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रविकांत का लेख- शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएं

‘दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया।’ पढ़ें रविकांत का पूरा लेख…

डॉ अम्बेडकर के विचारों और सपनों को साकार करने वाला साहित्य सबसे पहले 1960 के दशक में मराठी में शुरू हुआ। इसके बाद तेलुगु, हिन्दी, गुजराती, तमिल और कन्नड में दलित साहित्य लेखन का आंदोलन खड़ा हुआ। 1970 के दशक में हिन्दी दलित साहित्यकारों की पहली पीढ़ी सक्रिय हुई। इसमें सबसे उल्लेखनीय नाम ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून 1950-17 नवंबर 2013) का है। सदियों से पढ़ने-लिखने से वंचित रहे दलित समाज को पहली बार अभिव्यक्ति का अवसर मिला। लेकिन उनके लिए यह कितना आसान था? हिन्दू समाज के सबसे निचले पायदान पर स्थित जाति में जन्मे ओमप्रकाश वाल्मीकि के लिए लिखना किसी यातना से कम नहीं था। उन्होंने अपनी किताब ‘दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष और यथार्थ’ में लिखा है ,”मुद्रित शब्द की आग में मैंने अपने आपको हमेशा झुलसते पाया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर , गांव बरला के बेसिक प्राइमरी स्कूल में मेरे दाखिले के वक्त गिड़गिड़ाते पिता का चेहरा आज भी मेरी आंखों में किरकिराता है। और यातना भरे सफर और संघर्ष में यही मेरी ताकत भी बनता है। यह वह दौर था, जब भारत नया-नया स्वतंत्र हुआ था, लेकिन स्कूल- कॉलेजों में किसी दलित के लिए प्रवेश पाना आसमान से तारे तोड़ लेने के समान था, किसी दलित के लिए स्कूल के दरवाजे बंद थे। नई-नई आजादी मिली थी, नया संविधान बना था। जिसमें सबको समान अधिकार देने की बात कही गई थी। लेकिन हिंदुत्व की सनातनी मान्यताओं के सामने संविधान की धाराएँ बौनी थीं। पिताजी के उस जज्बे को समझने की उस वक्त मेरी उम्र नहीं थी, लेकिन एक बार जब स्कूल की टाट-पट्टी के सबसे किनारे पर, जो मेरे बैठने से पहले ही खत्म हो जाती थी, बैठकर अक्षर पहचानने का जो सिलसिला शुरू हुआ, तो वह चिंगारी बनाकर अंधेरे में जुगनू की तरह चमकने लगा था। और वही चमक मेरे भीतर आग में तब्दील हो गई थी। जिसकी तपिश ने मेरे वजूद को ही बदल दिया तो उस वक्त पिताजी का वह जज्बा ठीक से समझ में आने लगा था।”

ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदू समाज की बेड़ियों को ही नहीं तोड़ा बल्कि हिंदी साहित्य को भी शुचिता और कुलीनता से मुक्त कराया। जयप्रकाश कर्दम के शब्दों में, “ओमप्रकाश वाल्मीकि एक ऐसा नाम है, जिसने अपनी रचनाओं के माध्यम से कुलीनता और आभिजात्य संस्कृति के मूल्यों में रचे-बसे हिंदी साहित्य की सदियों पुरानी जड़ता को तोड़ा और समाज की भांति साहित्य की चौखट से बाहर उपेक्षित पड़े दलितों को साहित्य के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि का लेखन साहित्य विमर्श में एक अनिवार्य हस्तक्षेप है।”
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने साहित्य को नए ढंग से परिभाषित किया। उनके अनुसार, साहित्य मनुष्यता की अभिव्यक्ति है। पराधीनता से मुक्ति का आख्यान है। शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है। समता और स्वतंत्रता की चेतना है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने पूर्ववर्ती हिन्दी साहित्य को कठघरे में खड़ा किया। उनके अनुसार अधिकांश हिन्दी साहित्य ब्राह्मणवादी परंपराओं और मूल्यों से पोषित है। इसमें दलितों-वंचितों की पराधीनता और पीड़ा की अभिव्यक्ति नहीं है। दलित समाज की पराधीनता और उसके मुक्ति के सवालों को केंद्र में रखकर उन्होंने कविता, कहानी, आत्मकथा और आलोचना जैसी महत्वपूर्ण विधाओं में रचनाएं लिखीं। उनका रचना संसार बहुत व्यापक है। उनके चार कहानी संग्रह – सलाम (2000), घुसपैठिए (2003), छतरी, अम्मा एंड अदर स्टोरी। आत्मकथा- जूठन (1997) दूसरा भाग (2015) आलोचना- दलित साहित्य का सौंदर्य शास्त्र (2001), मुख्य धारा और दलित साहित्य, दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ (2013) विचारपरक लेखन – सफाई देवता (2008) नाटक- दो चेहरे, उसे वीर चक्र मिला था, अनुवाद- मैं हिंदू क्यों नहीं? (कांचा इलैया की अंग्रेजी किताब का हिंदी अनुवाद), सायरन का शहर (अरुण काले के मराठी कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद)।
बृहत साहित्य के लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि बुनियादी तौर पर कवि हैं। उनके लेखन की शुरुआत कविता से हुई और कविता उनके जीवन-संघर्ष में अनवरत संबल बनी रही। अपनी किताब ‘दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ’ में उन्होंने लिखा है कि, “प्रारंभिक दौर में ही मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम कविता ही रही है। एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहने के साथ-साथ कविताओं की ओर मेरा झुकाव लगातार बढ़ता गया। बल्कि हताशा और निराशा के समय कविता मुझे संबल देती रही है।” कविता जीवन नहीं बल्कि उनकी पूरी दुनिया है। उसका सच दिल से क्या, अस्थि-मज्जा से निकला हुआ यथार्थ है! उनका पहला कविता संग्रह ‘सदियों का संताप’ 1989 में फिलहाल प्रकाशन, देहरादून से प्रकाशित हुआ। दूसरा काव्य संग्रह ‘बस्स बहुत हो चुका’ 1997 में वाणी प्रकाशन से आया। इसके बाद 2009 में उनका तीसरा काव्य संग्रह ‘अब और नहीं’ राधाकृष्ण प्रकाशन से छपा। अंतिम और चौथा काव्य संग्रह ‘शब्द झूठ नहीं बोलते’ 2012 में अनामिका प्रकाशन से प्रकाशित हुआ।

