<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>विचार-विमर्श Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
	<atom:link href="https://adahanpatrika.com/category/thoughts/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://adahanpatrika.com/category/thoughts/</link>
	<description>साहित्य, विचार और जन आंदोलन</description>
	<lastBuildDate>Mon, 19 Oct 2026 07:18:25 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=7.1</generator>

<image>
	<url>https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/cropped-WhatsApp-Image-2026-06-04-at-18.28.09-32x32.jpeg</url>
	<title>विचार-विमर्श Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
	<link>https://adahanpatrika.com/category/thoughts/</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>स्त्रीद्वेषी समाज का अंतिम हथियार है चरित्र-हनन!</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/character-assassination-is-the-last-weapon-of-a-misogynistic-society-article-by-roshni-rawat/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Roshni Rawat]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Oct 2026 07:18:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#abp news]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#aisa]]></category>
		<category><![CDATA[#cjp]]></category>
		<category><![CDATA[#delhi]]></category>
		<category><![CDATA[#delhi protest]]></category>
		<category><![CDATA[#feminisim]]></category>
		<category><![CDATA[#indian media]]></category>
		<category><![CDATA[#misogynist society]]></category>
		<category><![CDATA[#neha bora]]></category>
		<category><![CDATA[#neha singh rathor]]></category>
		<category><![CDATA[#ravikant]]></category>
		<category><![CDATA[#roshni rawat]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=708</guid>

					<description><![CDATA[<p>‘नेहा सिंह राठौर के साथ जो हुआ वह न‌ सिर्फ हमारे समाज की गंदी मानसिकता को उजागर करता है बल्कि इस समय पतनोन्मुख मुख्यधारा की पत्रकारिता के स्त्री-विरोधी चरित्र का भी पर्दाफाश करता है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी स्त्री के साथ ऐसा हुआ है.’ पढ़ें पूरा आलेख… पितृसत्तावादी समाज को जब &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/character-assassination-is-the-last-weapon-of-a-misogynistic-society-article-by-roshni-rawat/">स्त्रीद्वेषी समाज का अंतिम हथियार है चरित्र-हनन!</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>‘नेहा सिंह राठौर के साथ जो हुआ वह न‌ सिर्फ हमारे समाज की गंदी मानसिकता को उजागर करता है बल्कि इस समय पतनोन्मुख मुख्यधारा की पत्रकारिता के स्त्री-विरोधी चरित्र का भी पर्दाफाश करता है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी स्त्री के साथ ऐसा हुआ है.’ पढ़ें पूरा आलेख…</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">पितृसत्तावादी समाज को जब एक बेखौफ स्त्री चुनौती देती है , तब उसे चुप कराने की हर संभव कोशिशों के बाद समाज का अंतिम हथियार उस स्त्री का चरित्र-हनन होता है. हालही में प्रसिद्ध लोक गायिका और राजनीतिक व्यंग्यकार नेहा‌ सिंह राठौर के साथ भी यही हुआ जब देश के एक बड़े मीडिया चैनल ने नीचता की सारी हदें पार करते हुए उनके विषय में सेक्स रैकेट चलाने जैसी भ्रामक खबर चलाई. नेहा सिंह राठौर की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद सोशल मीडिया पर दो-तीन दिन जमकर हंगामा मचा. और भले उस मीडिया चैनल ने अब नेहा से माफी मांग ली हो पर एक प्रश्न ज्यों का त्यों है कि आखिर कब तक समाज में स्त्रियों को अपनी हक की आवाज़ उठाने के बदले ऐसे चरित्र-हनन सहने पड़ेंगे? इस प्रश्न की जटिलता इसी से समझी जा सकती है कि जब नेहा जैसी जानी-मानी सोशल मीडिया इंफ्ल्यूएंसर का ऐसा चरित्र-हनन हो सकता है,‌ तब उन स्त्रियों की क्या स्थिति होगी जो सिर्फ अपने परिवार-गली-मुहल्ले और गांव-शहर तक सीमित है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">समय बदला , समाज बदला , विचार बदले और तकनीकी बदली पर एक चीज़ कॉन्स्टेंट रही &#8211; स्त्रियों का चरित्र हनन! कभी उन्नीसवीं शताब्दी में स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखने के लिए अफ़वाहें उड़ाई जातीं थीं कि पढ़ी-लिखी स्त्रियां अपने पति को पशु बना कर अपना गुलाम बना लेती हैं. आज एक स्वतंत्र महिला को कभी वेश्या तो कभी इससे मिलती-जुलती ही कोई उपमा या विशेषण देकर चरित्र-हनन किया जाता है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">वैसे भी हमारे देश में स्त्रियों का चरित्र-हनन कोई नयी बात नहीं है. सीता से लेकर मीरा तक कोई स्त्री इससे बच नहीं सकी. आधुनिक युग में भी अस्सी के दशक के बाद शुरु हुए स्त्री-विमर्श को &#8216; देह-विमर्श&#8217; का नाम दे डाला गया और इन लेखिकाओं को भी कभी &#8216;कुलटा&#8217; तो कभी &#8216;बदचलन&#8217; तो कभी ऐसे ही कुछ और शब्दों से नवाज़ा गया. कुल मिलाकार हमारा समाज कभी स्त्रियों का अंतर्मन समझ ही नहीं पाया, न उसने समझने की कोशिश की, उसे सिर्फ देह से मतलब था , उसे वही दिखी , उसी पर छींटाकशी भी की गई, उसी से प्रेम भी किया गया.</p>



<p class="wp-block-paragraph">बहरहाल , नेहा सिंह राठौर के साथ जो हुआ वह न‌ सिर्फ हमारे समाज की गंदी मानसिकता को उजागर करता है बल्कि इस समय पतनोन्मुख मुख्यधारा की पत्रकारिता के स्त्री-विरोधी चरित्र का भी पर्दाफाश करता है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी स्त्री के साथ ऐसा हुआ है. इससे पहले जबसे आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा अपनी राजनीतिक छवि के साथ लाइमलाइट में आई हैं , उनके ऊपर पर अश्लील कमेंट करने वालों की सोशल मीडिया पर बाढ़ आ गई है. बस फर्क इतना है कि नेहा राठौर के साथ यह घटिया हरकत करने वाला एक मीडिया संस्थान है जबकि नेहा बोरा पर व्यक्तिगत रूप से लोग कीचड़ उछालते रहते है. दरअसल हमारे समाज में यह इतना नॉर्मलाइज हो गया कि शायद लोगों की कॉन्शियसनेस को यह हिट ही नहीं करता है. इसका सीधा कारण यह है कि इस देश का पितृसत्तावादी समाज हमेशा से स्त्री-द्वेषी रहा है. इसलिए ऐसी कोई घटना उसे भीतर से झकझोर नहीं पाती.</p>



<p class="wp-block-paragraph">जब-जब समाज  में कोई सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक या वैज्ञानिक परिवर्तन हुआ है , हम पाते हैं कि इसके दुष्प्रभावों में सबसे ज्यादा वल्नरेबल स्त्रियां ही रही हैं. इंटरनेट की लॉन्चिंग के बाद सोशल-मीडिया पर सबसे ज्यादा महिलाएं ही हिंसा की शिकार रही हैं. चाहे पिछले कुछ वर्षों में फेक आईडी बनाना हो या अब डीपफेक के इस्तेमाल‌ से फेक वीडियो वायरल करना. कहना ही‌ होगा कि इस‌ समय स्त्रियों के सामने दोहरी‌ चुनौती है. एक तरफ जहां हमारी जेन-जी लड़कियां सत्ता से लेकर साहित्य और समाज तक हर मोर्चे पर  खड़ी स्त्री-विरोधी ताकतों को डट कर चुनौती दे रहीं हैं वहीं दूसरी तरफ निजी जिंदगी के साथ-साथ सोशल मीडिया पर होने वाले ऐसे चरित्र-हनन को लेकर भी सशंकित, सतर्क और चिंतित हैं.</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>-रोशनी रावत</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/character-assassination-is-the-last-weapon-of-a-misogynistic-society-article-by-roshni-rawat/">स्त्रीद्वेषी समाज का अंतिम हथियार है चरित्र-हनन!</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>हिन्दी दिवस विशेष: हिन्दी आज भी पराई क्यों है?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/hindi-diwas-special-why-is-hindi-still-alien-today/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 14 Sep 2026 04:41:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#14 september]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi diwas]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#latest]]></category>
		<category><![CDATA[#national language]]></category>
		<category><![CDATA[#ravikant]]></category>
		<category><![CDATA[#sahitya]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=669</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;प्रतिवर्ष 14 सितंबर को सरकारी दफ्तरों, निकायों और महकमों में हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है। एक रस्मी उत्सव की तरह हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए संकल्प दोहराए जाते हैं। लेकिन अगले दिन से सब पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। सवाल उठता है कि हिंदी के प्रयोग में सफलता क्यों नहीं &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/hindi-diwas-special-why-is-hindi-still-alien-today/">हिन्दी दिवस विशेष: हिन्दी आज भी पराई क्यों है?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;प्रतिवर्ष 14 सितंबर को सरकारी दफ्तरों, निकायों और महकमों में हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है। एक रस्मी उत्सव की तरह हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए संकल्प दोहराए जाते हैं। लेकिन अगले दिन से सब पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। सवाल उठता है कि हिंदी के प्रयोग में सफलता क्यों नहीं मिली? गैर-हिंदी भाषी प्रांतों में हिंदी को स्वीकार्यता क्यों नहीं प्राप्त हुई?&#8217; पढ़ें रविकान्त का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8220;बच्चा किसके साथ अच्छी तरह से खेल सकता है, अपनी मां के साथ या पराई मां के साथ! अगर कोई आदमी किसी जबान के साथ खेलना चाहे और जबान का मजा तो तभी आता है, जब उसको बोलने वाला या लिखने वाला उसके साथ खेले, तो कौन हिंदुस्तानी है जो अंग्रेजी के साथ खेल सकता है? हिंदुस्तानी आदमी तेलुगू, हिंदी, उर्दू, बंगाली, मराठी के साथ खेल सकता है। उसमें नए-नए ढांचे बना सकता है। उसमें जान डाल सकता है, रंग ला सकता है। बच्चा अपनी मां के साथ जितनी अच्छी तरह से खेल सकता है, दूसरे की मां के साथ उतनी अच्छी तरह से नहीं खेल सकता।&#8221;- डा. राममनोहर लोहिया</p>



<p class="wp-block-paragraph">हिंदू राष्ट्र के हिमायती आज यूपी जैसे सूबे में अंग्रेजी को अनिवार्य बना रहे हैं। उग्र हिंदुत्व की राजनीति करने वाले शुद्ध हिंदी में संबोधन देते हैं, हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन सकी, गाहे-बगाहे यह सवाल भी दागते रहते हैं; लेकिन सरकारी कार्यालयों से लेकर शिक्षण संस्थानों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए उनके प्रयास सिफर हैं। दरअसल, हिंदू धर्म की तरह ही हिंदी भाषा की अस्मिता भी उनके लिए राजनीतिक प्रोपेगेंडा मात्र है। वास्तविकता यह है कि ये हुक्मरान ना हिंदी भाषा के प्रति ईमानदार हैं और ना वफादार।</p>



