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	<title>Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</title>
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	<description>साहित्य, विचार और जन आंदोलन</description>
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	<title>Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</title>
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		<title>क्या रामायण के राम-रावण युद्ध के पीछे था ब्राह्मण और बौद्ध धम्म का संघर्ष ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Roshni Rawat]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Oct 2026 13:54:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;ऐसे में वे क्या कारण थे कि बाद की कथाओं में रावण का वीभत्स चित्रण किया गया ? क्या इसका कारण राम को दैवीय आलोक से आवृत्त कर रावण को एक निकृष्ट व्यक्ति के रूप में चित्रित कर आम-जनमानस में उसके प्रति घृणा भरना था ?&#8217; पढ़ें पूरा आलेख&#8230; लेखक क्या रावण बौद्ध धर्मानुयायी था &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;ऐसे में वे क्या कारण थे कि बाद की कथाओं में रावण का वीभत्स चित्रण किया गया ? क्या इसका कारण राम को दैवीय आलोक से आवृत्त कर रावण को एक निकृष्ट व्यक्ति के रूप में चित्रित कर आम-जनमानस में उसके प्रति घृणा भरना था ?&#8217; पढ़ें पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


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<figure class="alignleft size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="412" height="551" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-19-at-12.28.29-PM-edited.jpeg" alt="लेखक" class="wp-image-719" style="aspect-ratio:0.782130490868355;width:96px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-19-at-12.28.29-PM-edited.jpeg 412w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-19-at-12.28.29-PM-edited-224x300.jpeg 224w" sizes="(max-width: 412px) 100vw, 412px" /><figcaption class="wp-element-caption">लेखक</figcaption></figure>
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<p class="wp-block-paragraph">क्या रावण बौद्ध धर्मानुयायी था ? क्या रामायण के राम और रावण का युद्ध देव-दानवों का धर्मयुद्ध नहीं अपितु ब्राह्मण धर्म और बौद्ध धम्म का संघर्ष था ? क्या राम ब्राह्मण धर्म की रक्षा करने वाले एक क्षत्रिय राजा थे और रावण एक अनार्य राजा? क्या पुष्यमित्र शुंग द्वारा किये गये बौद्धों के नरसंहार के ट्रेसेज़ रामायण कथा में खोजे जा सकते हैं ? भारत के पौराणिक साहित्य में उपस्थित ऐसे तमाम मिथकों/कथाओं को आज दलित विमर्श ने एक बिल्कुल अलग, नया और क्रांतिकारी दृष्टिकोण दिया है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">हिंदी दलित विमर्श में रामायण कथा को इस दृष्टिकोण से पहलेपहल प्रस्तुत करने वाले विचारक सी.पी. जिज्ञासु थे. 1959 में प्रकाशित अपनी पुस्तक &#8216; रावण और उसकी लंका &#8216; में वे बताते हैं कि वाल्मीकि रामायण में ऐसा कहीं जिक्र नहीं है कि रावण के दस शीश थे , या उसके सिर पर पशुओं जैसे सींग थे या वह हिंसक था. बल्कि उसमें रावण को कुशल नीतिज्ञ, परम विद्वान और सभ्य बताया गया है.तो ऐसे में वे क्या कारण थे कि  बाद की कथाओं में रावण का वीभत्स चित्रण किया गया ? क्या इसका कारण राम को दैवीय आलोक से आवृत्त कर रावण को एक निकृष्ट व्यक्ति के रूप में चित्रित कर आम-जनमानस में उसके प्रति घृणा भरना था ?</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large is-resized"><img decoding="async" width="1024" height="559" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM-1024x559.jpeg" alt="" class="wp-image-717" style="aspect-ratio:1.8318737860769414;width:443px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM-1024x559.jpeg 1024w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM-300x164.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM-766x418.jpeg 766w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM.jpeg 1408w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">रामायण कथा और अन्य मिथकों में बार-बार ऐसे प्रसंग आते हैं कि राक्षस ब्राह्मणों के यज्ञ में बाधा पहुंचाते थे.प्राचीन इतिहास के अध्ययनों से पता चलता है कि उस काल‌ में यज्ञों में बलि चढ़ाई जाती थी, आज भी बंगाल‌ सहित कई राज्यों‌ में आराध्य देव के सामने बलि चढ़ाने की परंपरा है.वहीं दूसरी तरफ बौद्ध धर्म में हिंसा वर्जित है. बौद्ध धर्मानुयायी सम्राट अशोक ने अपने शिलालेख में पशुबलि का निषेध किया था. क्या यही कारण था कि उस समय बौद्ध प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा ब्राह्मणों के यज्ञ-हवनों को रोका जाता रहा हो , जिसके प्रतिशोध में ब्राह्मण-वर्ग ने उन्हें अपने मिथकों में राक्षसों की संज्ञा दी ? पेरियार रामास्वामी अपनी प्रसिद्ध‌ किताब &#8216; ट्रू रीडिंग ऑफ रामायणा&#8217; में इस संदर्भ में विस्तार में बात करते हैं. आचार्य नरेंद्र देव के &#8216; बौद्ध धर्म दर्शन&#8217; में भी &#8216;लंकावतार सूत्र&#8217; का उल्लेख मिलता है , जिसके अनुसार लंकापति रावण ने बुद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण की थी.</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large is-resized"><img decoding="async" width="1024" height="559" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1-1024x559.jpeg" alt="" class="wp-image-718" style="aspect-ratio:1.8318737860769414;width:451px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1-1024x559.jpeg 1024w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1-300x164.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1-766x418.jpeg 766w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1.jpeg 1408w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">एक थ्योरी यह भी है जिसके अनुसार रावण शिव‌ का परम उपासक था. और क्योंकि शिव‌ अनार्यों के देवता थे ऐसे में रावण अनार्यों का राजा था या स्वयं भी अनार्य था. ब्राह्मण धर्म के इतिहास में आर्य-अनार्य संघर्ष भी बहुत प्रचलित रहा है. कुल मिलाकर ऐसा प्रतीत होता है कि रावण का धर्म ब्राह्मण-धर्म नहीं था. यही कारण है ब्राह्मण धर्म के प्रतिनिधि राम उसे चुनौती देते हैं और उसे मार डालते हैं.</p>



<p class="wp-block-paragraph">इन तमाम कथाओं से एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट होती है कि हर कथा , हर मिथक के पीछे इतिहास में घटित घटनाएं होती हैं. ये घटनाएं एक-दूसरे से यथार्थ और कल्पना के मेल से संबद्ध होती हैं. इसी यथार्थ और कल्पना के मेल से मिथकों की रचनाएं होती हैं जिसके पीछे उसे रचने वाले वर्ग का एक खास दृष्टिकोण होता है. इस दृष्टिकोण में रचयिता के अपने विचार और तर्क ऐसे घुले-मिले होते हैं कि वे आम पाठक पर अपनी दृष्टि का प्रभाव तो पूरा डालते हैं पर पाठक उसकी मूल दृष्टि को समझ ही नहीं पाता. अभी तक हम रावण को उसी दृष्टि से देखने के आदी रहे हैं जो सदियों से &#8216;सवर्ण शिक्षा-पद्धति&#8217; के अनुकूल रही है. आज के समय में दलित चिंतकों ने भारतीय पौराणिक कथाओं और मिथकों को साक्ष्यों सहित नये दृष्टिकोण से प्रस्तुत करके धर्म, साहित्य और इतिहास दर्शन में एक नई क्रान्ति का आगाज़ कर दिया है.</p>



<ul class="wp-block-list">
<li><strong>रोशनी रावत</strong></li>
</ul>
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		<title>स्त्रीद्वेषी समाज का अंतिम हथियार है चरित्र-हनन!</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/character-assassination-is-the-last-weapon-of-a-misogynistic-society-article-by-roshni-rawat/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Roshni Rawat]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Oct 2026 07:18:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>‘नेहा सिंह राठौर के साथ जो हुआ वह न‌ सिर्फ हमारे समाज की गंदी मानसिकता को उजागर करता है बल्कि इस समय पतनोन्मुख मुख्यधारा की पत्रकारिता के स्त्री-विरोधी चरित्र का भी पर्दाफाश करता है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी स्त्री के साथ ऐसा हुआ है.’ पढ़ें पूरा आलेख… पितृसत्तावादी समाज को जब &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>‘नेहा सिंह राठौर के साथ जो हुआ वह न‌ सिर्फ हमारे समाज की गंदी मानसिकता को उजागर करता है बल्कि इस समय पतनोन्मुख मुख्यधारा की पत्रकारिता के स्त्री-विरोधी चरित्र का भी पर्दाफाश करता है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी स्त्री के साथ ऐसा हुआ है.’ पढ़ें पूरा आलेख…</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">पितृसत्तावादी समाज को जब एक बेखौफ स्त्री चुनौती देती है , तब उसे चुप कराने की हर संभव कोशिशों के बाद समाज का अंतिम हथियार उस स्त्री का चरित्र-हनन होता है. हालही में प्रसिद्ध लोक गायिका और राजनीतिक व्यंग्यकार नेहा‌ सिंह राठौर के साथ भी यही हुआ जब देश के एक बड़े मीडिया चैनल ने नीचता की सारी हदें पार करते हुए उनके विषय में सेक्स रैकेट चलाने जैसी भ्रामक खबर चलाई. नेहा सिंह राठौर की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद सोशल मीडिया पर दो-तीन दिन जमकर हंगामा मचा. और भले उस मीडिया चैनल ने अब नेहा से माफी मांग ली हो पर एक प्रश्न ज्यों का त्यों है कि आखिर कब तक समाज में स्त्रियों को अपनी हक की आवाज़ उठाने के बदले ऐसे चरित्र-हनन सहने पड़ेंगे? इस प्रश्न की जटिलता इसी से समझी जा सकती है कि जब नेहा जैसी जानी-मानी सोशल मीडिया इंफ्ल्यूएंसर का ऐसा चरित्र-हनन हो सकता है,‌ तब उन स्त्रियों की क्या स्थिति होगी जो सिर्फ अपने परिवार-गली-मुहल्ले और गांव-शहर तक सीमित है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">समय बदला , समाज बदला , विचार बदले और तकनीकी बदली पर एक चीज़ कॉन्स्टेंट रही &#8211; स्त्रियों का चरित्र हनन! कभी उन्नीसवीं शताब्दी में स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखने के लिए अफ़वाहें उड़ाई जातीं थीं कि पढ़ी-लिखी स्त्रियां अपने पति को पशु बना कर अपना गुलाम बना लेती हैं. आज एक स्वतंत्र महिला को कभी वेश्या तो कभी इससे मिलती-जुलती ही कोई उपमा या विशेषण देकर चरित्र-हनन किया जाता है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">वैसे भी हमारे देश में स्त्रियों का चरित्र-हनन कोई नयी बात नहीं है. सीता से लेकर मीरा तक कोई स्त्री इससे बच नहीं सकी. आधुनिक युग में भी अस्सी के दशक के बाद शुरु हुए स्त्री-विमर्श को &#8216; देह-विमर्श&#8217; का नाम दे डाला गया और इन लेखिकाओं को भी कभी &#8216;कुलटा&#8217; तो कभी &#8216;बदचलन&#8217; तो कभी ऐसे ही कुछ और शब्दों से नवाज़ा गया. कुल मिलाकार हमारा समाज कभी स्त्रियों का अंतर्मन समझ ही नहीं पाया, न उसने समझने की कोशिश की, उसे सिर्फ देह से मतलब था , उसे वही दिखी , उसी पर छींटाकशी भी की गई, उसी से प्रेम भी किया गया.</p>



