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	<title>विचार-विमर्श Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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	<title>विचार-विमर्श Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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		<title>क्या धार्मिक आस्थाओं का राजनीतिक अस्थि संचय हो रहा है ? -श्रवण गर्ग</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Jul 2026 14:29:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;नागरिक क्यों आश्वस्त होना चाहते हैं कि कथित तौर पर जो एक राजनीतिक आपातकाल देश में पहले से ही उपस्थित है उसके अलावा यह कोई नया धार्मिक आपदाकाल तो नहीं है ? एक ऐसा आपदाकाल जिसमें धार्मिक आस्थाएँ संदेहों की अस्थियों में परिवर्तित होकर कोविडकाल की तरह व्यवस्था की नदियों में तैर रही हैं !&#8217; &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;नागरिक क्यों आश्वस्त होना चाहते हैं कि कथित तौर पर जो एक राजनीतिक आपातकाल देश में पहले से ही उपस्थित है उसके अलावा यह कोई नया धार्मिक आपदाकाल तो नहीं है ? एक ऐसा आपदाकाल जिसमें धार्मिक आस्थाएँ संदेहों की अस्थियों में परिवर्तित होकर कोविडकाल की तरह व्यवस्था की नदियों में तैर रही हैं !&#8217; पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


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<figure class="alignleft size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="450" height="450" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg" alt="पत्रकार श्रवण गर्ग" class="wp-image-413" style="width:185px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg 450w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-300x300.jpg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-150x150.jpg 150w" sizes="(max-width: 450px) 100vw, 450px" /><figcaption class="wp-element-caption">पत्रकार श्रवण गर्ग</figcaption></figure>
</div>


<p>जनता इतने आत्मविश्वास के साथ क्यों दावा कर रही है कि रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में हुए चंदे-चढ़ावे के घोटाले में कुछ भी नहीं होगा या कुछ निकलेगा ? असली दोषियों के न कभी नाम बाहर आएँगे और न उनका बाल कोई बाँका होगा ? घोटाले की जाँच के लिए बनाए गए विशेष जाँच दल द्वारा कोई सनसनीख़ेज़ रहस्योद्घाटन भी नहीं होगा। दल का कार्यकाल वैसे भी 15 जुलाई तक बढ़ गया है। मुमकिन है जाँच का दायरा बढ़ाकर कार्यकाल फिर से बढ़ा दिया जाए।</p>



<p>चंपतराय के विकल्प की तलाश प्रारंभ हो चुकी है। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरि अब कह रहे हैं कि वे कोषाध्यक्ष तो थे लेकिन उनकी कोई भूमिका ही नहीं थी। किसी भी काम में उनका कोई दखल नहीं था।</p>



<p>श्रद्धालुओं के बीच इस तरह की बातें क्यों हैं कि घोटाले का इस समय बाहर आना किसी बड़ी राजनीतिक कार्ययोजना का हिस्सा भी हो सकता है जिसके कि तार यूपी में अगले साल होने वाले महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से जुड़े हों ?</p>



<p>नागरिकों के बीच ऐसा डर क्यों है कि लगभग पच्चीस करोड़ की आबादी वाले देश के सबसे बड़े राज्य में चुनावों के पहले ख़ौफ़ का साम्राज्य क़ायम हो रहा है ?</p>



<p>नागरिक क्यों सवाल कर रहे हैं कि मंदिर-निर्माण के लिए भूमि-पूजन से लेकर उसके भव्य उद्घाटन-समारोह तक आकर्षण का केंद्र बने रहे दोनों प्रमुख यजमान करोड़ों हिन्दू भक्तों की धार्मिक आस्थाओं के साथ हुए आघात के प्रति बिलकुल भी विचलित नहीं दिखाई पड़ रहे हैं ? प्रधानमंत्री विदेशों के और संघ-प्रमुख देश में भ्रमण कर रहे हैं, प्रेरक उद्बोधन वितरित कर रहे हैं !</p>



<p>नागरिक क्यों आश्वस्त होना चाहते हैं कि कथित तौर पर जो एक राजनीतिक आपातकाल देश में पहले से ही उपस्थित है उसके अलावा यह कोई नया धार्मिक आपदाकाल तो नहीं है ? एक ऐसा आपदाकाल जिसमें धार्मिक आस्थाएँ संदेहों की अस्थियों में परिवर्तित होकर कोविडकाल की तरह व्यवस्था की नदियों में तैर रही हैं !</p>



<p>ऐसा इसलिए कि जब कभी व्यवस्थाएँ किसी बड़े राजनीतिक अथवा नैतिक संकट से मुखातिब होती हैं कोई नई आपदा आस्थाओं की भीड़ के बीच किसी साँप के बच्चे की तरह अचानक से प्रकट हो जाती है ! इसके कारण मचने वाली भगदड़ में आस्थाएँ तो श्वासहीन शरीरों में तब्दील होने लगती हैं,साँप का बच्चा सुरक्षित ग़ायब हो जाता है !</p>



<p>स्मरण किया जाए तो यक़ीन करना मुश्किल हो जाएगा कि कोविडकाल के दौरान असीमित कष्ट भुगत रहे नागरिकों के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कभी ऐसा कहा होगा : ‘ जब वे अपने भाई-बहनों की तरफ़ देखते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि वे (भाई-बहन) सोच रहे होंगे कि ये कैसा प्रधानमंत्री है जिसने हमें इतनी कठिनाइयों में डाल दिया है !’</p>



<p>नागरिक डरे हुए हैं कि कोविडकाल के दौरान उनकी आस्थाओं के साथ किए गए प्रयोगों को कहीं सरकार ने आपदाओं से निपटने के किसी स्थाई रोल मॉडल में तो नहीं परिवर्तित कर दिया गया है ! खाड़ी युद्ध से उत्पन्न संकट पर संसद में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने चार महीने पूर्व ही कहा था कि :’ पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण भारत के सामने अभूतपूर्व चुनौतियाँ हैं और उनसे निपटने के लिए देश को कोविड संकट के समय की तरह एकजुट होकर तैयार रहना होगा।’</p>



<p>सवाल एक और भी है जो सबसे बड़ा है ! वह यह कि मोदी-भागवत के भारत में निर्मित हुए हिंदुत्व की आस्थाओं के सर्वोच्च तीर्थस्थल की पवित्रता ही अगर संदेहों के घेरे में सिमट रही है तो क्या इसे केदारनाथ की गुफा और विवेकानंद स्मारक पर किये गए तपों से अर्जित पुण्य के क्षीण होने की शुरुआत मान लेना चाहिए या फिर किसी नए ईश्वरीय चमत्कार की प्रतीक्षा करना चाहिए ?</p>



<p></p>
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		<title>डॉ. राम पुनियानी का आलेख- सोमनाथ के लुटने से लेकर अयोध्या में ‘चंदा चोरी‘ तक</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Jul 2026 08:00:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;मंदिर को लूटा गया और घोटालेबाजों को न तो भगवन का कोई डर था और ना ही उनका धर्म से कोई लेनादेना था. इसका क्या असर होगा, यह तो आने वाले समय में ही पता लगेगा. सच तो यह है कि राममंदिर का पूरा आंदोलन मुख्यतः राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ही चलाया &#8230;</p>
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<figure class="alignleft size-large is-resized"><img decoding="async" width="768" height="768" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png" alt="डा. राम पुनियानी" class="wp-image-468" style="width:260px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png 768w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-300x300.png 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-150x150.png 150w" sizes="(max-width: 768px) 100vw, 768px" /></figure>
</div>


<p><strong>&#8216;मंदिर को लूटा गया और घोटालेबाजों को न तो भगवन का कोई डर था और ना ही उनका धर्म से कोई लेनादेना था. इसका क्या असर होगा, यह तो आने वाले समय में ही पता लगेगा. सच तो यह है कि राममंदिर का पूरा आंदोलन मुख्यतः राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ही चलाया गया था. इससे भाजपा को सत्ता हासिल हुई&#8217; पढें सुप्रतिष्ठित इतिहासकार डॉ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p>इस समय पूरा देश अयोध्या के राममंदिर में चंदे की लूट से स्तब्ध है, सदमे में है. इस चंदा चोरी से पूरे देश को, और खासतौर से उन श्रद्धालुओं को गहरा धक्का लगा है जिन्होंने छोटी-सी राशि से लेकर बहुत बड़ी रकमें तक अपने आराध्य भगवान राम को अर्पित की थी. राममंदिर आंदोलन के दौरान बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया था. उसी ज़मीन पर इस मंदिर को बनाया गया है. राममंदिर आंदोलन से देश हिल गया था. भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवानी के नेतृत्व में रथयात्रा निकाली गई थी. इस आन्दोलन के पीछे भाजपा-आरएसएस का एजेंडा था अयोध्या में बाबरी मस्जिद के स्थान पर राममंदिर का निर्माण. इसके लिए यह कहानी गढ़ी गई कि पहले मुगल बादशाह बाबर ने अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थल पर बने राममंदिर को तोड़कर उसके मलबे पर अपने नाम पर एक मस्जिद बनवाई थी.</p>



<p>न्यायपालिका की मिलीभगत के चलते भाजपा-आरएसएस अपना लक्ष्य हासिल करने में सफल रहे. आन्दोलन के समानांतर चंदा जमा करने का काम बड़े पैमाने पर चल रहा था. बाबरी मस्जिद ढ़हाए जाने की घटना की जांच में लिब्रहान आयोग ने पाया था कि अन्य लोगों के अलावा आडवानी, मुरलीमनोहर जोशी और उमा भारती मस्जिद ढ़हाए जाने के दोषी हैं. यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में भी यह माना गया कि मस्जिद का ध्वंस एक जुर्म था. न्यायपालिका जाहिर तौर पर सत्ताधारियों के दबाव में थी और इसलिए मुजरिमों को पुरस्कार के रूप में मंदिर निर्माण के लिए वह पूरी जमीन दे दी गई जिस पर मस्जिद हुआ करती थी. इसके बाद शानदार मंदिर के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर पैसा मिलने लगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुहरी भूमिका अदा की- पहली राज्य के प्रधान की और दूसरी मंदिर के उद्घाटन समारोह में मुख्य यजमान कीं. कुल मिलाकर राम मंदिर से जुड़े सभी मामलों में अंतिम फैसला लेने वाले वे ही थे.</p>



<p>मंदिर के उद्घाटन के बाद पहली बारिश में ही निर्माण की गुणवत्ता की पोल खुल गई. छत से पानी रिसने लगा. इससे बाल्टी उद्योग को जबरदस्त बढ़ावा मिला. फर्श पर पानी जमा होने से बचाने के लिए ढेर सारी बाल्टियाँ रखी गईं. श्रद्धालुओं का जमघट लगने लगा. दान इकठ्ठा करने से जुड़ी सारी व्यवस्थाएं प्रधानमंत्री कार्यालय के नियंत्रण में थीं. कितने बड़े पैमाने पर दान आ रहा था, इसका अंदाज इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सिन्धी समुदाय के विश्व सिंधी समाज ने चांदी की लगभग 200 ईटें दान की थीं, जिनमें से हर एक का वजन एक किलो था. उन्हें इसकी कोई पावती नहीं दी गई. तरह-तरह की बहुत सी बहुमूल्य वस्तुएं मंदिर को दान में मिलीं. ट्रस्टियों द्वारा गबन की गई राशि 2000 से 3000 करोड़ रूपये के बीच बताई जा रही है.</p>



