चंदन कुमार की कविता- धरती की जीवटता हमारे हिस्से आई
सदियों से संघर्ष करने से हम नहीं डरे
हम नहीं डरे किसी पहाड़, खदान से पार निकलने में
हम आजीवन लड़ते रहे
और धरती की जीवटता हमारे हिस्से आई
जिनका नाता संघर्षों से कभी नहीं रहा
वे भाषा में गपोड़ी कहे जाते हैं
और वे बताते हैं
श्रम को दुनिया की सबसे कमतर चीज
अमानवीय क्रियाओं से सरोकार रखने वाले
गढ़ते हैं दुनिया के लिए मर्यादा के शब्द
जहां उनकी पहुंच तनिक भी नहीं होती
वे नैतिक होने का खेल खेलते रहते हैं
और बताते हैं अपने आपको
दुनिया का सर्वश्रेष्ठ जीव
जिसने फसलें उगाईं, महल बनाए
वे तरसते रहे दो जून की रोटी के लिए
जो इस धरती को सुंदर बनाने की चाह
लिए चले गए
उनकी पीढ़ियां भूखमरी – बेरोजगारी की आग में झुलस रही हैं
तुमने अपनी भाषा बनाई
और उस भाषा में दूसरों के लिए
सबसे निकृष्टम शब्द गढ़े
जिससे तुम्हारे हिंसक होने का परिचय अनायास हो जाता है
अब तो पूछा जायेगा
भाषा में किसने कहा ‘चोरी चमारी’
भाषिक आवाजाही बताते हैं
बड़ी चालाकी से चमारी चकारी में
तब्दील कर दिया गया है
लगता है; चकारी कहने से सब सही हो जायेगा
भाषा पर डकैती डालने वाले
चोरी और चकारी में साम्य बतलाने की कोशिश में
श्रेष्ठता बोध को नहीं भूलते
अब उनसे कौन कहने जाय
‘ चमारी ‘ एक समुदाय के लिए गाली है
चकारी का चोरी से साम्य
एक वृहत्तर समुदाय को
कमतर दिखाना है
आज जब दुनिया करवट बदल रही है
पूंजी के नए औज़ार
और अधिक खूंखार होते जा रहे हैं
उसके बाद भी हम इस दुनिया को बचाने के लिए
जल – जंगल – जमीन की लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं
यह जानते हुए कि यह सब करने के बाद भी
आने वाली पीढ़ियों के लिए शायद ही मुकम्मल जहां मिले।
हमें इंतिज़ार है उस दिन का
जहां दो प्रेमी युगल किसी जातीय हिंसा के शिकार न होने पाएं
कोई भूख से तड़प न जाए
बेरोजगारी की आग में कोई दम न तोड़े
कोई किसी की याद में
सदियों तक इंतिज़ार न करे
इस तरह
जबरिया श्रम की लूट से मुक्ति मिल जाय
निजी संपत्ति का का विनाश हो जाय।
–चन्दन कुमार ( सहायक आचार्य – हिंदी )
गांधी शताब्दी स्मारक पी. जी. कॉलेज कोयलसा, आजमगढ़।



