‘अपराधी’ सिर्फ़ पाँच नहीं, लाखों में हैं ! राहुल जानते हैं ! -श्रवण गर्ग
‘दिल्ली में मनमोहन सिंह और गांधीनगर में मोदी के शासनकालों के बीच समानांतर गुजरी एक दशक की अवधि(2004 से 2014) का अध्ययन करें तो यह प्रभाव पड़ता है कि गुजरात के ‘सांप्रदायिक विकास’ के प्रति या तो केंद्र की मौन सहमति रही अथवा कांग्रेस के भीतर सक्रिय बीजेपी के स्लीपर सेल्स मनमोहन सिंह के मुक़ाबले इतने ज़्यादा शक्तिशाली थे कि उन्होंने मोदी-शाह के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होने दी।’ पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का विश्लेषण…

राहुल गांधी आत्मविश्वास के साथ बार-बार दोहरा रहे हैं कि उनकी लड़ाई सिर्फ़ पाँच ‘अपराधियों’ के ख़िलाफ़ उनकी जवाबदेही तय कर उन्हें दंडित करवाने (या करने) की है। चार लोगों के वे नाम भी बताते हैं। जनता को नाम रट भी गए हैं।हक़ीक़त में भी क्या सारी लड़ाई इन चार-पाँच हस्तियों तक ही सीमित है ? शायद नहीं !
राहुल अतीत में स्वीकार चुके हैं कि वे कभी सत्ता में आ गए तो भी शासन इसलिए नहीं चला पाएँगे कि पिछले बारह सालों के दौरान संघ-बीजेपी ने व्यवस्था के हरेक क्षेत्र में अपने लोगों की घुसपैठ करवाकर जो जाल बिछा दिया है कि वह उन्हें सफल नहीं होने देगा। हक़ीक़त यही है !
यह दावा ऊपरी तौर पर ही सही माना जा सकता है कि दो-चार लोगों को हटा देने से सबकुछ ठीक हो जाएगा यानी लोकतंत्र भी बच जाएगा और संविधान की रक्षा भी हो जाएगी।गुजरात की एक पार्टी बैठक में राहुल स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि कांग्रेस में बीजेपी के स्लीपर सेल्स काम कर रहे हैं। उनका पहला काम उन्हें ख़त्म करने का होगा। कारण जो भी रहे हों राहुल वह काम नहीं कर पाए।
अमित शाह ने अभी एक दिन पहले ही राहुल का ध्यान इस ओर आकर्षित किया था कि कांग्रेस पिछले इकतालीस सालों से गुजरात में सत्ता से बाहर है जबकि SIR का काम तो दो साल पहले ही शुरू हुआ है।
ताज़ा खबर यह है कि हाल ही तक देश के ‘चीफ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ’ (CDS) रहे अनिल चौहान ‘विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन’(VIF) के नए निदेशक नियुक्त किए गए हैं। इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) से सेवानिवृत्त होने के बाद, NSA अजीत डोभाल ने दिसंबर 2009 में फाउंडेशन की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई थी और इसके पहले निदेशक बने थे। फाउंडेशन की संबद्धता किन संगठनों और व्यक्तियों से है उसके कामकाज से समझा जा सकता है। चौहान ने दायित्व सब कुछ जानते हुए ही स्वीकार किया होगा ?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच सुप्रीम कोर्ट-हाई कोर्ट के 42 सेवानिवृत जजों और 124 सेवानिवृत आईएएस/आईएफ़एस अफ़सरों ने खुले पत्रों के ज़रिए चुनाव आयोग के प्रति समर्थन व्यक्त किया है। मोदी सरकार तो 2014 में ही सत्ता में आई है जब कि ये तमाम लोग तो काफ़ी पहले से न्यायपालिका और कार्यपालिका में कार्यरत रहे होंगे।
क्या कहा जा सकता है कि अपने पूरे सेवा काल के दौरान ये सभी लोग और वे अन्य भी जो अब धीरे-धीरे बाहर आएँगे एक विचारधारा विशेष से प्रभावित होकर ही काम कर रहे होंगे ? इनके सेवा काल के दौरान ही नरसिंह राव और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे होंगे।
दिल्ली में मनमोहन सिंह और गांधीनगर में मोदी के शासनकालों के बीच समानांतर गुजरी एक दशक की अवधि(2004 से 2014) का अध्ययन करें तो यह प्रभाव पड़ता है कि गुजरात के ‘सांप्रदायिक विकास’ के प्रति या तो केंद्र की मौन सहमति रही अथवा कांग्रेस के भीतर सक्रिय बीजेपी के स्लीपर सेल्स मनमोहन सिंह के मुक़ाबले इतने ज़्यादा शक्तिशाली थे कि उन्होंने मोदी-शाह के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होने दी।
दूसरा यह कि राहुल अगर 2004 में ही राजनीति में आ गए थे(जैसा कि वे कहते हैं )तो क्या वे भी सबकुछ चुपचाप देखते रहे ? अगर मनमोहन सिंह सरकार तभी कुछ कर देती तो क्या उन्हें आज यह लड़ाई लड़नी पड़ती?
