<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</title>
	<atom:link href="https://adahanpatrika.com/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://adahanpatrika.com/</link>
	<description>साहित्य, विचार और जन आंदोलन</description>
	<lastBuildDate>Fri, 10 Jul 2026 06:47:36 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=6.9.4</generator>

<image>
	<url>https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/cropped-WhatsApp-Image-2026-06-04-at-18.28.09-32x32.jpeg</url>
	<title>Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</title>
	<link>https://adahanpatrika.com/</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>श्रवण गर्ग का लेख &#8211; संजय सिंह को कौन बताए कि मोदी जी ‘निर्मम क्यों है ?’</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-the-full-article-by-renowned-journalist-shrawan-garg-who-will-tell-sanjay-singh-why-modi-ji-is-ruthless-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Jul 2026 06:47:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[#abhijeetdipke]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#cjp]]></category>
		<category><![CDATA[#cjp protest]]></category>
		<category><![CDATA[#delhi]]></category>
		<category><![CDATA[#hunger strika]]></category>
		<category><![CDATA[#jantar-mantar]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#ravikant]]></category>
		<category><![CDATA[#roshni rawat]]></category>
		<category><![CDATA[#shravan garg]]></category>
		<category><![CDATA[#sonam wangchuk]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=481</guid>

					<description><![CDATA[<p>पत्रकार श्रवण गर्ग &#8216;मोदीजी अगर सभी असंतुष्ट लोगों की बात सुनने लग गए होते और हर बात का जवाब देने बैठ जाते तो फिर बारह सालों के दौरान लगभग सौ देशों की इतनी निश्चिंतता से यात्राएँ कर ढेर सारे अवॉर्ड्स प्राप्त करना तो बहुत दूर,एक दिन के लिए भूटान तक भी नहीं जा पाते !&#8217; &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-the-full-article-by-renowned-journalist-shrawan-garg-who-will-tell-sanjay-singh-why-modi-ji-is-ruthless-on-adahan-patrika/">श्रवण गर्ग का लेख &#8211; संजय सिंह को कौन बताए कि मोदी जी ‘निर्मम क्यों है ?’</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="450" height="450" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg" alt="पत्रकार श्रवण गर्ग" class="wp-image-413" style="width:149px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg 450w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-300x300.jpg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-150x150.jpg 150w" sizes="(max-width: 450px) 100vw, 450px" /><figcaption class="wp-element-caption">पत्रकार श्रवण गर्ग</figcaption></figure>
</div>


<p><strong>&#8216;मोदीजी अगर सभी असंतुष्ट लोगों की बात सुनने लग गए होते और हर बात का जवाब देने बैठ जाते तो फिर बारह सालों के दौरान लगभग सौ देशों की इतनी निश्चिंतता से यात्राएँ कर ढेर सारे अवॉर्ड्स प्राप्त करना तो बहुत दूर,एक दिन के लिए भूटान तक भी नहीं जा पाते !&#8217; पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>सोनम वांगचुक को किसी भी तरह मनाया जाना चाहिए या कोई सम्मानपूर्ण रास्ता खोजा जाए जिससे कि वे अपना आमरण अनशन ख़त्म कर दें। खोजे जाने वाले उपायों में एक यह भी हो सकता है कि अण्णा हजारे को दिल्ली लाकर उनसे अपील करवाई जाए।</p>



<p>ऐसा लगता है आमरण अनशन पर बैठने से पहले वांगचुक ने अरविंद केजरीवाल से एक्सपर्ट ओपिनियन नहीं ली थी अन्यथा आम आदमी पार्टी के ‘चतुर’ (नेता) ‘थ्री इडिअट्स’ के प्रेरणा पुरुष को मोदी के सामने इतनी बड़ी जोखिम उठाने की कभी सलाह नहीं देते।</p>



<p>अण्णा हजारे के और सब योगदानों को छोड़ दें तब भी अपनी बात मनवाने के लिए गांधीजी के जिस अंतिम हथियार का उन्होंने प्रथम शास्त्र के तौर पर हमेशा सफलतापूर्वक दुरुपयोग किया वह बात-बात पर आमरण अनशन पर बैठ जाना ही रहा ! पर वह ज़माना डॉ मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री की मानवीय हुकूमत का था।</p>



<p>मनमोहन सिंह सरकार द्वारा हजारे के ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन के दौरान दल के दल बनाकर बातचीत के लिए रामलीला मैदान भेजे जाते रहे।सारी शर्तें मान ली गईं।आंदोलन ख़त्म करवा कर अण्णा को महान नेता बनवा दिया गया । नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्ता में आने के बादसे अण्णा रालेगण सिद्धि में ही स्थिर हैं।</p>



<p>वांगचुक अपने इस पूर्व अनुभव के बाद भी अनशन पर बैठ गए कि इसी हुकूमत ने उन्हें एनएसए के तहत 170 दिनों तक तपती गर्मी में जोधपुर की जेल के एकांतवास में बंद रखने के बाद इसी साल रिहा किया था।स्टेन स्वामी हों या उमर ख़ालिद किसी भी तरह के प्रतिरोध के लिये मोदीजी के लोकतंत्र में गुंजाइश नहीं है।</p>



<p>‘आम आदमी पार्टी’ के सांसद संजय सिंह ने सोशल मीडिया X पर प्रधानमंत्री से सवाल किया है कि वांगचुक के अनशन के मुद्दे पर वे आख़िर चुप क्यों हैं ? “ सोचकर तकलीफ़ होती है मोदीजी, आप इतने निर्मम कैसे हो सकते हैं ? सोनम वांगचुक जैसे पढ़े-लिखे शख़्स पेपर लीक के ख़िलाफ़ अनशन पर बैठे हैं। उनका वजन सात किलो घट चुका है।मोदीजी को तो उनकी बात सुनने की फुर्सत नहीं है,’ संजय सिंह कहते हैं !</p>



<p>मोदीजी अगर सभी असंतुष्ट लोगों की बात सुनने लग गए होते और हर बात का जवाब देने बैठ जाते तो फिर बारह सालों के दौरान लगभग सौ देशों की इतनी निश्चिंतता से यात्राएँ कर ढेर सारे अवॉर्ड्स प्राप्त करना तो बहुत दूर,एक दिन के लिए भूटान तक भी नहीं जा पाते ! मोदीजी अगर वांगचुक के अनशन पर चुप्पी तोड़ दें तो संजय सिंह उनसे फिर राममंदिर के चंदे-चढ़ावे का हिसाब पूछने लगेंगे !</p>



<p>संजय सिंह ने पूछा है कि मोदीजी इतने निर्मम कैसे हो सकते हैं ? संजय सिंह शायद भूल गए हैं कि केजरीवाल सरकार की आबकारी नीति के मामले में ED ने उन्हें अक्टूबर 2023 में गिरफ़्तार कर छह महीने तक जेल में बंद रखा था। सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिलने के बाद ही 2024 में वे रिहा हुए थे।</p>



<p>मोदीजी जिस तरह से सरकार चलाना चाहते हैं उसमें उनका निर्मम होना या नज़र आना ज़रूरी हो गया है। तीन काले कृषि क़ानूनों के विरोध में नवंबर 2020 से दिसंबर 2021 तक चले किसान आंदोलन में 750 प्रदर्शनकारियों की मौतें हुईं थीं। क्या मोदीजी की तरफ़ से कभी कोई खेद व्यक्त किया गया ?</p>



<p>मोदीजी ने माफ़ी इस बात को लेकर अवश्य माँगी थी कि क़ानूनों की सच्चाई को पूरी तरह से समझा पाने की उनकी तपस्या में शायद कोई कमी रह गई ! संजय सिंह को पता है कि सांसदों के सदन से निलंबन के बाद क़ानून किस तरह से राज्य सभा में पास करवाए गए थे !</p>



<p>मोदी सरकार को किसी की भी कोई बात सुनने की फ़ुरसत नहीं है ! बीजेपी के पितृ संगठन आरएसएस की बात भी नहीं ! पार्टी के उन बुजुर्ग नेताओं की भी नहीं जिन्होंने बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए आहुतियाँ दीं थी और अब किसी अज्ञात ‘मार्गदर्शन मंडल’ में साँसें गिन रहे हैं।</p>



<p>वांगचुक को अगर कुछ हो गया तो अभिजीत दीपके की’ कॉकरोच जनता पार्टी’ के करोड़ों सोशल मीडिया फ़ॉलोअर्स पूरी तरह डीमोरेलाइज़्ड हो जाएँगे ! हुकूमत सारे ही जन-आंदोलनों को बिना सरकारी हस्तक्षेप के हतोत्साहित और निराश होते देखना चाहती है।अतः वांगचुक के आमरण अनशन को अगर जारी रहने दिया जाता है तो उसे सरकार की मदद करने जैसा ही माना जाना जाएगा।</p>



<p>संजय सिंह और अन्य विपक्षी नेता अगर वांगचुक के गिरते स्वास्थ्य को लेकर ईमानदारी से चिंतित हैं तो उन्हें लद्दाखी नेता के आमरण अनशन को तुरंत समाप्त करवाना चाहिए ! मोदीजी के उत्तर की प्रत्याशा में वांगचुक का अनशन जारी रखना भी एक तरह की निर्ममता ही होगी !</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-the-full-article-by-renowned-journalist-shrawan-garg-who-will-tell-sanjay-singh-why-modi-ji-is-ruthless-on-adahan-patrika/">श्रवण गर्ग का लेख &#8211; संजय सिंह को कौन बताए कि मोदी जी ‘निर्मम क्यों है ?’</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>रमेश जोशी का व्यंग्य- हनुमान जी का दल-बदल</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/ramesh-joshis-satire-hanuman-jis-party-switch-read-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Jul 2026 13:42:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यंग्य]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#hanuman]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#political satire]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#ramesh joshi]]></category>
		<category><![CDATA[#ravikant]]></category>
		<category><![CDATA[#road show bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#roshni rawat]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<category><![CDATA[#sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#satire comedy]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=478</guid>

					<description><![CDATA[<p>लेखक- रमेश जोशी &#8216;यह हमारा आंतरिक मामला है जैसे राम मंदिर की चोरी । हमारे राम, हमारा मंदिर, हम कुछ भी करें । कांग्रेस, राम मंदिर में दर्शन के लिए अभी तक नहीं गए लोग और जिन्होंने राम मंदिर के लिए कोई चंदा नहीं दिया उन्हें कुछ भी बोलने का कोई अधिकार नहीं है । &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/ramesh-joshis-satire-hanuman-jis-party-switch-read-on-adahan-patrika/">रमेश जोशी का व्यंग्य- हनुमान जी का दल-बदल</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full"><img decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="लेखक- रमेश जोशी" class="wp-image-461"/><figcaption class="wp-element-caption">लेखक- रमेश जोशी</figcaption></figure>
</div>


<p><strong>&#8216;यह हमारा आंतरिक मामला है जैसे राम मंदिर की चोरी । हमारे राम, हमारा मंदिर, हम कुछ भी करें । कांग्रेस, राम मंदिर में दर्शन के लिए अभी तक नहीं गए लोग और जिन्होंने राम मंदिर के लिए कोई चंदा नहीं दिया उन्हें कुछ भी बोलने का कोई अधिकार नहीं है । हम हनुमान को नचाएं या राम को स्कूल जाने की उम्र में गर्भगृह में बैठा दें हमारी मर्जी ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230;</strong></p>



<p>जैसे कोई ट्रेवलिंग सेल्समैन छह दिन घूमघाम कर एक दिन के लिए घर आता है और फिर सूटकेस जमाकर निकल लेता है या जैसे मोदी जी 27 से 29 जून तक सशेल्स की ‘सम्मान समेट यात्रा’ से लौटे, सम्मान को सुरक्षित काँच की अलमारी में सजाया और फिर 6 जुलाई को केश सज्जा करवाकर, नए कपड़े लेकर, सम्मान समेटने के लिए इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया की यात्रा पर निकल गए वैसे ही तोताराम सुबह चाय पीकर गया था और लांच खाकर, दोपहर थोड़ा आराम करके फिर चार बजे आ धमका ।</p>



<p>हमने कहा- मोदी जी ने तो सेवा के लिए घर परिवार छोड़ दिया । 20-20 घंटे रोज देश की सेवा के साथ साथ विश्वगुरु की जिम्मेदारी संभालने के लिए भागे फिरते हैं लेकिन तू घर पर क्यों नहीं टिकता ?</p>



<p>बोला- मैं चाय पीने नहीं आया हूँ । आज मंगलवार है । देश दुनिया में भूतपिशाच बहुत उपद्रव मचा रहे हैं सो चल जयपुर रोड़ तक चलते हैं । घूमना भी हो जाएगा और हनुमान जी के दर्शन भी ।</p>



