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‘ पराधीन मीडिया कमजोर लोकतंत्र को जन्म देता है…’ बोले शीतल पी सिंह

लोकतंत्र में मीडिया का काम नेताओं की तारीफ करना और आलोचकों से उनका बचाव करना नहीं, बल्कि उनसे असहज सवाल पूछना होता है।

इराक युद्ध के दौरान अमेरिकी एडमिरल से अमरीकी मीडिया द्वारा यह पूछा गया था कि ईरान के मिनाब के स्कूल पर टॉमहॉक मिसाइल किसने दागी, जहां 120 बच्चों समेत 150 से ज्यादा लोग मारे गए थे। यही पत्रकारिता की असली भूमिका है — सत्ता से जवाब मांगना।

लेकिन ओस्लो में जब एक नॉर्वेजियन महिला पत्रकार ने प्रधानमंत्री Narendra Modi से पूछा कि वे मीडिया के सवालों का जवाब क्यों नहीं लेते, तो भारतीय टीवी मीडिया और सोशल मीडिया का एक हिस्सा पत्रकार पर ही टूट पड़ा।
किसी ने उसे “भारत विरोधी” कहा, किसी ने “एजेंडा पत्रकार”।

दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में प्रेस कॉन्फ्रेंस और कठिन सवाल सामान्य बात हैं। वहां नेता पत्रकारों के सवालों से भागने को उपलब्धि नहीं मानते।
लेकिन भारत में हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि पत्रकार सवाल पूछ दे तो उसे ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

मीडिया अगर सिर्फ “मोदी जी मोदी जी” कहकर कैमरे के सामने खड़ा रहेगा और सवाल पूछने वालों को ट्रोल करेगा, तो लोकतंत्र कमजोर होगा, मजबूत नहीं।

शीतल पी सिंह
फेसबुक से साभार

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