रविकान्त का लेख- किसान समस्या, प्रेमचंद और जादुई यथार्थवाद
भारत की सड़सठ प्रतिशत आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है। इतनी बड़ी आबादी आज घोर संकट में है। अतिवृष्टि और ओलावृष्टि के कारण फसल चैपट हो गई है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। किसानों की बेबसी का जमकर राजनीतिकरण हुआ है। कोई किसान की आत्महत्या का तमाशा बना रहा है। कोई इसे कायरता कह रहा है। इन हालातों में कथाकार प्रेमचन्द की याद आना स्वाभाविक है। प्रेमचन्द केवल हिन्दी के ही नहीं बल्कि सभी भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्त किसान-जीवन के सबसे बड़े लेखक हैं। अपने दर्जन भर उपन्यासों और तीन सौ से अधिक कहानियों में उन्होंने किसानों का बहुत मार्मिक चित्रण किया है। परिमाण के हिसाब से यद्यपि प्रेमचन्द ने किसानों पर अपेक्षाकृत कम कहानियाँ और उपन्यास लिखे हैं। प्रेमचन्द के यहाँ गांव के साथ-साथ शहर का जीवन भी बखूबी चित्रित है। उनके यहाँ शहरी जीवन का यथार्थ अपनी तमाम खूबियों-विसंगतियों के साथ मौजूद है। पूँजीपति, दलाल, रईस, वकील, संपादक, अध्यापक से लेकर राजनीतिक कार्यकर्ता, संघर्षशील पढ़े-लिखे युवा और मजदूर आदि विभिन्न चरित्र उनके कथा साहित्य में उपस्थित हैं। प्रेमचन्द के गांवों में भी किसान के साथ-साथ जमींदार महाजन, पण्डे पुरोहित, मुस्लिम, स्त्री, दलित आदि पात्र विद्यमान हैं। इसी वैविध्य को ध्यान में रखते हुए हंसराज रहबर ने प्रेमचन्द को स्वाधीनता आंदोलन का लेखक कहा है। अलबत्ता, उनके लेखन के केन्द्र में किसान और उसका जीवन ही है। प्रेमचन्द ने बेहद तल्लीनता और रागात्मकता के साथ गांवों के किसान और उसके परिवार को चित्रित किया है। यह चित्रात्मक शैली अन्य प्रसंगों में उतनी जीवन्त नहीं दिखाई देती। इसीलिए ज्यादातर आलोचक प्रेमचन्द को गांवों और किसानों का लेखक मानते हैं।
किसान जीवन के सबसे बड़े रचनाकार के रूप में प्रेमचन्द हमें बार-बार याद आते हैं। इसका एक कारण और भी है। उनके कथा-सहित्य के अन्य पात्र और समुदाय आज पहले से बेहतर स्थिति में हैं। स्त्री और दलित समुदाय आज स्वयं साहित्यिक रूप से अपना प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श आज साहित्य के केन्द्र में है। स्वाधीनता प्राप्ति और संविधान लागू होने के बाद इन समुदायों को विभिन्न अवसर प्राप्त हुए। इनका आर्थिक उत्थान हुआ। इनमें राजनीतिक सजगता और चेतना पैदा हुई। राजनैतिक चेतना और नेतृत्व प्राप्त होने के कारण इन समुदायों की आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति पहले से बेहतर हुई। दुर्भाग्य से स्वाधीन भारत में किसानों की कोई नुमाइन्दगी नहीं रही। लगातार किसानों को हाशिए पर धकेला जाता रहा। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी उनके हालात बद से बदतर होते गए। औपनिवेशिक भारत से भी कठिन परिस्थितियों का सामना आज भारतीय किसान कर रहा है। औपनिवेशिक भारत का किसान प्राणपण से किसानी की रक्षा करता था। फिर भी वह मजदूर बनने के लिए अभिशप्त था। आज किसान स्वेच्छा से खेती छोड़ना चाहता है, लेकिन उसके पास मजदूरी का विकल्प भी नहीं। वह ऋण लेकर खेती करता है। मोटे ब्याज पर साहूकार- महाजन से लिए गए ऋण को चुकाने में खुद को असमर्थ पाता है तो मजबूरन वह आत्महत्या कर लेता है।