<p>हमने कहा- तो क्या लौट आये ?</p>



<p>बोला- कौन ? मोदी जी तो 11-12 जुलाई को लौटेंगे । फिर कहाँ का कार्यक्रम है मुझे पता नहीं । और हनुमान जी के कहीं जाने का सवाल नहीं उठता ।</p>



<p>हमने कहा- क्या पता, हमने तो कल एक वीडियो देखा था जिसमें हनुमान जी लखनऊ में भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के रोड शो में नाच रहे थे लेकिन अभी तक न तो किसी संस्कारी हिन्दू की भावना आहत हुई और न ही कहीं कोई एफ आई आर हुई ।</p>



<p>बोला- यह हमारा आंतरिक मामला है जैसे राम मंदिर की चोरी । हमारे राम, हमारा मंदिर, हम कुछ भी करें । कांग्रेस, राम मंदिर में दर्शन के लिए अभी तक नहीं गए लोग और जिन्होंने राम मंदिर के लिए कोई चंदा नहीं दिया उन्हें कुछ भी बोलने का कोई अधिकार नहीं है । हम हनुमान को नचाएं या राम को स्कूल जाने की उम्र में गर्भगृह में बैठा दें हमारी मर्जी । हाँ, अगर कोई अन्य पार्टी या धर्म का व्यक्ति ऐसा कुकर्म करता तो दिखाते कि धर्म, भावना और सत्ता की ताकत क्या होती है ।</p>



<p>हमने कहा- ठीक है । लेकिन जब हनुमान जी आउट ऑफ स्टेशन हैं तो चल कर क्या करेंगे ।</p>



<p>बोला- वे हनुमान जी थोड़े थे । उनके हाथ में राम का ध्वज थोड़े था । उनके हाथ में भाजपा का झण्डा था जिस पर कमल का निशान साफ दिखाई दे रहा था । हो सकता है कोई संस्कारी और धार्मिक कार्यकर्ता हो जो यूपी के अगले चुनाव में टिकट पाने के लिए यह नाटक कर रहा हो ।</p>



<p>हमने कहा- भले ही हम किसी संस्कारी संस्था के स्वयंसेवक नहीं हैं लेकिन राम के निस्वार्थ सेवक, पराक्रमी और सामान्य लोगों के लिए सहज सुलभ रहने वाले हनुमान जी का बहुत आदर करते हैं । अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए उनका वेश धारण करना हमें बहुत बुरा लगता है । अगर पार्टी में स्थान बनाना हो तो हनुमान बनने की जगह गाँधी नेहरू परिवार को गाली निकाल सकता था, किसी मस्जिद पर भगवा झंडा फहरा सकता था, किसी मुसलमान के फ्रिज में गौ मांस ढूंढ सकता था, किसी मस्जिद के आगे सुंदरकांड का पाठ कर सकता था, किसी तृणमूल वाले सांसद पर अंडे फेंक सकता था ।</p>



<p>बोला- चल, मंदिर तो चलते हैं । पक्का मान अपने जयपुर रोड़ वाले हनुमान जी यथास्थान मिलेंगे । यह होगा कोई लखनऊ कानपुर का कार्यकर्ता ।</p>



<p>हमने कहा- तोताराम, यह भी हो सकता है कि ये असली हनुमान जी ही हों । अयोध्या में अपनी चौकीदारी के बावजूद ट्रस्ट के चंदा गिनती करने वाले अनट्रस्टवर्दी लोगों के कुकर्मों से दुखी होकर हमेशा के कहीं हिमालय में जा रहे हों । या उन्हें डर हो कि बचने का कोई रास्ता न देखकर ट्रस्ट वाले कहीं इन्हें ही न फँसा दें कि हनुमान जी से पूछो । यहाँ की सुरक्षा की जिम्मेदारी इन्हीं की है । या यह डर रहा हो कि कहीं कोई उनकी गदा ही न गायब कर दे । दुष्टता पर उतरे आदमी का कोई ठिकाना नहीं । गदा के बिना उनसे कौन डरेगा जैसे यूएपीए, कोर्ट और ईडी के बिना सरकार से ।</p>



<p></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/ramesh-joshis-satire-hanuman-jis-party-switch-read-on-adahan-patrika/">रमेश जोशी का व्यंग्य- हनुमान जी का दल-बदल</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>रमेश जोशी का व्यंग्य- हड़बड़ी में गड़बड़ी</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-ramesh-joshis-complete-political-satire-hurry-creates-mess-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Jul 2026 15:03:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यंग्य]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#political satire]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#ramesh joshi]]></category>
		<category><![CDATA[#ravikant]]></category>
		<category><![CDATA[#sahitya]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=475</guid>

					<description><![CDATA[<p>लेखक- रमेश जोशी &#8216;शेक्सपीयर कहते हैं नाम में क्या रखा है । सम्मान तो सम्मान है । मोदी जी ट्रम्प को ‘डोलांड’ कहते हैं और वह इन्हें ‘मोडी’ कहता है जो कि सही नहीं है लेकिन प्रेम में कोई कमी हो तो बता ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230; हमने कहा- तोताराम, जल्दी का &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-ramesh-joshis-complete-political-satire-hurry-creates-mess-on-adahan-patrika/">रमेश जोशी का व्यंग्य- हड़बड़ी में गड़बड़ी</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p></p>


<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full"><img decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="लेखक- रमेश जोशी" class="wp-image-461"/><figcaption class="wp-element-caption">लेखक- रमेश जोशी</figcaption></figure>
</div>


<p><strong>&#8216;शेक्सपीयर कहते हैं नाम में क्या रखा है । सम्मान तो सम्मान है । मोदी जी ट्रम्प को ‘डोलांड’ कहते हैं और वह इन्हें ‘मोडी’ कहता है जो कि सही नहीं है लेकिन प्रेम में कोई कमी हो तो बता ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230;</strong></p>



<p>हमने कहा- तोताराम, जल्दी का काम शैतान का ।</p>



<p>बोला- मतलब ?</p>



<p>हमने कहा- झूठ नहीं कहा है कि सहज पके सो मीठा होय लेकिन जिसे अपने कर्मों पर विश्वास नहीं होता और जो ईवेंट मनेजमेंट के सहारे अपनी इमेज बनाता है वह जल्दी करता है और उसी चक्कर में  भद्द पिटवाता है ।</p>



<p>बोला- यह, वह, जो, उस आदि में लपेट कर बात मत कर । साफ साफ बता ।</p>



<p>हमने कहा- जैसे चुनावी लाभ लेने के लिए शिखर के बिना ही प्राणप्रतिष्ठा कर दी गई तो राम मंदिर का गर्भगृह टपकने लगा कि नहीं ? 400 पार वाले 240 पर अटक गए और जिस राम के राज में-</p>



<p>बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।</p>



<p>मांगें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥</p>



<p>इस दोहे अर्थ है कि राम जी के राज में चंद्रदेव अपनी अमृतमयी किरणों से पृथ्वी को परिपूर्ण रखते हैं। सूर्य देव केवल उतनी ही गर्मी देते हैं, जितनी वर्षा या अन्य कार्यों के लिए आवश्यक होती है। बादल भी ऐसे हैं जो केवल मांगने पर और आवश्यकता के अनुसार ही जल बरसाते हैं, अर्थात वहां अतिवृष्टि या अनावृष्टि जैसी कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है।</p>



<p>लेकिन आज कट्टरता की राजनीति तथा मूर्खता और स्वार्थपूर्ण विकास के कारण स्थिति यह हो गई है कि गरमी भयंकर और दूर दूर तक बरसात नहीं । अल्पवृष्टि का खतरा मंडरा रहा है । जहाँ तहाँ सड़कें और पुल टूट रहे हैं । इतनी सुरक्षा और संस्कारी लोगों के ट्रस्ट, व्यवस्था में होते हुए राम लला की पादुकाएं चोरी हो गईं । और बुलडोज़र चलेगा 100 मीटर का प्लॉट खरीदने वाले लवकुश पर । हो सकता है कल को यह सिद्ध कर दिया जाए कि चोरी-वोरी कुछ नहीं हुई है बल्कि राम लला के बेटों लव कुश ने सुरक्षा की दृष्टि से सामान एक बैंक लाकर में रखवा दिया था ।</p>



<p>हड़बड़ी का एक और ताज़ा उदाहरण देख ले । 1400 करोड़ की सहायता के बदले एक सम्मान लिया उसमें भी तीन गलतियाँ ।</p>



<p>बोला- तू यहाँ बरामदे में बैठा नितंबों से सुपारी फोड़ता रहता है । देश दुनिया को संभालना पड़े तो पता चले । जहाँ 240 पर अटकने की बात है तो राम के चढ़ावे और चंदे के बल पर पंजाब, बंगाल और महाराष्ट्र में खरीद-फरोख्त करके 400 पार भी हो जाएंगे ।</p>



<p>हमने कहा- तो फिर पीयूष गोयल को नंबर बढ़वाने के लिए सम्मान का ड्राफ्ट फाइनल होने से पहले ही इसे अपने ट्विटर पर डालने की क्या जरूरत थी ? चल, एक और उदाहरण देते हैं । 2018 में पटेल की मूर्ति के उद्घाटन के विज्ञापन में 8-10 गलतियाँ थीं । और नया उदाहरण ओडिशा की स्कूली पाठ्य पुस्तकों का जिनमें कई हजार गलतियाँ है ।</p>



<p>बोला- ये छोटी-मोटी बातें हैं । शेक्सपीयर कहते हैं नाम में क्या रखा है । सम्मान तो सम्मान है । मोदी जी ट्रम्प को ‘डोलांड’ कहते हैं और वह इन्हें ‘मोडी’ कहता है जो कि सही नहीं है लेकिन प्रेम में कोई कमी हो तो बता ।विदुर की पत्नी कृष्ण को देखकर इतनी भावविह्वल हो गई कि केलों की गिरी नीचे गिराकर कृष्ण को केले के छिलके खिलाती रही । रीतिकाल के कवि बिहारीलाल ने नायिका की अत्यधिक उत्सुकता बड़ा ही मनोवैज्ञानिक और सुंदर चित्रण किया है जो नायक के आने का समाचार सुनकर इतनी हड़बड़ी में होती है कि पैरों में लगाने वाला महावर आँखों में और आँखों में लगाने वाला काजल पैरों में लगा लेती है।</p>



<p>बिहारी का वह दोहा इस प्रकार है:</p>



<p>काजरु दै अँखियान में, रह्यो महावरु भाल।</p>



<p>तिय-उतावली आँगने, करी अनूपम चाल॥</p>



<p></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-ramesh-joshis-complete-political-satire-hurry-creates-mess-on-adahan-patrika/">रमेश जोशी का व्यंग्य- हड़बड़ी में गड़बड़ी</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>क्या धार्मिक आस्थाओं का राजनीतिक अस्थि संचय हो रहा है ? -श्रवण गर्ग</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/are-religious-beliefs-being-turned-into-a-political-bone-bank-read-senior-journalist-shravan-gargs-full-article-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Jul 2026 14:29:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#champatrai]]></category>
		<category><![CDATA[#chandachori]]></category>
		<category><![CDATA[#latest]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#ramandir]]></category>
		<category><![CDATA[#ravikant]]></category>
		<category><![CDATA[#roshni rawat]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<category><![CDATA[#shravan garg]]></category>
		<category><![CDATA[#UPNews]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=470</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;नागरिक क्यों आश्वस्त होना चाहते हैं कि कथित तौर पर जो एक राजनीतिक आपातकाल देश में पहले से ही उपस्थित है उसके अलावा यह कोई नया धार्मिक आपदाकाल तो नहीं है ? एक ऐसा आपदाकाल जिसमें धार्मिक आस्थाएँ संदेहों की अस्थियों में परिवर्तित होकर कोविडकाल की तरह व्यवस्था की नदियों में तैर रही हैं !&#8217; &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/are-religious-beliefs-being-turned-into-a-political-bone-bank-read-senior-journalist-shravan-gargs-full-article-on-adahan-patrika/">क्या धार्मिक आस्थाओं का राजनीतिक अस्थि संचय हो रहा है ? -श्रवण गर्ग</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>&#8216;नागरिक क्यों आश्वस्त होना चाहते हैं कि कथित तौर पर जो एक राजनीतिक आपातकाल देश में पहले से ही उपस्थित है उसके अलावा यह कोई नया धार्मिक आपदाकाल तो नहीं है ? एक ऐसा आपदाकाल जिसमें धार्मिक आस्थाएँ संदेहों की अस्थियों में परिवर्तित होकर कोविडकाल की तरह व्यवस्था की नदियों में तैर रही हैं !&#8217; पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img decoding="async" width="450" height="450" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg" alt="पत्रकार श्रवण गर्ग" class="wp-image-413" style="width:185px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg 450w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-300x300.jpg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-150x150.jpg 150w" sizes="(max-width: 450px) 100vw, 450px" /><figcaption class="wp-element-caption">पत्रकार श्रवण गर्ग</figcaption></figure>
</div>


