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डॉ. पंकज श्रीवास्तव लेख- क्यों आपातकाल था दलितों और आदिवासियों के लिए ‘मुक्ति-पर्व’ ?

‘इमरजेंसी को देखने का एक दूसरा नज़रिया भी है जो इस काल को वंचित समुदायों के लिए “सकारात्मक स्वतंत्रता” का युग मानता है। आपातकाल ने दलितों को सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप करने का हौसला दिया। उनके लिए यह एक तरह का सामाजिक और सांस्कृतिक दावा भी था।’ पढ़ें पत्रकार एवं लेखक पंकज श्रीवास्तव का पूरा लेख…

पाँच दशक बाद भी इमरजेंसी को लेकर विवाद जारी है। ख़ासतौर पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और कांग्रेस को कोसने के लिए इसकी याद दिलायी जाती है। यहाँ तक कि बीजेपी ने बीते कुछ सालों से 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने की शुरुआत की है ताकि इस आलोचना को एक संस्थागत स्वरूप दिया जा सके। लेकिन इसी बीच ऐसे भी कुछ अध्ययन सामने आये हैं जो बताते हैं कि इमरजेंसी का दौर ख़ासतौर पर दलितों और आदिवासियों के लिए मुक्ति का द्वार खुलने जैसा था। भारतीय समाज को समतामूलक बनाने की दिशा में इमरजेंसी ने ‘एक्ज़ीलरेटर’ का काम किया था। साथ ही, इमरजेंसी के लिए सिर्फ़ इंदिरा गाँधी को ज़िम्मेदार ठहराना ग़लत है। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने जो मोड़ लिया था, उसमें कोई भी सरकार इमरजेंसी जैसा फ़ैसला ले सकती थी।

कुछ महीने पहले दिल्ली में ‘फ़िफ्टी इयर्स ऑफ़ इंडियन इमरेजंसी: लेसन फॉर डेमोक्रेसी’ शीर्षक की एक किताब का विमोचन हुआ जिसमें 17 लेख छपे हैं। इसमें इमरजेंसी को महज़ ‘लोकतंत्र का काला अध्याय’ बताने के रिवाज से उलट कुछ ज़मीनी निष्कर्ष पेश करने वाले लेख हैं। इस सिलसिले में मशहूर राजनीति विज्ञानी और जेएनयू के पूर्व प्रोफ़ेसर गोपाल गुरु का लेख ख़ास तौर पर ध्यान खींचने वाला था। ‘स्वतंत्रता की अवधारणा पर बहस’ शीर्षक लेख में प्रो.गोपाल गुरु लिखते हैं- “ऐसा आपातकाल मुक्ति का काल बन जाता है, क्योंकि वे लोग जो दलितों और शोषित वर्गों को दबाते रहे — जैसे साहूकार, जो उन्हें कर्ज में डालते थे, जो उन्हें खाद्यान्न देने से इनकार करते थे, जो उनके बर्तन-भांडे और सोना-चांदी गिरवी रख लेते थे — वे सभी या तो धमकाए गए थे या जेल में थे।”

यानी इमरजेंसी को देखने का एक दूसरा नज़रिया भी है जो इस काल को वंचित समुदायों के लिए “सकारात्मक स्वतंत्रता” का युग मानता है। आपातकाल ने दलितों को सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप करने का हौसला दिया। उनके लिए यह एक तरह का सामाजिक और सांस्कृतिक दावा भी था। यह बताता है कि आज़ादी के बाद भारतीय समाज को समतामूलक बनाने की राह में खड़ी तमाम बाधाओं पर इमरजेंसी ने निर्णायक चोट की गयी जिसका असर देश के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ा।