<p class="wp-block-paragraph">14 सितंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा हिंदी को राजभाषा बनाया गया। लेकिन इसमें एक शर्त जोड़ दी गई कि अगले 15 साल तक अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा। तर्क यह दिया गया कि इस दौरान हिंदी को समुन्नत बनाकर 26 जनवरी 1965 को अंग्रेजी के स्थान पर पूर्णरूप से लागू कर दिया जाएगा। इतिहास गवाह है कि यह तारीख आज तक नहीं आई। 1960 के दशक में बंगाल और दक्षिणी प्रांतों खासकर तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन हुए। नतीजे में 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित करके अंग्रेजी को सह राजभाषा का दर्जा दे दिया गया और यह प्रावधान किया गया कि गैर हिंदी भाषी प्रांतों की जब तक सहमति नहीं होती है, राजभाषा हिंदी को लागू नहीं किया जाएगा। यह व्यवस्था आज भी जारी है। 1976 के राजभाषा अधिनियम द्वारा भाषिक आधार पर भारत को क, ख, ग, तीन क्षेत्रों में विभाजित करके सरकारी कामकाज चल रहा है। दरअसल, अंग्रेजी का प्रयोग अनवरत जारी है। हिंदी की स्थिति अभी भी, प्रसिद्ध हिंदी कवि रघुवीर सहाय के शब्दों में &#8216;दुहाजू की बीवी&#8217; की तरह है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रतिवर्ष 14 सितंबर को सरकारी दफ्तरों, निकायों और महकमों में हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है। एक रस्मी उत्सव की तरह हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए संकल्प दोहराए जाते हैं। लेकिन अगले दिन से सब पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। सवाल उठता है कि हिंदी के प्रयोग में सफलता क्यों नहीं मिली? गैर-हिंदी भाषी प्रांतों में हिंदी को स्वीकार्यता क्यों नहीं प्राप्त हुई? राजभाषा हिंदी को लागू करने में सरकारी ढुलमुलपन का विरोध करते हुए समाजवादी डॉ राम मनोहर लोहिया ने सार्थक हस्तक्षेप किया। डॉक्टर लोहिया ने मुखरता से राजकाज की भाषा के रूप में अंग्रेजी के प्रयोग पर कड़ी आपत्ति की। इस वजह से आम तौर पर माना जाता है कि लोहिया अंग्रेजी के विरोधी थे। सच्चाई यह है कि लोहिया अंग्रेजी के विरोधी नहीं बल्कि हिंदी के समर्थक हैं। दरअसल, अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में डॉक्टर लोहिया किसी भाषा के विरोधी नहीं थे। वे हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं के भी उतने ही समर्थक थे। लोहिया अंग्रेजी भाषा के खिलाफ नहीं थे, बल्कि उसकी मानसिकता और सामंती स्वभाव के विरोधी थे। अंग्रेजी भाषा जन विरोधी है। देश के करोड़ों दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, किसानों, मजदूरों के लिए अंग्रेजी नुकसानदेह है। &#8216;सामंती भाषा बनाम लोक भाषा&#8217; निबंध में लोहिया ने लिखा है, &#8220;अंग्रेजी हिंदुस्तान को ज्यादा नुकसान इसलिए नहीं पहुंचा रही है कि वह विदेशी है बल्कि इसलिए कि भारतीय प्रसंग में वह सामंती है। आबादी का सिर्फ एक प्रतिशत छोटा सा अल्पमत ही अंग्रेजी में ऐसी योग्यता हासिल कर पाता है कि वह उसे सत्ता या स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करता है। इस छोटे से अल्पमत के हाथ में विशाल जनसमुदाय पर अधिकार और शोषण करने का हथियार है।&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ लोहिया ने हिंदी विरोधी आंदोलन को भी बहुत बारीकी से परखा। उनका स्पष्ट मानना है कि तटीय प्रदेशों में हिंदी का विरोध संपन्न वर्ग द्वारा किया गया। इस तबके ने तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम आदि भाषाओं को बढ़ाने और उनका समर्थन करने के बजाय हिंदी का विरोध करते हुए अंग्रेजी की वकालत की। दरअसल यह वर्ग मेहनतकश कमजोर वर्गों को यथास्थिति में रखने के लिए और अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए अंग्रेजी का समर्थन करता है। वस्तुतः हिंदी का विरोध भाषाई अस्मिता की राजनीति के जरिए अंग्रेजी पढ़े लिखे संपन्न वर्ग के हितों के संरक्षण और उनके वर्चस्व को कायम रखने के लिए किया गया। सरकारी कामकाज और देश स्तरीय परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता से हाशिए के तबकों को न तो न्याय मिल सकता है और ना ही सही अर्थ में जनतंत्र स्थापित हो सकता है। लोहिया ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है, &#8220;लोकभाषा के बिना लोकराज असंभव है। कुछ लोग यह गलत सोचते हैं कि उनके बच्चों को मौका मिलने पर वह अंग्रेजी में उच्च वर्ग जैसी ही योग्यता हासिल कर सकते हैं। सौ में एक की बात अलग है, पर यह असंभव है। उच्च वर्ग अपने घरों में अंग्रेजी का वातावरण बना सकते हैं और पीढ़ियों से बनाते आ रहे हैं। विदेशी भाषाओं के अध्ययन में जनता इन पुश्तैनी गुलामों का मुकाबला नहीं कर सकती।&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">जब हिंदी की जगह अंग्रेजी को राजभाषा पद पर बिठाया गया, तब यह तर्क दिया गया कि हिंदी समृद्ध नहीं है। उसके पास पारिभाषिक शब्दावली की कमी है। यही तर्क देशी भाषाओं के लिए दिया गया और पूरे देश में विदेशी अंग्रेजी भाषा को थोप दिया गया। यह बात सही है कि अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली की कमी है। लेकिन तमाम भारतीय भाषाओं के पास अंग्रेजी की अपेक्षा दो गुना शब्द भंडार है। हिंदी का प्रयोग करने और नई शब्दावली के निर्माण से इस कमजोरी को दूर किया जा सकता है। लोहिया ने &#8216;देशी भाषाएं बनाम अंग्रेजी&#8217; निबंध में लिखा, &#8220;जो लोग कहते हैं कि तेलुगू, हिंदी, उर्दू, मराठी गरीब भाषाएं हैं और आधुनिक दुनिया के लायक नहीं है उनको तो और इन भाषाओं के इस्तेमाल की बात सोचनी चाहिए, क्योंकि इस्तेमाल करते-करते ही भाषाएं धनी बनेंगी। जब मैं कभी इस तर्क को सुनता हूं,हिंदुस्तान में, तो बहुत आश्चर्य होता है कि मामूली बुद्धि के लोग भी कैसे इस बात को कह सकते हैं कि अंग्रेजी का इस्तेमाल करो क्योंकि तुम्हारी भाषाएं गरीब हैं। अगर अंग्रेजी का इस्तेमाल करते रह जाओगे तो तुम्हारी अपनी भाषाएं कभी धनी बन ही नहीं पाएंगी।&#8221; इसके लिए समय की नहीं बल्कि इच्छाशक्ति की जरूरत है। हिंदी का प्रयोग कैसे होगा? हमारी भाषा नीति क्या होनी चाहिए? डा. लोहिया ने अपना दृष्टिकोण पेश करते हुए लिखा है कि , &#8220;केंद्रीय सरकार की भाषा हिंदी होनी चाहिए। ठीक इसके बाद दस वर्ष के लिए दिल्ली केंद्रीय सरकार की गजटी नौकरियां गैर हिंदी लोगों के लिए सुरक्षित रहें। केंद्र का राज्यों से व्यवहार हिंदी में हो और जब तक कि वे हिंदी जान लें, केंद्र को अपनी भाषाओं में लिखें। स्नातकी तक की पढ़ाई का माध्यम अपनी मातृभाषा हो और उसके बाद का हिंदी। जिला जज व मजिस्टर अपनी भाषाओं में कार्यवाही कर सकते हैं, उच्च तथा सर्वोच्च न्यायालय में हिंदुस्तानी होनी चाहिए। जबकि लोकसभा में साधारणतः भाषण हिंदुस्तानी में हों लेकिन जो हिंदी ना जानते हों, वे अपनी भाषा में बोलें।&#8221; हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के प्रयोग संबंधी डा. लोहिया के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक है। लोहिया के रास्ते भाषा के मुद्दे को हल ही नहीं किया जा सकता है बल्कि राष्ट्रीयता को भी मजबूत किया जा सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/hindi-diwas-special-why-is-hindi-still-alien-today/">हिन्दी दिवस विशेष: हिन्दी आज भी पराई क्यों है?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>डॉ. राम पुनियानी का लेख- भारतीय समाज की पितृसत्ता के मूल में है धर्म‌सत्ता?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-is-religious-domination-at-the-root-of-patriarchy-in-indian-society/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 31 Aug 2026 07:21:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#patriarchy]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#rahul gandhi]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=661</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;भाजपा की तत्कालीन उपाध्यक्ष विजयाराजे सिंधिया संसद भवन तक एक जुलूस लेकर गईं जिसमें सती को एक गौरवशाली भारतीय परंपरा और महिलाओं का अधिकार बताने वाले नारे लगाए जा रहे थे. इसका दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने स्वयं अपने पति की मौत के बाद इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया.&#8217; पढ़ें सुपरिचित इतिहासकार डॉ. &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-is-religious-domination-at-the-root-of-patriarchy-in-indian-society/">डॉ. राम पुनियानी का लेख- भारतीय समाज की पितृसत्ता के मूल में है धर्म‌सत्ता?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;भाजपा की तत्कालीन उपाध्यक्ष विजयाराजे सिंधिया संसद भवन तक एक जुलूस लेकर गईं जिसमें सती को एक गौरवशाली भारतीय परंपरा और महिलाओं का अधिकार बताने वाले नारे लगाए जा रहे थे. इसका दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने स्वयं अपने पति की मौत के बाद इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया.&#8217; पढ़ें सुपरिचित इतिहासकार डॉ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">औपनिवेशिक काल से पहले के भारत में हिन्दू समुदाय अधिकांशतः मनुस्मृति के नियमों के अनुसार ही संचालित होता था, जिसका केन्द्रीय मूल्य था जाति एवं लिंग आधारित पदानुक्रम. औपनिवेशिक काल में शिक्षा, परिवहन के साधन एवं आधुनिक प्रशासनिक ढ़ांचा विकसित हुए और लोकतंत्र के बीज पड़े. ये बदलाव धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद की धारणा के अनुरूप थे, जिसके विभिन्न तत्व थे &#8211; कामगारों के अधिकारों के लिए संघर्ष, शिक्षा एवं उसके जरिए दलितों व महिलाओं का सशक्तिकरण और धर्म, जाति, भाषा और लिंग की सीमाओं के परे सभी की एकसमान नागरिकता की अवधारणा. इन सारी प्रक्रियाओं के खिलाफ खड़े थे कुलीन, जमींदार और पुरोहित वर्ग. जहां मोटे तौर पर लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों का प्रतिनिधि भगत सिंह, आंबेडकर और गांधी को माना जा सकता है वहीं इनके विरोधियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और आरएसएस.</p>



<p class="wp-block-paragraph">लोकतांत्रीकरण की जद्दोजहद में शामिल थे कामगारों के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आजादी के लिए आंदोलन और दलितों और महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर. जहां तक स्त्री शिक्षा की बात है, इसकी शुरूआत जोतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख ने की. सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख को अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए कैसी-कैसी कठिनाईयों से जूझना पड़ा, यह जगजाहिर है. आंबेडकर के संघर्ष में महिलाओं की अच्छी-खासी भागीदारी थी और गांधीजी के नेतृत्व में चले राष्ट्रीय आंदोलन में भी महिलाओं ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया था. इसके विरोधी कुलीन वर्गो ने इन सारी प्रक्रियाओं का विरोध किया, साथ ही इनके संगठन &#8211; मुस्लिम लीग और आरएसएस &#8211; मुख्यतः केवल पुरूषों के संगठन थे. हमारे संविधान में पुरूषों एवं स्त्रियों को समान अवसर और समान दर्जा देने का जो प्रावधान किया गया, वह अत्यंत उपयुक्त है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">जहां मुस्लिम लीग की विचारधारा के कारण पाकिस्तान में तबाही हुई, वहीं भारत में महिलाओं की समानता का सबसे प्रमुख विरोधी संगठन आरएसएस था. जब 1936 में लक्ष्मीबाई केलकर ने आरएसएस सरसंघचालक से महिलाओं को आरएसएस का सदस्य बनाए जाने का सुझाव दिया, तो उन्होंने इसे खारिज करते हुए उनसे राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना करने को कहा. यहां यह ध्यान देने योग्य है कि महिलाओं के संगठन के नाम &#8211; राष्ट्र सेविका समिति &#8211; में से ‘स्वयं’ शब्द गायब है. इसमें यह स्पष्ट संकेत निहित है कि महिलाओं को पुरूषों के अधीन रहना होगा. आरएसएस ने इस आधार पर भारतीय संविधान का भी विरोध किया कि इसमें गौरवशाली अतीत के मूल्यों को स्थान नहीं दिया गया है. अतीत के गौरवशाली मूल्यों से उनका आशय मनुस्मृति के मूल्यों से था इसमें कोई संशय नहीं है. आरएसएस हिन्दू कोड बिल के मूल प्रावधानों के पूर्णतः खिलाफ था जिसमें पिता की संपत्ति में महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिया गया था.</p>



<p class="wp-block-paragraph"><br>यह सारी बातें इसलिए मन में कौंध रही हैं क्योंकि राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज‘ कार्यक्रम (23 अगस्त 2026) को पुणे में केवल लड़कियों के लिए आयोजित किया गया था. हमारी आजादी के बाद के शुरूआती दशकों में महिलाओं और लड़कियों की समानता का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में बहुत से कदम उठाए गए लेकिन उसी काल में विभिन्न तरीकों से हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा को प्रबल करने के प्रयास भी हुए. इसका एक औजार थी गीता प्रेस, जिसने मनुस्मृति पर आधारित पुस्तकों का प्रकाशन दसियों लाख प्रतियों में किया. इस विचारधारा के बहुत से अन्य संगठनों ने अपनी कथनी और करनी के जरिए भी इस दिशा में कार्य किया.</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमें याद है कि रूपकुंवर को उनके पति की चिता पर जिंदा जला दिया गया था. जहां ज्यादातर समूहों, संगठनों एवं राजनैतिक दलों ने इस त्रासद घटना की निंदा की थी, जो पूर्णतः उचित था, वहीं भाजपा की तत्कालीन उपाध्यक्ष विजयाराजे सिंधिया संसद भवन तक एक जुलूस लेकर गईं जिसमें सती को एक गौरवशाली भारतीय परंपरा और महिलाओं का अधिकार बताने वाले नारे लगाए जा रहे थे. इसका दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने स्वयं अपने पति की मौत के बाद इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया! इसी तरह भाजपा महिला मोर्चा की पूर्व प्रमुख मृदुला सिन्हा ने सेवी पत्रिका के अप्रैल 1994 के अंक में प्रकाशित एक साक्षात्कार में कहा था कि महिलाओं को घर के बाहर जाकर काम नहीं करना चाहिए, जब तक कि ऐसा करना एकदम जरूरी न हो. उन्होंने पत्नियों के साथ मारपीट किए जाने और दहेज प्रथा को भी सही ठहराया था.</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुणे के आयोजन में राहुल गांधी ने महिलाओं की बातें सुनीं, जिन्होंने अपनी सुरक्षा, शिक्षा हासिल करने और स्वयं से जुड़े फैसले खुद लेने की राह में आने वाली बाधाओं, विभिन्न सामाजिक दबावों और एक पूर्ण नागरिक का जीवन जीने की राह में चुनौतियों की चर्चा की. राहुल गांधी ने इस कार्यक्रम को समाज सुधार के आह्वान में बदल दिया. यह महिलाओं की समानता के पक्ष में सामाजिक प्रक्रियाओं को मोड़ने का एक बड़ा प्रयास था. इस दिशा में संघर्षरत महिला समूहों को इस कार्यक्रम के भाव और संदेश से बहुत मदद मिलेगी.</p>



