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सतीश झा की कहानी- पुरुषोत्तम मिश्रा का आईना

लेखक- सतीश झा

सावन का सत्रहवाँ दिन था, सन् १८७१।

उस दिन पुरुषोत्तम मिश्रा ने वह किया जिसे वे न उस समय समझ पाए, न फिर कभी।

वाराणसी की संकरी गलियों में, दशाश्वमेध घाट से कुछ दूर, अपने पुराने घर की ऊपरी कोठरी में वे अकेले खड़े थे। नीचे उनकी पत्नी सो रही थी। सातवाँ महीना था। नींद भारी थी—मानो किसी और के सपनों से भरी हो।

दो बार वे नीचे जाकर उनका चेहरा देख आए थे।

चेहरे पर ऐसी शांति थी जैसे किसी पात्र में रखा जल, जिसे छूने भर से कुछ टूट जाएगा।

वे फिर ऊपर लौट आए। शायद उस शांति को बचाने के लिए। शायद इसलिए कि जो होने वाला था, उसे नीचे नहीं होना चाहिए था।

उन्होंने दादा का पुराना आईना सामने रखा।

काठ पर समय से घिसे हुए आकार थे—अधखिले कमल, उलटी दिशा में तैरती मछलियाँ और बीच में एक आँख।

उसे देखते हुए पहली बार उन्हें लगा कि देखना और देखे जाना दो अलग बातें नहीं हैं।

उन्होंने शीशे पर हथेली रखी।

काँच पानी की तरह काँपा।

ठंडक थी—नदी की नहीं; उस जल की, जो धरती के बहुत नीचे, बिना आवाज़ किए बहता है।

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उस प्रकाशहीन जगह में पाँच पुस्तकें खुलीं।

न दीवार थी, न द्वार। प्रत्येक पुस्तक पर एक हथेली का निशान था—हर बार वही, हर बार थोड़ा बदला हुआ।

किसी पर कोई नाम नहीं था।

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पहला जीवन

एक बच्चा राजा बना।

वह आईनों के महल में रहा और वहीं मरा—जहाँ प्रत्येक प्रतिबिंब अपने बाद एक और प्रतिबिंब को जन्म देता था।

अंत तक उसे मालूम नहीं हुआ कि उनमें असली कौन था।

हाशिये पर लिखा था:

“खंड १७ देखें।”

खंड १७ में वही मनुष्य कमला नदी के किनारे बैठा था। सत्तर वर्षों से एक ही श्लोक की टीका लिख रहा था।

हर व्याख्या से तीन व्याख्याएँ निकलतीं। उनसे नौ। नौ से सत्ताईस।

मृत्यु के दिन भी उसकी कलम चल रही थी।

अंतिम वाक्य था:

“यह श्लोक अभी समझ में नहीं आया।”

पुरुषोत्तम ने पुस्तक बंद कर दी।

भीतर कहीं एक और पृष्ठ खुला।

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दूसरा जीवन

जूट और पीतल का बड़ा कारोबार था।

हर संबंध का एक खाता था। हर स्पर्श की एक कीमत।

इकतालीस वर्ष की आयु में हिसाब में एक आना कम निकला।

शेष जीवन उसी एक आने की तलाश में बीत गया।

अंतिम पृष्ठ पर लिखा था:

“बाकी: एक अज्ञात पुत्र।”

पुरुषोत्तम ने वह पंक्ति दो बार पढ़ी।

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तीसरा जीवन

भोर से पहले का समय था—न रात, न दिन।

एक युवक खाई में पड़ा था। चारों ओर गीली मिट्टी की गंध थी।

वह अपनी माँ के हाथों की गंध याद कर रहा था।

रोटी की नहीं। मेहंदी की नहीं।

बस हाथों की।

सूर्योदय से पहले वह मर गया।

नीचे लिखा था:

“लापता।”

पीछे के पृष्ठ पर, किसी दूसरी लिखावट में:

“माँ ने तीन वर्ष तक दरवाज़ा खुला रखा।”

पुरुषोत्तम ने पुस्तक बंद कर दी।

वाक्य खुला रहा।

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चौथा जीवन

यह सबसे मोटी पुस्तक थी।

उसमें वही कोठरी थी। वही आईना। वही सावन का दिन।

और एक आदमी था, जो यह कथा लिख रहा था।

पुरुषोत्तम ने अंतिम अनुच्छेद पढ़ा।

उसमें लिखा था कि पुरुषोत्तम अंतिम अनुच्छेद पढ़ रहे हैं।

अगली पंक्ति खाली थी।

वे पीछे हटे।

आईने का जल गाढ़ा हो गया।

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पाँचवाँ जीवन

इस पुस्तक पर हथेली का निशान नहीं था।

भीतर एक आदमी था। वह हर सुबह उठता, खिड़की खोलता और नदी को देखता।

फिर धीरे-धीरे गुनगुनाता।

दिन भर कुछ नहीं करता।

उस जीवन में न पत्नी थी, न पुत्र। न कोई खाता, न युद्ध, न श्लोक, न आईना।

केवल वह था।

वह बहुत वृद्ध हुआ। एक सुबह खिड़की खोलते हुए मर गया।

उसके बाद कोई दरवाज़ा खुला नहीं रहा।

पुरुषोत्तम बहुत देर तक उस पृष्ठ को देखते रहे।

तभी उन्हें नीचे सो रही स्त्री की साँस सुनाई दी।

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किसी ने पूछा:

“इनमें से किसे आप जीने देंगे?”

पुरुषोत्तम ने हथेली हटानी चाही।

पर अब यह स्पष्ट नहीं था कि हथेली उनकी ओर थी या आईने की ओर।

नीचे लकड़ी हिली।

शायद उनकी पत्नी ने करवट बदली थी।

शायद वह बच्चा, जो अभी किसी पुस्तक में दर्ज नहीं था।

पहली पुस्तक खुली। जहाँ राजा का चेहरा होना चाहिए था, वहाँ कोरा शीशा था।

दूसरी में एक आना चमक रहा था।

तीसरी में दरवाज़ा अब भी खुला था।

चौथी की खाली पंक्ति पर स्याही फैलने लगी।

पाँचवीं बंद रही।

पुरुषोत्तम ने कोई उत्तर नहीं दिया।

फिर भी एक पुस्तक चुन ली गई।

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बहुत दूर—जहाँ समय नहीं था और नाम अभी दिए नहीं गए थे—असंख्य जीवन चुप खड़े थे।

उन्हें जन्म लेने की कोई जल्दी नहीं थी।

पुरुषोत्तम ने शीशे से हथेली हटा ली।

उस पर कोई निशान नहीं था।

नीचे पत्नी की साँस सुनाई दे रही थी।

पुराने काठ में, अधखिले कमलों और उलटी तैरती मछलियों के बीच, वह आँख अब भी खुली थी।

वह न पिता को देख रही थी, न पुत्र को।

वह उसे देख रही थी जो अभी जन्मा नहीं था।

और उसे—

जो यह पढ़ रहा है।

  • सतीश झा, लेखक जाने-माने भारतीय-अमरीकी पत्रकार एवं जनसत्ता तथा दिनमान के संपादक रहे हैं.

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