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	<title>देश Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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	<title>देश Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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		<title>श्रवण गर्ग का लेख &#8211; संजय सिंह को कौन बताए कि मोदी जी ‘निर्मम क्यों है ?’</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Jul 2026 06:47:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>पत्रकार श्रवण गर्ग &#8216;मोदीजी अगर सभी असंतुष्ट लोगों की बात सुनने लग गए होते और हर बात का जवाब देने बैठ जाते तो फिर बारह सालों के दौरान लगभग सौ देशों की इतनी निश्चिंतता से यात्राएँ कर ढेर सारे अवॉर्ड्स प्राप्त करना तो बहुत दूर,एक दिन के लिए भूटान तक भी नहीं जा पाते !&#8217; &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-the-full-article-by-renowned-journalist-shrawan-garg-who-will-tell-sanjay-singh-why-modi-ji-is-ruthless-on-adahan-patrika/">श्रवण गर्ग का लेख &#8211; संजय सिंह को कौन बताए कि मोदी जी ‘निर्मम क्यों है ?’</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="450" height="450" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg" alt="पत्रकार श्रवण गर्ग" class="wp-image-413" style="width:149px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg 450w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-300x300.jpg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-150x150.jpg 150w" sizes="(max-width: 450px) 100vw, 450px" /><figcaption class="wp-element-caption">पत्रकार श्रवण गर्ग</figcaption></figure>
</div>


<p><strong>&#8216;मोदीजी अगर सभी असंतुष्ट लोगों की बात सुनने लग गए होते और हर बात का जवाब देने बैठ जाते तो फिर बारह सालों के दौरान लगभग सौ देशों की इतनी निश्चिंतता से यात्राएँ कर ढेर सारे अवॉर्ड्स प्राप्त करना तो बहुत दूर,एक दिन के लिए भूटान तक भी नहीं जा पाते !&#8217; पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>सोनम वांगचुक को किसी भी तरह मनाया जाना चाहिए या कोई सम्मानपूर्ण रास्ता खोजा जाए जिससे कि वे अपना आमरण अनशन ख़त्म कर दें। खोजे जाने वाले उपायों में एक यह भी हो सकता है कि अण्णा हजारे को दिल्ली लाकर उनसे अपील करवाई जाए।</p>



<p>ऐसा लगता है आमरण अनशन पर बैठने से पहले वांगचुक ने अरविंद केजरीवाल से एक्सपर्ट ओपिनियन नहीं ली थी अन्यथा आम आदमी पार्टी के ‘चतुर’ (नेता) ‘थ्री इडिअट्स’ के प्रेरणा पुरुष को मोदी के सामने इतनी बड़ी जोखिम उठाने की कभी सलाह नहीं देते।</p>



<p>अण्णा हजारे के और सब योगदानों को छोड़ दें तब भी अपनी बात मनवाने के लिए गांधीजी के जिस अंतिम हथियार का उन्होंने प्रथम शास्त्र के तौर पर हमेशा सफलतापूर्वक दुरुपयोग किया वह बात-बात पर आमरण अनशन पर बैठ जाना ही रहा ! पर वह ज़माना डॉ मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री की मानवीय हुकूमत का था।</p>



<p>मनमोहन सिंह सरकार द्वारा हजारे के ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन के दौरान दल के दल बनाकर बातचीत के लिए रामलीला मैदान भेजे जाते रहे।सारी शर्तें मान ली गईं।आंदोलन ख़त्म करवा कर अण्णा को महान नेता बनवा दिया गया । नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्ता में आने के बादसे अण्णा रालेगण सिद्धि में ही स्थिर हैं।</p>



<p>वांगचुक अपने इस पूर्व अनुभव के बाद भी अनशन पर बैठ गए कि इसी हुकूमत ने उन्हें एनएसए के तहत 170 दिनों तक तपती गर्मी में जोधपुर की जेल के एकांतवास में बंद रखने के बाद इसी साल रिहा किया था।स्टेन स्वामी हों या उमर ख़ालिद किसी भी तरह के प्रतिरोध के लिये मोदीजी के लोकतंत्र में गुंजाइश नहीं है।</p>



<p>‘आम आदमी पार्टी’ के सांसद संजय सिंह ने सोशल मीडिया X पर प्रधानमंत्री से सवाल किया है कि वांगचुक के अनशन के मुद्दे पर वे आख़िर चुप क्यों हैं ? “ सोचकर तकलीफ़ होती है मोदीजी, आप इतने निर्मम कैसे हो सकते हैं ? सोनम वांगचुक जैसे पढ़े-लिखे शख़्स पेपर लीक के ख़िलाफ़ अनशन पर बैठे हैं। उनका वजन सात किलो घट चुका है।मोदीजी को तो उनकी बात सुनने की फुर्सत नहीं है,’ संजय सिंह कहते हैं !</p>



<p>मोदीजी अगर सभी असंतुष्ट लोगों की बात सुनने लग गए होते और हर बात का जवाब देने बैठ जाते तो फिर बारह सालों के दौरान लगभग सौ देशों की इतनी निश्चिंतता से यात्राएँ कर ढेर सारे अवॉर्ड्स प्राप्त करना तो बहुत दूर,एक दिन के लिए भूटान तक भी नहीं जा पाते ! मोदीजी अगर वांगचुक के अनशन पर चुप्पी तोड़ दें तो संजय सिंह उनसे फिर राममंदिर के चंदे-चढ़ावे का हिसाब पूछने लगेंगे !</p>



<p>संजय सिंह ने पूछा है कि मोदीजी इतने निर्मम कैसे हो सकते हैं ? संजय सिंह शायद भूल गए हैं कि केजरीवाल सरकार की आबकारी नीति के मामले में ED ने उन्हें अक्टूबर 2023 में गिरफ़्तार कर छह महीने तक जेल में बंद रखा था। सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिलने के बाद ही 2024 में वे रिहा हुए थे।</p>



<p>मोदीजी जिस तरह से सरकार चलाना चाहते हैं उसमें उनका निर्मम होना या नज़र आना ज़रूरी हो गया है। तीन काले कृषि क़ानूनों के विरोध में नवंबर 2020 से दिसंबर 2021 तक चले किसान आंदोलन में 750 प्रदर्शनकारियों की मौतें हुईं थीं। क्या मोदीजी की तरफ़ से कभी कोई खेद व्यक्त किया गया ?</p>



<p>मोदीजी ने माफ़ी इस बात को लेकर अवश्य माँगी थी कि क़ानूनों की सच्चाई को पूरी तरह से समझा पाने की उनकी तपस्या में शायद कोई कमी रह गई ! संजय सिंह को पता है कि सांसदों के सदन से निलंबन के बाद क़ानून किस तरह से राज्य सभा में पास करवाए गए थे !</p>



<p>मोदी सरकार को किसी की भी कोई बात सुनने की फ़ुरसत नहीं है ! बीजेपी के पितृ संगठन आरएसएस की बात भी नहीं ! पार्टी के उन बुजुर्ग नेताओं की भी नहीं जिन्होंने बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए आहुतियाँ दीं थी और अब किसी अज्ञात ‘मार्गदर्शन मंडल’ में साँसें गिन रहे हैं।</p>



<p>वांगचुक को अगर कुछ हो गया तो अभिजीत दीपके की’ कॉकरोच जनता पार्टी’ के करोड़ों सोशल मीडिया फ़ॉलोअर्स पूरी तरह डीमोरेलाइज़्ड हो जाएँगे ! हुकूमत सारे ही जन-आंदोलनों को बिना सरकारी हस्तक्षेप के हतोत्साहित और निराश होते देखना चाहती है।अतः वांगचुक के आमरण अनशन को अगर जारी रहने दिया जाता है तो उसे सरकार की मदद करने जैसा ही माना जाना जाएगा।</p>



<p>संजय सिंह और अन्य विपक्षी नेता अगर वांगचुक के गिरते स्वास्थ्य को लेकर ईमानदारी से चिंतित हैं तो उन्हें लद्दाखी नेता के आमरण अनशन को तुरंत समाप्त करवाना चाहिए ! मोदीजी के उत्तर की प्रत्याशा में वांगचुक का अनशन जारी रखना भी एक तरह की निर्ममता ही होगी !</p>
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		<title>क्या धार्मिक आस्थाओं का राजनीतिक अस्थि संचय हो रहा है ? -श्रवण गर्ग</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Jul 2026 14:29:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;नागरिक क्यों आश्वस्त होना चाहते हैं कि कथित तौर पर जो एक राजनीतिक आपातकाल देश में पहले से ही उपस्थित है उसके अलावा यह कोई नया धार्मिक आपदाकाल तो नहीं है ? एक ऐसा आपदाकाल जिसमें धार्मिक आस्थाएँ संदेहों की अस्थियों में परिवर्तित होकर कोविडकाल की तरह व्यवस्था की नदियों में तैर रही हैं !&#8217; &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;नागरिक क्यों आश्वस्त होना चाहते हैं कि कथित तौर पर जो एक राजनीतिक आपातकाल देश में पहले से ही उपस्थित है उसके अलावा यह कोई नया धार्मिक आपदाकाल तो नहीं है ? एक ऐसा आपदाकाल जिसमें धार्मिक आस्थाएँ संदेहों की अस्थियों में परिवर्तित होकर कोविडकाल की तरह व्यवस्था की नदियों में तैर रही हैं !&#8217; पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


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<figure class="alignleft size-full is-resized"><img decoding="async" width="450" height="450" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg" alt="पत्रकार श्रवण गर्ग" class="wp-image-413" style="width:185px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg 450w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-300x300.jpg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-150x150.jpg 150w" sizes="(max-width: 450px) 100vw, 450px" /><figcaption class="wp-element-caption">पत्रकार श्रवण गर्ग</figcaption></figure>
</div>


