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लोकतंत्र की हत्या अब लाठी से नहीं, सूची से होगी

‘अगर नागरिकता की परिभाषा संदिग्ध कर दी जाए, जनगणना के आंकड़ों पर भरोसा कम कर दिया जाए, SIR के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए और परिसीमन के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पूरा नक्शा बदल दिया जाए तो चुनाव भले होते रहें, लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाएगा।’ पढ़ें पत्रकार त्रिभुवन का पूरा लेख…

जीएन देवी भारत के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक कार्यकर्ता, भाषाविद्, साहित्य-आलोचक और सार्वजनिक बुद्धिजीवी हैं। वे विलुप्तप्राय और उपेक्षित भाषाओं के दस्तावेज़ीकरण तथा संरक्षण के अपने असाधारण काम के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। People’s Linguistic Survey of India के नेतृत्वकर्ता के रूप में उन्होंने भारत के आदिवासी, घुमंतू, सीमांत और हाशिए के समुदायों की भाषाई-सांस्कृतिक अस्मिता को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का ऐतिहासिक कार्य किया है। अभी मैंने “महाभारत : काव्य और राष्ट्र” शीर्षक वाली विद्वत्तापूर्ण पुस्तक पूरी की ही थी कि उनके जयपुर आगमन की ख़बर मिली तो मैं अपने आपको उनके व्याख्यान में जाने से रोक नहीं पाया।

जयपुर में जीएन देवी का व्याख्यान किसी साहित्यिक विद्वान का सामान्य भाषण नहीं था। वह लोकतंत्र के शव-परीक्षण से पहले की अंतिम चेतावनी जैसा था। एक खचाखच भरे विशालकाय सभागार में करीने से धीर-गंभीर बैठे लोगों को उन्होंने नागरिकता, जनगणना, SIR, परिसीमन और जनसांख्यिकी के नाम पर बन रही उस नई राजनीति को समझाया, जिसमें नागरिक को पहले आंकड़ा बनाया जाता है, फिर संदेहास्पद बनाया जाता है, फिर सूची से हटाया जाता है और अंत में राष्ट्र से बाहर धकेल दिया जाता है। यह सब बंदूक से नहीं होता। यह फॉर्म से होता है। यह हिरासत-शिविर से पहले प्रमाणपत्र मांगता है। यह संविधान पर हमला करने से पहले मतदाता-सूची पर हमला करता है।

हैरानी यह नहीं कि हॉल भरा हुआ था। हैरानी यह है कि वहाँ मीडिया नहीं था। राजनीतिक दल नहीं थे। विपक्ष नहीं था। कांग्रेस नहीं थी। वे लोग नहीं थे जिनका पहला काम नागरिकता, मतदान-अधिकार, संविधान और प्रतिनिधित्व की रक्षा करना है। यह वही कांग्रेस है जो चुनाव के समय बूथ मैनेजमेंट पर लाखों वॉट्सऐप संदेश भेजती है, लेकिन जब नागरिकता और जनगणना के जरिए पूरे लोकतंत्र का भूगोल बदलने की बहस उठती है तो उसकी वैचारिक रीढ़ जैसे गायब हो जाती है। प्रतिपक्ष में होकर भी अगर किसी दल को Census, SIR, Demography, Delimitation और Citizenship जैसे शब्दों से बेचैनी नहीं होती तो समझना चाहिए कि वह सत्ता से नहीं, इतिहास से पराजित है। इस तरह के कार्यक्रमों से कांग्रेस की दूरी बताती है कि वह विधानसभा चुनाव में पक्का मार खाएगी और फिर शोर मचाएगी कि बीजेपी ने वोट चुरा लिये। उनकी उदासीनता संकेत दे रही है कि राजस्थान में बंगाल रिपीट होगा।

जीएन देवी ने जिस संकट की ओर इशारा किया, वह बेहद गंभीर है। भारत में लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं है। लोकतंत्र इस बात का नाम है कि कौन नागरिक माना जाएगा, कौन मतदाता रहेगा, किसकी गिनती होगी, किस राज्य को कितनी राजनीतिक शक्ति मिलेगी, किस भाषा को कितनी जगह मिलेगी, किस समुदाय को संदेह की नजर से देखा जाएगा और किसे राष्ट्र की मुख्यधारा से बाहर कर दिया जाएगा। यह सब मिलकर लोकतंत्र का वास्तविक ढांचा बनाते हैं। अगर नागरिकता की परिभाषा संदिग्ध कर दी जाए, जनगणना के आंकड़ों पर भरोसा कम कर दिया जाए, SIR के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए और परिसीमन के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पूरा नक्शा बदल दिया जाए तो चुनाव भले होते रहें, लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाएगा।

