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	<title>Ravikant, Author at Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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		<title>हिन्दी दिवस विशेष: हिन्दी आज भी पराई क्यों है?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 14 Sep 2026 04:41:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;प्रतिवर्ष 14 सितंबर को सरकारी दफ्तरों, निकायों और महकमों में हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है। एक रस्मी उत्सव की तरह हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए संकल्प दोहराए जाते हैं। लेकिन अगले दिन से सब पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। सवाल उठता है कि हिंदी के प्रयोग में सफलता क्यों नहीं &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;प्रतिवर्ष 14 सितंबर को सरकारी दफ्तरों, निकायों और महकमों में हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है। एक रस्मी उत्सव की तरह हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए संकल्प दोहराए जाते हैं। लेकिन अगले दिन से सब पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। सवाल उठता है कि हिंदी के प्रयोग में सफलता क्यों नहीं मिली? गैर-हिंदी भाषी प्रांतों में हिंदी को स्वीकार्यता क्यों नहीं प्राप्त हुई?&#8217; पढ़ें रविकान्त का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8220;बच्चा किसके साथ अच्छी तरह से खेल सकता है, अपनी मां के साथ या पराई मां के साथ! अगर कोई आदमी किसी जबान के साथ खेलना चाहे और जबान का मजा तो तभी आता है, जब उसको बोलने वाला या लिखने वाला उसके साथ खेले, तो कौन हिंदुस्तानी है जो अंग्रेजी के साथ खेल सकता है? हिंदुस्तानी आदमी तेलुगू, हिंदी, उर्दू, बंगाली, मराठी के साथ खेल सकता है। उसमें नए-नए ढांचे बना सकता है। उसमें जान डाल सकता है, रंग ला सकता है। बच्चा अपनी मां के साथ जितनी अच्छी तरह से खेल सकता है, दूसरे की मां के साथ उतनी अच्छी तरह से नहीं खेल सकता।&#8221;- डा. राममनोहर लोहिया</p>



<p class="wp-block-paragraph">हिंदू राष्ट्र के हिमायती आज यूपी जैसे सूबे में अंग्रेजी को अनिवार्य बना रहे हैं। उग्र हिंदुत्व की राजनीति करने वाले शुद्ध हिंदी में संबोधन देते हैं, हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन सकी, गाहे-बगाहे यह सवाल भी दागते रहते हैं; लेकिन सरकारी कार्यालयों से लेकर शिक्षण संस्थानों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए उनके प्रयास सिफर हैं। दरअसल, हिंदू धर्म की तरह ही हिंदी भाषा की अस्मिता भी उनके लिए राजनीतिक प्रोपेगेंडा मात्र है। वास्तविकता यह है कि ये हुक्मरान ना हिंदी भाषा के प्रति ईमानदार हैं और ना वफादार।</p>



<p class="wp-block-paragraph">14 सितंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा हिंदी को राजभाषा बनाया गया। लेकिन इसमें एक शर्त जोड़ दी गई कि अगले 15 साल तक अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा। तर्क यह दिया गया कि इस दौरान हिंदी को समुन्नत बनाकर 26 जनवरी 1965 को अंग्रेजी के स्थान पर पूर्णरूप से लागू कर दिया जाएगा। इतिहास गवाह है कि यह तारीख आज तक नहीं आई। 1960 के दशक में बंगाल और दक्षिणी प्रांतों खासकर तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन हुए। नतीजे में 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित करके अंग्रेजी को सह राजभाषा का दर्जा दे दिया गया और यह प्रावधान किया गया कि गैर हिंदी भाषी प्रांतों की जब तक सहमति नहीं होती है, राजभाषा हिंदी को लागू नहीं किया जाएगा। यह व्यवस्था आज भी जारी है। 1976 के राजभाषा अधिनियम द्वारा भाषिक आधार पर भारत को क, ख, ग, तीन क्षेत्रों में विभाजित करके सरकारी कामकाज चल रहा है। दरअसल, अंग्रेजी का प्रयोग अनवरत जारी है। हिंदी की स्थिति अभी भी, प्रसिद्ध हिंदी कवि रघुवीर सहाय के शब्दों में &#8216;दुहाजू की बीवी&#8217; की तरह है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रतिवर्ष 14 सितंबर को सरकारी दफ्तरों, निकायों और महकमों में हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है। एक रस्मी उत्सव की तरह हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए संकल्प दोहराए जाते हैं। लेकिन अगले दिन से सब पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। सवाल उठता है कि हिंदी के प्रयोग में सफलता क्यों नहीं मिली? गैर-हिंदी भाषी प्रांतों में हिंदी को स्वीकार्यता क्यों नहीं प्राप्त हुई? राजभाषा हिंदी को लागू करने में सरकारी ढुलमुलपन का विरोध करते हुए समाजवादी डॉ राम मनोहर लोहिया ने सार्थक हस्तक्षेप किया। डॉक्टर लोहिया ने मुखरता से राजकाज की भाषा के रूप में अंग्रेजी के प्रयोग पर कड़ी आपत्ति की। इस वजह से आम तौर पर माना जाता है कि लोहिया अंग्रेजी के विरोधी थे। सच्चाई यह है कि लोहिया अंग्रेजी के विरोधी नहीं बल्कि हिंदी के समर्थक हैं। दरअसल, अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में डॉक्टर लोहिया किसी भाषा के विरोधी नहीं थे। वे हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं के भी उतने ही समर्थक थे। लोहिया अंग्रेजी भाषा के खिलाफ नहीं थे, बल्कि उसकी मानसिकता और सामंती स्वभाव के विरोधी थे। अंग्रेजी भाषा जन विरोधी है। देश के करोड़ों दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, किसानों, मजदूरों के लिए अंग्रेजी नुकसानदेह है। &#8216;सामंती भाषा बनाम लोक भाषा&#8217; निबंध में लोहिया ने लिखा है, &#8220;अंग्रेजी हिंदुस्तान को ज्यादा नुकसान इसलिए नहीं पहुंचा रही है कि वह विदेशी है बल्कि इसलिए कि भारतीय प्रसंग में वह सामंती है। आबादी का सिर्फ एक प्रतिशत छोटा सा अल्पमत ही अंग्रेजी में ऐसी योग्यता हासिल कर पाता है कि वह उसे सत्ता या स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करता है। इस छोटे से अल्पमत के हाथ में विशाल जनसमुदाय पर अधिकार और शोषण करने का हथियार है।&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ लोहिया ने हिंदी विरोधी आंदोलन को भी बहुत बारीकी से परखा। उनका स्पष्ट मानना है कि तटीय प्रदेशों में हिंदी का विरोध संपन्न वर्ग द्वारा किया गया। इस तबके ने तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम आदि भाषाओं को बढ़ाने और उनका समर्थन करने के बजाय हिंदी का विरोध करते हुए अंग्रेजी की वकालत की। दरअसल यह वर्ग मेहनतकश कमजोर वर्गों को यथास्थिति में रखने के लिए और अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए अंग्रेजी का समर्थन करता है। वस्तुतः हिंदी का विरोध भाषाई अस्मिता की राजनीति के जरिए अंग्रेजी पढ़े लिखे संपन्न वर्ग के हितों के संरक्षण और उनके वर्चस्व को कायम रखने के लिए किया गया। सरकारी कामकाज और देश स्तरीय परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता से हाशिए के तबकों को न तो न्याय मिल सकता है और ना ही सही अर्थ में जनतंत्र स्थापित हो सकता है। लोहिया ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है, &#8220;लोकभाषा के बिना लोकराज असंभव है। कुछ लोग यह गलत सोचते हैं कि उनके बच्चों को मौका मिलने पर वह अंग्रेजी में उच्च वर्ग जैसी ही योग्यता हासिल कर सकते हैं। सौ में एक की बात अलग है, पर यह असंभव है। उच्च वर्ग अपने घरों में अंग्रेजी का वातावरण बना सकते हैं और पीढ़ियों से बनाते आ रहे हैं। विदेशी भाषाओं के अध्ययन में जनता इन पुश्तैनी गुलामों का मुकाबला नहीं कर सकती।&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">जब हिंदी की जगह अंग्रेजी को राजभाषा पद पर बिठाया गया, तब यह तर्क दिया गया कि हिंदी समृद्ध नहीं है। उसके पास पारिभाषिक शब्दावली की कमी है। यही तर्क देशी भाषाओं के लिए दिया गया और पूरे देश में विदेशी अंग्रेजी भाषा को थोप दिया गया। यह बात सही है कि अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली की कमी है। लेकिन तमाम भारतीय भाषाओं के पास अंग्रेजी की अपेक्षा दो गुना शब्द भंडार है। हिंदी का प्रयोग करने और नई शब्दावली के निर्माण से इस कमजोरी को दूर किया जा सकता है। लोहिया ने &#8216;देशी भाषाएं बनाम अंग्रेजी&#8217; निबंध में लिखा, &#8220;जो लोग कहते हैं कि तेलुगू, हिंदी, उर्दू, मराठी गरीब भाषाएं हैं और आधुनिक दुनिया के लायक नहीं है उनको तो और इन भाषाओं के इस्तेमाल की बात सोचनी चाहिए, क्योंकि इस्तेमाल करते-करते ही भाषाएं धनी बनेंगी। जब मैं कभी इस तर्क को सुनता हूं,हिंदुस्तान में, तो बहुत आश्चर्य होता है कि मामूली बुद्धि के लोग भी कैसे इस बात को कह सकते हैं कि अंग्रेजी का इस्तेमाल करो क्योंकि तुम्हारी भाषाएं गरीब हैं। अगर अंग्रेजी का इस्तेमाल करते रह जाओगे तो तुम्हारी अपनी भाषाएं कभी धनी बन ही नहीं पाएंगी।&#8221; इसके लिए समय की नहीं बल्कि इच्छाशक्ति की जरूरत है। हिंदी का प्रयोग कैसे होगा? हमारी भाषा नीति क्या होनी चाहिए? डा. लोहिया ने अपना दृष्टिकोण पेश करते हुए लिखा है कि , &#8220;केंद्रीय सरकार की भाषा हिंदी होनी चाहिए। ठीक इसके बाद दस वर्ष के लिए दिल्ली केंद्रीय सरकार की गजटी नौकरियां गैर हिंदी लोगों के लिए सुरक्षित रहें। केंद्र का राज्यों से व्यवहार हिंदी में हो और जब तक कि वे हिंदी जान लें, केंद्र को अपनी भाषाओं में लिखें। स्नातकी तक की पढ़ाई का माध्यम अपनी मातृभाषा हो और उसके बाद का हिंदी। जिला जज व मजिस्टर अपनी भाषाओं में कार्यवाही कर सकते हैं, उच्च तथा सर्वोच्च न्यायालय में हिंदुस्तानी होनी चाहिए। जबकि लोकसभा में साधारणतः भाषण हिंदुस्तानी में हों लेकिन जो हिंदी ना जानते हों, वे अपनी भाषा में बोलें।&#8221; हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के प्रयोग संबंधी डा. लोहिया के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक है। लोहिया के रास्ते भाषा के मुद्दे को हल ही नहीं किया जा सकता है बल्कि राष्ट्रीयता को भी मजबूत किया जा सकता है।</p>