प्रेमचन्द के कथा साहित्य के दो जीवन्त पात्रों हल्कू (पूस की रात) और होरी (गोदान) के माध्यम से औपनिवेशिक भारत की कृषि व्यवस्था और कृषक जीवन को समझा जा सकता है। खेती, किसान के जीविका का साधन तो है ही उसकी मरजाद भी है। लेकिन जब मरजाद (मर्यादा) बिखर जाए तो ऐसी खेती से क्या हासिल। जानवरों द्वारा बर्बाद की गई खेती को देखकर हल्कू हौले से मुस्कुराता है और सोचता है कि अब यहाँ ठंड में सोना तो न पड़ेगा। वह मजदूरी करके गुजारा कर लेगा। इसी कहानी को प्रेमचंद बड़े फलक पर ‘गोदान’ (1935) में प्रस्तुत करते हैं। गोदान में प्रेमचंद किसान जीवन और उसकी समस्या को सम्पूर्णता में चित्रित करते हैं। उसके वर्तमान की बारीक सच्चाईयों के साथ-साथ प्रेमचंद किसान और उसके परिवार के जीवन के भविष्य का भी संकेत करते हैं। गोदान के होरी की समस्या केवल ऋणग्रस्तता नहीं है, जैसा कि ‘प्रेमचंद और उनका युग’ में रामविलास शर्मा मानते हंै। वास्तव में भारतीय समाज की ब्राह्मणवादी-कर्मकाण्डी व्यवस्था और जमींदार- साहूकार तथा नये उभरते हुए पूँजीपति वर्ग का गठजोड़, किसान जीवन की त्रासदी के लिए उत्तरदायी हंै। यह समूचा तंत्र जौंक की तरह किसान के जीवन को चूसता है। हल्कू खेती छोड़ने के बारे में सोचकर हौले से मुस्कुराता है किन्तु खेती की बेदखली के बाद या चले जाने के बाद होरी के चेहरे पर स्थायी विषाद का भाव चस्पा हो जाता है। वह मजदूरी के लिए विवश है। अंततः भूखे पेट सड़क पर गिट्टी ढोते हुए होरी दर्दनाक मौत मरता है। वास्तव में यह होरी की मौत नहीं बल्कि हत्या है। ऐसी हत्या है जिसके गुनहगार रात-दिन तरक्की कर रहे हैं। खूब फल-फूल रहे हैं। अस्सी वर्षों के बाद भी किसानों के हालात नहीं बदले। उनके जीवन की त्रासदी बदस्तूर जारी है। आज हजारों होरी आत्महत्या कर रहे हैं। जनाब! ये आत्महत्याएँ नहीं, हत्याएँ हैं। मर्डर और सौ फीसदी मर्डर! यराना पूँजीवादी सत्तातंत्र इन हत्याओं का गुनहगार है।
आज के हालातों में हल्कू और होरी से ज्यादा ‘बलिदान’ कहानी के गिरधारी की याद आती है। ‘बलिदान’ कहानी का यथार्थ ‘पूस की रात’ और ‘गोदान’ के यथार्थ से एकदम अलग है। यह जितना मार्मिक है, उतना ही कलात्मक भी। ‘बलिदान’ का यथार्थ अधिक लोकधर्मी और सारगर्भी है। किसान जीवन से सम्बन्धित ‘बलिदान’ प्रेमचंद की कम चर्चित कहानी है। आज इस कहानी पर व्यापक चर्चा करने की आवश्यकता है। साथ ही इस बात की खोजबीन करना भी जरूरी है कि आलोचकों ने इस कहानी की अनदेखी क्यों की है। दरअसल ‘बलिदान’ कहानी आलोचना के मान्य सिद्धान्तों और विचारधारात्मक मानदण्डों पर खरी नहीं उतरती।