उनकी कविताओं में सामन्तों- ब्राह्मणवादियों का शोषण तंत्र तथा दलितों की यातना, संघर्ष और आक्रोश की अभिव्यक्ति हुई है। दलित जीवन के भोगे हुए यथार्थ को प्रस्तुत करने वाली उनकी कविताएं काव्यरसिकों के गले नहीं उतरतीं। उनकी कविताओं में ना शास्त्रीय संस्कार है और ना सात स्वरों का साज। उनकी कविताओं में वेदना की अनुभूति है। मैनेजर पांडेय के शब्दों में ‘वेदना की कोई लय नहीं होती।’ अभिजात साहित्य की तरह उनकी कविताएं मनोरंजन के लिए नहीं हैं। आधुनिकतावादियों की तरह विकारों के उत्सर्जन की संवाहक भी उनकी कविताएं नहीं हैं। उनके लिए कविता संवेदना और सरोकारों का संधान है। सच कहने का साहस और संघर्ष की गवाही है, कविता। ‘शब्द झूठ नहीं बोलते’ संग्रह की भूमिका में ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं, “मेरे लिए कविता आनंद या रसास्वादन की चीज नहीं है। बल्कि कविता के माध्यम से मानवीय पक्षों को उजागर करते हुए मनुष्यता के सरोकारों और मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना है।” अन्यत्र भी उन्होंने लिखा है कि, “मेरे लिए कविता कला से ज्यादा जीवन की अदम्य लालसा, गतिशीलता की संवाहक है, जो हमारी पीड़ा, हमारे सुख-दुख की अभिव्यक्ति है, जिसमें हम अपने वर्तमान का प्रतिबिंब शिद्दत के साथ देख सकें, जो जीवन की विद्रूपताओं से जूझने का हौसला दे…सच्ची और सही कविता है, जो सच को सच और झूठ को झूठ कहने का हौसला रखती है।”
भारतीय समाज में व्यक्ति की बुनियादी पहचान जाति है। जाति से द्विजों को जन्मना श्रेष्ठता हासिल है और शूद्रों-दलितों को जन्मना हीनता। जाति के कारण ही दलितों को रोज अपमान, अन्याय और अत्याचार का सामना करना पड़ता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जाति कहीं उनका पीछा नहीं छोड़ती। दलितों के लिए जाति एक अभिशाप है। जीते जी नरक! जाति की नारकीय यातनाओं को दलित कवियों ने रचा। उनके शब्दों में एक वेदना भरी चीख है। ‘ठाकुर का कुआं’ कविता में बेहद सरल शब्दों में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने जातिवादी परतों को उघाड़कर शोषणकारी तंत्र और वंचितों की बेबसी को बहुत मार्मिक ढंग से पेश किया है-
“चूल्हा मिट्टी का/ मिट्टी तालाब की/ तालाब ठाकुर का।
भूख रोटी की/ रोटी बाजरे की/ बाजरा खेत का/ खेत ठाकुर का।
बैल ठाकुर का/ हल ठाकुर का/ हल की मूठ पर हथेली अपनी/ फसल ठाकुर की।
कुआं ठाकुर का/ पानी ठाकुर का/ खेत खलिहान ठाकुर के/ गली मुहल्ले ठाकुर के फिर अपना क्या?
गांव?
शहर?
देश?”
56 शब्दों की यह कविता 56 इंची सत्ता के दौर में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली कविता बन गई है। साहित्यिक महफिलों से लेकर संसद भवन तक इस कविता की गूंज है। एक सांसद द्वारा उद्धृत किए जाने के बाद सामन्तों द्वारा हुई प्रतिक्रिया इस बात को दर्शाती है कि आज भी ब्राह्मणवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं।
दलित समाज पीढ़ी दर पीढ़ी जाति दंश से पीड़ित है। सदियों से मूक बधिर रहा, यह समाज आज अपनी पीड़ा और वेदना को व्यक्त कर रहा है। वह हंसते हुए प्रेम के गीत नहीं लिख सकता। उसका एक-एक शब्द ज्वालामुखी है, आह है, कराह है, धिक्कार है। बकौल ओमप्रकाश वाल्मीकि, “किसी एक जाति में जन्म लेने के कारण, जो कि उस व्यक्ति विशेष के हाथ में नहीं था, के लिए उसे इतनी बड़ी सजा कि उससे उसके मनुष्य होने तक के तमाम अधिकार छीन लिए जाएं। ऐसे में जब उस अपमानित व्यक्ति के हाथ में कलम आएगी, तब वह कैसी कविता लिखेगा? क्या उसे प्रेम कविता लिखनी चाहिए या विद्रोही? यह सवाल एक दलित कवि के भीतर गर्म-गर्म लावा दहकाता रहा है।” अगर यह गुलामी तुम्हारे ऊपर थोप दी जाए? ‘तब तुम क्या करोगे’ कविता में वाल्मीकि जी पूछते हैं, “यदि तुम्हें धकेलकर गांव से बाहर कर दिया जाए/ पानी तक न लेने दिया जाए कुएं से/ दुत्कारा फटकारा जाए/ चिलचिलाती दोपहर में कहा जाए/ तोड़ने को पत्थर/ काम के बदले दिया जाए/ खाने को जूठन/ तब तुम क्या करोगे/ यदि तुम्हें मरे जानवर को/ खींचकर ले जाने के लिए कहा जाए/ और कहा जाए ढोने को पूरे परिवार का मैला /पहनने को दी जाए उतरन/ तब तुम क्या करोगे?”
वेदना से उपजे इन सवालों के बावजूद, कवि समर्पण के बदले सौहार्द और अपनापन चाहता है। वह बदलाव चाहता है, बदला नहीं। ‘भय’ कविता में एक उम्मीद है कि काश!-
“तुम्हारे हाथ बढ़े होते/ मेरी ओर/ प्रेम गंध का स्पर्श लेकर/ सच कहता हूं/ मैं सीने से नहीं/ लिपट जाता तुम्हारे कदमों से/ बिछ जाता/ धूल बनकर जमीन पर।
बिछा तो अब भी हूँ-
प्रेम की आसक्ति पर नहीं/ तुम्हारे खूनी पंजों से डरकर।”
इसीलिए दलित कविता में जाति के प्रति गहरी वितृष्णा है।-
“स्वीकार्य नहीं मुझे जाना / मृत्यु के बाद/ तुम्हारे स्वर्ग में/ वहां भी तुम/ पहचानोगे मुझे/ मेरी जाति से ही।”
‘शब्द झूठ नहीं बोलते’ की भूमिका में ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं कि, “सभ्यता, संस्कृति के घिनौने षड्यंत्र लुभावने शब्दों से भरमाने का काम करते हैं। जहां नैतिकता, अनैतिकता और जीवन मूल्यों के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है।”10 पुनः वे हिन्दू सहिष्णुता के सच को तंज भरे लहजे में बेनकाब करते हैं-
” हां, सचमुच तुम सहिष्णु हो/ जब दंगों में मारे जाते हैं/ अब्दुल और कासिम/ कल्लू और बिरजू/ तब तुम सत्यनारायण की कथा सुनते हुए/ भूल जाते हो अखबार पढ़ना।
पूजते हो गांधी की हत्यारे को
तोड़ते हो इबादतगाह झुंड बनाकर।”
महात्मा गांधी के हत्यारे को पूजने वाले और बाबरी मस्जिद तोड़ने वाले हिंदुत्ववादी आज सत्तानशीं हैं। हिंसा की यह संस्कृति आज मोब लिंचिंग जैसे भयावह कुकृत्य में तब्दील हो चुकी है।

