रविकान्त का लेख- शिवरानी देवी के साथ प्रेमचन्द के सम्बन्ध
‘हमारे समाज में या दुनिया के किसी भी समाज में किसी स्त्री द्वारा पति के परायी स्त्री के साथ सम्बन्ध को सहन करना लगभग नामुमकिन है। वे कौन से कारण थे, जिनकी बदौलत शिवरानी ने प्रेमचन्द को कभी भनक भी नहीं लगने दी कि वे उस सम्बन्ध को जानती हैं? दूसरा सवाल यह भी है कि वह दूसरी स्त्री कौन थी ? अब तक हिन्दी के खोजी साहित्यकार इसकी पड़ताल कर पाए हैं या नहीं, इसकी कोई जानकारी अभी तक नहीं है।’ पढ़ें पूरा आलेख…
बीसवीं सदी के विश्व साहित्य में प्रेमचन्द की मानीखेज भूमिका है। दुनिया की तमाम भाषाओं के उल्लेखनीय साहित्य में प्रेमचन्द का कथा साहित्य सम्मान के साथ पहली पंक्ति में शामिल करने योग्य है। हालाँकि औपनिवेशिक देशों के साहित्य, साहित्यकारों को इस रूप में देखने-परखने और सम्मान देने में आलोचक हिचकते हैं। अक्सर, प्रेमचन्द की तुलना गोर्की से होती है। कभी यह तुलना टालस्टाय और चेखव से होती है। वास्तव में, औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि के कारण आज भी इसी तरह देखने-परखने और मूल्यांकन करने की रबायत है। क्यों नहीं गोर्की की तुलना प्रेमचन्द से की जाती है ? ये वही दृष्टि है जिसमें समुद्रगुप्त की तुलना नेपोलियन से की जाती है, बिना यह जाने-समझे कि समुद्रगुप्त का इतिहास नेपोलियन से सैकड़ों वर्ष पुराना है।
सवाल यह है कि किसी साहित्यकार को परखने की कसौटी क्या होनी चाहिए। क्या सिर्फ साहित्य और रचनात्मक मूल्यों के आधार पर किसी साहित्यकार का मूल्यांकन होना चाहिए ? रचनाकार के व्यक्तिगत जीवन को जाँचना-परखना जरूरी है या नहीं? किसी रचनाकार के व्यक्तिगत जीवन और रचनात्मक अवदान में कोई सम्बन्ध होता है या नहीं ? लेखक के जीवन और साहित्य के सम्बन्धों और अन्तर्विरोधों को रेखांकित किया जाना चाहिए या नहीं? ये प्रश्न प्रेमचन्द जैसे साहित्यकार का मूल्यांकन करते समय और भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। प्रेमचन्द का निजी जीवन बेहद दिलचस्प है। रचनात्मक मूल्यों के निकष पर उनकी जिन्दगी कहीं सच्ची, नैतिक और निर्द्वन्द्व है तो कहीं उतनी ही जटिल और अन्तर्विरोधों से भरी हुई है।
प्रेमचन्द स्वाधीनता आन्दोलन के लेखक हैं। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान तमाम धार्मिक-सामाजिक सुधार आन्दोलन चल रहे थे। हिन्दुस्तान के अलग-अलग भागों में ये आन्दोलन सक्रिय थे। पंजाब और संयुक्त प्रान्त में दयानन्द सरस्वती के आर्य समाज का अधिक प्रभाव था। प्रेमचन्द ने 1911 में आर्य समाजी शिवरानी देवी से आर्य समाज के रीति-रिवाज से विवाह किया। शिवरानी देवी प्रेमचन्द की दूसरी पत्नी थीं। बाल विधवा शिवरानी का भी यह दूसरा विवाह था। प्रेमचन्द ने स्वेच्छा से प्रयत्नपूर्वक शिवरानी देवी से विवाह किया था। शिवरानी पढ़ी-लिखी साहित्यिक महिला थीं। प्रेमचन्द के साथ अपने रिश्तों को उन्होंने ‘प्रेमचन्द घर में’ नामक पुस्तक में दर्ज किया है। अमृतराय की किताब ‘कलम का सिपाही’ में उद्धृत प्रेमचन्द-शिवरानी के सम्बन्धों की अधिकांश जानकारी इसी किताब से ली गयी है।