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		<title>रविकान्त का लेख- शिवरानी देवी के साथ प्रेमचन्द के सम्बन्ध</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 31 Jul 2026 11:35:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;हमारे समाज में या दुनिया के किसी भी समाज में किसी स्त्री द्वारा पति के परायी स्त्री के साथ सम्बन्ध को सहन करना लगभग नामुमकिन है। वे कौन से कारण थे, जिनकी बदौलत शिवरानी ने प्रेमचन्द को कभी भनक भी नहीं लगने दी कि वे उस सम्बन्ध को जानती हैं? दूसरा सवाल यह भी है &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">&#8216;<strong>हमारे समाज में या दुनिया के किसी भी समाज में किसी स्त्री द्वारा पति के परायी स्त्री के साथ सम्बन्ध को सहन करना लगभग नामुमकिन है। वे कौन से कारण थे, जिनकी बदौलत शिवरानी ने प्रेमचन्द को कभी भनक भी नहीं लगने दी कि वे उस सम्बन्ध को जानती हैं? दूसरा सवाल यह भी है कि वह दूसरी स्त्री कौन थी ? अब तक हिन्दी के खोजी साहित्यकार इसकी पड़ताल कर पाए हैं या नहीं, इसकी कोई जानकारी अभी तक नहीं है।&#8217; पढ़ें पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">बीसवीं सदी के विश्व साहित्य में प्रेमचन्द की मानीखेज भूमिका है। दुनिया की तमाम भाषाओं के उल्लेखनीय साहित्य में प्रेमचन्द का कथा साहित्य सम्मान के साथ पहली पंक्ति में शामिल करने योग्य है। हालाँकि औपनिवेशिक देशों के साहित्य, साहित्यकारों को इस रूप में देखने-परखने और सम्मान देने में आलोचक हिचकते हैं। अक्सर, प्रेमचन्द की तुलना गोर्की से होती है। कभी यह तुलना टालस्टाय और चेखव से होती है। वास्तव में, औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि के कारण आज भी इसी तरह देखने-परखने और मूल्यांकन करने की रबायत है। क्यों नहीं गोर्की की तुलना प्रेमचन्द से की जाती है ? ये वही दृष्टि है जिसमें समुद्रगुप्त की तुलना नेपोलियन से की जाती है, बिना यह जाने-समझे कि समुद्रगुप्त का इतिहास नेपोलियन से सैकड़ों वर्ष पुराना है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सवाल यह है कि किसी साहित्यकार को परखने की कसौटी क्या होनी चाहिए। क्या सिर्फ साहित्य और रचनात्मक मूल्यों के आधार पर किसी साहित्यकार का मूल्यांकन होना चाहिए ? रचनाकार के व्यक्तिगत जीवन को जाँचना-परखना जरूरी है या नहीं? किसी रचनाकार के व्यक्तिगत जीवन और रचनात्मक अवदान में कोई सम्बन्ध होता है या नहीं ? लेखक के जीवन और साहित्य के सम्बन्धों और अन्तर्विरोधों को रेखांकित किया जाना चाहिए या नहीं? ये प्रश्न प्रेमचन्द जैसे साहित्यकार का मूल्यांकन करते समय और भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। प्रेमचन्द का निजी जीवन बेहद दिलचस्प है। रचनात्मक मूल्यों के निकष पर उनकी जिन्दगी कहीं सच्ची, नैतिक और निर्द्वन्द्व है तो कहीं उतनी ही जटिल और अन्तर्विरोधों से भरी हुई है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रेमचन्द स्वाधीनता आन्दोलन के लेखक हैं। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान तमाम धार्मिक-सामाजिक सुधार आन्दोलन चल रहे थे। हिन्दुस्तान के अलग-अलग भागों में ये आन्दोलन सक्रिय थे। पंजाब और संयुक्त प्रान्त में दयानन्द सरस्वती के आर्य समाज का अधिक प्रभाव था। प्रेमचन्द ने 1911 में आर्य समाजी शिवरानी देवी से आर्य समाज के रीति-रिवाज से विवाह किया। शिवरानी देवी प्रेमचन्द की दूसरी पत्नी थीं। बाल विधवा शिवरानी का भी यह दूसरा विवाह था। प्रेमचन्द ने स्वेच्छा से प्रयत्नपूर्वक शिवरानी देवी से विवाह किया था। शिवरानी पढ़ी-लिखी साहित्यिक महिला थीं। प्रेमचन्द के साथ अपने रिश्तों को उन्होंने &#8216;प्रेमचन्द घर में&#8217; नामक पुस्तक में दर्ज किया है। अमृतराय की किताब &#8216;कलम का सिपाही&#8217; में उद्धृत प्रेमचन्द-शिवरानी के सम्बन्धों की अधिकांश जानकारी इसी किताब से ली गयी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रेमचन्द और शिवरानी देवी के स्वभाव में बहुत अन्तर था। अमृतराय ने अपनी माँ (शिवरानी) के सम्बन्ध में लिखा है कि वे &#8220;लकड़ी की तरह सीधी-सपाट, सच्ची, निडर, अक्खड़ और हठीली थीं।&#8221; जबकि प्रेमचन्द शान्त, विनम्र और मिलनसार थे। दोनों के स्वभाव में इतना फर्क होने के बावजूद घर-गृहस्थी से लेकर पढ़ने-लिखने तक कहीं कोई विशेष तनाव नहीं होता था। दरअसल, दोनों के स्वभाव ने एक-दूसरे का पूरक बना दिया था। यों तो प्रेमचन्द और शिवरानी के रिश्तों की बुनियाद भुरभुरी और झूठ पर आधारित थी। मसलन, प्रेमचन्द ने शिवरानी को बताया था कि उनकी पहली पत्नी जीवित नहीं हैं। विवाह के आठ साल बाद जब शिवरानी देवी को पता चला कि उनकी पहली पत्नी जीवित हैं तो प्रेमचन्द से उन्होंने उसे घर लाने के लिए कहा। हालाँकि प्रेमचन्द इसके लिए तैयार न हुए। यह भी सच है कि प्रेमचन्द और शिवरानी के विवाह के शुरुआती आठ-दस बरस बड़े तनाव भरे रहे। कारण प्रेमचन्द की विमाता थीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बचपन में ही माँ के गुजर जाने के बाद प्रेमचन्द की परवरिशविमाता यानी चाची ने की थी। इसीलिए प्रेमचन्द चाची के स्वभाव से परिचित होने के बावजूद, उनसे कभी कुछ न कहते थे। चाची और शिवरानी में आपस में मनमुटाव रहता था। इसीलिए अक्सर गृहकलह होता रहता था। शिवरानी ने अपनी किताब में एक ऐसे ही वाकयात का जिक्र करते हुए लिखा है कि &#8220;उसपर उन्होंने मुझे दो चपत लगाए और बाहर चले गये।&#8221; लेकिन धीरे-धीरे पति-पत्नी के रिश्तों में मिठास आने लगी। वात्सल्य और प्रेम के अभाव के कारण प्रेमचन्द के स्वभाव में कठोरता आ गयी थी। धीरे-धीरे शिवरानी ने इस कमी को दूर कर दिया। प्रेमचन्द को शिवरानी से प्रेम और वात्सल्य दोनों प्राप्त होने लगे। समय के साथ प्रेमचन्द उनपर आसक्त और निर्भर होते चले गये। एक पत्र में प्रेमचन्द ने शिवरानी को लिखा, &#8220;सच मानो मैंने अपने को तुम्हें सौंप दिया है।&#8221; और तब शिवरानी &#8220;वाकई उनपर शासन करने लगीं।&#8221; प्रेमचन्द ने शिवरानी के इस शासन को मानो स्वीकार कर लिया था। स्वयं शिवरानी ने प्रेमचन्द पर अपने स्नेह और प्रभाव तथा पति के स्वीकार भाव को इन शब्दों में व्यक्त किया है, &#8220;खाने-पीने के बारे में तो बच्चों की तरह जो भी पाएँ चुपके से खा लें और कुछ न बोलें। अगर अपने मन की कोई चीज वे खाना चाहें और मेरी इच्छा न हो तो वे उसे किसी तरह भी न खाते थे।&#8221; वस्तुतः यह शिवरानी देवी के प्रेम और वात्सल्य का शासन था। इस शासन में प्रेमचन्द अधिक स्वतन्त्र होकर लेखन में व्यस्त हो गये।</p>



<p class="wp-block-paragraph">खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने के आर्थिक प्रबन्धन और घर-गृहस्थी का बोझ अपने ऊपर लेकर शिवरानी देवी ने प्रेमचन्द को जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया। लेकिन शिवरानी ने अपने प्रेम और स्नेह के बन्धन में प्रेमचन्द को इस कदर बान्धा कि प्रेमचन्द पत्नी की इजाजत और सहमति के बगैर कोई काम नहीं करते थे। मसलन, 1920 में शिवरानी की रजामन्दी लेकर ही उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दिया था। कलकत्ते में भाई ने साझे में प्रेस लगाने की बात की। प्रेमचन्द बिना शर्त रुपये भेज रहे थे लेकिन शिवरानी के कहने पर उन्होंने शर्त लगाई। प्रेमचन्द बम्बई तभी गये जब &#8216;रानी&#8217; की रजामन्दी हुई। फिल्म कम्पनी से इग्लैण्ड जाने का प्रस्ताव मिला लेकिन शिवरानी के इनकार करने पर प्रेमचन्द ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। वास्तव में, शिवरानी गृहस्वामिनी ही नहीं प्रेमचन्द की हृदयस्वामिनी भी बन गयी थीं। इस सम्बन्ध में उन्होंने स्वयं लिखा है, &#8220;मेरी बातों को वे बहुत महत्त्व देते थे। अपने जीवन में कोई भी काम उन्होंने मेरी सलाह के बगैर नहीं किया।&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रेमचन्द और शिवरानी के आत्मीय सम्बन्ध भारत जैसे पुरुष प्रधान समाज में किसी भी दम्पत्ति के लिए आदर्श हो सकते हैं। आजकल, एक जुमला चलता है कि अगर प्रेम विश्वास पर टिका होता है तो विवाह अन्धविश्वास पर। लेकिन वैवाहिक जीवन में विश्वास और समर्पण हो तो दाम्पत्य सम्बन्ध निरे प्रेम सम्बन्ध से ज्यादा प्रेरक और सार्थक बन जाता है। प्रेमचन्द पत्नी को हमेशा &#8216;रानी&#8217; कहकर सम्बोधित करते थे। शुरुआती आठ वर्ष के बमचख के बाद प्रेमचन्द अपनी &#8216;रानी&#8217; को इतना चाहने लगे थे कि कुछ दिनों की जुदाई ही उन्हें असह्य लगने लगती थी। एक बार शिवरानी इलाहाबाद क्या रूक गयीं, बनारस में प्रेमचन्द को सुना घर काटकर खाने लगा। तब एक रोज उकताकर और बहुत खिन्न होकर प्रेमचन्द ने उन्हें उलाहना देते हुए लिखा, &#8220;प्रिय रानी, मैं तुम्हें छोड़कर काशी आया। मगर यहाँ तुम्हारे बिना सूना सूना लग रहा है। क्या कहूँ? तुम्हारी बहन की बात कैसे न मानता ? न मानने पर तुम्हें भी बुरा लगता। तुम तो वहाँ अपनी बहन के साथ खुश होंगी, मगर मैं यहाँ परीशान हूँ, जैसे एक घोंसले में दो पक्षी रह रहे हों और उनमें से एक के न रहने पर दूसरा परेशान हो। तुम्हारा यही न्याय है कि तुम वहाँ मौज करो और मैं तुम्हारे नाम की माला फेरूँ ? तुम मेरे पास रहती हो तो मैं भरसक कहीं जाने का नाम नहीं लेता, तुम आने का नाम नहीं लेती… घर मुझे खाये जा रहा है। कभी-कभी मैं यह सोचता हूँ कि क्या सभी की तबीयत इसी तरह चिन्तित हो जाती है या मेरी ही?… कहीं ऐसा न हो कि इस पत्र के साथ मैं भी पहुँचूँ।&#8221;</p>


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<figure class="aligncenter size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="628" height="414" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-31-at-4.56.17-PM.jpeg" alt="" class="wp-image-564" style="width:438px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-31-at-4.56.17-PM.jpeg 628w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-31-at-4.56.17-PM-300x198.jpeg 300w" sizes="(max-width: 628px) 100vw, 628px" /></figure>