<p>कुल मिलाकार यह कहा जा सकता है कि मंदिर को लूटा गया और घोटालेबाजों को न तो भगवन का कोई डर था और ना ही उनका धर्म से कोई लेनादेना था. इसका क्या असर होगा, यह तो आने वाले समय में ही पता लगेगा. सच तो यह है कि राममंदिर का पूरा आंदोलन मुख्यतः राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ही चलाया गया था. इससे भाजपा को सत्ता हासिल हुई और मुसलमानों के प्रति नफरत फैलाकर उसने अपना राजनैतिक आधार बहुत मजबूत कर लिया. हमारे लोकतंत्र से बंधुत्व का भाव बहुत हद तक लुप्त हो गया और मुसलमानों के प्रति नफरत लगातार बढ़ती गई. हमें साम्राज्यों का वह दौर याद आता है जब राजा धन के लिए मंदिरों को लूटते थे. साम्राज्यवादी दौर में राजाओं द्वारा मंदिरों की लूट और वर्तमान अर्ध-लोकतांत्रिक समाज (जो निर्वाचित तानाशाही में तब्दील होता जा रहा है) में इसी तरह की लूट में क्या अंतर है? दौलत की हवस दोनों दौरों में एक जैसी है. लेकिन धर्म-आधारित ध्रुवीकरण राजाओं की नीति नहीं थी. वहीं वर्तमान लुटेरे, जो साम्प्रदायिक शक्तियों से जुड़े हुए हैं, का मुख्य एजेंडा ध्रुवीकरण ही है.</p>



<p>वैसे तो मंदिर और अन्य पवित्र स्थान कई अन्य राजाओं द्वारा भी नष्ट किए गए थे मगर दो प्रमुख उदाहरण याद आते हैं. पहला है 11वीं सदी के कश्मीर के राजा हर्षदेव का और दूसरा महमूद गजनी द्वारा सोमनाथ मंदिर को लूटने का. डी. डी. कोसंबी के अनुसार &#8220;कश्मीर के राजा हर्षदेव (1089-1101 ईस्वी), जो सातवीं शताब्दी के शासक हर्ष से अलग थे, ने अत्यंत व्यवस्थित ढंग से अपने साम्राज्य में धातु की सभी देव प्रतिमाओं (मात्र चार को छोड़कर) को गलवा दिया. यह काम इसके लिए विशेष रूप से नियुक्त देवोपतन नायक पदनाम वाले मंत्री के माध्यम से करवाया गया. असगर अली इंजीनियर बताते हैं &#8220;महमूद गजनवी के बारे में भी इतिहासवेत्ताओं ने केवल कुछ तथ्यों को सामने रखा है. हम इस बात को प्रमुखता देते हैं कि उसने सोमनाथ के मंदिर को लूटा और नष्ट किया. लेकिन हम इस तथ्य पर प्रकाश नहीं डालते कि उसने अपनी सेना और प्रशासन में हिंदुओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया. उसके हिंदू जनरलों में से तिलक, सोंधी, राय हिंद और हरजन आदि का जिक्र तारीख-ए-बैहाकी में है…उसके शासनकाल में जारी सिक्कों में संस्कृत में अभिलेख थे‘‘.</p>



<p>आज समाज में यह आम धारणा है कि मंदिरों को धार्मिक वजहों से नष्ट किया गया. यह धारणा अंग्रेजों द्वारा उनकी ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति के अंतर्गत किए गए साम्प्रदायिक इतिहासलेखन की वजह से बनी. महमूद गजनी ने सोमनाथ मंदिर को नष्ट करने के पहले वहां मौजूद चांदी और सोने की सभी मूर्तियों को अपने कब्जे में ले लिया जिनका कुल मूल्य सोने के बीस हजार दीनारों से अधिक रहा होगा, जो एक बहुत बड़ी रकम थी…. सुलतान इन मूर्तियों को देखकर अचंभित रह गया और उसने इन मूर्तियों और मंदिर के खजाने को जब्त करने का आदेश दिया. वहां चांदी और सोने की बहुत सी मूर्तियां थीं…मंदिर में मिली वस्तुओं का मूल्य बीस हजार दीनार से भी अधिक था‘‘.</p>



<p>रोमिला थापर लिखती हैं, &#8220;मंदिरो में भक्तों द्वारा दान की गई नकद राशि, सोने की मूर्तियों और गहनों के रूप में अपार संपदा थी और इसलिए वे स्वाभाविक तौर पर उत्तर भारत में दौलत तलाश रहे गैर-हिन्दुओं के निशाने पर थे. महमूद गज़नी सोने का बहुत लालची था…और सोमनाथ अपनी अथाह संपदा के लिए विख्यात था&#8221;. वे आगे लिखती हैं. ‘‘जब बात राजनैतिक लक्ष्य हासिल करने की हो तो धर्म से जुड़े मुद्दों का इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती‘‘. आम लोगों में मुसलमानों और महमूद गजनी का दानवीकरण करने में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के उपन्यास ‘जय सोमनाथ‘ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. उसमें घटनाओं को इस तरह प्रस्तुत किया गया जिससे यह धारणा बने कि मंदिरों को लूटने की वजह सिर्फ हिंदुओं का अपमान करना यानि धार्मिक थी.</p>



<p>हालांकि कई मुस्लिम राजाओं को मंदिर नष्ट करने का दोषी बताया जाता है लेकिन इस बात का बहुत कम जिक्र किया जाता है कि बहुत से मुस्लिम राजा हिंदू मंदिरों को दान देते थे. मुझे औरंगजेब द्वारा जारी उन फरमानों की प्रतियां दी गईं हैं जिनमें उत्तर भारत के विभिन्न स्थानों जैसे महाकालेश्वर (उज्जैन), बालाजी मंदिर (चित्रकूट) उमानंद मंदिर (गुवाहाटी), शत्रुंजय के जैन मंदिरों और अन्य कई प्रसिद्ध मंदिरों और गुरूद्वारो को दान दिए जाने का आदेश दिया गया है. ये फरमान इस्लामिक कैलेंडर के सन् 1065 (1659 ईस्वी) और 1095 (1685) के बीच जारी किए गए थे.&#8221; मंदिरों को नष्ट करने वाले गज़नी जैसे राजाओं और वर्तमान सत्ताधारियों के नियंत्रण वाले ट्रस्ट के बीच गजब की समानताएं नजर आ रही हैं.</p>



<p>&#8211;<strong>डॉ. राम पुनियानी </strong>, लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं. अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया.</p>



<p></p>



<p>(यह लेखक के निजी विचार हैं)</p>
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			</item>
		<item>
		<title>डॉ. पंकज श्रीवास्तव लेख- क्यों आपातकाल था दलितों और आदिवासियों के लिए &#8216;मुक्ति-पर्व&#8217; ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/dr-pankaj-srivastava-article-why-was-the-emergency-a-festival-of-liberation-for-dalits-and-adivasis-read-the-full-article-by-dr-pankaj-srivastava-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 05:39:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;इमरजेंसी को देखने का एक दूसरा नज़रिया भी है जो इस काल को वंचित समुदायों के लिए “सकारात्मक स्वतंत्रता” का युग मानता है। आपातकाल ने दलितों को सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप करने का हौसला दिया। उनके लिए यह एक तरह का सामाजिक और सांस्कृतिक दावा भी था।&#8217; पढ़ें पत्रकार एवं लेखक पंकज श्रीवास्तव का पूरा &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>&#8216;इमरजेंसी को देखने का एक दूसरा नज़रिया भी है जो इस काल को वंचित समुदायों के लिए “सकारात्मक स्वतंत्रता” का युग मानता है। आपातकाल ने दलितों को सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप करने का हौसला दिया। उनके लिए यह एक तरह का सामाजिक और सांस्कृतिक दावा भी था।&#8217; पढ़ें पत्रकार एवं लेखक पंकज श्रीवास्तव का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>पाँच दशक बाद भी इमरजेंसी को लेकर विवाद जारी है। ख़ासतौर पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और कांग्रेस को कोसने के लिए इसकी याद दिलायी जाती है। यहाँ तक कि बीजेपी ने बीते कुछ सालों से 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने की शुरुआत की है ताकि इस आलोचना को एक संस्थागत स्वरूप दिया जा सके। लेकिन इसी बीच ऐसे भी कुछ अध्ययन सामने आये हैं जो बताते हैं कि इमरजेंसी का दौर ख़ासतौर पर दलितों और आदिवासियों के लिए मुक्ति का द्वार खुलने जैसा था। भारतीय समाज को समतामूलक बनाने की दिशा में इमरजेंसी ने ‘एक्ज़ीलरेटर’ का काम किया था। साथ ही, इमरजेंसी के लिए सिर्फ़ इंदिरा गाँधी को ज़िम्मेदार ठहराना ग़लत है। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने जो मोड़ लिया था, उसमें कोई भी सरकार इमरजेंसी जैसा फ़ैसला ले सकती थी।</p>



<p>कुछ महीने पहले दिल्ली में &#8216;फ़िफ्टी इयर्स ऑफ़ इंडियन इमरेजंसी: लेसन फॉर डेमोक्रेसी’ शीर्षक की एक किताब का विमोचन हुआ जिसमें 17 लेख छपे हैं। इसमें इमरजेंसी को महज़ ‘लोकतंत्र का काला अध्याय’ बताने के रिवाज से उलट कुछ ज़मीनी निष्कर्ष पेश करने वाले लेख हैं। इस सिलसिले में मशहूर राजनीति विज्ञानी और जेएनयू के पूर्व प्रोफ़ेसर गोपाल गुरु का लेख ख़ास तौर पर ध्यान खींचने वाला था। ‘स्वतंत्रता की अवधारणा पर बहस’ शीर्षक लेख में प्रो.गोपाल गुरु लिखते हैं- “ऐसा आपातकाल मुक्ति का काल बन जाता है, क्योंकि वे लोग जो दलितों और शोषित वर्गों को दबाते रहे — जैसे साहूकार, जो उन्हें कर्ज में डालते थे, जो उन्हें खाद्यान्न देने से इनकार करते थे, जो उनके बर्तन-भांडे और सोना-चांदी गिरवी रख लेते थे — वे सभी या तो धमकाए गए थे या जेल में थे।”</p>



<p>यानी इमरजेंसी को देखने का एक दूसरा नज़रिया भी है जो इस काल को वंचित समुदायों के लिए “सकारात्मक स्वतंत्रता” का युग मानता है। आपातकाल ने दलितों को सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप करने का हौसला दिया। उनके लिए यह एक तरह का सामाजिक और सांस्कृतिक दावा भी था। यह बताता है कि आज़ादी के बाद भारतीय समाज को समतामूलक बनाने की राह में खड़ी तमाम बाधाओं पर इमरजेंसी ने निर्णायक चोट की गयी जिसका असर देश के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ा।</p>