प्रेमचन्द और शिवरानी देवी के स्वभाव में बहुत अन्तर था। अमृतराय ने अपनी माँ (शिवरानी) के सम्बन्ध में लिखा है कि वे “लकड़ी की तरह सीधी-सपाट, सच्ची, निडर, अक्खड़ और हठीली थीं।” जबकि प्रेमचन्द शान्त, विनम्र और मिलनसार थे। दोनों के स्वभाव में इतना फर्क होने के बावजूद घर-गृहस्थी से लेकर पढ़ने-लिखने तक कहीं कोई विशेष तनाव नहीं होता था। दरअसल, दोनों के स्वभाव ने एक-दूसरे का पूरक बना दिया था। यों तो प्रेमचन्द और शिवरानी के रिश्तों की बुनियाद भुरभुरी और झूठ पर आधारित थी। मसलन, प्रेमचन्द ने शिवरानी को बताया था कि उनकी पहली पत्नी जीवित नहीं हैं। विवाह के आठ साल बाद जब शिवरानी देवी को पता चला कि उनकी पहली पत्नी जीवित हैं तो प्रेमचन्द से उन्होंने उसे घर लाने के लिए कहा। हालाँकि प्रेमचन्द इसके लिए तैयार न हुए। यह भी सच है कि प्रेमचन्द और शिवरानी के विवाह के शुरुआती आठ-दस बरस बड़े तनाव भरे रहे। कारण प्रेमचन्द की विमाता थीं।
बचपन में ही माँ के गुजर जाने के बाद प्रेमचन्द की परवरिशविमाता यानी चाची ने की थी। इसीलिए प्रेमचन्द चाची के स्वभाव से परिचित होने के बावजूद, उनसे कभी कुछ न कहते थे। चाची और शिवरानी में आपस में मनमुटाव रहता था। इसीलिए अक्सर गृहकलह होता रहता था। शिवरानी ने अपनी किताब में एक ऐसे ही वाकयात का जिक्र करते हुए लिखा है कि “उसपर उन्होंने मुझे दो चपत लगाए और बाहर चले गये।” लेकिन धीरे-धीरे पति-पत्नी के रिश्तों में मिठास आने लगी। वात्सल्य और प्रेम के अभाव के कारण प्रेमचन्द के स्वभाव में कठोरता आ गयी थी। धीरे-धीरे शिवरानी ने इस कमी को दूर कर दिया। प्रेमचन्द को शिवरानी से प्रेम और वात्सल्य दोनों प्राप्त होने लगे। समय के साथ प्रेमचन्द उनपर आसक्त और निर्भर होते चले गये। एक पत्र में प्रेमचन्द ने शिवरानी को लिखा, “सच मानो मैंने अपने को तुम्हें सौंप दिया है।” और तब शिवरानी “वाकई उनपर शासन करने लगीं।” प्रेमचन्द ने शिवरानी के इस शासन को मानो स्वीकार कर लिया था। स्वयं शिवरानी ने प्रेमचन्द पर अपने स्नेह और प्रभाव तथा पति के स्वीकार भाव को इन शब्दों में व्यक्त किया है, “खाने-पीने के बारे में तो बच्चों की तरह जो भी पाएँ चुपके से खा लें और कुछ न बोलें। अगर अपने मन की कोई चीज वे खाना चाहें और मेरी इच्छा न हो तो वे उसे किसी तरह भी न खाते थे।” वस्तुतः यह शिवरानी देवी के प्रेम और वात्सल्य का शासन था। इस शासन में प्रेमचन्द अधिक स्वतन्त्र होकर लेखन में व्यस्त हो गये।
खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने के आर्थिक प्रबन्धन और घर-गृहस्थी का बोझ अपने ऊपर लेकर शिवरानी देवी ने प्रेमचन्द को जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया। लेकिन शिवरानी ने अपने प्रेम और स्नेह के बन्धन में प्रेमचन्द को इस कदर बान्धा कि प्रेमचन्द पत्नी की इजाजत और सहमति के बगैर कोई काम नहीं करते थे। मसलन, 1920 में शिवरानी की रजामन्दी लेकर ही उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दिया था। कलकत्ते में भाई ने साझे में प्रेस लगाने की बात की। प्रेमचन्द बिना शर्त रुपये भेज रहे थे लेकिन शिवरानी के कहने पर उन्होंने शर्त लगाई। प्रेमचन्द बम्बई तभी गये जब ‘रानी’ की रजामन्दी हुई। फिल्म कम्पनी से इग्लैण्ड जाने का प्रस्ताव मिला लेकिन शिवरानी के इनकार करने पर प्रेमचन्द ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। वास्तव में, शिवरानी गृहस्वामिनी ही नहीं प्रेमचन्द की हृदयस्वामिनी भी बन गयी थीं। इस सम्बन्ध में उन्होंने स्वयं लिखा है, “मेरी बातों को वे बहुत महत्त्व देते थे। अपने जीवन में कोई भी काम उन्होंने मेरी सलाह के बगैर नहीं किया।”
