प्रियदर्शन का लेख : कुंवर नारायण को पढ़ना अपने समय को पढ़ना है
‘वे बताते हैं कि इन दिनों वे एक अजीब सी मुश्किल में हैं, नफ़रत करने की उनकी ताक़त घटती जा रही है। अंग्रेज़ी से नफ़रत करने की कोशिश में शेक्सपियर आड़े आ जाते हैं, मुसलमानों से नफ़रत की कोशिश में ग़ालिब रास्ता रोक लेते हैं, सिखों से नफ़रत की राह में गुरु नानक मिल जाते हैं। पहला धोखा देने वाली अपनी प्रेमिका के चेहरे पर मां, बहन और पत्नी का चेहरा दिख जाता है और कवि प्रेम के घूंट पीकर रह जाता है।’ पढ़ें सुपरिचित लेखक प्रियदर्शन का पूरा आलेख…

कुंवर नारायण को पढ़ना क्यों ज़रूरी है? क्योंकि वे हमें परंपरा से भी जोड़ते हैं और आधुनिकता से भी। वे परंपरा और आधुनिकता दोनों को जस का तस नहीं ग्रहण कर लेते। परंपरा में भी जो छोड़े जाने लायक है, उसे छोड़ देते हैं और आधुनिकता में भी जो त्याज्य है, उसे त्याज्य बताते हैं।
कुंवर नारायण बहुत सरल कवि हैं। कई बार तो वे सूक्तियों में बात करते हैं। निश्चय ही सूक्तियां कविता नहीं होतीं। लेकिन काव्य तत्व को सूक्तियों में बदलने के लिए जो मानवीय सरलता और भाषिक गहनता चाहिए, वह कुंवर नारायण में भरपूर है। उन जैसा कवि ही लिख सकता है- ‘कोई दुख मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं / हारा वही जो लड़ा नहीं।’
कुंवर नारायण के यहां ऐसी बेशुमार पंक्तियां हैं। वे मनुष्य के साहस और संघर्ष को सर्वोपरि मानते हैं- लेकिन गर्व, अहंकार और मिथ्या अभिमान के खोखलेपन को भी पहचानते हैं। उनकी एक छोटी सी कविता है जिसमें वह बहुत गरिमापूर्ण ढंग से लिखते हैं- ‘अबकी बार लौटा तो / बृहत्तर लौटूंगा / चेहरे पर लगाए नोकदार मूंछें नहीं / कमर में बांधे लोहे की पूंछें नहीं / जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को / तरेर कर न देखूंगा उन्हें / भूखी शेर-आँखों से /अबकी बार लौटा तो / मनुष्यतर लौटूंगा / घर से निकलते / सड़कों पर चलते / बसों पर चढ़ते / ट्रेनें पकड़ते / जगह बेजगह कुचला पड़ा / पिद्दी-सा जानवर नहीं / अगर बचा रहा तो / कृतज्ञतर लौटूंगा / अबकी बार लौटा तो / हताहत नहीं सबके हिताहित को सोचता / पूर्णतर लौटूंगा।’
बहुत जटिल बातों को बहुत सरलता से कह देना कुंवर नारायण की एक अन्य विशेषता है। उनके समूचे काव्य-तत्व में पौराणिक प्रसंगों की प्रचुरता है। ‘वाजश्रवा के बहाने’ या ‘आत्मजयी’ जैसी उनकी कृतियां परंपरा से संवाद करती हैं। ‘आत्मजयी’ में नचिकेता यमराज से बहस करता है। लेकिन परंपरा कुंवर नारायण के लिए आत्मीय विरासत तो है, श्रद्धा या पूजा की वस्तु नहीं। दूसरी बात यह कि वे तमाम परंपराओं को देखते हैं और उनका सम्मान करते हैं। मौजूदा समय में घृणा की जो राजनीति है, उस पर प्रहार करने में भी उनकी कविता नहीं चूकती। उनकी एक कविता है- ‘एक अजीब सी मुश्किल’। वे बताते हैं कि इन दिनों वे एक अजीब सी मुश्किल में हैं, नफ़रत करने की उनकी ताक़त घटती जा रही है। अंग्रेज़ी से नफ़रत करने की कोशिश में शेक्सपियर आड़े आ जाते हैं, मुसलमानों से नफ़रत की कोशिश में ग़ालिब रास्ता रोक लेते हैं, सिखों से नफ़रत की राह में गुरु नानक मिल जाते हैं। पहला धोखा देने वाली अपनी प्रेमिका के चेहरे पर मां, बहन और पत्नी का चेहरा दिख जाता है और कवि प्रेम के घूंट पीकर रह जाता है।