<p>जनता इतने आत्मविश्वास के साथ क्यों दावा कर रही है कि रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में हुए चंदे-चढ़ावे के घोटाले में कुछ भी नहीं होगा या कुछ निकलेगा ? असली दोषियों के न कभी नाम बाहर आएँगे और न उनका बाल कोई बाँका होगा ? घोटाले की जाँच के लिए बनाए गए विशेष जाँच दल द्वारा कोई सनसनीख़ेज़ रहस्योद्घाटन भी नहीं होगा। दल का कार्यकाल वैसे भी 15 जुलाई तक बढ़ गया है। मुमकिन है जाँच का दायरा बढ़ाकर कार्यकाल फिर से बढ़ा दिया जाए।</p>



<p>चंपतराय के विकल्प की तलाश प्रारंभ हो चुकी है। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरि अब कह रहे हैं कि वे कोषाध्यक्ष तो थे लेकिन उनकी कोई भूमिका ही नहीं थी। किसी भी काम में उनका कोई दखल नहीं था।</p>



<p>श्रद्धालुओं के बीच इस तरह की बातें क्यों हैं कि घोटाले का इस समय बाहर आना किसी बड़ी राजनीतिक कार्ययोजना का हिस्सा भी हो सकता है जिसके कि तार यूपी में अगले साल होने वाले महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से जुड़े हों ?</p>



<p>नागरिकों के बीच ऐसा डर क्यों है कि लगभग पच्चीस करोड़ की आबादी वाले देश के सबसे बड़े राज्य में चुनावों के पहले ख़ौफ़ का साम्राज्य क़ायम हो रहा है ?</p>



<p>नागरिक क्यों सवाल कर रहे हैं कि मंदिर-निर्माण के लिए भूमि-पूजन से लेकर उसके भव्य उद्घाटन-समारोह तक आकर्षण का केंद्र बने रहे दोनों प्रमुख यजमान करोड़ों हिन्दू भक्तों की धार्मिक आस्थाओं के साथ हुए आघात के प्रति बिलकुल भी विचलित नहीं दिखाई पड़ रहे हैं ? प्रधानमंत्री विदेशों के और संघ-प्रमुख देश में भ्रमण कर रहे हैं, प्रेरक उद्बोधन वितरित कर रहे हैं !</p>



<p>नागरिक क्यों आश्वस्त होना चाहते हैं कि कथित तौर पर जो एक राजनीतिक आपातकाल देश में पहले से ही उपस्थित है उसके अलावा यह कोई नया धार्मिक आपदाकाल तो नहीं है ? एक ऐसा आपदाकाल जिसमें धार्मिक आस्थाएँ संदेहों की अस्थियों में परिवर्तित होकर कोविडकाल की तरह व्यवस्था की नदियों में तैर रही हैं !</p>



<p>ऐसा इसलिए कि जब कभी व्यवस्थाएँ किसी बड़े राजनीतिक अथवा नैतिक संकट से मुखातिब होती हैं कोई नई आपदा आस्थाओं की भीड़ के बीच किसी साँप के बच्चे की तरह अचानक से प्रकट हो जाती है ! इसके कारण मचने वाली भगदड़ में आस्थाएँ तो श्वासहीन शरीरों में तब्दील होने लगती हैं,साँप का बच्चा सुरक्षित ग़ायब हो जाता है !</p>



<p>स्मरण किया जाए तो यक़ीन करना मुश्किल हो जाएगा कि कोविडकाल के दौरान असीमित कष्ट भुगत रहे नागरिकों के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कभी ऐसा कहा होगा : ‘ जब वे अपने भाई-बहनों की तरफ़ देखते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि वे (भाई-बहन) सोच रहे होंगे कि ये कैसा प्रधानमंत्री है जिसने हमें इतनी कठिनाइयों में डाल दिया है !’</p>



<p>नागरिक डरे हुए हैं कि कोविडकाल के दौरान उनकी आस्थाओं के साथ किए गए प्रयोगों को कहीं सरकार ने आपदाओं से निपटने के किसी स्थाई रोल मॉडल में तो नहीं परिवर्तित कर दिया गया है ! खाड़ी युद्ध से उत्पन्न संकट पर संसद में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने चार महीने पूर्व ही कहा था कि :’ पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण भारत के सामने अभूतपूर्व चुनौतियाँ हैं और उनसे निपटने के लिए देश को कोविड संकट के समय की तरह एकजुट होकर तैयार रहना होगा।’</p>



<p>सवाल एक और भी है जो सबसे बड़ा है ! वह यह कि मोदी-भागवत के भारत में निर्मित हुए हिंदुत्व की आस्थाओं के सर्वोच्च तीर्थस्थल की पवित्रता ही अगर संदेहों के घेरे में सिमट रही है तो क्या इसे केदारनाथ की गुफा और विवेकानंद स्मारक पर किये गए तपों से अर्जित पुण्य के क्षीण होने की शुरुआत मान लेना चाहिए या फिर किसी नए ईश्वरीय चमत्कार की प्रतीक्षा करना चाहिए ?</p>



<p></p>
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		<title>शीतल पी सिंह का लेख- भारत-चीन सीमा विवाद कैसे दे रहा नई वास्तविकताओं को आकार ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/sheetal-p-singhs-article-how-is-the-india-china-border-dispute-shaping-new-realities-read-the-full-article-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 02 Jul 2026 14:57:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;मोदी सरकार की नीति पिछले कुछ वर्षों में स्पष्ट रूप से यह रही है कि चीन के साथ किसी बड़े सैन्य टकराव से हर कीमत पर बचा जाए। 2020 की गलवान घाटी की हिंसक घटना के बाद भारत ने सीमा पर सैनिकों और हथियारों की तैनाती अवश्य बढ़ाई, सड़कें और आधारभूत ढाँचा भी तेज़ी से &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img decoding="async" width="715" height="715" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1.jpeg" alt="पत्रकार शीतल पी सिंह" class="wp-image-457" style="width:130px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1.jpeg 715w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1-300x300.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1-150x150.jpeg 150w" sizes="(max-width: 715px) 100vw, 715px" /></figure>
</div>


<p><strong>&#8216;मोदी सरकार की नीति पिछले कुछ वर्षों में स्पष्ट रूप से यह रही है कि चीन के साथ किसी बड़े सैन्य टकराव से हर कीमत पर बचा जाए। 2020 की गलवान घाटी की हिंसक घटना के बाद भारत ने सीमा पर सैनिकों और हथियारों की तैनाती अवश्य बढ़ाई, सड़कें और आधारभूत ढाँचा भी तेज़ी से विकसित किया, लेकिन सरकार ने ऐसी किसी भी कार्रवाई से परहेज़ किया जिससे व्यापक युद्ध या लगातार सीमा संघर्ष की स्थिति बन सकती थी।&#8217; पढ़ें सुप्रतिष्ठित पत्रकार शीतल पी सिंह का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>भारत-चीन सीमा पर हाल में सामने आई उच्च-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों ने एक बार फिर उस कठिन वास्तविकता की याद दिलाई है, जिसे अक्सर राजनीतिक शोर-शराबे में भुला दिया जाता है। खबर है कि चीन अरुणाचल प्रदेश से लगी तिब्बत सीमा के एक ऐसे क्षेत्र में नई सड़क का निर्माण कर रहा है, जिसे भारत अपने आधिकारिक मानचित्रों में अपना क्षेत्र मानता है। यह क्षेत्र मैकमोहन रेखा के भारतीय पक्ष में आता है। लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि यह इलाका 1959 से चीन के प्रभावी नियंत्रण में है और आज भारतीय सेना की नियमित गश्त तथा नियंत्रण रेखा (LAC) के पार स्थित माना जाता है। यानी भारत का कानूनी दावा आज भी कायम है, लेकिन वास्तविक नियंत्रण चीन के पास है।</p>



<p>यही भारत-चीन सीमा विवाद की सबसे जटिल सच्चाई है। मैकमोहन रेखा और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) एक ही चीज़ नहीं हैं। मैकमोहन रेखा भारत की ऐतिहासिक और आधिकारिक सीमा का आधार है, जबकि LAC वह सैन्य वास्तविकता है जहाँ तक दोनों देशों की सेनाएँ अपने-अपने नियंत्रण का दावा और अभ्यास करती हैं। इन दोनों के बीच का अंतर ही अक्सर ऐसी खबरों को जन्म देता है कि चीन “भारतीय क्षेत्र” में निर्माण कर रहा है, जबकि चीन का दावा होता है कि वह अपने नियंत्रण वाले इलाके में काम कर रहा है।</p>



<p>भारत-चीन सीमा विवाद का इतिहास भी इस संदर्भ में समझना आवश्यक है। 1962 का युद्ध अचानक नहीं हुआ था। उसके पहले कई वर्षों से सीमा के सीमांकन को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद बढ़ रहे थे। भारत की ‘फ़ॉरवर्ड पॉलिसी’, तिब्बत पर चीन का नियंत्रण, दलाई लामा को भारत में शरण और दोनों देशों की अलग-अलग सीमा संबंधी व्याख्याओं ने तनाव को चरम पर पहुँचा दिया। अक्टूबर 1962 में युद्ध छिड़ा और भारत को सैन्य पराजय का सामना करना पड़ा। युद्धविराम की घोषणा के बाद चीन पूर्वी क्षेत्र में मैकमोहन रेखा के उत्तर लौट गया, लेकिन पश्चिमी क्षेत्र में उसने अक्साई चिन पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। इसके बाद 1967 में सिक्किम सीमा पर नाथू ला और चो ला में दोनों सेनाओं के बीच भारी गोलीबारी और तोपों तक का प्रयोग हुआ, जिसमें दोनों पक्षों को नुकसान हुआ, लेकिन भारत ने अपने मोर्चे मजबूती से संभाले रखे। इसके बाद दशकों तक भारत-चीन सीमा पर बंदूकों से ऐसी बड़ी मुठभेड़ नहीं हुई। 1993 और 1996 सहित कई समझौतों के बाद दोनों देशों ने सीमा पर आग्नेयास्त्रों के प्रयोग से बचने की व्यवस्था विकसित की। हालांकि जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने दिखाया कि बंदूकें भले न चली हों, लेकिन लोहे की रॉड, कीलों वाले डंडों और पत्थरों से हुई हाथापाई भी कितनी भयावह और जानलेवा हो सकती है।</p>



