पीयूष बबेले का लेख- राहुल गांधी के शब्द देश की जनता में आशा जगाते हैं
‘राहुल ने उन सब चीजों को फिर से जिंदा कर दिया है, जो संविधान की किताब में लिखी तो थीं, लेकिन उनके ऊपर तानाशाही की धूल जम गई थी। लोग सच जानते थे, लेकिन बोलने से डरने लगे थे। लोगों को लगता था कि ये सच के खुदा हो गए हैं, इन्हें हटाएंगे कैसे। राहुल ने दिखा दिया है कि यह गांधी भी तानाशाही को वैसे ही हटाएगा, जैसे उस गांधी ने हटाया था।’ पढ़ें जाने-माने लेखक पीयूष बबेले का पूरा आलेख…

दिल्ली शहर में एक दिन पहले तक परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। आंदोलनकारियों को इस वितृष्णा के साथ गिरफ्तार कर बसों में ठूंसा जा रहा था, जैसे नगर निगम की गाड़ी आवारा कुत्तों को पकड़ रही हो। सिपाहियों के चेहरों पर सत्ता की क्रूर मुस्कान नाच रही थी। सत्ता पोषित संघी गुंडे पुलिस की सुरक्षा में बेखौफ होकर लड़कियों के कपड़े फाड़ रहे थे और पालतू मीडिया बढ़-चढ़कर बता रहा था कि कोकरोचों की हवा निकल गई। सरकार जीत गई और जनता हार गई। (मेरे कानों में आवाज आ रही थी- दुशासन जीत गया, द्रोपदी हार गयी।) तानाशाही के इस नंगे नाच को देखकर एकबारगी तो ऐसा लगा कि भारत का लोकतंत्र वर्दी वाले बूटों के नीचे रौंद दिया गया है।
लेकिन, एक दिन बाद ही नजारा बदल गया। राहुल गांधी आए। बड़े इत्मीनान से प्रेस कांन्फ्रेंस की। लोकतंत्र के हत्यारों को खुली चुनौती दी। पूरे देश से दिल्ली आने का आग्रह किया। और शान से सुप्रीम कोर्ट की ओर चल दिए। उनके पीछे भारतीय प्रजातंत्र का समुद्र उमड़ने लगा। जो दिल्ली कल तक बूटों की धमक से कांप रही थी, वही दिल्ली जनता की पदचाप से गूंज उठी। वोट चोर गद्दी छोड़ के नारों पर लाखों लोग झूमने लगे। करोड़ों लोग इस नजारे को अपनी मोबाइल स्क्रीन पर देख रहे थे। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट तक राहुल की बस नहीं जाने दी गई। वे अपनी बहनों प्रियंका गांधी और नेहा वोरा को सुरक्षा घेरे में साथ लिए पैदल बढ़ चले। शंकर जी की इस बारात में नेता, युवा, महिला, पुरुष , वकील, पत्रकार और न जाने कौन-कौन शामिल थे। तंत्र के खिलाफ लोक इस कदर उमड़ रहा था कि लगता था कि राहुल खुद ही अपनी लोकप्रियता के बोझ से दब न जाएं। लेकिन वे सतर्क थे। और अंतत: गोधूलि वेला में नभ में उड़ती धूल से पटे राहुल याचिका फाइल करके बाहर आ गए। भारत माता ने राहत की सांस ली। उसे संजीवनी मिल गई।
राहुल को भी पता है और देश को भी पता है कि वे सुप्रीम कोर्ट से जिस मर्ज का इलाज करने की गुजारिश कर रहे हैं, वह इलाज उसके पास नहीं है। और हो भी तो वह शायद ही करे। लेकिन राहुल पूरी दुनिया को यह दिखा देना चाहते हैं कि उन्होंन न्याय का कोई दरवाजा नहीं छोड़ा। उन्होंने मीडिया को सब बताया, आयोग से सरकारी गवाह बनने को कहा, राष्ट्रपति को बताया और अब सुप्रीम कोर्ट से भी फरियाद कर चुके हैं। अगर न्याय की हर चौखट पर उनकी आवाज बहरे कानों से टकराकर हवा में विलीन हो जाएगी, तो आखिरी रास्ता ही बचेगा।
