डॉ. राम पुनियानी का लेख- भारतीय समाज की पितृसत्ता के मूल में है धर्मसत्ता?
‘भाजपा की तत्कालीन उपाध्यक्ष विजयाराजे सिंधिया संसद भवन तक एक जुलूस लेकर गईं जिसमें सती को एक गौरवशाली भारतीय परंपरा और महिलाओं का अधिकार बताने वाले नारे लगाए जा रहे थे. इसका दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने स्वयं अपने पति की मौत के बाद इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया.’ पढ़ें सुपरिचित इतिहासकार डॉ. राम पुनियानी का पूरा आलेख…
औपनिवेशिक काल से पहले के भारत में हिन्दू समुदाय अधिकांशतः मनुस्मृति के नियमों के अनुसार ही संचालित होता था, जिसका केन्द्रीय मूल्य था जाति एवं लिंग आधारित पदानुक्रम. औपनिवेशिक काल में शिक्षा, परिवहन के साधन एवं आधुनिक प्रशासनिक ढ़ांचा विकसित हुए और लोकतंत्र के बीज पड़े. ये बदलाव धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद की धारणा के अनुरूप थे, जिसके विभिन्न तत्व थे – कामगारों के अधिकारों के लिए संघर्ष, शिक्षा एवं उसके जरिए दलितों व महिलाओं का सशक्तिकरण और धर्म, जाति, भाषा और लिंग की सीमाओं के परे सभी की एकसमान नागरिकता की अवधारणा. इन सारी प्रक्रियाओं के खिलाफ खड़े थे कुलीन, जमींदार और पुरोहित वर्ग. जहां मोटे तौर पर लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों का प्रतिनिधि भगत सिंह, आंबेडकर और गांधी को माना जा सकता है वहीं इनके विरोधियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और आरएसएस.
लोकतांत्रीकरण की जद्दोजहद में शामिल थे कामगारों के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आजादी के लिए आंदोलन और दलितों और महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर. जहां तक स्त्री शिक्षा की बात है, इसकी शुरूआत जोतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख ने की. सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख को अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए कैसी-कैसी कठिनाईयों से जूझना पड़ा, यह जगजाहिर है. आंबेडकर के संघर्ष में महिलाओं की अच्छी-खासी भागीदारी थी और गांधीजी के नेतृत्व में चले राष्ट्रीय आंदोलन में भी महिलाओं ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया था. इसके विरोधी कुलीन वर्गो ने इन सारी प्रक्रियाओं का विरोध किया, साथ ही इनके संगठन – मुस्लिम लीग और आरएसएस – मुख्यतः केवल पुरूषों के संगठन थे. हमारे संविधान में पुरूषों एवं स्त्रियों को समान अवसर और समान दर्जा देने का जो प्रावधान किया गया, वह अत्यंत उपयुक्त है.
जहां मुस्लिम लीग की विचारधारा के कारण पाकिस्तान में तबाही हुई, वहीं भारत में महिलाओं की समानता का सबसे प्रमुख विरोधी संगठन आरएसएस था. जब 1936 में लक्ष्मीबाई केलकर ने आरएसएस सरसंघचालक से महिलाओं को आरएसएस का सदस्य बनाए जाने का सुझाव दिया, तो उन्होंने इसे खारिज करते हुए उनसे राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना करने को कहा. यहां यह ध्यान देने योग्य है कि महिलाओं के संगठन के नाम – राष्ट्र सेविका समिति – में से ‘स्वयं’ शब्द गायब है. इसमें यह स्पष्ट संकेत निहित है कि महिलाओं को पुरूषों के अधीन रहना होगा. आरएसएस ने इस आधार पर भारतीय संविधान का भी विरोध किया कि इसमें गौरवशाली अतीत के मूल्यों को स्थान नहीं दिया गया है. अतीत के गौरवशाली मूल्यों से उनका आशय मनुस्मृति के मूल्यों से था इसमें कोई संशय नहीं है. आरएसएस हिन्दू कोड बिल के मूल प्रावधानों के पूर्णतः खिलाफ था जिसमें पिता की संपत्ति में महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिया गया था.
यह सारी बातें इसलिए मन में कौंध रही हैं क्योंकि राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज‘ कार्यक्रम (23 अगस्त 2026) को पुणे में केवल लड़कियों के लिए आयोजित किया गया था. हमारी आजादी के बाद के शुरूआती दशकों में महिलाओं और लड़कियों की समानता का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में बहुत से कदम उठाए गए लेकिन उसी काल में विभिन्न तरीकों से हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा को प्रबल करने के प्रयास भी हुए. इसका एक औजार थी गीता प्रेस, जिसने मनुस्मृति पर आधारित पुस्तकों का प्रकाशन दसियों लाख प्रतियों में किया. इस विचारधारा के बहुत से अन्य संगठनों ने अपनी कथनी और करनी के जरिए भी इस दिशा में कार्य किया.
