<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</title>
	<atom:link href="https://adahanpatrika.com/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://adahanpatrika.com/</link>
	<description>साहित्य, विचार और जन आंदोलन</description>
	<lastBuildDate>Tue, 08 Sep 2026 09:38:00 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=7.1</generator>

<image>
	<url>https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/cropped-WhatsApp-Image-2026-06-04-at-18.28.09-32x32.jpeg</url>
	<title>Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</title>
	<link>https://adahanpatrika.com/</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>डॉ. राम पुनियानी का लेख &#8211; RSS के भाईचारे के मुखौटे के पीछे का क्या है सच?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-what-is-the-truth-behind-rss-mask-of-brotherhood/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 08 Sep 2026 09:37:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[विदेश]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=666</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;आरएसएस का आचरण हमेशा से विविधता का सम्मान करने के उसके दावे के एकदम खिलाफ रहा है। लेकिन भागवत बहुत चतुराई से अपनी संस्था की हकीकत छिपा गए। विविधता का सम्मान करने का मुखौटा सिर्फ दुनिया को भ्रमित करने का प्रयास, एक झांसा है। लेकिन क्या इंटरनेट के इस युग में और मानवाधिकारों को गंभीरता &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-what-is-the-truth-behind-rss-mask-of-brotherhood/">डॉ. राम पुनियानी का लेख &#8211; RSS के भाईचारे के मुखौटे के पीछे का क्या है सच?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;आरएसएस का आचरण हमेशा से विविधता का सम्मान करने के उसके दावे के एकदम खिलाफ रहा है। लेकिन भागवत बहुत चतुराई से अपनी संस्था की हकीकत छिपा गए। विविधता का सम्मान करने का मुखौटा सिर्फ दुनिया को भ्रमित करने का प्रयास, एक झांसा है। लेकिन क्या इंटरनेट के इस युग में और मानवाधिकारों को गंभीरता से लेने वाले इस दौर में दुनिया से हकीकत छिपाकर रखना संभव हो सकेगा?&#8217; पढ़ें डॉ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">आरएसएस के मुखिया, सरसंघचालक मोहन भागवत इन दिनों तीन देशों की यात्रा पर हैं। प्रथम चरण में वे अमरीका पहुंचे जहां उनका मुख्य कार्यक्रम न्यूयार्क के मेडिसन स्क्वायर में भाषण था। इस कार्यक्रम में करीब 5,000 लोगों के आने की उम्मीद थी। इस यात्रा का घोषित उद्धेश्य था आरएसएस के बारे में व्याप्त गलत धारणाओं को दूर करना, लोगों से संवाद करना और सारी दुनिया एक है का संदेश देना। इस कार्यक्रम का कड़ा विरोध हुआ था। विरोध करने वालों में लगभग 61 मानवाधिकार संगठन शामिल थे, जिन्होंने संघ परिवार की नफरत की राजनीति पर रोशनी डाली। विरोध करने वालों ने आरएसएस से जुड़े लोगों के लेखन का हवाला दिया जिसमें यहूदियों का कत्लेआम करने के लिए हिटलर की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई थी और हिन्दू राष्ट्रवादियों को राष्ट्रनिर्माण के हिटलर के तरीके का अनुसरण करने के लिए कहा गया था। विरोध प्रदर्शन कर रहे लोग बैनर लिए हुए थे जिन पर लिखा था कि आरएसएस ने महात्मा गांधी की हत्या की थी। यहां तक कि न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी, जो भारतीय मूल के हैं, ने भी आरएसएस की निंदा की और आरएसएस के आयोजन के प्रति अपनी नाराजगी दर्ज कराई। मगर उन्होंने कहा कि वे इसे रूकवाने में असमर्थ हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जिस भारत में वे बड़े हुए (वे भारतीय फिल्म निर्माता मीरा नायर के पुत्र हैं) उसमें विविधता का सम्मान था, वहीं आज का भारत एक असहिष्णु राष्ट्र बन गया है। कई हिन्दू संगठनों और