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<p class="wp-block-paragraph">सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में बा और बापू के रिश्तों पर बहुत-कुछ कहा-लिखा गया। इन दिनों पुनः दिल्ली के एक मन्त्री के कुकर्मों का वीडियो मीडिया में आने पर एक पुराने पत्रकार और नये राजनेता ने ट्वीट कर लिखा कि परायी स्त्री से सहमति से बनाया गया शारीरिक सम्बन्ध जाएज है। उन लाल बुझक्कड़ ने फिर एक लम्बी अविश्वसनीय फेहरिस्त ऐसे रिश्तों की ट्विटर पर टांग दी। इस फेहरिस्त में गांधी जी का भी नाम था कि बापू ने उर्मिला देवी को आध्यात्मिक पत्नी माना था। इस जिरह को बीच में लाने का औचित्य यह है कि भारतीय समाज में पति-पत्नी के रिश्तों को खासी तवज्जो मिली है। यहाँ दाम्पत्य प्रेम की डोर विश्वास और समर्पण में बन्धी होती है। हम इतने संकीर्ण हैं कि इन रिश्तों पर कोई बहस-विमर्श नहीं करना चाहते। गोया, बात करने से यह रिश्ता नापाक हो जाएगा। मेरा इसरार सिर्फ इतना है कि बेहद बारीक और सघन बुने इस रिश्ते की समाजशास्त्रीय और आलोचनात्मक ढंग से जाँच-पड़ताल होनी चाहिए। ताकि इसके स्वरूप और ऐतिहासिक विकास-क्रम को समझा जा सके। यह जरूरी इसलिए भी है क्योंकि आज महानगरीय जीवन-पद्धति में सहजीवन (लिवइन) का अस्तित्व अंगड़ाई ले रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">समकालीन अस्मितावादी विमर्शकारों ने प्रेमचन्द के साहित्य को प्रश्नांकित किया है। दलित रचनाकारों ने जाति के सवाल उठाए। हालाँकि अपने अन्तिम उपन्यास &#8216;गोदान&#8217; और &#8216;गुल्ली-डण्डा&#8217; जैसी कहानियों में प्रेमचन्द ने दलित चेतना और संघर्ष की अभिव्यक्ति दी है। अलबत्ता, स्त्री नजरिए से &#8216;गोदान&#8217; में मालती और आनन्दी को आमने-सामने खड़ा करके प्रो. मेहता के व्याख्यानों को कटघरे में खड़ा किया जाता है। माना जाता है कि प्रेमचन्द आदर्श भारतीय नारी के कायल हैं। वे उस दर्शन को मानते हैं जिसमें स्त्री या तो देवी है अथवा दासी। देखने वाली बात यह है कि प्रेमचन्द अपने निजी जीवन में स्त्री के प्रति कैसा व्यवहार रखते हैं। शिवरानी ने तफ्सील से वर्णन किया है कि प्रेमचन्द उनकी सुख-सुविधाओं का बहुत खयाल रखते थे। वे शिवरानी के घरेलू कामों में भी मदद करते थे, जैसे-बच्चों को सम्भालना, बर्तन धोना, रोटी सेंकना, पत्नी और बच्चों के बीमार पड़ने पर उनकी सेवा करना आदि। उन्होंने शिवरानी से &#8216;दासी&#8217; की तरह<br>कभी व्यवहार नहीं किया। शिवरानी कभी उनके पैर दबाने जातीं तो प्रेमचन्द मना कर देते। शिवरानी ने भी प्रेमचन्द का पूर्ण मनोयोग से जीवन के हर पड़ाव पर साथ दिया। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान प्रेमचन्द को जेल न जाना पड़े, इसलिए वे स्वयं जेल गयीं। प्रेमचन्द इतने लिक्खाड़ थे कि बीमार होने के बावजूद, वे लिखते रहते। ऐसी स्थिति में जब कभी प्रेमचन्द नहीं माने तो शिवरानी ने उनका कलम तोड़कर फेंक दिया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रेमचन्द और शिवरानी का रिश्ता महज भावनात्मक ही नहीं था। इस जुड़ाव का बौद्धिक पक्ष भी है। शिवरानी जितनी निडर, साहसी और जिम्मेदार थीं, उतनी ही बौद्धिक भी थीं। प्रेमचन्द और शिवरानी में अक्सर बौद्धिक बहस भी होती थी। शिवरानी ने इन बहस-मुबाहिसों का सिलसिलेवार ब्योरा दिया है। इन बहसों में अधिकतर समकालीन मुद्दे होते थे। जैसे- स्त्री समस्याओं में नारी पराधीनता और वैश्यावृत्ति, साहित्य, देश की पराधीनता और आर्थिक शोषण, भाषा-समस्या, रूसी समाजवादी क्रान्ति और शासन व्यवस्था, धर्म, आस्था और आस्तिकता। ऐसे तमाम गम्भीर विषयों-समस्याओं पर प्रेमचन्द-शिवरानी में बहस-विमर्श होता था। इन मसलों पर दोनों की राय हमेशा एक नहीं होती थी। स्त्री समस्याओं पर दोनों के विचारों में अन्तर था। प्रेमचन्द शिवरानी के स्वतन्त्र विचारों का सम्मान करते थे। शिवरानी के सामाजिक कार्यों में भी प्रेमचन्द सहयोग करते थे। महिला आश्रम जाने और स्वाधीनता आन्दोलन में भागीदारी को प्रेमचन्द ने प्रोत्साहित किया। प्रेमचन्द की वजह से शिवरानी का साहित्य की तरफ झुकाव हुआ। उनसे प्रेरित होकर शिवरानी कहानी लिखने लगीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रेमचन्द और शिवरानी के इतने आत्मीय और सघन रिश्तों में एक गहरी फाँस भी थी। यह फाँस थी, प्रेमचन्द के अन्यत्र सम्बन्ध। अपने अन्तिम समय में प्रेमचन्द ने शिवरानी के समक्ष स्वयं इस सच्चाई को कुबूल किया है। पहली पत्नी के रहते हुए अन्य स्त्री के साथ प्रेमचन्द के सम्बन्ध थे। शिवरानी से विवाह करने के बाद भी यह सम्बन्ध चलता रहा। आश्चर्य तो यह है कि शिवरानी को इस सम्बन्ध की<br>जानकारी भी थी। हमारे समाज में या दुनिया के किसी भी समाज में किसी स्त्री द्वारा पति के परायी स्त्री के साथ सम्बन्ध को सहन करना लगभग नामुमकिन है। वे कौन से कारण थे, जिनकी बदौलत शिवरानी ने प्रेमचन्द को कभी भनक भी नहीं लगने दी कि वे उस सम्बन्ध को जानती हैं? दूसरा सवाल यह भी है कि वह दूसरी स्त्री कौन थी ? अब तक हिन्दी के खोजी साहित्यकार इसकी पड़ताल कर पाए हैं या नहीं, इसकी कोई जानकारी अभी तक नहीं है। एक सवाल यह भी प्रेमचन्द आखिरी वक्त में सच को कुबूल करके क्या अपराध मुक्त या पाप मुक्त होना चाहते थे। प्रेमचन्द के व्यक्तिगत जीवन का यह जटिल अन्तर्विरोध है।</p>
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		<title>रविकान्त का लेख- किसान समस्या, प्रेमचंद और जादुई यथार्थवाद</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Jul 2026 07:04:39 +0000</pubDate>
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<p class="wp-block-paragraph">भारत की सड़सठ प्रतिशत आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है। इतनी बड़ी आबादी आज घोर संकट में है। अतिवृष्टि और ओलावृष्टि के कारण फसल चैपट हो गई है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। किसानों की बेबसी का जमकर राजनीतिकरण हुआ है। कोई किसान की आत्महत्या का तमाशा बना रहा है। कोई इसे कायरता कह रहा है। इन हालातों में कथाकार प्रेमचन्द की याद आना स्वाभाविक है। प्रेमचन्द केवल हिन्दी के ही नहीं बल्कि सभी भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्त किसान-जीवन के सबसे बड़े लेखक हैं। अपने दर्जन भर उपन्यासों और तीन सौ से अधिक कहानियों में उन्होंने किसानों का बहुत मार्मिक चित्रण किया है। परिमाण के हिसाब से यद्यपि प्रेमचन्द ने किसानों पर अपेक्षाकृत कम कहानियाँ और उपन्यास लिखे हैं। प्रेमचन्द के यहाँ गांव के साथ-साथ शहर का जीवन भी बखूबी चित्रित है। उनके यहाँ शहरी जीवन का यथार्थ अपनी तमाम खूबियों-विसंगतियों के साथ मौजूद है। पूँजीपति, दलाल, रईस, वकील, संपादक, अध्यापक से लेकर राजनीतिक कार्यकर्ता, संघर्षशील पढ़े-लिखे युवा और मजदूर आदि विभिन्न चरित्र उनके कथा साहित्य में उपस्थित हैं। प्रेमचन्द के गांवों में भी किसान के साथ-साथ जमींदार महाजन, पण्डे पुरोहित, मुस्लिम, स्त्री, दलित आदि पात्र विद्यमान हैं। इसी वैविध्य को ध्यान में रखते हुए हंसराज रहबर ने प्रेमचन्द को स्वाधीनता आंदोलन का लेखक कहा है। अलबत्ता, उनके लेखन के केन्द्र में किसान और उसका जीवन ही है। प्रेमचन्द ने बेहद तल्लीनता और रागात्मकता के साथ गांवों के किसान और उसके परिवार को चित्रित किया है। यह चित्रात्मक शैली अन्य प्रसंगों में उतनी जीवन्त नहीं दिखाई देती। इसीलिए ज्यादातर आलोचक प्रेमचन्द को गांवों और किसानों का लेखक मानते हैं।<br>किसान जीवन के सबसे बड़े रचनाकार के रूप में प्रेमचन्द हमें बार-बार याद आते हैं। इसका एक कारण और भी है। उनके कथा-सहित्य के अन्य पात्र और समुदाय आज पहले से बेहतर स्थिति में हैं। स्त्री और दलित समुदाय आज स्वयं साहित्यिक रूप से अपना प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श आज साहित्य के केन्द्र में है। स्वाधीनता प्राप्ति और संविधान लागू होने के बाद इन समुदायों को विभिन्न अवसर प्राप्त हुए। इनका आर्थिक उत्थान हुआ। इनमें राजनीतिक सजगता और चेतना पैदा हुई। राजनैतिक चेतना और नेतृत्व प्राप्त होने के कारण इन समुदायों की आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति पहले से बेहतर हुई। दुर्भाग्य से स्वाधीन भारत में किसानों की कोई नुमाइन्दगी नहीं रही। लगातार किसानों को हाशिए पर धकेला जाता रहा। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी उनके हालात बद से बदतर होते गए। औपनिवेशिक भारत से भी कठिन परिस्थितियों का सामना आज भारतीय किसान कर रहा है। औपनिवेशिक भारत का किसान प्राणपण से किसानी की रक्षा करता था। फिर भी वह मजदूर बनने के लिए अभिशप्त था। आज किसान स्वेच्छा से खेती छोड़ना चाहता है, लेकिन उसके पास मजदूरी का विकल्प भी नहीं। वह ऋण लेकर खेती करता है। मोटे ब्याज पर साहूकार- महाजन से लिए गए ऋण को चुकाने में खुद को असमर्थ पाता है तो मजबूरन वह आत्महत्या कर लेता है।<br>प्रेमचन्द के कथा साहित्य के दो जीवन्त पात्रों हल्कू (पूस की रात) और होरी (गोदान) के माध्यम से औपनिवेशिक भारत की कृषि व्यवस्था और कृषक जीवन को समझा जा सकता है। खेती, किसान के जीविका का साधन तो है ही उसकी मरजाद भी है। लेकिन जब मरजाद (मर्यादा) बिखर जाए तो ऐसी खेती से क्या हासिल। जानवरों द्वारा बर्बाद की गई खेती को देखकर हल्कू हौले से मुस्कुराता है और सोचता है कि अब यहाँ ठंड में सोना तो न पड़ेगा। वह मजदूरी करके गुजारा कर लेगा। इसी कहानी को प्रेमचंद बड़े फलक पर ‘गोदान’ (1935) में प्रस्तुत करते हैं। गोदान में प्रेमचंद किसान जीवन और उसकी समस्या को सम्पूर्णता में चित्रित करते हैं। उसके वर्तमान की बारीक सच्चाईयों के साथ-साथ प्रेमचंद किसान और उसके परिवार के जीवन के भविष्य का भी संकेत करते हैं। गोदान के होरी की समस्या केवल ऋणग्रस्तता नहीं है, जैसा कि ‘प्रेमचंद और उनका युग’ में रामविलास शर्मा मानते हंै। वास्तव में भारतीय समाज की ब्राह्मणवादी-कर्मकाण्डी व्यवस्था और जमींदार- साहूकार तथा नये उभरते हुए पूँजीपति वर्ग का गठजोड़, किसान जीवन की त्रासदी के लिए उत्तरदायी हंै। यह समूचा तंत्र जौंक की तरह किसान के जीवन को चूसता है। हल्कू खेती छोड़ने के बारे में सोचकर हौले से मुस्कुराता है किन्तु खेती की बेदखली के बाद या चले जाने के बाद होरी के चेहरे पर स्थायी विषाद का भाव चस्पा हो जाता है। वह मजदूरी के लिए विवश है। अंततः भूखे पेट सड़क पर गिट्टी ढोते हुए होरी दर्दनाक मौत मरता है। वास्तव में यह होरी की मौत नहीं बल्कि हत्या है। ऐसी हत्या है जिसके गुनहगार रात-दिन तरक्की कर रहे हैं। खूब फल-फूल रहे हैं। अस्सी वर्षों के बाद भी किसानों के हालात नहीं बदले। उनके जीवन की त्रासदी बदस्तूर जारी है। आज हजारों होरी आत्महत्या कर रहे हैं। जनाब! ये आत्महत्याएँ नहीं, हत्याएँ हैं। मर्डर और सौ फीसदी मर्डर! यराना पूँजीवादी सत्तातंत्र इन हत्याओं का गुनहगार है।<br>आज के हालातों में हल्कू और होरी से ज्यादा ‘बलिदान’ कहानी के गिरधारी की याद आती है। ‘बलिदान’ कहानी का यथार्थ ‘पूस की रात’ और ‘गोदान’ के यथार्थ से एकदम अलग है। यह जितना मार्मिक है, उतना ही कलात्मक भी। ‘बलिदान’ का यथार्थ अधिक लोकधर्मी और सारगर्भी है। किसान जीवन से सम्बन्धित ‘बलिदान’ प्रेमचंद की कम चर्चित कहानी है। आज इस कहानी पर व्यापक चर्चा करने की आवश्यकता है। साथ ही इस बात की खोजबीन करना भी जरूरी है कि आलोचकों ने इस कहानी की अनदेखी क्यों की है। दरअसल ‘बलिदान’ कहानी आलोचना के मान्य सिद्धान्तों और विचारधारात्मक मानदण्डों पर खरी नहीं उतरती।