देवी ने एक डच फिल्म A Question of Silence का जिक्र करते हुए अपना व्याख्यान शुरू किया। इसमें तीन स्त्रियां एक हिंसक और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के सामने चुप्पी को प्रतिरोध में बदल देती हैं। अदालत उन्हें पागल साबित करना चाहती है, पर सवाल उलटा हो जाता है—पागल वे हैं या वह व्यवस्था है जो उनके जीवन को रोज़ चुपचाप कुचलती रही? आज भारत में भी यही प्रश्न खड़ा है। अगर कोई नागरिक अपने दस्तावेज़ों में एक अक्षर की त्रुटि के कारण संदिग्ध हो जाता है, अगर कोई घुमंतू पशुपालक, कोई मजदूर, कोई आदिवासी, कोई नदी किनारे का विस्थापित, कोई बिना स्थायी पते का मनुष्य राज्य की नजर में “अपूर्ण नागरिक” हो जाता है तो पागल नागरिक नहीं है; पागल व्यवस्था है।

सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि जनगणना अब केवल जनगणना नहीं रह गई है। वह कल्याणकारी योजनाओं, खाद्य सुरक्षा, भाषा, रोजगार, संसाधन-वितरण, निर्वाचन-क्षेत्र, आरक्षण और राजनीतिक शक्ति का मूल आधार है। Planning Commission या बाद की नीति-प्रक्रियाओं में खाद्य सुरक्षा जैसे दस्तावेज़ों की रीढ़ डेटा रहा है। अगर डेटा सही है तो नीति गरीब तक पहुँच सकती है। अगर डेटा देर से आता है, अधूरा आता है या अविश्वसनीय आता है तो शासन अनुमान, प्रचार और पूर्वग्रह पर चलने लगता है। यही वह जगह है जहाँ लोकतंत्र मरना शुरू करता है—जब गरीब का पेट आंकड़े में गायब हो जाए और विस्थापित का नाम सूची में न मिले।

भारत की जनगणना की परंपरा 1871 में औपनिवेशिक शासन के दौर से व्यवस्थित रूप में शुरू हुई। औपनिवेशिक सत्ता ने गिनती को नियंत्रण का उपकरण बनाया था। स्वतंत्र भारत ने उसी गिनती को लोकतांत्रिक योजना और सामाजिक न्याय का आधार बनाया। फर्क यही था—वहाँ census सत्ता की आंख था, यहाँ census नागरिक अधिकार का आधार होना चाहिए था। लेकिन अब भय यह है कि हम फिर उसी औपनिवेशिक प्रवृत्ति की ओर लौट रहे हैं, जहाँ राज्य नागरिक को समझने के लिए नहीं, उसे वर्गीकृत और नियंत्रित करने के लिए गिनता है।

इसीलिए “Demography Commission” या “Demographic Mission” जैसी अवधारणाएँ अत्यंत सावधानी से देखी जानी चाहिए। जनसांख्यिकी अपने आप में विज्ञान है। लेकिन जब उसी विज्ञान को “घुसपैठ”, “अस्वाभाविक परिवर्तन” और “आंतरिक खतरा” जैसी राजनीतिक भाषा में बांध दिया जाए तो वह विज्ञान नहीं रहता, वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का डंडा बन जाता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हमेशा संस्कृति की बात करता है, लेकिन उसका असली लक्ष्य नागरिकता की छंटनी होता है। वह कहता है कि वह राष्ट्र बचा रहा है; वस्तुतः वह राष्ट्र को नागरिकों से खाली कर रहा होता है।

जीएन देवी ने व्याख्यान में पुनर्जागरण आंदोलन की याद दिलाई। राजा राममोहन राय ने उन्नीसवीं सदी के आरंभ में एकेश्वरवाद, विवेक और धार्मिक समानता की दिशा में प्रश्न उठाए। ब्रह्म समाज ने धर्म को तार्किकता और नैतिकता की कसौटी पर रखने की कोशिश की। उन्नीसवीं सदी में आर्य समाज ने वेदों की ओर लौटने का आह्वान किया। फिर धीरे-धीरे सुधारवाद की धार से एक दूसरी धारा निकली—हिन्दू समाज की राजनीतिक संगठनशीलता, हिंदू महासभा, सावरकर की 1923 की हिंदुत्व-पुस्तिका, मूंजे-हेडगेवार की संगठन-दृष्टि और 1925 का आरएसएस। यह इतिहास इसलिए महत्वपूर्ण है कि इससे पता चलता है—एक देश में धार्मिक सुधार, सांस्कृतिक पुनरुद्धार और राजनीतिक राष्ट्रवाद के बीच फर्क मिटता है तो अंततः नागरिकता की जगह सांस्कृतिक शुद्धता बैठ जाती है।