<p class="wp-block-paragraph">आज के भारत में संघ परिवार न केवल भारतीय संविधान के मूल्यों को कमजोर करने का प्रयास कर रहा है बल्कि महिलाओं एवं दलितों के संबंध में प्रतिगामी सामाजिक सोच को भी बढ़ावा दे रहा है. जहां उसके द्वारा ईसाईयों और मुसलमानों के खिलाफ फैलाई जा रही नफरत साफ नजर आती है वहीं वह महिलाओं के संबंध में मनुस्मृति के मूल्यों को तरजीह देने में जुटा हुआ है, जिसकी चर्चा पुणे के कार्यक्रम में हुई. राहुल गांधी ने इसके तीन स्पष्ट उदाहरण दिए. पहला, डॉ. मोहन भागवत का वह वक्तव्य जिसमें उन्होंने कहा था कि दुष्कर्म इंडिया में होते हैं भारत में नहीं. स्पष्टतः भारत से उनका आशय ग्रामीण क्षेत्रों से था, जो संविधान के मूल्यों की ओर ले जाने वाली प्रक्रियाओं से अपेक्षाकृत अप्रभावित रहे हैं. वे दलित और आदिवासी महिलाओं के साथ होने वाली दुष्कर्म की घटनाओं से अनजान होने का दिखावा कर रहे थे.</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल गांधी ने हिन्दू राष्ट्रवादियों की विचारधारा के केन्द्रबिन्दु का खुलासा करके बिल्कुल ठीक किया. उन्होंने सही कहा कि संघ परिवार मनुस्मृति का अनुमोदन करता है जिसके अनुसार लड़की को बचपन में अपने पिता, वयस्क होने पर पति और विधवा हो जाने पर अपने पुत्र के नियंत्रण में रहना होगा. राहुल गांधी का यह कथन एकदम सही था कि लड़कियों का अपना ‘सेल्फ’ होना चाहिए जिसकी कार्यक्रम में उपस्थित लड़कियों ने सराहना की.</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह कार्यक्रम महिलाओं की समानता के लिए चल रहे संघर्ष में एक मील का पत्थर बनना चाहिए. कार्यक्रम का संदेश बड़ा एवं स्पष्ट है. इसमें लड़कियों के अरमानों को अत्यंत बेबाकी से बयां किया गया. ‘राजनैतिक‘ शब्द के सामान्य मायनों से अलग रहते हुए, राहुल गांधी ने गहन सामाजिक स्तर पर अपना पक्ष रखा और उस सामाजिक ढांचे के बारे में बात की जिसे महिलाओं की समानता की खातिर संघर्ष के जरिए बदला जाना होगा. लड़कियों ने यह विचार भी व्यक्त किया कि वे आजादी, गरिमा और समानता से रह सकें, इसके लिए लड़कों को भी बदलना होगा. वे मानव जाति का आधा हिस्सा हैं, आधा भारत हैं, जिसे हिन्दू राष्ट्रवादी मानसिकता ने जकड़ा हुआ है. इसमें बदलाव लाना और भारतीय संविधान के मूल्यों को सशक्त करना जरूरी है. यह एक और वजह है कि जिसके कारण संघ परिवार के बढ़ते प्रभुत्व को चुनौती दी जानी चाहिए. </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>(अंग्रेजी से रूपांतरण-अमरीश हरदेनिया )</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-is-religious-domination-at-the-root-of-patriarchy-in-indian-society/">डॉ. राम पुनियानी का लेख- भारतीय समाज की पितृसत्ता के मूल में है धर्म‌सत्ता?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>80वां स्वतंत्रता दिवसः किस दिशा में जा रहा है हमारा लोकतंत्र?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/80th-independence-day-which-direction-is-our-democracy-heading/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 Aug 2026 07:08:36 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#democracy]]></category>
		<category><![CDATA[#dr ram puniyani]]></category>
		<category><![CDATA[#freedom struggle]]></category>
		<category><![CDATA[#independence day]]></category>
		<category><![CDATA[#indian history]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=650</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;पिछले कुछ दशकों में भारतीय दक्षिणपंथ के उदय के साथ आरएसएस और उसके कुनबे ने राष्ट्र की दिशा और उसके लक्ष्यों को बदल दिया है। हिन्दू धर्म के नाम पर मनमाने ढंग से राजनीति की जा रही है जिससे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उभरा &#8220;आईडिया ऑफ इंडिया&#8221; कमजोर हुआ है।&#8217; पढ़ें सुप्रसिद्ध इतिहासकार डाॅ. राम &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/80th-independence-day-which-direction-is-our-democracy-heading/">80वां स्वतंत्रता दिवसः किस दिशा में जा रहा है हमारा लोकतंत्र?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;पिछले कुछ दशकों में भारतीय दक्षिणपंथ के उदय के साथ आरएसएस और उसके कुनबे ने राष्ट्र की दिशा और उसके लक्ष्यों को बदल दिया है। हिन्दू धर्म के नाम पर मनमाने ढंग से राजनीति की जा रही है जिससे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उभरा &#8220;आईडिया ऑफ इंडिया&#8221; कमजोर हुआ है।&#8217; पढ़ें सुप्रसिद्ध इतिहासकार डाॅ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="349" height="408" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM.jpeg" alt="डाॅ. राम पुनियानी" class="wp-image-652" style="width:155px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM.jpeg 349w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM-257x300.jpeg 257w" sizes="(max-width: 349px) 100vw, 349px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">भारत की स्वतंत्रता हमारे लोगों के ब्रिटिश-विरोधी जनसंघर्ष की बहुत बड़ी सफलता थी। आजादी की लड़ाई में सभी धर्मों, जातियों और लिंगों के लोगों और विभिन्न भाषा-भाषियों ने भाग लिया। इस संघर्ष में स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय के मूल्य हमारे मार्गदर्शक थे। भगत सिंह जैसे लोगों ने जाति और वर्ग की सीमाओं के परे सभी लोगों के अधिकारों और आजादियों पर जोर दिया। अम्बेडकर ने जाति और वर्ण की दीवारें तोड़ने और सभी लोगों की समानता (सामाजिक न्याय) को सर्वाधिक महत्व दिया। और गांधी, जो संघर्ष के सबसे महत्वपूर्ण नेता थे, का जोर बंधुत्व पर था। नए उभरते वर्गों &#8211; उद्योगपति, व्यापारी, कामगार, महिलाओं और आदिवासियों &#8211; ने इन नेताओं का साथ दिया। ये तीन महानायक आधुनिक राज्य के तीन मुख्य स्तंभों का प्रतिनिधित्व करते थे और उन्होंने स्वाधीन भारत को गहरे तक प्रभावित किया। स्वतंत्रता आंदोलन के यही मूल्य भारतीय संविधान का आधार हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">औद्योगिकरण, संचार साधनों के विकास और आधुनिक शिक्षा के चलते सशक्त हुए नए उभरते वर्गों ने एक ऐसे देश का सपना देखा जिसमें समावेशी राष्ट्रवाद के रास्ते शांति एवं उन्नति सुनिश्चित होगी। मौटे तौर पर देश का वर्गीय विभाजन यही था, हालांकि इसके कुछ अपवाद भी थे। आधुनिक भारत की पक्षधर इन ताकतों के विरोध में खड़े थे समाज के अस्त होते वर्ग, जिनमें शामिल थे पुराने राजा, नवाब और जागीरदार और समाज का प्रभुत्वशाली तबका जो जाति एवं लिंग पर आधारित ऊंच-नीच के सामंती मूल्यों में आस्था रखता था। इन वर्गों में पितृसत्तात्मकता जड़ें जमाए हुए थी और वे राजशाही और सामंतशाही के मूल्यों के बोलबाले वाले दौर का यशोगान करते थे। इन वर्गों के ज्यादातर लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध किया और भारत के प्राचीन &#8220;गौरवशाली अतीत&#8221; का महिमामंडन करते रहे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उन्होंने आगे बढ़ते हुए भी पीछे जाने की तरकीबें निकाली। ये तरकीबें जमींदारों, राजाओं आदि के जरिए आईं। वे कामगारों, दलितों, महिलाओं और आदिवासियों को आवाज मिलने से भयभीत थे। वे अपने-अपने धर्मों के शासकों और उनके काल के सामाजिक मूल्यों को सर्वश्रेष्ठ बताते थे। मुस्लिम लीग को मुख्यतः नवाबों और जमींदारों का साथ हासिल था जबकि हिन्दू महासभा-आरएसएस को राजाओं, जमींदारों और पुरोहित वर्गों का समर्थन मिल रहा था। ये दोनों वर्ग लोकतांत्रिक समाज के उभरते हुए मूल्यों, सभी की आधुनिक शिक्षा तक पहुंच और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के विरोधी थे। ये वर्ग धर्म को राष्ट्र का आधार मानते थे, जिसे सावरकर ने अपनी पुस्तक &#8220;हिन्दुत्व ऑर हू इज अ हिन्दू&#8221; में स्पष्ट शब्दों में अभिव्यक्त किया है। ये दोनों प्रवृत्तियां राष्ट्रीय आंदोलन के ब्रिटिश-विरोधी संघर्ष के खिलाफ थीं, जो बहुत दुखद था। धर्म के आधार पर देश का बंटवारा भारतीय राष्ट्रवाद पर सबसे बड़ा आघात था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">संविधानसभा देश की विविधता का प्रतिनिधित्व करती थी। मनुस्मृति का दहन करने वाले अम्बेडकर को संविधान का मसौदा तैयार करने वाली महत्वपूर्ण समिति का अध्यक्ष बनाया गया। संविधान के तैयार होने के कुछ ही समय बाद आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर’ ने इस आधार पर संविधान की तीखी आलोचना की कि उसमें मनुस्मृति के प्राचीन मूल्यों को कोई जगह नहीं दी गई है। इन तत्वों ने आंबेडकर और नेहरू की तस्वीरों को जलाया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">स्वतंत्र भारत को गांधीजी के दो पक्के चेलों &#8211; नेहरू और पटेल &#8211; का नेतृत्व मिला। जहां पटेल ने अधिकांश राजे-रजवाड़ों का भारत में सफलतापूर्वक विलय करवाया वहीं नेहरू ने संविधान के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करते हुए आधुनिक भारत के स्वप्न को साकार करने हेतु बनाई गई योजनाओं को अमली जामा पहनाया। &#8216;एक व्यक्ति एक मत&#8217; के सिद्धांत पर सफलतापूर्वक अमल किया गया और नेहरू की लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता, जो एक तरह से जुड़वां हैं, के प्रति गहन आस्था के चलते देश में लोकतंत्र की जड़ें गहराई तक जम गईं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नेहरू के आधुनिक शिक्षा (आईआईटी, आईआईएम, एम्स आदि), सार्वजनिक क्षेत्र और सिंचाई के साधनों के निर्माण पर जोर और आरक्षण की नीति पर अमल से एक हद तक समानता कायम हुई। कुछ दशकों पहले भारत और पाकिस्तान की स्थिति की तुलना करने वाले कुछ टिप्पणीकारों का कहना था कि शिक्षा, औद्योगिकरण आदि के क्षेत्रों में भारत की सफलताओं और पाकिस्तान की असफलता के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन इसकी एक मुख्य वजह यह थी कि भारत को जवाहरलाल नेहरू का नेतृत्व हासिल था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पिछले कुछ दशकों में भारतीय दक्षिणपंथ के उदय के साथ आरएसएस और उसके कुनबे ने राष्ट्र की दिशा और उसके लक्ष्यों को बदल दिया है। हिन्दू धर्म के नाम पर मनमाने ढंग से राजनीति की जा रही है जिससे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उभरा &#8220;आईडिया ऑफ इंडिया&#8221; कमजोर हुआ है। जो लोग स्वाधीनता आंदोलन में अपने घरों से बाहर नहीं निकले और आजादी की लड़ाई और समावेशिता और समानता के उसके मूल्य का विरोध करते रहे, वे अब देश पर काबिज हैं। नतीजे में देश का विकास अवरूद्ध हो गया है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाई जा रही है जिससे हमारे समाज से बंधुत्व का भाव गायब हो रहा है। हाल में परीक्षा प्रणाली की असफलता के मुद्दे पर चलाए गए आंदोलन की सफलता ने निश्चित तौर पर वर्तमान सरकार के अहंकार को कुछ हद तक तोड़ा है मगर हिन्दुत्व राष्ट्रवादियों की दिशा और उनके लक्ष्य अब भी वही हैं। हमारे देश की प्रजातांत्रिक आत्मा और भारतीय संविधान के मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए एक कठिन और लंबे संघर्ष की जरूरत है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">संघ परिवार ने समाज में नफरत के बीज बो दिए हैं। उसने राज्यतंत्र के सभी हिस्सों में घुसपैठ कर ली है। संघ परिवार की सरकारों की नीतियों के कारण जो असंतोश पैदा हो रहा था उसने हाल में कॉकरोच आंदोलन का स्वरूप ले लिया। इस आंदोलन से यह सुनिश्चित हुआ कि ‘‘निर्वाचित तानाशाह’’ सरकार का डर कुछ समय के लिए ही सही मगर कम हुआ। मगर आरएसएस के कुनबे ने देश को जो गहरे घाव दिए हैं उन्हें भरने में वक्त लगेगा। उन्होंने देश की राजनीति को गहरे तक प्रभावित किया है। हमें हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्ध इस सरकार की जगह भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध और समर्पित सरकार चाहिए। नफरत फैलाने वाले झूठे नैरेटिव ने हमारी सामूहिक सोच पर कब्जा जमा लिया है। उनका मुकाबला उन नैरेटिव से किया जाना चाहिए जो भारतीयों के बीच सदियों से व्याप्त प्रेम, भाईचारे और दोस्ताना संबंधों पर आधारित हों, उन नैरेटिव से जिन्हें सुभाषचन्द्र बोस, महात्मा गांधी, सरदार पटेल और पंडित नेहरू ने भारतीयों के मानस में बिठाने का प्रयास किया था। जंतर मंतर में पिछले दिनों जो हुआ वह भारत की सदियों पुरानी सभ्यता को पुनर्जीवित करने की दिशा में पहला कदम था। इसी पुनर्जीवन से हमें दुनिया के देशों में अपना उचित स्थान हासिल होगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अल्पसंख्यकों के साथ ‘समान नागरिक’ के रूप में व्यवहार किया जाना चाहिए। सरकार की तानाशाही खत्म होनी चाहिए और हमें तार्किक और वैज्ञानिक आधारों पर राष्ट्र निर्माण का काम फिर से शुरू करना चाहिए। जंतर मंतर एक शुरूआत भर है। गांधी और आंबेडकर, भगत सिंह और सुभाष बोस, मौलाना आजाद और सरदार पटेल के सपनों को पूरा करने के लिए हमें अभी एक लंबा रास्ता तय करना है। आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/80th-independence-day-which-direction-is-our-democracy-heading/">80वां स्वतंत्रता दिवसः किस दिशा में जा रहा है हमारा लोकतंत्र?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>गालियों का भी अपना समाजशास्त्र रहा है- प्रियदर्शन</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/even-abuses-have-had-their-own-sociology-priyadarshan/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Aug 2026 06:21:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#civilisation]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#priyadarshan]]></category>
		<category><![CDATA[#protest]]></category>
		<category><![CDATA[#society]]></category>
		<category><![CDATA[#writer]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=575</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;सभ्यता और भाषा का रिश्ता बहुत अन्योन्याश्रित है- एक-दूसरे पर निर्भर। भाषा ने सभ्यता बनाई, सभ्यता ने भाषा बनाई। लेकिन सभ्यता की बसावट में सिर्फ़ सुंदर घर नहीं होते, नालियां भी होती हैं, गटर भी होते हैं जिनसे गंदगी बाहर निकलती है। ये नालियां न हों तो पूरा घर गटर में बदल जाए। गालियां शायद &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/even-abuses-have-had-their-own-sociology-priyadarshan/">गालियों का भी अपना समाजशास्त्र रहा है- प्रियदर्शन</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;सभ्यता और भाषा का रिश्ता बहुत अन्योन्याश्रित है- एक-दूसरे पर निर्भर। भाषा ने सभ्यता बनाई, सभ्यता ने भाषा बनाई। लेकिन सभ्यता की बसावट में सिर्फ़ सुंदर घर नहीं होते, नालियां भी होती हैं, गटर भी होते हैं जिनसे गंदगी बाहर निकलती है। ये नालियां न हों तो पूरा घर गटर में बदल जाए। गालियां शायद ऐसी ही नालियों का काम करती हैं- उनसे कई बार हमारे भीतर की घृणा निकल आती है, हम कुछ स्वस्थ हो जाते हैं। गालियों की तुक नालियों से यों ही नहीं मिलती।&#8217; पढ़ें सुपरिचित लेखक प्रियदर्शन का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image is-style-default">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img decoding="async" width="421" height="488" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-05-at-11.42.21-AM.jpeg" alt="लेखक प्रियदर्शन" class="wp-image-577" style="aspect-ratio:0.8627557241566184;width:147px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-05-at-11.42.21-AM.jpeg 421w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-05-at-11.42.21-AM-259x300.jpeg 259w" sizes="(max-width: 421px) 100vw, 421px" /><figcaption class="wp-element-caption">लेखक प्रियदर्शन</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">गालियां नहीं देनी चाहिए- यह हम सब जानते हैं। लेकिन कभी न कभी हम सब गाली देते रहे हैं और सुनते भी रहे हैं। गालियां भी भाषा से ही निकली हैं। जिस भाषा ने हंसने, रोने, उदास होने, प्रेम करने, चोट खाने, मरहम लगा का ने के लिए हमें अनगिनत शब्द दिए, उसी भाषा ने हमें हमारी घृणा, हमारी जुगुप्सा, किसी के प्रति हमारी चिढ़ प्रगट करने के लिए गालियां भी विकसित कीं। इन गालियों के केंद्र में स्त्रियां क्यों हैं, मांएं-बहनें क्यों हैं? क्योंकि जिस समाज ने ये गालियां विकसित कीं, उसे यह एहसास था कि मां-बहन के नाम पर की जाने वाली चोट सबसे मर्मांतक चोट होती है। यानी इनमें इरादा जितना मां-बहन के अपमान का नहीं, उससे ज़्यादा उस व्यक्ति को आहत करने का होता है जिसे गालियां दी जाती हैं।<br>सभ्यता और भाषा का रिश्ता बहुत अन्योन्याश्रित है- एक-दूसरे पर निर्भर। भाषा ने सभ्यता बनाई, सभ्यता ने भाषा बनाई। लेकिन सभ्यता की बसावट में सिर्फ़ सुंदर घर नहीं होते, नालियां भी होती हैं, गटर भी होते हैं जिनसे गंदगी बाहर निकलती है। ये नालियां न हों तो पूरा घर गटर में बदल जाए। गालियां शायद ऐसी ही नालियों का काम करती हैं- उनसे कई बार हमारे भीतर की घृणा निकल आती है, हम कुछ स्वस्थ हो जाते हैं। गालियों की तुक नालियों से यों ही नहीं मिलती।<br>गालियों का भी अपना समाजशास्त्र रहा है। गालियां एक ही होती हैं, लेकिन उनके अर्थ बोलने वाले की हैसियत के हिसाब से बदलते रहते हैं। कई बार गालियां दबंग लोगों के विशेषाधिकार की सूचक होती हैं। ताकतवर आदमी कमज़ोर आदमी को गाली देता है- ज़मींदार अपने कारकून को, बॉस अपने कर्मचारी को। कई बार ये गालियां अपनी विफलता, अपनी अयोग्यता, अपने अन्याय को छुपाने के लिए भी जा जाती हैं और कई बार दूसरों को दिखाने के लिए कि उनके वर्चस्व को कोई चुनौती देगा तो वह गाली खाएगा। फिर गालियां तो बिल्कुल इस संघर्ष का पहला रूप होती हैं, अगले रूप ज़्यादा हिंसक और विध्वंसक होते हैं।<br>गालियां कमज़ोर भी देते हैं- अपने गुस्से में, अपनी हताशा में, अपनी बेबसी में- ज़्यादातर वे पीठ पीछे देते हैं। इन गालियों में लाचारी बोलती है- गाली देने के अलावा कुछ न कर सकने की टीस। कई बार लोग गाली देकर पिटने का जोखिम भी उठाते हैं- यह उनका प्रतिरोध होता है। वे जो सबसे मर्मांतक चोट पहुंचा सकते हैं, वह इन्हीं गालियों से संभव होती है। इसी के बाद किसी महाप्रतापी को भी इंस्टाग्राम की रील बनाने की ज़रूरत महसूस होने लगती है।<br>गालियों का एक खेल और होता है। वह खेल सभ्यता ने भाषा के साथ किया है या भाषा ने सभ्यता के साथ किया है। इस सभ्यता ने सिखाया है कि भाषा कोई जड़ चीज़ नहीं होती। शब्दों के भी अर्थ बिल्कुल वही स्थिर नहीं होते जो शब्दकोश बताते हैं। हमारे रिश्तों के हिसाब से शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। तो गालियां दोस्तों के बीच भी चलती हैं। ये अचानक मीठी गालियां हो जाती हैं। बिल्कुल वही गालियां- लेकिन उनकी लैंगिक चुभन वहां गायब हो जाती है, गाली देने-सुनने वालों में एक भाईचारा सा बन जाता है। बेशक, दोस्तों के बीच चुहल में दी जाने वाली गालियां कई बार मुझे मर्दवाद के दोस्ताने जैसी लगती है- मूंछों पर ताव देते लोगों की आपसी आश्वस्ति कि इन गालियों से हमारा रिश्ता और प्रगाढ़ हो रहा है।<br>लेकिन जब गालियां इतनी आम हैं तो हम उनसे बचते क्यों हैं? हम क्यों चाहते हैं कि हमारे बच्चे गालियां न दें। हम क्यों इन गालियों को संस्कारों से जोड़ लेते हैं?<br>क्योंकि गालियों की दुनिया है तो नालियों की दुनिया ही। इस नाली में पांव न रखने पड़ें तो अच्छा। हम जैसे अपने घर साफ़-सुथरे रखना चाहते हैं, वैसे ही अपना या अपने बच्चों का मन भी साफ़ रखना चाहते हैं। लेकिन हमारे घरों में जैसे बाहर की धूल चली आती है, वैसे ही मन पर भी चली आती है। जैसे हम रोज़ घर बुहारते हैं, वैसे नैतिकता की झाड़ू लेकर रोज़ बच्चों का मन बुहारते हैं।