अन्य मानवाधिकार संगठनों ने भी भागवत विरोधी प्रदर्शनों में भाग लिया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भागवत का कार्यक्रम 200 से अधिक संगठनों ने आयोजित किया था जो मुख्यतः पहचान से जुड़े मुद्दों पर केन्द्रित रहे हैं। कार्यक्रम में भागवत ने बहिष्करण की अपनी राजनीति को छिपाने का प्रयास करते हुए स्वयं को एक उदार व्यक्ति के रूप में दिखाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि विविधता हमारी जन्मजात एकता का गहना है और मुस्लिम-मुक्त भारत चाहने वाला हिन्दू, हिन्दू नहीं रहेगा! बहुत अच्छी बात है! हम एक व्यक्ति और एक संस्था के बारे में अपनी राय किस आधार पर बनाते हैं? उसकी बातों के आधार पर या उसकी कारगुजारियों के आधार पर? अनेकता में एकता, सद्भाव और धर्मों की सीमाओं के परे लोगों में एकता, भारत के अतीत का हिस्सा रहे हैं। आजादी के संघर्ष के दौरान भगतसिंह के आदर्शों, अम्बेडकर के मूल्यों और गांधी के बंधुत्व के साथ लोगों ने अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने की लड़ाई लड़ी। आरएसएस-हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग लोगों को जोड़ने की इस प्रक्रिया से दूर बने रहे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस दौरान आरएसएस न केवल भारतीय राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया के प्रति उदासीन रहा, बल्कि उसने मुसलमानों के प्रति नफरत फैलाने (और बाद में ईसाईयों के खिलाफ भी) में कोई कसर नहीं छोड़ी और कई तरह से ब्रिटिश शासकों की सहायता की। आरएसएस द्वारा अपनी शाखाओं, स्कूलों, मीडिया और बाद में सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाई गई नफरत की वजह से बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा हुई जिसके मुख्य शिकार मुसलमान हुए। जहां ब्रिटिश राज के दौरान हिन्दू और मुसलमान साम्प्रदायिक तत्वों के बीच लगभग बराबरी का मुकाबला था, वहीं आजादी के बाद आरएसएस की साम्प्रदायिकता का बोलबाला हो गया, जिससे इन दो प्रमुख समुदायों के बीच गहरी खाई बन गई। इसी नफरत के चलते हमने 1993 में मुंबई में, 2002 में गुजरात में, 2013 में मुजफ्फरनगर और 2019 में दिल्ली में मुसलमानों के व्यापक नरसंहार की घटनाएं देखीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आरएसएस की राजनीति का असली चेहरा गुजरात के बिलकीस बानो मामले से पूरी तरह साफ है। एक गर्भवती मुस्लिम महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म होता है, और इसके दोषियों को थोड़ा समय जेल में गुजारने के बाद रिहा कर दिया जाता है! यही है उसका महिलाओं के प्रति सम्मान भाव! उसने पवित्र गाय का मामला भी जोरशोर से उठाया जिसके नतीजे में कई मुसलमानों की लिंचिंग हुई। अखलाक, रकबर खान आदि के साथ ही कई दलित भी लिंचिंग का शिकार बने। ऊना में लाठियों और लोहे की छड़ों से दलितों की पिटाई से आरएसएस के दलितों के प्रति रवैये की पोल खुल गई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">1980 के दशक से ईसाई भी आरएसएस के निशाने पर आ गए। जहां पास्टर स्टेन्स और उनके दो मासूम लड़कों को जिंदा जलाए जाने की घटना को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. केआर नारायणन ने ठीक ही मानव जाति के सबसे कलुषित कार्यों में से एक कहा था, वहीं कंधमाल की घटना ने दुबारा यह दिखाया कि ‘ईसाई धर्म विदेशी है‘ का नारा आरएसएस का ही है। उसका ईसाईयों और मुसलमानों के खिलाफ रवैया पिछले करीब एक दशक से और कटु होता गया है। संघ की राजनैतिक शाखा लगभग 12 सालों से केन्द्र की सत्ता पर काबिज है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हाल में ईसाईयों की प्रार्थनासभाओं पर हमले की घटनाओं में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। मुसलमानों का किस हद तक हाशियाकरण हो चुका है, यह इस बात से जाहिर है कि आरएसएस की राजनैतिक संतान भाजपा के कुल मिलाकर 1000 से अधिक सांसद एवं विधायक