<p class="wp-block-paragraph">बहरहाल , नेहा सिंह राठौर के साथ जो हुआ वह न‌ सिर्फ हमारे समाज की गंदी मानसिकता को उजागर करता है बल्कि इस समय पतनोन्मुख मुख्यधारा की पत्रकारिता के स्त्री-विरोधी चरित्र का भी पर्दाफाश करता है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी स्त्री के साथ ऐसा हुआ है. इससे पहले जबसे आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा अपनी राजनीतिक छवि के साथ लाइमलाइट में आई हैं , उनके ऊपर पर अश्लील कमेंट करने वालों की सोशल मीडिया पर बाढ़ आ गई है. बस फर्क इतना है कि नेहा राठौर के साथ यह घटिया हरकत करने वाला एक मीडिया संस्थान है जबकि नेहा बोरा पर व्यक्तिगत रूप से लोग कीचड़ उछालते रहते है. दरअसल हमारे समाज में यह इतना नॉर्मलाइज हो गया कि शायद लोगों की कॉन्शियसनेस को यह हिट ही नहीं करता है. इसका सीधा कारण यह है कि इस देश का पितृसत्तावादी समाज हमेशा से स्त्री-द्वेषी रहा है. इसलिए ऐसी कोई घटना उसे भीतर से झकझोर नहीं पाती.</p>



<p class="wp-block-paragraph">जब-जब समाज  में कोई सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक या वैज्ञानिक परिवर्तन हुआ है , हम पाते हैं कि इसके दुष्प्रभावों में सबसे ज्यादा वल्नरेबल स्त्रियां ही रही हैं. इंटरनेट की लॉन्चिंग के बाद सोशल-मीडिया पर सबसे ज्यादा महिलाएं ही हिंसा की शिकार रही हैं. चाहे पिछले कुछ वर्षों में फेक आईडी बनाना हो या अब डीपफेक के इस्तेमाल‌ से फेक वीडियो वायरल करना. कहना ही‌ होगा कि इस‌ समय स्त्रियों के सामने दोहरी‌ चुनौती है. एक तरफ जहां हमारी जेन-जी लड़कियां सत्ता से लेकर साहित्य और समाज तक हर मोर्चे पर  खड़ी स्त्री-विरोधी ताकतों को डट कर चुनौती दे रहीं हैं वहीं दूसरी तरफ निजी जिंदगी के साथ-साथ सोशल मीडिया पर होने वाले ऐसे चरित्र-हनन को लेकर भी सशंकित, सतर्क और चिंतित हैं.</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>-रोशनी रावत</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>पीयूष बबेले का लेख- राहुल गांधी के शब्द देश की जनता में आशा जगाते हैं</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/article-by-piyush-babele-rahul-gandhis-words-instill-hope-among-the-people-of-the-country/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 18 Oct 2026 14:19:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;राहुल ने उन सब चीजों को फिर से जिंदा कर दिया है, जो संविधान की किताब में लिखी तो थीं, लेकिन उनके ऊपर तानाशाही की धूल जम गई थी। लोग सच जानते थे, लेकिन बोलने से डरने लगे थे। लोगों को लगता था कि ये सच के खुदा हो गए हैं, इन्‍हें हटाएंगे कैसे। राहुल &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;राहुल ने उन सब चीजों को फिर से जिंदा कर दिया है, जो संविधान की किताब में लिखी तो थीं, लेकिन उनके ऊपर तानाशाही की धूल जम गई थी। लोग सच जानते थे, लेकिन बोलने से डरने लगे थे। लोगों को लगता था कि ये सच के खुदा हो गए हैं, इन्&#x200d;हें हटाएंगे कैसे। राहुल ने दिखा दिया है कि यह गांधी  भी तानाशाही को वैसे ही हटाएगा, जैसे उस गांधी ने हटाया था।&#8217; पढ़ें जाने-माने लेखक पीयूष बबेले का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="518" height="441" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-18-at-7.18.40-PM.jpeg" alt="पीयूष बबेले" class="wp-image-494" style="width:177px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-18-at-7.18.40-PM.jpeg 518w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-18-at-7.18.40-PM-300x255.jpeg 300w" sizes="(max-width: 518px) 100vw, 518px" /><figcaption class="wp-element-caption">पीयूष बबेले</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">दिल्&#x200d;ली शहर में एक दिन पहले तक परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। आंदोलनकारियों को इस वितृष्&#x200d;णा के साथ गिरफ्तार कर बसों में ठूंसा जा रहा था, जैसे नगर निगम की गाड़ी आवारा कुत्&#x200d;तों को पकड़ रही हो। सिपाहियों के चेहरों पर सत्&#x200d;ता की क्रूर मुस्&#x200d;कान नाच रही थी। सत्&#x200d;ता पोषित संघी गुंडे पुलिस की सुरक्षा में बेखौफ होकर लड़कियों के कपड़े फाड़ रहे थे और पालतू मीडिया बढ़-चढ़कर बता रहा था कि कोकरोचों की हवा निकल गई। सरकार जीत गई और जनता हार गई। (मेरे कानों में आवाज आ रही थी- दुशासन जीत गया, द्रोपदी हार गयी।) तानाशाही के इस नंगे नाच को देखकर एकबारगी तो ऐसा लगा कि भारत का लोकतंत्र वर्दी वाले बूटों के नीचे रौंद दिया गया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लेकिन, एक दिन बाद ही नजारा बदल गया। राहुल गांधी आए। बड़े इत्&#x200d;मीनान से प्रेस कांन्&#x200d;फ्रेंस की। लोकतंत्र के हत्&#x200d;यारों को खुली चुनौती दी। पूरे देश से दिल्&#x200d;ली आने का आग्रह किया। और शान से सुप्रीम कोर्ट की ओर चल दिए। उनके पीछे भारतीय प्रजातंत्र का समुद्र उमड़ने लगा। जो दिल्&#x200d;ली कल तक बूटों की धमक से कांप रही थी, वही दिल्&#x200d;ली जनता की पदचाप से गूंज उठी। वोट चोर गद्दी छोड़ के नारों पर लाखों लोग झूमने लगे। करोड़ों लोग इस नजारे को अपनी मोबाइल स्&#x200d;क्रीन पर देख रहे थे। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट तक राहुल की बस नहीं जाने दी गई। वे अपनी बहनों प्रियंका गांधी और नेहा वोरा को सुरक्षा घेरे में साथ लिए पैदल बढ़ चले। शंकर जी की इस बारात में नेता, युवा, महिला, पुरुष , वकील, पत्रकार और न जाने कौन-कौन शामिल थे। तंत्र के खिलाफ लोक इस कदर उमड़ रहा था कि लगता था कि राहुल खुद ही अपनी लोकप्रियता के बोझ से दब न जाएं। लेकिन वे सतर्क थे। और अंतत: गोधूलि वेला में नभ में उड़ती धूल से पटे राहुल याचिका फाइल करके बाहर आ गए। भारत माता ने राहत की सांस ली। उसे संजीवनी मिल गई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल को भी पता है और देश को भी पता है कि वे सुप्रीम कोर्ट से जिस मर्ज का इलाज करने की गुजारिश कर रहे हैं, वह इलाज उसके पास नहीं है। और हो भी तो वह शायद ही करे। लेकिन राहुल पूरी दुनिया को यह दिखा देना चाहते हैं कि उन्&#x200d;होंन न्&#x200d;याय का कोई दरवाजा नहीं छोड़ा। उन्&#x200d;होंने मीडिया को सब बताया, आयोग से सरकारी गवाह बनने को कहा, राष्&#x200d;ट्रपति को बताया और अब सुप्रीम कोर्ट से भी फरियाद कर चुके हैं। अगर न्&#x200d;याय की हर चौखट पर उनकी आवाज बहरे कानों से टकराकर हवा में विलीन हो जाएगी, तो आखिरी रास्&#x200d;ता ही बचेगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बिलकुल महाभारत के कृष्&#x200d;ण की तरह, जिन्होंने हर स्&#x200d;तर पर युद्ध को टालने की कोशिश की। भीष्&#x200d;म और द्रोण को समझाया। कर्ण से भी सत्&#x200d;य के साथ आने की प्रार्थना की। धृतराष्&#x200d;ट्र से बारंबार कहा कि महाराज आप प्रजा के प्रति जवाबदेह हैं, पुत्र के प्रति नहीं। और अंत में उस नराधम दुर्योधन को भी समझाया कि मान जा। लेकिन दुर्योधन का सत्&#x200d;ता का अहंकार, धृतराष्&#x200d;ट्र की अंधी न्&#x200d;याय बुद्धि, भीष्&#x200d;म और द्रोण का राजवित्&#x200d;त पर जीवन गुजारना और कर्ण का अहसानों के तले दबे होना, कृष्&#x200d;ण की न्&#x200d;याय की पुकार को नहीं सुन सका। कौरवों की भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण होने बावजूद कृष्&#x200d;ण न्&#x200d;याय का ही पंथ खोज रहे थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एसआईआर के जरिए भारतीय लोकतंत्र का चीरहरण होने के बाद भी राहुल शांति का रास्&#x200d;ता खोज रहे हैं। लेकिन इस खोज की प्रक्रिया में उन्&#x200d;होंने करोड़ों दिलों को जीत लिया है। उनके समर्थक अब उनके अनुयायी बनने लगे हैं तो वहीं उनके विरोधी, अब उनके प्रति उदार हो रहे हैं। जिस विपक्ष को वे अब तक एकजुट करने के लिए प्रयासरत थे, वह खुद अब उनके साथ आने को लालायित है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल ने उन सब चीजों को फिर से जिंदा कर दिया है, जो संविधान की किताब में लिखी तो थीं, लेकिन उनके ऊपर तानाशाही की धूल जम गई थी। लोग सच जानते थे, लेकिन बोलने से डरने लगे थे। लोगों को लगता था कि ये सच के खुदा हो गए हैं, इन्&#x200d;हें हटाएंगे कैसे। राहुल ने दिखा दिया है कि यह गांधी भी तानाशाही को वैसे ही हटाएगा, जैसे उस गांधी ने हटाया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस सबके बीच यह सवाल बार-बार मन में आता है कि आखिर यह सब हुआ कैसे? 40 हजार पुलिसवालों से जनता को धमकाने वाली सरकार आखिर राहुल की हुंकार के सामने क्&#x200d;यों दुबक गई? संभवत: इसका एक कारण यह है कि राहुल गांधी अब देश की भावनाओं के सच्&#x200d;चे प्रतिनिधि बन गए हैं। सरकार जानती है कि अगर वह राहुल की कलाई पकड़ेगी तो जनता उसकी बांह मरोड़ देगी। राहुल की छवि झूठ के उस दायरे को पार कर चुकी है कि जहां गोदी मीडिया उसे कलंकित कर सके। हाथ में संविधान की किताब लिए राहुल से टकराने के मतलब है, देश की लोकतांत्रिक चेतना को चुनौती देना। पिछले 12 साल के संघर्ष में राहुल गांधी ने उनके खिलाफ पिछले 22 साल से चलाए जा रहे दुष्&#x200d;प्रचार को खत्&#x200d;म कर दिया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अब राहुल गांधी ने देश की चेतना में प्रवेश कर लिया है। उनके शब्&#x200d;द लोगों में आशा जगाते हैं, उनके बढ़ते कदम करोड़ों को कदमताल करने को ललचाते हैं, उनकी गर्जना में जनता अपना खोया हुआ गौरव प्राप्&#x200d;त करती है और उनके लक्ष्&#x200d;य में करोड़ों लोगों को अपना लक्ष्&#x200d;य दिखाई देता है। यही तो एक नेता की पहचान होती है, जो गांधी में थी, नेहरू में थी, इंदिरा में थी और उससे बहुत पहले महावीर और बुद्ध में थी।</p>
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		<title>‘अपराधी’ सिर्फ़ पाँच नहीं, लाखों में हैं ! राहुल जानते हैं ! -श्रवण गर्ग</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/the-culprits-are-not-just-five-they-are-in-lakhs-rahul-knows-shravan-garg/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 14 Oct 2026 14:39:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;दिल्ली में मनमोहन सिंह और गांधीनगर में मोदी के शासनकालों के बीच समानांतर गुजरी एक दशक की अवधि(2004 से 2014) का अध्ययन करें तो यह प्रभाव पड़ता है कि गुजरात के ‘सांप्रदायिक विकास’ के प्रति या तो केंद्र की मौन सहमति रही अथवा कांग्रेस के भीतर सक्रिय बीजेपी के स्लीपर सेल्स मनमोहन सिंह के मुक़ाबले &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;दिल्ली में मनमोहन सिंह और गांधीनगर में मोदी के शासनकालों के बीच समानांतर गुजरी एक दशक की अवधि(2004 से 2014) का अध्ययन करें तो यह प्रभाव पड़ता है कि गुजरात के ‘सांप्रदायिक विकास’ के प्रति या तो केंद्र की मौन सहमति रही अथवा कांग्रेस के भीतर सक्रिय बीजेपी के स्लीपर सेल्स मनमोहन सिंह के मुक़ाबले इतने ज़्यादा शक्तिशाली थे कि उन्होंने मोदी-शाह के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होने दी।&#8217; पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का विश्लेषण&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="450" height="450" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg" alt="पत्रकार श्रवण गर्ग" class="wp-image-413" style="width:134px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg 450w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-300x300.jpg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-150x150.jpg 150w" sizes="(max-width: 450px) 100vw, 450px" /><figcaption class="wp-element-caption">पत्रकार श्रवण गर्ग</figcaption></figure>
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<p class="wp-block-paragraph">राहुल गांधी आत्मविश्वास के साथ बार-बार दोहरा रहे हैं कि उनकी लड़ाई सिर्फ़ पाँच ‘अपराधियों’ के ख़िलाफ़ उनकी जवाबदेही तय कर उन्हें दंडित करवाने (या करने) की है। चार लोगों के वे नाम भी बताते हैं। जनता को नाम रट भी गए हैं।हक़ीक़त में भी क्या सारी लड़ाई इन चार-पाँच हस्तियों तक ही सीमित है ? शायद नहीं !</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल अतीत में स्वीकार चुके हैं कि वे कभी सत्ता में आ गए तो भी शासन इसलिए नहीं चला पाएँगे कि पिछले बारह सालों के दौरान संघ-बीजेपी ने व्यवस्था के हरेक क्षेत्र में अपने लोगों की घुसपैठ करवाकर जो जाल बिछा दिया है कि वह उन्हें सफल नहीं होने देगा। हक़ीक़त यही है !</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह दावा ऊपरी तौर पर ही सही माना जा सकता है कि दो-चार लोगों को हटा देने से सबकुछ ठीक हो जाएगा यानी लोकतंत्र भी बच जाएगा और संविधान की रक्षा भी हो जाएगी।गुजरात की एक पार्टी बैठक में राहुल स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि कांग्रेस में बीजेपी के स्लीपर सेल्स काम कर रहे हैं। उनका पहला काम उन्हें ख़त्म करने का होगा। कारण जो भी रहे हों राहुल वह काम नहीं कर पाए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अमित शाह ने अभी एक दिन पहले ही राहुल का ध्यान इस ओर आकर्षित किया था कि कांग्रेस पिछले इकतालीस सालों से गुजरात में सत्ता से बाहर है जबकि SIR का काम तो दो साल पहले ही शुरू हुआ है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ताज़ा खबर यह है कि हाल ही तक देश के ‘चीफ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ’ (CDS) रहे अनिल चौहान ‘विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन’(VIF) के नए निदेशक नियुक्त किए गए हैं। इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) से सेवानिवृत्त होने के बाद, NSA अजीत डोभाल ने दिसंबर 2009 में फाउंडेशन की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई थी और इसके पहले निदेशक बने थे। फाउंडेशन की संबद्धता किन संगठनों और व्यक्तियों से है उसके कामकाज से समझा जा सकता है। चौहान ने दायित्व सब कुछ जानते हुए ही स्वीकार किया होगा ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच सुप्रीम कोर्ट-हाई कोर्ट के 42 सेवानिवृत जजों और 124 सेवानिवृत आईएएस/आईएफ़एस अफ़सरों ने खुले पत्रों के ज़रिए चुनाव आयोग के प्रति समर्थन व्यक्त किया है। मोदी सरकार तो 2014 में ही सत्ता में आई है जब कि ये तमाम लोग तो काफ़ी पहले से न्यायपालिका और कार्यपालिका में कार्यरत रहे होंगे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्या कहा जा सकता है कि अपने पूरे सेवा काल के दौरान ये सभी लोग और वे अन्य भी जो अब धीरे-धीरे बाहर आएँगे एक विचारधारा विशेष से प्रभावित होकर ही काम कर रहे होंगे ? इनके सेवा काल के दौरान ही नरसिंह राव और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे होंगे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दिल्ली में मनमोहन सिंह और गांधीनगर में मोदी के शासनकालों के बीच समानांतर गुजरी एक दशक की अवधि(2004 से 2014) का अध्ययन करें तो यह प्रभाव पड़ता है कि गुजरात के ‘सांप्रदायिक विकास’ के प्रति या तो केंद्र की मौन सहमति रही अथवा कांग्रेस के भीतर सक्रिय बीजेपी के स्लीपर सेल्स मनमोहन सिंह के मुक़ाबले इतने ज़्यादा शक्तिशाली थे कि उन्होंने मोदी-शाह के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होने दी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरा यह कि राहुल अगर 2004 में ही राजनीति में आ गए थे(जैसा कि वे कहते हैं )तो क्या वे भी सबकुछ चुपचाप देखते रहे ? अगर मनमोहन सिंह सरकार तभी कुछ कर देती तो क्या उन्हें आज यह लड़ाई लड़नी पड़ती?</p>