<br>मुश्किल यह है कि घर की झाड़ू पुरानी होने पर तो हम बदल लेते हैं। नैतिकता की झाड़ू झड़ चुकी है या उसकी सींकें ख़त्म हो चुकी हैं- यह हमें पता नहीं चलता। हम इस सड़ी-गली झाड़ू से मन का घर साफ़ करने निकलते हैं- यह समझे बिना कि उसके लिए नई सींकें, नई झाड़ू चाहिए जो नए पर्यावरण की धूल को ठीक से बुहार सके। हम एक खोखली नैतिकता के व्यूह में घिरे रहते हैं और हमारी दुनिया गालियों से भरी रहती है।<br>यह सच है कि हमारी दुनिया बहुत बदल चुकी है। जब नहीं बदली थी तब भी समाज की पहचान करने वाले साहित्य में कई बार गालियां चली आती थीं। काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ बनारस नाम की उस सनातन नगरी का गाली-वृत्तांत ही है जो सभ्यता के हर दौर में बनी रही है- हमारी धार्मिक आस्थाओं का केंद्र रही है। राही मासूम रज़ा ने जब ‘आधा गांव’ लिखा तो उसमें भी कुछ गालियां चली आईं। उसे जोधपुर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से इसीलिए निकाल दिया गया कि उसमें गालियां थीं। लेकिन इन उपन्यासों से किसी शुद्धतावादी अभियान के तहत गालियां निकाल दी जातीं तो क्या उनमें जीवन बचा रहता? सच्चाई बची रहती?<br>एक तर्क यह हो सकता है कि इतनी सच्चाई क्यों देखना? यथार्थ का यह स्थूल रूप है। हम किसी के अंतरंग कक्षों में नहीं झांकते। लेकिन इंसानी तहज़ीब की फ़ितरत है कि सारे तर्क बेमानी हो जाते हैं। उसके भीतर का मनोविज्ञान कुछ ऐसा है कि वह जितना रोशनी की पहचान करना चाहता है, उससे ज़्यादा अंधेरों को जानना चाहता है।<br>हम गालियों से चाहे जितना भागें, वे हमारा पीछा करती रही हैं- अवचेतन में बसे कई अन्य प्रेतों की तरह। इस फ़र्क के साथ कि हमारे कई प्रेत अदृश्य होते हैं, गालियां सार्वजनिक होती हैं, वे हमारा भेद खोल देती हैं।<br>बीसवीं सदी में विकसित हुआ सिनेमा आज अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा माध्यम है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के रूप में वह घर-घर पहुंचा हुआ है। इनकी मार्फ़त गालियां भी हमारे ड्राइंग रूम में पहुंच गई हैं। वे हमारे मनोरंजन का हिस्सा हो गई हैं। जब आप इस पर बहुत एतराज़ नहीं करते तो उस नई पीढ़ी पर क्यों करते हैं जो इसी समाज से, इसी नए ड्राइंग रूम से ये गालियां सीख कर निकली है और अकुंठ भाव से दे रही है? ठीक है कि हमें गालियों पर तालियां नहीं बजानी चाहिए, लेकिन गाली बकने वालों को बिल्कुल चरित्रहीन, संस्कारहीन घोषित कर ट्रोल करना, उन्हें ज़्यादा कुत्सित गालियां देना कहीं से उचित नहीं है। समझने की कोशिश यह करनी चाहिए कि इन गालियों से जो निकल रहा है, वह कैसा गुस्सा है, कैसा प्रतिरोध है या कैसी हताशा है और वह कौन सी कार्रवाई हो सकती है जिससे हम गाली देने वालों को ताली बजाने वालों में बदल सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph">(साभार &#8211; प्रभात खबर)</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/even-abuses-have-had-their-own-sociology-priyadarshan/">गालियों का भी अपना समाजशास्त्र रहा है- प्रियदर्शन</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>डाॅ. राम पुनियानी का लेख-RSS मुखिया द्वारा हिंदुओं का किया गया वर्गीकरण कितना सही ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-how-accurate-is-the-classification-of-hindus-done-by-the-rss-chief/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 Jul 2026 06:41:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#dr ram puniyani]]></category>
		<category><![CDATA[#hinduism]]></category>
		<category><![CDATA[#history]]></category>
		<category><![CDATA[#mohan bhagwat]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=503</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;आरएसएस यह भी कहता रहा है कि हिन्दू दरअसल एक धर्म नहीं वरन् एक जीवनशैली है। यह कथन समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से गलत है, जिसके अनुसार आराध्य, कर्मकांड, पवित्र ग्रंथ, पुरोहित वर्ग आदि धर्म के तत्व माने जाते हैं। हाल में उन्होंने हिन्दुओं का अनोखा वर्गीकरण किया जिसका उद्धेश्य मुसलमानों और ईसाईयों में व्याप्त हाशियेपन के &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-how-accurate-is-the-classification-of-hindus-done-by-the-rss-chief/">डाॅ. राम पुनियानी का लेख-RSS मुखिया द्वारा हिंदुओं का किया गया वर्गीकरण कितना सही ?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;आरएसएस यह भी कहता रहा है कि हिन्दू दरअसल एक धर्म नहीं वरन् एक जीवनशैली है। यह कथन समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से गलत है, जिसके अनुसार आराध्य, कर्मकांड, पवित्र ग्रंथ, पुरोहित वर्ग आदि धर्म के तत्व माने जाते हैं। हाल में उन्होंने हिन्दुओं का अनोखा वर्गीकरण किया जिसका उद्धेश्य मुसलमानों और ईसाईयों में व्याप्त हाशियेपन के एहसास को कम करना था।&#8217; पढ़ें सुप्रतिष्ठित इतिहासकार डाॅ. राम पुनियानी का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत हिन्दू राष्ट्र के विचार को सही ठहराने के लिए तरह-तरह की वैचारिक कलाबाजियां खाते रहते हैं। वे कई बार कह चुके हैं कि भारत में रहने वाले सभी लोग हिन्दू हैं, हमारे पूर्वज एक ही थे आदि। मगर समस्या यह है कि पुराने आरएसएस विचारक यह नजरिया पेश करते रहे हैं कि इस्लाम और ईसाईयत विदेशी धर्म हैं। हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा के जनक वी. डी. सावरकर ने हिन्दू को परिभाषित करते हुए कहा था कि हिन्दू वह है जो सिन्धु से लेकर समुद्र तक की भूमि को पवित्र और अपनी पितृभूमि मानता है। द्वितीय सरसंघचालक एम. एस. गोलवलकर का कहना था कि हिन्दू राष्ट्र के निर्माण हेतु हम जर्मनी के मॉडल का अनुसरण करेंगे जहां बहुत बड़ी संख्या में यहूदियों को यातनाएं दी गईं और फिर उन्हें गैस चैम्बरों में भेजकर जर्मन राष्ट्र का निर्माण किया गया। हाल में इसी वक्तव्य के अधिक चिकने-चुपड़े संस्करण भागवत ने सामने रखें हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आरएसएस यह भी कहता रहा है कि हिन्दू दरअसल एक धर्म नहीं वरन् एक जीवनशैली है। यह कथन समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से गलत है, जिसके अनुसार आराध्य, कर्मकांड, पवित्र ग्रंथ, पुरोहित वर्ग आदि धर्म के तत्व माने जाते हैं। हाल में उन्होंने हिन्दुओं का अनोखा वर्गीकरण किया जिसका उद्धेश्य मुसलमानों और ईसाईयों में व्याप्त हाशियेपन के एहसास को कम करना था। हिन्दू धर्म की बहुत ही अजीब परिभाषा देते हुए उन्होंने कहा ‘‘अगर आप भारतीय हैं तो यह प्रकृति (हिन्दू) आप में अंतर्निहित है‘‘। उन्होंने जोर देकर कहा कि मुसलमान और ईसाई हिंदू राष्ट्र के अविभाज्य अंग हैं। इसके बाद उन्होंने देश के हिंदुओं का चार मुख्य समूहों में वर्गीकरण किया। उन्होंने कहा कि पहले समूह में वे लोग शामिल हैं जो अपनी हिन्दू पहचान को गर्व से घोषित करते हैं। दूसरे समूह में वे लोग हैं जो अपने को हिन्दू मानते हैं लेकिन इसमें उन्हें किसी विशिष्टता का एहसास नहीं होता। भागवत के अनुसार तीसरा समूह उन लोगों का है जो केवल निजी चर्चा में अपनी हिन्दू पहचान का जिक्र करते हैं। चौथे समूह में वे लोग शामिल हैं जो या तो अपनी हिन्दू पहचान को भूल चुके है या जिसे उन्हें विस्मृत करा दिया गया है।</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large is-resized"><img decoding="async" width="1024" height="681" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/Screenshot-2026-07-08-222738-1024x681.png" alt="मोहन भागवत" class="wp-image-504" style="aspect-ratio:1.503692101141195;width:337px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/Screenshot-2026-07-08-222738-1024x681.png 1024w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/Screenshot-2026-07-08-222738-300x200.png 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/Screenshot-2026-07-08-222738-768x511.png 768w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/Screenshot-2026-07-08-222738.png 1112w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /><figcaption class="wp-element-caption">मोहन भागवत</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">उनके अनुसार स्वाभिमानी हिन्दू कौन हैं? वे जिन्होंने बाबरी मस्जिद को ढहाया? वे जो मस्जिदों के सामने नाचते हैं और गालियों भरे नारे लगाते हैं? वे जो कावंड़ियों के भेष में सड़कों पर हंगामा करते हैं? हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया लेकिन हमें इसका अनुमान लगाना होगा। बाबासाहेब अम्बेडकर एक हिन्दू परिवार में पैदा हुए थे लेकिन उन्होंने बाद में ‘मनुस्मृति’ जलाई और घोषणा की कि हालांकि वे हिन्दू पैदा हुए हैं, लेकिन वे एक हिन्दू के रूप में नहीं मरेंगे। आरएसएस प्रमुख उन्हें किस वर्ग में रखेंगे? वे भारतीय संविधान को क्या बताएंगे &#8211; एक ‘अच्छे’ हिन्दू द्वारा निर्मित संहिता या कुछ और? उनकी संस्था ने तो यह कहते हुए संविधान का विरोध किया था कि यह पश्चिमी मूल्यों पर आधारित है और उसमें कुछ भी भारतीय नहीं है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वर्तमान में आरएसएस की दुविधा यह है कि मुसलमानों, ईसाईयों, दलितों और आदिवासियों को आरएसएस से जोड़ने के लिए उसे ईसाईयों और मुसलमानों के बारे में सम्मानजनक ढंग से बात करने की कलाबाजी दिखानी होगी। वैसे भी हिन्दू धर्म को पारिभाषित करना निश्चित ही एक कठिन कार्य है। इसकी कई वजहें हैं। पहली यह है कि हिन्दू धर्म एक पैगम्बर-आधारित धर्म नहीं है। उसकी स्थापना करने वाला कोई एक व्यक्ति नहीं है। दूसरी वजह यह है कि दुनिया के इस हिस्से में विकसित हुई कई धार्मिक धाराएं, हिन्दू धर्म में समाहित हुई हैं। तीसरी यह कि हिंदू धर्म के कर्मकांडों में इतनी विविधता है कि उन्हें एक रंग में नहीं रंगा जा सकता। इसमें यह भी जोड़ा जा सकता है कि अलग-अलग कालखंडों में विकसित हुए विचार और परंपराएं आज भी एक साथ इस धर्म का हिस्सा हैं। भगवान सत्यनारायण और संतोषी माता की पूजा होती है और साथ ही सगुण और निर्गुण ईश्वर की अवधारणाएं भी बनी हुई हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हिन्दू धर्म से जुड़ा एक मूलभूत मुद्दा है वर्ण व्यवस्था का धर्म के महत्वपूर्ण पक्षों पर गहरा प्रभाव, सामजिक असमानता को धार्मिक मान्यता और वर्ण व्यवस्था का उसके धर्मग्रंथों और परंपराओं के केन्द्र में होना।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आर्य, जो कई चरणों में भारत आए, पशुपालक और बहुदेववादी थे। शुरूआती काल में वेद लिखे गए, जो उस काल के मूल्यों की एक झलक पेश करने के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के बहुत से देवी-देवताओं की बात करतें हैं और बहुदेववाद का अस्तित्व दर्शाते हैं। ‘मनु के नियम‘ समाज के मार्गनिर्देशी सिद्धांत थे। वैदिक काल के बाद ब्राहम्णवाद का दौर आया। इस काल में समाज का कुलीन वर्ग, सामान्य लोगों से एकदम कट गया। इस दौर में जाति प्रथा के जरिए कुलीन वर्गों के विशिष्ट बने रहने का अत्यंत कुशल तंत्र स्थापित हुआ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">जातिप्रथा को बौद्ध धर्म द्वारा चुनौती दिए जाने से ब्राह्मणवाद एक ऐसे दौर में प्रवेश करने को बाध्य हुआ जिसे हिन्दू धर्म कहा जा सकता है। इस दौर में सामाजिक एवं धार्मिक परंपराओं से समाज के अपेक्षाकृत बड़े वर्ग को जोड़ा गया और सार्वजनिक समारोह एवं कर्मकांड स्थापित किए गए ताकि सामान्य लोगों को बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित होने से रोका जा सके। यहां एक ध्यान देने योग्य दिलचस्प बात यह है कि 8वीं शताब्दी तक तथाकथित हिन्दू ग्रंथों में ‘हिन्दू’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया था। यह शब्द पश्चिम एशियाई मुसलमानों के यहां आगमन के साथ अस्तित्व में आया। वे सिन्धु नदी के इस पार रहने वालों को हिन्दू कहते थे। इस तरह हिन्दू शब्द दरअसल एक भौगोलिक इलाके का नाम था। बाद में इस इलाके में विकसित हुए धर्मों को हिन्दू कहा जाने लगा। जाति प्रथा के शिकार लोगों ने धर्मपरिवर्तन करने का हर संभव प्रयास किया। उन्होंने बौद्ध धर्म, इस्लाम, कुछ हद तक ईसाई धर्म और बाद के दौर में सिक्ख धर्म अपनाया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हिन्दू धर्म के अंदर भी दो धाराएं एक दूसरे के समानांतर चलीं। ब्राह्मणवाद और श्रमणवाद। श्रमणों ने ब्राह्मणों के नियंत्रण का विरोध किया और जाति प्रथा को खारिज किया। वैसे बोलबाला ब्राह्मणवाद का ही रहा लेकिन हिन्दू धर्म की अन्य धाराएं भी कायम रहीं जिनमें तंत्र, भक्ति, शैव, सिद्धांत आदि शामिल थीं। श्रमणों ने वैदिक मूल्यों और नियमों को नहीं माना। जहां ब्राह्मणवाद ने धार्मिक परंपराओं को जाति के आधार पर वर्गीकृत किया वहीं श्रमणवाद ने जाति भेद को खारिज किया। ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म का बोलबाला इसलिए कायम रहा क्योंकि वह शासकों से जुड़ा हुआ था। समय बीतने के साथ नीची जातियों की हिंदू परंपराओं की उपेक्षा कर  ब्राह्मणवाद को ही हिन्दू धर्म की मान्यता दी जाने लगी। यह प्रवृत्ति मगध-मौर्य साम्राज्यों द्वारा बौद्ध एवं जैन धर्मों को कुचलने के साथ प्रारंभ हुई। बाद में अंग्रेजों के आगमन के साथ, जो भारतीय समाज को समझना चाहते थे, ब्राह्मणवादी परंपराओं पर आधारित हिन्दू पहचान सभी गैर-मुस्लिमों और गैर-ईसाईयों पर लाद दी गई। वेद एवं अन्य ब्राह्मणवादी ग्रंथों को हिन्दू ग्रंथों की तरह प्रस्तुत किया गया। इससे हिन्दू धर्म की विविधिता ओझल हो गई और ब्राह्मणवाद को ही हिन्दू धर्म की मान्यता मिल गई। इसलिए आज हिन्दू धर्म को  ब्राह्मणवादी कर्मकांडों, ग्रंथों एवं ब्राह्मणों के प्रभुत्व से जोड़ा जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मोहन भागवत को हिंदुओं के उनके वर्गीकरण में जाति प्रथा का भी ध्यान रखना चाहिए था। सवाल यह भी है कि अत्यंत विविधतापूर्ण और व्यापक हिन्दू धर्म में भागवत के हिन्दुओं के चार वर्गों को कहां रखा जाएगा। </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>(अंग्रेजी से रूपांतरण &#8211; अमरीश हरदेनिया)</strong></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-how-accurate-is-the-classification-of-hindus-done-by-the-rss-chief/">डाॅ. राम पुनियानी का लेख-RSS मुखिया द्वारा हिंदुओं का किया गया वर्गीकरण कितना सही ?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>डाॅ. राम पुनियानी का लेख- ईसाई मिशनरी और धर्मांतरण का मुद्दा, क्या है आरएसएस के दावों के पीछे का सच ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/article-by-renowned-historian-dr-ram-puniyani-christian-missionaries-and-the-issue-of-religious-conversion-what-is-the-truth-behind-the-rss-claims-read-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Jul 2026 14:06:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#dr ram puniyani]]></category>
		<category><![CDATA[#freedom]]></category>
		<category><![CDATA[#justice]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#mohan bhagwat]]></category>
		<category><![CDATA[#ngo]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#propoganda]]></category>
		<category><![CDATA[#ravikant]]></category>
		<category><![CDATA[#religious minority]]></category>
		<category><![CDATA[#roshni rawat]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=485</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने नियोगी समिति की सिफारिशों को खारिज कर दिया क्योंकि उसके द्वारा प्रस्तावित प्रतिबंध हाल में लागू हुए संविधान के प्रावधानों के विपरीत थे, विशेषकर धर्म का प्रचार करने के मूलभूत अधिकार के संदर्भ में. नेहरू ने रपट में की गई सिफारिशों को धार्मिक स्वतंत्रता के लिए खतरा माना.&#8217; पढ़ें &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/article-by-renowned-historian-dr-ram-puniyani-christian-missionaries-and-the-issue-of-religious-conversion-what-is-the-truth-behind-the-rss-claims-read-on-adahan-patrika/">डाॅ. राम पुनियानी का लेख- ईसाई मिशनरी और धर्मांतरण का मुद्दा, क्या है आरएसएस के दावों के पीछे का सच ?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने नियोगी समिति की सिफारिशों को खारिज कर दिया क्योंकि उसके द्वारा प्रस्तावित प्रतिबंध हाल में लागू हुए संविधान के प्रावधानों के विपरीत थे, विशेषकर धर्म का प्रचार करने के मूलभूत अधिकार के संदर्भ में. नेहरू ने रपट में की गई सिफारिशों को धार्मिक स्वतंत्रता के लिए खतरा माना.&#8217; पढ़ें सुप्रतिष्ठित इतिहासकार डाॅ. राम पुनियानी का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">इन दिनों विभिन्न वजहों से स्वयंसेवी संस्थाएं (एनजीओ) खबरों में हैं. लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री और आरएसएस प्रचारक नरेन्द्र मोदी ने दावा किया था कि आरएसएस दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ है. यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि यह एनजीओ अपंजीकृत है जो सिर्फ सांस्कृतिक गतिविधियां करता है. इस मुद्दे पर कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियंक खड़गे ने कहा कि आरएसएस को अपना पंजीकरण करवाना चाहिए. आरएसएस ने इससे इंकार करते हुए दावा किया कि वह केवल व्यक्तियों का एक समूह है. यह दावा मान भी लिया जाए तो उसे मिलने वाले भारी-भरकम चंदे के बारे में उसकी क्या सफाई है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक अलग घटनाक्रम संसद में हुआ. केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने नए एफसीआरए अर्थात विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम को लागू करने की घोषणा की है जिसमें विदेशों से धन प्राप्त करने वाले एनजीओ की गतिविधियों पर रोक लगाए जाने का प्रावधान है. सत्ताधारी दल का मानना यह है कि ईसाई एनजीओ द्वारा धर्मपरिवर्तन करवाया जा रहा है. उनका मानना यह है कि इन एनजीओ द्वारा शिक्षा एवं स्वास्थ्य की सुविधाएं उपलब्ध करवाना धर्मपरिवर्तन के लिए लोगों को लालच देना है. उनकी नजर में ईसाई एनजीओ द्वारा जबरिया धर्मपरिवर्तन भी करवाया जाता है. यह दावा किस हद तक सच है? वैसे हमारे संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को अपने धर्म को अबाध रूप से मानने, पालन करने व उसका प्रचार करने का मूलभूत अधिकार देता है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">सत्ताधारी यह दावा करते हैं कि यह अनुच्छेद हमें अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने का अधिकार तो देता है, लेकिन वह किसी व्यक्ति का धर्मपरिवर्तन करवाने का अधिकार नहीं देता. हिंदू राष्ट्रवादियों की समझ यह है कि मिशनरियां लालच और जबरदस्ती का सहारा लेती हैं. वे यह मानते हैं कि जो लोग धर्मपरिवर्तन करते हैं उसमें उनकी कोई भूमिका होती ही नहीं है. ऐसा कोई अध्ययन नहीं किया गया है जिससे हमें पता लग सके कि ईसाई मिशनरी स्कूलों में पढ़े कितने लोग ईसाई बन गए. यह जानकारी देने वाले आंकड़ें भी उपलब्ध नहीं हैं कि कितने दलित और आदिवासी लालच का बलप्रयोग की वजह से धर्मपरिवर्तन कर ईसाई बने.<br>भारत में ईसाई धर्म बहुत लंबे समय से मौजूद है. भारत में इसका आगमन सन् 52 में सेंट थामस के साथ हुआ. उन्होंने गिरजाघरों का निर्माण करवाया और कई स्थानीय लोगों ने इस धर्म को अपनाया. यदि हम आंकड़ों को देखें तो हमें पता लगता है कि भारत में ईसाई धर्म का विस्तार काफी धीमी रफ्तार से हुआ है. पिछली जनगणना (2011) के आंकड़ों के अनुसार कुल जनसंख्या में ईसाईयों का प्रतिशत केवल 2.30 था. जिस दौर में जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाए जाने के आरोप बार-बार लगाए गए, उस दौर के जनगणना के आंकड़े कुछ और कहानी कहते हैं. जनसंख्या में ईसाईयों का प्रतिशत 1971 में 2.60 था जो लगातार घटता गया और 1981 में 2.44 प्रतिशत, 1991 में 2.34 प्रतिशत, 2001 में 2.30 प्रतिशत और 2011 में भी 2.30 प्रतिशत ही रहा.</p>