हैं मगर उनमें से एक भी मुसलमान नहीं है। यह है मुसलमानों के प्रति समानता का भाव रखने के भागवत के दावे की हकीकत। सन् 2025 में यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ), जो एक स्वतंत्र आयोग है जिसे अमरीकी कांग्रेस ने दूसरे देशों में धार्मिक स्वतंत्रता पर निगरानी रखने और अमरीकी सरकार को अनुसंशाएं करने के लिए स्थापित किया था, ने सिफारिश की थी कि अमरीकी सरकार भारत को ‘‘विशेष रूप से चिंता करने योग्य‘‘ राष्ट्र का दर्जा दे। यूएससीआईआरएफ ने यह सिफारिश भी की थी कि कुछ व्यक्तियों एवं आरएसएस सहित कुछ संस्थाओं पर लक्षित प्रतिबंध लगाए जाएं जिनमें उनकी संपत्तियों को फ्रीज़ करना और अमरीका में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना शामिल हो। सबसे हालिया घटनाक्रम में यूएससीआईआरएफ ने भागवत और आरएसएस के अन्य नेताओं के साथ उच्चाधिकारियों की मुलाकातों और उन्हें राजनयिक शिष्टाचार उपलब्ध कराए जाने के खिलाफ आगाह किया। कई मानवाधिकार संगठनों ने भी अमरीका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो से मांग की कि भागवत का अमरीका का वीजा निरस्त कर दिया जाए या उसे देने से इंकार कर दिया जाए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आरएसएस का आचरण हमेशा से विविधता का सम्मान करने के उसके दावे के एकदम खिलाफ रहा है। लेकिन भागवत बहुत चतुराई से अपनी संस्था की हकीकत छिपा गए। विविधता का सम्मान करने का मुखौटा सिर्फ दुनिया को भ्रमित करने का प्रयास, एक झांसा है। लेकिन क्या इंटरनेट के इस युग में और मानवाधिकारों को गंभीरता से लेने वाले इस दौर में दुनिया से हकीकत छिपाकर रखना संभव हो सकेगा? जहां आरएसएस से संबद्ध 2,500 से अधिक संस्थाएं दुनिया भर में हैं वहीं केरेवान पत्रिका के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत से ऐसे अध्येता और कार्यकर्ता हैं जो मुसलमानों, ईसाईयों, दलितों, महिलाओं और आदिवासियों की भारत में वास्तविक स्थिति से दुनिया को अवगत करा रहे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऐसा लगता है कि भागवत का मुख्य लक्ष्य विश्वव्यापी एकता को बढ़ावा देना नहीं बल्कि भारत में उसके द्वारा किए गए भयावह कार्यों पर पर्दा डालना है। धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, स्वतंत्र प्रेस, भूख और प्रसन्नता संबंधी वैश्विक सूचकांकों पर भारत की स्थिति में गिरावट और आरएसएस-भाजपा का उदय एक-दूसरे के समांतर हुआ है। भागवत नफरत की राजनीति को छिपाने की अपनी ‘चतुराई‘ के लिए प्रशंसा के पात्र हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह भी हो सकता है कि उनका लक्ष्य विविधता का मुखौटा लगाकर, अमरीका और दुनिया के अन्य देषों में हिन्दू लॉबी को सशक्त करना हो। भारत में शांति कायम रखने के लिए जरूरी है कि हम भारतीय संविधान का पालन करें, जिसका विरोध संघ परिवार करता है। वैश्विक एकता स्थापित करने का सर्वोत्तम माध्यम है संयुक्त राष्ट्र संघ का मानवाधिकार घोषणापत्र। इस दौर में, जब सारी दुनिया एक गांव बन गई है, हिन्दू धर्मग्रंथों को उद्धृत करना एकदम गलत है। इससे हिन्दू श्रेष्ठतावादियों का असली इरादा बेनकाब होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"> (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया )</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-what-is-the-truth-behind-rss-mask-of-brotherhood/">डॉ. राम पुनियानी का लेख &#8211; RSS के भाईचारे के मुखौटे के पीछे का क्या है सच?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>क्यों उठता है बार-बार एससी कोटे के भीतर कोटा का सवाल?