<p>जनता इतने आत्मविश्वास के साथ क्यों दावा कर रही है कि रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में हुए चंदे-चढ़ावे के घोटाले में कुछ भी नहीं होगा या कुछ निकलेगा ? असली दोषियों के न कभी नाम बाहर आएँगे और न उनका बाल कोई बाँका होगा ? घोटाले की जाँच के लिए बनाए गए विशेष जाँच दल द्वारा कोई सनसनीख़ेज़ रहस्योद्घाटन भी नहीं होगा। दल का कार्यकाल वैसे भी 15 जुलाई तक बढ़ गया है। मुमकिन है जाँच का दायरा बढ़ाकर कार्यकाल फिर से बढ़ा दिया जाए।</p>



<p>चंपतराय के विकल्प की तलाश प्रारंभ हो चुकी है। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरि अब कह रहे हैं कि वे कोषाध्यक्ष तो थे लेकिन उनकी कोई भूमिका ही नहीं थी। किसी भी काम में उनका कोई दखल नहीं था।</p>



<p>श्रद्धालुओं के बीच इस तरह की बातें क्यों हैं कि घोटाले का इस समय बाहर आना किसी बड़ी राजनीतिक कार्ययोजना का हिस्सा भी हो सकता है जिसके कि तार यूपी में अगले साल होने वाले महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से जुड़े हों ?</p>



<p>नागरिकों के बीच ऐसा डर क्यों है कि लगभग पच्चीस करोड़ की आबादी वाले देश के सबसे बड़े राज्य में चुनावों के पहले ख़ौफ़ का साम्राज्य क़ायम हो रहा है ?</p>



<p>नागरिक क्यों सवाल कर रहे हैं कि मंदिर-निर्माण के लिए भूमि-पूजन से लेकर उसके भव्य उद्घाटन-समारोह तक आकर्षण का केंद्र बने रहे दोनों प्रमुख यजमान करोड़ों हिन्दू भक्तों की धार्मिक आस्थाओं के साथ हुए आघात के प्रति बिलकुल भी विचलित नहीं दिखाई पड़ रहे हैं ? प्रधानमंत्री विदेशों के और संघ-प्रमुख देश में भ्रमण कर रहे हैं, प्रेरक उद्बोधन वितरित कर रहे हैं !</p>



<p>नागरिक क्यों आश्वस्त होना चाहते हैं कि कथित तौर पर जो एक राजनीतिक आपातकाल देश में पहले से ही उपस्थित है उसके अलावा यह कोई नया धार्मिक आपदाकाल तो नहीं है ? एक ऐसा आपदाकाल जिसमें धार्मिक आस्थाएँ संदेहों की अस्थियों में परिवर्तित होकर कोविडकाल की तरह व्यवस्था की नदियों में तैर रही हैं !</p>



<p>ऐसा इसलिए कि जब कभी व्यवस्थाएँ किसी बड़े राजनीतिक अथवा नैतिक संकट से मुखातिब होती हैं कोई नई आपदा आस्थाओं की भीड़ के बीच किसी साँप के बच्चे की तरह अचानक से प्रकट हो जाती है ! इसके कारण मचने वाली भगदड़ में आस्थाएँ तो श्वासहीन शरीरों में तब्दील होने लगती हैं,साँप का बच्चा सुरक्षित ग़ायब हो जाता है !</p>



<p>स्मरण किया जाए तो यक़ीन करना मुश्किल हो जाएगा कि कोविडकाल के दौरान असीमित कष्ट भुगत रहे नागरिकों के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कभी ऐसा कहा होगा : ‘ जब वे अपने भाई-बहनों की तरफ़ देखते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि वे (भाई-बहन) सोच रहे होंगे कि ये कैसा प्रधानमंत्री है जिसने हमें इतनी कठिनाइयों में डाल दिया है !’</p>



<p>नागरिक डरे हुए हैं कि कोविडकाल के दौरान उनकी आस्थाओं के साथ किए गए प्रयोगों को कहीं सरकार ने आपदाओं से निपटने के किसी स्थाई रोल मॉडल में तो नहीं परिवर्तित कर दिया गया है ! खाड़ी युद्ध से उत्पन्न संकट पर संसद में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने चार महीने पूर्व ही कहा था कि :’ पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण भारत के सामने अभूतपूर्व चुनौतियाँ हैं और उनसे निपटने के लिए देश को कोविड संकट के समय की तरह एकजुट होकर तैयार रहना होगा।’</p>



<p>सवाल एक और भी है जो सबसे बड़ा है ! वह यह कि मोदी-भागवत के भारत में निर्मित हुए हिंदुत्व की आस्थाओं के सर्वोच्च तीर्थस्थल की पवित्रता ही अगर संदेहों के घेरे में सिमट रही है तो क्या इसे केदारनाथ की गुफा और विवेकानंद स्मारक पर किये गए तपों से अर्जित पुण्य के क्षीण होने की शुरुआत मान लेना चाहिए या फिर किसी नए ईश्वरीय चमत्कार की प्रतीक्षा करना चाहिए ?</p>



<p></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/are-religious-beliefs-being-turned-into-a-political-bone-bank-read-senior-journalist-shravan-gargs-full-article-on-adahan-patrika/">क्या धार्मिक आस्थाओं का राजनीतिक अस्थि संचय हो रहा है ? -श्रवण गर्ग</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>डॉ. राम पुनियानी का आलेख- सोमनाथ के लुटने से लेकर अयोध्या में ‘चंदा चोरी‘ तक</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-dr-ram-puniyanis-article-from-the-plundering-of-somnath-to-chanda-chori-in-ayodhya-in-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Jul 2026 08:00:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#dr ram puniyani]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#ram mandir]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=466</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;मंदिर को लूटा गया और घोटालेबाजों को न तो भगवन का कोई डर था और ना ही उनका धर्म से कोई लेनादेना था. इसका क्या असर होगा, यह तो आने वाले समय में ही पता लगेगा. सच तो यह है कि राममंदिर का पूरा आंदोलन मुख्यतः राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ही चलाया &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-dr-ram-puniyanis-article-from-the-plundering-of-somnath-to-chanda-chori-in-ayodhya-in-adahan-patrika/">डॉ. राम पुनियानी का आलेख- सोमनाथ के लुटने से लेकर अयोध्या में ‘चंदा चोरी‘ तक</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p></p>


<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-large is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="768" height="768" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png" alt="डा. राम पुनियानी" class="wp-image-468" style="width:260px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png 768w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-300x300.png 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-150x150.png 150w" sizes="(max-width: 768px) 100vw, 768px" /></figure>
</div>


<p><strong>&#8216;मंदिर को लूटा गया और घोटालेबाजों को न तो भगवन का कोई डर था और ना ही उनका धर्म से कोई लेनादेना था. इसका क्या असर होगा, यह तो आने वाले समय में ही पता लगेगा. सच तो यह है कि राममंदिर का पूरा आंदोलन मुख्यतः राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ही चलाया गया था. इससे भाजपा को सत्ता हासिल हुई&#8217; पढें सुप्रतिष्ठित इतिहासकार डॉ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p>इस समय पूरा देश अयोध्या के राममंदिर में चंदे की लूट से स्तब्ध है, सदमे में है. इस चंदा चोरी से पूरे देश को, और खासतौर से उन श्रद्धालुओं को गहरा धक्का लगा है जिन्होंने छोटी-सी राशि से लेकर बहुत बड़ी रकमें तक अपने आराध्य भगवान राम को अर्पित की थी. राममंदिर आंदोलन के दौरान बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया था. उसी ज़मीन पर इस मंदिर को बनाया गया है. राममंदिर आंदोलन से देश हिल गया था. भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवानी के नेतृत्व में रथयात्रा निकाली गई थी. इस आन्दोलन के पीछे भाजपा-आरएसएस का एजेंडा था अयोध्या में बाबरी मस्जिद के स्थान पर राममंदिर का निर्माण. इसके लिए यह कहानी गढ़ी गई कि पहले मुगल बादशाह बाबर ने अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थल पर बने राममंदिर को तोड़कर उसके मलबे पर अपने नाम पर एक मस्जिद बनवाई थी.</p>



<p>न्यायपालिका की मिलीभगत के चलते भाजपा-आरएसएस अपना लक्ष्य हासिल करने में सफल रहे. आन्दोलन के समानांतर चंदा जमा करने का काम बड़े पैमाने पर चल रहा था. बाबरी मस्जिद ढ़हाए जाने की घटना की जांच में लिब्रहान आयोग ने पाया था कि अन्य लोगों के अलावा आडवानी, मुरलीमनोहर जोशी और उमा भारती मस्जिद ढ़हाए जाने के दोषी हैं. यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में भी यह माना गया कि मस्जिद का ध्वंस एक जुर्म था. न्यायपालिका जाहिर तौर पर सत्ताधारियों के दबाव में थी और इसलिए मुजरिमों को पुरस्कार के रूप में मंदिर निर्माण के लिए वह पूरी जमीन दे दी गई जिस पर मस्जिद हुआ करती थी. इसके बाद शानदार मंदिर के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर पैसा मिलने लगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुहरी भूमिका अदा की- पहली राज्य के प्रधान की और दूसरी मंदिर के उद्घाटन समारोह में मुख्य यजमान कीं. कुल मिलाकर राम मंदिर से जुड़े सभी मामलों में अंतिम फैसला लेने वाले वे ही थे.</p>



<p>मंदिर के उद्घाटन के बाद पहली बारिश में ही निर्माण की गुणवत्ता की पोल खुल गई. छत से पानी रिसने लगा. इससे बाल्टी उद्योग को जबरदस्त बढ़ावा मिला. फर्श पर पानी जमा होने से बचाने के लिए ढेर सारी बाल्टियाँ रखी गईं. श्रद्धालुओं का जमघट लगने लगा. दान इकठ्ठा करने से जुड़ी सारी व्यवस्थाएं प्रधानमंत्री कार्यालय के नियंत्रण में थीं. कितने बड़े पैमाने पर दान आ रहा था, इसका अंदाज इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सिन्धी समुदाय के विश्व सिंधी समाज ने चांदी की लगभग 200 ईटें दान की थीं, जिनमें से हर एक का वजन एक किलो था. उन्हें इसकी कोई पावती नहीं दी गई. तरह-तरह की बहुत सी बहुमूल्य वस्तुएं मंदिर को दान में मिलीं. ट्रस्टियों द्वारा गबन की गई राशि 2000 से 3000 करोड़ रूपये के बीच बताई जा रही है.</p>



<p>कुल मिलाकार यह कहा जा सकता है कि मंदिर को लूटा गया और घोटालेबाजों को न तो भगवन का कोई डर था और ना ही उनका धर्म से कोई लेनादेना था. इसका क्या असर होगा, यह तो आने वाले समय में ही पता लगेगा. सच तो यह है कि राममंदिर का पूरा आंदोलन मुख्यतः राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ही चलाया गया था. इससे भाजपा को सत्ता हासिल हुई और मुसलमानों के प्रति नफरत फैलाकर उसने अपना राजनैतिक आधार बहुत मजबूत कर लिया. हमारे लोकतंत्र से बंधुत्व का भाव बहुत हद तक लुप्त हो गया और मुसलमानों के प्रति नफरत लगातार बढ़ती गई. हमें साम्राज्यों का वह दौर याद आता है जब राजा धन के लिए मंदिरों को लूटते थे. साम्राज्यवादी दौर में राजाओं द्वारा मंदिरों की लूट और वर्तमान अर्ध-लोकतांत्रिक समाज (जो निर्वाचित तानाशाही में तब्दील होता जा रहा है) में इसी तरह की लूट में क्या अंतर है? दौलत की हवस दोनों दौरों में एक जैसी है. लेकिन धर्म-आधारित ध्रुवीकरण राजाओं की नीति नहीं थी. वहीं वर्तमान लुटेरे, जो साम्प्रदायिक शक्तियों से जुड़े हुए हैं, का मुख्य एजेंडा ध्रुवीकरण ही है.</p>