<br>कहानी में अलौकिक या अतिप्राकृतिक तत्वों का समावेश है। सम्भवतः यही कारण है कि खासकर माक्र्सवादी आलोचकों ने इस कहानी को तवज्जो नहीं दी है। कहानी ‘गिरधारी’ नाम के एक किसान की है। पिता ‘हरखू’ की मौत के बाद जब वह जमींदार ‘ओंकारनाथ’ को पेशगी और नजराना नहीं दे पाता तो उसके पांच बीघा खेत नीलाम हो जाते हैं। उसके ऊपर महाजन का तीस रूपया कर्जा था। मजबूरन उसे कम दामों पर अपने बैल बेचकर कर्जा चुकाना पड़ा। गिरधारी इस सदमे से उबर नहीं पाता और खेत की मेड़ पर स्थित कुँए में कूदकर आत्महत्या कर लेता है। अब कोई भी उसके खेत को जोत-बो नहीं पाता क्योंकि रोज रात को गिरधारी कुँए से निकलकर खेत के चक्कर लगाता है और रोता है। गिरधारी के भूत के डर से कालिकादीन ने जमींदार को खेत वापस कर दिए हैं। ओंकारनाथ खेत उठाना चाहते हैं लेकिन कोई किसान खेत लेने के लिए तैयार नहीं होता।<br>गिरधारी के मरने के बाद उसका बड़ा लड़का शहर में ईंट के भट्टे पर काम करता है। प्रतिमाह बीस रूपये घर लाता है। जौ की जगह गेहूँ खाया जाता है। फिर भी गिरधारी की पत्नी गांव में दुबकी-छिपती फिरती है। अब उसकी कोई इज्जत-मर्यादा नहीं है। उसके पास खेत नहीं हैं। उसका बेटा मजदूरी करता है छोटे किसानों के लिए खेती न तब पुसाने लायक थी और न अब है।<br>गिरधारी का भूत रोज रात में खेत की मेड़ के चक्कर लगाता है। अब कोई उसके खेत में हल नहीं जोत पाता। कहानी की इस अलौकिकता की कैसे व्याख्या की जाए? क्या प्रेमचंद अंधविश्वासी थे? क्या प्रेमचंद नये तरह से गांधीवाद को प्रस्तुत कर रहे थे? गिरधारी के खेत पर चक्कर लगाने को क्या एक किसान के सत्याग्रह के रूप में देखना चाहिए? लेकिन भला कोई भूत के सत्याग्रह पर कैसे विश्वास करे। एक सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि भूत-प्रेत की कहानी लिखकर कहीं प्रेमचंद समाज में अंधविश्वास तो नहीं पोषित कर रहे थे। अगर ऐसा है तो प्रेमचंद को बड़ा लेखक कैसे माना जा सकता है? एक बात और, ‘बलिदान’ कोई अकेली कहानी नहीं है जिसमें प्रेमचंद भूत-प्रेत जैसी अलौकिक शक्तियों को चित्रित कर रहे हैं। ‘विध्वंस’ और ‘भूत’ कहानियों में भी चमत्कारपूर्ण दैवीय घटनाएँ होती हैं।<br>प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के सामाजिक यथार्थवादी लेखक हैं। उनके कथासाहित्य में संवेदना और शिल्प दोनों स्तरों पर यथार्थवाद को देखा जा सकता है। उपरोक्त कहानियों में प्रेमचंद ने भूत-प्रेत आदि अलौकिक शक्तियों का वर्णन किया है। यह किस किस्म का यथार्थवाद है? क्या उन्होंने यथार्थवाद को छोड़ दिया था? इसका सटीक उत्तर तभी दिया जा सकता है, जब हम प्रेमचंद की कहानियों का विश्लेषण बहुत सजग और सचेत होकर करें। दरअसल इन कहानियों में एक अलग किस्म का यथार्थवाद है। यह, वह यथार्थवाद हैं जिसे उन्नीस सौ पचास (1950) के बाद द0 अमेरिकी उपन्यासों के संदर्भ में ’जादुई यथार्थवाद’ कहा गया। प्रेमचंद, जादुई यथार्थवाद के माध्यम से भारतीय समाज के उस सच को व्यक्त करना चाहते थे जिसे सीधे प्रस्तुत करना मुश्किल था।<br>‘जादुई यथार्थवाद’ शब्द सबसे पहले लैटिन अमेरिकी उपन्यासों के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है। ‘सौ सालों का एकान्त’ नामक माक्र्वेज के उपन्यास के सन्दर्भ में जादुई यथार्थवाद पर गम्भीरता पूर्वक विचार किया गया। माक्र्वेज, लूशुन, कारपेंतियर, जार्ज अमादो, जोस मेरिया, अर्गूदस, जुआन रूफो, कार्लोस फुएत, रावबस्तोस आदि लेखकों-विचारकों के साहित्य में जादुई यथार्थवाद प्रस्तुत हुआ है। जादुई यथार्थवाद का सम्बन्ध सामान्य जीवन से है। माक्र्वेज लिखते हैं कि ‘निजन्धरी कथाएँ, मिथकीय चरित्र तथा भूत-प्रेतादि दैवीय शक्तियों के चमत्कारों के किस्से हमारे जीवन के हिस्से हैं। हमने अपनी दादी से सुने हैं। दरअसल जब जीवन में वास्तविकता और भ्रम का अंतर समाप्त हो जाता है तो ऐसे प्रसंगों का चित्रण होना स्वाभाविक है।’ लैटिन अमेरिकी देशों में उपनिवेशवाद के बाद तानाशाहों का जो शासन रहा उसमें भ्रम और वास्तविकता का अंतर खत्म हो गया। ऐसी विसंगत परिस्थितियों को बेपर्दा करने के लिए इन लेखकों ने जादुई यथार्थवाद की शैली का सहारा लिया।<br>जब सच कहना असम्भव किन्तु अनिवार्य हो तो वहाँ जादुई यथार्थवाद शैली का प्रयोग सबसे सार्थक होता हैं। हिन्दी साहित्य में इसका प्रयोग हुआ है। लेकिन आलोचना में जादुई यथार्थवाद को लगभग अछूत मान लिया गया हैं। माक्र्सवादी लेखकों में केवल मैनेजर पाण्डेय हैं जिन्होंने जादुई यथार्थवाद पर एक लम्बा लेख लिखा है। उन्होंने मुक्तिबोध के फैण्टसी शिल्प में अभिव्यक्त जादुई यथार्थवाद की ओर संकेत किया है। राजस्थान के प्रसिद्ध कहानीकार विजयदान देथा और हिन्दी कथाकार उदय प्रकाश के सन्दर्भ में भी जादुई यथार्थवाद की चर्चा होती है।<br>गिरीराज किराडू ने देथा की कहानियों में प्रस्तुत जादुई यथार्थवाद की खोज की है। उदय प्रकाश, लूशुन और माक्र्वेज के जादुई यथार्थवाद को हजारी प्रसाद द्विवेदी की गल्प शैली में पाते हैं। उनका मानना है कि इस शैली की प्रेरणा उन्हें द्विवेदी जी से मिली।<br>जादुई यथार्थवाद, यथार्थवाद का ही एक प्रकार है। एक विशेष शैली है। इसमें इतिहास, मिथक, फैण्टसी, यूटोपिया, जादू-टोना, परिकथाएँ, दैवीय शक्तियों, शगुन-अशगुन, शाप-वरदान, निजन्धारी कथाएँ, अद्भुत घटनाओं और पूर्वाभास आदि तत्वों-प्रसंगों का प्रयोग होता है। यह अद्भुत और यथार्थ का मेल है। यह यथार्थ को मिथकीय दृष्टि से प्रस्तुत करने की एक शैली है। यह कला और यथार्थ के समन्वय की महत्वपूर्ण शैली है। दूसरे शब्दों में, जादुई यथार्थवाद, यथार्थवाद का सर्वाधिक कलात्मक रूप है। औपनिवेशिक भारत में ऐसी राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ उपस्थिति थीं जिनसे जादुई यथार्थवाद की प्रस्तुति सम्भव हुई। मैनेजर पाण्डेय मानते हैं कि भारत के आदिवासियों और किसानों के जीवन में वे अधिकांश बातें मौजूद हैं जिनसे जादुई यथार्थवाद जुड़ा हुआ है। प्रेमचंद औपनिवेशिक भारत में किसान जीवन के यथार्थ को इस शैली में प्रस्तुत करते हैं। ‘बलिदान’ कहानी में गिरधारी के अपने खेतों से अत्यधिक लगाव, किसानी की मर्यादा और उसकी जीविका के परस्पर जुड़ाव के घनीभूत यथार्थ को प्रेमचंद प्रस्तुत करते हैं। इसीलिए गिरधारी का भूत खेतों का चक्कर लगाता है। ऐसे अलौकिक और अतिप्राकृतिक संदर्भ प्रेमचंद को जादुई यथार्थवाद का लेखक बनाते हैं। चुनांचे, प्रेमचंद हिन्दी के ही नहीं बल्कि किसी भी भाषा के पहले जादुई यथार्थवादी लेखक हैं।</p>
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		<title>रविकांत का लेख- शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएं</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-ravikants-article-in-adahan-magazine-om-prakash-valmikis-poems-are-a-call-for-struggle-against-exploitation/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:48:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया।&#8217; पढ़ें रविकांत का &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया।&#8217; पढ़ें  रविकांत का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ अम्बेडकर के विचारों और सपनों को साकार करने वाला साहित्य सबसे पहले 1960 के दशक में मराठी में शुरू हुआ। इसके बाद तेलुगु, हिन्दी, गुजराती, तमिल और कन्नड में दलित साहित्य लेखन का आंदोलन खड़ा हुआ। 1970 के दशक में हिन्दी दलित साहित्यकारों की पहली पीढ़ी सक्रिय हुई। इसमें सबसे उल्लेखनीय नाम ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून 1950-17 नवंबर 2013) का है। सदियों से पढ़ने-लिखने से वंचित रहे दलित समाज को पहली बार अभिव्यक्ति का अवसर मिला। लेकिन उनके लिए यह कितना आसान था? हिन्दू समाज के सबसे निचले पायदान पर स्थित जाति में जन्मे ओमप्रकाश वाल्मीकि के लिए लिखना किसी यातना से कम नहीं था। उन्होंने अपनी किताब &#8216;दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष और यथार्थ&#8217; में लिखा है ,&#8221;मुद्रित शब्द की आग में मैंने अपने आपको हमेशा झुलसते पाया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर , गांव बरला के बेसिक प्राइमरी स्कूल में मेरे दाखिले के वक्त गिड़गिड़ाते पिता का चेहरा आज भी मेरी आंखों में किरकिराता है। और यातना भरे सफर और संघर्ष में यही मेरी ताकत भी बनता है। यह वह दौर था, जब भारत नया-नया स्वतंत्र हुआ था, लेकिन स्कूल- कॉलेजों में किसी दलित के लिए प्रवेश पाना आसमान से तारे तोड़ लेने के समान था, किसी दलित के लिए स्कूल के दरवाजे बंद थे। नई-नई आजादी मिली थी, नया संविधान बना था। जिसमें सबको समान अधिकार देने की बात कही गई थी। लेकिन हिंदुत्व की सनातनी मान्यताओं के सामने संविधान की धाराएँ बौनी थीं। पिताजी के उस जज्बे को समझने की उस वक्त मेरी उम्र नहीं थी, लेकिन एक बार जब स्कूल की टाट-पट्टी के सबसे किनारे पर, जो मेरे बैठने से पहले ही खत्म हो जाती थी, बैठकर अक्षर पहचानने का जो सिलसिला शुरू हुआ, तो वह चिंगारी बनाकर अंधेरे में जुगनू की तरह चमकने लगा था। और वही चमक मेरे भीतर आग में तब्दील हो गई थी। जिसकी तपिश ने मेरे वजूद को ही बदल दिया तो उस वक्त पिताजी का वह जज्बा ठीक से समझ में आने लगा था।&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदू समाज की बेड़ियों को ही नहीं तोड़ा बल्कि हिंदी साहित्य को भी शुचिता और कुलीनता से मुक्त कराया। जयप्रकाश कर्दम के शब्दों में, &#8220;ओमप्रकाश वाल्मीकि एक ऐसा नाम है, जिसने अपनी रचनाओं के माध्यम से कुलीनता और आभिजात्य संस्कृति के मूल्यों में रचे-बसे हिंदी साहित्य की सदियों पुरानी जड़ता को तोड़ा और समाज की भांति साहित्य की चौखट से बाहर उपेक्षित पड़े दलितों को साहित्य के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि का लेखन साहित्य विमर्श में एक अनिवार्य हस्तक्षेप है।