मुख़ातिब
साथियों,
एक लंबे अंतराल के बाद आप सबसे फिर से मुखातिब हूँ। अदहन पत्रिका का फिर से प्रकाशन शुरू हो रहा है। इस बार अदहन अपने नए कलेवर में है। तेवर कितना बदला है, यह तो आप सब शुभचिंतक और पाठक बताएंगे। लेकिन मेरा विनम्र आग्रह है कि अपने साहित्यिक प्रतिमानों, जीवन मूल्यों और विचारों के आधार पर पत्रिका को जांचें और परखें।
अदहन हिंदी का पहला पोर्टल बनने जा रहा है जिस पर साहित्य, विचार और राजनीति को बराबर का महत्व मिलेगा। चाहे-अनचाहे हम राजनीति और उसकी प्रवृत्तियों से चौतरफा घिरे हैं। हम साहित्य के नजरिए से समाज और राजनीति को परखना चाहते हैं। राजनीति जितना समाज को विद्रूप करती है, साहित्य उतना ही उसको संवारता है। समाज को परिवर्तनशील और मानवीय बनाए रखने के लिए विचार और साहित्य दोनों की जरूरत है। आज तो और भी ज्यादा।
एक ऐसे दौर में जब साम्राज्यवाद का बेहद क्रूर चेहरा हमारे सामने है। एक तरफ दुनिया के अधिकांश देशों में फासीवादी तंत्र मजबूत हुआ है, तो दूसरी तरफ इसके खिलाफ लड़ने का ताब भी कम नहीं हुआ है। उम्मीदें जिंदा है। अमेरिका से लेकर ईरान तक और स्पेन से लेकर नेपाल तक होने वाला बदलाव इसके गवाह हैं।
अदहन पत्रिका को अब हम पोर्टल पर लेकर आए हैं। इसमें समसामयिक मुद्दों और राजनीतिक विमर्श को रोजाना आपके समक्ष मूल्यांकन हेतु प्रस्तुत करेंगे। हमें देश के जाने-माने साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और लेखकों का साहित्यिक सहयोग मिलने का पूर्ण आश्वासन मिला है। हम आपके समक्ष उनके विचारों और साहित्यिक रचनाओं को प्रकाशित करते रहेंगे। आप पढ़ते रहें और हमें अपने सुझाव देते रहें।
अदहन की टीम और अदहन की सह संपादक रोशनी रावत के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी है। मुझे विश्वास है कि वे सब पूरी वैचारिक प्रतिबद्धता और संवेदनशीलता के साथ अपने दायित्व का निर्वाह करने में कामयाब होंगे।
-रविकान्त