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/why-does-the-question-of-quota-within-sc-quota-arise-again-and-again/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 04 Sep 2026 10:34:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bihar]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#scquota]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=663</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;2008 में धोबी और पासी इस समूह में शामिल कर दिए गए. 2009 में रविदास जाति भी आ गई. 2018 में दुसाधों को भी महादलित का दर्जा मिल गया. यानी जिस श्रेणी को सबसे वंचित दलितों के लिए बनाया गया था, कुछ वर्षों में बिहार की सभी दलित जातियां उसमें आ गईं. 2007 का प्रयोग, &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/why-does-the-question-of-quota-within-sc-quota-arise-again-and-again/">क्यों उठता है बार-बार एससी कोटे के भीतर कोटा का सवाल?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;2008 में धोबी और पासी इस समूह में शामिल कर दिए गए. 2009 में रविदास जाति भी आ गई. 2018 में दुसाधों को भी महादलित का दर्जा मिल गया. यानी जिस श्रेणी को सबसे वंचित दलितों के लिए बनाया गया था, कुछ वर्षों में बिहार की सभी दलित जातियां उसमें आ गईं. 2007 का प्रयोग, व्यावहारिक रूप से, खत्म हो गया.&#8217; पढ़ें पुष्य मित्र की  पूरी रिपोर्ट&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">साल 2024 की बात है. अगस्त महीने में सुप्रीम कोर्ट ने एससी आरक्षण में उपवर्गीकरण का सुझाव दिया था. हर साल की तरह उस साल भी 15 अगस्त बिहार के तत्कालीन सीएम नीतीश कुमार राज्य के एक महादलित टोले लखन बिगहा में झंडा फहराने पहुंचे थे. क्योंकि उन्होंने ही बिहार में सबसे पहले पहचाना था कि राज्य में दलित जातियों में भी कुछ जातियां ज्यादा वंचित हैं, उनके लिए अलग कार्यक्रम की जरूरत है. उधर जीतन राम मांझी गरमाये हुए थे, कहते थे, “डी-4 के लोग तो 76 साल से गुलछर्रे उड़ा रहे हैं और हमारे लोग थूक से सतुआ सान कर खा रहे हैं. हमारी मांग यही है कि हमको अलग कर दीजिये.”</p>



<p class="wp-block-paragraph">लखन बिगहा में झंडात्तोलन के बाद नीतीश कुमार के हाथों 164 महादलितों को आवास योजना से लेकर आयुष्मान भारत तक सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने का प्रमाणपत्र दिया. मैं भी वहां दलित-महादलित के मसले को समझने गया था. वहां पता चला कि इन 164 लोगों में एक भी मुसहर-भुइयां नहीं था. लगभग सभी लाभार्थी रविदास जाति के थे, जिन्हें जीतनराम मांझी डी-4 का हिस्सा बताते हैं.</p>



<p class="wp-block-paragraph">टोले के दूसरे सिरे पर 27 घरों वाली मांझी बस्ती थी. जामुन मांझी तब 20-22 साल के थे. उन्होंने अपना टूटा हुआ घर दिखाते हुए कहा था, “मांझी-मुसहर को कौन पूछता है?” छत इतनी जर्जर थी कि डर लगा रहता था कि कब पत्थर गिर पड़े. वहां एक भी इंदिरा आवास नहीं बना था. लगा कि जीतनराम मांझी का गुस्सा जायज है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">दो साल बाद बिहार में सवाल फिर वहीं खड़ा है. जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष कुमार सुमन फिर से कह रहे हैं कि अनुसूचित जातियों के भीतर भी जो समुदाय सबसे पीछे रह गए हैं, उनके लिए आरक्षण में अलग हिस्सेदारी होनी चाहिए. दूसरी तरफ चिराग पासवान इसका विरोध कर रहे हैं. सवाल यह है कि क्या आरक्षण का लाभ सभी दलित जातियों तक समान रूप से पहुंचा है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">जैसा कि सबको मालूम है, 2007 में नीतीश कुमार सरकार ने दलितों के भीतर एक अलग श्रेणी बनाई थी- महादलित. उस समय बिहार की 22 अनुसूचित जातियों में से चार अपेक्षाकृत मजबूत मानी जाने वाली जातियों-चमार/रविदास, दुसाध, धोबी और पासी (जिन्हें मांझी अब डी-4, यानी डेवलप्ड फोर कहते हैं.) को छोड़कर बाकी 18 जातियों को महादलित समूह में रखा गया. महादलित आयोग ने एक अध्ययन कराया और उसके आधार पर कहा गया कि दलितों के भीतर चमार, दुसाध, धोबी और पासी जैसी जातियों में शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन मुसहर, भुइयां, मेहतर, डोम और नट जैसी जातियां अब भी सरकारी योजनाओं का ठीक से लाभ नहीं उठा पा रही हैं. इसलिए इन जातियों को अलग करके विशेष योजनाएं चलाने की जरूरत है.<br>सरकार ने ऐसा किया भी&#8230;</p>