&#8221;<br>ओमप्रकाश वाल्मीकि ने साहित्य को नए ढंग से परिभाषित किया। उनके अनुसार, साहित्य मनुष्यता की अभिव्यक्ति है। पराधीनता से मुक्ति का आख्यान है। शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है। समता और स्वतंत्रता की चेतना है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने पूर्ववर्ती हिन्दी साहित्य को कठघरे में खड़ा किया। उनके अनुसार अधिकांश हिन्दी साहित्य ब्राह्मणवादी परंपराओं और मूल्यों से पोषित है। इसमें दलितों-वंचितों की पराधीनता और पीड़ा की अभिव्यक्ति नहीं है। दलित समाज की पराधीनता और उसके मुक्ति के सवालों को केंद्र में रखकर उन्होंने कविता, कहानी, आत्मकथा और आलोचना जैसी महत्वपूर्ण विधाओं में रचनाएं लिखीं। उनका रचना संसार बहुत व्यापक है। उनके चार कहानी संग्रह &#8211; सलाम (2000), घुसपैठिए (2003), छतरी, अम्मा एंड अदर स्टोरी। आत्मकथा- जूठन (1997) दूसरा भाग (2015) आलोचना- दलित साहित्य का सौंदर्य शास्त्र (2001), मुख्य धारा और दलित साहित्य, दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ (2013) विचारपरक लेखन &#8211; सफाई देवता (2008) नाटक- दो चेहरे, उसे वीर चक्र मिला था, अनुवाद- मैं हिंदू क्यों नहीं? (कांचा इलैया की अंग्रेजी किताब का हिंदी अनुवाद), सायरन का शहर (अरुण काले के मराठी कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद)।<br>बृहत साहित्य के लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि बुनियादी तौर पर कवि हैं। उनके लेखन की शुरुआत कविता से हुई और कविता उनके जीवन-संघर्ष में अनवरत संबल बनी रही। अपनी किताब &#8216;दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ&#8217; में उन्होंने लिखा है कि, &#8220;प्रारंभिक दौर में ही मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम कविता ही रही है। एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहने के साथ-साथ कविताओं की ओर मेरा झुकाव लगातार बढ़ता गया। बल्कि हताशा और निराशा के समय कविता मुझे संबल देती रही है।&#8221; कविता जीवन नहीं बल्कि उनकी पूरी दुनिया है। उसका सच दिल से क्या, अस्थि-मज्जा से निकला हुआ यथार्थ है! उनका पहला कविता संग्रह &#8216;सदियों का संताप&#8217; 1989 में फिलहाल प्रकाशन, देहरादून से प्रकाशित हुआ। दूसरा काव्य संग्रह &#8216;बस्स बहुत हो चुका&#8217; 1997 में वाणी प्रकाशन से आया। इसके बाद 2009 में उनका तीसरा काव्य संग्रह &#8216;अब और नहीं&#8217; राधाकृष्ण प्रकाशन से छपा। अंतिम और चौथा काव्य संग्रह &#8216;शब्द झूठ नहीं बोलते&#8217; 2012 में अनामिका प्रकाशन से प्रकाशित हुआ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उनकी कविताओं में सामन्तों- ब्राह्मणवादियों का शोषण तंत्र तथा दलितों की यातना, संघर्ष और आक्रोश की अभिव्यक्ति हुई है। दलित जीवन के भोगे हुए यथार्थ को प्रस्तुत करने वाली उनकी कविताएं काव्यरसिकों के गले नहीं उतरतीं। उनकी कविताओं में ना शास्त्रीय संस्कार है और ना सात स्वरों का साज। उनकी कविताओं में वेदना की अनुभूति है। मैनेजर पांडेय के शब्दों में &#8216;वेदना की कोई लय नहीं होती।&#8217; अभिजात साहित्य की तरह उनकी कविताएं मनोरंजन के लिए नहीं हैं। आधुनिकतावादियों की तरह विकारों के उत्सर्जन की संवाहक भी उनकी कविताएं नहीं हैं। उनके लिए कविता संवेदना और सरोकारों का संधान है। सच कहने का साहस और संघर्ष की गवाही है, कविता। &#8216;शब्द झूठ नहीं बोलते&#8217; संग्रह की भूमिका में ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं, &#8220;मेरे लिए कविता आनंद या रसास्वादन की चीज नहीं है। बल्कि कविता के माध्यम से मानवीय पक्षों को उजागर करते हुए मनुष्यता के सरोकारों और मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना है।&#8221; अन्यत्र भी उन्होंने लिखा है कि, &#8220;मेरे लिए कविता कला से ज्यादा जीवन की अदम्य लालसा, गतिशीलता की संवाहक है, जो हमारी पीड़ा, हमारे सुख-दुख की अभिव्यक्ति है, जिसमें हम अपने वर्तमान का प्रतिबिंब शिद्दत के साथ देख सकें, जो जीवन की विद्रूपताओं से जूझने का हौसला दे…सच्ची और सही कविता है, जो सच को सच और झूठ को झूठ कहने का हौसला रखती है।&#8221;<br>भारतीय समाज में व्यक्ति की बुनियादी पहचान जाति है। जाति से द्विजों को जन्मना श्रेष्ठता हासिल है और शूद्रों-दलितों को जन्मना हीनता। जाति के कारण ही दलितों को रोज अपमान, अन्याय और अत्याचार का सामना करना पड़ता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जाति कहीं उनका पीछा नहीं छोड़ती। दलितों के लिए जाति एक अभिशाप है। जीते जी नरक! जाति की नारकीय यातनाओं को दलित कवियों ने रचा। उनके शब्दों में एक वेदना भरी चीख है। &#8216;ठाकुर का कुआं&#8217; कविता में बेहद सरल शब्दों में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने जातिवादी परतों को उघाड़कर शोषणकारी तंत्र और वंचितों की बेबसी को बहुत मार्मिक ढंग से पेश किया है-<br>&#8220;चूल्हा मिट्टी का/ मिट्टी तालाब की/ तालाब ठाकुर का।<br>भूख रोटी की/ रोटी बाजरे की/ बाजरा खेत का/ खेत ठाकुर का।<br>बैल ठाकुर का/ हल ठाकुर का/ हल की मूठ पर हथेली अपनी/ फसल ठाकुर की।<br>कुआं ठाकुर का/ पानी ठाकुर का/ खेत खलिहान ठाकुर के/ गली मुहल्ले ठाकुर के फिर अपना क्या?<br>गांव?<br>शहर?<br>देश?&#8221;<br>56 शब्दों की यह कविता 56 इंची सत्ता के दौर में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली कविता बन गई है। साहित्यिक महफिलों से लेकर संसद भवन तक इस कविता की गूंज है। एक सांसद द्वारा उद्धृत किए जाने के बाद सामन्तों द्वारा हुई प्रतिक्रिया इस बात को दर्शाती है कि आज भी ब्राह्मणवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं।<br>दलित समाज पीढ़ी दर पीढ़ी जाति दंश से पीड़ित है। सदियों से मूक बधिर रहा, यह समाज आज अपनी पीड़ा और वेदना को व्यक्त कर रहा है। वह हंसते हुए प्रेम के गीत नहीं लिख सकता। उसका एक-एक शब्द ज्वालामुखी है, आह है, कराह है, धिक्कार है। बकौल ओमप्रकाश वाल्मीकि, &#8220;किसी एक जाति में जन्म लेने के कारण, जो कि उस व्यक्ति विशेष के हाथ में नहीं था, के लिए उसे इतनी बड़ी सजा कि उससे उसके मनुष्य होने तक के तमाम अधिकार छीन लिए जाएं। ऐसे में जब उस अपमानित व्यक्ति के हाथ में कलम आएगी, तब वह कैसी कविता लिखेगा? क्या उसे प्रेम कविता लिखनी चाहिए या विद्रोही? यह सवाल एक दलित कवि के भीतर गर्म-गर्म लावा दहकाता रहा है।&#8221; अगर यह गुलामी तुम्हारे ऊपर थोप दी जाए? &#8216;तब तुम क्या करोगे&#8217; कविता में वाल्मीकि जी पूछते हैं, &#8220;यदि तुम्हें धकेलकर गांव से बाहर कर दिया जाए/ पानी तक न लेने दिया जाए कुएं से/ दुत्कारा फटकारा जाए/ चिलचिलाती दोपहर में कहा जाए/ तोड़ने को पत्थर/ काम के बदले दिया जाए/ खाने को जूठन/ तब तुम क्या करोगे/ यदि तुम्हें मरे जानवर को/ खींचकर ले जाने के लिए कहा जाए/ और कहा जाए ढोने को पूरे परिवार का मैला /पहनने को दी जाए उतरन/ तब तुम क्या करोगे?&#8221;<br>वेदना से उपजे इन सवालों के बावजूद, कवि समर्पण के बदले सौहार्द और अपनापन चाहता है। वह बदलाव चाहता है, बदला नहीं। &#8216;भय&#8217; कविता में एक उम्मीद है कि काश!-<br>&#8220;तुम्हारे हाथ बढ़े होते/ मेरी ओर/ प्रेम गंध का स्पर्श लेकर/ सच कहता हूं/ मैं सीने से नहीं/ लिपट जाता तुम्हारे कदमों से/ बिछ जाता/ धूल बनकर जमीन पर।<br>बिछा तो अब भी हूँ-<br>प्रेम की आसक्ति पर नहीं/ तुम्हारे खूनी पंजों से डरकर।&#8221;<br>इसीलिए दलित कविता में जाति के प्रति गहरी वितृष्णा है।-<br>&#8220;स्वीकार्य नहीं मुझे जाना / मृत्यु के बाद/ तुम्हारे स्वर्ग में/ वहां भी तुम/ पहचानोगे मुझे/ मेरी जाति से ही।&#8221;<br>&#8216;शब्द झूठ नहीं बोलते&#8217; की भूमिका में ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं कि, &#8220;सभ्यता, संस्कृति के घिनौने षड्यंत्र लुभावने शब्दों से भरमाने का काम करते हैं। जहां नैतिकता, अनैतिकता और जीवन मूल्यों के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है।&#8221;10 पुनः वे हिन्दू सहिष्णुता के सच को तंज भरे लहजे में बेनकाब करते हैं-<br>&#8221; हां, सचमुच तुम सहिष्णु हो/ जब दंगों में मारे जाते हैं/ अब्दुल और कासिम/ कल्लू और बिरजू/ तब तुम सत्यनारायण की कथा सुनते हुए/ भूल जाते हो अखबार पढ़ना।<br>पूजते हो गांधी की हत्यारे को<br>तोड़ते हो इबादतगाह झुंड बनाकर।&#8221;<br>महात्मा गांधी के हत्यारे को पूजने वाले और बाबरी मस्जिद तोड़ने वाले हिंदुत्ववादी आज सत्तानशीं हैं। हिंसा की यह संस्कृति आज मोब लिंचिंग जैसे भयावह कुकृत्य में तब्दील हो चुकी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मानीखेज है कि दलित साहित्यकारों में, खासकर ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदुत्व और उसकी संस्कृति की तीखी आलोचना की है। हिंदुत्ववादियों ने भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कृति को गड्डमड्ड कर दिया। उनके दावे पर ओमप्रकाश वाल्मीकि व्यंग करते हैं- &#8220;कैद कर रखा है तुमने तहखानों में/ संस्कृति को/ मैं पूछता हूँ-/ संस्कृति क्या तुम्हारी रखैल है?&#8221;<br>&#8216;शास्त्रीय भाषा का शब्द वसुधैव कुटुम्बकम कितना खोखला&#8217; है? वाल्मीकि जी पूछते हैं, &#8216;उपेक्षा, उत्पीड़न और अछूत जाति किस सभ्यता और संस्कृति की देन है?&#8217;</p>



<p class="wp-block-paragraph">90 के दशक में पिछड़ों के आरक्षण वाली मण्डल राजनीति के बरक्स कमण्डल की राजनीति तेज हुई। साम्प्रदायिक राजनीति दंगों में बदल गई। विस्फोटक की जगह मूर्तियों ने ले ली। धार्मिक जुलूस भय पैदा करने लगे। &#8216;आईना&#8217; कविता में वाल्मीकि जी ने भयावहता को इन शब्दों में दर्ज किया है-<br>&#8220;खड़ा हूं चौराहे पर/ जहां से गुजरा है अभी-अभी/ एक जुलूस/ जिसमें शामिल थे/ बिन चेहरों के लोग/ जिनके हाथों में चमक रही थीं/ तलवारें, त्रिशूल और तमंचे<br>…..<br>इस खूंखार समय में/ आरडीएक्स की जगह/ हो सकती हैं मूर्तियां/ जो आस्था के प्रश्न पर/ कर दी जाएंगी फिट/ अवैध जगहों पर/ खून खराबे के लिए किसी तर्क की/ आवश्यकता नहीं होती है।&#8221;<br>ओमप्रकाश वाल्मीकि हिन्दू संस्कृति के मुखौटे में छिपे हिंसक, अश्लील और सत्तालोलुप चेहरे को बेनकाब करते हैं। यह राजनीति और संस्कृति अब और भी भयानक और खूनी हो चुकी है। आज दलित साहित्य विमर्श और अम्बेडकरवाद क्रूर और आतताई हिंदुत्ववादी सत्ता और संस्कृति का डटकर मुकाबला कर रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया। दलित जीवन के बदरंग प्रसंगों को रचकर ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदू धर्म के पाखंड को बेपर्दा किया। उनकी कहानियों ने पौराणिक कथाओं की अश्लीलता को नंगा कर दिया। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने उस सामाजिक व्यवस्था का पर्दाफाश किया, जिसमें सदियों से यातनाओं का शिकार दलित पशुओं से भी बदतर जीवन जी रहा था। दलितों के शोषण और दमन पर पलने वाला रक्तपिपासु ब्राह्मणवाद आज ओमप्रकाश वाल्मीकि के साहित्यिक कटघरे में है। उससे हजारों सालों की यातनाओं का हिसाब मांगा जा रहा है।</p>