<p>इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि भारत का दावा समाप्त हो गया है। भारत आज भी पूरे अरुणाचल प्रदेश को अपना अभिन्न अंग मानता है और चीन द्वारा समय-समय पर भारतीय स्थानों के चीनी नामकरण या नए नक्शे जारी करने का लगातार विरोध करता रहा है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि केवल कूटनीतिक विरोध दर्ज कराने और सैन्य वास्तविकता को बदल देने में बहुत अंतर होता है।</p>



<p>मोदी सरकार की नीति पिछले कुछ वर्षों में स्पष्ट रूप से यह रही है कि चीन के साथ किसी बड़े सैन्य टकराव से हर कीमत पर बचा जाए। 2020 की गलवान घाटी की हिंसक घटना के बाद भारत ने सीमा पर सैनिकों और हथियारों की तैनाती अवश्य बढ़ाई, सड़कें और आधारभूत ढाँचा भी तेज़ी से विकसित किया, लेकिन सरकार ने ऐसी किसी भी कार्रवाई से परहेज़ किया जिससे व्यापक युद्ध या लगातार सीमा संघर्ष की स्थिति बन सकती थी। समर्थकों का तर्क है कि दो परमाणु शक्तियों के बीच युद्ध किसी के हित में नहीं होगा और संयम ही परिपक्व नेतृत्व की पहचान है। आलोचकों का कहना है कि अत्यधिक संयम चीन को धीरे-धीरे अपनी स्थिति और मजबूत करने का अवसर देता है। सरकार का दृष्टिकोण यह प्रतीत होता है कि सीमित भूभाग पर सामरिक धैर्य रखते हुए भारत अपनी आर्थिक, सैन्य और अवसंरचनात्मक क्षमता को दीर्घकाल में मजबूत करे, क्योंकि बिना व्यापक राष्ट्रीय शक्ति के केवल सीमावर्ती सैन्य प्रतिक्रिया से स्थायी समाधान संभव नहीं है।</p>



<p>असल प्रश्न यह नहीं है कि युद्ध होना चाहिए या नहीं। युद्ध किसी भी समस्या का पहला समाधान नहीं हो सकता। लेकिन लोकतंत्र में जनता को यह जानने का अधिकार अवश्य है कि वास्तविक स्थिति क्या है। किन इलाकों में भारत पहले की तरह गश्त कर पा रहा है और किन क्षेत्रों में नहीं? क्या कहीं बफर ज़ोन बनने से भारतीय गश्त प्रभावित हुई है? जिन इलाकों पर भारत अपना दावा करता है, वहाँ उस दावे को मजबूत करने के लिए भविष्य की रणनीति क्या है? इन प्रश्नों पर पारदर्शिता लोकतंत्र की आवश्यकता है, कमजोरी नहीं।</p>



<p>सीमा विवाद केवल सैनिकों का विषय नहीं होता; यह राष्ट्रीय नीति, कूटनीति, आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता और दीर्घकालिक रणनीतिक धैर्य की भी परीक्षा होता है। चीन पिछले कई वर्षों से सीमा पर सड़कें, पुल, गाँव, हवाई पट्टियाँ और अन्य सैन्य ढाँचे बनाकर अपनी स्थिति लगातार मजबूत करता रहा है। भारत ने भी अपनी ओर बुनियादी ढाँचे का विस्तार तेज़ किया है, लेकिन जहाँ चीन पहले से प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर चुका है, वहाँ स्थिति बदलना केवल राजनीतिक भाषणों से संभव नहीं है।</p>



<p>राष्ट्रहित की सबसे बड़ी कसौटी यह नहीं कि कौन सबसे ऊँची आवाज़ में राष्ट्रवाद का नारा लगाता है। असली कसौटी यह है कि देश की सीमाएँ कितनी सुरक्षित हैं, जनता को कितनी ईमानदारी से जानकारी दी जाती है और सरकार अपने दावों को भविष्य में वास्तविकता में बदलने के लिए कितनी स्पष्ट एवं दीर्घकालिक रणनीति रखती है। चीन की हर नई सड़क केवल कंक्रीट की एक पट्टी नहीं होती; वह हमें यह याद दिलाती है कि सीमा विवाद समय के साथ स्वयं समाप्त नहीं होते। उन्हें या तो कूटनीति, शक्ति और धैर्य के संतुलन से सुलझाया जाता है, या फिर वे धीरे-धीरे नई वास्तविकताओं का रूप ले लेते हैं।</p>



<p>&#8211;<strong>शीतल पी सिंह , फेसबुक वॉल से साभार</strong></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/sheetal-p-singhs-article-how-is-the-india-china-border-dispute-shaping-new-realities-read-the-full-article-on-adahan-patrika/">शीतल पी सिंह का लेख- भारत-चीन सीमा विवाद कैसे दे रहा नई वास्तविकताओं को आकार ?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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		<title>लोकतंत्र की हत्या अब लाठी से नहीं, सूची से होगी</title>
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		<pubDate>Wed, 01 Jul 2026 14:13:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;अगर नागरिकता की परिभाषा संदिग्ध कर दी जाए, जनगणना के आंकड़ों पर भरोसा कम कर दिया जाए, SIR के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए और परिसीमन के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पूरा नक्शा बदल दिया जाए तो चुनाव भले होते रहें, लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाएगा।&#8217; &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;अगर नागरिकता की परिभाषा संदिग्ध कर दी जाए, जनगणना के आंकड़ों पर भरोसा कम कर दिया जाए, SIR के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए और परिसीमन के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पूरा नक्शा बदल दिया जाए तो चुनाव भले होते रहें, लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाएगा।&#8217; पढ़ें पत्रकार त्रिभुवन का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>जीएन देवी भारत के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक कार्यकर्ता, भाषाविद्, साहित्य-आलोचक और सार्वजनिक बुद्धिजीवी हैं। वे विलुप्तप्राय और उपेक्षित भाषाओं के दस्तावेज़ीकरण तथा संरक्षण के अपने असाधारण काम के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। People’s Linguistic Survey of India के नेतृत्वकर्ता के रूप में उन्होंने भारत के आदिवासी, घुमंतू, सीमांत और हाशिए के समुदायों की भाषाई-सांस्कृतिक अस्मिता को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का ऐतिहासिक कार्य किया है। अभी मैंने &#8220;महाभारत : काव्य और राष्ट्र&#8221; शीर्षक वाली विद्वत्तापूर्ण पुस्तक पूरी की ही थी कि उनके जयपुर आगमन की ख़बर मिली तो मैं अपने आपको उनके व्याख्यान में जाने से रोक नहीं पाया।</p>



<p>जयपुर में जीएन देवी का व्याख्यान किसी साहित्यिक विद्वान का सामान्य भाषण नहीं था। वह लोकतंत्र के शव-परीक्षण से पहले की अंतिम चेतावनी जैसा था। एक खचाखच भरे विशालकाय सभागार में करीने से धीर-गंभीर बैठे लोगों को उन्होंने नागरिकता, जनगणना, SIR, परिसीमन और जनसांख्यिकी के नाम पर बन रही उस नई राजनीति को समझाया, जिसमें नागरिक को पहले आंकड़ा बनाया जाता है, फिर संदेहास्पद बनाया जाता है, फिर सूची से हटाया जाता है और अंत में राष्ट्र से बाहर धकेल दिया जाता है। यह सब बंदूक से नहीं होता। यह फॉर्म से होता है। यह हिरासत-शिविर से पहले प्रमाणपत्र मांगता है। यह संविधान पर हमला करने से पहले मतदाता-सूची पर हमला करता है।</p>



<p>हैरानी यह नहीं कि हॉल भरा हुआ था। हैरानी यह है कि वहाँ मीडिया नहीं था। राजनीतिक दल नहीं थे। विपक्ष नहीं था। कांग्रेस नहीं थी। वे लोग नहीं थे जिनका पहला काम नागरिकता, मतदान-अधिकार, संविधान और प्रतिनिधित्व की रक्षा करना है। यह वही कांग्रेस है जो चुनाव के समय बूथ मैनेजमेंट पर लाखों वॉट्सऐप संदेश भेजती है, लेकिन जब नागरिकता और जनगणना के जरिए पूरे लोकतंत्र का भूगोल बदलने की बहस उठती है तो उसकी वैचारिक रीढ़ जैसे गायब हो जाती है। प्रतिपक्ष में होकर भी अगर किसी दल को Census, SIR, Demography, Delimitation और Citizenship जैसे शब्दों से बेचैनी नहीं होती तो समझना चाहिए कि वह सत्ता से नहीं, इतिहास से पराजित है। इस तरह के कार्यक्रमों से कांग्रेस की दूरी बताती है कि वह विधानसभा चुनाव में पक्का मार खाएगी और फिर शोर मचाएगी कि बीजेपी ने वोट चुरा लिये। उनकी उदासीनता संकेत दे रही है कि राजस्थान में बंगाल रिपीट होगा।</p>