यह कुंवर नारायण की अपनी उलटबांसी है। एक बदहवास, घृणा से बजबजाती दुनिया का जैसे वे मुस्कुराते हुए कंधा थपथपाते हें। लेकिन आततायियों के प्रति उनमें कोई ममत्व नहीं है। यहां उनका सहज अंदाज़ अचानक व्यंग्य-विदग्ध हो उठता है। बाबरी मस्जिद गिराए जाने से व्यथिक वे ‘अयोध्या 1992’ जैसी कविता लिख सकते हैं- ‘हे राम, / जीवन एक कटु यथार्थ है / और तुम एक महाकाव्य ! / तुम्हारे बस की नहीं / उस अविवेक पर विजय / जिसके दस बीस नहीं / अब लाखों सर- लाखों हाथ हैं, / और विभीषण भी अब / न जाने किसके साथ है / इससे बड़ा क्या हो सकता है / हमारा दुर्भाग्य / एक विवादित स्थल में सिमट कर / रह गया तुम्हारा साम्राज्य / अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं / योद्धाओं की लंका है, / ‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं / चुनाव का डंका है! / हे राम, कहां यह समय
कहां तुम्हारा त्रेता युग / कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहां यह नेता-युग! / सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ य किसी पुराण – किसी धर्मग्रन्थ में /
सकुशल सपत्नीक / अबके जंगल वो जंगल नहीं /
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक!’
तो यह भी कुंवर नारायण हैं। पूरी तरह समकालीन और अकाव्यात्मक होने का ख़तरा उठाते हुए भी तीखी बात कह सकने का साहस रखने वाले कवि। उनको पढ़ना इसलिए ज़रूरी है कि उनको पढ़ते हुए मनुष्य होने के नए अर्थ खुलते हैं, सभ्य होने के नए मानी मिलते हैं। वे बहुत चुपचाप हमें भीतर से कुछ बदल डालते हैं। उनका एक दार्शनिक आयाम है जो उनकी छोटी-बड़ी कविताओं में बहुत मुखर होकर सामने आता है। यह मुखरता भी अलग तरह की है- इसमें कोई ऊंची आवाज़ नहीं, बस बहुत स्पष्ट चिंतन की कौंध है। दर्शन को भी निरी दार्शनिकता से मुक्त कर कविता में कैसे ढाल दिया जाए- यह उन्हें ख़ूब मालूम है। उन जैसा कवि ही ‘दीवारें’ जैसी कविता लिख सकता है- ‘अब मैं एक छोटे-से घर /
और बहुत बड़ी दुनिया में रहता हूँ / कभी मैं एक बहुत बड़े घर / और छोटी-सी दुनिया में रहता था /
कम दीवारों से / बड़ा फ़र्क पड़ता है / दीवारें न हों /
तो दुनिया से भी बड़ा हो जाता है घर।’
कुंवर नारायण ने हिंदी के बहुत सारे लेखकों की तरह आर्थिक संघर्ष नहीं झेले, बल्कि वे एक समृद्ध-संपन्न और कुलीन परिवार से आते थे। मगर समकालीन साहित्य संसार में इस बात ने उनकी चुनौती कुछ बड़ी कर दी। उनको मान्यता मिलने में समय लगा। उनके मुक़ाबले हिंदी समाज उम्र में उनसे कुछ वरिष्ठ नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन जैसे जनकवियों को ज़्यादा महत्व देता रहा। वे रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के भी समकालीन रहे। उस दौर में केदारनाथ सिंह की ग्राम-संवेदना को भी हाथों-हाथ लिया गया। यह सच है कि वह दौर हिंदी कविता की बहुत समृद्ध आवाज़ों से भरा था। धीरे-धीरे लोगों ने कुंवर नारायण की कुछ मद्धिम आवाज़ भी सुननी शुरू की। यह शिकायत की गई कि वे ऊष्मा से भरे इस दौर में कुछ ‘ठंडे’ कवि हैं। लेकिन उनकी कविताओं का जो आंतरिक ताप था, वह भी इन वर्षों में मुखर होता रहा।
