उपन्यास और स्त्री
‘उपभोक्तावादी संस्कृति ने स्त्री को तमाम विकल्प जरूर उपलब्ध कराए लेकिन इसकी नकारात्मक छवियों से वह अपना बचाव न कर सकी। परिणामस्वरूप नारीवादी आन्दोलन और विमर्श पर बहुत सारे प्रश्न खड़े किये जाने लगे।’ पढ़ें रविकांत का पूरा लेख…
क्या स्त्री जन्म से ही कैदी है या उसका अस्तित्व ही कैद में है? स्त्री के जन्म लेते ही तमाम कैदखानों के दरवाजे परत दर परत खुलते जाते हैं। ‘दि सेकेण्ड सेक्स’ में सिमोन द बाउआ ने लिखा है कि स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है। स्त्री की कैद के कितने कठघरे हैं? स्त्री जितनी कैद होती जाती है उतनी ही स्त्री होती जाती है। कहीं स्त्री बाजार के स्वर्णिम पिंजरे में कैद है तो कहीं खाप की बन्द खिड़कियों में उसका दम घुटता है। कभी अगर वह मुँह खोलने का प्रयास भी करती है तो चन्द उपहार और सौगातें उसके होंठों को सी देते हैं। अगर वह आँख खोलकर सच देखना चाहे तो व्यवस्था की गर्म सलाखें पुतलियों को बेधकर उसकी रोशनी छीन लेती हैं।
फ्रांस की प्रसिद्ध स्त्रीवादी विचारक और उपन्यासकार मादाम स्तेल कहती हैं कि उपन्यास का विकास उन्हीं समाजों में होता है जहाँ स्त्रियों का स्थान ऊँचा हो और व्यक्तिगत जिन्दगी में लोगों की गहरी दिलचस्पी हो। ऐसे ही समाज में उपन्यास वैयक्तिक अनुभवों का माध्यम और वैयक्तिक स्वतन्त्रता का वाहक बनता है। नवजागरण के दौर में स्त्री शिक्षा और स्त्री सुधार को केन्द्र में रखकर ही हिन्दी उपन्यास लेखन की शुरुआत हुई। लगभग डेढ़ सदी के इतिहास में हिन्दी उपन्यास ने एक लम्बी यात्रा तय की है। प्रारम्भिक उपन्यासों की स्त्री; अशिक्षा, अज्ञानता, अन्धविश्वास और रूढ़िवादिता का शिकार थी। लेखक इस स्त्री में नैतिक ऊर्जा का संचार कर रहे थे। प्रेमचन्द, प्रसाद, जैनेन्द्र और अज्ञेय के स्त्री पात्र जीवन-आदर्श और प्रेम की अनुभूतियों की कठपुतलियाँ सरीखे लग रहे थे। आजादी के बाद, हिन्दी उपन्यासों में स्त्री का निजी व्यक्तित्व और उसकी भावनाएँ केन्द्र में आती हैं। फिर भी कहीं न कहीं ये चरित्र रोते- टूटते और बिखरते जाते हैं। राजेन्द्र यादव ने ठीक ही लिखा है कि नये माहौल में स्त्री पंख लगाकर, स्वतन्त्र होकर उड़ना चाहती है। लेकिन सामाजिक भीतियों और मानसिक ग्रन्थियों से जूझने के प्रयत्न में उसके डैने टूट गये हैं। हैं। कभी उसे शरीर की मांग झुका देती है तो कभी अकेलेपन की यातना। पुरुष लेखकों द्वारा रचे गये ऐसे चरित्रों से मुक्ति तब मिलती है जब स्त्रियाँ स्वयं लेखन में दाखिल होती हैं। स्त्री विमर्श के आन्दोलन की शक्ल में आने से पूर्व मन्नू भण्डारी और कृष्णा सोबती जैसी समर्थ और सजग रचनाकारों ने स्त्री की निजी अनुभूतियों को पूरी प्रामाणिकता के साथ पिरोने की कोशिश की थी।
नब्बे के दशक में शुरू हुए अस्मितावादी विमर्श में नारीवाद प्रमुख मुहावरा बनकर उभरता है। इस नारीवादी आन्दोलन ने पितृसत्ता की चूलें हिला दीं। उग्र होता यह नारी विमर्श दुर्योग से देह के विमर्श में तब्दील होता गया। बाजार, विज्ञापन और तमाम संचार साधनों द्वारा प्रसारित पूँजीवादी पश्चिमी संस्कृति में यह आन्दोलन उलझता चला गया। उपभोक्तावादी संस्कृति ने स्त्री को तमाम विकल्प जरूर उपलब्ध कराए लेकिन इसकी नकारात्मक छवियों से वह अपना बचाव न कर सकी। परिणामस्वरूप नारीवादी आन्दोलन और विमर्श पर बहुत सारे प्रश्न खड़े किये जाने लगे। अगरचे, आज नये प्रश्नों और कुछ दबे-ढके मुद्दों पर नारीवादी स्वर मुखरित हुआ है।