<p>इस बात की तस्दीक़ इमरजेंसी के दौरान चलाये गये ‘बीस सूत्री कार्यक्रम’ से भी होती है। इस दौरान सीलिंग के ज़रिए मुक्त की गयी भूमि को भूमिहीनों (ख़ासतौर पर दलितों) को बाँटा गया। छोटे किसानों, भूमिहीनों और दस्तकारों के क़र्ज़ की वसूली पर रोक लगी। बँधुआ मज़दूरी ख़त्म करने का अभियान चला। कृषि मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी क़ानून लागू हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों में ग़रीबों के लिए मकान बने। महँगाई पर क़ाबू पाया गया और अनाज तथा आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को प्रभावी बनाया गया। अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए स्पेशल कंपोनेंट प्लान की अवधारणा विकसित की गयी जो आबादी के अनुपात में बजट सुनिश्चित करता था। छोटे-सीमांत किसानों और भूमिहीनों के लिए ऋण और अन्य सुविधाएँ दी गयीं। यही नहीं, अश्पृश्यता निरोधक क़ानून को सख़्त बनाकर जाति के आधार पर शोषण और दमन करने वालों को सख़्त संदेश दिया गया।</p>



<p>निश्चित ही इमरजेंसी में ज़्यादतियाँ हुईं। नागरिक अधिकारों को बाधित किया गया, तमाम नेताओं को जेल हुई और प्रेस को भी सेंसरशिप का सामना करना पड़ा। लेकिन क्या इसके लिए अकेले इंदिरा गाँधी को दोषी ठहराया जा सकता है? पचास साल बाद अगर निष्पक्षता से उस समय की राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति पर नज़र डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आख़िर इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी क्यों लगायी।</p>



<p>यह कहना पूरी तरह ग़लत है कि इंदिरा गाँधी ने 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फ़ैसले के असर से बचने के लिए लगायी थी जिसके तहत रायबरेली से उनके निर्वाचन को रद्द कर दिया गया था। अगर ऐसा होता तो उसी दिन इमरजेंसी लग जाती। सच्चाई यह है कि 24 जून को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी थी ( जिसे 7 नवंबर 1975 को पूरी तरह रद्द कर दिया गया।)। यानी इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बने रहने में कोई क़ानूनी अड़चन नहीं थी। वैसे भी इलाहाबाद होईकोर्ट का तर्क किसी के गले नहीं उतर रहा था। हाईकोर्ट ने यूपी सरकार द्वारा इंदिरा गाँधी के भाषण के लिए ऊँचा मंच बनाने और यशपाल कपूर का सरकारी सेवा से इस्तीफ़ा स्वीकार होने के पहले इलेक्शन एजेंट बनने को ‘भ्रष्टाचार&#8217; करार दिया था। स्वतंत्र स्तंभकारों ने इसे ‘ट्रैफ़िक लाइट के उल्लंघन के अपराध में प्रधानमंत्री को बर्खास्त करना’ कहा था।</p>



<p>इमरजेंसी लगाने का ऐलान 25 जून की आधी रात के पहले हुई। दिन में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई रैली में जय प्रकाश नारायण ने आह्वान किया था कि सेना और पुलिस सरकार के आदेश को मानने से मना कर दे। यह केंद्रीय सत्ता को उखाड़ फेंकने का खुला आह्वान था। ऐसे में कोई दूसरी सरकार भी क्या करती? ऐसी ही स्थिति के लिए संविधान में अनुच्छेद 352 मौजूद था जिसके तहत आपातकाल लगाने का फ़ैसला किया गया। यानी यह क़दम कहीं से भी असंवैधानिक नहीं था।</p>



<p>इंदिरा गाँधी ने उस समय विदेशी साज़िश का जो तर्क दिया था, वह भी यूँ ही नहीं था। 1971 में अमेरिका के सातवें बेड़े की धौंस को बंगाल की खाड़ी में डुबोकर उन्होंने जिस तरह बांग्लादेश का निर्माण संभव किया था, उसके बाद अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के वे स्वाभाविक ही निशाने पर थीं। 1973 में चिली के समाजवादी राष्ट्रपति सल्वाडोर अलांदे का इसी एजेंसी में तख्ता पलट किया था और सैन्य विद्रोह में उनकी जान चली गयी थी। आलेंदे की हत्या की ख़बर जब इंदिर गाँधी को मिली तो वे दिल्ली में क्यूबा के राष्ट्रपति फ़िदेल कास्त्रो की मेज़बानी कर रही थीं। बाद में कास्त्रो ने लिखा कि “ इंदिरा ने उस वक़्त कहा था- उन्होंने जो अलांदे के साथ किया है, वही मेरे साथ भी करना चाहते हैं। चिली में जिन ताक़तों ने यह काम किया है, उनसे जुड़े लोग यहाँ भी हैं।’</p>



<p>इसके अलावा 1974 की रेल हड़ताल ने भी सरकार को गंभीर संकेत दिया था। इस हड़ताल का मक़सद देश भर के कारख़ानों में कोयला सप्लाई रोककर उत्पादन ठप कर देना था ताकि ज़रूरी चीजों की आपूर्ति न हो सके और जनता विद्रोह कर दे। हिंसा और धमाकों का सिलसिला भी जारी था ( जिसका प्रमाण बाद में बड़ौदा डायनामाइट कांड के रूप में मिला)। जनवरी 1975 में रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या भी हो गयी थी। ऐसे में इंदिरा गाँधी ने अगर इमरजेंसी लगाने का फ़ैसला किया तो अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता।</p>



<p>यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद ही जिस तरह समाजवादी नीतियाँ लागू की थीं उससे कांग्रेस के अंदर और बाहर का दक्षिणपंथी ख़ेमा नाराज़ था। पूँजीपति बैंकों के राष्ट्रीयकरण से नाराज़ थे तो पूर्व रियासतदारों का सामंत वर्ग ‘प्रिवीपर्स’ और राजा, महाराजा और हिज़ हाईनेस जैसे टाइटन ख़त्म किये जाने से ग़ुस्से में था। नेहरू के समय ज़मींदारी उन्मूलन रोकने की उसकी तमाम कोशिशें नाकाम हुई थीं और इंदिरा ने उसे ज़मीन पर उतारने का प्रयास और तेज़ कर दिया था। ये सारी शक्तियाँ जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन को ताक़त दे रही थीं। जय प्रकाश नारायण ने आरएसएस को भी साथ ले लिया था जिस पर तब तक महात्मा गाँधी की हत्या का दाग़ गाढ़ा था और इंदिरा गाँधी की नज़र में वो एक फ़ासीवादी संगठन था। इन सब चीजों ने इंदिरा गाँधी के संदेह को बढ़ा दिया था।</p>



<p>यह भी याद रखने की बात है कि बिना किसी बड़े आंदोलन के दबाव के, उन्नीस महीने बाद इंदिरा गाँधी ने ख़ुद ही इमरजेंसी हटा दी। आज के अघोषित आपात्काल में मोदी सरकार और चुनाव आयोग के रिश्तों को देखते हुए यह भी आश्चर्यजनक ही लगता है कि ‘तानाशाह’ इंदिरा गाँधी द्वारा नियुक्त चुनाव आयुक्त टी.स्वामीनाथन ने ऐसा चुनाव कराया कि इंदिरा गाँधी चुनाव हार गयीं और बिना किसी ना-नुकुर के सत्ता से हट गयीं।</p>



<p>आरएसएस को साथ लेने के सदैव विरोधी रहे मशहूर समाजवादी चिंतक मधु लिमये ने बाद में लिखा- ‘इंदिरा ने 1977 में चुनाव कराने के जो कारण बताये वह सचमुच व्यक्तित्व की अंतरात्मा को प्रतिबिंबित करता है। …इंदिरा गाँधी यह कभी नहीं भूल सकती थीं कि वह जवाहरलाल नेहरू की बेटी हैं और हम सब की तरह महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चलने वाले स्वतंत्रता संग्राम की संतान हैं।’</p>



<p>1977 के चुनाव में नसबंदी और उससे जुड़ी अफ़वाहें उत्तर भारत में कांग्रेस के सफ़ाये का सबसे बड़ा कारण बनी थीं। लेकिन ढाई साल में ही संपूर्ण क्रांति का ढोल फट गया। जनता पार्टी ने 1980 में ‘फिर इमरजेंसी’ का डर दिखाकर इंदिरा गाँधी को रोकने की कोशिश की लेकिन कांग्रेस के पक्ष में आँधी चली और उसे लोकसभा में 353 सीटें मिलीं जबकि जनता पार्टी महज़ 31 सीटों पर सिमट गयी। जनता की अदालत में इमरजेंसी का मुक़दमा इसी चुनाव में निपट गया था जिसे साढ़े चार दशक बाद मोदी सरकार फिर सुनवाई पर लाने की कोशिश करती रहती है। लेकिन दलित-वंचित समाज की ओर से इमरजेंसी को लेकर जो नया नज़रिया सामने आ रहा है, वह इस कोशिश के सामने बड़ी चुनौती साबित होगा।</p>



<p>साभार- द लेंस</p>



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		<title>उपन्यास और स्त्री</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-novel-and-woman-read-the-full-article-of-famous-writer-and-ambedkarite-thinker-ravikant-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 17 Jun 2026 15:14:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;उपभोक्तावादी संस्कृति ने स्त्री को तमाम विकल्प जरूर उपलब्ध कराए लेकिन इसकी नकारात्मक छवियों से वह अपना बचाव न कर सकी। परिणामस्वरूप नारीवादी आन्दोलन और विमर्श पर बहुत सारे प्रश्न खड़े किये जाने लगे।&#8217; पढ़ें रविकांत का पूरा लेख&#8230; क्या स्त्री जन्म से ही कैदी है या उसका अस्तित्व ही कैद में है? स्त्री के &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;उपभोक्तावादी संस्कृति ने स्त्री को तमाम विकल्प जरूर उपलब्ध कराए लेकिन इसकी नकारात्मक छवियों से वह अपना बचाव न कर सकी। परिणामस्वरूप नारीवादी आन्दोलन और विमर्श पर बहुत सारे प्रश्न खड़े किये जाने लगे।&#8217; पढ़ें रविकांत का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p><br>क्या स्त्री जन्म से ही कैदी है या उसका अस्तित्व ही कैद में है? स्त्री के जन्म लेते ही तमाम कैदखानों के दरवाजे परत दर परत खुलते जाते हैं। &#8216;दि सेकेण्ड सेक्स&#8217; में सिमोन द बाउआ ने लिखा है कि स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है। स्त्री की कैद के कितने कठघरे हैं? स्त्री जितनी कैद होती जाती है उतनी ही स्त्री होती जाती है। कहीं स्त्री बाजार के स्वर्णिम पिंजरे में कैद है तो कहीं खाप की बन्द खिड़कियों में उसका दम घुटता है। कभी अगर वह मुँह खोलने का प्रयास भी करती है तो चन्द उपहार और सौगातें उसके होंठों को सी देते हैं। अगर वह आँख खोलकर सच देखना चाहे तो व्यवस्था की गर्म सलाखें पुतलियों को बेधकर उसकी रोशनी छीन लेती हैं।</p>