सत्तर और अस्सी के दशकों में हिंदी कविता नक्सलवाद की क्रांतिकारी धारा से ऊर्जा पाती रही। मंगलेश डबराल, आलोकधन्वा, वीरेन डंगवाल जैसे कई बड़े कवि इसी दौर में उभरे। इस दौर पर नागार्जुन-त्रिलोचन की छाया भी बड़ी होती रही। यह सच है कि इससे पहले इनकी कविताओं को भी वह मान्यता नहीं मिली थी जो इन वर्षों में मिली। लेकिन एक समय ऐसा लगता था कि हिंदी कविता की मुख्यधारा के रूप में जनवाद और उसके आग्रहों के बीच कुछ कवि विस्मृत न कर दिए जाएं।
लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कविता की अपनी शक्ति ने कवियों को बचाया। आज की तारीख में हिंदी कविता जिन कवियों की परंपरा से कुछ ग्रहण करती है, उनमें कुंवर नारायण भी एक हैं और प्रमुख हैं। कभी जाने-माने विष्णु खरे ने लिखा था कि हिंदी कविता वैश्विक कविता से कहीं कमतर नहीं है। हिंदी के जो कवि इस वक्तव्य के प्रामाणिक स्वर की तरह प्रस्तुत किए जा सकते हैं, उनमें कुंवर नारायण भी एक हैं। बेशक, उनकी आवाज कई बार मद्धिम जान पड़ती है, वे कहीं-कहीं पोलिश कवियों मिस्लाव मिवोश और शिंबोर्स्का की याद दिलाते हैं, चिली के महान कवि निकानौर पार्रा की एक कविता युवा कवियों के नाम है- ‘जैसा चाहो वैसा लिखो / जिस भी शैली में जो तुम्हें पसंद आए / पुल के नीचे बहुत सारा खून बह चुका है / यह मानते रहने में / कि एक ही रास्ता सही है / कविता में सबकुछ स्वीकार्य है / बेशक, इस एक शर्त के साथ / कि तुम्हें यह कोरा पन्ना सुधारना है।’ इसमें संदेह नहीं कि कुंवर नारायण ने कोरे पन्नों को बार-बार नए अर्थ दिए।
कुंवर नारायण ने विपुल मात्रा में लिखा है- कविता के अलावा कहानियां भी, फिल्मों पर भी और विचार से जुड़े आलेख भी। ‘कोई दूसरा नहीं’, ‘परिवेश हम तुम’, ‘आमने-सामने’, ‘इन दिनों’ जैसे कविता संग्रह सहज याद आते हैं। उनकी एक कहानी में दो देशों के बीच की सीमाएं खो जाती हैं। अब सब सीमाओं की तलाश में लगे हैं, सीमाएं न हों तो लोग कैसे पहचाने जाएं, सेनाएं क्या करें। लेकिन खोई हुई सीमाओं के बीच सबसे निश्चिंत होकर बच्चे खेल रहे हैं।
सादगी के सौंदर्य और दर्शन की गरिमा के बीच कहीं बनता है कुंवर नारायण का साहित्य। वे समकालीन भी हैं और सार्वकालिक भी, बिल्कुल स्थानीय भी हैं और वैश्विक भी। उनको पढ़ना अपनी दुनिया को नए सिरे से पहचानना है। सार्वकालिक और समकालीन के बीच का सेतु वे बस चंद शब्दों में बांध देते हैं- ‘जिस समय में / सब कुछ / इतनी तेजी से बदल रहा है / वही समय / मेरी प्रतीक्षा में / न जाने कब से / ठहरा हुआ है! / उसकी इस विनम्रता से / काल के प्रति मेरा सम्मान-भाव / कुछ अधिक / गहरा हुआ है ।’
कुंवरनारायण को पढ़ना अपने समय को भी पढ़ना है और समयातीत को भी।