<p class="wp-block-paragraph">महादलित विकास मिशन बना. विकास मित्र नियुक्त हुए. टोला सेवक रखे गए. भूमिहीन परिवारों के लिए जमीन और आवास की योजनाएं बनीं. कौशल विकास के लिए दशरथ मांझी कौशल विकास योजना चली. हर महादलित बस्ती में रेडियो बांटने तक की योजना बनी, ताकि सरकारी योजनाओं और अधिकारों की जानकारी उन तक पहुंच सके.</p>



<p class="wp-block-paragraph">लेकिन महादलित की कहानी ज्यादा लंबी नहीं चली.</p>



<p class="wp-block-paragraph">2008 में धोबी और पासी इस समूह में शामिल कर दिए गए. 2009 में रविदास जाति भी आ गई. 2018 में दुसाधों को भी महादलित का दर्जा मिल गया. यानी जिस श्रेणी को सबसे वंचित दलितों के लिए बनाया गया था, कुछ वर्षों में बिहार की सभी दलित जातियां उसमें आ गईं. 2007 का प्रयोग, व्यावहारिक रूप से, खत्म हो गया.</p>



<p class="wp-block-paragraph">बिहार सरकार की जाति आधारित गणना के आंकड़ों में भी दलित समाज के भीतर बड़ा अंतर सामने आया है. रिपोर्ट के मुताबिक चार प्रमुख दलित जातियों-दुसाध, चमार, पासी हिस्से में 2,42,246 नौकरियां थीं, जबकि बाकी 18 जातियों के पास सिर्फ 48,758. हालांकि जीतनराम मांझी के डी-4 आबादी में भी अधिक हैं, 63 फीसदी हैं, शेष जातियां सिर्फ 37 फीसदी, फिर भी यह फर्क वाजिब नहीं है. और यही विवाद का मुद्दा भी है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">सच यही है कि बिहार की राजनीति में भी पासवान, रविदास, धोबी, पासी और मुशहर को छोड़कर किसी दलित जाति की पूछ नहीं है. पासवान, रविदास और मुशहर आबादी के कारण और धोबी-पासी इसलिए कि वे अपेक्षाकृत संपन्न हैं. मगर डोम, बांसफोड़, मेहतर, चौपाल, बांतर, नट, भोगता वगैरह जातियों का न के बराबर प्रतिनिधित्व है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">राज्य में नौकरियों के मामले में धोबी जाति के लोग इस श्रेणी में सबसे आगे हैं, उनकी आबादी का 3.14 फीसदी हिस्सा सरकारी नौकरी वाला है. उसके बाद पासी का 2 फीसदी, पासवान का 1.44 फीसदी और रविदास का 1.20 फीसदी. इस तुलना में मुसहर की कुल आबादी का सिर्फ 0.26 फीसदी ही सरकारी नौकरी में है. इसके बाद ज्यादातर जातियों के आंकड़े ऐसे ही हैं.</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/why-does-the-question-of-quota-within-sc-quota-arise-again-and-again/">क्यों उठता है बार-बार एससी कोटे के भीतर कोटा का सवाल?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>डॉ. राम पुनियानी का लेख- भारतीय समाज की पितृसत्ता के मूल में है धर्म‌सत्ता?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-is-religious-domination-at-the-root-of-patriarchy-in-indian-society/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 31 Aug 2026 07:21:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#patriarchy]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#rahul gandhi]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=661</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;भाजपा की तत्कालीन उपाध्यक्ष विजयाराजे सिंधिया संसद भवन तक एक जुलूस लेकर गईं जिसमें सती को एक गौरवशाली भारतीय परंपरा और महिलाओं का अधिकार बताने वाले नारे लगाए जा रहे थे. इसका दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने स्वयं अपने पति की मौत के बाद इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया.&#8217; पढ़ें सुपरिचित इतिहासकार डॉ. &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-is-religious-domination-at-the-root-of-patriarchy-in-indian-society/">डॉ. राम पुनियानी का लेख- भारतीय समाज की पितृसत्ता के मूल में है धर्म‌सत्ता?