<p>जीएन देवी ने जिस संकट की ओर इशारा किया, वह बेहद गंभीर है। भारत में लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं है। लोकतंत्र इस बात का नाम है कि कौन नागरिक माना जाएगा, कौन मतदाता रहेगा, किसकी गिनती होगी, किस राज्य को कितनी राजनीतिक शक्ति मिलेगी, किस भाषा को कितनी जगह मिलेगी, किस समुदाय को संदेह की नजर से देखा जाएगा और किसे राष्ट्र की मुख्यधारा से बाहर कर दिया जाएगा। यह सब मिलकर लोकतंत्र का वास्तविक ढांचा बनाते हैं। अगर नागरिकता की परिभाषा संदिग्ध कर दी जाए, जनगणना के आंकड़ों पर भरोसा कम कर दिया जाए, SIR के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए और परिसीमन के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पूरा नक्शा बदल दिया जाए तो चुनाव भले होते रहें, लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाएगा।</p>



<p>देवी ने एक डच फिल्म A Question of Silence का जिक्र करते हुए अपना व्याख्यान शुरू किया। इसमें तीन स्त्रियां एक हिंसक और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के सामने चुप्पी को प्रतिरोध में बदल देती हैं। अदालत उन्हें पागल साबित करना चाहती है, पर सवाल उलटा हो जाता है—पागल वे हैं या वह व्यवस्था है जो उनके जीवन को रोज़ चुपचाप कुचलती रही? आज भारत में भी यही प्रश्न खड़ा है। अगर कोई नागरिक अपने दस्तावेज़ों में एक अक्षर की त्रुटि के कारण संदिग्ध हो जाता है, अगर कोई घुमंतू पशुपालक, कोई मजदूर, कोई आदिवासी, कोई नदी किनारे का विस्थापित, कोई बिना स्थायी पते का मनुष्य राज्य की नजर में “अपूर्ण नागरिक” हो जाता है तो पागल नागरिक नहीं है; पागल व्यवस्था है।</p>



<p>सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि जनगणना अब केवल जनगणना नहीं रह गई है। वह कल्याणकारी योजनाओं, खाद्य सुरक्षा, भाषा, रोजगार, संसाधन-वितरण, निर्वाचन-क्षेत्र, आरक्षण और राजनीतिक शक्ति का मूल आधार है। Planning Commission या बाद की नीति-प्रक्रियाओं में खाद्य सुरक्षा जैसे दस्तावेज़ों की रीढ़ डेटा रहा है। अगर डेटा सही है तो नीति गरीब तक पहुँच सकती है। अगर डेटा देर से आता है, अधूरा आता है या अविश्वसनीय आता है तो शासन अनुमान, प्रचार और पूर्वग्रह पर चलने लगता है। यही वह जगह है जहाँ लोकतंत्र मरना शुरू करता है—जब गरीब का पेट आंकड़े में गायब हो जाए और विस्थापित का नाम सूची में न मिले।</p>



<p>भारत की जनगणना की परंपरा 1871 में औपनिवेशिक शासन के दौर से व्यवस्थित रूप में शुरू हुई। औपनिवेशिक सत्ता ने गिनती को नियंत्रण का उपकरण बनाया था। स्वतंत्र भारत ने उसी गिनती को लोकतांत्रिक योजना और सामाजिक न्याय का आधार बनाया। फर्क यही था—वहाँ census सत्ता की आंख था, यहाँ census नागरिक अधिकार का आधार होना चाहिए था। लेकिन अब भय यह है कि हम फिर उसी औपनिवेशिक प्रवृत्ति की ओर लौट रहे हैं, जहाँ राज्य नागरिक को समझने के लिए नहीं, उसे वर्गीकृत और नियंत्रित करने के लिए गिनता है।</p>



<p>इसीलिए “Demography Commission” या “Demographic Mission” जैसी अवधारणाएँ अत्यंत सावधानी से देखी जानी चाहिए। जनसांख्यिकी अपने आप में विज्ञान है। लेकिन जब उसी विज्ञान को “घुसपैठ”, “अस्वाभाविक परिवर्तन” और “आंतरिक खतरा” जैसी राजनीतिक भाषा में बांध दिया जाए तो वह विज्ञान नहीं रहता, वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का डंडा बन जाता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हमेशा संस्कृति की बात करता है, लेकिन उसका असली लक्ष्य नागरिकता की छंटनी होता है। वह कहता है कि वह राष्ट्र बचा रहा है; वस्तुतः वह राष्ट्र को नागरिकों से खाली कर रहा होता है।</p>



<p>जीएन देवी ने व्याख्यान में पुनर्जागरण आंदोलन की याद दिलाई। राजा राममोहन राय ने उन्नीसवीं सदी के आरंभ में एकेश्वरवाद, विवेक और धार्मिक समानता की दिशा में प्रश्न उठाए। ब्रह्म समाज ने धर्म को तार्किकता और नैतिकता की कसौटी पर रखने की कोशिश की। उन्नीसवीं सदी में आर्य समाज ने वेदों की ओर लौटने का आह्वान किया। फिर धीरे-धीरे सुधारवाद की धार से एक दूसरी धारा निकली—हिन्दू समाज की राजनीतिक संगठनशीलता, हिंदू महासभा, सावरकर की 1923 की हिंदुत्व-पुस्तिका, मूंजे-हेडगेवार की संगठन-दृष्टि और 1925 का आरएसएस। यह इतिहास इसलिए महत्वपूर्ण है कि इससे पता चलता है—एक देश में धार्मिक सुधार, सांस्कृतिक पुनरुद्धार और राजनीतिक राष्ट्रवाद के बीच फर्क मिटता है तो अंततः नागरिकता की जगह सांस्कृतिक शुद्धता बैठ जाती है।</p>



<p>हालांकि मैं देवी की पुनर्जागरण आंदोलन संबंधी कुछ अवधारणाओं से सहमत नहीं हूँ। लेकिन उन्होंने आज की चिंताओं को बहुत प्रखरता से रखा। उनका कहना था कि आज ज़रूरत संविधान समाज की है—ऐसे समाज की जो कहे कि नागरिकता जन्म, जाति, धर्म, भाषा, खान-पान, वेशभूषा या काग़ज़ी संदेह की बंधक नहीं हो सकती। संविधान समाज का अर्थ है—हर नागरिक की गरिमा, हर मतदाता का अधिकार, हर भाषा का सम्मान, हर क्षेत्र का न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व।</p>



<p>कांग्रेस और विपक्ष का मौन इसलिए अपराध है। वे समझ ही नहीं रहे कि लड़ाई केवल महंगाई, टिकट, गठबंधन या मुख्यमंत्री पद की नहीं है। लड़ाई इस बात की है कि 2027 के बाद भारत का राजनीतिक भूगोल कैसा होगा। परिसीमन केवल सीटों का बंटवारा नहीं होता; वह सत्ता की नसों का पुनर्संयोजन होता है। किस प्रदेश की आवाज़ घटेगी, किसकी बढ़ेगी, कौन-सा इलाका निर्णायक होगा, कौन-सा समुदाय स्थायी रूप से हाशिए पर चला जाएगा—यह सब इसी से तय होगा। अगर विपक्ष इस प्रश्न पर चुप है तो वह अपने भविष्य की कब्र खुद खोद रहा है।</p>



<p>और मीडिया? मीडिया तो लोकतंत्र की शुरुआती चेतावनी-व्यवस्था था। लेकिन अगर जीएन देवी जैसे चिंतक जयपुर में आकर नागरिकता और लोकतंत्र पर सबसे गंभीर चेतावनी दें और मीडिया अनुपस्थित रहे तो यह अनुपस्थिति खबर से बड़ी खबर है। यह बताती है कि मीडिया की प्राथमिकता नागरिक नहीं, इवेंट है; संविधान नहीं, तमाशा है; लोकतंत्र नहीं, सत्ता की दैनिक ध्वनि है।</p>



<p>देवी चेताते भर नहीं, समझाते हैं जैसे कोई पिता या गुरु बच्चे को समझाता है। उनका कहना था अब सवाल यह नहीं है कि क्या बिगड़ेगा। सवाल यह है कि हम कितना बचा पाएंगे। हर जिले में नागरिक समितियां बननी चाहिए। नागरिकता, जनगणना, मतदाता-सूची, परिसीमन और जनसांख्यिकी पर सार्वजनिक अध्ययन-मंडल बनने चाहिए। People’s Demographic Survey जैसे नागरिक प्रयास शुरू होने चाहिए। घुमंतू समुदायों, पशुपालकों, प्रवासी मजदूरों, आदिवासियों, शहरी गरीबों और दस्तावेज़हीन नागरिकों की डायरी लिखी जानी चाहिए। कौन कहाँ रहता है, किसके पास कौन-सा कागज है, किसका नाम वोटर लिस्ट में है, कौन बाहर हो सकता है—यह सब लोकतंत्र की नई जनगाथा है।</p>



<p>जीएन देवी ने जो कहा, वह डराने के लिए नहीं था; जगाने के लिए था। अगर हमारी निष्क्रियता से किसी एक आदमी की नागरिकता भी छिनती है तो यह केवल उस आदमी की त्रासदी नहीं होगी। वह पूरे गणराज्य के माथे पर एक काला धब्बा होगा। लोकतंत्र की हत्या अब संसद के दरवाज़े तोड़कर नहीं होगी। वह जनगणना-फॉर्म, मतदाता-सूची, नागरिकता-प्रमाणपत्र और परिसीमन-मानचित्र के बीच चुपचाप होगी। और इतिहास की सबसे भयावह हत्याएं अक्सर शोर से नहीं, चुप्पी से होती हैं। मुझे सुखद हैरानी है कि हमारे यहाँ वास्तविक राजनीतिक समझ वालों में कविता श्रीवास्तव शीर्ष पर हैं और उन्होंने यह आयोजन किया।</p>