अगर इतने सारे लोग साहसपूर्वक चुनाव आयोग के पक्ष में खड़े हो रहे हैं तो निश्चित ही वे भविष्य के परिणामों की परवाह नहीं करते हुए ऐसा कर रहे हैं। इन लोगों के पीछे भी एक बड़ी भीड़ ऐसे चेहरों की होगी जो न सिर्फ़ वर्तमान व्यवस्था को क़ायम रखने में जुटी है सत्ता परिवर्तन की दशा में नये शासकों के ख़िलाफ़ विद्रोह करने में भी सक्षम सिद्ध हो सकती है।
राहुल अपनी यात्राओं और सार्वजनिक संबोधनों में कहते रहे हैं कि मोदी तो सिर्फ़ मुखौटा हैं। असली ताक़त तो अंबानी, अदाणी की है। इसका मतलब यह है कि राहुल का मुक़ाबला सिर्फ़ संघ द्वारा व्यवस्था में घुसपैठ कराए गए तत्वों से ही नहीं है उन पूँजीपतियों से भी है जिन्होंने मीडिया ही नहीं मुल्क के समूचे संरचनात्मक ढाँचे (रेलवे, हवाई सेवा, संचार माध्यम,बंदरगाह, रक्षा उत्पादन,ऊर्जा, स्टॉक और कैपिटल मार्केट,आदि ) पर क़ब्ज़ा कर रखा है।वे विपक्षी दल जो राहुल के साथ दिखते हैं उनके भी इन पूंजीपतियों के साथ सम्बन्धों को लेकर समय-समय पर संदेह उत्पन्न होते रहते हैं।
राहुल जब कहते हैं कि लड़ाई लंबी चलने वाली है।इसमें कई महीने और साल भी लग सकते हैं तो मानकर चलना चाहिए कि वे जानते हैं कि जिन चार-पाँच लोगों को वे हटाना चाहते हैं उन्हें बचाने के लिए हज़ारों-लाखों की संख्या में निहित स्वार्थों का एक बड़ा समूह पीछे खड़ा है। उन्हीं के चेहरे खुले पत्रों के ज़रिए सत्ता के दबाव में प्रकट हो रहे हैं।
हकीकत में यह समूह इस समय राहुल से ज़्यादा उस जनता से भयभीत हो रहा है जो मोदी-शाह के ख़ौफ़ को सड़कों पर ललकार रहा है। राहुल की स्ट्रेटेजी की दाद दी जानी चाहिए कि उनका हाथ अब उन लोगों/बच्चों की पीठ पर है जो उनके लिए अपनी जान देने को तैयार है।
राहुल का इससे बड़ा रणनीतिक कदम और क्या हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट तक उमड़े सैलाब को देख लेने के बाद CJP भी अब साथ जुड़ने की तैयारी दिखा रही है। CJP के दो नेताओं की सिर्फ पाँच दिन की न्यायिक रिमांड ने ही दीपके को इतना हिला दिया कि वे चार दिन में ही महाराष्ट्र से दिल्ली वापस लौट आए। दूसरी ओर, राहुल आर या पार की तैयारी के साथ हुकूमत से लड़ रहे हैं।