हालांकि मैं देवी की पुनर्जागरण आंदोलन संबंधी कुछ अवधारणाओं से सहमत नहीं हूँ। लेकिन उन्होंने आज की चिंताओं को बहुत प्रखरता से रखा। उनका कहना था कि आज ज़रूरत संविधान समाज की है—ऐसे समाज की जो कहे कि नागरिकता जन्म, जाति, धर्म, भाषा, खान-पान, वेशभूषा या काग़ज़ी संदेह की बंधक नहीं हो सकती। संविधान समाज का अर्थ है—हर नागरिक की गरिमा, हर मतदाता का अधिकार, हर भाषा का सम्मान, हर क्षेत्र का न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व।

कांग्रेस और विपक्ष का मौन इसलिए अपराध है। वे समझ ही नहीं रहे कि लड़ाई केवल महंगाई, टिकट, गठबंधन या मुख्यमंत्री पद की नहीं है। लड़ाई इस बात की है कि 2027 के बाद भारत का राजनीतिक भूगोल कैसा होगा। परिसीमन केवल सीटों का बंटवारा नहीं होता; वह सत्ता की नसों का पुनर्संयोजन होता है। किस प्रदेश की आवाज़ घटेगी, किसकी बढ़ेगी, कौन-सा इलाका निर्णायक होगा, कौन-सा समुदाय स्थायी रूप से हाशिए पर चला जाएगा—यह सब इसी से तय होगा। अगर विपक्ष इस प्रश्न पर चुप है तो वह अपने भविष्य की कब्र खुद खोद रहा है।

और मीडिया? मीडिया तो लोकतंत्र की शुरुआती चेतावनी-व्यवस्था था। लेकिन अगर जीएन देवी जैसे चिंतक जयपुर में आकर नागरिकता और लोकतंत्र पर सबसे गंभीर चेतावनी दें और मीडिया अनुपस्थित रहे तो यह अनुपस्थिति खबर से बड़ी खबर है। यह बताती है कि मीडिया की प्राथमिकता नागरिक नहीं, इवेंट है; संविधान नहीं, तमाशा है; लोकतंत्र नहीं, सत्ता की दैनिक ध्वनि है।

देवी चेताते भर नहीं, समझाते हैं जैसे कोई पिता या गुरु बच्चे को समझाता है। उनका कहना था अब सवाल यह नहीं है कि क्या बिगड़ेगा। सवाल यह है कि हम कितना बचा पाएंगे। हर जिले में नागरिक समितियां बननी चाहिए। नागरिकता, जनगणना, मतदाता-सूची, परिसीमन और जनसांख्यिकी पर सार्वजनिक अध्ययन-मंडल बनने चाहिए। People’s Demographic Survey जैसे नागरिक प्रयास शुरू होने चाहिए। घुमंतू समुदायों, पशुपालकों, प्रवासी मजदूरों, आदिवासियों, शहरी गरीबों और दस्तावेज़हीन नागरिकों की डायरी लिखी जानी चाहिए। कौन कहाँ रहता है, किसके पास कौन-सा कागज है, किसका नाम वोटर लिस्ट में है, कौन बाहर हो सकता है—यह सब लोकतंत्र की नई जनगाथा है।

जीएन देवी ने जो कहा, वह डराने के लिए नहीं था; जगाने के लिए था। अगर हमारी निष्क्रियता से किसी एक आदमी की नागरिकता भी छिनती है तो यह केवल उस आदमी की त्रासदी नहीं होगी। वह पूरे गणराज्य के माथे पर एक काला धब्बा होगा। लोकतंत्र की हत्या अब संसद के दरवाज़े तोड़कर नहीं होगी। वह जनगणना-फॉर्म, मतदाता-सूची, नागरिकता-प्रमाणपत्र और परिसीमन-मानचित्र के बीच चुपचाप होगी। और इतिहास की सबसे भयावह हत्याएं अक्सर शोर से नहीं, चुप्पी से होती हैं। मुझे सुखद हैरानी है कि हमारे यहाँ वास्तविक राजनीतिक समझ वालों में कविता श्रीवास्तव शीर्ष पर हैं और उन्होंने यह आयोजन किया।

कई बार तो मुझे यही लगता है कि इस प्रदेश में वास्तविक राजनीति तो कविता श्रीवास्तव, अरुणा रॉय, निखिल डे, भंवर मेघवंशी जैसे लोग ही कर रहे हैं और कांग्रेस के कथित बड़े नाम और सत्ता के शीर्ष पर रहे लोग तो इस जम्हूरियत के हिसाब से अप्रासंगिक ही हैं। उन्हें अगर इतने बेचैन करने वाले प्रश्नों पर बेचैनी नहीं है और वे सिर्फ़ बयानबाज़ियां करके ही राजनीति करना चाहते हैं तो ख़तरा बड़ा है। इस कार्यक्रम में प्रोफेसर अपूर्वानंद भी मौजूद थे। उन्होंने भी भारतीय लोकतंत्र के सामने मंडरा रहे ख़तरों को सांगोपांग रेखांकित किया।

-त्रिभुवन , फेसबुक वाॅल से साभार

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