क्यों उठता है बार-बार एससी कोटे के भीतर कोटा का सवाल?
‘2008 में धोबी और पासी इस समूह में शामिल कर दिए गए. 2009 में रविदास जाति भी आ गई. 2018 में दुसाधों को भी महादलित का दर्जा मिल गया. यानी जिस श्रेणी को सबसे वंचित दलितों के लिए बनाया गया था, कुछ वर्षों में बिहार की सभी दलित जातियां उसमें आ गईं. 2007 का प्रयोग, व्यावहारिक रूप से, खत्म हो गया.’ पढ़ें पुष्य मित्र की पूरी रिपोर्ट…
साल 2024 की बात है. अगस्त महीने में सुप्रीम कोर्ट ने एससी आरक्षण में उपवर्गीकरण का सुझाव दिया था. हर साल की तरह उस साल भी 15 अगस्त बिहार के तत्कालीन सीएम नीतीश कुमार राज्य के एक महादलित टोले लखन बिगहा में झंडा फहराने पहुंचे थे. क्योंकि उन्होंने ही बिहार में सबसे पहले पहचाना था कि राज्य में दलित जातियों में भी कुछ जातियां ज्यादा वंचित हैं, उनके लिए अलग कार्यक्रम की जरूरत है. उधर जीतन राम मांझी गरमाये हुए थे, कहते थे, “डी-4 के लोग तो 76 साल से गुलछर्रे उड़ा रहे हैं और हमारे लोग थूक से सतुआ सान कर खा रहे हैं. हमारी मांग यही है कि हमको अलग कर दीजिये.”
लखन बिगहा में झंडात्तोलन के बाद नीतीश कुमार के हाथों 164 महादलितों को आवास योजना से लेकर आयुष्मान भारत तक सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने का प्रमाणपत्र दिया. मैं भी वहां दलित-महादलित के मसले को समझने गया था. वहां पता चला कि इन 164 लोगों में एक भी मुसहर-भुइयां नहीं था. लगभग सभी लाभार्थी रविदास जाति के थे, जिन्हें जीतनराम मांझी डी-4 का हिस्सा बताते हैं.
टोले के दूसरे सिरे पर 27 घरों वाली मांझी बस्ती थी. जामुन मांझी तब 20-22 साल के थे. उन्होंने अपना टूटा हुआ घर दिखाते हुए कहा था, “मांझी-मुसहर को कौन पूछता है?” छत इतनी जर्जर थी कि डर लगा रहता था कि कब पत्थर गिर पड़े. वहां एक भी इंदिरा आवास नहीं बना था. लगा कि जीतनराम मांझी का गुस्सा जायज है.
दो साल बाद बिहार में सवाल फिर वहीं खड़ा है. जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष कुमार सुमन फिर से कह रहे हैं कि अनुसूचित जातियों के भीतर भी जो समुदाय सबसे पीछे रह गए हैं, उनके लिए आरक्षण में अलग हिस्सेदारी होनी चाहिए. दूसरी तरफ चिराग पासवान इसका विरोध कर रहे हैं. सवाल यह है कि क्या आरक्षण का लाभ सभी दलित जातियों तक समान रूप से पहुंचा है?
जैसा कि सबको मालूम है, 2007 में नीतीश कुमार सरकार ने दलितों के भीतर एक अलग श्रेणी बनाई थी- महादलित. उस समय बिहार की 22 अनुसूचित जातियों में से चार अपेक्षाकृत मजबूत मानी जाने वाली जातियों-चमार/रविदास, दुसाध, धोबी और पासी (जिन्हें मांझी अब डी-4, यानी डेवलप्ड फोर कहते हैं.) को छोड़कर बाकी 18 जातियों को महादलित समूह में रखा गया. महादलित आयोग ने एक अध्ययन कराया और उसके आधार पर कहा गया कि दलितों के भीतर चमार, दुसाध, धोबी और पासी जैसी जातियों में शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन मुसहर, भुइयां, मेहतर, डोम और नट जैसी जातियां अब भी सरकारी योजनाओं का ठीक से लाभ नहीं उठा पा रही हैं. इसलिए इन जातियों को अलग करके विशेष योजनाएं चलाने की जरूरत है.
सरकार ने ऐसा किया भी…
महादलित विकास मिशन बना. विकास मित्र नियुक्त हुए. टोला सेवक रखे गए. भूमिहीन परिवारों के लिए जमीन और आवास की योजनाएं बनीं. कौशल विकास के लिए दशरथ मांझी कौशल विकास योजना चली. हर महादलित बस्ती में रेडियो बांटने तक की योजना बनी, ताकि सरकारी योजनाओं और अधिकारों की जानकारी उन तक पहुंच सके.
लेकिन महादलित की कहानी ज्यादा लंबी नहीं चली.
2008 में धोबी और पासी इस समूह में शामिल कर दिए गए. 2009 में रविदास जाति भी आ गई. 2018 में दुसाधों को भी महादलित का दर्जा मिल गया. यानी जिस श्रेणी को सबसे वंचित दलितों के लिए बनाया गया था, कुछ वर्षों में बिहार की सभी दलित जातियां उसमें आ गईं. 2007 का प्रयोग, व्यावहारिक रूप से, खत्म हो गया.
बिहार सरकार की जाति आधारित गणना के आंकड़ों में भी दलित समाज के भीतर बड़ा अंतर सामने आया है. रिपोर्ट के मुताबिक चार प्रमुख दलित जातियों-दुसाध, चमार, पासी हिस्से में 2,42,246 नौकरियां थीं, जबकि बाकी 18 जातियों के पास सिर्फ 48,758. हालांकि जीतनराम मांझी के डी-4 आबादी में भी अधिक हैं, 63 फीसदी हैं, शेष जातियां सिर्फ 37 फीसदी, फिर भी यह फर्क वाजिब नहीं है. और यही विवाद का मुद्दा भी है.
सच यही है कि बिहार की राजनीति में भी पासवान, रविदास, धोबी, पासी और मुशहर को छोड़कर किसी दलित जाति की पूछ नहीं है. पासवान, रविदास और मुशहर आबादी के कारण और धोबी-पासी इसलिए कि वे अपेक्षाकृत संपन्न हैं. मगर डोम, बांसफोड़, मेहतर, चौपाल, बांतर, नट, भोगता वगैरह जातियों का न के बराबर प्रतिनिधित्व है.
राज्य में नौकरियों के मामले में धोबी जाति के लोग इस श्रेणी में सबसे आगे हैं, उनकी आबादी का 3.14 फीसदी हिस्सा सरकारी नौकरी वाला है. उसके बाद पासी का 2 फीसदी, पासवान का 1.44 फीसदी और रविदास का 1.20 फीसदी. इस तुलना में मुसहर की कुल आबादी का सिर्फ 0.26 फीसदी ही सरकारी नौकरी में है. इसके बाद ज्यादातर जातियों के आंकड़े ऐसे ही हैं.