<p class="wp-block-paragraph">इन आंकड़ों के बावजूद बलपूर्वक या लालच देकर धर्मपरिवर्तन करवाने का प्रोपेगेंडा जमकर चलता रहा. इसके कारण भयावह हिंसा हुई. सबसे खौफनाक हिंसा क्योंझर, मनोहरपुर, ओडिशा में 1999 में हुई जब पास्टर ग्राहम स्टेन्स को उनके दो मासूम लड़कों के साथ जिंदा जला दिया गया. लोगों को भड़काने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका बजरंग दल के दारा सिंह उर्फ राजेन्द्र सिंह पाल की थी, जो आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है. इस भयावह हत्या को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने बर्बर कार्य की संज्ञा दी थी जो ‘दुनिया में हुई कलुषित घटनाओं में से एक‘ थी. इस घटना की जांच के लिए वाधवा आयोग की नियुक्ति की गई. आयोग ने पाया कि ‘‘पास्टर धर्मपरिवर्तन का काम नहीं कर रहे थे बल्कि वे कुष्ठ रोगियों की सेवा में जुटे हुए थे‘‘.</p>



<p class="wp-block-paragraph">आयोग की रपट के बारे में उल्लेखनीय तथ्य यह है कि उसने पाया कि इलाके में ईसाईयों की संख्या में कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं हुई थी. रपट के मुताबिक ‘‘क्योंझर जिले की कुल जनसंख्या 15.30 लाख थी. इनमें से 14.93 लाख हिंदू थे, ईसाई, जिनमें से ज्यादातर आदिवासी थे, केवल 4,707 थे. 1991 की जनगणना के अनुसार उस समय ही जिले में ईसाईयों की संख्या 4,112 थी. इस प्रकार ईसाईयों की जनसंख्या में केवल 595 की बढ़ोत्तरी हुई‘‘. यह कोई बड़ी वृद्धि नहीं है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके बाद डांग (गुजरात) और कंधमाल (ओडिसा) में गतिविधियां तेजी से बढ़ीं. स्वामी असीमानंद और स्वामी लक्ष्मणानंद सहित विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े कई लोगों ने इन क्षेत्रों में अपने आश्रम स्थापित किए. इन इलाकों में बहुत हिंसा हुई, जिसकी पराकाष्ठा थी 2008 की कंधमाल हिंसा. अब इस प्रोपेगेंडा की ही वजह से दूरदराज के इलाकों में कार्य कर रहे ईसाई मिशनरियों को छुटपुट हिंसा का सामना करना पड़ रहा है, जिसकी ओर ज्यादा ध्यान नहीं जाता. प्रार्थना सभाओं को धर्मपरिवर्तन का औजार बताया जाता है और उन पर हमले होते हैं.</p>



