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शंकरानंद की चार कविताएं

1. चमकती दोपहर में

जिन सड़कों से गुजरता हूं
उसके पास के घरों की आवाजें
छन कर बाहर आती हैं
जबकि उनके बाहर आने पर पाबंदी है

हवा के साथ आती है
एक मामूली सी चीख
जो किसी स्त्री की है

उंगलियों का कटना और
खून का बहना
यह रोज की बात है

आग में जलते हुए तवे पर
हाथ की छाप से
रोटी के स्वाद पर
कोई फर्क नहीं पड़ता
फटे को सिलने की
एक कोशिश में
बीत जाते हैं दिन
सूई की नोंक चुभती है तो
आह तक नहीं निकलती

कितना कुछ है जो
सिर्फ इसलिए बाकी है कि
इसे एक स्त्री को ही पूरा करना है
जब तक वह पूरा नहीं कर लेगी
कुछ नया काम निकल आएगा और
बढ़ जाएगी उसकी बेचैनी थोड़ी और

चमकती दोपहर में एक स्त्री की चीख
स्थाई भाव की तरह है
जिसका होना रोज के धूप जितनी
मामूली बात है

इसपर कोई बहस नहीं होती!

2. एक कलम

पिता की कलम को देखता हूं तो
वह मुझसे
पिता के होने का पता पूछती है

वह खाली पड़ी है
पिछले कई सालों से
मुझमें इतनी हिम्मत नहीं कि
उसे थाम सकूं अपनी उंगलियों से

मुझे नहीं लगता कि
वह कलम मेरा साथ देगी
वह लिखेगी या
लिखने से इंकार कर देगी
नहीं कह सकता मैं
लेकिन देखती है वह अपलक
जैसे स्त्री राह देखती है
दरवाजा खोल कर
जो गया उसके लौटने की आशा में

अक्सर यही होता है कि
चीजें तक पहचानती हैं
मनुष्य के होने की छाप
वह छाप नहीं मिलती तो
शोक में वे चीजें
धीरे धीरे टूट जाती हैं

जैसे अपने पक्षी के
लौटने की चाह में ही
कोई घोंसला जिंदा रहता है
कई महीनों तक और
नहीं लौटने के शोक में
वह धीरे-धीरे उजड़ जाता है।

3. तानाशाह

उसके बोलने में आवाज नहीं होती
इतना कम बोलता है कि
कुछ नहीं बोलता
इसके बावजूद सबकुछ हो जाता है

अगले ही पल विरोध में उठने वाली
टूट जाती है गर्दन
और गिर जाती हैं एक के बाद एक
देह की श्रृंखलाएं

उसके आदेश लिखित नहीं होते
उसकी आंखों में क्रोध नहीं दिखता
उसकी बातों में छल नहीं दिखता
दिखता कुछ नहीं
जबकि भीतर सबकुछ गहरा है
समुद्र जितना फैला हुआ अथाह

सबकुछ उसी समुद्र में डूबता है
उबरता है
फिर डूब जाता है।

4. युद्ध की तस्वीर

जहां युद्ध चल रहा है
अभी वहां शांति नहीं
वह अपनी जान बचा रही फिलहाल
किसी खोह या गुफा में छिपकर

युद्ध चल रहा है और
युद्ध की तस्वीरें सामने आ रही हैं

उन तस्वीरों में जले हुए मकान तो
दिखाई देते हैं
मगर जले हुए स्वप्न और लालसा की राख
कहीं नजर नहीं आती

जो दिखता है वह तो सिर्फ
सतह की राख है

न जाने कितने बीज
न जाने कितने स्वप्न
न जाने कितनी लालसा
राख होती है युद्ध के बीच
युद्ध की तस्वीर खींचने वाला
इसकी तस्वीर नहीं ले पाता

राख हुए भविष्य की तस्वीर
कोई नहीं ले सकता।

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