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पीयूष बबेले का लेख- उपवास छोड़ राहुल गांधी के आंदोलन से जुड़ें सोनम वांगचुक

लेखक - पीयूष बबेले

‘ऐसे में अगर वांगचुक वाकई छात्रों का हित ही चाहते हैं तो उन्‍हें राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ आंदोलन में शामिल होना चाहिए या इसका समर्थन करना चाहिए। आखिर जब वे कांग्रेस से समर्थन मांग सकते हैं, तो बदले में समर्थन देने में कोई हर्ज नहीं है।’ पढ़ें लेखक पीयूष बबेले का पूरा लेख…

मोदी सरकार से जैसी उम्‍मीद थी, वैसा ही हुआ। शनिवार सुबह नई दिल्‍ली के जंतर-मंतर के धरनास्‍थल से पुलिस सोनम वांगचुक को जबरन उठा ले गई। उनके 20 दिन के उपवास के दौरान परंपरा के मुताबिक प्रधानमंत्री या उनके किसी मंत्री ने उपवास का न तो संज्ञान लिया और न ही उनसे उपवास तोड़ने की अपील की। परंपरा शब्‍द का इस्‍तेमाल इसलिये किया गया है क्‍योंकि आजाद भारत में पंडित नेहरू से लेकर डॉ मनमोहन सिंह तक सभी प्रधानमंत्रियों ने सूचना मिलने पर उपवासों का हमेशा संज्ञान लिया और यथाशक्ति उपवास खुलवाने की कोशिश की।

जाहिर है अस्‍पताल में सोनम वांगचुक को प्राकृतिक या कृत्रिम तरीके से भोजन देने की कोशिश की जाएगी, जो एक तरह से उनके उपवास को तोड़ देगी। ऐसे में वांगचुक और उनके सहयोगियों को एक बार फिर से सोचना चाहिए कि उनका लक्ष्‍य क्‍या है। प्रथमदृष्‍टया तो ऐसा लगता है कि वे शिक्षा मंत्री का इस्‍तीफा चाहते हैं और पेपर लीक रुकवाना चाहते हैं। इस साध्‍य को प्राप्‍त करने के लिये उपवास उनका साधन मात्र था।

अगर वे अब भी अपने साध्‍य पर कायम हैं तो उन्‍हें व्‍यावहारिक दृष्टिकोण से काम लेना चाहिए। उन्‍हें उपवास छोड़कर, कुछ दिन स्‍वास्‍थ्‍य लाभ करना चाहिए और फिर छात्रों की लड़ाई के लिये पहले से चल रहे आंदोलन को समर्थन देना चाहिए। वांगचुक जी को पता ही होगा कि राहुल गांधी पहले से ही पूरे देश में नीट और अन्‍य परीक्षाओं में भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं। उनके आंदोलन में लाखों युवा जुड़ रहे हैं। इनमें वे पीड़ित परिवार भी शामिल हैं, जिनके बच्‍चों ने भ्रष्‍ट शिक्षा तंत्र से त्रस्‍त होकर आत्‍महत्‍या कर ली।

वांगचुक के लिये ऐसा करना कठिन नहीं होना चाहिए। उन्‍होंने जंतर-मंतर पर यह कहा था कि कांग्रेस और विपक्ष को उनके धरना स्‍थल पर आना चाहिए और ‘छोटा दिल नहीं दिखाना चाहिए।’ उसके बाद विपक्षी दलों के नेता वहां गए। कांग्रेस की ओर से मीडिया विभाग के अध्‍यक्ष और राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा उनसे मिले। कांग्रेस के प्रमुख वरिष्‍ठ नेताओं ने उन्‍हें सहयोग दिया। उन्‍हें जबरन धरनास्‍थल से हटाने की कार्रवाई की राहुल गांधी ने निंदा की और वांगचुक को अपना समर्थन दिया।

ऐसे में अगर वांगचुक वाकई छात्रों का हित ही चाहते हैं तो उन्‍हें राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ आंदोलन में शामिल होना चाहिए या इसका समर्थन करना चाहिए। आखिर जब वे कांग्रेस से समर्थन मांग सकते हैं, तो बदले में समर्थन देने में कोई हर्ज नहीं है। ऐसा करने से वे देश भर के छात्रों से सीधे संपर्क कर सकेंगे और अपनी मांग के लिये बेहतर जानाधार जुटा पाएंगे।

वांगचुक अनुभवी व्‍यक्ति हैं। उन्‍हें वर्तमान और अतीत का ज्ञान है। वे खुद ही देख चुके हैं कि कई मुद्दों पर मोदी सरकार का साथ देने के बावजूद अंतत: जब उन्‍होंने लद्दाख को राज्‍य बनाने की मांग की तो उन्‍हें जेल में डाल दिया गया। अब वे उपवास पर बैठे तो भाजपा ने पहले तो उन्‍हें मरने के लिये छोड़ दिया और जब पार्टी की भद्द पिटने लगी तो अस्‍पताल में ठूंस दिया।

इसके उलट जब 1984 में उनके पिता लद्दाखवासियों के लिये अनुसूचित जनजाति की मांग करने उपवास पर बैठे थे तो तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्‍वयं अपने हाथों से जूस पिलाकर उनका अनशन खुलवाया था। उसके बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद 1989 में उनकी मांग पर अमल हो गया था। राहुल गांधी, उन्‍हीं इंदिरा गांधी के पोते हैं। इसलिये वांगचुक को उन पर विश्‍वास करने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए। बाकी, फैसला तो वांगचुक को स्‍वयं ही करना है।

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