<p class="wp-block-paragraph">अगर इतने सारे लोग साहसपूर्वक चुनाव आयोग के पक्ष में खड़े हो रहे हैं तो निश्चित ही वे भविष्य के परिणामों की परवाह नहीं करते हुए ऐसा कर रहे हैं। इन लोगों के पीछे भी एक बड़ी भीड़ ऐसे चेहरों की होगी जो न सिर्फ़ वर्तमान व्यवस्था को क़ायम रखने में जुटी है सत्ता परिवर्तन की दशा में नये शासकों के ख़िलाफ़ विद्रोह करने में भी सक्षम सिद्ध हो सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल अपनी यात्राओं और सार्वजनिक संबोधनों में कहते रहे हैं कि मोदी तो सिर्फ़ मुखौटा हैं। असली ताक़त तो अंबानी, अदाणी की है। इसका मतलब यह है कि राहुल का मुक़ाबला सिर्फ़ संघ द्वारा व्यवस्था में घुसपैठ कराए गए तत्वों से ही नहीं है उन पूँजीपतियों से भी है जिन्होंने मीडिया ही नहीं मुल्क के समूचे संरचनात्मक ढाँचे (रेलवे, हवाई सेवा, संचार माध्यम,बंदरगाह, रक्षा उत्पादन,ऊर्जा, स्टॉक और कैपिटल मार्केट,आदि ) पर क़ब्ज़ा कर रखा है।वे विपक्षी दल जो राहुल के साथ दिखते हैं उनके भी इन पूंजीपतियों के साथ सम्बन्धों को लेकर समय-समय पर संदेह उत्पन्न होते रहते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल जब कहते हैं कि लड़ाई लंबी चलने वाली है।इसमें कई महीने और साल भी लग सकते हैं तो मानकर चलना चाहिए कि वे जानते हैं कि जिन चार-पाँच लोगों को वे हटाना चाहते हैं उन्हें बचाने के लिए हज़ारों-लाखों की संख्या में निहित स्वार्थों का एक बड़ा समूह पीछे खड़ा है। उन्हीं के चेहरे खुले पत्रों के ज़रिए सत्ता के दबाव में प्रकट हो रहे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हकीकत में यह समूह इस समय राहुल से ज़्यादा उस जनता से भयभीत हो रहा है जो मोदी-शाह के ख़ौफ़ को सड़कों पर ललकार रहा है। राहुल की स्ट्रेटेजी की दाद दी जानी चाहिए कि उनका हाथ अब उन लोगों/बच्चों की पीठ पर है जो उनके लिए अपनी जान देने को तैयार है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल का इससे बड़ा रणनीतिक कदम और क्या हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट तक उमड़े सैलाब को देख लेने के बाद CJP भी अब साथ जुड़ने की तैयारी दिखा रही है। CJP के दो नेताओं की सिर्फ पाँच दिन की न्यायिक रिमांड ने ही दीपके को इतना हिला दिया कि वे चार दिन में ही महाराष्ट्र से दिल्ली वापस लौट आए। दूसरी ओर, राहुल आर या पार की तैयारी के साथ हुकूमत से लड़ रहे हैं।</p>
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		<title>रमेश जोशी &#8211; (तोता) राम की शक्ति पूजा</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/ramesh-joshi-tota-ram-ki-shakti-puja-a-satirical-story-on-the-delhi-movement/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 13 Oct 2026 13:22:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#abhijeet dipke]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;मुझे रात को बड़ा अजीब सपना आया । देखा कि मैं जंतर मंतर पर बैठा हूँ और पुलिस मुझे घसीटकर बस में पटक रही है । सो मैंने सोचा, कहीं यह दुःस्वप्न सच न हो जाए सो नवरात्र करने का निश्चय कर लिया ।&#8217; पढ़ें व्यंग्यकार रमेश जोशी की पूरी कहानी&#8230; लेखक- रमेश जोशी नवरात्र &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;मुझे रात को बड़ा अजीब सपना आया । देखा कि मैं जंतर मंतर पर बैठा हूँ और पुलिस मुझे घसीटकर बस में पटक रही है । सो मैंने सोचा, कहीं यह दुःस्वप्न सच न हो जाए सो नवरात्र करने का निश्चय कर लिया ।&#8217; पढ़ें व्यंग्यकार रमेश जोशी की पूरी कहानी&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="लेखक- रमेश जोशी" class="wp-image-461"/><figcaption class="wp-element-caption">लेखक- रमेश जोशी</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph"> नवरात्र चल रहे हैं । शक्ति की आराधना का आठ-नौ दिन अनुष्ठान । उस बंगाल की संस्कृति का समुच्चय जिस बंगाल ने विभिन्न रूपों में देश का अद्भुत बौद्धिक नेतृत्व किया । हम और तोताराम न पूरे आस्तिक बन सके और न ही नास्तिक । सुखों में सुमिरन नहीं किया तो फिर दुख तो आने ही थे । क्या बताएं पेट पालने से ही फुरसत नहीं मिली तो कैसे सरकारी खर्च से तीर्थयात्रा करते या केदारनाथ की गुफा में ध्यान लगाते । हाँ, जब-जब दुखों के ईडी के छापे का संकट आया हमने किसी न किसी देवता की वाशिंग मशीन में छलांग लगा दी और बच गए ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हम तो सदैव की तरह बासी मुँह बरामदे में आकर बैठ गए लेकिन तोताराम नहीं आया । सो हमने उसी तरह उसके हिस्से की चाय भी पी ली जैसे मन न होते हुए भी एक्स्ट्रा पैसे देकर बनवाई गई दाल-फ्राई ग्राहक गले के नीचे उतार ही लेता है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हम नहाने का मन बना ही रहे थे कि तोताराम हाजिर । हमने पूछा- क्या बात है ? हमने तो सोचा कहीं जंतर-मंतर तो नहीं चला गया ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- किसी फ्री की बस और खाने-पीने का इंतजाम होता और सुरक्षित वापिस घर छोड़ने का इंतजाम होता तो हिम्मत कर भी लेता लेकिन कल से कोई बस, ट्रेन कुछ भी दिल्ली की तरफ नहीं जा रही । सुना है सरकार ने हजारों पुलिस, अर्द्ध सैनिक बल लगाकर दिल्ली को पूरी तरह से बंद कर दिया है । जब-जब सरकारें डरती हैं तो ऐसा ही करती हैं ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- सरकार तो बहुत लोकप्रिय है । जनता उस पर जान छिड़कती है । एक इशारे पर ताली-थाली बजाने लगती है , दीये जलाने लगती है । डरने की तो कोई बात नहीं । सरकार तो लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए चिंतित है । कहीं कोई कॉकरोच उसे कुतरकर भ्रष्ट न कर डाले इसीलिए लोकतंत्र की सुरक्षा का इंतजाम तो कारण ही पड़ता है । और अधिक खतरा हुआ तो कहीं ताले में बंद न करना पड़े ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लेकिन यह बता कि तू इतनी देर क्यों आया ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- मुझे रात को बड़ा अजीब सपना आया । देखा कि मैं जंतर मंतर पर बैठा हूँ और पुलिस मुझे घसीटकर बस में पटक रही है । सो मैंने सोचा, कहीं यह दुःस्वप्न सच न हो जाए सो नवरात्र करने का निश्चय कर लिया । बस, दुर्गसप्तशाती का एक पाठ करके आ रहा हूँ । उसी में देर हो गई ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- सपनों का क्या है ? आडवाणी जी को बहुत बार प्रधानमंत्री बनने के सपने आते रहे लेकिन सच हुए क्या ?इसलिए सपनों से डरने या खुश होने की जरूरत नहीं है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- लेकिन जब मैं आ रहा था तो एक पुलिस वाला मेरी तरफ बहुत संदेहास्पद नज़रों से देख रहा था ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- अंधभक्तों को डरने की कोई जरूरत नहीं है । पुलिस वाले तो केवल दिमागी नक्सलियों को रोकते हैं ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- लेकिन उन्हें कैसे पता चलेगा कि मैं दिमागी नक्सली नहीं हूँ ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- जिस प्रकार घड़े को ठोले से बजाकर देखा जाता है । उसी तरह बरतन की आवाज से पता चल जाता है कि फूटा हुआ है, खाली है या भरा हुआ है । तेरा तो नवरात्र के बिना भी काम चल जाएगा ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- जिस प्रकार सीता ने रावण का वरण नहीं किया था । रावण के उसका अपहरण किया था । वैसे ही मुझे लगता है लोकतंत्र का अपहरण हो गया है । ऐसे में शक्ति की आराधना तो करनी ही पड़ेगी । ये बच्चे भी जंतर मंतर पर यही तो कर रहे हैं । ये बंदर भालू की रावण की लंका फूंकेंगे ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">समझ ले मेरे ये नवरात्र इन बच्चों के लिए ही हैं ।</p>
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		<title>रमेश जोशी का व्यंग्य- &#8217;56 इंच का छोटा बंदर&#8217;</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/ramesh-joshi-ka-vyangya-56-inch-ka-chhota-bandar/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 Oct 2026 14:08:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यंग्य]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लेखक- रमेश जोशी तोताराम ने आज बड़ा अजीब प्रश्न पूछा- मास्टर, बड़े से बड़ा बंदर कितना बड़ा होता है ? हमने कहा- भई बड़े से बड़े की कोई सीमा नहीं होती । वह तो बड़े से भी बड़ा होता है जैसे मोदी जी नेहरू से भी बड़े हो चुके हैं कार्यकाल के हिसाब से । &#8230;</p>
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<figure class="alignleft size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="लेखक- रमेश जोशी" class="wp-image-461"/><figcaption class="wp-element-caption">लेखक- रमेश जोशी</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">तोताराम ने आज बड़ा अजीब प्रश्न पूछा- मास्टर, बड़े से बड़ा बंदर कितना बड़ा होता है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- भई बड़े से बड़े की कोई सीमा नहीं होती । वह तो बड़े से भी बड़ा होता है जैसे मोदी जी नेहरू से भी बड़े हो चुके हैं कार्यकाल के हिसाब से । हो सकता है कल को कोई उनसे भी आगे निकल जाए । वैसे अब तक का रिकार्ड तो फ्रांस के लुई 14 वें के नाम है जो 72 साल तक गद्दी पर काबिज रहा , जब तक कि मर नहीं गया । अब मोदी जी तो मोदी जी है विष्णु के अवतार या फिर साक्षात विष्णु । जब तक उनका मन करे रहें । और फिर उनका विकल्प भी तो नहीं है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- हर बात को बिना बात खींच खींचकर इतना बड़ा कर देता है कि बात का मज़ा ही खराब हो जाता है । बात मोदी जी की नहीं, बंदर की हो रही थी कि बड़े से बड़ा बंदर कितना बड़ा होता होगा ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा-सामान्य रूप से बंदर चारों पैरों पर चले तो ज्यादा से ज्यादा डेढ़ फुट ऊँचाई का होता होगा और अगर दो पाँवों पर खड़ा हो जाए तो पूँछ समेत अधिक से अधिक तीन फुट का होता होगा ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- तो फिर जंतर मन्तर पर ये कॉकरोच क्या गा रहे थे- 56 इंच का छोटा बंदर । पेपर लीक कर गया बंदर ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- या तो यह इन बच्चों का अज्ञान है या फिर बड़बोलापन । इन्हें बंदर की क्षमता और खुराफ़ातों का कुछ ज्ञान नहीं है । बंदर मनुष्य का पूर्वज है और फिर शैतान भी । वह कुछ भी हो, कितना भी छोटा-बड़ा हो सकता है । जैसे लंका में घुसते समय बंदर हनुमान मशक अर्थात मच्छर के समान आकार का हो गया और फिर जब सीता जी ने उनके आकार को देखकर शंका की-</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8220;हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना । जातुधान अति भट बलवाना’</p>