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;भाजपा की तत्कालीन उपाध्यक्ष विजयाराजे सिंधिया संसद भवन तक एक जुलूस लेकर गईं जिसमें सती को एक गौरवशाली भारतीय परंपरा और महिलाओं का अधिकार बताने वाले नारे लगाए जा रहे थे. इसका दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने स्वयं अपने पति की मौत के बाद इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया.&#8217; पढ़ें सुपरिचित इतिहासकार डॉ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">औपनिवेशिक काल से पहले के भारत में हिन्दू समुदाय अधिकांशतः मनुस्मृति के नियमों के अनुसार ही संचालित होता था, जिसका केन्द्रीय मूल्य था जाति एवं लिंग आधारित पदानुक्रम. औपनिवेशिक काल में शिक्षा, परिवहन के साधन एवं आधुनिक प्रशासनिक ढ़ांचा विकसित हुए और लोकतंत्र के बीज पड़े. ये बदलाव धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद की धारणा के अनुरूप थे, जिसके विभिन्न तत्व थे &#8211; कामगारों के अधिकारों के लिए संघर्ष, शिक्षा एवं उसके जरिए दलितों व महिलाओं का सशक्तिकरण और धर्म, जाति, भाषा और लिंग की सीमाओं के परे सभी की एकसमान नागरिकता की अवधारणा. इन सारी प्रक्रियाओं के खिलाफ खड़े थे कुलीन, जमींदार और पुरोहित वर्ग. जहां मोटे तौर पर लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों का प्रतिनिधि भगत सिंह, आंबेडकर और गांधी को माना जा सकता है वहीं इनके विरोधियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और आरएसएस.</p>



<p class="wp-block-paragraph">लोकतांत्रीकरण की जद्दोजहद में शामिल थे कामगारों के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आजादी के लिए आंदोलन और दलितों और महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर. जहां तक स्त्री शिक्षा की बात है, इसकी शुरूआत जोतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख ने की. सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख को अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए कैसी-कैसी कठिनाईयों से जूझना पड़ा, यह जगजाहिर है. आंबेडकर के संघर्ष में महिलाओं की अच्छी-खासी भागीदारी थी और गांधीजी के नेतृत्व में चले राष्ट्रीय आंदोलन में भी महिलाओं ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया था. इसके विरोधी कुलीन वर्गो ने इन सारी प्रक्रियाओं का विरोध किया, साथ ही इनके संगठन &#8211; मुस्लिम लीग और आरएसएस &#8211; मुख्यतः केवल पुरूषों के संगठन थे. हमारे संविधान में पुरूषों एवं स्त्रियों को समान अवसर और समान दर्जा देने का जो प्रावधान किया गया, वह अत्यंत उपयुक्त है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">जहां मुस्लिम लीग की विचारधारा के कारण पाकिस्तान में तबाही हुई, वहीं भारत में महिलाओं की समानता का सबसे प्रमुख विरोधी संगठन आरएसएस था. जब 1936 में लक्ष्मीबाई केलकर ने आरएसएस सरसंघचालक से महिलाओं को आरएसएस का सदस्य बनाए जाने का सुझाव दिया, तो उन्होंने इसे खारिज करते हुए उनसे राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना करने को कहा. यहां यह ध्यान देने योग्य है कि महिलाओं के संगठन के नाम &#8211; राष्ट्र सेविका समिति &#8211; में से ‘स्वयं’ शब्द गायब है. इसमें यह स्पष्ट संकेत निहित है कि महिलाओं को पुरूषों के अधीन रहना होगा. आरएसएस ने इस आधार पर भारतीय संविधान का भी विरोध किया कि इसमें गौरवशाली अतीत के मूल्यों को स्थान नहीं दिया गया है. अतीत के गौरवशाली मूल्यों से उनका आशय मनुस्मृति के मूल्यों से था इसमें कोई संशय नहीं है. आरएसएस हिन्दू कोड बिल के मूल प्रावधानों के पूर्णतः खिलाफ था जिसमें पिता की संपत्ति में महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिया गया था.</p>