<p>वैसे तो मंदिर और अन्य पवित्र स्थान कई अन्य राजाओं द्वारा भी नष्ट किए गए थे मगर दो प्रमुख उदाहरण याद आते हैं. पहला है 11वीं सदी के कश्मीर के राजा हर्षदेव का और दूसरा महमूद गजनी द्वारा सोमनाथ मंदिर को लूटने का. डी. डी. कोसंबी के अनुसार &#8220;कश्मीर के राजा हर्षदेव (1089-1101 ईस्वी), जो सातवीं शताब्दी के शासक हर्ष से अलग थे, ने अत्यंत व्यवस्थित ढंग से अपने साम्राज्य में धातु की सभी देव प्रतिमाओं (मात्र चार को छोड़कर) को गलवा दिया. यह काम इसके लिए विशेष रूप से नियुक्त देवोपतन नायक पदनाम वाले मंत्री के माध्यम से करवाया गया. असगर अली इंजीनियर बताते हैं &#8220;महमूद गजनवी के बारे में भी इतिहासवेत्ताओं ने केवल कुछ तथ्यों को सामने रखा है. हम इस बात को प्रमुखता देते हैं कि उसने सोमनाथ के मंदिर को लूटा और नष्ट किया. लेकिन हम इस तथ्य पर प्रकाश नहीं डालते कि उसने अपनी सेना और प्रशासन में हिंदुओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया. उसके हिंदू जनरलों में से तिलक, सोंधी, राय हिंद और हरजन आदि का जिक्र तारीख-ए-बैहाकी में है…उसके शासनकाल में जारी सिक्कों में संस्कृत में अभिलेख थे‘‘.</p>



<p>आज समाज में यह आम धारणा है कि मंदिरों को धार्मिक वजहों से नष्ट किया गया. यह धारणा अंग्रेजों द्वारा उनकी ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति के अंतर्गत किए गए साम्प्रदायिक इतिहासलेखन की वजह से बनी. महमूद गजनी ने सोमनाथ मंदिर को नष्ट करने के पहले वहां मौजूद चांदी और सोने की सभी मूर्तियों को अपने कब्जे में ले लिया जिनका कुल मूल्य सोने के बीस हजार दीनारों से अधिक रहा होगा, जो एक बहुत बड़ी रकम थी…. सुलतान इन मूर्तियों को देखकर अचंभित रह गया और उसने इन मूर्तियों और मंदिर के खजाने को जब्त करने का आदेश दिया. वहां चांदी और सोने की बहुत सी मूर्तियां थीं…मंदिर में मिली वस्तुओं का मूल्य बीस हजार दीनार से भी अधिक था‘‘.</p>



<p>रोमिला थापर लिखती हैं, &#8220;मंदिरो में भक्तों द्वारा दान की गई नकद राशि, सोने की मूर्तियों और गहनों के रूप में अपार संपदा थी और इसलिए वे स्वाभाविक तौर पर उत्तर भारत में दौलत तलाश रहे गैर-हिन्दुओं के निशाने पर थे. महमूद गज़नी सोने का बहुत लालची था…और सोमनाथ अपनी अथाह संपदा के लिए विख्यात था&#8221;. वे आगे लिखती हैं. ‘‘जब बात राजनैतिक लक्ष्य हासिल करने की हो तो धर्म से जुड़े मुद्दों का इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती‘‘. आम लोगों में मुसलमानों और महमूद गजनी का दानवीकरण करने में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के उपन्यास ‘जय सोमनाथ‘ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. उसमें घटनाओं को इस तरह प्रस्तुत किया गया जिससे यह धारणा बने कि मंदिरों को लूटने की वजह सिर्फ हिंदुओं का अपमान करना यानि धार्मिक थी.</p>



<p>हालांकि कई मुस्लिम राजाओं को मंदिर नष्ट करने का दोषी बताया जाता है लेकिन इस बात का बहुत कम जिक्र किया जाता है कि बहुत से मुस्लिम राजा हिंदू मंदिरों को दान देते थे. मुझे औरंगजेब द्वारा जारी उन फरमानों की प्रतियां दी गईं हैं जिनमें उत्तर भारत के विभिन्न स्थानों जैसे महाकालेश्वर (उज्जैन), बालाजी मंदिर (चित्रकूट) उमानंद मंदिर (गुवाहाटी), शत्रुंजय के जैन मंदिरों और अन्य कई प्रसिद्ध मंदिरों और गुरूद्वारो को दान दिए जाने का आदेश दिया गया है. ये फरमान इस्लामिक कैलेंडर के सन् 1065 (1659 ईस्वी) और 1095 (1685) के बीच जारी किए गए थे.&#8221; मंदिरों को नष्ट करने वाले गज़नी जैसे राजाओं और वर्तमान सत्ताधारियों के नियंत्रण वाले ट्रस्ट के बीच गजब की समानताएं नजर आ रही हैं.</p>



<p>&#8211;<strong>डॉ. राम पुनियानी </strong>, लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं. अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया.</p>



<p></p>



<p>(यह लेखक के निजी विचार हैं)</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-dr-ram-puniyanis-article-from-the-plundering-of-somnath-to-chanda-chori-in-ayodhya-in-adahan-patrika/">डॉ. राम पुनियानी का आलेख- सोमनाथ के लुटने से लेकर अयोध्या में ‘चंदा चोरी‘ तक</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>लघु कथा- भक्त की हवाई चप्पलें</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-author-ramesh-joshis-short-story-bhakt-ki-hawai-chappalein-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Jul 2026 07:04:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#hindishortstory]]></category>
		<category><![CDATA[#political]]></category>
		<category><![CDATA[#rameshjoshi]]></category>
		<category><![CDATA[#sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#shortstory]]></category>
		<category><![CDATA[#लघुकथा]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=460</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;किसी तरह राम की कृपा से भक्त का जीवन कट ही रहा था क्योंकि उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी । उसे न तो सोना खरीदना था, गाड़ी नहीं थी सो पेट्रोल डलवाने का चक्कर भी नहीं। विदेश यात्रा भी नहीं क्योंकि किसी देश का सर्वोच्च पुरस्कार भी नहीं मिलना था ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी की &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-author-ramesh-joshis-short-story-bhakt-ki-hawai-chappalein-on-adahan-patrika/">लघु कथा- भक्त की हवाई चप्पलें</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="" class="wp-image-461"/></figure>
</div>


<p><strong>&#8216;किसी तरह राम की कृपा से भक्त का जीवन कट ही रहा था क्योंकि उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी । उसे न तो सोना खरीदना था, गाड़ी नहीं थी सो पेट्रोल डलवाने का चक्कर भी नहीं। विदेश यात्रा भी नहीं क्योंकि किसी देश का सर्वोच्च पुरस्कार भी नहीं मिलना था ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी की पूरी लघु कथा&#8230;</strong></p>



<p>एक भक्त था । बहुत परेशान था । इतना परेशान कि कोई नीट का परीक्षार्थी भी पेपर लीक होने से नहीं हुआ होगा । 15 लाख और अच्छे दिन के जुमले पर आँख मींचकर वोट देने वाला भी इतना निराश नहीं हुआ होगा । उसे तो एक ही भरोसा, एक ही आस और एक ही विश्वास था । केवल राम का । जैसे अंधभक्तों को हर तीर्थ पर जाकर फ़ोटो शूट करवाने वाले अपने अजैविक नेता पर ।</p>



<p>भक्त रोज रामचरित का मास पारायण करता था । मंगलवार को एक टाइम खाना खाता था । हर बार भय लगने पर हनुमान चालीसा बाँचता था । उसे भूत पिशाच भगाने के लिए पुलिस से अधिक प्रभु पर विश्वास था । वह अपने मन की बात भी रेडियो पर नहीं बल्कि एकांत में प्रभु के साथ ही करता था । उसे विश्वास था कि भले ही अंतिम समय में ही सही लेकिन गजराज को मगरमच्छ से बचाने वाले भगवान विष्णु की तरह उसके आराध्य राम जरूर आएंगे ।</p>



<p>किसी तरह राम की कृपा से भक्त का जीवन कट ही रहा था क्योंकि उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी । उसे न तो सोना खरीदना था, गाड़ी नहीं थी सो पेट्रोल डलवाने का चक्कर भी नहीं। विदेश यात्रा भी नहीं क्योंकि किसी देश का सर्वोच्च पुरस्कार भी नहीं मिलना था । लेकिन आज उसका धैर्य चुक गया क्योंकि बड़ा बेटा बी ए करके पिछले दस वर्षों से प्रतियोगी परीक्षा देते देते ओवर एज हो गया ।इंसान से कॉकरोच बन गया । कल तो परीक्षा केंसिल होने के कारण एक विरोध प्रदर्शन में गया और पुलिस द्वारा अभिनंदित होकर टांग तुड़वाकर घर लौटा ।</p>



<p>भक्त तीर्थयात्रियों की भगदड़ में मरकर मोक्ष को प्राप्त करके ऊपर पहुँचा तो जाते ही अपने आराध्य पर बिफर पड़ा । बोला- प्रभु, मैं ही मूर्ख था जो आप पर विश्वास करके उल्लू बनता रहा । सब झूठ है कि आप अंत समय में ही सही भक्तों का उद्धार करने जरूर पहुंचते हैं । अजामिल को तो अपने बेटे नारायण का नाम लेने मात्र से ही कन्फ्यूज होकर आपके दूतों ने उसका उद्धार कर दिया । मैं आपको जाने कितनी बार पुकारता रहा लेकिन आप मणिपुर, युद्ध विराम, गाजा और ईरान में बच्चों के संहार की तरह चुप रहे । पुलिस भी चोरों के भाग जाने और अग्निशमन वाले सब कुछ राख हो जाने के बाद ही सही आ तो जाती है लेकिन आप …..?</p>



<p>राम भक्त की पीड़ा से द्रवित हुए और बोले- भक्त, मेरी मजबूरी समझो । मैं अब पहले की तरह स्वतंत्र नहीं हूँ । मुझे कुछ दुष्टों ने एक मंदिर में कैद कर रखा है । जनता के बीच तक नहीं जाने देते हैं । मैं तुम्हारी पुकार सुनकर आना चाहता था लेकिन क्या बताऊँ दुष्टों ने मेरी पादुकाएं ही चुरा लीं । और इतनी तेज धूप में नंगे पैर मेरे पैर जलने लगे थे । मुझे माफ करना भक्त ।</p>



<p>भक्त ने कहा- प्रभु, हवाई चप्पल वालों को हवाई यात्रा करवाने के वादे पर विश्वास करके खरीदी थी लेकिन वह भी अन्य वादों की तरह झूठा ही निकला । इन्हें पहन लें । घिसी हुई सही लेकिन पैरों को जलने से तो बचाएंगी ही ।</p>



<p>और भक्त ने अपनी हवाई चप्पलें रामजी के सामने रख दीं ।</p>



<p></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-author-ramesh-joshis-short-story-bhakt-ki-hawai-chappalein-on-adahan-patrika/">लघु कथा- भक्त की हवाई चप्पलें</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>शीतल पी सिंह का लेख- भारत-चीन सीमा विवाद कैसे दे रहा नई वास्तविकताओं को आकार ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/sheetal-p-singhs-article-how-is-the-india-china-border-dispute-shaping-new-realities-read-the-full-article-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 02 Jul 2026 14:57:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#arunachal pradesh]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#border tensions]]></category>
		<category><![CDATA[#china]]></category>
		<category><![CDATA[#foreign minister]]></category>
		<category><![CDATA[#foreign policy]]></category>
		<category><![CDATA[#india]]></category>
		<category><![CDATA[#india china]]></category>
		<category><![CDATA[#india china relations]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#national security]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#s jaishankar]]></category>
		<category><![CDATA[#sheetal p singh]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=456</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;मोदी सरकार की नीति पिछले कुछ वर्षों में स्पष्ट रूप से यह रही है कि चीन के साथ किसी बड़े सैन्य टकराव से हर कीमत पर बचा जाए। 2020 की गलवान घाटी की हिंसक घटना के बाद भारत ने सीमा पर सैनिकों और हथियारों की तैनाती अवश्य बढ़ाई, सड़कें और आधारभूत ढाँचा भी तेज़ी से &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/sheetal-p-singhs-article-how-is-the-india-china-border-dispute-shaping-new-realities-read-the-full-article-on-adahan-patrika/">शीतल पी सिंह का लेख- भारत-चीन सीमा विवाद कैसे दे रहा नई वास्तविकताओं को आकार ?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="715" height="715" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1.jpeg" alt="पत्रकार शीतल पी सिंह" class="wp-image-457" style="width:130px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1.jpeg 715w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1-300x300.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1-150x150.jpeg 150w" sizes="(max-width: 715px) 100vw, 715px" /></figure>
</div>