बिलकुल महाभारत के कृष्ण की तरह, जिन्होंने हर स्तर पर युद्ध को टालने की कोशिश की। भीष्म और द्रोण को समझाया। कर्ण से भी सत्य के साथ आने की प्रार्थना की। धृतराष्ट्र से बारंबार कहा कि महाराज आप प्रजा के प्रति जवाबदेह हैं, पुत्र के प्रति नहीं। और अंत में उस नराधम दुर्योधन को भी समझाया कि मान जा। लेकिन दुर्योधन का सत्ता का अहंकार, धृतराष्ट्र की अंधी न्याय बुद्धि, भीष्म और द्रोण का राजवित्त पर जीवन गुजारना और कर्ण का अहसानों के तले दबे होना, कृष्ण की न्याय की पुकार को नहीं सुन सका। कौरवों की भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण होने बावजूद कृष्ण न्याय का ही पंथ खोज रहे थे।
एसआईआर के जरिए भारतीय लोकतंत्र का चीरहरण होने के बाद भी राहुल शांति का रास्ता खोज रहे हैं। लेकिन इस खोज की प्रक्रिया में उन्होंने करोड़ों दिलों को जीत लिया है। उनके समर्थक अब उनके अनुयायी बनने लगे हैं तो वहीं उनके विरोधी, अब उनके प्रति उदार हो रहे हैं। जिस विपक्ष को वे अब तक एकजुट करने के लिए प्रयासरत थे, वह खुद अब उनके साथ आने को लालायित है।
राहुल ने उन सब चीजों को फिर से जिंदा कर दिया है, जो संविधान की किताब में लिखी तो थीं, लेकिन उनके ऊपर तानाशाही की धूल जम गई थी। लोग सच जानते थे, लेकिन बोलने से डरने लगे थे। लोगों को लगता था कि ये सच के खुदा हो गए हैं, इन्हें हटाएंगे कैसे। राहुल ने दिखा दिया है कि यह गांधी भी तानाशाही को वैसे ही हटाएगा, जैसे उस गांधी ने हटाया था।
इस सबके बीच यह सवाल बार-बार मन में आता है कि आखिर यह सब हुआ कैसे? 40 हजार पुलिसवालों से जनता को धमकाने वाली सरकार आखिर राहुल की हुंकार के सामने क्यों दुबक गई? संभवत: इसका एक कारण यह है कि राहुल गांधी अब देश की भावनाओं के सच्चे प्रतिनिधि बन गए हैं। सरकार जानती है कि अगर वह राहुल की कलाई पकड़ेगी तो जनता उसकी बांह मरोड़ देगी। राहुल की छवि झूठ के उस दायरे को पार कर चुकी है कि जहां गोदी मीडिया उसे कलंकित कर सके। हाथ में संविधान की किताब लिए राहुल से टकराने के मतलब है, देश की लोकतांत्रिक चेतना को चुनौती देना। पिछले 12 साल के संघर्ष में राहुल गांधी ने उनके खिलाफ पिछले 22 साल से चलाए जा रहे दुष्प्रचार को खत्म कर दिया है।
अब राहुल गांधी ने देश की चेतना में प्रवेश कर लिया है। उनके शब्द लोगों में आशा जगाते हैं, उनके बढ़ते कदम करोड़ों को कदमताल करने को ललचाते हैं, उनकी गर्जना में जनता अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त करती है और उनके लक्ष्य में करोड़ों लोगों को अपना लक्ष्य दिखाई देता है। यही तो एक नेता की पहचान होती है, जो गांधी में थी, नेहरू में थी, इंदिरा में थी और उससे बहुत पहले महावीर और बुद्ध में थी।



