क्या रामायण के राम-रावण युद्ध के पीछे था ब्राह्मण और बौद्ध धम्म का संघर्ष ?
‘ऐसे में वे क्या कारण थे कि बाद की कथाओं में रावण का वीभत्स चित्रण किया गया ? क्या इसका कारण राम को दैवीय आलोक से आवृत्त कर रावण को एक निकृष्ट व्यक्ति के रूप में चित्रित कर आम-जनमानस में उसके प्रति घृणा भरना था ?’ पढ़ें पूरा आलेख…

क्या रावण बौद्ध धर्मानुयायी था ? क्या रामायण के राम और रावण का युद्ध देव-दानवों का धर्मयुद्ध नहीं अपितु ब्राह्मण धर्म और बौद्ध धम्म का संघर्ष था ? क्या राम ब्राह्मण धर्म की रक्षा करने वाले एक क्षत्रिय राजा थे और रावण एक अनार्य राजा? क्या पुष्यमित्र शुंग द्वारा किये गये बौद्धों के नरसंहार के ट्रेसेज़ रामायण कथा में खोजे जा सकते हैं ? भारत के पौराणिक साहित्य में उपस्थित ऐसे तमाम मिथकों/कथाओं को आज दलित विमर्श ने एक बिल्कुल अलग, नया और क्रांतिकारी दृष्टिकोण दिया है.
हिंदी दलित विमर्श में रामायण कथा को इस दृष्टिकोण से पहलेपहल प्रस्तुत करने वाले विचारक सी.पी. जिज्ञासु थे. 1959 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘ रावण और उसकी लंका ‘ में वे बताते हैं कि वाल्मीकि रामायण में ऐसा कहीं जिक्र नहीं है कि रावण के दस शीश थे , या उसके सिर पर पशुओं जैसे सींग थे या वह हिंसक था. बल्कि उसमें रावण को कुशल नीतिज्ञ, परम विद्वान और सभ्य बताया गया है.तो ऐसे में वे क्या कारण थे कि बाद की कथाओं में रावण का वीभत्स चित्रण किया गया ? क्या इसका कारण राम को दैवीय आलोक से आवृत्त कर रावण को एक निकृष्ट व्यक्ति के रूप में चित्रित कर आम-जनमानस में उसके प्रति घृणा भरना था ?

रामायण कथा और अन्य मिथकों में बार-बार ऐसे प्रसंग आते हैं कि राक्षस ब्राह्मणों के यज्ञ में बाधा पहुंचाते थे.प्राचीन इतिहास के अध्ययनों से पता चलता है कि उस काल में यज्ञों में बलि चढ़ाई जाती थी, आज भी बंगाल सहित कई राज्यों में आराध्य देव के सामने बलि चढ़ाने की परंपरा है.वहीं दूसरी तरफ बौद्ध धर्म में हिंसा वर्जित है. बौद्ध धर्मानुयायी सम्राट अशोक ने अपने शिलालेख में पशुबलि का निषेध किया था. क्या यही कारण था कि उस समय बौद्ध प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा ब्राह्मणों के यज्ञ-हवनों को रोका जाता रहा हो , जिसके प्रतिशोध में ब्राह्मण-वर्ग ने उन्हें अपने मिथकों में राक्षसों की संज्ञा दी ? पेरियार रामास्वामी अपनी प्रसिद्ध किताब ‘ ट्रू रीडिंग ऑफ रामायणा’ में इस संदर्भ में विस्तार में बात करते हैं. आचार्य नरेंद्र देव के ‘ बौद्ध धर्म दर्शन’ में भी ‘लंकावतार सूत्र’ का उल्लेख मिलता है , जिसके अनुसार लंकापति रावण ने बुद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण की थी.

एक थ्योरी यह भी है जिसके अनुसार रावण शिव का परम उपासक था. और क्योंकि शिव अनार्यों के देवता थे ऐसे में रावण अनार्यों का राजा था या स्वयं भी अनार्य था. ब्राह्मण धर्म के इतिहास में आर्य-अनार्य संघर्ष भी बहुत प्रचलित रहा है. कुल मिलाकर ऐसा प्रतीत होता है कि रावण का धर्म ब्राह्मण-धर्म नहीं था. यही कारण है ब्राह्मण धर्म के प्रतिनिधि राम उसे चुनौती देते हैं और उसे मार डालते हैं.
इन तमाम कथाओं से एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट होती है कि हर कथा , हर मिथक के पीछे इतिहास में घटित घटनाएं होती हैं. ये घटनाएं एक-दूसरे से यथार्थ और कल्पना के मेल से संबद्ध होती हैं. इसी यथार्थ और कल्पना के मेल से मिथकों की रचनाएं होती हैं जिसके पीछे उसे रचने वाले वर्ग का एक खास दृष्टिकोण होता है. इस दृष्टिकोण में रचयिता के अपने विचार और तर्क ऐसे घुले-मिले होते हैं कि वे आम पाठक पर अपनी दृष्टि का प्रभाव तो पूरा डालते हैं पर पाठक उसकी मूल दृष्टि को समझ ही नहीं पाता. अभी तक हम रावण को उसी दृष्टि से देखने के आदी रहे हैं जो सदियों से ‘सवर्ण शिक्षा-पद्धति’ के अनुकूल रही है. आज के समय में दलित चिंतकों ने भारतीय पौराणिक कथाओं और मिथकों को साक्ष्यों सहित नये दृष्टिकोण से प्रस्तुत करके धर्म, साहित्य और इतिहास दर्शन में एक नई क्रान्ति का आगाज़ कर दिया है.
- रोशनी रावत