<p class="wp-block-paragraph">भाजपा/आरएसएस के एक प्रमुख विचारक राम माधव ने अपने एक लेख में नए एफसीआरए के माध्यम से किए जाने वाले बदलावों का समर्थन किया और याद दिलाया कि नियोगी समिति पहले ही मिशनरियों पर पाबंदियां लगाने के पक्ष में राय दे चुकी है. नेहरू सरकार ने उसकी अनुशंसाओं पर अमल न करने का फैसला किया था. इसके बाद माधव यह जोड़ते हैं अब मोदी उन्हीं सिफारिशों पर अमल कर रहे हैं (इंडियन एक्सप्रेस 17 जून 2026). आखिर नियोगी समिति ने क्या सिफारिशें कीं थीं?<br>नियोगी समिति, जिसने सन् 1956 में ईसाई मिशनरियों के क्रियाकलापों पर रपट दी थी, ने भारत में धर्मांतरण के विवादास्पद मुद्दे की जांच की थी. समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची की धर्मांतरण मुख्यतः शिक्षा एवं चिकित्सा संबंधी प्रलोभनों के जरिए किया जा रहा था और यह चेतावनी दी थी कि विदेशी मिशनरियों का लक्ष्य भारत में एक अलग ईसाई राष्ट्र बनाने का है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने नियोगी समिति की सिफारिशों को खारिज कर दिया क्योंकि उसके द्वारा प्रस्तावित प्रतिबंध हाल में लागू हुए संविधान के प्रावधानों के विपरीत थे, विशेषकर धर्म का प्रचार करने के मूलभूत अधिकार के संदर्भ में. नेहरू ने रपट में की गई सिफारिशों को धार्मिक स्वतंत्रता के लिए खतरा माना.</p>



<p class="wp-block-paragraph">माधव का दावा है कि गांधी धर्मांतरण के खिलाफ थे. यह सच है, लेकिन वे धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ नहीं थे. अब धार्मिक स्वतंत्रता को ही धर्मांतरण के रूप में प्रस्तुत एवं प्रचारित किया जा रहा है. गांधीजी ने जो कहा वह धर्म को मानने एवं उसका पालन करने के अधिकार के खिलाफ कतई नहीं था. दिनांक 22 मार्च 1931 को दिए गए एक साक्षात्कार (द हिन्दू) में गांधीजी ने जाहिर तौर पर कहा कि यदि स्वतंत्र भारत में मिशनरी चिकित्सा सहायता एवं शिक्षा आदि के माध्यम से धर्मांतरण जारी रखेंगे तो मैं निश्चित ही उनसे हट जाने को कहूंगा. हर देश का धर्म किसी दूसरे देश के धर्म जितना ही अच्छा है. निश्चित ही भारत के धर्म उसमें रहने वालों के लिए पर्याप्त हैं. हमें आध्यात्मिक दृष्टि से धर्मपरिवर्तन करने की जरूरत बिल्कुल नहीं है.‘‘ यह उनके उद्धरण का पहला हिस्सा है. इसके बाद की पंक्तियों में एकदम विपरीत विचार व्यक्त किए गए हैं &#8211; जो गांधीजी का वास्तविक नजरिया दर्शाते हैं. गांधीजी आगे लिखते हैं ‘‘ये बातें संवाददाता ने मेरे मुंह में ठूसीं…मैं इतना ही कहूंगा कि यह जो मैं जो हमेशा कहता रहा हूं और मानता रहा हूं, उसके खिलाफ है‘‘.</p>



<p class="wp-block-paragraph">वे आगे अपना नजरिया स्पष्ट करते हैं ‘‘मैं धर्मांतरण के खिलाफ नहीं हूं…हर देश अपने धर्म को अन्य देशों के धर्मों जितना ही उत्तम मानता है. निश्चित ही भारत की जनता द्वारा माने जाने वाले धर्म उसके लिए पर्याप्त हैं…इसके बाद वे भारत के धर्मों के नाम लेते हैं, ‘‘ईसाई और यहूदी धर्म के अलावा, हिन्दू धर्म और उससे निकले धर्म, इस्लाम और पारसी धर्म भारत के जीवित धर्म हैं‘‘ (गांधीज कलेक्टिड वर्क्स, खंड 46 पृष्ठ 27-28).</p>



<p class="wp-block-paragraph">माधव जैसों की नजर में ईसाई धर्म एक विदेशी धर्म है, जिसे बलप्रयोग और लालच के जरिए फैलाया गया है. यह उनकी समझ में मूलभूत कमी है. </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>अंग्रेजी से रूपांतरण &#8211; अमरीश हरदेनिया.</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph">(यह लेखक के निजी विचार हैं.)</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/article-by-renowned-historian-dr-ram-puniyani-christian-missionaries-and-the-issue-of-religious-conversion-what-is-the-truth-behind-the-rss-claims-read-on-adahan-patrika/">डाॅ. राम पुनियानी का लेख- ईसाई मिशनरी और धर्मांतरण का मुद्दा, क्या है आरएसएस के दावों के पीछे का सच ?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>क्या धार्मिक आस्थाओं का राजनीतिक अस्थि संचय हो रहा है ? -श्रवण गर्ग</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/are-religious-beliefs-being-turned-into-a-political-bone-bank-read-senior-journalist-shravan-gargs-full-article-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Jul 2026 14:29:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#champatrai]]></category>
		<category><![CDATA[#chandachori]]></category>
		<category><![CDATA[#latest]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#ramandir]]></category>
		<category><![CDATA[#ravikant]]></category>
		<category><![CDATA[#roshni rawat]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<category><![CDATA[#shravan garg]]></category>
		<category><![CDATA[#UPNews]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=470</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;नागरिक क्यों आश्वस्त होना चाहते हैं कि कथित तौर पर जो एक राजनीतिक आपातकाल देश में पहले से ही उपस्थित है उसके अलावा यह कोई नया धार्मिक आपदाकाल तो नहीं है ? एक ऐसा आपदाकाल जिसमें धार्मिक आस्थाएँ संदेहों की अस्थियों में परिवर्तित होकर कोविडकाल की तरह व्यवस्था की नदियों में तैर रही हैं !&#8217; &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/are-religious-beliefs-being-turned-into-a-political-bone-bank-read-senior-journalist-shravan-gargs-full-article-on-adahan-patrika/">क्या धार्मिक आस्थाओं का राजनीतिक अस्थि संचय हो रहा है ? -श्रवण गर्ग</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;नागरिक क्यों आश्वस्त होना चाहते हैं कि कथित तौर पर जो एक राजनीतिक आपातकाल देश में पहले से ही उपस्थित है उसके अलावा यह कोई नया धार्मिक आपदाकाल तो नहीं है ? एक ऐसा आपदाकाल जिसमें धार्मिक आस्थाएँ संदेहों की अस्थियों में परिवर्तित होकर कोविडकाल की तरह व्यवस्था की नदियों में तैर रही हैं !&#8217; पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="450" height="450" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg" alt="पत्रकार श्रवण गर्ग" class="wp-image-413" style="width:185px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg 450w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-300x300.jpg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-150x150.jpg 150w" sizes="(max-width: 450px) 100vw, 450px" /><figcaption class="wp-element-caption">पत्रकार श्रवण गर्ग</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">जनता इतने आत्मविश्वास के साथ क्यों दावा कर रही है कि रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में हुए चंदे-चढ़ावे के घोटाले में कुछ भी नहीं होगा या कुछ निकलेगा ? असली दोषियों के न कभी नाम बाहर आएँगे और न उनका बाल कोई बाँका होगा ? घोटाले की जाँच के लिए बनाए गए विशेष जाँच दल द्वारा कोई सनसनीख़ेज़ रहस्योद्घाटन भी नहीं होगा। दल का कार्यकाल वैसे भी 15 जुलाई तक बढ़ गया है। मुमकिन है जाँच का दायरा बढ़ाकर कार्यकाल फिर से बढ़ा दिया जाए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">चंपतराय के विकल्प की तलाश प्रारंभ हो चुकी है। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरि अब कह रहे हैं कि वे कोषाध्यक्ष तो थे लेकिन उनकी कोई भूमिका ही नहीं थी। किसी भी काम में उनका कोई दखल नहीं था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">श्रद्धालुओं के बीच इस तरह की बातें क्यों हैं कि घोटाले का इस समय बाहर आना किसी बड़ी राजनीतिक कार्ययोजना का हिस्सा भी हो सकता है जिसके कि तार यूपी में अगले साल होने वाले महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से जुड़े हों ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">नागरिकों के बीच ऐसा डर क्यों है कि लगभग पच्चीस करोड़ की आबादी वाले देश के सबसे बड़े राज्य में चुनावों के पहले ख़ौफ़ का साम्राज्य क़ायम हो रहा है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">नागरिक क्यों सवाल कर रहे हैं कि मंदिर-निर्माण के लिए भूमि-पूजन से लेकर उसके भव्य उद्घाटन-समारोह तक आकर्षण का केंद्र बने रहे दोनों प्रमुख यजमान करोड़ों हिन्दू भक्तों की धार्मिक आस्थाओं के साथ हुए आघात के प्रति बिलकुल भी विचलित नहीं दिखाई पड़ रहे हैं ? प्रधानमंत्री विदेशों के और संघ-प्रमुख देश में भ्रमण कर रहे हैं, प्रेरक उद्बोधन वितरित कर रहे हैं !</p>



<p class="wp-block-paragraph">नागरिक क्यों आश्वस्त होना चाहते हैं कि कथित तौर पर जो एक राजनीतिक आपातकाल देश में पहले से ही उपस्थित है उसके अलावा यह कोई नया धार्मिक आपदाकाल तो नहीं है ? एक ऐसा आपदाकाल जिसमें धार्मिक आस्थाएँ संदेहों की अस्थियों में परिवर्तित होकर कोविडकाल की तरह व्यवस्था की नदियों में तैर रही हैं !</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऐसा इसलिए कि जब कभी व्यवस्थाएँ किसी बड़े राजनीतिक अथवा नैतिक संकट से मुखातिब होती हैं कोई नई आपदा आस्थाओं की भीड़ के बीच किसी साँप के बच्चे की तरह अचानक से प्रकट हो जाती है ! इसके कारण मचने वाली भगदड़ में आस्थाएँ तो श्वासहीन शरीरों में तब्दील होने लगती हैं,साँप का बच्चा सुरक्षित ग़ायब हो जाता है !</p>



