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‘यह मुकम्‍मल इंकलाब नहीं, सत्‍याग्रह की शुरुआत है’- पीयूष बबेले

‘कथित लोकतंत्र में बच्‍चों को संवाद नहीं, सत्‍ता का प्रहार मिला।एक-एक बच्‍चे को कई-कई सिपाहियों ने मारा। ऐसा लगता था कि कौरवों के चक्रव्‍यूह में नन्‍हा अभिमन्‍यु फंस गया हो। लेकिन कमाल है 21वीं सदी का जेन-जी गांधीवाद। वे चुपचाप खड़े होकर लाठियां खाते रहे। पुलिस को और मारने के लिये ललकारते रहे।’ पढ़े सुपरिचित लेखक पीयूष बबेले का पूरा आलेख…

पीयूष बबेले
पीयूष बबेले

लोग पूछते थे- सरकारें उनकी हैं। एजेंसियां उनकी हैं। आयोग उनके हैं। पुलिस उनकी है। अदालत उनकी है। सब उनका है। हम क्‍या करें। जो उठेगा उसे कुचल दिया जाएगा। जेल में डाल दिया जाएगा। बुल्‍डोजर से रौंद दिया जाएगा। एजेंसियों की कुंडली में लपेट कर घोंट दिया जाएगा। केसों में फंसा दिया जाएगा और अदालतों से भगा दिया जाएगा। कुछ नहीं हो सकता, कुछ भी नहीं।

लेकिन इन बच्‍चों ने इतना नहीं सोचा। पीठ पर बैग लटकाए, हाथों में मोबाइल और पानी की बोतल लिये, लड़के-लड़कियां चले आए। दिल्‍ली के उस जंतर-मंतर पर जहां से 5 मिनट की पैदल दूरी पर देश की संसद है। उन्‍होंने नहीं सोचा कि पुलिस मारेगी। उन्‍होंने नहीं सोचा कि आंसू गैस के गोले चलेंगे। उन्‍होंने नहीं सोचा कि सादी वर्दी में गुंडे मिलेंगे। उन्‍होंने नहीं सोचा कि उन पर हमला करने के लिये ट्रकों में पत्‍थर लाए जाएंगे। उन्‍होंने नहीं सोचा कि गोदी मीडिया उन्‍हें पाकिस्‍तानी, आतंकवादी, नक्‍सलवादी और देशद्रोही घोषित कर देगा।

वे तो अपनी सरकार से अपना भविष्‍य पूछने आए थे। बस इतना पूछना चाहते थे कि हम पढ़ते हैं तो परीक्षा में सफल क्‍यों नहीं होते। जो नौकरी चाहते हैं, व‍ह किसी और को क्‍यों मिल जाती है। आखिर हमारा कुसूर क्‍या है। क्‍या तुम्‍हारा जयकारा लगाने वाली भीड़ के अलावा भी हमारा कोई काम है। आप हमारे सवालों का कोई जवाब क्‍यों नहीं देते।

लेकिन जिसने जामिया की लाइब्रेरी में बच्‍चों पर लाठियों और आंसू गैस चलवाई हो, जिसने जेएनयू में नकाबपोश गुंडे भेजकर बच्‍चों पर लठ्ठ बजाए हों, जिसने किसानों के रास्‍ते में कीलें बिछाई हों, जिसने मणिपुर को जलता हुआ छोड़ दिया हो,जिसने कोविड की आपदा में अवसर तलाशा हो, उस अभिमानी सत्‍ता को बच्‍चों के जायज सवाल भी सवाल नहीं लगते, अपनी नाफरमानी लगती है।

इसलिये कथित लोकतंत्र में बच्‍चों को संवाद नहीं, सत्‍ता का प्रहार मिला। लड़कों को मारा। लड़कियों को मारा। एक-एक बच्‍चे को कई-कई सिपाहियों ने मारा। उनके ऊपर खूब लाठियां बरसाईं। आंसू गैस के गोले दागे। शरीर का कोई अंग दंड प्रहार से अछूता नहीं रहने दिया। कितनों को लहुलुहान कर दिया। ऐसा लगता था कि कौरवों के चक्रव्‍यूह में नन्‍हा अभिमन्‍यु फंस गया हो। या लकड़बघ्‍घों का झुंड किसी हिरन के छौने पर टूट पड़ा हो।

लेकिन कमाल है 21वीं सदी का जेन-जी गांधीवाद। वे चुपचाप खड़े होकर लाठियां खाते रहे। पुलिस को और मारने के लिये ललकारते रहे। लड़कियों ने पूछ लिया- जैसे मुझे मार रहे हो, अपनी बेटी को भी मारोगे। अपने घर जाकर बच्‍चों को अपनी बहादुरी बताना कि कैसे बच्‍चों को पीट कर आए हो। इस सत्‍याग्रह के सामने कई बार लाठियां रुकीं। कई बार सरकारी खाकी के भीतर फंसे नागरिक को शर्म आई। और अपने मोबाइल फोन पर यह दृश्‍य देख रहे करोड़ों लोगों की आंखें नम हो गईं। जड़ हो चुके दुनियादारों के समाज में कुछ हलचल हुई। खामोशी के लब खुले। डर का कुहासा कुछ कम हुआ।

बच्‍चे आगे बढ़ते गए। मेट्रो के गेट बंद कर दिये, बसों के रूट डायवर्ट कर दिये, ऑटो और टैक्‍सी का आना मना कर दिया, इंटरनेट और मोबाइल जैम कर दिये, लेकिन फिर भी वे आए। और आते ही गए। वे तानाशाही की चट्टान से टकरातीं समुद्र की लहरें बन गए।

ये नया भारत है। तुम इसे हिंदू-मुसलमान, अगड़े-पिछड़े, दलित-सवर्ण और उत्‍तर-दक्षिण में बांटने की कोशिश जरूर करोगे। लेकिन वे बंटेंगे नहीं। क्‍योंकि वे स्‍वार्थों की नाजुक डोर से नहीं, पीड़ा की मजबूत रस्‍सी से बंधे हैं। और यह भी याद रखना कि यह मुकम्‍मल इंकलाब नहीं, सत्‍याग्रह की शुरुआत है।

बच्‍चों ने वो कर दिया जो बड़ों से न हुआ।

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