<p class="wp-block-paragraph">तो उन्होंने विराट रूप धारण किया-</p>



<p class="wp-block-paragraph">“कनक भूधराकार सरीरा, समर भयंकर अतिबल बीरा॥”</p>



<p class="wp-block-paragraph">बंदर कुछ भी कर सकता है और अगर 56 इंच का हो तो कहना ही क्या ? चाहे तो इतिहास तक को बदल सकता है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- कैसे ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- जयपुर में बंदर आज भी कम नहीं हैं । हम तो तुझे 1964 की बात बता रहे हैं जब हम परीक्षा देने जयपुर गए थे । चांदपोल में भाई साहब के एक मित्र के यहाँ ठहरे थे । खुली छत पर बैठे पढ़ रहे थे । बीच में पाँच सात मिनट के लिए गन्ने का ज्यूस पीने के लिए बाहर गली में गए । आए तो देखा कि एक बंदर हमारा हिन्दी साहित्य का इतिहास लेकर नीम पर बैठा हुआ उसके पन्ने फाड़ फाड़कर फेंक रहा है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सारा इतिहास उलट पुलट दिया । सो बंदर छोटा हो या बड़ा, 56 इंच का या 26 का सावधान रहो ।</p>
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		<title>रमेश जोशी का व्यंग्य- &#8216;मोदी मंदिर&#8217;</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/ramesh-joshis-satire-modi-temple/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 04 Oct 2026 13:45:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यंग्य]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लेखक- रमेश जोशी &#8216;मोदी जी के मंदिर की क्या जरूरत है । वे वैसे ही कण कण में व्याप्त हैं लाल किले से लेकर सुलभ शौचालय तक में , 5 किलो अनाज के बोरे से लेकर कोरोना के टीके के प्रमाण पत्र और रेल टिकट तक पर ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230; आज &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="लेखक- रमेश जोशी" class="wp-image-461"/><figcaption class="wp-element-caption">लेखक- रमेश जोशी</figcaption></figure>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;मोदी जी के मंदिर की क्या जरूरत है । वे वैसे ही कण कण में व्याप्त हैं लाल किले से लेकर सुलभ शौचालय तक में , 5 किलो अनाज के बोरे से लेकर कोरोना के टीके के प्रमाण पत्र और रेल टिकट तक पर ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">आज तोताराम बहुत प्रसन्न था, बोला- अब तो मान ले लोहा, कर ले चमत्कार को नमस्कार ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- क्या चमत्कार हो गया ? क्या मोदी जी नोटबंदी और किसान आंदोलन में मृत लोगों, नीट पेपर आउट के मृत विद्यार्थियों, जंतर मंतर आंदोलन में अपमानित किए बच्चों या मणिपुर के पीड़ित लोगों के बारे में कुछ बोले, उनसे माफ़ी मांगी ? उनका दुख-दर्द पूछने चले गए ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- ये कोई चमत्कार थोड़े हैं । ये तो राहुल जैसे निठल्ले लोगों के काम हैं । मोदी जी का तो मंदिर बन रहा है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- इस देश में मंदिर बनना-बनाना कोई मुश्किल काम है ? कोई भी कहीं भी दो पत्थर रखकर, अगरबत्ती जला देगा तो बन गया मंदिर, हो गई मज़ार । मुश्किल तो है स्कूल बनाना, उन्हें सुविधा सम्पन्न बनाना । जहां स्कूलों से ज्यादा मंदिर-मस्जिद हों उस देश के अच्छे दिन कभी नहीं आने । फिर वे मंदिर चाहे किसी ईश्वर के हों, बुद्ध के हों या अंबेडकर के या फिर दयानंद सरस्वती के । मूर्तियाँ विचार और तर्क की बहुत बड़ी दुश्मन होती हैं । इस देश में तो पशु-पक्षियों के भी अनेक मंदिर हैं जैसे </p>