प्रेमचन्द और शिवरानी के आत्मीय सम्बन्ध भारत जैसे पुरुष प्रधान समाज में किसी भी दम्पत्ति के लिए आदर्श हो सकते हैं। आजकल, एक जुमला चलता है कि अगर प्रेम विश्वास पर टिका होता है तो विवाह अन्धविश्वास पर। लेकिन वैवाहिक जीवन में विश्वास और समर्पण हो तो दाम्पत्य सम्बन्ध निरे प्रेम सम्बन्ध से ज्यादा प्रेरक और सार्थक बन जाता है। प्रेमचन्द पत्नी को हमेशा ‘रानी’ कहकर सम्बोधित करते थे। शुरुआती आठ वर्ष के बमचख के बाद प्रेमचन्द अपनी ‘रानी’ को इतना चाहने लगे थे कि कुछ दिनों की जुदाई ही उन्हें असह्य लगने लगती थी। एक बार शिवरानी इलाहाबाद क्या रूक गयीं, बनारस में प्रेमचन्द को सुना घर काटकर खाने लगा। तब एक रोज उकताकर और बहुत खिन्न होकर प्रेमचन्द ने उन्हें उलाहना देते हुए लिखा, “प्रिय रानी, मैं तुम्हें छोड़कर काशी आया। मगर यहाँ तुम्हारे बिना सूना सूना लग रहा है। क्या कहूँ? तुम्हारी बहन की बात कैसे न मानता ? न मानने पर तुम्हें भी बुरा लगता। तुम तो वहाँ अपनी बहन के साथ खुश होंगी, मगर मैं यहाँ परीशान हूँ, जैसे एक घोंसले में दो पक्षी रह रहे हों और उनमें से एक के न रहने पर दूसरा परेशान हो। तुम्हारा यही न्याय है कि तुम वहाँ मौज करो और मैं तुम्हारे नाम की माला फेरूँ ? तुम मेरे पास रहती हो तो मैं भरसक कहीं जाने का नाम नहीं लेता, तुम आने का नाम नहीं लेती… घर मुझे खाये जा रहा है। कभी-कभी मैं यह सोचता हूँ कि क्या सभी की तबीयत इसी तरह चिन्तित हो जाती है या मेरी ही?… कहीं ऐसा न हो कि इस पत्र के साथ मैं भी पहुँचूँ।”

सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में बा और बापू के रिश्तों पर बहुत-कुछ कहा-लिखा गया। इन दिनों पुनः दिल्ली के एक मन्त्री के कुकर्मों का वीडियो मीडिया में आने पर एक पुराने पत्रकार और नये राजनेता ने ट्वीट कर लिखा कि परायी स्त्री से सहमति से बनाया गया शारीरिक सम्बन्ध जाएज है। उन लाल बुझक्कड़ ने फिर एक लम्बी अविश्वसनीय फेहरिस्त ऐसे रिश्तों की ट्विटर पर टांग दी। इस फेहरिस्त में गांधी जी का भी नाम था कि बापू ने उर्मिला देवी को आध्यात्मिक पत्नी माना था। इस जिरह को बीच में लाने का औचित्य यह है कि भारतीय समाज में पति-पत्नी के रिश्तों को खासी तवज्जो मिली है। यहाँ दाम्पत्य प्रेम की डोर विश्वास और समर्पण में बन्धी होती है। हम इतने संकीर्ण हैं कि इन रिश्तों पर कोई बहस-विमर्श नहीं करना चाहते। गोया, बात करने से यह रिश्ता नापाक हो जाएगा। मेरा इसरार सिर्फ इतना है कि बेहद बारीक और सघन बुने इस रिश्ते की समाजशास्त्रीय और आलोचनात्मक ढंग से जाँच-पड़ताल होनी चाहिए। ताकि इसके स्वरूप और ऐतिहासिक विकास-क्रम को समझा जा सके। यह जरूरी इसलिए भी है क्योंकि आज महानगरीय जीवन-पद्धति में सहजीवन (लिवइन) का अस्तित्व अंगड़ाई ले रहा है।
