आसिफ़ अली मंसूरी की कविता
मैं देख रहा हूँ—
सभ्यता की फटी हुई जेब से
गिरते जा रहे हैं मनुष्य के चीथड़े।
धूल से सनी सड़कों पर
एक बच्चा पड़ा है—
उसकी आँखों में अब भी
आधी बची हुई रोशनी काँप रही है,
जैसे किसी जले हुए शहर के ऊपर
अंतिम तारा।
फ़िलिस्तीन की राख
अब सिर्फ़ नक्शे पर नहीं,
मेरे समय की नसों में बह रही है।
मैं देखता हूँ—
सत्ता के लौह-जूतों के नीचे
चीख़ों का गूदा फैल गया है,
और संसदों की दीवारों पर
लोकतंत्र का चेहरा
पोस्टर की तरह फट रहा है।
एक गरीब
अपने ही पेट की अँधेरी सुरंग में
रोटी खोजता हुआ
धीरे-धीरे चीथड़ा हो गया है।
बाज़ार की पीली रोशनी में
पूँजी की मुस्कान
कितनी भयानक लगती है—
जैसे कसाईखाने में
लटकता हुआ उत्सव।
और मैं देखता हूँ
कि जाति, धर्म, संप्रदाय—
ये सब
मनुष्य की आत्मा पर उग आए
सड़े हुए कपड़ों की तरह हैं,
जिनसे बदबू आती रहती है
सदियों तक।
हर विस्फोट के बाद
आकाश में उड़ते हैं
मांस नहीं,
भविष्य के चीथड़े।
मगर इस घने अँधेरे में भी
कहीं भीतर
एक अदृश्य सिलाई चल रही है—
कोई है
जो इतिहास के फटे हुए कुरते को
धीरे-धीरे रफ़ू कर रहा है।
शायद वही
आने वाले मनुष्य का हाथ है।
— आसिफ़ अली मंसूरी