<p>कई बार तो मुझे यही लगता है कि इस प्रदेश में वास्तविक राजनीति तो कविता श्रीवास्तव, अरुणा रॉय, निखिल डे, भंवर मेघवंशी जैसे लोग ही कर रहे हैं और कांग्रेस के कथित बड़े नाम और सत्ता के शीर्ष पर रहे लोग तो इस जम्हूरियत के हिसाब से अप्रासंगिक ही हैं। उन्हें अगर इतने बेचैन करने वाले प्रश्नों पर बेचैनी नहीं है और वे सिर्फ़ बयानबाज़ियां करके ही राजनीति करना चाहते हैं तो ख़तरा बड़ा है। इस कार्यक्रम में प्रोफेसर अपूर्वानंद भी मौजूद थे। उन्होंने भी भारतीय लोकतंत्र के सामने मंडरा रहे ख़तरों को सांगोपांग रेखांकित किया।</p>



<p><strong>-त्रिभुवन , फेसबुक वाॅल से साभार</strong></p>
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		<title>श्रवण गर्ग का लेख- ‘नागरिकों’ को ‘शरणार्थियों’ में बदलने का षड्यंत्र तो नहीं ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Jun 2026 14:55:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;जो चल रहा है उसे देख-समझकर डर लगना चाहिए कि क्या कुछ चुनिंदा नागरिकों अथवा समुदायों को परेशान करने के लिए कोई कृत्रिम अंधकार खड़ा किया जा रहा है ? ऐसा अंधकार जिसे क़ानूनी अथवा संवैधानिक तौर पर जायज़ ठहराया जा सके ? या कोई षड्यंत्र है नागरिकों का समूचा ध्यान इस सचाई से भटकाने &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;जो चल रहा है उसे देख-समझकर डर लगना चाहिए कि क्या कुछ चुनिंदा नागरिकों अथवा समुदायों को परेशान करने के लिए कोई कृत्रिम अंधकार खड़ा किया जा रहा है ? ऐसा अंधकार जिसे क़ानूनी अथवा संवैधानिक तौर पर जायज़ ठहराया जा सके ? या कोई षड्यंत्र है नागरिकों का समूचा ध्यान इस सचाई से भटकाने के लिए कि गवर्नेंस पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है ?&#8217; पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>बात कोलकाता के प्रसिद्ध सत्ता-विरोधी अंग्रेज़ी दैनिक ‘द टेलीग्राफ’ के पूर्व संपादक-पत्रकार आर राजगोपाल की पीड़ा से शुरू करते हैं।राजगोपाल की पीड़ा हालाँकि काफ़ी चर्चा में आ चुकी है फिर भी मूल विषय को आगे बढ़ाने के लिए उसका उल्लेख ज़रूरी है।</p>



<p>पश्चिम बंगाल में हुए हाल के विधानसभा चुनावों में SIR के तहत जिन लाखों लोगों के नाम मतदाता सूचियों से बाहर कर दिये गए थे उनमें एक नाम राजगोपाल का भी था। इसके चलते उनके पासपोर्ट का नवीनीकरण नहीं हो सका। देश का नागरिक होते हुए भी राजगोपाल को नया पासपोर्ट अपनी सिटीजनशिप को प्रमाणित करने के लिए नहीं चाहिए था।वे उसे अपनी पत्रकार बेटी के विवाह में शामिल होने सेनफ़्रांसिस्को पहुँचने के लिये चाहते थे।</p>



<p>नवीनीकृत पासपोर्ट के लिए उनकी सारी अपीलें ठुकरा दी गई। ऐसा इसलिए किया गया कि 2002 की मतदाता सूची में न उनका नाम मिला और न ही उनके पिता का। राजगोपाल के पिता एक गांधीवादी, सेवा-निवृत प्रोफेसर और केरल में गांधी स्मारक निधि के राज्य सचिव रह चुके हैं। उनका 2016 में निधन हो चुका है।</p>



<p>डेढ़ सौ करोड़ के भारत देश में सिर्फ़ बारह-तेरह करोड़ लोगों के पास ही पासपोर्ट है।यानी सौ लोगों में सिर्फ़ आठ या नौ के पास।उसके बावजूद एक संपादक के साथ क्या हो सकता है यह उसकी कहानी है। वे करोड़ों लोग जिनके पास कोई काग़ज़ ही नहीं है उनकी व्यथा की केवल कल्पना ही की जा सकती है।क़ानूनन कहा जाए तो पासपोर्ट भी केवल एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है, अपने आपको देश का नागरिक सिद्ध करने का प्रमाणपत्र नहीं !</p>



<p>केवल पासपोर्ट ही नहीं ! आधार कार्ड, वोटर आईडी, पैन कार्ड, या राशन कार्ड भी देश का नागरिक होने का क़ानून-सम्मत दस्तावेज़ नहीं माना गया है। भारत का वैध नागरिक होने अथवा बनने की क़ानून-सम्मत अहर्ताएं 1955 के सिटीज़न्स एक्ट में वर्णित है। वर्तमान सरकार उन्हीं अहर्ताओं का सख़्ती से पालन करवाना चाहती है।</p>



<p>जो चल रहा है उसे देख-समझकर डर लगना चाहिए कि क्या कुछ चुनिंदा नागरिकों अथवा समुदायों को परेशान करने के लिए कोई कृत्रिम अंधकार खड़ा किया जा रहा है ? ऐसा अंधकार जिसे क़ानूनी अथवा संवैधानिक तौर पर जायज़ ठहराया जा सके ? या कोई षड्यंत्र है नागरिकों का समूचा ध्यान इस सचाई से भटकाने के लिए कि गवर्नेंस पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है ?</p>



<p>हुकूमत क़तई चिंतित नज़र नहीं आती कि लाखों की संख्या में हर साल पढ़े-लिखे और सामर्थ्य लोग क्यों भारत की नागरिकता को त्याग कर विदेशों में बसने रवाना हो रहे हैं।कोई तो बात होगी कि जो बाहर जा चुके हैं वापस नहीं लौटना चाहते और जो हैं वे जा रहे हैं।इन जाने वालों को प्रधानमंत्री देश में नहीं रोकते पर अपनी विदेश यात्राओं के दौरान ‘इंडियन डायस्पोरा’ के साथ मन की बात में उनसे स्वदेश लौटने की अपील ज़रूर करते हैं !</p>



<p>व्यवस्था ने अपने आपको इतना अधिकार-संपन्न कर लिया है कि वह न सिर्फ़ नया पासपोर्ट जारी करने अथवा उसका नवीनीकरण करने से इंकार कर सकती है, जन्म से देश में रह रहे प्रत्येक नागरिक की भारतीयता को चुनौती भी दे सकती है ! संबंधित व्यक्ति भारत का नागरिक है ऐसा उसे ही क़ानूनी आवश्यकताओं के आधार पर साबित करना होगा।</p>



<p>एक ऐसी स्थिति अगर उत्पन्न हो जाए तो क्या होगा कि लाखों-करोड़ों की संख्या में देशवासियों को भारत का वैध नागरिक मानने से इनकार कर दिया जाए ? इतना ही नहीं ! इनमें भी एक बड़ी तादाद उन अल्पसंख्यकों की हो जिन्हें हिन्दूवादी सत्ता अपना नागरिक मानने से ही इंकार करती है।उनके नुमाइंदों को संसद और विधानसभाओं में नहीं भेजती। एक उल्लेखनीय संख्या उन सेक्युलर अथवा हिंदुओं की भी हो जिन्हें सत्ता-विरोधी मानकर लगातार चिन्हित किया जा रहा हो !</p>



<p>तो क्या ऐसे तमाम लोग अपने ही मुल्क में शरणार्थी करार दिये जाएँगे ? ऐसे शरणार्थी जिन्हें जीने का अधिकार तो प्राप्त होगा पर वोट डालकर सरकारें नहीं चुन सकेंगे, उम्मीदवार नहीं बन सकेंगे ! विदेशों की यात्राएँ नहीं कर सकेंगे ! राजगोपाल की तरह अपने बच्चों से नहीं मिल सकेंगे !</p>



<p>जो कहा जा रहा है वह काल्पनिक और अतिरंजित भी हो सकता है ! सचाई यह भी है कि काल्पनिक भय तभी जन्म लेते हैं जब जो उपस्थित है उसके प्रति अविश्वास पुख़्ता होने लगता है।</p>



<p>धर्म के आधार पर किए गए बटवारे के बाद क्या मुल्क को किसी नए विभाजन की तरफ़ ले जाया जा रहा है ? वह यह कि एक ही मुल्क में रहने वाले कुछ लोग वोटर और नागरिक होंगे और शेष अनागरिक, शरणार्थी अथवा घुसपैठिए !</p>



<p></p>
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		<title>श्रवण गर्ग का लेख- राहुल अब रुकने वाले नहीं हैं ! ‘इंडिया’ साथ चलेगा क्या ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Jun 2026 06:01:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>पत्रकार श्रवण गर्ग &#8216;‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक के तीन दिन बाद जारी हुए राहुल की स्पीच के संक्षिप्त ऑडियो के बाद से देश की राजनीति में हलचल मच गई है और उनके कहे के अलग-अलग विश्लेषण किए जा रहे हैं ! राहुल ने बैठक में जो कहा उसे उनके दो दशकों से ज़्यादा समय की &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="450" height="450" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg" alt="पत्रकार श्रवण गर्ग" class="wp-image-413" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg 450w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-300x300.jpg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-150x150.jpg 150w" sizes="(max-width: 450px) 100vw, 450px" /><figcaption class="wp-element-caption">पत्रकार श्रवण गर्ग</figcaption></figure>
</div>


