शीतल पी सिंह का लेख- भारत-चीन सीमा विवाद कैसे दे रहा नई वास्तविकताओं को आकार ?

‘मोदी सरकार की नीति पिछले कुछ वर्षों में स्पष्ट रूप से यह रही है कि चीन के साथ किसी बड़े सैन्य टकराव से हर कीमत पर बचा जाए। 2020 की गलवान घाटी की हिंसक घटना के बाद भारत ने सीमा पर सैनिकों और हथियारों की तैनाती अवश्य बढ़ाई, सड़कें और आधारभूत ढाँचा भी तेज़ी से विकसित किया, लेकिन सरकार ने ऐसी किसी भी कार्रवाई से परहेज़ किया जिससे व्यापक युद्ध या लगातार सीमा संघर्ष की स्थिति बन सकती थी।’ पढ़ें सुप्रतिष्ठित पत्रकार शीतल पी सिंह का पूरा लेख…
भारत-चीन सीमा पर हाल में सामने आई उच्च-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों ने एक बार फिर उस कठिन वास्तविकता की याद दिलाई है, जिसे अक्सर राजनीतिक शोर-शराबे में भुला दिया जाता है। खबर है कि चीन अरुणाचल प्रदेश से लगी तिब्बत सीमा के एक ऐसे क्षेत्र में नई सड़क का निर्माण कर रहा है, जिसे भारत अपने आधिकारिक मानचित्रों में अपना क्षेत्र मानता है। यह क्षेत्र मैकमोहन रेखा के भारतीय पक्ष में आता है। लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि यह इलाका 1959 से चीन के प्रभावी नियंत्रण में है और आज भारतीय सेना की नियमित गश्त तथा नियंत्रण रेखा (LAC) के पार स्थित माना जाता है। यानी भारत का कानूनी दावा आज भी कायम है, लेकिन वास्तविक नियंत्रण चीन के पास है।
यही भारत-चीन सीमा विवाद की सबसे जटिल सच्चाई है। मैकमोहन रेखा और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) एक ही चीज़ नहीं हैं। मैकमोहन रेखा भारत की ऐतिहासिक और आधिकारिक सीमा का आधार है, जबकि LAC वह सैन्य वास्तविकता है जहाँ तक दोनों देशों की सेनाएँ अपने-अपने नियंत्रण का दावा और अभ्यास करती हैं। इन दोनों के बीच का अंतर ही अक्सर ऐसी खबरों को जन्म देता है कि चीन “भारतीय क्षेत्र” में निर्माण कर रहा है, जबकि चीन का दावा होता है कि वह अपने नियंत्रण वाले इलाके में काम कर रहा है।
भारत-चीन सीमा विवाद का इतिहास भी इस संदर्भ में समझना आवश्यक है। 1962 का युद्ध अचानक नहीं हुआ था। उसके पहले कई वर्षों से सीमा के सीमांकन को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद बढ़ रहे थे। भारत की ‘फ़ॉरवर्ड पॉलिसी’, तिब्बत पर चीन का नियंत्रण, दलाई लामा को भारत में शरण और दोनों देशों की अलग-अलग सीमा संबंधी व्याख्याओं ने तनाव को चरम पर पहुँचा दिया। अक्टूबर 1962 में युद्ध छिड़ा और भारत को सैन्य पराजय का सामना करना पड़ा। युद्धविराम की घोषणा के बाद चीन पूर्वी क्षेत्र में मैकमोहन रेखा के उत्तर लौट गया, लेकिन पश्चिमी क्षेत्र में उसने अक्साई चिन पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। इसके बाद 1967 में सिक्किम सीमा पर नाथू ला और चो ला में दोनों सेनाओं के बीच भारी गोलीबारी और तोपों तक का प्रयोग हुआ, जिसमें दोनों पक्षों को नुकसान हुआ, लेकिन भारत ने अपने मोर्चे मजबूती से संभाले रखे। इसके बाद दशकों तक भारत-चीन सीमा पर बंदूकों से ऐसी बड़ी मुठभेड़ नहीं हुई। 1993 और 1996 सहित कई समझौतों के बाद दोनों देशों ने सीमा पर आग्नेयास्त्रों के प्रयोग से बचने की व्यवस्था विकसित की। हालांकि जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने दिखाया कि बंदूकें भले न चली हों, लेकिन लोहे की रॉड, कीलों वाले डंडों और पत्थरों से हुई हाथापाई भी कितनी भयावह और जानलेवा हो सकती है।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि भारत का दावा समाप्त हो गया है। भारत आज भी पूरे अरुणाचल प्रदेश को अपना अभिन्न अंग मानता है और चीन द्वारा समय-समय पर भारतीय स्थानों के चीनी नामकरण या नए नक्शे जारी करने का लगातार विरोध करता रहा है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि केवल कूटनीतिक विरोध दर्ज कराने और सैन्य वास्तविकता को बदल देने में बहुत अंतर होता है।