<p class="wp-block-paragraph">स्मरण किया जाए तो यक़ीन करना मुश्किल हो जाएगा कि कोविडकाल के दौरान असीमित कष्ट भुगत रहे नागरिकों के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कभी ऐसा कहा होगा : ‘ जब वे अपने भाई-बहनों की तरफ़ देखते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि वे (भाई-बहन) सोच रहे होंगे कि ये कैसा प्रधानमंत्री है जिसने हमें इतनी कठिनाइयों में डाल दिया है !’</p>



<p class="wp-block-paragraph">नागरिक डरे हुए हैं कि कोविडकाल के दौरान उनकी आस्थाओं के साथ किए गए प्रयोगों को कहीं सरकार ने आपदाओं से निपटने के किसी स्थाई रोल मॉडल में तो नहीं परिवर्तित कर दिया गया है ! खाड़ी युद्ध से उत्पन्न संकट पर संसद में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने चार महीने पूर्व ही कहा था कि :’ पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण भारत के सामने अभूतपूर्व चुनौतियाँ हैं और उनसे निपटने के लिए देश को कोविड संकट के समय की तरह एकजुट होकर तैयार रहना होगा।’</p>



<p class="wp-block-paragraph">सवाल एक और भी है जो सबसे बड़ा है ! वह यह कि मोदी-भागवत के भारत में निर्मित हुए हिंदुत्व की आस्थाओं के सर्वोच्च तीर्थस्थल की पवित्रता ही अगर संदेहों के घेरे में सिमट रही है तो क्या इसे केदारनाथ की गुफा और विवेकानंद स्मारक पर किये गए तपों से अर्जित पुण्य के क्षीण होने की शुरुआत मान लेना चाहिए या फिर किसी नए ईश्वरीय चमत्कार की प्रतीक्षा करना चाहिए ?</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/are-religious-beliefs-being-turned-into-a-political-bone-bank-read-senior-journalist-shravan-gargs-full-article-on-adahan-patrika/">क्या धार्मिक आस्थाओं का राजनीतिक अस्थि संचय हो रहा है ? -श्रवण गर्ग</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>डॉ. राम पुनियानी का आलेख- सोमनाथ के लुटने से लेकर अयोध्या में ‘चंदा चोरी‘ तक</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-dr-ram-puniyanis-article-from-the-plundering-of-somnath-to-chanda-chori-in-ayodhya-in-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Jul 2026 08:00:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#dr ram puniyani]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#ram mandir]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=466</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;मंदिर को लूटा गया और घोटालेबाजों को न तो भगवन का कोई डर था और ना ही उनका धर्म से कोई लेनादेना था. इसका क्या असर होगा, यह तो आने वाले समय में ही पता लगेगा. सच तो यह है कि राममंदिर का पूरा आंदोलन मुख्यतः राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ही चलाया &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-dr-ram-puniyanis-article-from-the-plundering-of-somnath-to-chanda-chori-in-ayodhya-in-adahan-patrika/">डॉ. राम पुनियानी का आलेख- सोमनाथ के लुटने से लेकर अयोध्या में ‘चंदा चोरी‘ तक</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"></p>


<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="768" height="768" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png" alt="डा. राम पुनियानी" class="wp-image-468" style="width:260px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png 768w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-300x300.png 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-150x150.png 150w" sizes="(max-width: 768px) 100vw, 768px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;मंदिर को लूटा गया और घोटालेबाजों को न तो भगवन का कोई डर था और ना ही उनका धर्म से कोई लेनादेना था. इसका क्या असर होगा, यह तो आने वाले समय में ही पता लगेगा. सच तो यह है कि राममंदिर का पूरा आंदोलन मुख्यतः राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ही चलाया गया था. इससे भाजपा को सत्ता हासिल हुई&#8217; पढें सुप्रतिष्ठित इतिहासकार डॉ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">इस समय पूरा देश अयोध्या के राममंदिर में चंदे की लूट से स्तब्ध है, सदमे में है. इस चंदा चोरी से पूरे देश को, और खासतौर से उन श्रद्धालुओं को गहरा धक्का लगा है जिन्होंने छोटी-सी राशि से लेकर बहुत बड़ी रकमें तक अपने आराध्य भगवान राम को अर्पित की थी. राममंदिर आंदोलन के दौरान बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया था. उसी ज़मीन पर इस मंदिर को बनाया गया है. राममंदिर आंदोलन से देश हिल गया था. भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवानी के नेतृत्व में रथयात्रा निकाली गई थी. इस आन्दोलन के पीछे भाजपा-आरएसएस का एजेंडा था अयोध्या में बाबरी मस्जिद के स्थान पर राममंदिर का निर्माण. इसके लिए यह कहानी गढ़ी गई कि पहले मुगल बादशाह बाबर ने अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थल पर बने राममंदिर को तोड़कर उसके मलबे पर अपने नाम पर एक मस्जिद बनवाई थी.</p>



<p class="wp-block-paragraph">न्यायपालिका की मिलीभगत के चलते भाजपा-आरएसएस अपना लक्ष्य हासिल करने में सफल रहे. आन्दोलन के समानांतर चंदा जमा करने का काम बड़े पैमाने पर चल रहा था. बाबरी मस्जिद ढ़हाए जाने की घटना की जांच में लिब्रहान आयोग ने पाया था कि अन्य लोगों के अलावा आडवानी, मुरलीमनोहर जोशी और उमा भारती मस्जिद ढ़हाए जाने के दोषी हैं. यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में भी यह माना गया कि मस्जिद का ध्वंस एक जुर्म था. न्यायपालिका जाहिर तौर पर सत्ताधारियों के दबाव में थी और इसलिए मुजरिमों को पुरस्कार के रूप में मंदिर निर्माण के लिए वह पूरी जमीन दे दी गई जिस पर मस्जिद हुआ करती थी. इसके बाद शानदार मंदिर के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर पैसा मिलने लगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुहरी भूमिका अदा की- पहली राज्य के प्रधान की और दूसरी मंदिर के उद्घाटन समारोह में मुख्य यजमान कीं. कुल मिलाकर राम मंदिर से जुड़े सभी मामलों में अंतिम फैसला लेने वाले वे ही थे.</p>



<p class="wp-block-paragraph">मंदिर के उद्घाटन के बाद पहली बारिश में ही निर्माण की गुणवत्ता की पोल खुल गई. छत से पानी रिसने लगा. इससे बाल्टी उद्योग को जबरदस्त बढ़ावा मिला. फर्श पर पानी जमा होने से बचाने के लिए ढेर सारी बाल्टियाँ रखी गईं. श्रद्धालुओं का जमघट लगने लगा. दान इकठ्ठा करने से जुड़ी सारी व्यवस्थाएं प्रधानमंत्री कार्यालय के नियंत्रण में थीं. कितने बड़े पैमाने पर दान आ रहा था, इसका अंदाज इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सिन्धी समुदाय के विश्व सिंधी समाज ने चांदी की लगभग 200 ईटें दान की थीं, जिनमें से हर एक का वजन एक किलो था. उन्हें इसकी कोई पावती नहीं दी गई. तरह-तरह की बहुत सी बहुमूल्य वस्तुएं मंदिर को दान में मिलीं. ट्रस्टियों द्वारा गबन की गई राशि 2000 से 3000 करोड़ रूपये के बीच बताई जा रही है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुल मिलाकार यह कहा जा सकता है कि मंदिर को लूटा गया और घोटालेबाजों को न तो भगवन का कोई डर था और ना ही उनका धर्म से कोई लेनादेना था. इसका क्या असर होगा, यह तो आने वाले समय में ही पता लगेगा. सच तो यह है कि राममंदिर का पूरा आंदोलन मुख्यतः राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ही चलाया गया था. इससे भाजपा को सत्ता हासिल हुई और मुसलमानों के प्रति नफरत फैलाकर उसने अपना राजनैतिक आधार बहुत मजबूत कर लिया. हमारे लोकतंत्र से बंधुत्व का भाव बहुत हद तक लुप्त हो गया और मुसलमानों के प्रति नफरत लगातार बढ़ती गई. हमें साम्राज्यों का वह दौर याद आता है जब राजा धन के लिए मंदिरों को लूटते थे. साम्राज्यवादी दौर में राजाओं द्वारा मंदिरों की लूट और वर्तमान अर्ध-लोकतांत्रिक समाज (जो निर्वाचित तानाशाही में तब्दील होता जा रहा है) में इसी तरह की लूट में क्या अंतर है? दौलत की हवस दोनों दौरों में एक जैसी है. लेकिन धर्म-आधारित ध्रुवीकरण राजाओं की नीति नहीं थी. वहीं वर्तमान लुटेरे, जो साम्प्रदायिक शक्तियों से जुड़े हुए हैं, का मुख्य एजेंडा ध्रुवीकरण ही है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">वैसे तो मंदिर और अन्य पवित्र स्थान कई अन्य राजाओं द्वारा भी नष्ट किए गए थे मगर दो प्रमुख उदाहरण याद आते हैं. पहला है 11वीं सदी के कश्मीर के राजा हर्षदेव का और दूसरा महमूद गजनी द्वारा सोमनाथ मंदिर को लूटने का. डी. डी. कोसंबी के अनुसार &#8220;कश्मीर के राजा हर्षदेव (1089-1101 ईस्वी), जो सातवीं शताब्दी के शासक हर्ष से अलग थे, ने अत्यंत व्यवस्थित ढंग से अपने साम्राज्य में धातु की सभी देव प्रतिमाओं (मात्र चार को छोड़कर) को गलवा दिया. यह काम इसके लिए विशेष रूप से नियुक्त देवोपतन नायक पदनाम वाले मंत्री के माध्यम से करवाया गया. असगर अली इंजीनियर बताते हैं &#8220;महमूद गजनवी के बारे में भी इतिहासवेत्ताओं ने केवल कुछ तथ्यों को सामने रखा है. हम इस बात को प्रमुखता देते हैं कि उसने सोमनाथ के मंदिर को लूटा और नष्ट किया. लेकिन हम इस तथ्य पर प्रकाश नहीं डालते कि उसने अपनी सेना और प्रशासन में हिंदुओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया. उसके हिंदू जनरलों में से तिलक, सोंधी, राय हिंद और हरजन आदि का जिक्र तारीख-ए-बैहाकी में है…उसके शासनकाल में जारी सिक्कों में संस्कृत में अभिलेख थे‘‘.</p>



<p class="wp-block-paragraph">आज समाज में यह आम धारणा है कि मंदिरों को धार्मिक वजहों से नष्ट किया गया. यह धारणा अंग्रेजों द्वारा उनकी ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति के अंतर्गत किए गए साम्प्रदायिक इतिहासलेखन की वजह से बनी. महमूद गजनी ने सोमनाथ मंदिर को नष्ट करने के पहले वहां मौजूद चांदी और सोने की सभी मूर्तियों को अपने कब्जे में ले लिया जिनका कुल मूल्य सोने के बीस हजार दीनारों से अधिक रहा होगा, जो एक बहुत बड़ी रकम थी…. सुलतान इन मूर्तियों को देखकर अचंभित रह गया और उसने इन मूर्तियों और मंदिर के खजाने को जब्त करने का आदेश दिया. वहां चांदी और सोने की बहुत सी मूर्तियां थीं…मंदिर में मिली वस्तुओं का मूल्य बीस हजार दीनार से भी अधिक था‘‘.</p>



<p class="wp-block-paragraph">रोमिला थापर लिखती हैं, &#8220;मंदिरो में भक्तों द्वारा दान की गई नकद राशि, सोने की मूर्तियों और गहनों के रूप में अपार संपदा थी और इसलिए वे स्वाभाविक तौर पर उत्तर भारत में दौलत तलाश रहे गैर-हिन्दुओं के निशाने पर थे. महमूद गज़नी सोने का बहुत लालची था…और सोमनाथ अपनी अथाह संपदा के लिए विख्यात था&#8221;. वे आगे लिखती हैं. ‘‘जब बात राजनैतिक लक्ष्य हासिल करने की हो तो धर्म से जुड़े मुद्दों का इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती‘‘. आम लोगों में मुसलमानों और महमूद गजनी का दानवीकरण करने में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के उपन्यास ‘जय सोमनाथ‘ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. उसमें घटनाओं को इस तरह प्रस्तुत किया गया जिससे यह धारणा बने कि मंदिरों को लूटने की वजह सिर्फ हिंदुओं का अपमान करना यानि धार्मिक थी.</p>