<p>&#8216;<strong>‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक के तीन दिन बाद जारी हुए राहुल की स्पीच के संक्षिप्त ऑडियो के बाद से देश की राजनीति में हलचल मच गई है और उनके कहे के अलग-अलग विश्लेषण किए जा रहे हैं ! राहुल ने बैठक में जो कहा उसे उनके दो दशकों से ज़्यादा समय की संसदीय राजनीति की सबसे आक्रामक अभिव्यक्ति या आज़ादी की दूसरी लड़ाई के लिए पार्टी का घोषणापत्र माना जा रहा है।&#8217; पढ़ें सुपरिचित पत्रकार श्रवण गर्ग का पूरा लेख…</strong></p>



<p>विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक की आठ जून को दिल्ली में हुई बैठक में राहुल गांधी ने आख़िर ऐसा क्या कह दिया कि उसके बाद से बीजेपी और संघ में भी सन्नाटा है और विपक्ष के उन दलों के नेताओं के बीच भी जो उस मीटिंग में उपस्थित थे ? क्या राहुल ने ऐसा कह दिया कि गठबंधन के सहयोगी दल अगर बीजेपी और संघ के साथ लड़ाई अपने पुराने तरीक़ों से ही जारी रखना चाहते हैं और कांग्रेस की तरह सड़कों पर उतर कर दमन के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की राजनीति से बचना चाहते हैं तो फिर अपनी लड़ाई वे ख़ुद लड़ें और बीजेपी से रक्षा करें ?</p>



<p>‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक के तीन दिन बाद जारी हुए राहुल की स्पीच के संक्षिप्त ऑडियो के बाद से देश की राजनीति में हलचल मच गई है और उनके कहे के अलग-अलग विश्लेषण किए जा रहे हैं ! राहुल ने बैठक में जो कहा उसे उनके दो दशकों से ज़्यादा समय की संसदीय राजनीति की सबसे आक्रामक अभिव्यक्ति या आज़ादी की दूसरी लड़ाई के लिए पार्टी का घोषणापत्र माना जा रहा है।</p>



<p>राहुल ने जो कहा उसे इस नज़रिए से देखा जाना चाहिए है कि बैठक में सोनिया गांधी भी उपस्थित थीं और पार्टी अध्यक्ष मल्लीकार्जुन खड़गे भी। इस बात पर शक ज़ाहिर किया जा सकता है कि अपने ज्ञात स्वभाव के विपरीत जाकर राहुल ने अपनी स्पीच को लेकर माँ सोनिया से पूर्व-स्वीकृति ली होगी या खड़गेजी अथवा पार्टी के किसी बड़े नेता को विश्वास में लिया होगा।वे कुछ ऐसा कुछ करने की जा रहे थे जिसके नतीजे कुछ भी निकल सकते हैं !</p>



<p>गठबंधन के सहयोगी दलों (सपा, माकपा,राजद,आदि )के नेताओं द्वारा की गई आलोचनाओं को मुस्कुराते हुए सुन लेने के बाद अपने संक्षिप्त भाषण में राहुल ने कहा :’ मुझे अफ़सोस है हमारे संगठन के सदस्यों के बीच कुछ भ्रम है। वह यह कि जिन राजनीतिक औज़ारों का इस्तेमाल वे अब तक करते आए हैं वे आगे भी काम कर पाएँगे।ऐसा मुमकिन नहीं हो पाएगा।बीजेपी देश के सभी संस्थानों (क़ानून-व्यवस्था, नौकरशाही, ख़ुफ़िया एजेंसियों, चुनाव आयोग )पर क़ब्ज़ा कर चुकी है।’</p>



<p>( पश्चिम बंगाल का चुनाव परिणाम चार जून को आने के पहले ही VVPAT की पर्चियों किसी कूड़े के ढेर में मिलती हैं। विपक्ष पचास से ज़्यादा सीटों के नतीजों पर आपत्ति जताता है।कोई कार्रवाई नहीं होती। और फिर 11 जून को खबर आती है कि चार हज़ार EVM जलकर राख हो गईं।उसके बाद TMC के दो-तिहाई से ज़्यादा सांसद और विधायक बीजेपी से जुड़ जाते हैं। लगभग तीन दशक पुराने एक राजनीतिक दल की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है।)</p>



<p>राहुल गांधी की स्पीच का उपसंहार यही मान सकते हैं कि विपक्षी दलों को अपने अस्तित्व की लड़ाई अब उन औज़ारों लड़ना होगी जिन पर कांग्रेस को भरोसा है। यानी विपक्षी गठबंधन के दल अगर उसके लिए तैयार नहीं हैं तो फिर कांग्रेस अकेले ही लड़ेगी और परिणामों का सामना भी करेगी। उसे दिखावे के गठबंधन की ज़रूरत नहीं है।</p>



<p>बीजेपी हुकूमत की बर्ख़ास्तगी और लोकतंत्र की बहाली के लिए प्रतिरोध की जिस राजनीति की शुरुआत राहुल गांधी करना चाहते हैं वह निश्चित ही असीमित ख़तरों से भरी हुई है। एक ऐसी हुकूमत जिसके पितृ-संगठन में हथियारों का प्रशिक्षण दिया जाता है, साध्य की प्राप्ति के लिए हिंसा के उपयोग के प्रति जिसका विरोध नहीं है, जो सांप्रदायिक हिंसा और विभाजन की राजनीति के ज़रिए सत्ताओं को प्राप्त कर उनपर क़ाबिज़ रहना चाहती है वह राहुल गांधी के अहिंसक प्रतिरोध की भ्रूण हत्या के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती है।</p>



<p>मानकर चला जाना चाहिए कि राहुल गांधी इन सभी ख़तरों के प्रति सचेत हैं और उन्हें झेलने के लिए उनकी तैयारी भी है। सवाल यह है कि ‘इंडिया’ ब्लॉक के वे सहयोगी दल जो पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल की उपस्थिति का लाभ ले चुके हैं अब उनके साथ ख़तरों में भी भागीदारी निभाएंगे कि नहीं ? ‘आम आदमी पार्टी’ की टूट के अनुभव से ममता ने कोई सबक़ नहीं लिया ! तृणमूल का हश्र सामने है। गेंद अब अखिलेश और उद्धव के पालों में है। राहुल तो अब रुकने वाले नहीं हैं !</p>



<p><strong>-श्रवण गर्ग </strong></p>



<p></p>
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		<title>अमेरिकी हमले पर मोदी की चुप्पी क्यों ? राहुल गांधी ने उठाए सवाल</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 14 Jun 2026 07:29:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>पिछले एक साल से अपने निम्नतम स्तर पर चल रहे भारत-अमेरिकी संबंध अब एक ऐसे मोड़ पर आ चुका है , जब दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य होने की उम्मीद टूटती नज़र आ रही है। ऐसे में अमेरिका के भारत के खिलाफ बढ़ते दुस्साहस पर प्रधानमंत्री मोदी का मौन भारत की साख पर गंभीर &#8230;</p>
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<p>पिछले एक साल से अपने निम्नतम स्तर पर चल रहे भारत-अमेरिकी संबंध अब एक ऐसे मोड़ पर आ चुका है , जब दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य होने की उम्मीद टूटती नज़र आ रही है। ऐसे में अमेरिका के भारत के खिलाफ बढ़ते दुस्साहस पर प्रधानमंत्री मोदी का मौन भारत की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा‌ है।<br>मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बीते 10 जून को भारतीय नाविकों वाला एक तेल टैंकर (एमटी सेटेबेलो) ओमान की खाड़ी के निकट से गुजर रहा था। इसी दौरान अमेरिकी सेना ने भारतीय जहाज पर मिसाइल से हमला कर दिया , जिसमें तीन भारतीय नाविक मारे गए थे। गौरतलब है कि अभी तक प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय नागरिकों की मौत पर कोई टिप्पणी नहीं की है ।<br>इस घटना का लाइव वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ जिसमें क्रू मेम्बर भारतीय जहाज पर हुए हमले की जानकारी देते हुए सहायता की अपील कर रहे थे ।</p>



<p><strong>देश की जनता में तीव्र आक्रोश</strong></p>



<p>सोशल मीडिया पर घटना का वीडियो वायरल होते ही लोगों की तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल‌ रही है। इसके साथ ही अब मोदी सरकार की कमजोर विदेश-नीति पर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं। यह आश्चर्यजनक है कि अभी तक इस घटना पर मोदी ने कोई टिप्पणी नहीं की है जबकि ईरान जैसे देशों ने इस अमेरिका की कार्रवाई की निंदा की है । ऐसे में अमेरिका के इस दुस्साहस और मोदी सरकार की चुप्पी के खिलाफ भारत की जनता का गुस्सा फूट पड़ा है।</p>



<p><strong>राहुल गांधी ने मोदी पर साधा निशाना</strong></p>



<p>लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी की कमजोर विदेश-नीति पर सवाल उठाते हुए कहा- &#8216; अमेरिकी हमलों में तीन भारतीय नाविकों की हत्या के चंद दिन बाद &#8211; न अफ़सोस, न माफ़ी। उल्टा, अमेरिका ने आदेश देना जारी रखा है।</p>



<p>उनके शब्द पढ़िए: &#8220;अमेरिकी सेना के आदेश तुरंत मानें।&#8221; कोई उल्लंघन &#8220;बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।&#8221;</p>