कहानी में अलौकिक या अतिप्राकृतिक तत्वों का समावेश है। सम्भवतः यही कारण है कि खासकर माक्र्सवादी आलोचकों ने इस कहानी को तवज्जो नहीं दी है। कहानी ‘गिरधारी’ नाम के एक किसान की है। पिता ‘हरखू’ की मौत के बाद जब वह जमींदार ‘ओंकारनाथ’ को पेशगी और नजराना नहीं दे पाता तो उसके पांच बीघा खेत नीलाम हो जाते हैं। उसके ऊपर महाजन का तीस रूपया कर्जा था। मजबूरन उसे कम दामों पर अपने बैल बेचकर कर्जा चुकाना पड़ा। गिरधारी इस सदमे से उबर नहीं पाता और खेत की मेड़ पर स्थित कुँए में कूदकर आत्महत्या कर लेता है। अब कोई भी उसके खेत को जोत-बो नहीं पाता क्योंकि रोज रात को गिरधारी कुँए से निकलकर खेत के चक्कर लगाता है और रोता है। गिरधारी के भूत के डर से कालिकादीन ने जमींदार को खेत वापस कर दिए हैं। ओंकारनाथ खेत उठाना चाहते हैं लेकिन कोई किसान खेत लेने के लिए तैयार नहीं होता।
गिरधारी के मरने के बाद उसका बड़ा लड़का शहर में ईंट के भट्टे पर काम करता है। प्रतिमाह बीस रूपये घर लाता है। जौ की जगह गेहूँ खाया जाता है। फिर भी गिरधारी की पत्नी गांव में दुबकी-छिपती फिरती है। अब उसकी कोई इज्जत-मर्यादा नहीं है। उसके पास खेत नहीं हैं। उसका बेटा मजदूरी करता है छोटे किसानों के लिए खेती न तब पुसाने लायक थी और न अब है।
गिरधारी का भूत रोज रात में खेत की मेड़ के चक्कर लगाता है। अब कोई उसके खेत में हल नहीं जोत पाता। कहानी की इस अलौकिकता की कैसे व्याख्या की जाए? क्या प्रेमचंद अंधविश्वासी थे? क्या प्रेमचंद नये तरह से गांधीवाद को प्रस्तुत कर रहे थे? गिरधारी के खेत पर चक्कर लगाने को क्या एक किसान के सत्याग्रह के रूप में देखना चाहिए? लेकिन भला कोई भूत के सत्याग्रह पर कैसे विश्वास करे। एक सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि भूत-प्रेत की कहानी लिखकर कहीं प्रेमचंद समाज में अंधविश्वास तो नहीं पोषित कर रहे थे। अगर ऐसा है तो प्रेमचंद को बड़ा लेखक कैसे माना जा सकता है? एक बात और, ‘बलिदान’ कोई अकेली कहानी नहीं है जिसमें प्रेमचंद भूत-प्रेत जैसी अलौकिक शक्तियों को चित्रित कर रहे हैं। ‘विध्वंस’ और ‘भूत’ कहानियों में भी चमत्कारपूर्ण दैवीय घटनाएँ होती हैं।
प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के सामाजिक यथार्थवादी लेखक हैं। उनके कथासाहित्य में संवेदना और शिल्प दोनों स्तरों पर यथार्थवाद को देखा जा सकता है। उपरोक्त कहानियों में प्रेमचंद ने भूत-प्रेत आदि अलौकिक शक्तियों का वर्णन किया है। यह किस किस्म का यथार्थवाद है? क्या उन्होंने यथार्थवाद को छोड़ दिया था? इसका सटीक उत्तर तभी दिया जा सकता है, जब हम प्रेमचंद की कहानियों का विश्लेषण बहुत सजग और सचेत होकर करें। दरअसल इन कहानियों में एक अलग किस्म का यथार्थवाद है। यह, वह यथार्थवाद हैं जिसे उन्नीस सौ पचास (1950) के बाद द0 अमेरिकी उपन्यासों के संदर्भ में ’जादुई यथार्थवाद’ कहा गया। प्रेमचंद, जादुई यथार्थवाद के माध्यम से भारतीय समाज के उस सच को व्यक्त करना चाहते थे जिसे सीधे प्रस्तुत करना मुश्किल था।