<p class="wp-block-paragraph">हालांकि कई मुस्लिम राजाओं को मंदिर नष्ट करने का दोषी बताया जाता है लेकिन इस बात का बहुत कम जिक्र किया जाता है कि बहुत से मुस्लिम राजा हिंदू मंदिरों को दान देते थे. मुझे औरंगजेब द्वारा जारी उन फरमानों की प्रतियां दी गईं हैं जिनमें उत्तर भारत के विभिन्न स्थानों जैसे महाकालेश्वर (उज्जैन), बालाजी मंदिर (चित्रकूट) उमानंद मंदिर (गुवाहाटी), शत्रुंजय के जैन मंदिरों और अन्य कई प्रसिद्ध मंदिरों और गुरूद्वारो को दान दिए जाने का आदेश दिया गया है. ये फरमान इस्लामिक कैलेंडर के सन् 1065 (1659 ईस्वी) और 1095 (1685) के बीच जारी किए गए थे.&#8221; मंदिरों को नष्ट करने वाले गज़नी जैसे राजाओं और वर्तमान सत्ताधारियों के नियंत्रण वाले ट्रस्ट के बीच गजब की समानताएं नजर आ रही हैं.</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211;<strong>डॉ. राम पुनियानी </strong>, लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं. अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया.</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph">(यह लेखक के निजी विचार हैं)</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-dr-ram-puniyanis-article-from-the-plundering-of-somnath-to-chanda-chori-in-ayodhya-in-adahan-patrika/">डॉ. राम पुनियानी का आलेख- सोमनाथ के लुटने से लेकर अयोध्या में ‘चंदा चोरी‘ तक</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>डॉ. पंकज श्रीवास्तव लेख- क्यों आपातकाल था दलितों और आदिवासियों के लिए &#8216;मुक्ति-पर्व&#8217; ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/dr-pankaj-srivastava-article-why-was-the-emergency-a-festival-of-liberation-for-dalits-and-adivasis-read-the-full-article-by-dr-pankaj-srivastava-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 05:39:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#adivasi]]></category>
		<category><![CDATA[#congress]]></category>
		<category><![CDATA[#emergency]]></category>
		<category><![CDATA[#indian culture]]></category>
		<category><![CDATA[#indira gandhi]]></category>
		<category><![CDATA[#justice]]></category>
		<category><![CDATA[#nehru]]></category>
		<category><![CDATA[#rajiv gandhi]]></category>
		<category><![CDATA[#social justice]]></category>
		<category><![CDATA[#tribal]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=435</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;इमरजेंसी को देखने का एक दूसरा नज़रिया भी है जो इस काल को वंचित समुदायों के लिए “सकारात्मक स्वतंत्रता” का युग मानता है। आपातकाल ने दलितों को सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप करने का हौसला दिया। उनके लिए यह एक तरह का सामाजिक और सांस्कृतिक दावा भी था।&#8217; पढ़ें पत्रकार एवं लेखक पंकज श्रीवास्तव का पूरा &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-pankaj-srivastava-article-why-was-the-emergency-a-festival-of-liberation-for-dalits-and-adivasis-read-the-full-article-by-dr-pankaj-srivastava-on-adahan-patrika/">डॉ. पंकज श्रीवास्तव लेख- क्यों आपातकाल था दलितों और आदिवासियों के लिए &#8216;मुक्ति-पर्व&#8217; ?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;इमरजेंसी को देखने का एक दूसरा नज़रिया भी है जो इस काल को वंचित समुदायों के लिए “सकारात्मक स्वतंत्रता” का युग मानता है। आपातकाल ने दलितों को सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप करने का हौसला दिया। उनके लिए यह एक तरह का सामाजिक और सांस्कृतिक दावा भी था।&#8217; पढ़ें पत्रकार एवं लेखक पंकज श्रीवास्तव का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">पाँच दशक बाद भी इमरजेंसी को लेकर विवाद जारी है। ख़ासतौर पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और कांग्रेस को कोसने के लिए इसकी याद दिलायी जाती है। यहाँ तक कि बीजेपी ने बीते कुछ सालों से 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने की शुरुआत की है ताकि इस आलोचना को एक संस्थागत स्वरूप दिया जा सके। लेकिन इसी बीच ऐसे भी कुछ अध्ययन सामने आये हैं जो बताते हैं कि इमरजेंसी का दौर ख़ासतौर पर दलितों और आदिवासियों के लिए मुक्ति का द्वार खुलने जैसा था। भारतीय समाज को समतामूलक बनाने की दिशा में इमरजेंसी ने ‘एक्ज़ीलरेटर’ का काम किया था। साथ ही, इमरजेंसी के लिए सिर्फ़ इंदिरा गाँधी को ज़िम्मेदार ठहराना ग़लत है। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने जो मोड़ लिया था, उसमें कोई भी सरकार इमरजेंसी जैसा फ़ैसला ले सकती थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुछ महीने पहले दिल्ली में &#8216;फ़िफ्टी इयर्स ऑफ़ इंडियन इमरेजंसी: लेसन फॉर डेमोक्रेसी’ शीर्षक की एक किताब का विमोचन हुआ जिसमें 17 लेख छपे हैं। इसमें इमरजेंसी को महज़ ‘लोकतंत्र का काला अध्याय’ बताने के रिवाज से उलट कुछ ज़मीनी निष्कर्ष पेश करने वाले लेख हैं। इस सिलसिले में मशहूर राजनीति विज्ञानी और जेएनयू के पूर्व प्रोफ़ेसर गोपाल गुरु का लेख ख़ास तौर पर ध्यान खींचने वाला था। ‘स्वतंत्रता की अवधारणा पर बहस’ शीर्षक लेख में प्रो.गोपाल गुरु लिखते हैं- “ऐसा आपातकाल मुक्ति का काल बन जाता है, क्योंकि वे लोग जो दलितों और शोषित वर्गों को दबाते रहे — जैसे साहूकार, जो उन्हें कर्ज में डालते थे, जो उन्हें खाद्यान्न देने से इनकार करते थे, जो उनके बर्तन-भांडे और सोना-चांदी गिरवी रख लेते थे — वे सभी या तो धमकाए गए थे या जेल में थे।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">यानी इमरजेंसी को देखने का एक दूसरा नज़रिया भी है जो इस काल को वंचित समुदायों के लिए “सकारात्मक स्वतंत्रता” का युग मानता है। आपातकाल ने दलितों को सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप करने का हौसला दिया। उनके लिए यह एक तरह का सामाजिक और सांस्कृतिक दावा भी था। यह बताता है कि आज़ादी के बाद भारतीय समाज को समतामूलक बनाने की राह में खड़ी तमाम बाधाओं पर इमरजेंसी ने निर्णायक चोट की गयी जिसका असर देश के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस बात की तस्दीक़ इमरजेंसी के दौरान चलाये गये ‘बीस सूत्री कार्यक्रम’ से भी होती है। इस दौरान सीलिंग के ज़रिए मुक्त की गयी भूमि को भूमिहीनों (ख़ासतौर पर दलितों) को बाँटा गया। छोटे किसानों, भूमिहीनों और दस्तकारों के क़र्ज़ की वसूली पर रोक लगी। बँधुआ मज़दूरी ख़त्म करने का अभियान चला। कृषि मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी क़ानून लागू हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों में ग़रीबों के लिए मकान बने। महँगाई पर क़ाबू पाया गया और अनाज तथा आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को प्रभावी बनाया गया। अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए स्पेशल कंपोनेंट प्लान की अवधारणा विकसित की गयी जो आबादी के अनुपात में बजट सुनिश्चित करता था। छोटे-सीमांत किसानों और भूमिहीनों के लिए ऋण और अन्य सुविधाएँ दी गयीं। यही नहीं, अश्पृश्यता निरोधक क़ानून को सख़्त बनाकर जाति के आधार पर शोषण और दमन करने वालों को सख़्त संदेश दिया गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">निश्चित ही इमरजेंसी में ज़्यादतियाँ हुईं। नागरिक अधिकारों को बाधित किया गया, तमाम नेताओं को जेल हुई और प्रेस को भी सेंसरशिप का सामना करना पड़ा। लेकिन क्या इसके लिए अकेले इंदिरा गाँधी को दोषी ठहराया जा सकता है? पचास साल बाद अगर निष्पक्षता से उस समय की राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति पर नज़र डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आख़िर इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी क्यों लगायी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह कहना पूरी तरह ग़लत है कि इंदिरा गाँधी ने 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फ़ैसले के असर से बचने के लिए लगायी थी जिसके तहत रायबरेली से उनके निर्वाचन को रद्द कर दिया गया था। अगर ऐसा होता तो उसी दिन इमरजेंसी लग जाती। सच्चाई यह है कि 24 जून को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी थी ( जिसे 7 नवंबर 1975 को पूरी तरह रद्द कर दिया गया।)। यानी इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बने रहने में कोई क़ानूनी अड़चन नहीं थी। वैसे भी इलाहाबाद होईकोर्ट का तर्क किसी के गले नहीं उतर रहा था। हाईकोर्ट ने यूपी सरकार द्वारा इंदिरा गाँधी के भाषण के लिए ऊँचा मंच बनाने और यशपाल कपूर का सरकारी सेवा से इस्तीफ़ा स्वीकार होने के पहले इलेक्शन एजेंट बनने को ‘भ्रष्टाचार&#8217; करार दिया था। स्वतंत्र स्तंभकारों ने इसे ‘ट्रैफ़िक लाइट के उल्लंघन के अपराध में प्रधानमंत्री को बर्खास्त करना’ कहा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इमरजेंसी लगाने का ऐलान 25 जून की आधी रात के पहले हुई। दिन में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई रैली में जय प्रकाश नारायण ने आह्वान किया था कि सेना और पुलिस सरकार के आदेश को मानने से मना कर दे। यह केंद्रीय सत्ता को उखाड़ फेंकने का खुला आह्वान था। ऐसे में कोई दूसरी सरकार भी क्या करती? ऐसी ही स्थिति के लिए संविधान में अनुच्छेद 352 मौजूद था जिसके तहत आपातकाल लगाने का फ़ैसला किया गया। यानी यह क़दम कहीं से भी असंवैधानिक नहीं था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इंदिरा गाँधी ने उस समय विदेशी साज़िश का जो तर्क दिया था, वह भी यूँ ही नहीं था। 1971 में अमेरिका के सातवें बेड़े की धौंस को बंगाल की खाड़ी में डुबोकर उन्होंने जिस तरह बांग्लादेश का निर्माण संभव किया था, उसके बाद अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के वे स्वाभाविक ही निशाने पर थीं। 1973 में चिली के समाजवादी राष्ट्रपति सल्वाडोर अलांदे का इसी एजेंसी में तख्ता पलट किया था और सैन्य विद्रोह में उनकी जान चली गयी थी। आलेंदे की हत्या की ख़बर जब इंदिर गाँधी को मिली तो वे दिल्ली में क्यूबा के राष्ट्रपति फ़िदेल कास्त्रो की मेज़बानी कर रही थीं। बाद में कास्त्रो ने लिखा कि “ इंदिरा ने उस वक़्त कहा था- उन्होंने जो अलांदे के साथ किया है, वही मेरे साथ भी करना चाहते हैं। चिली में जिन ताक़तों ने यह काम किया है, उनसे जुड़े लोग यहाँ भी हैं।’</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके अलावा 1974 की रेल हड़ताल ने भी सरकार को गंभीर संकेत दिया था। इस हड़ताल का मक़सद देश भर के कारख़ानों में कोयला सप्लाई रोककर उत्पादन ठप कर देना था ताकि ज़रूरी चीजों की आपूर्ति न हो सके और जनता विद्रोह कर दे। हिंसा और धमाकों का सिलसिला भी जारी था ( जिसका प्रमाण बाद में बड़ौदा डायनामाइट कांड के रूप में मिला)। जनवरी 1975 में रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या भी हो गयी थी। ऐसे में इंदिरा गाँधी ने अगर इमरजेंसी लगाने का फ़ैसला किया तो अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद ही जिस तरह समाजवादी नीतियाँ लागू की थीं उससे कांग्रेस के अंदर और बाहर का दक्षिणपंथी ख़ेमा नाराज़ था। पूँजीपति बैंकों के राष्ट्रीयकरण से नाराज़ थे तो पूर्व रियासतदारों का सामंत वर्ग ‘प्रिवीपर्स’ और राजा, महाराजा और हिज़ हाईनेस जैसे टाइटन ख़त्म किये जाने से ग़ुस्से में था। नेहरू के समय ज़मींदारी उन्मूलन रोकने की उसकी तमाम कोशिशें नाकाम हुई थीं और इंदिरा ने उसे ज़मीन पर उतारने का प्रयास और तेज़ कर दिया था। ये सारी शक्तियाँ जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन को ताक़त दे रही थीं। जय प्रकाश नारायण ने आरएसएस को भी साथ ले लिया था जिस पर तब तक महात्मा गाँधी की हत्या का दाग़ गाढ़ा था और इंदिरा गाँधी की नज़र में वो एक फ़ासीवादी संगठन था। इन सब चीजों ने इंदिरा गाँधी के संदेह को बढ़ा दिया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह भी याद रखने की बात है कि बिना किसी बड़े आंदोलन के दबाव के, उन्नीस महीने बाद इंदिरा गाँधी ने ख़ुद ही इमरजेंसी हटा दी। आज के अघोषित आपात्काल में मोदी सरकार और चुनाव आयोग के रिश्तों को देखते हुए यह भी आश्चर्यजनक ही लगता है कि ‘तानाशाह’ इंदिरा गाँधी द्वारा नियुक्त चुनाव आयुक्त टी.स्वामीनाथन ने ऐसा चुनाव कराया कि इंदिरा गाँधी चुनाव हार गयीं और बिना किसी ना-नुकुर के सत्ता से हट गयीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आरएसएस को साथ लेने के सदैव विरोधी रहे मशहूर समाजवादी चिंतक मधु लिमये ने बाद में लिखा- ‘इंदिरा ने 1977 में चुनाव कराने के जो कारण बताये वह सचमुच व्यक्तित्व की अंतरात्मा को प्रतिबिंबित करता है। …इंदिरा गाँधी यह कभी नहीं भूल सकती थीं कि वह जवाहरलाल नेहरू की बेटी हैं और हम सब की तरह महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चलने वाले स्वतंत्रता संग्राम की संतान हैं।’</p>



<p class="wp-block-paragraph">1977 के चुनाव में नसबंदी और उससे जुड़ी अफ़वाहें उत्तर भारत में कांग्रेस के सफ़ाये का सबसे बड़ा कारण बनी थीं। लेकिन ढाई साल में ही संपूर्ण क्रांति का ढोल फट गया। जनता पार्टी ने 1980 में ‘फिर इमरजेंसी’ का डर दिखाकर इंदिरा गाँधी को रोकने की कोशिश की लेकिन कांग्रेस के पक्ष में आँधी चली और उसे लोकसभा में 353 सीटें मिलीं जबकि जनता पार्टी महज़ 31 सीटों पर सिमट गयी। जनता की अदालत में इमरजेंसी का मुक़दमा इसी चुनाव में निपट गया था जिसे साढ़े चार दशक बाद मोदी सरकार फिर सुनवाई पर लाने की कोशिश करती रहती है। लेकिन दलित-वंचित समाज की ओर से इमरजेंसी को लेकर जो नया नज़रिया सामने आ रहा है, वह इस कोशिश के सामने बड़ी चुनौती साबित होगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">साभार- द लेंस</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-pankaj-srivastava-article-why-was-the-emergency-a-festival-of-liberation-for-dalits-and-adivasis-read-the-full-article-by-dr-pankaj-srivastava-on-adahan-patrika/">डॉ. पंकज श्रीवास्तव लेख- क्यों आपातकाल था दलितों और आदिवासियों के लिए &#8216;मुक्ति-पर्व&#8217; ?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