<p>एक आज़ाद देश इस तरह की भाषा कभी नहीं सहेगा। लेकिन हमारे Compromised PM? चुप। एक आज्ञाकारी नौकर की तरह सुनते हैं, और आदेश मान लेते हैं।<br>Compromised PM देश के सम्मान की रक्षा नहीं करेगा-क्योंकि जो देश का अपमान करते हैं, वो उन्हीं के वश में हैं। &#8216;</p>
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		<title>इंडिया गठबंधन की बैठक में राहुल गांधी का ऐतिहासिक भाषण</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-rahul-gandhis-historic-speech-at-india-alliance-meeting-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Jun 2026 04:52:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>हाल में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक में राहुल गाँधी ने एक अद्भुत भाषण दिया। दार्शनिक गहराई और इतिहास बोध से भरा यह भाषण हर उस भारतवासी को आश्वस्त करेगा जो &#8216;आइडिया ऑफ़ इंडिया&#8217; पर आरएसएस के दुर्दांत हमले से बेचैन है। यह भाषण विपक्ष की एकता के संबंध में एक स्पष्ट और साहसी दृष्टि &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p>हाल में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक में राहुल गाँधी ने एक अद्भुत भाषण दिया। दार्शनिक गहराई और इतिहास बोध से भरा यह भाषण हर उस भारतवासी को आश्वस्त करेगा जो &#8216;आइडिया ऑफ़ इंडिया&#8217; पर आरएसएस के दुर्दांत हमले से बेचैन है। यह भाषण विपक्ष की एकता के संबंध में एक स्पष्ट और साहसी दृष्टि के लिए भी याद किया जाएगा। पढ़ें&#8230;</p>



<p>&#8220;मैं आज यहां आये सभी लोगों का स्वागत करता हूंँ। आने के लिए धन्यवाद। कई साल पहले मेरे एक बहुत अच्छे दोस्त से बहस हुई थी। मैंने उससे कहा, &#8220;जो तुम कर रहे हो वो बिल्कुल अनफेयर है।&#8221; उसका जवाब था — &#8220;दुनिया अनफेयर है। अब इसकी आदत डाल लो।&#8221;</p>



<p>आज यहां कांग्रेस पार्टी के बारे में जो कुछ भी कहा गया, उसका जवाब देना मेरा काम नहीं है। मेरा काम शिव परंपरा को अपनाना है — सब कुछ निगल जाना। नीले कंठ वाले शिव की तरह, जो सारा जहर पी जाते हैं।</p>



<p>आप चाहे जितना कहें, मुझ पर या कांग्रेस पर जितनी भी आलोचना करनी हो, हम उसे खुशी-खुशी स्वीकार करेंगे। हम आपको खुश करने की कोशिश करेंगे, क्योंकि हमारी भूमिका आपकी भूमिका से बुनियादी तौर पर अलग है। और यह मैं अहंकार से नहीं कह रहा हूं। मेरी भूमिका आप सबको प्यार और स्नेह से जोड़ने की है।</p>



<p>मैं 2004 से कांग्रेस पार्टी का सांसद हूं, जब मैंने अपना पहली चुनाव लड़ा था। हमारी पार्टी भारत की दूसरी सभी पार्टियों से बुनियादी तौर पर अलग तरीके से संगठित है। और मैं यह विनम्रता से कह रहा हूं। क्यों?</p>



<p>क्योंकि यह पार्टी एक प्रतिरोध आंदोलन के रूप में शुरू हुई थी, जब आधुनिक भारत अस्तित्व में भी नहीं था। अन्य सभी पार्टियों के विपरीत, इसे भारतीय राज्य की इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा पर खड़ा नहीं किया गया था। कांग्रेस पार्टी एक प्रतिरोध आंदोलन है, जो इस विचार की रक्षा करती है कि सभी भारतीय बराबर हैं।</p>



<p>हम RSS की सोच के बिल्कुल खिलाफ हैं। हम मर जाएंगे, कांग्रेस पार्टी में मर जाएंगे, लेकिन BJP या RSS के साथ कभी समझौता नहीं करेंगे। इसके लिए हमें हमारे सिर काटने पड़ेंगे। मुझे पता है कि इस देश में लाखों-लाखों कांग्रेस कार्यकर्ता हैं जो कहेंगे — &#8220;हमारे सिर काट दो, हम RSS के सामने झुकेंगे नहीं।&#8221;</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="624" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Screenshot-2026-06-10-125850-1024x624.png" alt="" class="wp-image-400" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Screenshot-2026-06-10-125850-1024x624.png 1024w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Screenshot-2026-06-10-125850-300x183.png 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Screenshot-2026-06-10-125850-768x468.png 768w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Screenshot-2026-06-10-125850.png 1376w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p>मुझे अफसोस है कि इस समूह में कुछ भ्रम है। भ्रम यह है कि आप — SP, TMC, RJD — यह मानते हैं कि अब तक जो राजनीतिक औजार आप इस्तेमाल करते आए हैं, वे आगे भी काम करेंगे।<br>दरअसल वे तभी काम करते थे जब देश का सिस्टम उन्हें निष्पक्ष मैदान उपलब्ध कराता था। वो मैदान अब नहीं बचा है। BJP देश के संस्थानों पर कब्जा कर चुकी है। BJP कानूनी व्यवस्था को कंट्रोल करती है। BJP नौकरशाही को कंट्रोल करती है। खुफिया एजेंसियों को कंट्रोल करती है। BJP चुनाव आयोग को भी कंट्रोल करती है।</p>



<p>मेरे TMC में कई दोस्त हैं। वे मानते थे कि बंगाल में वे चुनाव जीत रहे हैं। मैं उन्हें बार-बार कहता रहा — तुम सपनों की दुनिया में हो। मैंने गुजरात में देखा है, मध्य प्रदेश में देखा है, छत्तीसगढ़ में देखा है, हरियाणा और महाराष्ट्र में देखा है। फिर भी आपमें से कई अभी भी आश्वस्त नहीं हैं।</p>



<p>कांग्रेस पार्टी प्रतिरोध की पार्टी है। इसे भारतीय राज्य की तटस्थता की जरूरत नहीं है। बल्कि, जितना ज्यादा भारतीय राज्य के संस्थान दबाए जाएंगे, कब्जाए जाएंगे, कांग्रेस पार्टी उतनी ही आक्रामकता से भारत के संविधान की रक्षा के लिए लड़ेगी। हम सभी कांग्रेस पार्टी के आदर्शों को साझा करते हैं। वे आदर्श क्या हैं? सत्य, अहिंसा और करुणा।</p>



<p>मुख्य मुद्दा क्या है? मुझे आपसे लड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। मुझे पागल होना पड़ेगा कि अचानक उठकर कहूं — &#8220;मैं तुमसे लड़ूंगा क्योंकि तुम हमारे सहयोगी हो, हमारे दोस्त हो, हम जिनसे प्यार करते हैं।</p>



<p>कृपया समझिए, हमने 2024 का चुनाव जीता था। हमने हारा नहीं था। आप पूछते हैं कि नीतीश जी क्यों चले गये? वह मेरी वजह से नहीं, कांग्रेस की वजह से नहीं गये। और मैं आपको बताता हूं कि निकट भविष्य में वे कुछ औजार भी काम करना बंद कर देंगे, क्योंकि BJP और RSS भारतीय राज्य पर अपनी पकड़ और मजबूत कर रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने 100 साल से ज्यादा पहले यही फैसला लिया था। 1927 से पहले हम एक राजनीतिक संगठन थे। गांधी जी ने जब स्वराज की मांग की, हम प्रतिरोध आंदोलन बन गए। अगर राजनीतिक पार्टियां काम नहीं कर सकतीं, तो क्या काम कर सकता है? प्रतिरोध काम करता है। Resistance works।</p>



<p>जहां हम प्रतिरोध करते हैं, वहां काम करता है। मैंने अपनी आंखों से देखा है। मैंने इस देश में 4000 किलोमीटर पैदल चला है। Resistance works।आपको राजनीतिक आर्किटेक्चर की जरूरत नहीं। नौकरशाही की जरूरत नहीं। खुफिया एजेंसियों की जरूरत नहीं। आपको सिर्फ प्रतिरोध का कार्य चाहिए। मतलब — मैं प्रतिरोध करूंगा। मैं अन्याय नहीं होने दूंगा। बस। खत्म। यह एक भावना है, संगठन नहीं। यह सोचने का तरीका है। और चाहे हम पसंद करें या नहीं, हमें वहीं जाना होगा। माइंडसेट बदलना होगा। माइंडसेट अब यह होना चाहिए कि हम एक-दूसरे से नहीं लड़ेंगे। हम प्रेस को हम पर हमला करने का मौका नहीं देंगे। हम प्रतिरोध करेंगे।</p>



<p>आप सोच रहे हैं कि चुनौती अगला चुनाव जीतने की है। अगला चुनाव तो पहले ही जीत लिया गया है। कृपया समझिए, भारत की जनता में इतना गुस्सा है कि अगला चुनाव पहले ही खत्म हो चुका है। समस्या RSS द्वारा भारतीय राज्य के औजारों पर कब्जा है। समस्या यह है कि आपको जीतने के लिए निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव नहीं मिलेगा। इसलिए हमें प्रतिरोध मोड में जाना होगा। Resistance works। Resistance CBSE है। Resistance NEET है। Resistance पदयात्रा है। सुबह उठकर पूछो — मैं आज प्रतिरोध कैसे करूं? और प्रतिरोध करो। मैं आपको गारंटी देता हूंँ, यह काम करेगा।</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="900" height="600" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/IMG-20260607-WA0004.jpg" alt="" class="wp-image-385" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/IMG-20260607-WA0004.jpg 900w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/IMG-20260607-WA0004-300x200.jpg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/IMG-20260607-WA0004-768x512.jpg 768w" sizes="(max-width: 900px) 100vw, 900px" /><figcaption class="wp-element-caption">राहुल गांधी , साभार- गूगल</figcaption></figure>