<p>फ्रांस की प्रसिद्ध स्त्रीवादी विचारक और उपन्यासकार मादाम स्तेल कहती हैं कि उपन्यास का विकास उन्हीं समाजों में होता है जहाँ स्त्रियों का स्थान ऊँचा हो और व्यक्तिगत जिन्दगी में लोगों की गहरी दिलचस्पी हो। ऐसे ही समाज में उपन्यास वैयक्तिक अनुभवों का माध्यम और वैयक्तिक स्वतन्त्रता का वाहक बनता है। नवजागरण के दौर में स्त्री शिक्षा और स्त्री सुधार को केन्द्र में रखकर ही हिन्दी उपन्यास लेखन की शुरुआत हुई। लगभग डेढ़ सदी के इतिहास में हिन्दी उपन्यास ने एक लम्बी यात्रा तय की है। प्रारम्भिक उपन्यासों की स्त्री; अशिक्षा, अज्ञानता, अन्धविश्वास और रूढ़िवादिता का शिकार थी। लेखक इस स्त्री में नैतिक ऊर्जा का संचार कर रहे थे। प्रेमचन्द, प्रसाद, जैनेन्द्र और अज्ञेय के स्त्री पात्र जीवन-आदर्श और प्रेम की अनुभूतियों की कठपुतलियाँ सरीखे लग रहे थे। आजादी के बाद, हिन्दी उपन्यासों में स्त्री का निजी व्यक्तित्व और उसकी भावनाएँ केन्द्र में आती हैं। फिर भी कहीं न कहीं ये चरित्र रोते- टूटते और बिखरते जाते हैं। राजेन्द्र यादव ने ठीक ही लिखा है कि नये माहौल में स्त्री पंख लगाकर, स्वतन्त्र होकर उड़ना चाहती है। लेकिन सामाजिक भीतियों और मानसिक ग्रन्थियों से जूझने के प्रयत्न में उसके डैने टूट गये हैं। हैं। कभी उसे शरीर की मांग झुका देती है तो कभी अकेलेपन की यातना। पुरुष लेखकों द्वारा रचे गये ऐसे चरित्रों से मुक्ति तब मिलती है जब स्त्रियाँ स्वयं लेखन में दाखिल होती हैं। स्त्री विमर्श के आन्दोलन की शक्ल में आने से पूर्व मन्नू भण्डारी और कृष्णा सोबती जैसी समर्थ और सजग रचनाकारों ने स्त्री की निजी अनुभूतियों को पूरी प्रामाणिकता के साथ पिरोने की कोशिश की थी।</p>



<p>नब्बे के दशक में शुरू हुए अस्मितावादी विमर्श में नारीवाद प्रमुख मुहावरा बनकर उभरता है। इस नारीवादी आन्दोलन ने पितृसत्ता की चूलें हिला दीं। उग्र होता यह नारी विमर्श दुर्योग से देह के विमर्श में तब्दील होता गया। बाजार, विज्ञापन और तमाम संचार साधनों द्वारा प्रसारित पूँजीवादी पश्चिमी संस्कृति में यह आन्दोलन उलझता चला गया। उपभोक्तावादी संस्कृति ने स्त्री को तमाम विकल्प जरूर उपलब्ध कराए लेकिन इसकी नकारात्मक छवियों से वह अपना बचाव न कर सकी। परिणामस्वरूप नारीवादी आन्दोलन और विमर्श पर बहुत सारे प्रश्न खड़े किये जाने लगे। अगरचे, आज नये प्रश्नों और कुछ दबे-ढके मुद्दों पर नारीवादी स्वर मुखरित हुआ है।</p>



<p></p>
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		<title>डॉ. राम पुनियानी का लेख- धार्मिक त्यौहार बने नफरत फैलाने के औज़ार</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-dr-ram-puniyanis-article-religious-festivals-become-tools-for-spreading-hatred-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Jun 2026 14:53:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;रामनवमी और जन्माष्टमी के जुलूसों के चरित्र में आमूल परिवर्तन आ गया है. अपने बचपन में मैं इन जुलूसों में खुशी-खुशी शामिल होता था क्योंकि रास्ते पर मौजूद हर व्यक्ति को प्रसाद दिया जाता था. यहां तक कि मुसलमानों के कई समूह जुलूस में शामिल लोगों के लिए शरबत के स्टॉल लगाते थे.&#8217; पढ़ें सुप्रसिद्ध &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-dr-ram-puniyanis-article-religious-festivals-become-tools-for-spreading-hatred-on-adahan-patrika/">डॉ. राम पुनियानी का लेख- धार्मिक त्यौहार बने नफरत फैलाने के औज़ार</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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<p><strong>&#8216;रामनवमी और जन्माष्टमी के जुलूसों के चरित्र में आमूल परिवर्तन आ गया है. अपने बचपन में मैं इन जुलूसों में खुशी-खुशी शामिल होता था क्योंकि रास्ते पर मौजूद हर व्यक्ति को प्रसाद दिया जाता था. यहां तक कि मुसलमानों के कई समूह जुलूस में शामिल लोगों के लिए शरबत के स्टॉल लगाते थे.&#8217; पढ़ें सुप्रसिद्ध लेखक एवं इतिहासकार डॉ. राम पुनियानी का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>बकरीद मुसलमानों का दूसरा सबसे बड़ा त्यौहार है. यह कुर्बानी का त्यौहार है. यह पैगम्बर इब्राहिम (अब्राहम) की अल्लाह के प्रति दृढ़ आस्था के सम्मान में मनाया जाता है. वे अल्लाह की आज्ञानुसार अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी देने के लिए तैयार थे. लेकिन उसके पहले ही अल्लाह ने उनके पुत्र की जगह एक मेढ़ा रख दिया. इस त्यौहार पर आर्थिक दृष्टि से सक्षम मुसलमान बकरे, भेड़, गाय या ऊंट की कुर्बानी की रस्म निभाते हैं. ऐसा पैगम्बर इब्राहिम द्वारा दी गई कुर्बानी के प्रतीकात्मक अनुसरण बतौर किया जाता है. मुसलमानों के लिए यह आध्यात्मिक त्यौहार होता है जो कुर्बानी एवं साझेपन की भावना पर आधारित है. कुर्बान किए गए जानवर का मांस तीन हिस्सों में बांटा जाता है और इस नियम के कड़ाई से पालन की अपेक्षा की जाती है. एक हिस्सा परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए और तीसरा गरीबों और जरूरतमंदों के लिए होता है. इससे जाहिर है कि हमदर्दी, दान और सामुदायिक एकता के भाव इस्लाम में कितने अहम हैं.</p>



<p>एक लंबे समय से हिंदू त्यौहारों का इस्तेमाल मुसलमानों के प्रति नफरत फैलाने के लिए किया जाता रहा है. और अब मुस्लिम त्यौहारों का भी उपयोग मुसलमानों के प्रति घृणा फैलाने के लिए हो रहा है. इस साल बकरीद पर मुंबई के मुस्लिम समुदाय को कुर्बानी की रस्म अदा करने में तरह-तरह की मुश्किलात का सामना करना पड़ा. नगरपालिका के नियमों और मुंबई उच्च न्यायालय के 2019 के आदेश में आवासीय परिसरों (मगर घर के अंदर नहीं) में कुर्बानी देने की अनुमति कुछ शर्तों के साथ दी गई है. इस साल तीन आवासीय सोसायटियों में अंतिम क्षणों में अनुमति वापिस ले ली गई. ऐसा मुख्यतः भाजपा से जुड़े राजनीतिज्ञों (इनमें से एक भाजपा की राज्य शाखा के उपाध्यक्ष कीरत सोमैया थे) के हस्तक्षेप और बजंरग दल व विहिप कार्यकर्ताओं की जिद की वजह से हुआ. इससे सामान्य जनता व मीडिया का ध्यान इस ओर गया और मुसलमानों के प्रति नफरत भड़की.</p>



<p>स्वतंत्र पत्रकार ज्योति पुनवानी फ्रंटलाईन में प्रकाशित अपने लेख में लिखती हैं ‘‘हर स्थानीय और बहुत से राष्ट्रीय टीवी चैनलों ने यह खबर बार-बार प्रसारित की और साथ में आवासीय सोसायटियों से बकरे बाहर ले जाते मुसलमानों के वीडियो लगातार दिखाए. इसका नतीजा यह हुआ कि एक समुदाय को अपने दूसरे सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार के दौरान तकलीफ और परेशानी से गुजरना पड़ा. सोशल मीडिया पर मुसलमानों के प्रति नफरती संदेशों की बाढ़ आ गई, जो हमेशा की तरह अर्धसत्य और अतिरेक पर आधारित थे‘‘. पुनवानी बताती हैं कि इन तीनों आवासीय परिसरों में कई वर्षों से कुर्बानी दी जा रही थी. यह इस तथ्य के बावजूद कि इनके रहवासियों में हिन्दुओं का बहुमत है. ऐसी एक सोसायटी में बकरों को परिसर में ही रखा गया और ईद के दिन कुर्बानी के लिए निर्धारित स्थान पर ले जाया गया.</p>



<p>इस वर्ष मीरा रोड की एक सोसायटी में बहुत हंगामा हुआ. पूनम एस्टेट क्लस्टर में 25 मई की दोपहर एवं 26 मई की सुबह गंभीर साम्प्रदायिक तनाव के हालात उत्पन्न हो गए. वहां पिछले सालों की तरह पशुओं को परिसर के अंदर एक अस्थायी शेड में रखा गया था. बजरंग दल और विहिप के कई कार्यकर्ताओं ने यह कहते हुए हंगामा बरपा दिया कि पशुओं को परिसर के अंदर नहीं रखा जा सकता. इससे किसी नियम का उल्लंघन नहीं हो रहा था, इसके बावजूद पुलिस और महानगरपालिका के अधिकारियों ने तनाव उत्पन्न करने वालों का साथ दिया. इस सबसे बढ़कर, कार्यकर्ता मुसलमानों को भयभीत करने के लिए परिसर के अंदर कई सुअर ले आए.</p>



<p>सामान्यतः त्यौहार शांति और आनंद का संदेश लाते हैं. लेकिन विहिप-बजरंग दल और उनके जैसी मानसिकता के अन्य तत्व इन अवसरों पर भी साम्प्रदायिक तनाव फैलाने से बाज नहीं आते. भारत में मिलजुल कर त्यौहार मनाने और धर्मों की सीमाओं से ऊपर उठकर घुलमिल कर रहने की लंबी परंपरा रही है. लेकिन इस तरह की घटनाओं से बहुत तनाव उत्पन्न हो जाता है. यह तनाव समाज में बढ़ती साम्प्रदायिकता के साथ बढ़ता जा रहा है. हमने विगत वर्षों में देखा है कि मुस्लिम युवकों को, विशेषकर गुजरात में, गरबा में भाग लेने की इजाजत नहीं दी जाती. गरबा पंडालों में प्रवेश के पहले सख्ती से आधार कार्डों की जांच की जाती है. धमकी भरे लहजे में चेतावनी दी जाती है कि जुमे की नमाज सड़क पर न पढ़ी जाए. यहां तक कि हिन्दू उत्सवों पर भी मुसलमानों को परेशानियां झेलनी पड़ती हैं.</p>



<p>दूसरी ओर कांवड़ यात्राओं के दौरान सड़कों पर नियमों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं और फलों और खाद्य साम्रग्री के विक्रेताओं को अपना नाम दुकान या ठेले पर लिखने को बाध्य किया जाता है. इसके पीछे उद्धेश्य यह होता है कि यात्राओं में शामिल लोग मुस्लिमों की होटलों या दुकानों से कुछ न खरीदें. ‘शुद्धता-प्रदूषण‘ के इन नियमों पर अमल सरकारी मशीनरी की मदद से करवाया जाता है.</p>