इस बात की तस्दीक़ इमरजेंसी के दौरान चलाये गये ‘बीस सूत्री कार्यक्रम’ से भी होती है। इस दौरान सीलिंग के ज़रिए मुक्त की गयी भूमि को भूमिहीनों (ख़ासतौर पर दलितों) को बाँटा गया। छोटे किसानों, भूमिहीनों और दस्तकारों के क़र्ज़ की वसूली पर रोक लगी। बँधुआ मज़दूरी ख़त्म करने का अभियान चला। कृषि मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी क़ानून लागू हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों में ग़रीबों के लिए मकान बने। महँगाई पर क़ाबू पाया गया और अनाज तथा आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को प्रभावी बनाया गया। अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए स्पेशल कंपोनेंट प्लान की अवधारणा विकसित की गयी जो आबादी के अनुपात में बजट सुनिश्चित करता था। छोटे-सीमांत किसानों और भूमिहीनों के लिए ऋण और अन्य सुविधाएँ दी गयीं। यही नहीं, अश्पृश्यता निरोधक क़ानून को सख़्त बनाकर जाति के आधार पर शोषण और दमन करने वालों को सख़्त संदेश दिया गया।

निश्चित ही इमरजेंसी में ज़्यादतियाँ हुईं। नागरिक अधिकारों को बाधित किया गया, तमाम नेताओं को जेल हुई और प्रेस को भी सेंसरशिप का सामना करना पड़ा। लेकिन क्या इसके लिए अकेले इंदिरा गाँधी को दोषी ठहराया जा सकता है? पचास साल बाद अगर निष्पक्षता से उस समय की राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति पर नज़र डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आख़िर इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी क्यों लगायी।

यह कहना पूरी तरह ग़लत है कि इंदिरा गाँधी ने 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फ़ैसले के असर से बचने के लिए लगायी थी जिसके तहत रायबरेली से उनके निर्वाचन को रद्द कर दिया गया था। अगर ऐसा होता तो उसी दिन इमरजेंसी लग जाती। सच्चाई यह है कि 24 जून को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी थी ( जिसे 7 नवंबर 1975 को पूरी तरह रद्द कर दिया गया।)। यानी इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बने रहने में कोई क़ानूनी अड़चन नहीं थी। वैसे भी इलाहाबाद होईकोर्ट का तर्क किसी के गले नहीं उतर रहा था। हाईकोर्ट ने यूपी सरकार द्वारा इंदिरा गाँधी के भाषण के लिए ऊँचा मंच बनाने और यशपाल कपूर का सरकारी सेवा से इस्तीफ़ा स्वीकार होने के पहले इलेक्शन एजेंट बनने को ‘भ्रष्टाचार’ करार दिया था। स्वतंत्र स्तंभकारों ने इसे ‘ट्रैफ़िक लाइट के उल्लंघन के अपराध में प्रधानमंत्री को बर्खास्त करना’ कहा था।

इमरजेंसी लगाने का ऐलान 25 जून की आधी रात के पहले हुई। दिन में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई रैली में जय प्रकाश नारायण ने आह्वान किया था कि सेना और पुलिस सरकार के आदेश को मानने से मना कर दे। यह केंद्रीय सत्ता को उखाड़ फेंकने का खुला आह्वान था। ऐसे में कोई दूसरी सरकार भी क्या करती? ऐसी ही स्थिति के लिए संविधान में अनुच्छेद 352 मौजूद था जिसके तहत आपातकाल लगाने का फ़ैसला किया गया। यानी यह क़दम कहीं से भी असंवैधानिक नहीं था।

इंदिरा गाँधी ने उस समय विदेशी साज़िश का जो तर्क दिया था, वह भी यूँ ही नहीं था। 1971 में अमेरिका के सातवें बेड़े की धौंस को बंगाल की खाड़ी में डुबोकर उन्होंने जिस तरह बांग्लादेश का निर्माण संभव किया था, उसके बाद अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के वे स्वाभाविक ही निशाने पर थीं। 1973 में चिली के समाजवादी राष्ट्रपति सल्वाडोर अलांदे का इसी एजेंसी में तख्ता पलट किया था और सैन्य विद्रोह में उनकी जान चली गयी थी। आलेंदे की हत्या की ख़बर जब इंदिर गाँधी को मिली तो वे दिल्ली में क्यूबा के राष्ट्रपति फ़िदेल कास्त्रो की मेज़बानी कर रही थीं। बाद में कास्त्रो ने लिखा कि “ इंदिरा ने उस वक़्त कहा था- उन्होंने जो अलांदे के साथ किया है, वही मेरे साथ भी करना चाहते हैं। चिली में जिन ताक़तों ने यह काम किया है, उनसे जुड़े लोग यहाँ भी हैं।’