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		<title>सामाजिक लोकतंत्र का आधार स्तंभ थे शाहूजी महाराज</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/shahu-maharaj-was-the-pillar-of-social-democracy-read-ravikants-full-article-on-adahan-patrika/</link>
		
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		<pubDate>Fri, 26 Jun 2026 10:19:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;शाहूजी महाराज द्वारा पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण लागू करने के बाद, 1912 में कुल 95 अधिकारियों में से केवल 35 पदों पर ही ब्राह्मण रह गए थे। यही कारण है कि मराठा ब्राह्मणों ने शाहूजी महाराज और उनकी नीतियों की बहुत आलोचना की। कहना न होगा कि आरक्षण की नीति का यह विरोध आज &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong> &#8216;शाहूजी महाराज द्वारा पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण लागू करने के बाद, 1912 में कुल 95 अधिकारियों में से केवल 35 पदों पर ही ब्राह्मण रह गए थे। यही कारण है कि मराठा ब्राह्मणों ने शाहूजी महाराज और उनकी नीतियों की बहुत आलोचना की। कहना न होगा कि आरक्षण की नीति का यह विरोध आज भी जारी है।&#8217; पढ़ें रविकान्त का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">मराठा छत्रपति शिवाजी आज हिंदुत्ववादियों के लिए प्रतीक पुरुष हैं। जबकि शिवाजी का राज तिलक करने के लिए कोई ब्राह्मण तैयार नहीं हुआ था। तब काशी से गंग भट्ट नामक एक निम्न कुल के ब्राह्मण को बुलाया गया था। कहा जाता है कि गंग भट्ट ने अपने पैर के अंगूठे से शिवाजी का राजतिलक किया था। हिंदुत्व के विचारक और अंग्रेजों से माफी मांगकर जेल से रिहा हुए वी. डी. सावरकर ने शिवाजी की इस आधार पर भर्त्सना की थी, कि उन्होंने पराजित शत्रुदल की बंधक बनाई गई स्त्रियों को ससम्मान उनके राज्य वापस क्यों भेज दिया ।सावरकर का कहना था कि शत्रु दल की स्त्रियों के साथ शिवाजी की सेना को बलात्कार करना चाहिए था। ऐसे मराठा क्षत्रप शिवाजी की छवि को आज कट्टर हिंदू धर्म रक्षक के तौर पर गढ़ा जा रहा है। मुगल बादशाह औरंगजेब से टकराने वाले शिवाजी का इस्तेमाल आज चितपावन ब्राह्मणों के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुसलमानों के विरुद्ध एक धर्मरक्षक राजा के रूप में कर रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि शिवाजी खुद हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवाद से प्रताड़ित थे। अपनी वीरता और पराक्रम से स्वतंत्र राज्य स्थापित करने वाले शिवाजी को मराठा ब्राह्मणों ने क्षत्रिय मानने से इंकार कर दिया था। दरअसल,शिवाजी शूद्र कुन्वी जाति के थे।कुन्वी जाति को उत्तर भारत की हिन्दी पट्टी में कुर्मी कहा जाता है। छत्रपति शिवाजी की तीसरी पीढ़ी में 26 जून 1874 को छत्रपति शाहूजी महाराज का जन्म हुआ था। उनके बचपन का नाम यशवंतराव था।तीन वर्ष की उम्र में ही उनकी माँ का देहान्त हो गया।17 मार्च 1884 को कोल्हापुर की रानी आनंदीबाई ने उन्हें गोद ले लिया। इसके बाद 2 जुलाई 1894 में शाहूजी महाराज कोल्हापुर स्टेट के राजा बने।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बहुजन नायक शाहूजी महाराज ने सत्ता संभालने के बाद दलित और पिछड़ों के हित में अनेक क्रांतिकारी फैसले किए।1901 में उन्होंने कोल्हापुर राज्य जनगणना कराकर अछूतों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को सार्वजनिक किया।वर्तमान संदर्भ में इस फैसले की प्रासंगिकता को समझा जा सकता है।तमाम बहुजन या दलित सामाजिक संगठन लगातार जातिगत जनगणना की माँग कर रहे हैं।ताकि देश में दलितों की वास्तविक स्थिति का खुलासा हो सके।एक साल बाद 1902 में शाहूजी महाराज ने कोल्हापुर राज्य में शिक्षा और सरकारी नौकरियों में दलितों और पिछड़ों को 50 फीसद आरक्षण लागू किया। भारतीय इतिहास में यह पहला अवसर है जब जाति के आधार पर आरक्षण दिया गया। पहली बार ब्राह्मणवादी व्यवस्था में शुद्र को पढ़ने-लिखने और सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई।इसी आधार पर बाबा साहब ने भारतीय संविधान में दलित, आदिवासी और पिछड़ों के लिए आरक्षण का विशेष प्रावधान किया। कथित शूद्र तबके के लिए विशेष आरक्षण के अधिकार की जो व्यवस्था संविधान में की गई,वास्तव में उसके सूत्रधार शाहूजी महाराज ही हैं। इसीलिए शाहूजी महाराज को आरक्षण व्यवस्था का जनक माना जाता है।<br>पेशवाई दौर से ही मराठा राज्य में चितपावन ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा है। शाहूजी महाराज के कोल्हापुर राज्य में आरक्षण लागू होने से पहले राज्य के सामान्य प्रशासन में कुल 71 पदों में से 60 पदों पर ब्राह्मण अधिकारी नियुक्त थे। इसी प्रकार 500 क्लर्कों में से 490 ब्राह्मण थे। शाहूजी महाराज द्वारा पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण लागू करने के बाद, 1912 में कुल 95 अधिकारियों में से केवल 35 पदों पर ही ब्राह्मण रह गए थे। यही कारण है कि मराठा ब्राह्मणों ने शाहूजी महाराज और उनकी नीतियों की बहुत आलोचना की। कहना न होगा कि आरक्षण की नीति का यह विरोध आज भी जारी है। आरक्षण के विरोध की शुरूआत भी नागपुर के संघ कार्यालय से हुई। अक्सर देखा गया है कि आरक्षण के खिलाफ भ्रांतियों और पिछड़ी जातियों के विरुद्ध नफरत और हिंसा का प्रयोग संघ की मानसिकता वाले सामंती सवर्णों द्वारा होता है। हिंदुत्व के झंडावरदार रत्नागिरी के सावरकर से लेकर संघ के हेडगेवार,गोलवलकर और वर्तमान संघ प्रमुख मोहन भागवत तक तथा महात्मा गांधी का हत्यारा नाथूराम गोडसे भी चितपावन ब्राह्मण हैं।चितपावन ब्राह्मणों ने शाहूजी महाराज की बहुत आलोचना की है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले से शाहूजी महाराज बहुत प्रभावित थे। ज्योतिबा फुले की &#8216;गुलामगिरी&#8217; उनकी सबसे प्रिय किताब थी।उन्होंने अपने राज्य में &#8216;सत्यशोधक समाज&#8217; आंदोलन चलाया।1911 में उन्होंने अपने संस्थान में सत्यशोधक समाज की स्थापना की।फूले दंपति द्वारा शूद्रों और स्त्रियों की शिक्षा के लिए किए गए काम से प्रेरित होकर शाहूजी महाराज ने अपने राज्य में आधुनिक शिक्षा का बीजारोपण किया। उन्होंने अपने राज्य में 1912 में प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाया। इसके बाद 25 जुलाई 1917 को शाहूजी महाराज ने प्राथमिक शिक्षा को निशुल्क भी कर दिया। उन्होंने 500 से 1000 तक की जनसंख्या वाले प्रत्येक गांव में स्कूल खोले।स्त्री शिक्षा पर उन्होंने विशेष जोर दिया।विदित है कि यूपीए सरकार ने 2009 में लगभग इसी पैटर्न को प्राइमरी और जूनियर शिक्षा पर लागू किया। लेकिन शाहूजी महाराज ने एक कदम और आगे बढ़कर गरीब और पिछड़े-दलित बच्चों के लिए निशुल्क छात्रावास भी खोले ।इन छात्रावासों का नामकरण उन्होंने शिवाजी के नाम पर किया -&#8216;शिवाजी मराठा बोर्डिंग हाउस&#8217;।15 अप्रैल 1920 को नासिक में एक छात्रावास का शिलान्यास करते हुए शाहूजी महाराज ने कहा-&#8220;जातिवाद का अंत जरूरी है। जाति को समर्थन देना अपराध है। हमारे समाज में सबसे बड़ी बाधा जाति है।&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">कोरोना महामारी के वैश्विक संकट के समय भारत में आर्थिक संकट इतना विकट है कि खजाना लगभग खाली है। ऐसे समय में कुछ प्रगतिशील बुद्धिजीवी मंदिर और मठों की संपत्ति को सरकारी खजाने में जमा करने की बात कह रहे हैं। आखिर, धर्म स्थानों की संपत्ति का लोगों के हित में उपयोग होना ही चाहिए। सभी धर्म मानवसेवा को सर्वोपरि मानते हैं। इसलिए धर्म स्थलों पर दान दी गई संपत्ति को अगर देश हित में इस्तेमाल किया जाए तो इससे जन कल्याण होगा। आश्चर्यजनक रूप से शाहूजी महाराज ने 9 जुलाई 1917 को एक आदेश जारी करके कोल्हापुर राज्य के सभी धार्मिक स्थलों की आय और संपत्ति पर राज्य का अधिकार स्थापित कर दिया। पिछले साल दक्षिण भारत में मंदिरों के पुजारियों में गैर ब्राह्मणों को नियुक्त किया गया। लेकिन शाहूजी महाराज ने एक सदी पहले कोल्हापुर राज्य में पिछड़ी जाति के मराठा पुजारियों की नियुक्ति का आदेश पारित किया था। इन पुजारियों के प्रशिक्षण के लिए उन्होंने 1920 में एक विद्यालय भी खुलवाया।<br>शाहूजी महाराज ने दलितों और स्त्रियों के अधिकारों के लिए ठोस कदम उठाए। 1919 में उन्होंने अछूतों को इलाज के लिए अस्पताल में दाखिल होने का अधिकार दिया। इसके पहले अन्य सार्वजनिक स्थानों की तरह किसी अछूत का अस्पताल में भी प्रवेश वर्जित था। इसी साल उन्होंने एक आदेश द्वारा प्राइमरी स्कूल से लेकर कॉलेजों तक में दलितों के साथ होने वाले अन्याय और दुर्व्यवहार को समाप्त कर दिया। अब जाति के आधार पर स्कूल में बच्चों के साथ भेदभाव नहीं हो सकता था। इसी तरह उन्होंने सरकारी नौकरियों में दलितों के साथ होने वाले अन्याय और छुआछूत को समाप्त किया। इस निर्णय के पीछे एक घटना मानी जाती है। दरअसल, उनके राजमहल में कर्मचारियों के लिए बने क्वार्टर में गंगाराम कांबले नामक एक दलित कर्मचारी रहता था। एक दिन मराठा सैनिक संताराम और ऊँची जाति के कुछ कर्मचारियों ने गंगाराम कांबले की यह कहते हुए पिटाई कर दी, कि उसने तालाब के पानी को छूकर अपवित्र कर दिया है।शाहूजी महाराज को खबर होने पर उन्होंने ऊँची जाति के कर्मचारियों की घोड़े के चाबुक से पिटाई की और नौकरी से निकाल दिया। गंगाराम कांबले को पैसा देकर उन्होंने चाय की दुकान खुलवाई। स्वयं शाहूजी महाराज उसकी दुकान पर चाय पीने जाते थे। गंगाराम ने अपनी चाय की दुकान का नाम सत्यसुधारक रखा। इस घटना के बाद शाहूजी महाराज ने छुआछूत को मानने वाले किसी भी अधिकारी और कर्मचारी को सख्त आदेश दिया कि वे या तो अपनी आदत बदल लें अथवा 6 माह के भीतर नौकरी से इस्तीफा देकर चले जाएं।15 जनवरी 1919 को उन्होंने आदेश पारित करते हुए कहा-&#8220;उनके राज्य के किसी भी कार्यालय और गाँव पंचायतों में भी दलित-पिछड़ी जातियों के साथ समानता का बर्ताव हो,यह सुनिश्चित किया जाए। छुआछूत को बर्दास्त नहीं किया जाएगा। उच्च जातियों को दलित जाति के लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही चाहिए। जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जाएगा,समाज का चौतरफा विकास असंभव है।