<p>रामनवमी और जन्माष्टमी के जुलूसों के चरित्र में आमूल परिवर्तन आ गया है. अपने बचपन में मैं इन जुलूसों में खुशी-खुशी शामिल होता था क्योंकि रास्ते पर मौजूद हर व्यक्ति को प्रसाद दिया जाता था. यहां तक कि मुसलमानों के कई समूह जुलूस में शामिल लोगों के लिए शरबत के स्टॉल लगाते थे. अब ये जुलूस मुस्लिम बहुल इलाकों से निकालें जाते हैं और उस दौरान मुस्लिम विरोधी नारे लगाए जाते हैं. अतिउत्साही तत्व मस्जिदों के सामने नाचते हैं और गालियों व अपशब्दों से भरपूर नारे लगाते हैं. इस सबसे आगे बढ़कर कुछ लोग मस्जिद के शिखर पर चढ़ जाते हैं और वहां फहरा रहे हरे झंडे को हटाकर भगवा झंडा लगा देते हैं. यह कई मौकों पर हुआ है.</p>



<p>यह नफरत हमें आखिर कहां ले जाएगी? यह एक तकलीफदेह सवाल है. भारत मिलीजुली संस्कृति वाला देश रहा है. हमारी संस्कृति ‘अन्य धाराओं‘ से समृद्ध हुई है, हमने अन्य धाराओं को आदर दिया है और मिलजुलकर उत्सव मनाये हैं. त्यौहार मेल-मुलाकात के मौके होते हैं, वे हमें रोजमर्रा की नीरस जिंदगी से थोड़े समय के लिए निजात दिलवाते हैं. साम्प्रदायिकता हमारे जीवन के इस सुहावने पहलू को हमसे छीनती जा रही है.</p>



<p>इरफान इंजीनियर एवं नेहा दाभाड़े द्वारा किया गया एक अध्ययन, जिसका विषय ‘वेपनेजाईनेशन ऑफ हिन्दू फेस्टिवल्स (हिन्दू त्यौहारों का सशस्त्रीकरण) था, त्यौहारों के दुरूपयोग के खतरों के बारे में हमारी आंखें खोल देता है. धर्म आधारित नफरत जैसे-जैसे और ऊँची दीवारें खड़ी कर रही है, मुस्लिम समुदाय को अधिकाधिक डरावने माहौल का सामना करना पड़ रहा है. यह निश्चित ही हमारे समाज की एक बड़ी समस्या है. यह हमारे संवैधानिक मूल्यों पर हमला है, खासकर बंधुत्व के केन्द्रीय मूल्य पर.</p>



<p>समाज के विभिन्न वर्गों के बीच प्यार और सामंजस्य दुबारा कायम करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की जरूरत है. यह हमारे लोकतंत्र को जीवित और सेहतमंद रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.</p>



<p> &#8211;<strong>डॉ. राम पुनियानी</strong>, लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं.</p>



<p>(अंग्रेजी से रूपांतरण-<strong>अमरीश हरदेनिया</strong>)</p>



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		<title>डॉ. राम पुनियानी का लेख — किन वजहों से हुए मोदी मजबूत ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniaanis-article-for-what-reasons-did-modi-become-strong-read-the-full-article-on-ramchandra-guha-rahul-gandhi-congress-bjp-rss-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 06 Jun 2026 08:00:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;सन् 1978 में जनता पार्टी सरकार में आडवानी के सूचना प्रसारण मंत्री बनने के बाद से ही मीडिया का झुकाव आरएसएस की विचारधारा की ओर होने लगा था. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने कारपोरेट दुनिया को लुभाना शुरू किया.&#8217; पढ़ें सुपरिचित इतिहासकार एवं लेखक डॉ. राम पुनियानी का पूरा लेख&#8230; प्रसिद्ध इतिहासविद् &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;सन् 1978 में जनता पार्टी सरकार में आडवानी के सूचना प्रसारण मंत्री बनने के बाद से ही मीडिया का झुकाव आरएसएस की विचारधारा की ओर होने लगा था. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने कारपोरेट दुनिया को लुभाना शुरू किया.&#8217; पढ़ें सुपरिचित इतिहासकार एवं लेखक डॉ. राम पुनियानी का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>प्रसिद्ध इतिहासविद् रामचंद्र गुहा के &#8216;स्क्राल&#8217; में हालिया प्रकाशित लेख &#8220;गांधी फैमिली हेस हेल्पड मोदी टू कन्सालीडेट हिस पावर&#8221; में पिछले दस से ज्यादा सालों में मोदी-भाजपा की ताकत में बढ़ोत्तरी का अत्यंत उथला विश्लेषण किया गया है. </p>



<p>कांग्रेस में परिवारवाद के बारे में गुहा जो कह रहे हैं उसमें खास दम नहीं है क्योंकि भाजपा सहित अन्य दलों में भी यह उतनी ही तेजी से फल-फूल रहा है. राहुल गांधी द्वारा मुद्दों को निरंतर न उठाने के लिए उनकी आलोचना में कुछ तथ्य हो सकता है लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि राहुल गाँधी ने भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस और उसकी हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति &#8211; जो हमारे लोकतंत्र को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं &#8211; के खतरों के बारे में देश को लगातार आगाह किया है. राहुल भले ही राजनीति में अपनी मां के कहने पर कूदे हों लेकिन यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि अब उनकी मां उनका मार्गदर्शन नहीं कर रहीं हैं. वे राष्ट्रीय राजनीति के लगभग सभी किरदारों से संवाद कर चुके हैं. अपनी शानदार भारत जोड़ो यात्राओं के दौरान उन्होंने पूरे देश को अपनी आंखों से देखा और लोगों से मुलाकातें की. उनकी बहन प्रियंका संभवतः उनसे बेहतर हिंदी वक्ता हैं लेकिन किसी आंदोलन या पार्टी का नेतृत्व करने की क्षमता का आंकलन सिर्फ इस आधार पर नहीं किया जा सकता. यह हो सकता है कि राहुल कुछ चमचों से घिरे हों. पर निश्चित ही वे फैसले लेते समय अपने दिमाग का इस्तेमाल करते हैं और शायद वे अपने संगठन को मज़बूत करने के लिए गांधी, नेहरू और अंबेडकर के सिद्धातों में आस्था रखने वाली अपेक्षाकृत युवा टीम तैयार कर रहे हैं.</p>



<p>क्या गांधी परिवार के कारण मोदी को देश को अपने शिकंजे में लेने में मदद मिली है? मोदी को सत्ता हासिल करने और आर्थिक एवं विदेश नीति संबंधी असफलाओं के बावजूद सत्ता पर काबिज रह आने के लिए जिन कारकों से मदद मिली है, उनकी ओर गुहा को ध्यान देना चाहिए.</p>



<p>मोदी आरएसएस के प्रशिक्षित प्रचारक हैं और उन्हें अटलबिहारी वाजपेयी ने तब गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया था जब उनके पास न तो इस पद को संभालने के लिए ज़रूरी अनुभव था और ना ही उन्होंने ऐसी कोई अनोखी योग्यता या क्षमता प्रदर्शित की थी. आरएसएस की हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा उनकी रग-रग में प्रवाहित होती है. गुजरात में गोधरा ट्रेन आगजनी के बहाने किए गए अल्पसंख्यकों के कत्लेआम के ज़रिये सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर उन्होंने गुजरात में अपनी ताकत बढ़ाई. पूरा संघ परिवार मजबूती से उनके पीछे खड़ा रहा. जब अटलबिहारी वाजपेयी ने जुहापुरा शरणार्थी शिविर का दौरा करने के बाद मोदी को राजधर्म का पालन करने की हिदायत दी, तब उन्होंने अत्यंत रूखे स्वर में जवाब दिया कि वे यही कर रहे हैं. वाजपेयी उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री के पद से हटाना चाहते थे मगर लगभग पूरी भाजपा ने मोदी का साथ दिया और वाजपेयी को गुजरात नरसंहार को नजरअंदाज करने पर मजबूर होना पड़ा.</p>



<p>मोदी ने अत्यंत चालाकी से इशारों-इशारों में मुसलमानों के खिलाफ लगातार टिप्पणियां कीं जिससे आरएसएस की हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति को बढ़ावा मिला. आरएसएस ही वह शक्ति थी जिसने मोदी का केन्द्र की सत्ता पर काबिज होना सुनिश्चित किया. जिन्ना पर की गई टिप्पणियों के चलते लालकृष्ण आडवानी से संघ की नाराजगी से भी मोदी को आरएसएस का आशीर्वाद हासिल करने में मदद मिली. कटसराज मंदिर का उद्घाटन करने के लिए पाकिस्तान गए आडवानी, जिन्ना की मजार पर भी गए और उन्होंने कहा कि जिन्ना का पाकिस्तान की संविधानसभा में 11 अगस्त 1947 को दिया गया भाषण धर्मनिरपेक्षता को सर्वोत्तम ढंग से परिभाषित करता है. जिन्ना ने उस भाषण में कहा था कि अब जबकि पाकिस्तान बन चुका है, सभी धार्मिक समुदायों को अपने-अपने धर्म का पालन करने की पूरी आजादी है.</p>



<p>2014 के चुनाव मोदी के जीवन में एक मील का पत्थर थे. इन चुनाव के पहले मोदी की छवि चमकाने के लिए सरकारी खर्च पर एपीसीओ नामक संस्था की सेवाएं लीं गईं जिससे वे एक करिश्माई व्यक्ति नज़र आने लगे. रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुओं के दाम कम करने, हर खाते में 15 लाख रूपये देने और हर साल दो करोड़ रोजगार देने के उनके वायदों का जादुई प्रभाव हुआ, खासकर जन लोकपाल की नियुक्ति के लिए चलाए गए अन्ना-केजरीवाल आंदोलन की पृष्ठभूमि में. इस आंदोलन का उद्देश्य कांग्रेस को बदनाम कर मोदी की सफलता की राह साफ़ करना था.</p>



<p>सत्ता पर काबिज होने के बाद मोदी ने सभी सरकारी एजेंसियों जैसे ईडी, इनकम टैक्स और सीबीआई को अपना पालतू तोता बना लिया और विपक्ष को नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. एजेंसियों के दुरूपयोग और बाद में न्यायपालिका के अनुकूल रवैये के साथ-साथ आरएसएस के प्रशिक्षित स्वयंसेवकों और संघ के हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रोपेगेंडा की भी उन्हें मजबूती देने में अहम् भूमिका रही. सन् 1978 में जनता पार्टी सरकार में आडवानी के सूचना प्रसारण मंत्री बनने के बाद से ही मीडिया का झुकाव आरएसएस की विचारधारा की ओर होने लगा था. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने कारपोरेट दुनिया को लुभाना शुरू किया. मीडिया ने न केवल मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया बल्कि बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने प्रमुख टीवी चैनलों और मीडिया के अन्य संस्थानों को खरीदने का सिलसिला शुरू कर दिया. मोदी ने सोशल मीडिया और आईटी सेल का भी भरपूर उपयोग किया और मीडिया संस्थान मोदी के चरणों में दण्डवत हो गए.</p>