समकालीन अस्मितावादी विमर्शकारों ने प्रेमचन्द के साहित्य को प्रश्नांकित किया है। दलित रचनाकारों ने जाति के सवाल उठाए। हालाँकि अपने अन्तिम उपन्यास ‘गोदान’ और ‘गुल्ली-डण्डा’ जैसी कहानियों में प्रेमचन्द ने दलित चेतना और संघर्ष की अभिव्यक्ति दी है। अलबत्ता, स्त्री नजरिए से ‘गोदान’ में मालती और आनन्दी को आमने-सामने खड़ा करके प्रो. मेहता के व्याख्यानों को कटघरे में खड़ा किया जाता है। माना जाता है कि प्रेमचन्द आदर्श भारतीय नारी के कायल हैं। वे उस दर्शन को मानते हैं जिसमें स्त्री या तो देवी है अथवा दासी। देखने वाली बात यह है कि प्रेमचन्द अपने निजी जीवन में स्त्री के प्रति कैसा व्यवहार रखते हैं। शिवरानी ने तफ्सील से वर्णन किया है कि प्रेमचन्द उनकी सुख-सुविधाओं का बहुत खयाल रखते थे। वे शिवरानी के घरेलू कामों में भी मदद करते थे, जैसे-बच्चों को सम्भालना, बर्तन धोना, रोटी सेंकना, पत्नी और बच्चों के बीमार पड़ने पर उनकी सेवा करना आदि। उन्होंने शिवरानी से ‘दासी’ की तरह
कभी व्यवहार नहीं किया। शिवरानी कभी उनके पैर दबाने जातीं तो प्रेमचन्द मना कर देते। शिवरानी ने भी प्रेमचन्द का पूर्ण मनोयोग से जीवन के हर पड़ाव पर साथ दिया। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान प्रेमचन्द को जेल न जाना पड़े, इसलिए वे स्वयं जेल गयीं। प्रेमचन्द इतने लिक्खाड़ थे कि बीमार होने के बावजूद, वे लिखते रहते। ऐसी स्थिति में जब कभी प्रेमचन्द नहीं माने तो शिवरानी ने उनका कलम तोड़कर फेंक दिया।
प्रेमचन्द और शिवरानी का रिश्ता महज भावनात्मक ही नहीं था। इस जुड़ाव का बौद्धिक पक्ष भी है। शिवरानी जितनी निडर, साहसी और जिम्मेदार थीं, उतनी ही बौद्धिक भी थीं। प्रेमचन्द और शिवरानी में अक्सर बौद्धिक बहस भी होती थी। शिवरानी ने इन बहस-मुबाहिसों का सिलसिलेवार ब्योरा दिया है। इन बहसों में अधिकतर समकालीन मुद्दे होते थे। जैसे- स्त्री समस्याओं में नारी पराधीनता और वैश्यावृत्ति, साहित्य, देश की पराधीनता और आर्थिक शोषण, भाषा-समस्या, रूसी समाजवादी क्रान्ति और शासन व्यवस्था, धर्म, आस्था और आस्तिकता। ऐसे तमाम गम्भीर विषयों-समस्याओं पर प्रेमचन्द-शिवरानी में बहस-विमर्श होता था। इन मसलों पर दोनों की राय हमेशा एक नहीं होती थी। स्त्री समस्याओं पर दोनों के विचारों में अन्तर था। प्रेमचन्द शिवरानी के स्वतन्त्र विचारों का सम्मान करते थे। शिवरानी के सामाजिक कार्यों में भी प्रेमचन्द सहयोग करते थे। महिला आश्रम जाने और स्वाधीनता आन्दोलन में भागीदारी को प्रेमचन्द ने प्रोत्साहित किया। प्रेमचन्द की वजह से शिवरानी का साहित्य की तरफ झुकाव हुआ। उनसे प्रेरित होकर शिवरानी कहानी लिखने लगीं।
प्रेमचन्द और शिवरानी के इतने आत्मीय और सघन रिश्तों में एक गहरी फाँस भी थी। यह फाँस थी, प्रेमचन्द के अन्यत्र सम्बन्ध। अपने अन्तिम समय में प्रेमचन्द ने शिवरानी के समक्ष स्वयं इस सच्चाई को कुबूल किया है। पहली पत्नी के रहते हुए अन्य स्त्री के साथ प्रेमचन्द के सम्बन्ध थे। शिवरानी से विवाह करने के बाद भी यह सम्बन्ध चलता रहा। आश्चर्य तो यह है कि शिवरानी को इस सम्बन्ध की
जानकारी भी थी। हमारे समाज में या दुनिया के किसी भी समाज में किसी स्त्री द्वारा पति के परायी स्त्री के साथ सम्बन्ध को सहन करना लगभग नामुमकिन है। वे कौन से कारण थे, जिनकी बदौलत शिवरानी ने प्रेमचन्द को कभी भनक भी नहीं लगने दी कि वे उस सम्बन्ध को जानती हैं? दूसरा सवाल यह भी है कि वह दूसरी स्त्री कौन थी ? अब तक हिन्दी के खोजी साहित्यकार इसकी पड़ताल कर पाए हैं या नहीं, इसकी कोई जानकारी अभी तक नहीं है। एक सवाल यह भी प्रेमचन्द आखिरी वक्त में सच को कुबूल करके क्या अपराध मुक्त या पाप मुक्त होना चाहते थे। प्रेमचन्द के व्यक्तिगत जीवन का यह जटिल अन्तर्विरोध है।