<p><strong>&#8216;मोदी सरकार की नीति पिछले कुछ वर्षों में स्पष्ट रूप से यह रही है कि चीन के साथ किसी बड़े सैन्य टकराव से हर कीमत पर बचा जाए। 2020 की गलवान घाटी की हिंसक घटना के बाद भारत ने सीमा पर सैनिकों और हथियारों की तैनाती अवश्य बढ़ाई, सड़कें और आधारभूत ढाँचा भी तेज़ी से विकसित किया, लेकिन सरकार ने ऐसी किसी भी कार्रवाई से परहेज़ किया जिससे व्यापक युद्ध या लगातार सीमा संघर्ष की स्थिति बन सकती थी।&#8217; पढ़ें सुप्रतिष्ठित पत्रकार शीतल पी सिंह का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>भारत-चीन सीमा पर हाल में सामने आई उच्च-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों ने एक बार फिर उस कठिन वास्तविकता की याद दिलाई है, जिसे अक्सर राजनीतिक शोर-शराबे में भुला दिया जाता है। खबर है कि चीन अरुणाचल प्रदेश से लगी तिब्बत सीमा के एक ऐसे क्षेत्र में नई सड़क का निर्माण कर रहा है, जिसे भारत अपने आधिकारिक मानचित्रों में अपना क्षेत्र मानता है। यह क्षेत्र मैकमोहन रेखा के भारतीय पक्ष में आता है। लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि यह इलाका 1959 से चीन के प्रभावी नियंत्रण में है और आज भारतीय सेना की नियमित गश्त तथा नियंत्रण रेखा (LAC) के पार स्थित माना जाता है। यानी भारत का कानूनी दावा आज भी कायम है, लेकिन वास्तविक नियंत्रण चीन के पास है।</p>



<p>यही भारत-चीन सीमा विवाद की सबसे जटिल सच्चाई है। मैकमोहन रेखा और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) एक ही चीज़ नहीं हैं। मैकमोहन रेखा भारत की ऐतिहासिक और आधिकारिक सीमा का आधार है, जबकि LAC वह सैन्य वास्तविकता है जहाँ तक दोनों देशों की सेनाएँ अपने-अपने नियंत्रण का दावा और अभ्यास करती हैं। इन दोनों के बीच का अंतर ही अक्सर ऐसी खबरों को जन्म देता है कि चीन “भारतीय क्षेत्र” में निर्माण कर रहा है, जबकि चीन का दावा होता है कि वह अपने नियंत्रण वाले इलाके में काम कर रहा है।</p>



<p>भारत-चीन सीमा विवाद का इतिहास भी इस संदर्भ में समझना आवश्यक है। 1962 का युद्ध अचानक नहीं हुआ था। उसके पहले कई वर्षों से सीमा के सीमांकन को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद बढ़ रहे थे। भारत की ‘फ़ॉरवर्ड पॉलिसी’, तिब्बत पर चीन का नियंत्रण, दलाई लामा को भारत में शरण और दोनों देशों की अलग-अलग सीमा संबंधी व्याख्याओं ने तनाव को चरम पर पहुँचा दिया। अक्टूबर 1962 में युद्ध छिड़ा और भारत को सैन्य पराजय का सामना करना पड़ा। युद्धविराम की घोषणा के बाद चीन पूर्वी क्षेत्र में मैकमोहन रेखा के उत्तर लौट गया, लेकिन पश्चिमी क्षेत्र में उसने अक्साई चिन पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। इसके बाद 1967 में सिक्किम सीमा पर नाथू ला और चो ला में दोनों सेनाओं के बीच भारी गोलीबारी और तोपों तक का प्रयोग हुआ, जिसमें दोनों पक्षों को नुकसान हुआ, लेकिन भारत ने अपने मोर्चे मजबूती से संभाले रखे। इसके बाद दशकों तक भारत-चीन सीमा पर बंदूकों से ऐसी बड़ी मुठभेड़ नहीं हुई। 1993 और 1996 सहित कई समझौतों के बाद दोनों देशों ने सीमा पर आग्नेयास्त्रों के प्रयोग से बचने की व्यवस्था विकसित की। हालांकि जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने दिखाया कि बंदूकें भले न चली हों, लेकिन लोहे की रॉड, कीलों वाले डंडों और पत्थरों से हुई हाथापाई भी कितनी भयावह और जानलेवा हो सकती है।</p>



<p>इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि भारत का दावा समाप्त हो गया है। भारत आज भी पूरे अरुणाचल प्रदेश को अपना अभिन्न अंग मानता है और चीन द्वारा समय-समय पर भारतीय स्थानों के चीनी नामकरण या नए नक्शे जारी करने का लगातार विरोध करता रहा है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि केवल कूटनीतिक विरोध दर्ज कराने और सैन्य वास्तविकता को बदल देने में बहुत अंतर होता है।</p>



<p>मोदी सरकार की नीति पिछले कुछ वर्षों में स्पष्ट रूप से यह रही है कि चीन के साथ किसी बड़े सैन्य टकराव से हर कीमत पर बचा जाए। 2020 की गलवान घाटी की हिंसक घटना के बाद भारत ने सीमा पर सैनिकों और हथियारों की तैनाती अवश्य बढ़ाई, सड़कें और आधारभूत ढाँचा भी तेज़ी से विकसित किया, लेकिन सरकार ने ऐसी किसी भी कार्रवाई से परहेज़ किया जिससे व्यापक युद्ध या लगातार सीमा संघर्ष की स्थिति बन सकती थी। समर्थकों का तर्क है कि दो परमाणु शक्तियों के बीच युद्ध किसी के हित में नहीं होगा और संयम ही परिपक्व नेतृत्व की पहचान है। आलोचकों का कहना है कि अत्यधिक संयम चीन को धीरे-धीरे अपनी स्थिति और मजबूत करने का अवसर देता है। सरकार का दृष्टिकोण यह प्रतीत होता है कि सीमित भूभाग पर सामरिक धैर्य रखते हुए भारत अपनी आर्थिक, सैन्य और अवसंरचनात्मक क्षमता को दीर्घकाल में मजबूत करे, क्योंकि बिना व्यापक राष्ट्रीय शक्ति के केवल सीमावर्ती सैन्य प्रतिक्रिया से स्थायी समाधान संभव नहीं है।</p>



<p>असल प्रश्न यह नहीं है कि युद्ध होना चाहिए या नहीं। युद्ध किसी भी समस्या का पहला समाधान नहीं हो सकता। लेकिन लोकतंत्र में जनता को यह जानने का अधिकार अवश्य है कि वास्तविक स्थिति क्या है। किन इलाकों में भारत पहले की तरह गश्त कर पा रहा है और किन क्षेत्रों में नहीं? क्या कहीं बफर ज़ोन बनने से भारतीय गश्त प्रभावित हुई है? जिन इलाकों पर भारत अपना दावा करता है, वहाँ उस दावे को मजबूत करने के लिए भविष्य की रणनीति क्या है? इन प्रश्नों पर पारदर्शिता लोकतंत्र की आवश्यकता है, कमजोरी नहीं।</p>



<p>सीमा विवाद केवल सैनिकों का विषय नहीं होता; यह राष्ट्रीय नीति, कूटनीति, आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता और दीर्घकालिक रणनीतिक धैर्य की भी परीक्षा होता है। चीन पिछले कई वर्षों से सीमा पर सड़कें, पुल, गाँव, हवाई पट्टियाँ और अन्य सैन्य ढाँचे बनाकर अपनी स्थिति लगातार मजबूत करता रहा है। भारत ने भी अपनी ओर बुनियादी ढाँचे का विस्तार तेज़ किया है, लेकिन जहाँ चीन पहले से प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर चुका है, वहाँ स्थिति बदलना केवल राजनीतिक भाषणों से संभव नहीं है।</p>



<p>राष्ट्रहित की सबसे बड़ी कसौटी यह नहीं कि कौन सबसे ऊँची आवाज़ में राष्ट्रवाद का नारा लगाता है। असली कसौटी यह है कि देश की सीमाएँ कितनी सुरक्षित हैं, जनता को कितनी ईमानदारी से जानकारी दी जाती है और सरकार अपने दावों को भविष्य में वास्तविकता में बदलने के लिए कितनी स्पष्ट एवं दीर्घकालिक रणनीति रखती है। चीन की हर नई सड़क केवल कंक्रीट की एक पट्टी नहीं होती; वह हमें यह याद दिलाती है कि सीमा विवाद समय के साथ स्वयं समाप्त नहीं होते। उन्हें या तो कूटनीति, शक्ति और धैर्य के संतुलन से सुलझाया जाता है, या फिर वे धीरे-धीरे नई वास्तविकताओं का रूप ले लेते हैं।</p>



<p>&#8211;<strong>शीतल पी सिंह , फेसबुक वॉल से साभार</strong></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/sheetal-p-singhs-article-how-is-the-india-china-border-dispute-shaping-new-realities-read-the-full-article-on-adahan-patrika/">शीतल पी सिंह का लेख- भारत-चीन सीमा विवाद कैसे दे रहा नई वास्तविकताओं को आकार ?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>लोकतंत्र की हत्या अब लाठी से नहीं, सूची से होगी</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/now-democracy-will-be-killed-not-by-batons-but-by-lists-read-journalist-tribhuvans-full-article-in-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 01 Jul 2026 14:13:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#democracy]]></category>
		<category><![CDATA[#india]]></category>
		<category><![CDATA[#judicial system]]></category>
		<category><![CDATA[#justice]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#politcal system]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<category><![CDATA[#wethepeopleofindia]]></category>
		<category><![CDATA[#नागरिकता]]></category>
		<category><![CDATA[#बीजेपी]]></category>
		<category><![CDATA[#राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[#लोकतंत्र]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=453</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;अगर नागरिकता की परिभाषा संदिग्ध कर दी जाए, जनगणना के आंकड़ों पर भरोसा कम कर दिया जाए, SIR के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए और परिसीमन के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पूरा नक्शा बदल दिया जाए तो चुनाव भले होते रहें, लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाएगा।&#8217; &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/now-democracy-will-be-killed-not-by-batons-but-by-lists-read-journalist-tribhuvans-full-article-in-adahan-patrika/">लोकतंत्र की हत्या अब लाठी से नहीं, सूची से होगी</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>&#8216;अगर नागरिकता की परिभाषा संदिग्ध कर दी जाए, जनगणना के आंकड़ों पर भरोसा कम कर दिया जाए, SIR के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए और परिसीमन के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पूरा नक्शा बदल दिया जाए तो चुनाव भले होते रहें, लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाएगा।&#8217; पढ़ें पत्रकार त्रिभुवन का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>जीएन देवी भारत के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक कार्यकर्ता, भाषाविद्, साहित्य-आलोचक और सार्वजनिक बुद्धिजीवी हैं। वे विलुप्तप्राय और उपेक्षित भाषाओं के दस्तावेज़ीकरण तथा संरक्षण के अपने असाधारण काम के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। People’s Linguistic Survey of India के नेतृत्वकर्ता के रूप में उन्होंने भारत के आदिवासी, घुमंतू, सीमांत और हाशिए के समुदायों की भाषाई-सांस्कृतिक अस्मिता को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का ऐतिहासिक कार्य किया है। अभी मैंने &#8220;महाभारत : काव्य और राष्ट्र&#8221; शीर्षक वाली विद्वत्तापूर्ण पुस्तक पूरी की ही थी कि उनके जयपुर आगमन की ख़बर मिली तो मैं अपने आपको उनके व्याख्यान में जाने से रोक नहीं पाया।</p>



<p>जयपुर में जीएन देवी का व्याख्यान किसी साहित्यिक विद्वान का सामान्य भाषण नहीं था। वह लोकतंत्र के शव-परीक्षण से पहले की अंतिम चेतावनी जैसा था। एक खचाखच भरे विशालकाय सभागार में करीने से धीर-गंभीर बैठे लोगों को उन्होंने नागरिकता, जनगणना, SIR, परिसीमन और जनसांख्यिकी के नाम पर बन रही उस नई राजनीति को समझाया, जिसमें नागरिक को पहले आंकड़ा बनाया जाता है, फिर संदेहास्पद बनाया जाता है, फिर सूची से हटाया जाता है और अंत में राष्ट्र से बाहर धकेल दिया जाता है। यह सब बंदूक से नहीं होता। यह फॉर्म से होता है। यह हिरासत-शिविर से पहले प्रमाणपत्र मांगता है। यह संविधान पर हमला करने से पहले मतदाता-सूची पर हमला करता है।</p>



<p>हैरानी यह नहीं कि हॉल भरा हुआ था। हैरानी यह है कि वहाँ मीडिया नहीं था। राजनीतिक दल नहीं थे। विपक्ष नहीं था। कांग्रेस नहीं थी। वे लोग नहीं थे जिनका पहला काम नागरिकता, मतदान-अधिकार, संविधान और प्रतिनिधित्व की रक्षा करना है। यह वही कांग्रेस है जो चुनाव के समय बूथ मैनेजमेंट पर लाखों वॉट्सऐप संदेश भेजती है, लेकिन जब नागरिकता और जनगणना के जरिए पूरे लोकतंत्र का भूगोल बदलने की बहस उठती है तो उसकी वैचारिक रीढ़ जैसे गायब हो जाती है। प्रतिपक्ष में होकर भी अगर किसी दल को Census, SIR, Demography, Delimitation और Citizenship जैसे शब्दों से बेचैनी नहीं होती तो समझना चाहिए कि वह सत्ता से नहीं, इतिहास से पराजित है। इस तरह के कार्यक्रमों से कांग्रेस की दूरी बताती है कि वह विधानसभा चुनाव में पक्का मार खाएगी और फिर शोर मचाएगी कि बीजेपी ने वोट चुरा लिये। उनकी उदासीनता संकेत दे रही है कि राजस्थान में बंगाल रिपीट होगा।</p>