हमें याद है कि रूपकुंवर को उनके पति की चिता पर जिंदा जला दिया गया था. जहां ज्यादातर समूहों, संगठनों एवं राजनैतिक दलों ने इस त्रासद घटना की निंदा की थी, जो पूर्णतः उचित था, वहीं भाजपा की तत्कालीन उपाध्यक्ष विजयाराजे सिंधिया संसद भवन तक एक जुलूस लेकर गईं जिसमें सती को एक गौरवशाली भारतीय परंपरा और महिलाओं का अधिकार बताने वाले नारे लगाए जा रहे थे. इसका दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने स्वयं अपने पति की मौत के बाद इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया! इसी तरह भाजपा महिला मोर्चा की पूर्व प्रमुख मृदुला सिन्हा ने सेवी पत्रिका के अप्रैल 1994 के अंक में प्रकाशित एक साक्षात्कार में कहा था कि महिलाओं को घर के बाहर जाकर काम नहीं करना चाहिए, जब तक कि ऐसा करना एकदम जरूरी न हो. उन्होंने पत्नियों के साथ मारपीट किए जाने और दहेज प्रथा को भी सही ठहराया था.
पुणे के आयोजन में राहुल गांधी ने महिलाओं की बातें सुनीं, जिन्होंने अपनी सुरक्षा, शिक्षा हासिल करने और स्वयं से जुड़े फैसले खुद लेने की राह में आने वाली बाधाओं, विभिन्न सामाजिक दबावों और एक पूर्ण नागरिक का जीवन जीने की राह में चुनौतियों की चर्चा की. राहुल गांधी ने इस कार्यक्रम को समाज सुधार के आह्वान में बदल दिया. यह महिलाओं की समानता के पक्ष में सामाजिक प्रक्रियाओं को मोड़ने का एक बड़ा प्रयास था. इस दिशा में संघर्षरत महिला समूहों को इस कार्यक्रम के भाव और संदेश से बहुत मदद मिलेगी.
आज के भारत में संघ परिवार न केवल भारतीय संविधान के मूल्यों को कमजोर करने का प्रयास कर रहा है बल्कि महिलाओं एवं दलितों के संबंध में प्रतिगामी सामाजिक सोच को भी बढ़ावा दे रहा है. जहां उसके द्वारा ईसाईयों और मुसलमानों के खिलाफ फैलाई जा रही नफरत साफ नजर आती है वहीं वह महिलाओं के संबंध में मनुस्मृति के मूल्यों को तरजीह देने में जुटा हुआ है, जिसकी चर्चा पुणे के कार्यक्रम में हुई. राहुल गांधी ने इसके तीन स्पष्ट उदाहरण दिए. पहला, डॉ. मोहन भागवत का वह वक्तव्य जिसमें उन्होंने कहा था कि दुष्कर्म इंडिया में होते हैं भारत में नहीं. स्पष्टतः भारत से उनका आशय ग्रामीण क्षेत्रों से था, जो संविधान के मूल्यों की ओर ले जाने वाली प्रक्रियाओं से अपेक्षाकृत अप्रभावित रहे हैं. वे दलित और आदिवासी महिलाओं के साथ होने वाली दुष्कर्म की घटनाओं से अनजान होने का दिखावा कर रहे थे.
राहुल गांधी ने हिन्दू राष्ट्रवादियों की विचारधारा के केन्द्रबिन्दु का खुलासा करके बिल्कुल ठीक किया. उन्होंने सही कहा कि संघ परिवार मनुस्मृति का अनुमोदन करता है जिसके अनुसार लड़की को बचपन में अपने पिता, वयस्क होने पर पति और विधवा हो जाने पर अपने पुत्र के नियंत्रण में रहना होगा. राहुल गांधी का यह कथन एकदम सही था कि लड़कियों का अपना ‘सेल्फ’ होना चाहिए जिसकी कार्यक्रम में उपस्थित लड़कियों ने सराहना की.
यह कार्यक्रम महिलाओं की समानता के लिए चल रहे संघर्ष में एक मील का पत्थर बनना चाहिए. कार्यक्रम का संदेश बड़ा एवं स्पष्ट है. इसमें लड़कियों के अरमानों को अत्यंत बेबाकी से बयां किया गया. ‘राजनैतिक‘ शब्द के सामान्य मायनों से अलग रहते हुए, राहुल गांधी ने गहन सामाजिक स्तर पर अपना पक्ष रखा और उस सामाजिक ढांचे के बारे में बात की जिसे महिलाओं की समानता की खातिर संघर्ष के जरिए बदला जाना होगा. लड़कियों ने यह विचार भी व्यक्त किया कि वे आजादी, गरिमा और समानता से रह सकें, इसके लिए लड़कों को भी बदलना होगा. वे मानव जाति का आधा हिस्सा हैं, आधा भारत हैं, जिसे हिन्दू राष्ट्रवादी मानसिकता ने जकड़ा हुआ है. इसमें बदलाव लाना और भारतीय संविधान के मूल्यों को सशक्त करना जरूरी है. यह एक और वजह है कि जिसके कारण संघ परिवार के बढ़ते प्रभुत्व को चुनौती दी जानी चाहिए.
(अंग्रेजी से रूपांतरण-अमरीश हरदेनिया )