<p>गोएबेल्स मार्का प्रोपेगेंडा और दमन के ज़रिये मोदी सामूहिक सामाजिक नजरिए को अपने पक्ष में करने में सफल रहे.अपनी कामयाबी दुहराने के लिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सभी का सहारा लिया. निर्वाचन आयोग पूरी तरह प्रधानमंत्री के नियंत्रण में आ गया क्योंकि निर्वाचन आयुक्तों का चयन करने वाली समिति में मुख्य न्यायाधीश (या उनके प्रतिनिधि) की जगह एक केबिनेट मंत्री को रखने का प्रावधान कर दिया गया. निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका के सहयोगी बनने के साथ ही रही सही कसर भी पूरी हो गई. ईव्हीएम के दुरूपयोग का मुद्दा पहले से ही था. मतदान के आंकड़ों का विश्लेषण कर तीस्ता सीतलवाड और पर्कला प्रभाकर ने यह साबित किया है कि 78 लोकसभा सीटें गलत तरीके अपनाकर जीती गईं. अब एसआईआर के जरिए गैर-भाजपा मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटाए जा रहे हैं और इस तरह नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जा रहा है. पश्चिम बंगाल में 91 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटा दिए गए और 27 लाख मतदाताओं के मामलों का ठीक से पुनर्परीक्षण नहीं किया गया. नतीजा हमारे सामने है.</p>



<p>मोदी के सशक्त होने के मूल कारणों को नजरअंदाज करते हुए गुहा केवल राहुल की विदेश यात्राओं, प्रियंका की बेहतर हिन्दी और सोनिया गांधी के अभी भी निर्णायक भूमिका निभाने और राहुल के केवल उनके निर्देशों का चुपचाप पालन करने जैसे छोटे-मोटे मुद्दों को उछाल रहे हैं. इसे घटिया विश्लेषण ही कहा जा सकता है. मोदी के सत्ता में आने और उस पर काबिज रहने की मुख्य वजहें गांधी परिवार या अन्य विपक्षी दलों की कमजोरी नहीं बल्कि कुछ और हैं. हालांकि यह सच है कि आरएसएस की राजनीति और उसके प्रोपेगेंडा का मुकाबला विपक्ष ने ठीक से नहीं किया है. मंदिर का ध्वंस, जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन, गौमांस और लव जिहाद जैसे भावनात्मक मुद्दों को पूरी दम से मुकाबला नहीं किया गया और इसी वजह से हिन्दू राष्ट्रवादी मोदी मजबूत हुए हैं. विपक्ष, और खासतौर से गांधी परिवार, को निश्चित ही अपने तौर-तरीकों में बदलाव लाना होगा. लेकिन मोदी के सशक्त होने की मुख्य वजह समाज में आरएसएस की जबरदस्त घुसपैठ है.</p>



<p><strong>-डॉ. राम पुनियानी</strong> (लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)</p>



<p>अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया.</p>



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		<title>अनुशासन या सरकारी शिकंजा ? क्यों यूपी के विश्वविद्यालयों में ड्रेस कोड लागू करना चाहती है बीजेपी सरकार ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/discipline-or-government-clampdown-why-does-the-bjp-government-want-to-implement-dress-code-in-up-universities-read-roshni-rawats-full-article-on-adahan-patriya/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Roshni Rawat]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 04 Jun 2026 08:43:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;मंत्री योगेंद्र उपाध्याय जिस &#8221; सकारात्मकता , समरसता , अनुशासन और संस्कारित माहौल&#8221; की बात कर रहें हैं आखिर उसका क्या अर्थ है ? क्या यह सकारात्मकता और समरसता सबसे पहले उन राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखनी चाहिए जहाँ से &#8221; गोली मारो सालों को &#8221; जैसे हिंसक और सांप्रदायिक नारे लगाये जाते हैं ?&#8217; &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;मंत्री योगेंद्र उपाध्याय जिस &#8221; सकारात्मकता , समरसता , अनुशासन और संस्कारित माहौल&#8221; की बात कर रहें हैं आखिर उसका क्या अर्थ है ? क्या यह सकारात्मकता और समरसता सबसे पहले उन राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखनी चाहिए जहाँ से &#8221; गोली मारो सालों को &#8221; जैसे हिंसक और सांप्रदायिक नारे लगाये जाते हैं ?&#8217; पढ़ें रोशनी रावत का पूरा आलेख…</strong></p>



<p>बीते दिनों उत्तर प्रदेश शासन‌ की ओर से एक कठोर और मनमाना आदेश जारी किया गया। 20 मई को एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अनिवार्य रूप से ड्रेस कोड लागू करने की बात कही। जिसके तुरंत बाद उ०प्र० उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने &#8221; गुणवत्तापरक शिक्षा, सकारात्मक, अनुशासित और संस्कारित माहौल &#8221; का हवाला देते हुए अनिवार्य ड्रेस कोड लागू करने का फरमान जारी कर दिया । बीजेपी सरकार के इस आदेश के बाद विपक्षी पार्टियों की तीखी प्रतिक्रिया देखनी मिली । हालांकि प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों पर जितनी चालाकी से सरकार शिकंजा कसने की कोशिश कर रही है, उसके विरोध में न तो विपक्षी पार्टियां ही उतरीं या न छात्र &#8211; संगठन । गौरतलब है कि यह आदेश ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने में एक साल से भी कम समय बचा है ।</p>



<p>दरअसल उच्च शिक्षण संस्थानों में अनिवार्य रूप से ड्रेस कोड लागू कर देना जितना सरल दिखता है उतना है नहीं। यह स्पष्ट रूप से  संस्थानों को नियंत्रित करने, युवाओं की अभिव्यक्ति की आजादी छीनने और सांस्कृतिक विवधता को खत्म करने की साजिश है। यूनिवर्सिटीज़ और कॉलेज हमेशा‌ से देश के सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के गढ़ रहे हैं। औपनिवेशिक काल से लेकर स्वातंत्र्योत्तर भारत की राजनीति में उच्च शिक्षण संस्थानों के युवाओं का शासन-प्रशासन की नीतियों के समर्थन और विरोध-प्रदर्शनों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप रहा‌ है। देश के सभी वर्तमान राजनीतिक दलों में एक हिस्सा‌ उन नेताओं का भी है जो इन्हीं कॉलेजों से पॉलिटिक्स करते हुए मंत्रालयों की गद्दी तक पहुंचे हैं।</p>



<p>ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अनिवार्य ड्रेस कोड सामाजिक- राजनीतिक चेतना से युक्त युवाओं को गुड-बॉय/गुड गर्ल बनाकर उन्हें बौद्धिक रूप से कमजोर करने की साजिश है? मंत्री योगेंद्र उपाध्याय जिस &#8221; सकारात्मकता , समरसता , अनुशासन और संस्कारित माहौल&#8221; की बात कर रहें हैं आखिर उसका क्या अर्थ है ? क्या यह सकारात्मकता और समरसता सबसे पहले उन राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखनी चाहिए जहाँ से &#8221; गोली मारो सालों को &#8221; जैसे हिंसक और सांप्रदायिक नारे लगाये जाते हैं ? और इस &#8220;अनुशासन&#8221; शब्द की क्या परिभाषा होगी? यह &#8221; संस्कारित माहौल &#8221; क्या हो सकता है ? क्या अब युवाओं की शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ बच्चों की तरह पढ़ना और डिग्री लेकर कहीं नौकरी पाना रह जाएगा ? क्या उनके आलोचनात्मक विचारों को क्षीण कर उन्हें &#8220;अनुशासित छात्र&#8221; भर बना दिया जाएगा , जिनके पास न तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी ,‌न प्रशासनिक नीतियों की आलोचना की आजादी । क्योंकि &#8220;सकरात्मकता&#8221; और &#8220;अनुशासन&#8221; जैसे सब्जेक्टिव शब्दों की कोई सर्वमान्य और सर्वव्यापक परिभाषा तो‌ है‌ नहीं। ऐसे में यह कैसे तय होगा कि छात्रों के लिए क्या अनुशासन है क्या नहीं? क्या प्रशासनिक नीतियों का विरोध अनुशासनहीनता में आयेगा कि‌ नहीं? इन प्रश्नों का‌ उत्तर कौन देगा?</p>



<p>तार्किक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो उच्च शिक्षण संस्थानों में  संरचनात्मक सुधारों, प्राध्यापकों के रिक्त पदों की भर्ती, कॉलेजों में लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का उद्देश्य पूरा हो‌ सकता है। इसके लिए ड्रेस कोड लागू कर यूनिवर्सिटीज और कॉलेज-विशेष के छात्रों को अलग से चिह्नित करने की आवश्यकता नहीं थी। देश-विदेश में कुछ गिने-चुने प्रोफेशनल कोर्सेज को छोड़कर कहीं भी इस तरह का ड्रेस कोड लागू नहीं है । ऐसे में जब  बीजेपी के शीर्ष नेता भारत के विश्वविद्यालयों की तुलना अमेरिका और ब्रिटेन के आधुनिक , लोकतांत्रिक, स्वतंत्र,  चेतनायुक्त और प्रगतिशील विश्वविद्यालयों से करते‌ हैं और देश‌ के विश्वविद्यालयों को उन जैसा‌ बनाने का वादा‌ करते हैं , तो यह सिर्फ एक झूठ और भ्रामक प्रचार भर लगता है।</p>



<p><strong>-रोशनी रावत</strong>,</p>



<p>लेखिका लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं। </p>



<p></p>
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		<title>डॉ. राम पुनियानी का लेख- क्यों फिर से गाय पर शुरू हुई राजनीतिक बहस ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/why-has-the-political-debate-started-again-over-the-cow-read-renowned-historian-and-author-dr-ram-puniyani-s-full-article-on-adahan-magazine/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 Jun 2026 15:50:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;गुजरात के एक अन्य प्राध्यापक ने बेजोड़ शोध कर बताया कि गौमूत्र में सोना होता है. सोने की आसमान छूती कीमतों के बीच यह कितनी राहत पहुंचाने वाली बात है! मुस्लिम समुदाय के सामूहिक फैसले पर वापिस आएं, तो इससे पहचान की राजनीति का नतीजा गरीब किसानों को भुगतना पड़ रहा है.&#8217; पढ़ें प्रसिद्ध इतिहासकार &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>&#8216;गुजरात के एक अन्य प्राध्यापक ने बेजोड़ शोध कर बताया कि गौमूत्र में सोना होता है. सोने की आसमान छूती कीमतों के बीच यह कितनी राहत पहुंचाने वाली बात है! मुस्लिम समुदाय के सामूहिक फैसले पर वापिस आएं, तो इससे पहचान की राजनीति का नतीजा गरीब किसानों को भुगतना पड़ रहा है.&#8217; पढ़ें प्रसिद्ध इतिहासकार एवं लेखक डा. राम पुनियानी का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>चुनाव आयोग की चालबाजियों और न्यायपालिका की अनदेखी के चलते भाजपा, पश्चिम बंगाल में सत्ता पर काबिज होने में कामयाब रही. इससे राज्य के मुस्लिम अल्पसंख्यक जबरदस्त दहशत में हैं. सरकार ने हर जिले में नजरबंदी केन्द्रों का निर्माण प्रारंभ कर दिया है जिनमें बांग्लादेश के कथित घुसपैठियों को रखा जाएगा और अन्य कई बातों के अतिरिक्त, छत्रपति शिवाजी महाराज के एक विशाल स्मारक के निर्माण की बात कही है. जिस मुद्दे पर राज्य की हिन्दू आबादी अत्यंत बेचैन है वह है गाय-गोमांस के नाम पर मुसलमानों की लिंचिंग का अभियान. ईद नजदीक आने के साथ ही हिन्दू अपने गाय-बैलों को बेचने के लिए बाजार में लाए किंतु यह देखकर उन्हें बहुत निराशा हुई कि वहां गोवंश का एक भी खरीददार नहीं था. मुसलमानों ने सामूहिक रूप से यह फैसला ले लिया था कि वे ईद पर इन पशुओं की कुर्बानी नहीं देंगे. जमात-ए-इस्लामी-ए-हिन्द के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी से लेकर असादुदीन ओवैसी जैसे राजनीतिज्ञों तक, मुस्लिम समुदाय के ज्यादातर नेताओं ने मांग की है कि गाय को बाघ की जगह राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए.</p>