<p>जीएन देवी ने जिस संकट की ओर इशारा किया, वह बेहद गंभीर है। भारत में लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं है। लोकतंत्र इस बात का नाम है कि कौन नागरिक माना जाएगा, कौन मतदाता रहेगा, किसकी गिनती होगी, किस राज्य को कितनी राजनीतिक शक्ति मिलेगी, किस भाषा को कितनी जगह मिलेगी, किस समुदाय को संदेह की नजर से देखा जाएगा और किसे राष्ट्र की मुख्यधारा से बाहर कर दिया जाएगा। यह सब मिलकर लोकतंत्र का वास्तविक ढांचा बनाते हैं। अगर नागरिकता की परिभाषा संदिग्ध कर दी जाए, जनगणना के आंकड़ों पर भरोसा कम कर दिया जाए, SIR के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए और परिसीमन के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पूरा नक्शा बदल दिया जाए तो चुनाव भले होते रहें, लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाएगा।</p>



<p>देवी ने एक डच फिल्म A Question of Silence का जिक्र करते हुए अपना व्याख्यान शुरू किया। इसमें तीन स्त्रियां एक हिंसक और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के सामने चुप्पी को प्रतिरोध में बदल देती हैं। अदालत उन्हें पागल साबित करना चाहती है, पर सवाल उलटा हो जाता है—पागल वे हैं या वह व्यवस्था है जो उनके जीवन को रोज़ चुपचाप कुचलती रही? आज भारत में भी यही प्रश्न खड़ा है। अगर कोई नागरिक अपने दस्तावेज़ों में एक अक्षर की त्रुटि के कारण संदिग्ध हो जाता है, अगर कोई घुमंतू पशुपालक, कोई मजदूर, कोई आदिवासी, कोई नदी किनारे का विस्थापित, कोई बिना स्थायी पते का मनुष्य राज्य की नजर में “अपूर्ण नागरिक” हो जाता है तो पागल नागरिक नहीं है; पागल व्यवस्था है।</p>



<p>सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि जनगणना अब केवल जनगणना नहीं रह गई है। वह कल्याणकारी योजनाओं, खाद्य सुरक्षा, भाषा, रोजगार, संसाधन-वितरण, निर्वाचन-क्षेत्र, आरक्षण और राजनीतिक शक्ति का मूल आधार है। Planning Commission या बाद की नीति-प्रक्रियाओं में खाद्य सुरक्षा जैसे दस्तावेज़ों की रीढ़ डेटा रहा है। अगर डेटा सही है तो नीति गरीब तक पहुँच सकती है। अगर डेटा देर से आता है, अधूरा आता है या अविश्वसनीय आता है तो शासन अनुमान, प्रचार और पूर्वग्रह पर चलने लगता है। यही वह जगह है जहाँ लोकतंत्र मरना शुरू करता है—जब गरीब का पेट आंकड़े में गायब हो जाए और विस्थापित का नाम सूची में न मिले।</p>



<p>भारत की जनगणना की परंपरा 1871 में औपनिवेशिक शासन के दौर से व्यवस्थित रूप में शुरू हुई। औपनिवेशिक सत्ता ने गिनती को नियंत्रण का उपकरण बनाया था। स्वतंत्र भारत ने उसी गिनती को लोकतांत्रिक योजना और सामाजिक न्याय का आधार बनाया। फर्क यही था—वहाँ census सत्ता की आंख था, यहाँ census नागरिक अधिकार का आधार होना चाहिए था। लेकिन अब भय यह है कि हम फिर उसी औपनिवेशिक प्रवृत्ति की ओर लौट रहे हैं, जहाँ राज्य नागरिक को समझने के लिए नहीं, उसे वर्गीकृत और नियंत्रित करने के लिए गिनता है।</p>



<p>इसीलिए “Demography Commission” या “Demographic Mission” जैसी अवधारणाएँ अत्यंत सावधानी से देखी जानी चाहिए। जनसांख्यिकी अपने आप में विज्ञान है। लेकिन जब उसी विज्ञान को “घुसपैठ”, “अस्वाभाविक परिवर्तन” और “आंतरिक खतरा” जैसी राजनीतिक भाषा में बांध दिया जाए तो वह विज्ञान नहीं रहता, वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का डंडा बन जाता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हमेशा संस्कृति की बात करता है, लेकिन उसका असली लक्ष्य नागरिकता की छंटनी होता है। वह कहता है कि वह राष्ट्र बचा रहा है; वस्तुतः वह राष्ट्र को नागरिकों से खाली कर रहा होता है।</p>



<p>जीएन देवी ने व्याख्यान में पुनर्जागरण आंदोलन की याद दिलाई। राजा राममोहन राय ने उन्नीसवीं सदी के आरंभ में एकेश्वरवाद, विवेक और धार्मिक समानता की दिशा में प्रश्न उठाए। ब्रह्म समाज ने धर्म को तार्किकता और नैतिकता की कसौटी पर रखने की कोशिश की। उन्नीसवीं सदी में आर्य समाज ने वेदों की ओर लौटने का आह्वान किया। फिर धीरे-धीरे सुधारवाद की धार से एक दूसरी धारा निकली—हिन्दू समाज की राजनीतिक संगठनशीलता, हिंदू महासभा, सावरकर की 1923 की हिंदुत्व-पुस्तिका, मूंजे-हेडगेवार की संगठन-दृष्टि और 1925 का आरएसएस। यह इतिहास इसलिए महत्वपूर्ण है कि इससे पता चलता है—एक देश में धार्मिक सुधार, सांस्कृतिक पुनरुद्धार और राजनीतिक राष्ट्रवाद के बीच फर्क मिटता है तो अंततः नागरिकता की जगह सांस्कृतिक शुद्धता बैठ जाती है।</p>



<p>हालांकि मैं देवी की पुनर्जागरण आंदोलन संबंधी कुछ अवधारणाओं से सहमत नहीं हूँ। लेकिन उन्होंने आज की चिंताओं को बहुत प्रखरता से रखा। उनका कहना था कि आज ज़रूरत संविधान समाज की है—ऐसे समाज की जो कहे कि नागरिकता जन्म, जाति, धर्म, भाषा, खान-पान, वेशभूषा या काग़ज़ी संदेह की बंधक नहीं हो सकती। संविधान समाज का अर्थ है—हर नागरिक की गरिमा, हर मतदाता का अधिकार, हर भाषा का सम्मान, हर क्षेत्र का न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व।</p>



<p>कांग्रेस और विपक्ष का मौन इसलिए अपराध है। वे समझ ही नहीं रहे कि लड़ाई केवल महंगाई, टिकट, गठबंधन या मुख्यमंत्री पद की नहीं है। लड़ाई इस बात की है कि 2027 के बाद भारत का राजनीतिक भूगोल कैसा होगा। परिसीमन केवल सीटों का बंटवारा नहीं होता; वह सत्ता की नसों का पुनर्संयोजन होता है। किस प्रदेश की आवाज़ घटेगी, किसकी बढ़ेगी, कौन-सा इलाका निर्णायक होगा, कौन-सा समुदाय स्थायी रूप से हाशिए पर चला जाएगा—यह सब इसी से तय होगा। अगर विपक्ष इस प्रश्न पर चुप है तो वह अपने भविष्य की कब्र खुद खोद रहा है।</p>



<p>और मीडिया? मीडिया तो लोकतंत्र की शुरुआती चेतावनी-व्यवस्था था। लेकिन अगर जीएन देवी जैसे चिंतक जयपुर में आकर नागरिकता और लोकतंत्र पर सबसे गंभीर चेतावनी दें और मीडिया अनुपस्थित रहे तो यह अनुपस्थिति खबर से बड़ी खबर है। यह बताती है कि मीडिया की प्राथमिकता नागरिक नहीं, इवेंट है; संविधान नहीं, तमाशा है; लोकतंत्र नहीं, सत्ता की दैनिक ध्वनि है।</p>



<p>देवी चेताते भर नहीं, समझाते हैं जैसे कोई पिता या गुरु बच्चे को समझाता है। उनका कहना था अब सवाल यह नहीं है कि क्या बिगड़ेगा। सवाल यह है कि हम कितना बचा पाएंगे। हर जिले में नागरिक समितियां बननी चाहिए। नागरिकता, जनगणना, मतदाता-सूची, परिसीमन और जनसांख्यिकी पर सार्वजनिक अध्ययन-मंडल बनने चाहिए। People’s Demographic Survey जैसे नागरिक प्रयास शुरू होने चाहिए। घुमंतू समुदायों, पशुपालकों, प्रवासी मजदूरों, आदिवासियों, शहरी गरीबों और दस्तावेज़हीन नागरिकों की डायरी लिखी जानी चाहिए। कौन कहाँ रहता है, किसके पास कौन-सा कागज है, किसका नाम वोटर लिस्ट में है, कौन बाहर हो सकता है—यह सब लोकतंत्र की नई जनगाथा है।</p>



<p>जीएन देवी ने जो कहा, वह डराने के लिए नहीं था; जगाने के लिए था। अगर हमारी निष्क्रियता से किसी एक आदमी की नागरिकता भी छिनती है तो यह केवल उस आदमी की त्रासदी नहीं होगी। वह पूरे गणराज्य के माथे पर एक काला धब्बा होगा। लोकतंत्र की हत्या अब संसद के दरवाज़े तोड़कर नहीं होगी। वह जनगणना-फॉर्म, मतदाता-सूची, नागरिकता-प्रमाणपत्र और परिसीमन-मानचित्र के बीच चुपचाप होगी। और इतिहास की सबसे भयावह हत्याएं अक्सर शोर से नहीं, चुप्पी से होती हैं। मुझे सुखद हैरानी है कि हमारे यहाँ वास्तविक राजनीतिक समझ वालों में कविता श्रीवास्तव शीर्ष पर हैं और उन्होंने यह आयोजन किया।</p>



<p>कई बार तो मुझे यही लगता है कि इस प्रदेश में वास्तविक राजनीति तो कविता श्रीवास्तव, अरुणा रॉय, निखिल डे, भंवर मेघवंशी जैसे लोग ही कर रहे हैं और कांग्रेस के कथित बड़े नाम और सत्ता के शीर्ष पर रहे लोग तो इस जम्हूरियत के हिसाब से अप्रासंगिक ही हैं। उन्हें अगर इतने बेचैन करने वाले प्रश्नों पर बेचैनी नहीं है और वे सिर्फ़ बयानबाज़ियां करके ही राजनीति करना चाहते हैं तो ख़तरा बड़ा है। इस कार्यक्रम में प्रोफेसर अपूर्वानंद भी मौजूद थे। उन्होंने भी भारतीय लोकतंत्र के सामने मंडरा रहे ख़तरों को सांगोपांग रेखांकित किया।</p>