<p class="wp-block-paragraph">करणी माता मंदिर (चूहों का मंदिर): राजस्थान के बीकानेर के पास देशनोक में स्थित इस मंदिर में 25,000 से अधिक चूहे खुलेआम घूमते हैं। इन्हें यहाँ पवित्र माना जाता है और &#8216;काबा&#8217; कहा जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुक्कुरदेव मंदिर (कुत्ते का मंदिर): छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के खापरी गाँव में स्थित यह मंदिर कुत्ते को समर्पित है। माना जाता है कि यहाँ दर्शन करने से कुत्ते के काटने का भय नहीं रहता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुतिया महारानी मंदिर: उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के मौरानीपुर में स्थित इस छोटे से मंदिर में एक कुतिया की मूर्ति स्थापित कर उसकी पूजा की जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मन्नारसला श्री नागराज मंदिर (सांपों का मंदिर): केरल के हरिपाड (मन्नारसला) में स्थित इस प्राचीन मंदिर में सांपों की मूर्तियों और चित्रों की भरमार है, जहाँ नाग देवता की पूजा होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बुल टेम्पल (नंदी मंदिर): कर्नाटक के बेंगलुरु में स्थित इस मंदिर में भगवान शिव के वाहन नंदी (सांड) की एक विशाल 15 फीट लंबी प्रतिमा है, जिसकी पूजा की जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">और तो और फिल्म वालों के भी मंदिर हैं जैसे</p>



<p class="wp-block-paragraph">अमिताभ बच्चन (कोलकाता): जैसा कि आपने ज़िक्र किया, कोलकाता के बालीगंज (आनंद नगरी) इलाके में फैंस ने उनका एक मंदिर बनाया है, जिसे बच्चन धाम कहा जाता है। यहाँ उनकी एक मूर्ति है और उनकी फिल्म &#8216;अक्स&#8217; से प्रेरित कुर्सी व &#8216;अग्निपथ&#8217; के जूते रखे गए हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">रजनीकांत (कर्नाटक): दक्षिण भारत के सुपरस्टार रजनीकांत के लिए फैंस ने कर्नाटक के कोलार जिले में स्थित कोटिलिंगेश्वर मंदिर में एक विशेष &#8216;सहस्र लिंगम&#8217; स्थापित किया है, जहाँ उनकी सेहत के लिए पूजा की जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सोनू सूद (तेलंगाना): कोरोना महामारी के दौरान लोगों की मदद करने वाले अभिनेता सोनू सूद को फैंस ने &#8216;मसीहा&#8217; माना। तेलंगाना के डुब्बा टांडा गांव में फैंस ने सोनू सूद की मूर्ति लगाकर उनका मंदिर बनाया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सामंथा रुथ प्रभु (आंध्र प्रदेश): साउथ की मशहूर अभिनेत्री सामंथा के एक प्रशंसक ने आंध्र प्रदेश के बापटला जिले में अपने घर के अहाते में ही उनका मंदिर बना दिया और वहाँ उनकी मूर्ति स्थापित की।</p>



<p class="wp-block-paragraph">निधि अग्रवाल (चेन्नई): फिल्म &#8216;इस्मार्ट शंकर&#8217; से मशहूर हुईं अभिनेत्री निधि अग्रवाल के फैंस ने चेन्नई में उनका मंदिर बनाया और उनकी मूर्ति पर दूध से अभिषेक भी किया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हंसिका मोटवानी (मदुरै): अभिनेत्री हंसिका मोटवानी की लोकप्रियता जब चरम पर थी, तब तमिलनाडु के मदुरै में उनके फैंस ने उनके नाम पर एक मंदिर बनाया था, जिसमें उनकी मूर्ति लगाई गई थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सचिन तेंदुलकर (बिहार): क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर का मंदिर बिहार के कैमूर (भभुआ) जिले के अतरवलिया गांव में बनाया गया है। यहाँ सचिन की आदमकद (लाइफ-साइज) मूर्ति लगाई गई है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नेताओं में</p>



<p class="wp-block-paragraph">सोनिया गांधी (तेलंगाना): कांग्रेस पार्टी की नेता सोनिया गांधी के प्रति सम्मान दिखाने के लिए तेलंगाना के एक नेता ने उनका मंदिर बनवाया था, जहाँ उनकी 9 फीट ऊंची कांसे की मूर्ति लगाई गई थी ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">और मोदी जी का भी एक मंदिर ग्वालियर में पहले से ही है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह देश विश्व गुरु है यहाँ एक दलित नेता ने अंग्रेजी का मंदिर बनवाया था ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- अगर तेरा यह मूर्ति महापुराण बंद हो तो कोई काम की बात करूँ ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- करो, करो । आज के दिन मोदी जी से बढ़कर और किसकी बात काम की बात हो सकती है ? लेकिन हमारा मानना है कि किसी भी जीवित व्यक्ति की मूर्ति या मंदिर बनाना अशुभ माना जाता है । तुझे याद है अपने गाँव में विद्या भवन नाम की युवाओं की एक संस्था थी जिसने 1962 में स्टेशन के सामने नेहरू जी की एक मूर्ति बनवाना शुरू किया था । 1963 में मूर्ति बनी और 1964 में नेहरू जी की मृत्यु । बाद में 1965 में जब इंदिरा जी अपने गाँव में आई थीं तो उन्होंने उसका अनावरण किया था । मायावती ने अपनी जीते जी मूर्तियाँ लगवा दीं । उसके बाद से घर बैठी हैं ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- लेकिन मोदी जी का यह मंदिर काई मायनों में अनोखा है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- कैसे ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- इसे ट्रांसजेंडर बोर्ड की तरफ से बनवाया जा रहा है जिसका अध्यक्ष एक ट्रांसजेंडर ही है । 5 एकड़ में सौ सवा सौ करोड़ में बनेगा मंदिर ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- जिस तरह से मंदिरों, कुम्भ मेलों, दीये जलाने के रिकार्ड बनाने में धन खर्च किया जा रहा है उसे देखते हुए यह धन कुछ भी नहीं है । फिर भी जिस देश में स्कूलों में कमरे, फर्नीचर, शौचालय, पीने का पानी नहीं है वहाँ यह एक नैतिक अपराध है । मोदी जी के मंदिर की क्या जरूरत है । वे वैसे ही कण कण में व्याप्त हैं लाल किले से लेकर सुलभ शौचालय तक में , 5 किलो अनाज के बोरे से लेकर कोरोना के टीके के प्रमाण पत्र और रेल टिकट तक पर ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोल- मंदिर की बात कुछ और होती है । सुबह शाम आरती, भजन कीर्तन, मन्नत मनौती आदि ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- लेकिन मंदिर के लिए जिस मूर्ति का पोस्टर ट्रांसजेंडर बोर्ड का अध्यक्ष ट्रांसजेंडर राजन सिंह उर्फ रंजन सिंह दिखा रहा है वह राम स्टाइल में दाढ़ी वाले मोदी जी का है । इसमें ये परशुराम, द्रोणाचार्य अधिक लगते हैं राम कम । और अगर दाढ़ी हटा दी जाए तो पता ही नहीं लगेगा कि यह है कौन । मोदी जी तो बिल्कुल नहीं लगेंगे । और दाढ़ी के साथ ट्रांसजेंडर कोई संबंध स्थापित नहीं कर पाएंगे । कोई दाढ़ी वाला हिजड़ा देखा है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- यह तो हिजड़ों का अपना निर्णय है वे चाहें जिस विग्रह में मोदी को स्थापित करें ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- हिजड़े कन्फ्यूज तो हो जाएँगे क्योंकि मोदी जी के लाखों रूप हैं नित नये। भक्त भगवान को अपने मन के अनुसार बनाना चाहता है जैसे मांसाहारी मांस का भोग लगाएगा और शराबी अपने आराध्य को हम पियाला बनाना चाहता है । ऐसे में अगर ट्रांसजेंडरों ने मोदी जी की दाढ़ी साफ करके घाघरा चुन्नी पहनाकर ‘जियो जियो रे लला’&#8217; करवा दिया तो छप्पन इंची सीने, लाल आँख और पठान का बच्चा वाली इमेज का सत्यानाश हो जाएगा ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके साथ एक चक्कर और है । मोदी जी कहते हैं हम तो फकीर हैं, जब चाहे झोला उठाकर चल देंगे । अगर ट्रांसजेंडरों ने दाढ़ी साफ करवा दी और मोदी का मन अचानक झोला उठाने का हो गया तो खाएंगे क्या । क्योंकि दाढ़ी के बिना कोई फकीर नहीं मानता और फकीर माने बिना भीख नहीं । और दुबारा दाढ़ी बढ़ने में भी एक महिना तो लगेगा । और नकली दाढ़ी का क्या भरोसा; कब, कहाँ धोखा दे जाए । </p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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			</item>
		<item>
		<title>सतीश झा की कहानी- पुरुषोत्तम मिश्रा का आईना</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/satish-jhas-story-purushottam-mishras-mirror/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 27 Sep 2026 13:35:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi kahani]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi story]]></category>
		<category><![CDATA[#sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#satish jha]]></category>
		<category><![CDATA[#short story]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सावन का सत्रहवाँ दिन था, सन् १८७१। उस दिन पुरुषोत्तम मिश्रा ने वह किया जिसे वे न उस समय समझ पाए, न फिर कभी। वाराणसी की संकरी गलियों में, दशाश्वमेध घाट से कुछ दूर, अपने पुराने घर की ऊपरी कोठरी में वे अकेले खड़े थे। नीचे उनकी पत्नी सो रही थी। सातवाँ महीना था। नींद &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="923" height="977" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/09/WhatsApp-Image-2026-09-14-at-9.34.19-AM.jpeg" alt="लेखक- सतीश झा" class="wp-image-681" style="aspect-ratio:0.9447490510333193;width:128px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/09/WhatsApp-Image-2026-09-14-at-9.34.19-AM.jpeg 923w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/09/WhatsApp-Image-2026-09-14-at-9.34.19-AM-283x300.jpeg 283w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/09/WhatsApp-Image-2026-09-14-at-9.34.19-AM-767x812.jpeg 767w" sizes="(max-width: 923px) 100vw, 923px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">सावन का सत्रहवाँ दिन था, सन् १८७१।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उस दिन पुरुषोत्तम मिश्रा ने वह किया जिसे वे न उस समय समझ पाए, न फिर कभी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वाराणसी की संकरी गलियों में, दशाश्वमेध घाट से कुछ दूर, अपने पुराने घर की ऊपरी कोठरी में वे अकेले खड़े थे। नीचे उनकी पत्नी सो रही थी। सातवाँ महीना था। नींद भारी थी—मानो किसी और के सपनों से भरी हो।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दो बार वे नीचे जाकर उनका चेहरा देख आए थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">चेहरे पर ऐसी शांति थी जैसे किसी पात्र में रखा जल, जिसे छूने भर से कुछ टूट जाएगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वे फिर ऊपर लौट आए। शायद उस शांति को बचाने के लिए। शायद इसलिए कि जो होने वाला था, उसे नीचे नहीं होना चाहिए था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उन्होंने दादा का पुराना आईना सामने रखा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">काठ पर समय से घिसे हुए आकार थे—अधखिले कमल, उलटी दिशा में तैरती मछलियाँ और बीच में एक आँख।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उसे देखते हुए पहली बार उन्हें लगा कि देखना और देखे जाना दो अलग बातें नहीं हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उन्होंने शीशे पर हथेली रखी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">काँच पानी की तरह काँपा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ठंडक थी—नदी की नहीं; उस जल की, जो धरती के बहुत नीचे, बिना आवाज़ किए बहता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">उस प्रकाशहीन जगह में पाँच पुस्तकें खुलीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">न दीवार थी, न द्वार। प्रत्येक पुस्तक पर एक हथेली का निशान था—हर बार वही, हर बार थोड़ा बदला हुआ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">किसी पर कोई नाम नहीं था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">पहला जीवन</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक बच्चा राजा बना।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वह आईनों के महल में रहा और वहीं मरा—जहाँ प्रत्येक प्रतिबिंब अपने बाद एक और प्रतिबिंब को जन्म देता था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अंत तक उसे मालूम नहीं हुआ कि उनमें असली कौन था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हाशिये पर लिखा था:</p>