<p>बाजारों में गोवंश के पशुओं को बेचने आए हिन्दुओं से मुसलमान कह रहे हैं कि ये तुम्हारी मां हैं और इन्हें तुम अपने घर पर रखो. कई गरीब किसान इन जानवरों को ईद के अवसर पर बेचने के लिए पालते हैं ताकि उन्हें इनकी अच्छी कीमत मिल सके और इस आमदनी से उन्हें अपना जीवनयापन करने में सहायता मिले. वे हताश हैं क्योंकि उस आमदनी का इस्तेमाल करने की जो भी योजना उन्होंने बना रखी थी, वह मिट्टी में मिलती नजर आ रही है. मुस्लिम समुदाय और मुस्लिम संगठनों ने गाय-गोमांस के बहाने बड़े पैमाने पर मुसलमानों की लिंचिंग की घटनाएं देखी हैं, खासतौर से पिछले 12 सालों के दौरान. मोहम्मद अखलाक से लेकर मोहम्मद जुनैद तक, पिछले कुछ सालों में 100 से अधिक लिचिंग की घटनाएं हुई हैं. इंडियास्पेन्ड के आंकड़ों से पता चलता है कि 2014 से 2018 के बीच गाय से जुड़ी हिंसा में 46 मुसलमान और दलित मारे गए.</p>



<p>हमें याद है कि गुजरात के ऊना में मृत गायों को उनकी खाल उतारने के लिए ले जा रहे चार दलितों को बेरहमी से पीटा गया था. इसके बाद युवा दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने गायों की खरीद-फरोख्त को रोकने का अभियान चलाया और दलितों को भूमि आवंटित किए जाने की मांग की. गौरक्षकों द्वारा बनाया गया यह माहौल, जिसे सत्ताधारियों का संरक्षण और संघ परिवार की वैचारिक सहमति हासिल है, अत्यंत भयावह है. कई आचार्यों ने यह तक कहा कि एक गाय के जीवन का मूल्य कई मनुष्यों के जीवन से ज्यादा है. बाबा रामदेव ने गाय से जुड़े उत्पादों को बढ़ावा दिया और गौमूत्र तक बेचकर अच्छी-खासी रकम कमाई. संबित पात्रा, जो भाजपा के प्रमुख प्रवक्ता हैं, ने दावा किया कि गाय का गोबर हीरे से अधिक मूल्यवान है. उल्लेखनीय है कि वे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में स्नातकोत्तर हैं.</p>



<p>गुजरात के एक अन्य प्राध्यापक ने बेजोड़ शोध कर बताया कि गौमूत्र में सोना होता है. सोने की आसमान छूती कीमतों के बीच यह कितनी राहत पहुंचाने वाली बात है! मुस्लिम समुदाय के सामूहिक फैसले पर वापिस आएं, तो इससे पहचान की राजनीति का नतीजा गरीब किसानों को भुगतना पड़ रहा है. देखना होगा कि हिन्दुत्ववादी सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का पवित्र निर्णय लेती है या नहीं. ऐसा होने बहुत से उन गैर-मुस्लिम व्यापारियों को नुकसान झेलना पड़ेगा जो गोमांस के निर्यात से जुड़े हुए हैं. गोमांस के प्रमुख निर्यातक हिंदू और जैन समुदायों के अभिजात वर्ग के हैं. अल कबीर एक्सपोर्ट्स प्राईवेट लिमिटेड भारत में मांस और गोमांस के सबसे बड़े निर्यातकों में से एक हैं. इनका तेलंगाना में बहुत बड़ा बूचड़खाना है. कई सूचनाओं के मुताबिक इस इकाई का मालिक सबरवाल परिवार है. अरेबियन एक्सपोर्ट्स प्राईवेट लिमिटेड बंबई का एक बड़ा मांस निर्यातक है. कई पीढ़ियों से सुनील कपूर परिवार इसका स्वामी भी है और प्रबंधन भी करता आ रहा है. एम. के. आर. फ्रोजन फुड एक्सपोर्ट्स प्राईवेट लिमिटेड, जिसका मुख्यालय दिल्ली में है, के पंजाब में कई पशुवध गृह हैं. इस कंपनी का प्रबंधन मदन एबोट प्राईवेट लिमिटेड करता है जिसका मुख्यालय चंडीगढ़ में है और इसके मालिकों में अन्यों के अलावा ए. एस. बिन्द्रा परिवार भी है.</p>



<p>इसके अलावा मांसाहार को भी बुरा बताया जा रहा है. हम जानते हैं कि गोवा, उत्तर-पूर्व और केरल में गोमांस का सेवन बड़े पैमाने पर किया जाता है. भारत में लगभग 77 प्रतिशत जनता मांसाहारी है (83.4 प्रतिशत पुरुष और 70.6 प्रतिशत महिलाएं) जो नियमित रूप से मांस, मछली या मुर्गा खाती है. तटीय इलाकों में मछली और अन्य स्थानों पर मुर्गा और मटन आदि खाया जाता है. कई लोगों का दावा है कि ब्राम्हण मांसाहारी नहीं होते. कश्मीरी पंडित मटन के व्यंजनों का सेवन मजे से करते है. कश्मीरी व्यंजनों का सरताज रोगन जोश मटन का अत्यंत खुशबूदार व्यंजन है. बिहार में भी ब्राह्मण अन्य मांसहारी व्यंजनों के अतिरिक्त खासतौर से मटन का सेवन करते हैं.</p>



<p>जानबूझकर फैलाई जाने वाली इन बातों, जिन्होंने आम धारणाओं का रूप ले लिया है, से सच्चाई बहुत अलग है. ये बातें इसलिए फैलाई जाती हैं ताकि यह कुतर्क दिया जा सके कि मुसलमान मुख्यतः मांसहारी होते हैं और इसी वजह से इतने हिंसक होते हैं. बंगाल में चुनावों के दौरान, जिसमें भाजपा और ममता बनर्जी के बीच मुख्य मुकाबला था, ममता ने कहा था कि यदि भाजपा सत्ता में आई तो माछ-भात जो पसंदीदा बंगाली व्यंजन है, मिलना मुश्किल हो जाएगा. इसके जवाब में ‘गोली मारो‘ वाले नारे के लिए कुख्यात पूर्व केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने माछ-भात खाते हुए अपना वीडियो जारी किया और कहा कि भाजपा के राज में मांसाहार पर कोई पाबंदी नहीं लगाई जाती. खानपान एक चुनावी मुद्दा बन गया है, यह तब एक बार फिर साबित हुआ जब हमारे नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री ने बंगाल के लोगों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए झालमूडी (मुख्यतः चावल से बनने वाला एक स्थानीय व्यंजन) खाया.</p>



<p>हम अपने राजनैतिक अभियानों में इतने नीचे गिर गए हैं कि हम असहाय अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने का प्रयास कर रहे हैं. पश्चिम बंगाल के उदाहरण से यह समझा जा सकता है कि साम्प्रदायिक राजनीतिज्ञ चुनाव जीतने के लिए कितनी ज्यादा नीचता पर उतारू हो सकते हैं. न केवल चुनाव आयोग बल्कि व्यापक सामाजिक सोच भी बहुत विकृत हो चुकी है. जहां अल्पसंख्यक पीड़ा और अभाव के बीच छटपटा रहे हैं वहीं साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले नेता माछ-भात और झालमूडी का आनंद ले रहे हैं, और साथ ही हिंसक प्रवृत्तियों और खान पान की आदतों के बीच बेतुका संबंध कायम करने का प्रोपेगेंडा कर रहे हैं. यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि मानव जाति के इतिहास में सबसे बड़ा नरसंहार करने वाला एडोल्फ हिटलर अपने जीवन के उत्तरार्ध में शाकाहारी बन गया था.</p>



<p>बड़े पैमाने पर की गई हेराफेरी के माध्यम से हासिल की गई इन जीतों के शोरगुल के बीच ये हिन्दुत्ववादी नेता यह भी भूल जाते हैं कि स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका (शेक्सपियर क्लब, पासाडेना, केलीर्फोनिया, यूएसए, 2 फरवरी 1900) में &#8220;बौद्ध भारत‘ विषय पर दिए गए अपने व्याख्यान में कहा था &#8220;यदि मैं आपको बताऊं तो आप भौचक्के रह जाएंगे कि प्राचीन परंपराओं के अनुसार वह व्यक्ति एक अच्छा हिंदू नहीं है जो गोमांस का सेवन नहीं करता. कुछ विशिष्ट अवसरों पर उसे बैल की बलि देनी ही चाहिए और उसका सेवन करना चाहिए‘‘ {विवेकानंद, द कम्पलीट वर्क्स ऑफ़ स्वामी विवेकानंद, खंड 3 (कलकत्ताः अद्वैत आश्रम, 1997) पृष्ठ 563}.</p>



<p>इस सबसे बढ़कर, हिन्दू राष्ट्रवाद के जनक, विनायक दामोदर सावरकर ने कहा था कि गाय एक पवित्र पशु नहीं है बल्कि एक उपयोगी पशु है! </p>



<p><strong>-डा. राम पुनियानी</strong></p>



<p><strong>(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)</strong></p>



<p>(यह लेखक के निजी विचार हैं )</p>



<p></p>
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		<title>राजनीति में जो गाय जिंदा है,वह जमीन पर मर रही है!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 May 2026 04:44:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;जैसलमेर की वे तस्वीरें किसी सभ्य समाज के चेहरे पर कालिख की तरह चिपक जानी चाहिए थीं. गर्मी,भूख,प्यास, लापरवाही और सिस्टम की संवेदनहीनता ने उन्हें मार डाला,लेकिन यह देश अजीब है.यहां गाय की लाश पर राजनीति होती है,गाय के जीवन पर नहीं.&#8217; पढ़ें सुपरिचित सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी का पूरा आलेख&#8230; देश में गाय इन &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;जैसलमेर की वे तस्वीरें किसी सभ्य समाज के चेहरे पर कालिख की तरह चिपक जानी चाहिए थीं. गर्मी,भूख,प्यास, लापरवाही और सिस्टम की संवेदनहीनता ने उन्हें मार डाला,लेकिन यह देश अजीब है.यहां गाय की लाश पर राजनीति होती है,गाय के जीवन पर नहीं.&#8217; पढ़ें सुपरिचित सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p>देश में गाय इन दिनों सबसे ज्यादा राजनीति में जीवित है और सबसे ज्यादा जमीन पर मर रही है.जैसलमेर की वे तस्वीरें किसी सभ्य समाज के चेहरे पर कालिख की तरह चिपक जानी चाहिए थीं,जिनमें एक किलोमीटर तक सड़ी हुई गायों के शव बिखरे पड़े हैं. पांच सौ से ज्यादा गायें मर गईं.गर्मी,भूख,प्यास, लापरवाही और सिस्टम की संवेदनहीनता ने उन्हें मार डाला,लेकिन यह देश अजीब है.यहां गाय की लाश पर राजनीति होती है,गाय के जीवन पर नहीं.</p>