<p><strong>-त्रिभुवन , फेसबुक वाॅल से साभार</strong></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/now-democracy-will-be-killed-not-by-batons-but-by-lists-read-journalist-tribhuvans-full-article-in-adahan-patrika/">लोकतंत्र की हत्या अब लाठी से नहीं, सूची से होगी</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>रविकांत का लेख- शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएं</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-ravikants-article-in-adahan-magazine-om-prakash-valmikis-poems-are-a-call-for-struggle-against-exploitation/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:48:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलोचना]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#dalit kavita]]></category>
		<category><![CDATA[#dalit lekhak]]></category>
		<category><![CDATA[#dalit literature]]></category>
		<category><![CDATA[#dalit sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#omprakash valmiki]]></category>
		<category><![CDATA[#ravikant]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=448</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया।&#8217; पढ़ें रविकांत का &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-ravikants-article-in-adahan-magazine-om-prakash-valmikis-poems-are-a-call-for-struggle-against-exploitation/">रविकांत का लेख- शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएं</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>&#8216;दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया।&#8217; पढ़ें  रविकांत का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>डॉ अम्बेडकर के विचारों और सपनों को साकार करने वाला साहित्य सबसे पहले 1960 के दशक में मराठी में शुरू हुआ। इसके बाद तेलुगु, हिन्दी, गुजराती, तमिल और कन्नड में दलित साहित्य लेखन का आंदोलन खड़ा हुआ। 1970 के दशक में हिन्दी दलित साहित्यकारों की पहली पीढ़ी सक्रिय हुई। इसमें सबसे उल्लेखनीय नाम ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून 1950-17 नवंबर 2013) का है। सदियों से पढ़ने-लिखने से वंचित रहे दलित समाज को पहली बार अभिव्यक्ति का अवसर मिला। लेकिन उनके लिए यह कितना आसान था? हिन्दू समाज के सबसे निचले पायदान पर स्थित जाति में जन्मे ओमप्रकाश वाल्मीकि के लिए लिखना किसी यातना से कम नहीं था। उन्होंने अपनी किताब &#8216;दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष और यथार्थ&#8217; में लिखा है ,&#8221;मुद्रित शब्द की आग में मैंने अपने आपको हमेशा झुलसते पाया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर , गांव बरला के बेसिक प्राइमरी स्कूल में मेरे दाखिले के वक्त गिड़गिड़ाते पिता का चेहरा आज भी मेरी आंखों में किरकिराता है। और यातना भरे सफर और संघर्ष में यही मेरी ताकत भी बनता है। यह वह दौर था, जब भारत नया-नया स्वतंत्र हुआ था, लेकिन स्कूल- कॉलेजों में किसी दलित के लिए प्रवेश पाना आसमान से तारे तोड़ लेने के समान था, किसी दलित के लिए स्कूल के दरवाजे बंद थे। नई-नई आजादी मिली थी, नया संविधान बना था। जिसमें सबको समान अधिकार देने की बात कही गई थी। लेकिन हिंदुत्व की सनातनी मान्यताओं के सामने संविधान की धाराएँ बौनी थीं। पिताजी के उस जज्बे को समझने की उस वक्त मेरी उम्र नहीं थी, लेकिन एक बार जब स्कूल की टाट-पट्टी के सबसे किनारे पर, जो मेरे बैठने से पहले ही खत्म हो जाती थी, बैठकर अक्षर पहचानने का जो सिलसिला शुरू हुआ, तो वह चिंगारी बनाकर अंधेरे में जुगनू की तरह चमकने लगा था। और वही चमक मेरे भीतर आग में तब्दील हो गई थी। जिसकी तपिश ने मेरे वजूद को ही बदल दिया तो उस वक्त पिताजी का वह जज्बा ठीक से समझ में आने लगा था।&#8221;</p>



<p>ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदू समाज की बेड़ियों को ही नहीं तोड़ा बल्कि हिंदी साहित्य को भी शुचिता और कुलीनता से मुक्त कराया। जयप्रकाश कर्दम के शब्दों में, &#8220;ओमप्रकाश वाल्मीकि एक ऐसा नाम है, जिसने अपनी रचनाओं के माध्यम से कुलीनता और आभिजात्य संस्कृति के मूल्यों में रचे-बसे हिंदी साहित्य की सदियों पुरानी जड़ता को तोड़ा और समाज की भांति साहित्य की चौखट से बाहर उपेक्षित पड़े दलितों को साहित्य के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि का लेखन साहित्य विमर्श में एक अनिवार्य हस्तक्षेप है।&#8221;<br>ओमप्रकाश वाल्मीकि ने साहित्य को नए ढंग से परिभाषित किया। उनके अनुसार, साहित्य मनुष्यता की अभिव्यक्ति है। पराधीनता से मुक्ति का आख्यान है। शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है। समता और स्वतंत्रता की चेतना है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने पूर्ववर्ती हिन्दी साहित्य को कठघरे में खड़ा किया। उनके अनुसार अधिकांश हिन्दी साहित्य ब्राह्मणवादी परंपराओं और मूल्यों से पोषित है। इसमें दलितों-वंचितों की पराधीनता और पीड़ा की अभिव्यक्ति नहीं है। दलित समाज की पराधीनता और उसके मुक्ति के सवालों को केंद्र में रखकर उन्होंने कविता, कहानी, आत्मकथा और आलोचना जैसी महत्वपूर्ण विधाओं में रचनाएं लिखीं। उनका रचना संसार बहुत व्यापक है। उनके चार कहानी संग्रह &#8211; सलाम (2000), घुसपैठिए (2003), छतरी, अम्मा एंड अदर स्टोरी। आत्मकथा- जूठन (1997) दूसरा भाग (2015) आलोचना- दलित साहित्य का सौंदर्य शास्त्र (2001), मुख्य धारा और दलित साहित्य, दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ (2013) विचारपरक लेखन &#8211; सफाई देवता (2008) नाटक- दो चेहरे, उसे वीर चक्र मिला था, अनुवाद- मैं हिंदू क्यों नहीं? (कांचा इलैया की अंग्रेजी किताब का हिंदी अनुवाद), सायरन का शहर (अरुण काले के मराठी कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद)।<br>बृहत साहित्य के लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि बुनियादी तौर पर कवि हैं। उनके लेखन की शुरुआत कविता से हुई और कविता उनके जीवन-संघर्ष में अनवरत संबल बनी रही। अपनी किताब &#8216;दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ&#8217; में उन्होंने लिखा है कि, &#8220;प्रारंभिक दौर में ही मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम कविता ही रही है। एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहने के साथ-साथ कविताओं की ओर मेरा झुकाव लगातार बढ़ता गया। बल्कि हताशा और निराशा के समय कविता मुझे संबल देती रही है।&#8221; कविता जीवन नहीं बल्कि उनकी पूरी दुनिया है। उसका सच दिल से क्या, अस्थि-मज्जा से निकला हुआ यथार्थ है! उनका पहला कविता संग्रह &#8216;सदियों का संताप&#8217; 1989 में फिलहाल प्रकाशन, देहरादून से प्रकाशित हुआ। दूसरा काव्य संग्रह &#8216;बस्स बहुत हो चुका&#8217; 1997 में वाणी प्रकाशन से आया। इसके बाद 2009 में उनका तीसरा काव्य संग्रह &#8216;अब और नहीं&#8217; राधाकृष्ण प्रकाशन से छपा। अंतिम और चौथा काव्य संग्रह &#8216;शब्द झूठ नहीं बोलते&#8217; 2012 में अनामिका प्रकाशन से प्रकाशित हुआ।</p>



<p>उनकी कविताओं में सामन्तों- ब्राह्मणवादियों का शोषण तंत्र तथा दलितों की यातना, संघर्ष और आक्रोश की अभिव्यक्ति हुई है। दलित जीवन के भोगे हुए यथार्थ को प्रस्तुत करने वाली उनकी कविताएं काव्यरसिकों के गले नहीं उतरतीं। उनकी कविताओं में ना शास्त्रीय संस्कार है और ना सात स्वरों का साज। उनकी कविताओं में वेदना की अनुभूति है। मैनेजर पांडेय के शब्दों में &#8216;वेदना की कोई लय नहीं होती।&#8217; अभिजात साहित्य की तरह उनकी कविताएं मनोरंजन के लिए नहीं हैं। आधुनिकतावादियों की तरह विकारों के उत्सर्जन की संवाहक भी उनकी कविताएं नहीं हैं। उनके लिए कविता संवेदना और सरोकारों का संधान है। सच कहने का साहस और संघर्ष की गवाही है, कविता। &#8216;शब्द झूठ नहीं बोलते&#8217; संग्रह की भूमिका में ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं, &#8220;मेरे लिए कविता आनंद या रसास्वादन की चीज नहीं है। बल्कि कविता के माध्यम से मानवीय पक्षों को उजागर करते हुए मनुष्यता के सरोकारों और मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना है।&#8221; अन्यत्र भी उन्होंने लिखा है कि, &#8220;मेरे लिए कविता कला से ज्यादा जीवन की अदम्य लालसा, गतिशीलता की संवाहक है, जो हमारी पीड़ा, हमारे सुख-दुख की अभिव्यक्ति है, जिसमें हम अपने वर्तमान का प्रतिबिंब शिद्दत के साथ देख सकें, जो जीवन की विद्रूपताओं से जूझने का हौसला दे…सच्ची और सही कविता है, जो सच को सच और झूठ को झूठ कहने का हौसला रखती है।&#8221;<br>भारतीय समाज में व्यक्ति की बुनियादी पहचान जाति है। जाति से द्विजों को जन्मना श्रेष्ठता हासिल है और शूद्रों-दलितों को जन्मना हीनता। जाति के कारण ही दलितों को रोज अपमान, अन्याय और अत्याचार का सामना करना पड़ता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जाति कहीं उनका पीछा नहीं छोड़ती। दलितों के लिए जाति एक अभिशाप है। जीते जी नरक! जाति की नारकीय यातनाओं को दलित कवियों ने रचा। उनके शब्दों में एक वेदना भरी चीख है। &#8216;ठाकुर का कुआं&#8217; कविता में बेहद सरल शब्दों में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने जातिवादी परतों को उघाड़कर शोषणकारी तंत्र और वंचितों की बेबसी को बहुत मार्मिक ढंग से पेश किया है-<br>&#8220;चूल्हा मिट्टी का/ मिट्टी तालाब की/ तालाब ठाकुर का।<br>भूख रोटी की/ रोटी बाजरे की/ बाजरा खेत का/ खेत ठाकुर का।<br>बैल ठाकुर का/ हल ठाकुर का/ हल की मूठ पर हथेली अपनी/ फसल ठाकुर की।<br>कुआं ठाकुर का/ पानी ठाकुर का/ खेत खलिहान ठाकुर के/ गली मुहल्ले ठाकुर के फिर अपना क्या?<br>गांव?<br>शहर?<br>देश?&#8221;<br>56 शब्दों की यह कविता 56 इंची सत्ता के दौर में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली कविता बन गई है। साहित्यिक महफिलों से लेकर संसद भवन तक इस कविता की गूंज है। एक सांसद द्वारा उद्धृत किए जाने के बाद सामन्तों द्वारा हुई प्रतिक्रिया इस बात को दर्शाती है कि आज भी ब्राह्मणवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं।<br>दलित समाज पीढ़ी दर पीढ़ी जाति दंश से पीड़ित है। सदियों से मूक बधिर रहा, यह समाज आज अपनी पीड़ा और वेदना को व्यक्त कर रहा है। वह हंसते हुए प्रेम के गीत नहीं लिख सकता। उसका एक-एक शब्द ज्वालामुखी है, आह है, कराह है, धिक्कार है। बकौल ओमप्रकाश वाल्मीकि, &#8220;किसी एक जाति में जन्म लेने के कारण, जो कि उस व्यक्ति विशेष के हाथ में नहीं था, के लिए उसे इतनी बड़ी सजा कि उससे उसके मनुष्य होने तक के तमाम अधिकार छीन लिए जाएं। ऐसे में जब उस अपमानित व्यक्ति के हाथ में कलम आएगी, तब वह कैसी कविता लिखेगा? क्या उसे प्रेम कविता लिखनी चाहिए या विद्रोही? यह सवाल एक दलित कवि के भीतर गर्म-गर्म लावा दहकाता रहा है।&#8221; अगर यह गुलामी तुम्हारे ऊपर थोप दी जाए? &#8216;तब तुम क्या करोगे&#8217; कविता में वाल्मीकि जी पूछते हैं, &#8220;यदि तुम्हें धकेलकर गांव से बाहर कर दिया जाए/ पानी तक न लेने दिया जाए कुएं से/ दुत्कारा फटकारा जाए/ चिलचिलाती दोपहर में कहा जाए/ तोड़ने को पत्थर/ काम के बदले दिया जाए/ खाने को जूठन/ तब तुम क्या करोगे/ यदि तुम्हें मरे जानवर को/ खींचकर ले जाने के लिए कहा जाए/ और कहा जाए ढोने को पूरे परिवार का मैला /पहनने को दी जाए उतरन/ तब तुम क्या करोगे?&#8221;<br>वेदना से उपजे इन सवालों के बावजूद, कवि समर्पण के बदले सौहार्द और अपनापन चाहता है। वह बदलाव चाहता है, बदला नहीं। &#8216;भय&#8217; कविता में एक उम्मीद है कि काश!-<br>&#8220;तुम्हारे हाथ बढ़े होते/ मेरी ओर/ प्रेम गंध का स्पर्श लेकर/ सच कहता हूं/ मैं सीने से नहीं/ लिपट जाता तुम्हारे कदमों से/ बिछ जाता/ धूल बनकर जमीन पर।<br>बिछा तो अब भी हूँ-<br>प्रेम की आसक्ति पर नहीं/ तुम्हारे खूनी पंजों से डरकर।&#8221;<br>इसीलिए दलित कविता में जाति के प्रति गहरी वितृष्णा है।-<br>&#8220;स्वीकार्य नहीं मुझे जाना / मृत्यु के बाद/ तुम्हारे स्वर्ग में/ वहां भी तुम/ पहचानोगे मुझे/ मेरी जाति से ही।&#8221;<br>&#8216;शब्द झूठ नहीं बोलते&#8217; की भूमिका में ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं कि, &#8220;सभ्यता, संस्कृति के घिनौने षड्यंत्र लुभावने शब्दों से भरमाने का काम करते हैं। जहां नैतिकता, अनैतिकता और जीवन मूल्यों के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है।&#8221;10 पुनः वे हिन्दू सहिष्णुता के सच को तंज भरे लहजे में बेनकाब करते हैं-<br>&#8221; हां, सचमुच तुम सहिष्णु हो/ जब दंगों में मारे जाते हैं/ अब्दुल और कासिम/ कल्लू और बिरजू/ तब तुम सत्यनारायण की कथा सुनते हुए/ भूल जाते हो अखबार पढ़ना।<br>पूजते हो गांधी की हत्यारे को<br>तोड़ते हो इबादतगाह झुंड बनाकर।&#8221;<br>महात्मा गांधी के हत्यारे को पूजने वाले और बाबरी मस्जिद तोड़ने वाले हिंदुत्ववादी आज सत्तानशीं हैं। हिंसा की यह संस्कृति आज मोब लिंचिंग जैसे भयावह कुकृत्य में तब्दील हो चुकी है।</p>