‘जादुई यथार्थवाद’ शब्द सबसे पहले लैटिन अमेरिकी उपन्यासों के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है। ‘सौ सालों का एकान्त’ नामक माक्र्वेज के उपन्यास के सन्दर्भ में जादुई यथार्थवाद पर गम्भीरता पूर्वक विचार किया गया। माक्र्वेज, लूशुन, कारपेंतियर, जार्ज अमादो, जोस मेरिया, अर्गूदस, जुआन रूफो, कार्लोस फुएत, रावबस्तोस आदि लेखकों-विचारकों के साहित्य में जादुई यथार्थवाद प्रस्तुत हुआ है। जादुई यथार्थवाद का सम्बन्ध सामान्य जीवन से है। माक्र्वेज लिखते हैं कि ‘निजन्धरी कथाएँ, मिथकीय चरित्र तथा भूत-प्रेतादि दैवीय शक्तियों के चमत्कारों के किस्से हमारे जीवन के हिस्से हैं। हमने अपनी दादी से सुने हैं। दरअसल जब जीवन में वास्तविकता और भ्रम का अंतर समाप्त हो जाता है तो ऐसे प्रसंगों का चित्रण होना स्वाभाविक है।’ लैटिन अमेरिकी देशों में उपनिवेशवाद के बाद तानाशाहों का जो शासन रहा उसमें भ्रम और वास्तविकता का अंतर खत्म हो गया। ऐसी विसंगत परिस्थितियों को बेपर्दा करने के लिए इन लेखकों ने जादुई यथार्थवाद की शैली का सहारा लिया।
जब सच कहना असम्भव किन्तु अनिवार्य हो तो वहाँ जादुई यथार्थवाद शैली का प्रयोग सबसे सार्थक होता हैं। हिन्दी साहित्य में इसका प्रयोग हुआ है। लेकिन आलोचना में जादुई यथार्थवाद को लगभग अछूत मान लिया गया हैं। माक्र्सवादी लेखकों में केवल मैनेजर पाण्डेय हैं जिन्होंने जादुई यथार्थवाद पर एक लम्बा लेख लिखा है। उन्होंने मुक्तिबोध के फैण्टसी शिल्प में अभिव्यक्त जादुई यथार्थवाद की ओर संकेत किया है। राजस्थान के प्रसिद्ध कहानीकार विजयदान देथा और हिन्दी कथाकार उदय प्रकाश के सन्दर्भ में भी जादुई यथार्थवाद की चर्चा होती है।
गिरीराज किराडू ने देथा की कहानियों में प्रस्तुत जादुई यथार्थवाद की खोज की है। उदय प्रकाश, लूशुन और माक्र्वेज के जादुई यथार्थवाद को हजारी प्रसाद द्विवेदी की गल्प शैली में पाते हैं। उनका मानना है कि इस शैली की प्रेरणा उन्हें द्विवेदी जी से मिली।
जादुई यथार्थवाद, यथार्थवाद का ही एक प्रकार है। एक विशेष शैली है। इसमें इतिहास, मिथक, फैण्टसी, यूटोपिया, जादू-टोना, परिकथाएँ, दैवीय शक्तियों, शगुन-अशगुन, शाप-वरदान, निजन्धारी कथाएँ, अद्भुत घटनाओं और पूर्वाभास आदि तत्वों-प्रसंगों का प्रयोग होता है। यह अद्भुत और यथार्थ का मेल है। यह यथार्थ को मिथकीय दृष्टि से प्रस्तुत करने की एक शैली है। यह कला और यथार्थ के समन्वय की महत्वपूर्ण शैली है। दूसरे शब्दों में, जादुई यथार्थवाद, यथार्थवाद का सर्वाधिक कलात्मक रूप है। औपनिवेशिक भारत में ऐसी राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ उपस्थिति थीं जिनसे जादुई यथार्थवाद की प्रस्तुति सम्भव हुई। मैनेजर पाण्डेय मानते हैं कि भारत के आदिवासियों और किसानों के जीवन में वे अधिकांश बातें मौजूद हैं जिनसे जादुई यथार्थवाद जुड़ा हुआ है। प्रेमचंद औपनिवेशिक भारत में किसान जीवन के यथार्थ को इस शैली में प्रस्तुत करते हैं। ‘बलिदान’ कहानी में गिरधारी के अपने खेतों से अत्यधिक लगाव, किसानी की मर्यादा और उसकी जीविका के परस्पर जुड़ाव के घनीभूत यथार्थ को प्रेमचंद प्रस्तुत करते हैं। इसीलिए गिरधारी का भूत खेतों का चक्कर लगाता है। ऐसे अलौकिक और अतिप्राकृतिक संदर्भ प्रेमचंद को जादुई यथार्थवाद का लेखक बनाते हैं। चुनांचे, प्रेमचंद हिन्दी के ही नहीं बल्कि किसी भी भाषा के पहले जादुई यथार्थवादी लेखक हैं।