<p>जिन लोगों ने वर्षों तक &#8216;गौ माता&#8217; के नाम पर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ीं,वही लोग आज इन सड़ती हुई गायों पर खामोश हैं.कभी गोहत्या के नाम पर लोगों को पीट पीट कर मार दिया गया.कभी किसी मुस्लिम,दलित,घुमंतू या पशुपालक को &#8216;गौ तस्कर&#8217; बताकर मॉब लिंचिंग कर दी गई.कभी ट्रकों को रोका गया,कभी डेयरी वालों को धमकाया गया,कभी चमड़ा मजदूरों को अपमानित किया गया.</p>



<p>गाय बचाने के नाम पर इंसान मारे गए और अब गायें खुद मर रही हैं.पूछिए उन तथाकथित गौरक्षकों से कि अब वे कहां हैं?<br>किस गौशाला में हैं? किस रेगिस्तान में पानी पिला रहे हैं? किस डंपिंग यार्ड में सड़ती गायों को कंधा दे रहे हैं? दरअसल यह धार्मिक आस्था नहीं,राजनीतिक कारोबार है.अगर गाय सचमुच आस्था का विषय होती तो देश में पशु चिकित्सा व्यवस्था मजबूत होती.चरागाह बचाए जाते.पशुपालकों को सहयोग मिलता.</p>



<p>आवारा पशुओं के लिए वैज्ञानिक नीति बनती.लेकिन यहां गाय को जीवित प्राणी नहीं,चुनावी प्रतीक बना दिया गया.जिस देश में किसान अपनी बूढ़ी गाय छोड़ने को मजबूर हो जाए,जहां पशुपालक चारे और पानी के लिए तरस जाएं,जहां हजारों गोवंश कूड़े में मरें.वहां गौ रक्षा का शोर एक क्रूर मजाक लगता है.</p>



<p>पश्चिम बंगाल में बकरीद के लिए पशु खरीद पर रोक लगाने की राजनीति हो या उत्तर भारत में गौरक्षा के नाम पर हिंसा,असल मकसद धार्मिक ध्रुवीकरण है.गाय अब पशु नहीं रही,राजनीतिक हथियार बना दी गई है.उसके नाम पर समाज को बांटो,भीड़ को भड़काओ,नफरत पैदा करो और चुनाव जीत लो.यह वही राजनीति है जिसमें गाय की रक्षा कम,सत्ता की रक्षा ज्यादा होती है.गौरक्षक या सड़कछाप गिरोह?</p>



<p>देश ने पिछले वर्षों में देखा है कि कैसे स्वयंभू गौरक्षक कानून से ऊपर खड़े हो गए.वे गाड़ियां रोकते हैं,पहचान पूछते हैं,मारपीट करते हैं,वीडियो बनाते हैं, जयकारे लगाते हैं.भीड़ अदालत बन जाती है.शक सबूत बन जाता है और हत्या राष्ट्रभक्ति घोषित कर दी जाती है.</p>



<p>यह कानून का राज नहीं,भीड़ का जंगलराज है.सबसे बड़ा पाखंड यही है,जो लोग गाय के नाम पर इंसानों की हत्या को जायज ठहराते हैं,वे ही हजारों गायों की मौत पर चुप रहते हैं.जैसलमेर की तस्वीरें पूछ रही हैं कि क्या गाय केवल नारे में पवित्र है? क्या उसकी कीमत सिर्फ तब तक है,जब तक उससे राजनीति हो सकती है?अगर सचमुच गाय माता है,तो उसका यह अपमान किस श्रेणी में आएगा?</p>



<p>भारत का संविधान कानून के शासन की बात करता है,लेकिन गौरक्षा की राजनीति ने कई जगह कानून को भीड़ के हवाले कर दिया.आज जरूरत इस बात की है कि मॉब लिंचिंग पर कठोर कानून बने.स्वयंभू गौरक्षक गिरोहों पर कार्रवाई हो.पशुपालकों को सुरक्षा मिले.गोशालाओं और पशु संरक्षण का वैज्ञानिक ढांचा विकसित हो और सबसे जरूरी बात यह है कि धर्म के नाम पर हिंसा की राजनीति बंद हो.</p>



<p>गाय को बचाना है तो पहले इंसानियत बचानी होगी.नफरत से न गाय बचेगी,न समाज.जिस देश में गाय के नाम पर आदमी मार दिया जाए और गाय खुद कूड़े में सड़ती मिले,वहां समस्या धर्म की नहीं,राजनीति की है.सच यह है कि गाय आज राजनीति में पूजी जा रही है और जमीन पर मर रही है.</p>



<p>-भंवर मेघवंशी</p>



<p></p>
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		<title>नेहरू के पुण्य स्मरण के बहाने ‘भारतीयता’ की खोज !</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 27 May 2026 15:09:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;बहुत मुमकिन है देश ने तब महसूस नहीं किया हो और हक़ीक़त रही हो कि नेहरू द्वारा प्रतिपादित ‘भारतीयता’ के अंतर्वस्त्र 27 मई 1964 के दिन उनके निधन के बाद से ही तार-तार होना शुरू हो गए थे और अब इतने सालों के बाद हम अपने आपको अंदर और बाहर से अलग-अलग दिखाई पड़ते परेशान &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;बहुत मुमकिन है देश ने तब महसूस नहीं किया हो और हक़ीक़त रही हो कि नेहरू द्वारा प्रतिपादित ‘भारतीयता’ के अंतर्वस्त्र 27 मई 1964 के दिन उनके निधन के बाद से ही तार-तार होना शुरू हो गए थे और अब इतने सालों के बाद हम अपने आपको अंदर और बाहर से अलग-अलग दिखाई पड़ते परेशान हो रहे हैं।&#8217; पढें वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>शायद यही सही समय है पूछे जाने का कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आज़ादी के पहले अहमदनगर क़िले के कारावास के दौरान अपनी महान रचना ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ के ज़रिए जिस प्राचीन ‘भारत’ और ‘भारतीयता’ की खोज की थी वह क्या अब अप्रासंगिक और ग़ैर-ज़रूरी हो गई है ? सत्तारूढ़ बीजेपी और संघ के सपनों के ‘नए भारत’ के निर्माण के लिए क्या किसी नई भारतीयता की तलाश या फिर उसका आविष्कार आवश्यक हो गया है ?</p>



<p>कोई तो कारण अवश्य ही रहा होगा कि नेहरू को आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है ! सवाल खड़े किए जा रहे हैं कि जिस ‘भारतीयता’ से नेहरू ने देश का साक्षात्कार कराया था वह तात्कालिक परिस्थितियों की देन थी। वे स्थितियाँ अब प्रासंगिक नहीं रहीं हैं। उक्त ‘धर्मसंकट’ एक ऐसे समय उपस्थित हुआ है जब ‘भारतीयता’ की अलग-अलग व्याख्याओं पर बुद्धिजीवियों और धर्मगुरुओं के बीच चल रहे संघर्षों के बीच नागरिक अपने प्राणों की रक्षा के लिए रास्ते तलाश रहे हैं !</p>



<p>असली ‘भारतीयता’ क्या है उसे समझाने की हाल के सालों की पहली असफल कोशिश कोई सात साल पहले एक ऑनलाइन फ़ूड डिलीवरी कंपनी ने की थी। उस कोशिश के अंतिम परिणाम इंडिकेटर थे कि 2026 में ‘भारतीयता’ अपने किस स्वरूप में प्रकट होने वाली है ! वे तमाम लोग जो इस समय जो चल रहा है को लेकर चिंतित हैं उन्होंने भी उन इंडिकेटरों को पढ़ने से इनकार कर दिया था।</p>



<p>ऑनलाइन फ़ूड डिलीवरी कंपनी ने अपने एक ग्राहक के ऑर्डर को उसकी केवल इस आपत्ति पर निरस्त कर उसे रिफ़ंड देने से इंकार कर दिया था कि डिलीवरी बॉय ग़ैर-हिन्दू है। न सिर्फ़ इतना ही ! कंपनी के संस्थापक ने इस तरह का ट्वीट करके कट्टरपंथियों के बीच हल्ला मचा दिया था कि :’ खाने का कोई धर्म नहीं होता ! ख़ाना ख़ुद एक धर्म है ! ‘भारतीयता’ के विचार और अपने ग्राहकों और सहयोगियों की विविधता पर हमें गर्व है !’</p>



<p>फ़ूड डिलीवरी वाले मामले में जब ‘डिलीवरी बॉय’ को बदलने की माँग करने वाले व्यक्ति की पहचान सार्वजनिक हो गई तो उसने भी साफ़-साफ़ कह दिया कि कंपनी को उसकी व्यक्तिगत पसंद के प्रति सहमति व्यक्त करना चाहिए थी।’अगर आपको किसी दुकान से लाल रंग की क़मीज़ चाहिए तो वही मिलनी चाहिए ,काली नहीं ! मेरी अपनी भी धार्मिक स्वतंत्रता है ! मुझे भी अपनी धार्मिक स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति और आज़ादी का अधिकार है।’</p>



<p>बताया गया था कि उक्त विवाद के बाद ग्राहक के ट्विटर अकाउंट पर फ़ॉलोवर्स की संख्या में कई गुना वृद्धि हो गई।कुछ धार्मिक और राजनीतिक संगठन भी उसके पक्ष में खड़े हो गए। ग्राहक के समर्थकों ने इस स्वदेशी फ़ूड डिलीवरी कंपनी के ख़िलाफ़ उसकी प्रतिद्वंद्वी ‘विदेशी’ फ़ूड डिलीवरी कंपनी को अपना समर्थन देना प्रारंभ कर दिया।</p>



<p>बहुत मुमकिन है देश ने तब महसूस नहीं किया हो और हक़ीक़त रही हो कि नेहरू द्वारा प्रतिपादित ‘भारतीयता’ के अंतर्वस्त्र 27 मई 1964 के दिन उनके निधन के बाद से ही तार-तार होना शुरू हो गए थे और अब इतने सालों के बाद हम अपने आपको अंदर और बाहर से अलग-अलग दिखाई पड़ते परेशान हो रहे हैं।</p>



<p>हम शायद स्वीकारने के लिये तैयार नहीं होंगे कि अपने होने या अपनी असली पहचान को लेकर इस समय किसी अंधेरी सुरंग से गुज़र रहे हैं। हमें जानकारी नहीं है कि हमारे आगे कौन चल रहा है और पीछे कितने लोग हैं ! अंधेरों में भी हमने नक़ाबें पहन रखी हैं। हम अपनी यात्राएँ भी बदले हुए नामों से कर रहे हैं। इतिहास जब बदला जाने लगता है तो नागरिक भी अपने नाम,ठिकाने और धारणाएँ बदल लेते हैं। सत्ताएँ तब ‘भारतीयता’ के मूल की खोज बंद करके उन व्यक्तियों की सूचियाँ बनाने में जुट जाती है जिन्हें वह ‘भारतीय’ नागरिक मानती है। डिलीवरी बॉय ने तब जो कहा था आज भी उतना ही सच है कि :’मेरे साथ ऐसा पहले भी हो चुका है । हम ग़रीब लोग हैं ! ऐसी चीजें सहन करना पड़ेगी।’</p>



<p><strong>-श्रवण गर्ग</strong></p>



<p></p>
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