&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">दलितों की आर्थिक पराधीनता को समाप्त करने के लिए शाहूजी महाराज ने 1917 में &#8216;बलूतदारी प्रथा&#8217; को समाप्त किया। इस प्रथा के अनुसार थोड़ी सी जमीन के बदले किसी दलित को परिवार सहित पूरे गांव की मुफ्त सेवा करनी पड़ती थी। इसी तरह शाहूजी महाराज ने 1918 में &#8216;वतनदारी&#8217; नामक एक और प्रथा का अंत किया। उन्होंने राज्य में भूमि सुधार व्यवस्था लागू की।इसके तहत अब अछूतों को भी भूस्वामी बनने का अधिकार मिल गया। दलितों की तरह शाहूजी महाराज ने स्त्रियों को भी आर्थिक अधिकार प्रदान किया। कोल्हापुर राज्य में उन्होंने 11 नवंबर 1920 को मिताक्षरा न्याय सिद्धांत समाप्त कर दिया। मिताक्षरा याज्ञवल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर की टीका है। यह एक तरह की स्त्री गुलामी का दस्तावेज है। मिताक्षरा न्याय सिद्धांत द्वारा स्त्रियों पर बहुत प्रतिबंध लगाए गए थे।इसे समाप्त करके शाहूजी महाराज ने स्त्रियों को पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार प्रदान किया। दरअसल, यह बाबा साहब आंबेडकर द्वारा लाए गए हिंदू कोड बिल का पूर्व रूप है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दलित और पिछड़ों के मुक्तिदाता शाहूजी महाराज को बहुत छोटी उम्र प्राप्त हुई। महज 48 साल की उम्र में 6 मई 1922 को उनका देहांत हो गया। लेकिन इसके पहले ही उन्होंने डॉ अंबेडकर को पिछड़ों के मुक्तिदाता के रूप में देख लिया था। आंबेडकर की प्रतिभा को देखकर शाहूजी महाराज ने उन्हें अपनी अधूरी शिक्षा पूरी करने के लिए विदेश भेजा। बाबा साहब द्वारा संपादित पहले अखबार &#8216;मूकनायक&#8217; के प्रकाशन के लिए शाहूजी महाराज ने आर्थिक सहयोग दिया था।1920 में दलितों की एक विशाल सभा को संबोधित करते हुए शाहू जी महाराज ने कहा था &#8216;मुझे लगता है आंबेडकर के रूप में तुम्हें तुम्हारा मुक्तिदाता मिल गया है। मुझे उम्मीद है वह तुम्हारी गुलामी की बेड़ियाँ काट डालेंगे।&#8217; खुद बाबा साहब आंबेडकर शाहूजी महाराज के दलितों-पिछड़ों और स्त्रियों के लिए किए गए कामों से बहुत प्रभावित थे।आंबेडकर ने कहा कि शाहूजी महाराज &#8216;सामाजिक लोकतंत्र का आधार स्तंभ&#8217; हैं।हमें उनका जन्मदिन त्योहार की तरह मनाना चाहिए।<br>आज शाहूजी महाराज की जयंती है। उन्हें नमन।</p>
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		<title>उपन्यास और स्त्री</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-novel-and-woman-read-the-full-article-of-famous-writer-and-ambedkarite-thinker-ravikant-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 17 Jun 2026 15:14:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
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		<category><![CDATA[#feminism]]></category>
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		<category><![CDATA[#नारीवाद]]></category>
		<category><![CDATA[#मन्नू भंडारी]]></category>
		<category><![CDATA[#राजेंद्र यादव]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;उपभोक्तावादी संस्कृति ने स्त्री को तमाम विकल्प जरूर उपलब्ध कराए लेकिन इसकी नकारात्मक छवियों से वह अपना बचाव न कर सकी। परिणामस्वरूप नारीवादी आन्दोलन और विमर्श पर बहुत सारे प्रश्न खड़े किये जाने लगे।&#8217; पढ़ें रविकांत का पूरा लेख&#8230; क्या स्त्री जन्म से ही कैदी है या उसका अस्तित्व ही कैद में है? स्त्री के &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;उपभोक्तावादी संस्कृति ने स्त्री को तमाम विकल्प जरूर उपलब्ध कराए लेकिन इसकी नकारात्मक छवियों से वह अपना बचाव न कर सकी। परिणामस्वरूप नारीवादी आन्दोलन और विमर्श पर बहुत सारे प्रश्न खड़े किये जाने लगे।&#8217; पढ़ें रविकांत का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"><br>क्या स्त्री जन्म से ही कैदी है या उसका अस्तित्व ही कैद में है? स्त्री के जन्म लेते ही तमाम कैदखानों के दरवाजे परत दर परत खुलते जाते हैं। &#8216;दि सेकेण्ड सेक्स&#8217; में सिमोन द बाउआ ने लिखा है कि स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है। स्त्री की कैद के कितने कठघरे हैं? स्त्री जितनी कैद होती जाती है उतनी ही स्त्री होती जाती है। कहीं स्त्री बाजार के स्वर्णिम पिंजरे में कैद है तो कहीं खाप की बन्द खिड़कियों में उसका दम घुटता है। कभी अगर वह मुँह खोलने का प्रयास भी करती है तो चन्द उपहार और सौगातें उसके होंठों को सी देते हैं। अगर वह आँख खोलकर सच देखना चाहे तो व्यवस्था की गर्म सलाखें पुतलियों को बेधकर उसकी रोशनी छीन लेती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">फ्रांस की प्रसिद्ध स्त्रीवादी विचारक और उपन्यासकार मादाम स्तेल कहती हैं कि उपन्यास का विकास उन्हीं समाजों में होता है जहाँ स्त्रियों का स्थान ऊँचा हो और व्यक्तिगत जिन्दगी में लोगों की गहरी दिलचस्पी हो। ऐसे ही समाज में उपन्यास वैयक्तिक अनुभवों का माध्यम और वैयक्तिक स्वतन्त्रता का वाहक बनता है। नवजागरण के दौर में स्त्री शिक्षा और स्त्री सुधार को केन्द्र में रखकर ही हिन्दी उपन्यास लेखन की शुरुआत हुई। लगभग डेढ़ सदी के इतिहास में हिन्दी उपन्यास ने एक लम्बी यात्रा तय की है। प्रारम्भिक उपन्यासों की स्त्री; अशिक्षा, अज्ञानता, अन्धविश्वास और रूढ़िवादिता का शिकार थी। लेखक इस स्त्री में नैतिक ऊर्जा का संचार कर रहे थे। प्रेमचन्द, प्रसाद, जैनेन्द्र और अज्ञेय के स्त्री पात्र जीवन-आदर्श और प्रेम की अनुभूतियों की कठपुतलियाँ सरीखे लग रहे थे। आजादी के बाद, हिन्दी उपन्यासों में स्त्री का निजी व्यक्तित्व और उसकी भावनाएँ केन्द्र में आती हैं। फिर भी कहीं न कहीं ये चरित्र रोते- टूटते और बिखरते जाते हैं। राजेन्द्र यादव ने ठीक ही लिखा है कि नये माहौल में स्त्री पंख लगाकर, स्वतन्त्र होकर उड़ना चाहती है। लेकिन सामाजिक भीतियों और मानसिक ग्रन्थियों से जूझने के प्रयत्न में उसके डैने टूट गये हैं। हैं। कभी उसे शरीर की मांग झुका देती है तो कभी अकेलेपन की यातना। पुरुष लेखकों द्वारा रचे गये ऐसे चरित्रों से मुक्ति तब मिलती है जब स्त्रियाँ स्वयं लेखन में दाखिल होती हैं। स्त्री विमर्श के आन्दोलन की शक्ल में आने से पूर्व मन्नू भण्डारी और कृष्णा सोबती जैसी समर्थ और सजग रचनाकारों ने स्त्री की निजी अनुभूतियों को पूरी प्रामाणिकता के साथ पिरोने की कोशिश की थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नब्बे के दशक में शुरू हुए अस्मितावादी विमर्श में नारीवाद प्रमुख मुहावरा बनकर उभरता है। इस नारीवादी आन्दोलन ने पितृसत्ता की चूलें हिला दीं। उग्र होता यह नारी विमर्श दुर्योग से देह के विमर्श में तब्दील होता गया। बाजार, विज्ञापन और तमाम संचार साधनों द्वारा प्रसारित पूँजीवादी पश्चिमी संस्कृति में यह आन्दोलन उलझता चला गया। उपभोक्तावादी संस्कृति ने स्त्री को तमाम विकल्प जरूर उपलब्ध कराए लेकिन इसकी नकारात्मक छवियों से वह अपना बचाव न कर सकी। परिणामस्वरूप नारीवादी आन्दोलन और विमर्श पर बहुत सारे प्रश्न खड़े किये जाने लगे। अगरचे, आज नये प्रश्नों और कुछ दबे-ढके मुद्दों पर नारीवादी स्वर मुखरित हुआ है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>प्रो. रविकांत का लेख- दलित साहित्य के पचास साल</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-prof-ravikants-article-on-fifty-years-of-dalit-literature-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 12 Jun 2026 14:30:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलोचना]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>  &#8216;दलितों द्वारा दलितों के लिए लिखा जाने वाला दलित साहित्य दलितों के संघर्ष और चेतना का विमर्श है। दलित विमर्श सिर्फ एक साहित्यिक शैली नहीं है बल्कि यह अखिल भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन है।&#8217; पढ़ें पूरा लेख&#8230; दलित साहित्य मुक्ति का साहित्य है। सदियों से जारी शोषण और अन्याय के खिलाफ खड़े होकर दलित &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-prof-ravikants-article-on-fifty-years-of-dalit-literature-on-adahan-patrika/">प्रो. रविकांत का लेख- दलित साहित्य के पचास साल</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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<h1 class="wp-block-heading"> </h1>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;दलितों द्वारा दलितों के लिए लिखा जाने वाला दलित साहित्य दलितों के संघर्ष और चेतना का विमर्श है। दलित विमर्श सिर्फ एक साहित्यिक शैली नहीं है बल्कि यह अखिल भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन है।&#8217; पढ़ें पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">दलित साहित्य मुक्ति का साहित्य है। सदियों से जारी शोषण और अन्याय के खिलाफ खड़े होकर दलित साहित्यकारों ने नकार, प्रतिरोध और आक्रोश को अभिव्यक्त किया। दलित साहित्य में फूलों की कोमलता नहीं, आग की तपिश है। उसमें दैहिक सौंदर्य नहीं भौतिक कुरूपता है, कामुकता नहीं जीवन का उजाड़ और ठूंठपन है। दलित साहित्य में कल्पित स्वर्गलोक की जगह दक्खिन टोले की बजबजाती सच्चाइयां हैं। दलित साहित्य में जीवन का संघर्ष, जाति का दंश, अपमान की यातना और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह है। इस विद्रोह की ज्वाला में दर्जनों हाथ वाले देवता और अवतारवादी ईश्वर जलकर भस्म हो गए। आखिर यह कैसा ईश्वर है जो हीराडोम के शब्दों में, &#8216;हमनी के दुःख भगवनओ न देखताजे, हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।