कँवल भारती की कविता
अक्सर ख्याल आता है कि
मैं किसी अंतहीन भीड़ में समा जाऊँ,
जहाँ से लौटना न हो मुमकिन
न भीड़ ख़त्म हो और न मेरा चलना
ख्याल न घर लौटने का हो और न किसी मंज़िल पर पहुँचने का।
फिर यह ख्याल आते ही मैं रो पड़ता हूँ।
अक्सर ख़्याल आता है कि
मैं किसी नदी के तट पर जाऊँ
अचानक मुझे एक ठोकर लगे
और मैं लुढ़कता हुआ समा जाऊँ
गहरी जलधारा में
या भंवर में,
जहाँ कोई वजूद ही न रहे मेरे शरीर का।
फिर यह ख्याल आते ही मैं रो पड़ता हूँ।
कभी कभी ख्याल यह भी आता है कि
सब तामझाम छोड़कर घर से निकलूँ
और वापस लौटूं ही नहीं।
अफ़साना कोई लिखा ही न जाए मेरा।
रूप बदलकर दूर कहीं से दुनिया को देखूँ
और एक गुमनाम मौत मर जाऊँ।
फिर यह ख्याल आते ही मैं रो पड़ता हूँ।
ख्याल आता है कि
तुम कभी आओगी,
यह जानकर भी कि तुम कभी नहीं आओगी।
यह कैसी आस है?
क्या उसका कोई वजूद नहीं?
यह तड़प, यह कसक, ये यादें,
क्या ये वजूद नहीं है उसका?
क्या यह उस अंतहीन भीड़ में अलग हो सकेगा मुझसे?
क्या नदी के तट से लुड़ककर जलधारा में समाते हुए साथ नहीं रहेगा?
यह ख्याल आते ही मैं रो पड़ता हूँ।
मैं रो पड़ता हूँ
क्योंकि एक खूंटा है, जो मुझे बांधे हुए है।
उससे मुक्त होना
दो मासूम ज़िन्दगियों से अलग होना है।
उनके आधार को तोड़कर
उन्हें कष्टों के समन्दर में मैं कैसे धकेल दूँ?।
मैं उनका दर्द जानता हूँ
जिनका टूट जाता है आधार।
जो टूटकर बिखर जाते हैं,
क्या वो जुड़ते हैं आसानी से?
फिर यह ख्याल आते ही मैं रो पड़ता हूँ।
–कँवल भारती