मानीखेज है कि दलित साहित्यकारों में, खासकर ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदुत्व और उसकी संस्कृति की तीखी आलोचना की है। हिंदुत्ववादियों ने भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कृति को गड्डमड्ड कर दिया। उनके दावे पर ओमप्रकाश वाल्मीकि व्यंग करते हैं- “कैद कर रखा है तुमने तहखानों में/ संस्कृति को/ मैं पूछता हूँ-/ संस्कृति क्या तुम्हारी रखैल है?”
‘शास्त्रीय भाषा का शब्द वसुधैव कुटुम्बकम कितना खोखला’ है? वाल्मीकि जी पूछते हैं, ‘उपेक्षा, उत्पीड़न और अछूत जाति किस सभ्यता और संस्कृति की देन है?’

90 के दशक में पिछड़ों के आरक्षण वाली मण्डल राजनीति के बरक्स कमण्डल की राजनीति तेज हुई। साम्प्रदायिक राजनीति दंगों में बदल गई। विस्फोटक की जगह मूर्तियों ने ले ली। धार्मिक जुलूस भय पैदा करने लगे। ‘आईना’ कविता में वाल्मीकि जी ने भयावहता को इन शब्दों में दर्ज किया है-
“खड़ा हूं चौराहे पर/ जहां से गुजरा है अभी-अभी/ एक जुलूस/ जिसमें शामिल थे/ बिन चेहरों के लोग/ जिनके हाथों में चमक रही थीं/ तलवारें, त्रिशूल और तमंचे
…..
इस खूंखार समय में/ आरडीएक्स की जगह/ हो सकती हैं मूर्तियां/ जो आस्था के प्रश्न पर/ कर दी जाएंगी फिट/ अवैध जगहों पर/ खून खराबे के लिए किसी तर्क की/ आवश्यकता नहीं होती है।”
ओमप्रकाश वाल्मीकि हिन्दू संस्कृति के मुखौटे में छिपे हिंसक, अश्लील और सत्तालोलुप चेहरे को बेनकाब करते हैं। यह राजनीति और संस्कृति अब और भी भयानक और खूनी हो चुकी है। आज दलित साहित्य विमर्श और अम्बेडकरवाद क्रूर और आतताई हिंदुत्ववादी सत्ता और संस्कृति का डटकर मुकाबला कर रहा है।

दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया। दलित जीवन के बदरंग प्रसंगों को रचकर ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदू धर्म के पाखंड को बेपर्दा किया। उनकी कहानियों ने पौराणिक कथाओं की अश्लीलता को नंगा कर दिया। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने उस सामाजिक व्यवस्था का पर्दाफाश किया, जिसमें सदियों से यातनाओं का शिकार दलित पशुओं से भी बदतर जीवन जी रहा था। दलितों के शोषण और दमन पर पलने वाला रक्तपिपासु ब्राह्मणवाद आज ओमप्रकाश वाल्मीकि के साहित्यिक कटघरे में है। उससे हजारों सालों की यातनाओं का हिसाब मांगा जा रहा है।

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