<p>मेरी नजर में, किसी भी तरफ से कोई भी आलोचना मैं खुशी से झेलने को तैयार हूं, क्योंकि मेरे लिए यह धार्मिक कर्तव्य है, आध्यात्मिक कर्तव्य है। यह अब राजनीति नहीं रही। इसलिए मैं आपको वादा करता हूं कि इस समूह को जोड़ने और सफल बनाने के लिए जितना भी अपमान सहने पड़ेंगे, मैं सहूंगा। आगे कैसे बढ़ें, यह बहुत सरल है। हमें एक खास विचार से दूर होना होगा। ममता दी 100% तो नहीं, लेकिन 90% यकीन से कहती हैं कि उनका चुनाव चुराया गया। उद्धव जी 40% यकीन रखते हैं। मेरे भाई तेजस्वी 40%… सुनिए, 100% यकीन रखिए — चुनाव चुराये जा रहे हैं। अपने मन से सारे संदेह हटा दीजिए। समझिए कि सोशल मीडिया पर उपस्थिति बनाने में सालों लगते हैं। यह एक हफ्ते में ऑर्गेनिक नहीं होता। मेरे 1 करोड़ YouTube फॉलोअर्स हैं, लेकिन मेरा अकाउंट पूरी तरह दबाया गया है। अगर आप यह सोच रहे हैं कि सोशल मीडिया निष्पक्ष है और विपक्ष को सपोर्ट मिल रहा है, तो आप दूसरी दुनिया में जी रहे हैं। पूरा आर्किटेक्चर — मीडिया, सोशल मीडिया, कानूनी व्यवस्था, नौकरशाही, खुफिया एजेंसियां — सब इस सरकार को सत्ता में बनाए रखने के लिए संरेखित हैं। लेकिन यह सरकार टिक नहीं पाएगी। यह टिक नहीं पाएगी क्योंकि इसने हमारे लोकतंत्र को नष्ट कर दिया है। इसने भारतीय लोगों के भविष्य को नष्ट कर दिया है।</p>



<p>अब जो आने वाला है (ईरान के बाद), वह अनियंत्रित है। और यह हमें जनता को संगठित करने का अवसर देगा। यह भी समझ लीजिए कि हम समन्वित नहीं हैं, साथ नहीं काम करते — ये सब BJP और उनके मीडिया दोस्त फैला रहे हैं। यह सच नहीं है।</p>



<p>मैं DMK की गारंटी ले सकता हूंँ कि भारत के विचार की रक्षा में हर कोई इस कमरे में खड़ा होगा। हमारे बीच झगड़े हैं, लेकिन अगर आप मुझसे कहें कि मैं केरल के पूर्व मुख्यमंत्री को गले लगाऊं, तो मैं नहीं कर सकता और नहीं करूंगा, क्योंकि मेरी उनसे राजनीतिक लड़ाई चल रही है।</p>



<p>हमें लचीला होना होगा और समझना होगा कि हम पर पूरा हमला है — यह साबित करने के लिए कि विपक्ष कमजोर है, disorganized है। अंत में, मुझे लगता है कि हमारी चर्चाओं में अक्सर उदासी छाई रहती है। लोग सोचते हैं — &#8220;ओह भगवान, हम BJP को कभी हरा पाएंगे?&#8221; मैं आपको बताता हूं, अगर हम साथ खड़े होकर प्रतिरोध करें तो उन्हें हराना आसान है।</p>



<p>पिछले चुनाव में इस कमरे में मेरे अलावा किसी को यकीन नहीं था कि हम BJP को हरा सकते हैं। अब इस कमरे में हर कोई यह विश्वास करना शुरू करे कि हम उन्हें हरा देंगे।इस विश्वास से शुरू कीजिए, और मैं गारंटी देता हूं — राज्य दर राज्य, चुनाव दर चुनाव, चाहे वे धांधली करें या न करें, वे गिरेंगे।&#8221;</p>



<p> (भाषण का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद &#8211; <strong>सौरभ यादव </strong>)</p>



<p></p>
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		<title>​बिरसा मुंडा और आदिवासी संस्कृति पर हमला कर रही हैं पूंजीपति ताकतें: भाकपा माले</title>
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		<pubDate>Tue, 09 Jun 2026 09:42:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>​9जून, मऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) भाकपा माले द्वारा महान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि के अवसर पर राज पैलेस स्थित उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। इस दौरान उपस्थित नेताओं और कार्यकर्ताओं ने बिरसा मुंडा की क्रांतिकारी विरासत को याद करते हुए उनके दिखाए रास्तों पर चलने का संकल्प &#8230;</p>
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<p>​9जून, मऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) भाकपा माले द्वारा महान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि के अवसर पर राज पैलेस स्थित उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। इस दौरान उपस्थित नेताओं और कार्यकर्ताओं ने बिरसा मुंडा की क्रांतिकारी विरासत को याद करते हुए उनके दिखाए रास्तों पर चलने का संकल्प लिया।</p>



<p>​कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता बसंत कुमार ने कहा, &#8220;बिरसा मुंडा हमारे स्वतंत्रता संग्राम के राष्ट्रीय नायक हैं। उन्होंने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ &#8216;उलगुलान&#8217; (महाविद्रोह) का बिगुल फूंका था। उनका जीवन और संघर्ष आज भी हमारे लिए प्रेरणास्रोत है।&#8221;</p>



<p><strong>​आदिवासी संस्कृति पर हमले का विरोध:</strong></p>



<p>जन संस्कृति मंच के प्रदेश अध्यक्ष जय प्रकाश धूमकेतु ने वर्तमान व्यवस्था पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि आज देश के जंगल, पहाड़ और नदियों को कॉर्पोरेट घरानों और पूंजीपतियों के हवाले किया जा रहा है। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि यह कदम न सिर्फ पर्यावरण के खिलाफ है, बल्कि बिरसा मुंडा के विचारों और आदिवासी संस्कृति पर सीधा हमला है। जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए आज फिर से एक बड़े आंदोलन की जरूरत है।</p>



<p>​<strong>सुंदरीकरण</strong> <strong>की उठी मांग:</strong></p>



<p>इस गौरवमयी अवसर पर भाकपा माले ने स्थानीय प्रशासन और सरकार से मांग की कि राज पैलेस स्थित बिरसा मुंडा की प्रतिमा, वहां मौजूद पोखरे और पार्क का अविलंब सुंदरीकरण किया जाए। वक्ताओं ने कहा कि राष्ट्रीय नायक के स्मारक की उपेक्षा बर्दाश्त नहीं की जाएगी और इसे एक सुंदर व गरिमामय स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।</p>



<p>​इस श्रद्धांजलि सभा और कार्यक्रम में रामबली राजभर, साधु यादव, फेकू राजभर, राजू आदिवासी भाकपा माले के स्थानीय पदाधिकारियों सहित भारी संख्या में कार्यकर्ता और आम जनता उपस्थित रही।</p>



<p>&#8211;<strong>बसंत कुमार की रिपोर्ट </strong></p>



<p></p>
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		<title>पत्रकार श्रवण गर्ग ने उठाए सवाल, क्यों इंडिया ब्लॉक की बैठक के दिन‌ दिल्ली पहुंच रहे CJP संस्थापक अभिजीत दीपके?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Jun 2026 04:42:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>विपक्ष सावधान !! ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के संस्थापक अभिजीत दिपके अमेरिका से ठीक उसी दिन (6जून)दिल्ली पहुँच रहे हैं जिस दिन विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया ब्लॉक’ की दिल्ली में बैठक है और जिसमें ममता बनर्जी भी भाग लेने वाली हैं। दिपके का यात्रा कार्यक्रम किसने तय किया होगा ? टिकट किसने करवाए होंगे ? केजरीवाल ने &#8230;</p>
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<p>विपक्ष सावधान !! ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के संस्थापक अभिजीत दिपके अमेरिका से ठीक उसी दिन (6जून)दिल्ली पहुँच रहे हैं जिस दिन विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया ब्लॉक’ की दिल्ली में बैठक है और जिसमें ममता बनर्जी भी भाग लेने वाली हैं। दिपके का यात्रा कार्यक्रम किसने तय किया होगा ? टिकट किसने करवाए होंगे ? केजरीवाल ने या बीजेपी ने ? ‘इंडिया ब्लॉक’ को मज़बूत करने के लिए या विपक्षी गठबंधन में सेंध लगाने के लिए ? कोई यकीन करेगा कि सिर्फ़ धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा मांगने अमेरिका से आ रहे हैं ? दिल्ली में तो चर्चाएं हैं कि शिक्षा मंत्रालय के किसी भाग में आग लग चुकी है ? क्या दिल्ली पहुंचते ही दिपके गिरफ़्तार कर लिए जाएँगे ? क्या राहुल गांधी के ख़िलाफ़ कोई बड़ा षड्यंत्र चल रहा है ? जो चल रहा है वह सिर्फ़ कोई संयोग तो हो नहीं सकता ! दिपके अकेले तो आ नहीं रहे होंगे ? कौन भेज रहा है सबको अमेरिका से ? क्या जॉर्ज सोरेस?</p>



<p><strong>-श्रवण गर्ग</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="720" height="825" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/WhatsApp-Image-2026-06-02-at-10.33.55-AM.jpeg" alt="" class="wp-image-368" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/WhatsApp-Image-2026-06-02-at-10.33.55-AM.jpeg 720w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/WhatsApp-Image-2026-06-02-at-10.33.55-AM-262x300.jpeg 262w" sizes="(max-width: 720px) 100vw, 720px" /></figure>



<p>&#8211;</p>
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