<p class="wp-block-paragraph">“खंड १७ देखें।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">खंड १७ में वही मनुष्य कमला नदी के किनारे बैठा था। सत्तर वर्षों से एक ही श्लोक की टीका लिख रहा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हर व्याख्या से तीन व्याख्याएँ निकलतीं। उनसे नौ। नौ से सत्ताईस।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मृत्यु के दिन भी उसकी कलम चल रही थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अंतिम वाक्य था:</p>



<p class="wp-block-paragraph">“यह श्लोक अभी समझ में नहीं आया।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने पुस्तक बंद कर दी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भीतर कहीं एक और पृष्ठ खुला।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरा जीवन</p>



<p class="wp-block-paragraph">जूट और पीतल का बड़ा कारोबार था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हर संबंध का एक खाता था। हर स्पर्श की एक कीमत।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इकतालीस वर्ष की आयु में हिसाब में एक आना कम निकला।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शेष जीवन उसी एक आने की तलाश में बीत गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अंतिम पृष्ठ पर लिखा था:</p>



<p class="wp-block-paragraph">“बाकी: एक अज्ञात पुत्र।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने वह पंक्ति दो बार पढ़ी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">तीसरा जीवन</p>



<p class="wp-block-paragraph">भोर से पहले का समय था—न रात, न दिन।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक युवक खाई में पड़ा था। चारों ओर गीली मिट्टी की गंध थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वह अपनी माँ के हाथों की गंध याद कर रहा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">रोटी की नहीं। मेहंदी की नहीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बस हाथों की।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सूर्योदय से पहले वह मर गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नीचे लिखा था:</p>



<p class="wp-block-paragraph">“लापता।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">पीछे के पृष्ठ पर, किसी दूसरी लिखावट में:</p>



<p class="wp-block-paragraph">“माँ ने तीन वर्ष तक दरवाज़ा खुला रखा।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने पुस्तक बंद कर दी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वाक्य खुला रहा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">चौथा जीवन</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह सबसे मोटी पुस्तक थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उसमें वही कोठरी थी। वही आईना। वही सावन का दिन।</p>



<p class="wp-block-paragraph">और एक आदमी था, जो यह कथा लिख रहा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने अंतिम अनुच्छेद पढ़ा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उसमें लिखा था कि पुरुषोत्तम अंतिम अनुच्छेद पढ़ रहे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अगली पंक्ति खाली थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वे पीछे हटे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आईने का जल गाढ़ा हो गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">पाँचवाँ जीवन</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस पुस्तक पर हथेली का निशान नहीं था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भीतर एक आदमी था। वह हर सुबह उठता, खिड़की खोलता और नदी को देखता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">फिर धीरे-धीरे गुनगुनाता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दिन भर कुछ नहीं करता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उस जीवन में न पत्नी थी, न पुत्र। न कोई खाता, न युद्ध, न श्लोक, न आईना।</p>



<p class="wp-block-paragraph">केवल वह था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वह बहुत वृद्ध हुआ। एक सुबह खिड़की खोलते हुए मर गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उसके बाद कोई दरवाज़ा खुला नहीं रहा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम बहुत देर तक उस पृष्ठ को देखते रहे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तभी उन्हें नीचे सो रही स्त्री की साँस सुनाई दी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">किसी ने पूछा:</p>



<p class="wp-block-paragraph">“इनमें से किसे आप जीने देंगे?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने हथेली हटानी चाही।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पर अब यह स्पष्ट नहीं था कि हथेली उनकी ओर थी या आईने की ओर।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नीचे लकड़ी हिली।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शायद उनकी पत्नी ने करवट बदली थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शायद वह बच्चा, जो अभी किसी पुस्तक में दर्ज नहीं था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पहली पुस्तक खुली। जहाँ राजा का चेहरा होना चाहिए था, वहाँ कोरा शीशा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरी में एक आना चमक रहा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तीसरी में दरवाज़ा अब भी खुला था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">चौथी की खाली पंक्ति पर स्याही फैलने लगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पाँचवीं बंद रही।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने कोई उत्तर नहीं दिया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">फिर भी एक पुस्तक चुन ली गई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">बहुत दूर—जहाँ समय नहीं था और नाम अभी दिए नहीं गए थे—असंख्य जीवन चुप खड़े थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उन्हें जन्म लेने की कोई जल्दी नहीं थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने शीशे से हथेली हटा ली।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उस पर कोई निशान नहीं था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नीचे पत्नी की साँस सुनाई दे रही थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुराने काठ में, अधखिले कमलों और उलटी तैरती मछलियों के बीच, वह आँख अब भी खुली थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वह न पिता को देख रही थी, न पुत्र को।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वह उसे देख रही थी जो अभी जन्मा नहीं था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">और उसे—</p>



<p class="wp-block-paragraph">जो यह पढ़ रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<ul class="wp-block-list">
<li><strong>सतीश झा</strong>, <strong>लेखक जाने-माने भारतीय-अमरीकी पत्रकार एवं जनसत्ता तथा दिनमान के संपादक रहे हैं.</strong></li>
</ul>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>प्रियदर्शन का लेख : कुंवर नारायण को पढ़ना अपने समय को  पढ़ना है</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/priyadarshans-article-to-read-kunwar-narayan-is-to-read-ones-own-time/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Sep 2026 12:18:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi kavi]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi kavita]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#kunwar narayan]]></category>
		<category><![CDATA[#lucknow]]></category>
		<category><![CDATA[#sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#कुंवर नारायण]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;वे बताते हैं कि इन दिनों वे एक अजीब सी मुश्किल में हैं, नफ़रत करने की उनकी ताक़त घटती जा रही है। अंग्रेज़ी से नफ़रत करने की कोशिश में शेक्सपियर आड़े आ जाते हैं, मुसलमानों से नफ़रत की कोशिश में ग़ालिब रास्ता रोक लेते हैं, सिखों से नफ़रत की राह में गुरु नानक मिल जाते &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;वे बताते हैं कि इन दिनों वे एक अजीब सी मुश्किल में हैं, नफ़रत करने की उनकी ताक़त घटती जा रही है। अंग्रेज़ी से नफ़रत करने की कोशिश में शेक्सपियर आड़े आ जाते हैं, मुसलमानों से नफ़रत की कोशिश में ग़ालिब रास्ता रोक लेते हैं, सिखों से नफ़रत की राह में गुरु नानक मिल जाते हैं। पहला धोखा देने वाली अपनी प्रेमिका के चेहरे पर मां, बहन और पत्नी का चेहरा दिख जाता है और कवि प्रेम के घूंट पीकर रह जाता है।&#8217; पढ़ें सुपरिचित लेखक प्रियदर्शन का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image is-style-default">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="421" height="488" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-05-at-11.42.21-AM.jpeg" alt="लेखक प्रियदर्शन" class="wp-image-577" style="aspect-ratio:0.8627635394623403;width:133px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-05-at-11.42.21-AM.jpeg 421w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-05-at-11.42.21-AM-259x300.jpeg 259w" sizes="(max-width: 421px) 100vw, 421px" /><figcaption class="wp-element-caption">लेखक प्रियदर्शन</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">कुंवर नारायण को पढ़ना क्यों ज़रूरी है? क्योंकि वे हमें परंपरा से भी जोड़ते हैं और आधुनिकता से भी। वे परंपरा और आधुनिकता दोनों को जस का तस नहीं ग्रहण कर लेते। परंपरा में भी जो छोड़े जाने लायक है, उसे छोड़ देते हैं और आधुनिकता में भी जो त्याज्य है, उसे त्याज्य बताते हैं।<br>कुंवर नारायण बहुत सरल कवि हैं। कई बार तो वे सूक्तियों में बात करते हैं। निश्चय ही सूक्तियां कविता नहीं होतीं। लेकिन काव्य तत्व को सूक्तियों में बदलने के लिए जो मानवीय सरलता और भाषिक गहनता चाहिए, वह कुंवर नारायण में भरपूर है। उन जैसा कवि ही लिख सकता है- &#8216;कोई दुख मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं / हारा वही जो लड़ा नहीं।&#8217;</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुंवर नारायण के यहां ऐसी बेशुमार पंक्तियां हैं। वे मनुष्य के साहस और संघर्ष को सर्वोपरि मानते हैं- लेकिन गर्व, अहंकार और मिथ्या अभिमान के खोखलेपन को भी पहचानते हैं। उनकी एक छोटी सी कविता है जिसमें वह बहुत गरिमापूर्ण ढंग से लिखते हैं- &#8216;अबकी बार लौटा तो / बृहत्तर लौटूंगा / चेहरे पर लगाए नोकदार मूंछें नहीं / कमर में बांधे लोहे की पूंछें नहीं / जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को / तरेर कर न देखूंगा उन्हें / भूखी शेर-आँखों से /अबकी बार लौटा तो / मनुष्यतर लौटूंगा / घर से निकलते / सड़कों पर चलते / बसों पर चढ़ते / ट्रेनें पकड़ते / जगह बेजगह कुचला पड़ा / पिद्दी-सा जानवर नहीं / अगर बचा रहा तो / कृतज्ञतर लौटूंगा / अबकी बार लौटा तो / हताहत नहीं सबके हिताहित को सोचता / पूर्णतर लौटूंगा।’</p>