मोदी सरकार की नीति पिछले कुछ वर्षों में स्पष्ट रूप से यह रही है कि चीन के साथ किसी बड़े सैन्य टकराव से हर कीमत पर बचा जाए। 2020 की गलवान घाटी की हिंसक घटना के बाद भारत ने सीमा पर सैनिकों और हथियारों की तैनाती अवश्य बढ़ाई, सड़कें और आधारभूत ढाँचा भी तेज़ी से विकसित किया, लेकिन सरकार ने ऐसी किसी भी कार्रवाई से परहेज़ किया जिससे व्यापक युद्ध या लगातार सीमा संघर्ष की स्थिति बन सकती थी। समर्थकों का तर्क है कि दो परमाणु शक्तियों के बीच युद्ध किसी के हित में नहीं होगा और संयम ही परिपक्व नेतृत्व की पहचान है। आलोचकों का कहना है कि अत्यधिक संयम चीन को धीरे-धीरे अपनी स्थिति और मजबूत करने का अवसर देता है। सरकार का दृष्टिकोण यह प्रतीत होता है कि सीमित भूभाग पर सामरिक धैर्य रखते हुए भारत अपनी आर्थिक, सैन्य और अवसंरचनात्मक क्षमता को दीर्घकाल में मजबूत करे, क्योंकि बिना व्यापक राष्ट्रीय शक्ति के केवल सीमावर्ती सैन्य प्रतिक्रिया से स्थायी समाधान संभव नहीं है।
असल प्रश्न यह नहीं है कि युद्ध होना चाहिए या नहीं। युद्ध किसी भी समस्या का पहला समाधान नहीं हो सकता। लेकिन लोकतंत्र में जनता को यह जानने का अधिकार अवश्य है कि वास्तविक स्थिति क्या है। किन इलाकों में भारत पहले की तरह गश्त कर पा रहा है और किन क्षेत्रों में नहीं? क्या कहीं बफर ज़ोन बनने से भारतीय गश्त प्रभावित हुई है? जिन इलाकों पर भारत अपना दावा करता है, वहाँ उस दावे को मजबूत करने के लिए भविष्य की रणनीति क्या है? इन प्रश्नों पर पारदर्शिता लोकतंत्र की आवश्यकता है, कमजोरी नहीं।
सीमा विवाद केवल सैनिकों का विषय नहीं होता; यह राष्ट्रीय नीति, कूटनीति, आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता और दीर्घकालिक रणनीतिक धैर्य की भी परीक्षा होता है। चीन पिछले कई वर्षों से सीमा पर सड़कें, पुल, गाँव, हवाई पट्टियाँ और अन्य सैन्य ढाँचे बनाकर अपनी स्थिति लगातार मजबूत करता रहा है। भारत ने भी अपनी ओर बुनियादी ढाँचे का विस्तार तेज़ किया है, लेकिन जहाँ चीन पहले से प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर चुका है, वहाँ स्थिति बदलना केवल राजनीतिक भाषणों से संभव नहीं है।
राष्ट्रहित की सबसे बड़ी कसौटी यह नहीं कि कौन सबसे ऊँची आवाज़ में राष्ट्रवाद का नारा लगाता है। असली कसौटी यह है कि देश की सीमाएँ कितनी सुरक्षित हैं, जनता को कितनी ईमानदारी से जानकारी दी जाती है और सरकार अपने दावों को भविष्य में वास्तविकता में बदलने के लिए कितनी स्पष्ट एवं दीर्घकालिक रणनीति रखती है। चीन की हर नई सड़क केवल कंक्रीट की एक पट्टी नहीं होती; वह हमें यह याद दिलाती है कि सीमा विवाद समय के साथ स्वयं समाप्त नहीं होते। उन्हें या तो कूटनीति, शक्ति और धैर्य के संतुलन से सुलझाया जाता है, या फिर वे धीरे-धीरे नई वास्तविकताओं का रूप ले लेते हैं।
–शीतल पी सिंह , फेसबुक वॉल से साभार



