रमेश जोशी – (तोता) राम की शक्ति पूजा
‘मुझे रात को बड़ा अजीब सपना आया । देखा कि मैं जंतर मंतर पर बैठा हूँ और पुलिस मुझे घसीटकर बस में पटक रही है । सो मैंने सोचा, कहीं यह दुःस्वप्न सच न हो जाए सो नवरात्र करने का निश्चय कर लिया ।’ पढ़ें व्यंग्यकार रमेश जोशी की पूरी कहानी…

नवरात्र चल रहे हैं । शक्ति की आराधना का आठ-नौ दिन अनुष्ठान । उस बंगाल की संस्कृति का समुच्चय जिस बंगाल ने विभिन्न रूपों में देश का अद्भुत बौद्धिक नेतृत्व किया । हम और तोताराम न पूरे आस्तिक बन सके और न ही नास्तिक । सुखों में सुमिरन नहीं किया तो फिर दुख तो आने ही थे । क्या बताएं पेट पालने से ही फुरसत नहीं मिली तो कैसे सरकारी खर्च से तीर्थयात्रा करते या केदारनाथ की गुफा में ध्यान लगाते । हाँ, जब-जब दुखों के ईडी के छापे का संकट आया हमने किसी न किसी देवता की वाशिंग मशीन में छलांग लगा दी और बच गए ।
हम तो सदैव की तरह बासी मुँह बरामदे में आकर बैठ गए लेकिन तोताराम नहीं आया । सो हमने उसी तरह उसके हिस्से की चाय भी पी ली जैसे मन न होते हुए भी एक्स्ट्रा पैसे देकर बनवाई गई दाल-फ्राई ग्राहक गले के नीचे उतार ही लेता है ।
हम नहाने का मन बना ही रहे थे कि तोताराम हाजिर । हमने पूछा- क्या बात है ? हमने तो सोचा कहीं जंतर-मंतर तो नहीं चला गया ।
बोला- किसी फ्री की बस और खाने-पीने का इंतजाम होता और सुरक्षित वापिस घर छोड़ने का इंतजाम होता तो हिम्मत कर भी लेता लेकिन कल से कोई बस, ट्रेन कुछ भी दिल्ली की तरफ नहीं जा रही । सुना है सरकार ने हजारों पुलिस, अर्द्ध सैनिक बल लगाकर दिल्ली को पूरी तरह से बंद कर दिया है । जब-जब सरकारें डरती हैं तो ऐसा ही करती हैं ।
हमने कहा- सरकार तो बहुत लोकप्रिय है । जनता उस पर जान छिड़कती है । एक इशारे पर ताली-थाली बजाने लगती है , दीये जलाने लगती है । डरने की तो कोई बात नहीं । सरकार तो लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए चिंतित है । कहीं कोई कॉकरोच उसे कुतरकर भ्रष्ट न कर डाले इसीलिए लोकतंत्र की सुरक्षा का इंतजाम तो कारण ही पड़ता है । और अधिक खतरा हुआ तो कहीं ताले में बंद न करना पड़े ।
लेकिन यह बता कि तू इतनी देर क्यों आया ?
बोला- मुझे रात को बड़ा अजीब सपना आया । देखा कि मैं जंतर मंतर पर बैठा हूँ और पुलिस मुझे घसीटकर बस में पटक रही है । सो मैंने सोचा, कहीं यह दुःस्वप्न सच न हो जाए सो नवरात्र करने का निश्चय कर लिया । बस, दुर्गसप्तशाती का एक पाठ करके आ रहा हूँ । उसी में देर हो गई ।
हमने कहा- सपनों का क्या है ? आडवाणी जी को बहुत बार प्रधानमंत्री बनने के सपने आते रहे लेकिन सच हुए क्या ?इसलिए सपनों से डरने या खुश होने की जरूरत नहीं है ।
बोला- लेकिन जब मैं आ रहा था तो एक पुलिस वाला मेरी तरफ बहुत संदेहास्पद नज़रों से देख रहा था ।
हमने कहा- अंधभक्तों को डरने की कोई जरूरत नहीं है । पुलिस वाले तो केवल दिमागी नक्सलियों को रोकते हैं ।
बोला- लेकिन उन्हें कैसे पता चलेगा कि मैं दिमागी नक्सली नहीं हूँ ।
हमने कहा- जिस प्रकार घड़े को ठोले से बजाकर देखा जाता है । उसी तरह बरतन की आवाज से पता चल जाता है कि फूटा हुआ है, खाली है या भरा हुआ है । तेरा तो नवरात्र के बिना भी काम चल जाएगा ।
बोला- जिस प्रकार सीता ने रावण का वरण नहीं किया था । रावण के उसका अपहरण किया था । वैसे ही मुझे लगता है लोकतंत्र का अपहरण हो गया है । ऐसे में शक्ति की आराधना तो करनी ही पड़ेगी । ये बच्चे भी जंतर मंतर पर यही तो कर रहे हैं । ये बंदर भालू की रावण की लंका फूंकेंगे ।
समझ ले मेरे ये नवरात्र इन बच्चों के लिए ही हैं ।