<p class="wp-block-paragraph">बहुत जटिल बातों को बहुत सरलता से कह देना कुंवर नारायण की एक अन्य विशेषता है। उनके समूचे काव्य-तत्व में पौराणिक प्रसंगों की प्रचुरता है। ‘वाजश्रवा के बहाने’ या ‘आत्मजयी’ जैसी उनकी कृतियां परंपरा से संवाद करती हैं। ‘आत्मजयी’ में नचिकेता यमराज से बहस करता है। लेकिन परंपरा कुंवर नारायण के लिए आत्मीय विरासत तो है, श्रद्धा या पूजा की वस्तु नहीं। दूसरी बात यह कि वे तमाम परंपराओं को देखते हैं और उनका सम्मान करते हैं। मौजूदा समय में घृणा की जो राजनीति है, उस पर प्रहार करने में भी उनकी कविता नहीं चूकती। उनकी एक कविता है- ‘एक अजीब सी मुश्किल’। वे बताते हैं कि इन दिनों वे एक अजीब सी मुश्किल में हैं, नफ़रत करने की उनकी ताक़त घटती जा रही है। अंग्रेज़ी से नफ़रत करने की कोशिश में शेक्सपियर आड़े आ जाते हैं, मुसलमानों से नफ़रत की कोशिश में ग़ालिब रास्ता रोक लेते हैं, सिखों से नफ़रत की राह में गुरु नानक मिल जाते हैं। पहला धोखा देने वाली अपनी प्रेमिका के चेहरे पर मां, बहन और पत्नी का चेहरा दिख जाता है और कवि प्रेम के घूंट पीकर रह जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह कुंवर नारायण की अपनी उलटबांसी है। एक बदहवास, घृणा से बजबजाती दुनिया का जैसे वे मुस्कुराते हुए कंधा थपथपाते हें। लेकिन आततायियों के प्रति उनमें कोई ममत्व नहीं है। यहां उनका सहज अंदाज़ अचानक व्यंग्य-विदग्ध हो उठता है। बाबरी मस्जिद गिराए जाने से व्यथिक वे ‘अयोध्या 1992’ जैसी कविता लिख सकते हैं- ‘हे राम, / जीवन एक कटु यथार्थ है / और तुम एक महाकाव्य ! / तुम्हारे बस की नहीं / उस अविवेक पर विजय / जिसके दस बीस नहीं / अब लाखों सर- लाखों हाथ हैं, / और विभीषण भी अब / न जाने किसके साथ है / इससे बड़ा क्या हो सकता है / हमारा दुर्भाग्य / एक विवादित स्थल में सिमट कर / रह गया तुम्हारा साम्राज्य / अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं / योद्धाओं की लंका है, / &#8216;मानस&#8217; तुम्हारा &#8216;चरित&#8217; नहीं / चुनाव का डंका है! / हे राम, कहां यह समय<br>कहां तुम्हारा त्रेता युग / कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम<br>कहां यह नेता-युग! / सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ य किसी पुराण &#8211; किसी धर्मग्रन्थ में /<br>सकुशल सपत्नीक / अबके जंगल वो जंगल नहीं /<br>जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक!’<br>तो यह भी कुंवर नारायण हैं। पूरी तरह समकालीन और अकाव्यात्मक होने का ख़तरा उठाते हुए भी तीखी बात कह सकने का साहस रखने वाले कवि। उनको पढ़ना इसलिए ज़रूरी है कि उनको पढ़ते हुए मनुष्य होने के नए अर्थ खुलते हैं, सभ्य होने के नए मानी मिलते हैं। वे बहुत चुपचाप हमें भीतर से कुछ बदल डालते हैं। उनका एक दार्शनिक आयाम है जो उनकी छोटी-बड़ी कविताओं में बहुत मुखर होकर सामने आता है। यह मुखरता भी अलग तरह की है- इसमें कोई ऊंची आवाज़ नहीं, बस बहुत स्पष्ट चिंतन की कौंध है। दर्शन को भी निरी दार्शनिकता से मुक्त कर कविता में कैसे ढाल दिया जाए- यह उन्हें ख़ूब मालूम है। उन जैसा कवि ही ‘दीवारें’ जैसी कविता लिख सकता है- &#8216;अब मैं एक छोटे-से घर /<br>और बहुत बड़ी दुनिया में रहता हूँ / कभी मैं एक बहुत बड़े घर / और छोटी-सी दुनिया में रहता था /<br>कम दीवारों से / बड़ा फ़र्क पड़ता है / दीवारें न हों /<br>तो दुनिया से भी बड़ा हो जाता है घर।&#8217;</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुंवर नारायण ने हिंदी के बहुत सारे लेखकों की तरह आर्थिक संघर्ष नहीं झेले, बल्कि वे एक समृद्ध-संपन्न और कुलीन परिवार से आते थे। मगर समकालीन साहित्य संसार में इस बात ने उनकी चुनौती कुछ बड़ी कर दी। उनको मान्यता मिलने में समय लगा। उनके मुक़ाबले हिंदी समाज उम्र में उनसे कुछ वरिष्ठ नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन जैसे जनकवियों को ज़्यादा महत्व देता रहा। वे रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के भी समकालीन रहे। उस दौर में केदारनाथ सिंह की ग्राम-संवेदना को भी हाथों-हाथ लिया गया। यह सच है कि वह दौर हिंदी कविता की बहुत समृद्ध आवाज़ों से भरा था। धीरे-धीरे लोगों ने कुंवर नारायण की कुछ मद्धिम आवाज़ भी सुननी शुरू की। यह शिकायत की गई कि वे ऊष्मा से भरे इस दौर में कुछ ‘ठंडे’ कवि हैं। लेकिन उनकी कविताओं का जो आंतरिक ताप था, वह भी इन वर्षों में मुखर होता रहा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सत्तर और अस्सी के दशकों में हिंदी कविता नक्सलवाद की क्रांतिकारी धारा से ऊर्जा पाती रही। मंगलेश डबराल, आलोकधन्वा, वीरेन डंगवाल जैसे कई बड़े कवि इसी दौर में उभरे। इस दौर पर नागार्जुन-त्रिलोचन की छाया भी बड़ी होती रही। यह सच है कि इससे पहले इनकी कविताओं को भी वह मान्यता नहीं मिली थी जो इन वर्षों में मिली। लेकिन एक समय ऐसा लगता था कि हिंदी कविता की मुख्यधारा के रूप में जनवाद और उसके आग्रहों के बीच कुछ कवि विस्मृत न कर दिए जाएं।<br>लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कविता की अपनी शक्ति ने कवियों को बचाया। आज की तारीख में हिंदी कविता जिन कवियों की परंपरा से कुछ ग्रहण करती है, उनमें कुंवर नारायण भी एक हैं और प्रमुख हैं। कभी जाने-माने विष्णु खरे ने लिखा था कि हिंदी कविता वैश्विक कविता से कहीं कमतर नहीं है। हिंदी के जो कवि इस वक्तव्य के प्रामाणिक स्वर की तरह प्रस्तुत किए जा सकते हैं, उनमें कुंवर नारायण भी एक हैं। बेशक, उनकी आवाज कई बार मद्धिम जान पड़ती है, वे कहीं-कहीं पोलिश कवियों मिस्लाव मिवोश और शिंबोर्स्का की याद दिलाते हैं, चिली के महान कवि निकानौर पार्रा की एक कविता युवा कवियों के नाम है- &#8216;जैसा चाहो वैसा लिखो / जिस भी शैली में जो तुम्हें पसंद आए / पुल के नीचे बहुत सारा खून बह चुका है / यह मानते रहने में / कि एक ही रास्ता सही है / कविता में सबकुछ स्वीकार्य है / बेशक, इस एक शर्त के साथ / कि तुम्हें यह कोरा पन्ना सुधारना है।&#8217; इसमें संदेह नहीं कि कुंवर नारायण ने कोरे पन्नों को बार-बार नए अर्थ दिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुंवर नारायण ने विपुल मात्रा में लिखा है- कविता के अलावा कहानियां भी, फिल्मों पर भी और विचार से जुड़े आलेख भी। ‘कोई दूसरा नहीं’, ‘परिवेश हम तुम’, ‘आमने-सामने’, ‘इन दिनों’ जैसे कविता संग्रह सहज याद आते हैं। उनकी एक कहानी में दो देशों के बीच की सीमाएं खो जाती हैं। अब सब सीमाओं की तलाश में लगे हैं, सीमाएं न हों तो लोग कैसे पहचाने जाएं, सेनाएं क्या करें। लेकिन खोई हुई सीमाओं के बीच सबसे निश्चिंत होकर बच्चे खेल रहे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सादगी के सौंदर्य और दर्शन की गरिमा के बीच कहीं बनता है कुंवर नारायण का साहित्य। वे समकालीन भी हैं और सार्वकालिक भी, बिल्कुल स्थानीय भी हैं और वैश्विक भी। उनको पढ़ना अपनी दुनिया को नए सिरे से पहचानना है। सार्वकालिक और समकालीन के बीच का सेतु वे बस चंद शब्दों में बांध देते हैं- &#8216;जिस समय में / सब कुछ / इतनी तेजी से बदल रहा है / वही समय / मेरी प्रतीक्षा में / न जाने कब से / ठहरा हुआ है! / उसकी इस विनम्रता से / काल के प्रति मेरा सम्मान-भाव / कुछ अधिक / गहरा हुआ है ।&#8217;<br>कुंवरनारायण को पढ़ना अपने समय को भी पढ़ना है और समयातीत को भी।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>डाॅ. राम पुनियानी का लेख: भारत की भोजन संस्कृति पर हो रही राजनीति से जनता त्रस्त</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-public-distressed-due-to-politics-over-indias-food-culture/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 20 Sep 2026 13:44:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;ऐसा ही परामर्श आरएसएस की सहयोगी संस्था व्हीएचपी द्वारा कुछ दिन पहले दिया जा चुका था। इससे बंगाली हिन्दू नाराज हो गए। इनमें वे हिन्दू भी शामिल थे जो स्वयं को &#8220;हिन्दू राष्ट्रवादी&#8221; कहते हैं। कई प्रमुख बंगालियों ने अपना विरोध प्रदर्शित किया और वक्तव्य जारी कर कहा कि शास्त्री को हमें यह सिखाने की &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong> &#8216;ऐसा ही परामर्श आरएसएस की सहयोगी संस्था व्हीएचपी द्वारा कुछ दिन पहले दिया जा चुका था। इससे बंगाली हिन्दू नाराज हो गए। इनमें वे हिन्दू भी शामिल थे जो स्वयं को &#8220;हिन्दू राष्ट्रवादी&#8221; कहते हैं। कई प्रमुख बंगालियों ने अपना विरोध प्रदर्शित किया और वक्तव्य जारी कर कहा कि शास्त्री को हमें यह सिखाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि हम दुर्गापूजा कैसे मनाएं और क्या खाएं और क्या न खाएं।