घर-घर पहुंचा हुआ है। इनकी मार्फ़त गालियां भी हमारे ड्राइंग रूम में पहुंच गई हैं। वे हमारे मनोरंजन का हिस्सा हो गई हैं। जब आप इस पर बहुत एतराज़ नहीं करते तो उस नई पीढ़ी पर क्यों करते हैं जो इसी समाज से, इसी नए ड्राइंग रूम से ये गालियां सीख कर निकली है और अकुंठ भाव से दे रही है? ठीक है कि हमें गालियों पर तालियां नहीं बजानी चाहिए, लेकिन गाली बकने वालों को बिल्कुल चरित्रहीन, संस्कारहीन घोषित कर ट्रोल करना, उन्हें ज़्यादा कुत्सित गालियां देना कहीं से उचित नहीं है। समझने की कोशिश यह करनी चाहिए कि इन गालियों से जो निकल रहा है, वह कैसा गुस्सा है, कैसा प्रतिरोध है या कैसी हताशा है और वह कौन सी कार्रवाई हो सकती है जिससे हम गाली देने वालों को ताली बजाने वालों में बदल सकते हैं।

(साभार – प्रभात खबर)

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