&#8217;1जो ईश्वर ब्राह्मणवादी शोषण और उत्पीड़न को देखकर भी एक अछूत की शिकायत को अनसुनी करता है, उस ईश्वररूपी पाखंड और अंधविश्वास को दलित साहित्यकारों ने उखाड़ फेंका। उसने विवेक, विज्ञान और विकास का मार्ग चुना। संविधान के रास्ते शिक्षा के जरिए सम्मान, स्वाभिमान और संपत्ति हासिल करने के सपने देखे। उसने तोड़ डाली परंपरा और परतंत्रता की बेड़ियां, उजाड़ डाले मंदिर और मठ, खंडित कर डाली मूर्तियां, मिटा दिए पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक के मिथक। समस्त ब्राह्मणवादी बाधाओं को मिटाकर दलित साहित्य ने मनुष्यता का विमर्श खड़ा किया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मनुवादी व्यवस्था में दलितों को शिक्षा, संपत्ति और शस्त्र से विहीन करके अछूत बना दिया गया। वर्ण व्यवस्था को हिंदू धर्मशास्त्रों- स्मृतियों द्वारा ईश्वरीय बना दिया गया। इस व्यवस्था के कुचक्र को तोड़ने के लिए धर्मशास्त्रों को खारिज करना आवश्यक था। डॉ अंबेडकर ने महाड़ चाबदार तालाब से पानी पीने के आंदोलन के दौरान 25 दिसंबर 1927 को मनुस्मृति का दहन किया। दलित साहित्यकारों ने बाबा साहब के विचारों और संघर्षों को साहित्य में अभिव्यक्ति दी। इंग्लैंड और अमेरिका स्थित दुनिया के दो सबसे मशहूर विश्वविद्यालयों से तालीम हासिल करके भारत लौटे डॉ. अम्बेडकर ने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान दलितों-वंचितों की सामाजिक आज़ादी के लिए लड़ाई छेड़ी। इसके बाद संविधान निर्माता और स्वतंत्र भारत के बतौर कानून मंत्री बाबा साहब ने दलितों, पिछड़ों और महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित किए। वंचितों के मसीहा डॉ. अंबेडकर ने दलितों को शिक्षा की रोशनी दी। दलित साहित्यकारों ने बाबा साहब के सपनों के किरदारों को रचा। गरीबी और अभाव में जीते, पल-पल अपमानित होते ऐसे दलित साहित्य के नायक बनते हैं, जो सवर्ण सामंतवाद और सत्तातंत्र से जूझते हुए तालीम हासिल करते हैं तथा सरकारी नौकरियों में बड़े औहदों पर पहुंचकर अपने समाज के लिए मिसाल बनते हैं। दलित साहित्यकारों के लिए बाबासाहब प्रेरणा ही नहीं पथप्रदर्शक भी हैं। डॉ अम्बेडकर ने साहित्यकारों को संबोधित करते हुए कहा था, &#8220;हमारे जीवन कर्तव्य और संस्कृति की ओर हमारा ध्यान नहीं है। अंतर्मुख होकर विचार करने से हमारे सामने वह भयावह स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कि हमारे जीवन मूल्य और सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने के लिए दलित साहित्यकारों को जागरूक और प्रयत्नशील हो जाना चाहिए। तुम्हारे उपन्यास, कथाओं की सीता, लक्ष्मण रेखा पार करके आगे जा चुकी है। दुर्योधन के दरबार में द्रौपदी का वस्त्रहरण हो रहा है। शकुंतला को दुष्यंत अपना सही परिचय नहीं दे रहा है। इसलिए शकुंतला को वनवास हो रहा है। ऐसी स्थिति में साहित्यकारों का मैं आह्वान करता हूं कि वे विभिन्न साहित्यिक विधाओं के द्वारा उदात्त जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक मूल्यों को रेखांकित करें। अपने लक्ष्य को मर्यादा में मत बांधो, उसे और अधिक विशाल बनने दो। वाणी का विस्तार करो। अपनी लेखनी को केवल अपने प्रश्नों तक सीमित मत रखो। उसे तेजस्वी बनाओ जिससे गांव में फैला अंधकार दूर हो सके। यह मत भूलो कि इस भारत देश में उपेक्षित दलितों का बहुत बड़ा विश्व है। अपनी रचनाओं द्वारा उनकी वेदना को समझकर उनके जीवन को उज्ज्वल बनाने की कोशिश करो। यही मानवता की सच्चाई है।&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">दलितों द्वारा दलितों के लिए लिखा जाने वाला दलित साहित्य दलितों के संघर्ष और चेतना का विमर्श है। दलित विमर्श सिर्फ एक साहित्यिक शैली नहीं है बल्कि यह अखिल भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन है। इसका आरम्भ सर्वप्रथम मराठी में हुआ। ओमप्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में, &#8220;दलित साहित्य का सर्वप्रथम आगाज मराठी में हुआ। डॉ आंबेडकर के मुक्ति आंदोलन ने दलितों में एक नई चेतना पैदा की, जिसके फलस्वरुप दलित साहित्य की रचनात्मकता का उदय हुआ; जो मानवीय सरोकारों की अभिव्यक्ति बना। ऐसा साहित्य जिसमें दलितों की वाणी जो हजारों साल से मूक बनी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षणिक विद्वेष और नारकीय जीवन की दग्धताओं को वहन कर रही थी, मुखर होकर स्वाभिमान और अस्मिता की लड़ाई लड़ने के लिए सामने आकर खड़ी हो गई।&#8221; मराठी में दलित साहित्य के उद्भव पर टिप्पणी करते हुए चर्चित दलित लेखिका विमल थोराट ने लिखा है कि, &#8220;दलित साहित्य का उद्भव मराठी साहित्य में एक साहित्यिक, सामाजिक विद्रोह के रूप में हुआ है। जिसके माध्यम से दलित शोषित समाज का विद्रोह मुखरित हुआ है। जिसे अछूत कहकर सदियों तक मनुष्य जीवन की सभी आवश्यकताओं और सुविधाओं से वंचित रखा गया और जिसे केवल दुख, वेदना, गुलामी, अपमान आंसुओं से भरी जिंदगी बिताने के लिए विवश किया गया। हिंदू धर्म वर्ण-व्यवस्था ने जातियों के लिए कटघरे से निर्मित इस समाज व्यवस्था में उसे वह स्थान दिया, जो गांवों, नगरों के अहातों से दूर था और जहां केवल अंधकार ही अंधकार था। उसे अंधकार जीवन से निकालकर उनके जीवन में रोशनी लाने का कार्य डॉ. अंबेडकर ने किया।&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">&nbsp;मराठी, तमिल, मलयालम, कन्नड़, पंजाबी, बांग्ला से लेकर हिंदी आदि भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य का उत्थान हुआ। पिछले 50 सालों में दलित साहित्य ने अपनी विशिष्ट पहचान ही नहीं बनाई बल्कि आज यह मुख्य धारा का साहित्य है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">1970 के दशक में हिंदी में दलित लेखन की शुरुआत हुई। यह वो दौर था जब हिन्दू मिथकों का वामपंथीकरण हो रहा था। प्रगतिशीलता के नाम पर किसान मजदूर की तो बात हो रही थी, लेकिन जाति के प्रश्न पर सामूहिक चुप्पी थी। दलित साहित्य ने अपनी चीख से इस खामोशी को बेधा। फिर भी शुरुआती दौर में दलित साहित्य को कोई तवज्जो ही नहीं दी गई। तब दलित साहित्यकारों ने प्रगतिशीलों के प्रेरक तुलसीदास और प्रेमचंद पर हमले शुरू किए। उन्हें ब्राह्मणवादी मूल्यों का पोषक और सर्जक बताया। इसके बाद दलित साहित्य की तीखी आलोचना शुरू हुई। दलित साहित्य को घृणा और विद्वेष का साहित्य कहा गया। जबकि सच्चाई यह है कि दलित साहित्य हिंदू वर्णव्यवस्था में निहित नफरत और ऊंच नीच की भावना के नकार का साहित्य है। यह प्रेम और मनुष्यता का साहित्य है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">दलित साहित्य निजी अनुभूति का साहित्य है। सदियों से पीड़ित दलितों की वेदना की अभिव्यक्ति दलित साहित्य में हुई है। गैर दलित इस यातना को कभी नहीं महसूस कर सकते।इसीलिए ज्योतिबा फुले ने कहा था कि &#8216;राख ही जानती है, जलने की पीड़ा। जो सहता है सो कहता है।&#8217; दलित साहित्य में यातना से उपजे दर्द और वेदना की अभिव्यक्ति ही नहीं बल्कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था के प्रति आक्रोश भी है। दलित चेतना इस शोषणकारी व्यवस्था को जलाकर नष्ट करने को उद्धत है। जब जातिगत शोषण के खिलाफ दलित साहित्यकारों ने सवर्ण सामंती जातियों के वर्चस्व के हथकंडों और षड्यंत्रों को उजागर किया तो दलित साहित्य पर जातिवादी होने के आरोप लगाए जाने लगे। असल में, दलितों के शोषण का कारण जाति व्यवस्था है, तब दलित साहित्यकार जाति का समर्थन कैसे कर सकते हैं? दलित साहित्यकार और चिंतक डॉ. एन. सिंह ने ठीक लिखा है कि, &#8220;दलित साहित्य जातिवादी व्यवस्था का घोर विरोधी है, जबकि कुछ साहित्यकार और आलोचक उस पर जातीय वैमनस्य भड़काने और जातिवादी होने के आरोप लगाते हैं। लेकिन समझा जा सकता है कि जिस व्यक्ति ने जाति के कारण शताब्दियों तक अपमान की यातना को झेला हो वह जातिवादी कैसे हो सकता है? जातिवादी वह होगा जिसे अपनी संपूर्ण मूर्खता और अज्ञान के बावजूद जाति के कारण ही सम्मान मिला हो। अतः दलित साहित्य जातिवाद के उच्छेद के लिए सर्वात्मना प्रयत्नशील दृष्टिगोचर होता है।&#8221; वास्तव में, दलित साहित्य स्वतंत्रता, समानता और बंधुता का पक्षधर है। दलित साहित्य लोकतांत्रिक मूल्यों का पोषक और अंततः मानवतावादी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8211; रविकांत</strong></p>
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		<title>मुख़ातिब</title>
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		<pubDate>Mon, 04 May 2026 06:34:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>साथियों,एक लंबे अंतराल के बाद आप सबसे फिर से मुखातिब हूँ। अदहन पत्रिका का फिर से प्रकाशन शुरू हो रहा है। इस बार अदहन अपने नए कलेवर में है। तेवर कितना बदला है, यह तो आप सब शुभचिंतक और पाठक बताएंगे। लेकिन मेरा विनम्र आग्रह है कि अपने साहित्यिक प्रतिमानों, जीवन मूल्यों और विचारों के &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph">साथियों,<br>एक लंबे अंतराल के बाद आप सबसे फिर से मुखातिब हूँ। अदहन पत्रिका का फिर से प्रकाशन शुरू हो रहा है। इस बार अदहन अपने नए कलेवर में है। तेवर कितना बदला है, यह तो आप सब शुभचिंतक और पाठक बताएंगे। लेकिन मेरा विनम्र आग्रह है कि अपने साहित्यिक प्रतिमानों, जीवन मूल्यों और विचारों के आधार पर पत्रिका को जांचें और परखें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अदहन हिंदी का पहला पोर्टल बनने जा रहा है जिस पर साहित्य, विचार और राजनीति को बराबर का महत्व मिलेगा। चाहे-अनचाहे हम राजनीति और उसकी प्रवृत्तियों से चौतरफा घिरे हैं। हम साहित्य के नजरिए से समाज और राजनीति को परखना चाहते हैं। राजनीति जितना समाज को विद्रूप करती है, साहित्य उतना ही उसको संवारता है। समाज को परिवर्तनशील और मानवीय बनाए रखने के लिए विचार और साहित्य दोनों की जरूरत है। आज तो और भी ज्यादा।<br>एक ऐसे दौर में जब साम्राज्यवाद का बेहद क्रूर चेहरा हमारे सामने है। एक तरफ दुनिया के अधिकांश देशों में फासीवादी तंत्र मजबूत हुआ है, तो दूसरी तरफ इसके खिलाफ लड़ने का ताब भी कम नहीं हुआ है। उम्मीदें जिंदा है। अमेरिका से लेकर ईरान तक और स्पेन से लेकर नेपाल तक होने वाला बदलाव इसके गवाह हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अदहन पत्रिका को अब हम पोर्टल पर लेकर आए हैं। इसमें समसामयिक मुद्दों और राजनीतिक विमर्श को रोजाना आपके समक्ष मूल्यांकन हेतु प्रस्तुत करेंगे। हमें देश के जाने-माने साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और लेखकों का साहित्यिक सहयोग मिलने का पूर्ण आश्वासन मिला है। हम आपके समक्ष उनके विचारों और साहित्यिक रचनाओं को प्रकाशित करते रहेंगे। आप पढ़ते रहें और हमें अपने सुझाव देते रहें।<br>अदहन की टीम और अदहन की सह संपादक रोशनी रावत के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी है। मुझे विश्वास है कि वे सब पूरी वैचारिक प्रतिबद्धता और संवेदनशीलता के साथ अपने दायित्व का निर्वाह करने में कामयाब होंगे।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>-रविकान्त</strong></p>



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