इसके अलावा 1974 की रेल हड़ताल ने भी सरकार को गंभीर संकेत दिया था। इस हड़ताल का मक़सद देश भर के कारख़ानों में कोयला सप्लाई रोककर उत्पादन ठप कर देना था ताकि ज़रूरी चीजों की आपूर्ति न हो सके और जनता विद्रोह कर दे। हिंसा और धमाकों का सिलसिला भी जारी था ( जिसका प्रमाण बाद में बड़ौदा डायनामाइट कांड के रूप में मिला)। जनवरी 1975 में रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या भी हो गयी थी। ऐसे में इंदिरा गाँधी ने अगर इमरजेंसी लगाने का फ़ैसला किया तो अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता।

यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद ही जिस तरह समाजवादी नीतियाँ लागू की थीं उससे कांग्रेस के अंदर और बाहर का दक्षिणपंथी ख़ेमा नाराज़ था। पूँजीपति बैंकों के राष्ट्रीयकरण से नाराज़ थे तो पूर्व रियासतदारों का सामंत वर्ग ‘प्रिवीपर्स’ और राजा, महाराजा और हिज़ हाईनेस जैसे टाइटन ख़त्म किये जाने से ग़ुस्से में था। नेहरू के समय ज़मींदारी उन्मूलन रोकने की उसकी तमाम कोशिशें नाकाम हुई थीं और इंदिरा ने उसे ज़मीन पर उतारने का प्रयास और तेज़ कर दिया था। ये सारी शक्तियाँ जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन को ताक़त दे रही थीं। जय प्रकाश नारायण ने आरएसएस को भी साथ ले लिया था जिस पर तब तक महात्मा गाँधी की हत्या का दाग़ गाढ़ा था और इंदिरा गाँधी की नज़र में वो एक फ़ासीवादी संगठन था। इन सब चीजों ने इंदिरा गाँधी के संदेह को बढ़ा दिया था।

यह भी याद रखने की बात है कि बिना किसी बड़े आंदोलन के दबाव के, उन्नीस महीने बाद इंदिरा गाँधी ने ख़ुद ही इमरजेंसी हटा दी। आज के अघोषित आपात्काल में मोदी सरकार और चुनाव आयोग के रिश्तों को देखते हुए यह भी आश्चर्यजनक ही लगता है कि ‘तानाशाह’ इंदिरा गाँधी द्वारा नियुक्त चुनाव आयुक्त टी.स्वामीनाथन ने ऐसा चुनाव कराया कि इंदिरा गाँधी चुनाव हार गयीं और बिना किसी ना-नुकुर के सत्ता से हट गयीं।

आरएसएस को साथ लेने के सदैव विरोधी रहे मशहूर समाजवादी चिंतक मधु लिमये ने बाद में लिखा- ‘इंदिरा ने 1977 में चुनाव कराने के जो कारण बताये वह सचमुच व्यक्तित्व की अंतरात्मा को प्रतिबिंबित करता है। …इंदिरा गाँधी यह कभी नहीं भूल सकती थीं कि वह जवाहरलाल नेहरू की बेटी हैं और हम सब की तरह महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चलने वाले स्वतंत्रता संग्राम की संतान हैं।’

1977 के चुनाव में नसबंदी और उससे जुड़ी अफ़वाहें उत्तर भारत में कांग्रेस के सफ़ाये का सबसे बड़ा कारण बनी थीं। लेकिन ढाई साल में ही संपूर्ण क्रांति का ढोल फट गया। जनता पार्टी ने 1980 में ‘फिर इमरजेंसी’ का डर दिखाकर इंदिरा गाँधी को रोकने की कोशिश की लेकिन कांग्रेस के पक्ष में आँधी चली और उसे लोकसभा में 353 सीटें मिलीं जबकि जनता पार्टी महज़ 31 सीटों पर सिमट गयी। जनता की अदालत में इमरजेंसी का मुक़दमा इसी चुनाव में निपट गया था जिसे साढ़े चार दशक बाद मोदी सरकार फिर सुनवाई पर लाने की कोशिश करती रहती है। लेकिन दलित-वंचित समाज की ओर से इमरजेंसी को लेकर जो नया नज़रिया सामने आ रहा है, वह इस कोशिश के सामने बड़ी चुनौती साबित होगा।

साभार- द लेंस

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