<p>मानीखेज है कि दलित साहित्यकारों में, खासकर ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदुत्व और उसकी संस्कृति की तीखी आलोचना की है। हिंदुत्ववादियों ने भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कृति को गड्डमड्ड कर दिया। उनके दावे पर ओमप्रकाश वाल्मीकि व्यंग करते हैं- &#8220;कैद कर रखा है तुमने तहखानों में/ संस्कृति को/ मैं पूछता हूँ-/ संस्कृति क्या तुम्हारी रखैल है?&#8221;<br>&#8216;शास्त्रीय भाषा का शब्द वसुधैव कुटुम्बकम कितना खोखला&#8217; है? वाल्मीकि जी पूछते हैं, &#8216;उपेक्षा, उत्पीड़न और अछूत जाति किस सभ्यता और संस्कृति की देन है?&#8217;</p>



<p>90 के दशक में पिछड़ों के आरक्षण वाली मण्डल राजनीति के बरक्स कमण्डल की राजनीति तेज हुई। साम्प्रदायिक राजनीति दंगों में बदल गई। विस्फोटक की जगह मूर्तियों ने ले ली। धार्मिक जुलूस भय पैदा करने लगे। &#8216;आईना&#8217; कविता में वाल्मीकि जी ने भयावहता को इन शब्दों में दर्ज किया है-<br>&#8220;खड़ा हूं चौराहे पर/ जहां से गुजरा है अभी-अभी/ एक जुलूस/ जिसमें शामिल थे/ बिन चेहरों के लोग/ जिनके हाथों में चमक रही थीं/ तलवारें, त्रिशूल और तमंचे<br>…..<br>इस खूंखार समय में/ आरडीएक्स की जगह/ हो सकती हैं मूर्तियां/ जो आस्था के प्रश्न पर/ कर दी जाएंगी फिट/ अवैध जगहों पर/ खून खराबे के लिए किसी तर्क की/ आवश्यकता नहीं होती है।&#8221;<br>ओमप्रकाश वाल्मीकि हिन्दू संस्कृति के मुखौटे में छिपे हिंसक, अश्लील और सत्तालोलुप चेहरे को बेनकाब करते हैं। यह राजनीति और संस्कृति अब और भी भयानक और खूनी हो चुकी है। आज दलित साहित्य विमर्श और अम्बेडकरवाद क्रूर और आतताई हिंदुत्ववादी सत्ता और संस्कृति का डटकर मुकाबला कर रहा है।</p>



<p>दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया। दलित जीवन के बदरंग प्रसंगों को रचकर ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदू धर्म के पाखंड को बेपर्दा किया। उनकी कहानियों ने पौराणिक कथाओं की अश्लीलता को नंगा कर दिया। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने उस सामाजिक व्यवस्था का पर्दाफाश किया, जिसमें सदियों से यातनाओं का शिकार दलित पशुओं से भी बदतर जीवन जी रहा था। दलितों के शोषण और दमन पर पलने वाला रक्तपिपासु ब्राह्मणवाद आज ओमप्रकाश वाल्मीकि के साहित्यिक कटघरे में है। उससे हजारों सालों की यातनाओं का हिसाब मांगा जा रहा है।</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-ravikants-article-in-adahan-magazine-om-prakash-valmikis-poems-are-a-call-for-struggle-against-exploitation/">रविकांत का लेख- शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएं</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>श्रवण गर्ग का लेख- ‘नागरिकों’ को ‘शरणार्थियों’ में बदलने का षड्यंत्र तो नहीं ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/shravan-gargs-article-is-this-not-a-conspiracy-to-turn-citizens-into-refugees-read-the-full-article-in-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Jun 2026 14:55:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#citizenship]]></category>
		<category><![CDATA[#constitution]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#SIR]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=444</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;जो चल रहा है उसे देख-समझकर डर लगना चाहिए कि क्या कुछ चुनिंदा नागरिकों अथवा समुदायों को परेशान करने के लिए कोई कृत्रिम अंधकार खड़ा किया जा रहा है ? ऐसा अंधकार जिसे क़ानूनी अथवा संवैधानिक तौर पर जायज़ ठहराया जा सके ? या कोई षड्यंत्र है नागरिकों का समूचा ध्यान इस सचाई से भटकाने &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/shravan-gargs-article-is-this-not-a-conspiracy-to-turn-citizens-into-refugees-read-the-full-article-in-adahan-patrika/">श्रवण गर्ग का लेख- ‘नागरिकों’ को ‘शरणार्थियों’ में बदलने का षड्यंत्र तो नहीं ?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>&#8216;जो चल रहा है उसे देख-समझकर डर लगना चाहिए कि क्या कुछ चुनिंदा नागरिकों अथवा समुदायों को परेशान करने के लिए कोई कृत्रिम अंधकार खड़ा किया जा रहा है ? ऐसा अंधकार जिसे क़ानूनी अथवा संवैधानिक तौर पर जायज़ ठहराया जा सके ? या कोई षड्यंत्र है नागरिकों का समूचा ध्यान इस सचाई से भटकाने के लिए कि गवर्नेंस पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है ?&#8217; पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>बात कोलकाता के प्रसिद्ध सत्ता-विरोधी अंग्रेज़ी दैनिक ‘द टेलीग्राफ’ के पूर्व संपादक-पत्रकार आर राजगोपाल की पीड़ा से शुरू करते हैं।राजगोपाल की पीड़ा हालाँकि काफ़ी चर्चा में आ चुकी है फिर भी मूल विषय को आगे बढ़ाने के लिए उसका उल्लेख ज़रूरी है।</p>



<p>पश्चिम बंगाल में हुए हाल के विधानसभा चुनावों में SIR के तहत जिन लाखों लोगों के नाम मतदाता सूचियों से बाहर कर दिये गए थे उनमें एक नाम राजगोपाल का भी था। इसके चलते उनके पासपोर्ट का नवीनीकरण नहीं हो सका। देश का नागरिक होते हुए भी राजगोपाल को नया पासपोर्ट अपनी सिटीजनशिप को प्रमाणित करने के लिए नहीं चाहिए था।वे उसे अपनी पत्रकार बेटी के विवाह में शामिल होने सेनफ़्रांसिस्को पहुँचने के लिये चाहते थे।</p>



<p>नवीनीकृत पासपोर्ट के लिए उनकी सारी अपीलें ठुकरा दी गई। ऐसा इसलिए किया गया कि 2002 की मतदाता सूची में न उनका नाम मिला और न ही उनके पिता का। राजगोपाल के पिता एक गांधीवादी, सेवा-निवृत प्रोफेसर और केरल में गांधी स्मारक निधि के राज्य सचिव रह चुके हैं। उनका 2016 में निधन हो चुका है।</p>



<p>डेढ़ सौ करोड़ के भारत देश में सिर्फ़ बारह-तेरह करोड़ लोगों के पास ही पासपोर्ट है।यानी सौ लोगों में सिर्फ़ आठ या नौ के पास।उसके बावजूद एक संपादक के साथ क्या हो सकता है यह उसकी कहानी है। वे करोड़ों लोग जिनके पास कोई काग़ज़ ही नहीं है उनकी व्यथा की केवल कल्पना ही की जा सकती है।क़ानूनन कहा जाए तो पासपोर्ट भी केवल एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है, अपने आपको देश का नागरिक सिद्ध करने का प्रमाणपत्र नहीं !</p>



<p>केवल पासपोर्ट ही नहीं ! आधार कार्ड, वोटर आईडी, पैन कार्ड, या राशन कार्ड भी देश का नागरिक होने का क़ानून-सम्मत दस्तावेज़ नहीं माना गया है। भारत का वैध नागरिक होने अथवा बनने की क़ानून-सम्मत अहर्ताएं 1955 के सिटीज़न्स एक्ट में वर्णित है। वर्तमान सरकार उन्हीं अहर्ताओं का सख़्ती से पालन करवाना चाहती है।</p>



<p>जो चल रहा है उसे देख-समझकर डर लगना चाहिए कि क्या कुछ चुनिंदा नागरिकों अथवा समुदायों को परेशान करने के लिए कोई कृत्रिम अंधकार खड़ा किया जा रहा है ? ऐसा अंधकार जिसे क़ानूनी अथवा संवैधानिक तौर पर जायज़ ठहराया जा सके ? या कोई षड्यंत्र है नागरिकों का समूचा ध्यान इस सचाई से भटकाने के लिए कि गवर्नेंस पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है ?</p>



<p>हुकूमत क़तई चिंतित नज़र नहीं आती कि लाखों की संख्या में हर साल पढ़े-लिखे और सामर्थ्य लोग क्यों भारत की नागरिकता को त्याग कर विदेशों में बसने रवाना हो रहे हैं।कोई तो बात होगी कि जो बाहर जा चुके हैं वापस नहीं लौटना चाहते और जो हैं वे जा रहे हैं।इन जाने वालों को प्रधानमंत्री देश में नहीं रोकते पर अपनी विदेश यात्राओं के दौरान ‘इंडियन डायस्पोरा’ के साथ मन की बात में उनसे स्वदेश लौटने की अपील ज़रूर करते हैं !</p>



<p>व्यवस्था ने अपने आपको इतना अधिकार-संपन्न कर लिया है कि वह न सिर्फ़ नया पासपोर्ट जारी करने अथवा उसका नवीनीकरण करने से इंकार कर सकती है, जन्म से देश में रह रहे प्रत्येक नागरिक की भारतीयता को चुनौती भी दे सकती है ! संबंधित व्यक्ति भारत का नागरिक है ऐसा उसे ही क़ानूनी आवश्यकताओं के आधार पर साबित करना होगा।</p>



<p>एक ऐसी स्थिति अगर उत्पन्न हो जाए तो क्या होगा कि लाखों-करोड़ों की संख्या में देशवासियों को भारत का वैध नागरिक मानने से इनकार कर दिया जाए ? इतना ही नहीं ! इनमें भी एक बड़ी तादाद उन अल्पसंख्यकों की हो जिन्हें हिन्दूवादी सत्ता अपना नागरिक मानने से ही इंकार करती है।उनके नुमाइंदों को संसद और विधानसभाओं में नहीं भेजती। एक उल्लेखनीय संख्या उन सेक्युलर अथवा हिंदुओं की भी हो जिन्हें सत्ता-विरोधी मानकर लगातार चिन्हित किया जा रहा हो !</p>



<p>तो क्या ऐसे तमाम लोग अपने ही मुल्क में शरणार्थी करार दिये जाएँगे ? ऐसे शरणार्थी जिन्हें जीने का अधिकार तो प्राप्त होगा पर वोट डालकर सरकारें नहीं चुन सकेंगे, उम्मीदवार नहीं बन सकेंगे ! विदेशों की यात्राएँ नहीं कर सकेंगे ! राजगोपाल की तरह अपने बच्चों से नहीं मिल सकेंगे !</p>



<p>जो कहा जा रहा है वह काल्पनिक और अतिरंजित भी हो सकता है ! सचाई यह भी है कि काल्पनिक भय तभी जन्म लेते हैं जब जो उपस्थित है उसके प्रति अविश्वास पुख़्ता होने लगता है।</p>



<p>धर्म के आधार पर किए गए बटवारे के बाद क्या मुल्क को किसी नए विभाजन की तरफ़ ले जाया जा रहा है ? वह यह कि एक ही मुल्क में रहने वाले कुछ लोग वोटर और नागरिक होंगे और शेष अनागरिक, शरणार्थी अथवा घुसपैठिए !</p>



<p></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/shravan-gargs-article-is-this-not-a-conspiracy-to-turn-citizens-into-refugees-read-the-full-article-in-adahan-patrika/">श्रवण गर्ग का लेख- ‘नागरिकों’ को ‘शरणार्थियों’ में बदलने का षड्यंत्र तो नहीं ?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