&#8217; पढ़ें सुपरिचित इतिहासकार एवं लेखक डाॅ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230; </strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="349" height="408" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM.jpeg" alt="डा. राम पुनियानी" class="wp-image-652" style="width:134px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM.jpeg 349w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM-257x300.jpeg 257w" sizes="(max-width: 349px) 100vw, 349px" /><figcaption class="wp-element-caption">डा. राम पुनियानी</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">आज के दौर में राजनीतिक प्रोपेगेंडा से समाज के नजरिए को प्रभावित करने के बहुत से उदाहरण हमारे सामने हैं। खानपान की आदतें भी विभाजनकारी राजनैतिक प्रवृत्तियों के हाथ में एक औजार बन गईं हैं। यह तर्क दिया जाता है कि मुसलमान इसलिए अधिक हिंसक होते हैं क्योंकि वे मांसाहारी होते हैं। पवित्र गाय और गौमांस के सेवन को भी इससे जोड़ दिया गया और नतीजे में हम भारत में लिंचिंग की शुरूआत के साक्षी बने जिसके मुख्य शिकार मुस्लिम होते हैं किंतु साथ ही बड़ी संख्या में दलितों को भी इसका सामना करना पड़ता है। हाउसिंग सोसायटियों में किसे रहने की इजाजत दी जाए और किसे नहीं, यह भी खानपान की आदतों के आधार पर तय होने लगा है। हाउसिंग सोसायटियां फ्लैट बेचने की अनुमति देने के पहले खरीदार की खानपान की आदतों के बारे में पूछताछ करती हैं। यह मुद्दा अधिक जटिल स्वरूप में हाल में बंगाल में सामने आया जहां पूजा-पंडालों के आसपास मांसाहारी खाद्य सामग्री न रखने की सलाह दी गई। साथ ही, समाज का एक तबका यह मांग कर रहा है कि जैन धर्म के पर्यूषण पर्व के दौरान मांसाहारी खाद्य पदार्थों पर प्रतिबंध लगना चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री (पर्चीवाले बाबा, जिन्हें प्रधानमंत्री अपना छोटा भाई कहते हैं) की दुर्गापूजा में मांसाहार पर निषेध की सलाह की मिलीजुली प्रतिक्रिया हुई। कुछ ही दिनों में बंगाल का सबसे बड़ा उत्सव, दुर्गा पूजा प्रारंभ होने वाला है। भाजपा हाल ही में पश्चिम बंगाल में सत्ता पर काबिज हुई है। बंगाल में भाजपा की राजनैतिक शक्ति में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ वहां भगवान राम को बढ़ावा देने का सिलसिला शुरू हो गया है। भाजपा और उसके समर्थकों द्वारा भगवान राम पर केन्द्रित उत्सवों को बढ़ावा दिया जा रहा है। राम का सहारा लेने से भाजपा को उत्तर भारत में जबरदस्त चुनावी लाभ हुआ, जिसका प्रभाव पूरे देश के चुनावी परिदृश्य पर पड़ा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भाजपा ने बंगाल में सत्ता संभालने के बाद बागेश्वर धाम के धीरेन्द्र शास्त्री को बंगाल आने का न्यौता दिया। वे हावड़ा के लिलुआह में हनुमान कथा सुनाने के लिए आए थे। उन्होंने लोगों को सलाह दी कि पूजा के दौरान मांसाहारी खाद्य पदार्थों को दुर्गा प्रतिमा से दूर रखा जाए। ऐसा ही परामर्श आरएसएस की सहयोगी संस्था व्हीएचपी द्वारा कुछ दिन पहले दिया जा चुका था। इससे बंगाली हिन्दू नाराज हो गए। इनमें वे हिन्दू भी शामिल थे जो स्वयं को &#8220;हिन्दू राष्ट्रवादी&#8221; कहते हैं। कई प्रमुख बंगालियों ने अपना विरोध प्रदर्शित किया और वक्तव्य जारी कर कहा कि शास्त्री को हमें यह सिखाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि हम दुर्गापूजा कैसे मनाएं और क्या खाएं और क्या न खाएं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस प्रतिक्रिया की वजह यह तथ्य है कि मछली और बकरे के मांस से बनने वाले व्यंजन दुर्गा उत्सव का लगभग अनिवार्य हिस्सा हैं। कई लोगों ने इस ओर ध्यान दिलाया कि मछली का बंगाली संस्कृति में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है और मांसाहारी खाद्य पदार्थ हिंदू धर्म के कई धार्मिक संस्कारों का हिस्सा हैं। त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय से लेकर कई पत्रकारों, कंटेट क्रियेटरों, समाज के विभिन्न वर्गों के व्यक्तियों, जिनमें स्वयं को &#8220;बंगाली हिन्दू राष्ट्रवादी&#8221; कहने वाले भी शामिल हैं, ने इसके प्रति विरोध प्रदर्शित किया। &#8220;बंगालियों को यह न बताया जाए कि वे दुर्गा पूजा कैसे मनाएं&#8221; कोलकाता की कंटेट क्रियेटर श्रेयसी विश्वास बैनर्जी ने फेसबुक पर लिखा। उन्होंने एक वीडियो भी अटैच किया जिसमें उन्होंने कहा कि एक &#8216;बाहरी व्यक्ति&#8217; विशिष्ट बंगाली धार्मिक और पाक परंपराओं के कायदे निर्धारित कर रहा है। कई लोगों ने शास्त्री के पोस्टरों को फाड़ा और विकृत किया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शुभेन्दु अधिकारी, जिन्होंने शास्त्री का बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया था, कोलकता के कालीघाट मंदिर में एक समारोह में शामिल हुए और प्रसाद के रूप में तली हुई मछली का सेवन किया। कई लोगों ने कहा कि मछली बंगाली संस्कृति का केन्द्रीय तत्व है। भारत सभी दृष्टियों से अत्यंत विविधतापूर्ण है चाहे वह खानपान हो, वेशभूषा हो, भाषा हो या धर्म। हिन्दुओं के कई पंथ हैं और कई तरह की खानपान की आदतें और परंपराएं हैं। मटन के व्यंजन कश्मीरी ब्राम्हणों की संस्कृति का अपरिहार्य भाग है। खानपान की आदतें कई कारकों से निर्धारित होती हैं। भौगोलिक स्थिति उसका एक महत्वपूर्ण आधार होता है। तटीय क्षेत्रों में समुद्री भोजन आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हाल में संपन्न हुए ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए रात्रिभोज में केवल शाकाहारी भोजन परोसा गया। संयोगवश शी जिनपिंग इस भोज में शामिल नहीं हुए, इसकी वजह चाहे जो भी रही हो। जहां विपक्ष ने अंतर्राष्ट्रीय अतिथियों के लिए केवल शाकाहारी भोजन उपलब्ध कराने की आलोचना की वहीं किरन रिजुजू ने इसका बचाव करते हुए कहा कि अतिथियों ने मेनू की तारीफ की। इससे सरकार का यह नजरिया भी जाहिर होता है कि भारत केवल शाकाहारी व्यंजनों वाला देश है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल में राज्य के सभी जिलों के मुख्य व्यंजनों का एक मानचित्र प्रकाशित करवाया। इसमें लखनऊ के टुंडे कबाब का जिक्र नहीं था और केवल शाकाहारी व्यंजनों को सम्मिलित किया गया था, मानो उत्तरप्रदेश पूरी तरह शाकाहारी हो।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक अन्य घटनाक्रम में 14 मुसलमानों को केवल इसलिए नजरबंद कर दिया गया क्योंकि वे गंगा नदी में नौका विहार करते हुए रोजा अफ्तार के दौरान चिकन बिरयानी खा रहे थे। इस घटना का एक दिलचस्प पहलू यह है कि उसी समय वहां नौका विहार कर रहे उन हिन्दुओं के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई जो शराब पी रहे थे। यह है भाजपा सरकारों के हाल।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह जानते हुए भी कि लगभग 70 प्रतिशत भारतीय मांसाहारी हैं, भाजपा सरकारों द्वारा शाकाहार को बढावा दिया जा रहा है। यह अभियान कई स्थानों पर सफल भी हुआ है। गुजरात में, जहां पिछले तीन दशकों से भाजपा की सरकार है, मांसाहारी व्यंजन बेचने वाली दुकानें और रेस्टोरेंट लगभग गायब हो गए हैं। कई लोग गुजरात की सीमा के बाहर के निकटवर्ती स्थानों पर जाकर मांसाहार की अपनी इच्छा पूरी करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भाजपा की दुविधा यह है कि वह भारतीयों की प्रचलित खानपान की आदतों और अपने शाकाहार लादने के एजेंडे के बीच संतुलन कैसे कायम करे। हर संभव अवसर पर वह और उसके सहयोगी संगठन शाकाहार को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं। किसी वजह से भाजपा मांसाहार को मुसलमानों से जोड़ती है। जबकि मांसाहार धर्म की सीमाओं के परे भारतीयों की खानपान की आदतों का अभिन्न अंग है। गुजरात जैसी जगहों पर तो उसका यह आक्रामक शाकाहारवाद चल जाता है, लेकिन पश्चिम बंगाल में उसे कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। शास्त्री और उनके जैसे अन्य बाबा, जो पिछले कुछ दशकों में बड़ी संख्या में ऊग आए हैं, भी आरएसएस-भाजपा की इस राजनीति के झंडाबरदार बने हुए हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शास्त्री इसी दिशा में प्रयासरत थे और उनकी कोशिश एक विशिष्ट प्रकार की खानपान की आदतों को बढ़ावा देने की थी। मानव समाज विभिन्न चरणों में विकसित हुआ है और खानपान की आदतें अत्यंत विविधतापूर्ण रही हैं। भाजपा-आरएसएस और उनके राजनैतिक-सांस्कृतिक समर्थकों का शाकाहार का महिमामंडन करना विचाधारात्मक वजहों से है। वीगनवाद या शाकाहार को बढ़ावा देने की अन्य वजहें भी हो सकती हैं, किंतु लोगों की खानपान की आदतों का सम्मान करना एक लोकतांत्रिक समाज का अभिन्न अंग होना चाहिए। इस बाबा को मांसाहार पर प्रतिबंध लगाने की वकालत करने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। हो सकता है कि भाजपा कुछ अन्य तरीके अपनाकर अपने शाकाहारवाद पर टिके रहने की कोशिश करे जो &#8216;मुसलमानों से नफरत&#8217; के उसके एजेंडे को आगे बढ़ाने में मददगार हो!</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong> (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया )</strong></p>



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<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-public-distressed-due-to-politics-over-indias-food-culture/">डाॅ. राम पुनियानी का लेख: भारत की भोजन संस्कृति पर हो रही राजनीति से जनता त्रस्त</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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