<p class="wp-block-paragraph"><br>यह सारी बातें इसलिए मन में कौंध रही हैं क्योंकि राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज‘ कार्यक्रम (23 अगस्त 2026) को पुणे में केवल लड़कियों के लिए आयोजित किया गया था. हमारी आजादी के बाद के शुरूआती दशकों में महिलाओं और लड़कियों की समानता का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में बहुत से कदम उठाए गए लेकिन उसी काल में विभिन्न तरीकों से हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा को प्रबल करने के प्रयास भी हुए. इसका एक औजार थी गीता प्रेस, जिसने मनुस्मृति पर आधारित पुस्तकों का प्रकाशन दसियों लाख प्रतियों में किया. इस विचारधारा के बहुत से अन्य संगठनों ने अपनी कथनी और करनी के जरिए भी इस दिशा में कार्य किया.</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमें याद है कि रूपकुंवर को उनके पति की चिता पर जिंदा जला दिया गया था. जहां ज्यादातर समूहों, संगठनों एवं राजनैतिक दलों ने इस त्रासद घटना की निंदा की थी, जो पूर्णतः उचित था, वहीं भाजपा की तत्कालीन उपाध्यक्ष विजयाराजे सिंधिया संसद भवन तक एक जुलूस लेकर गईं जिसमें सती को एक गौरवशाली भारतीय परंपरा और महिलाओं का अधिकार बताने वाले नारे लगाए जा रहे थे. इसका दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने स्वयं अपने पति की मौत के बाद इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया! इसी तरह भाजपा महिला मोर्चा की पूर्व प्रमुख मृदुला सिन्हा ने सेवी पत्रिका के अप्रैल 1994 के अंक में प्रकाशित एक साक्षात्कार में कहा था कि महिलाओं को घर के बाहर जाकर काम नहीं करना चाहिए, जब तक कि ऐसा करना एकदम जरूरी न हो. उन्होंने पत्नियों के साथ मारपीट किए जाने और दहेज प्रथा को भी सही ठहराया था.</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुणे के आयोजन में राहुल गांधी ने महिलाओं की बातें सुनीं, जिन्होंने अपनी सुरक्षा, शिक्षा हासिल करने और स्वयं से जुड़े फैसले खुद लेने की राह में आने वाली बाधाओं, विभिन्न सामाजिक दबावों और एक पूर्ण नागरिक का जीवन जीने की राह में चुनौतियों की चर्चा की. राहुल गांधी ने इस कार्यक्रम को समाज सुधार के आह्वान में बदल दिया. यह महिलाओं की समानता के पक्ष में सामाजिक प्रक्रियाओं को मोड़ने का एक बड़ा प्रयास था. इस दिशा में संघर्षरत महिला समूहों को इस कार्यक्रम के भाव और संदेश से बहुत मदद मिलेगी.</p>



<p class="wp-block-paragraph">आज के भारत में संघ परिवार न केवल भारतीय संविधान के मूल्यों को कमजोर करने का प्रयास कर रहा है बल्कि महिलाओं एवं दलितों के संबंध में प्रतिगामी सामाजिक सोच को भी बढ़ावा दे रहा है. जहां उसके द्वारा ईसाईयों और मुसलमानों के खिलाफ फैलाई जा रही नफरत साफ नजर आती है वहीं वह महिलाओं के संबंध में मनुस्मृति के मूल्यों को तरजीह देने में जुटा हुआ है, जिसकी चर्चा पुणे के कार्यक्रम में हुई. राहुल गांधी ने इसके तीन स्पष्ट उदाहरण दिए. पहला, डॉ. मोहन भागवत का वह वक्तव्य जिसमें उन्होंने कहा था कि दुष्कर्म इंडिया में होते हैं भारत में नहीं. स्पष्टतः भारत से उनका आशय ग्रामीण क्षेत्रों से था, जो संविधान के मूल्यों की ओर ले जाने वाली प्रक्रियाओं से अपेक्षाकृत अप्रभावित रहे हैं. वे दलित और आदिवासी महिलाओं के साथ होने वाली दुष्कर्म की घटनाओं से अनजान होने का दिखावा कर रहे थे.</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल गांधी ने हिन्दू राष्ट्रवादियों की विचारधारा के केन्द्रबिन्दु का खुलासा करके बिल्कुल ठीक किया. उन्होंने सही कहा कि संघ परिवार मनुस्मृति का अनुमोदन करता है जिसके अनुसार लड़की को बचपन में अपने पिता, वयस्क होने पर पति और विधवा हो जाने पर अपने पुत्र के नियंत्रण में रहना होगा. राहुल गांधी का यह कथन एकदम सही था कि लड़कियों का अपना ‘सेल्फ’ होना चाहिए जिसकी कार्यक्रम में उपस्थित लड़कियों ने सराहना की.</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह कार्यक्रम महिलाओं की समानता के लिए चल रहे संघर्ष में एक मील का पत्थर बनना चाहिए. कार्यक्रम का संदेश बड़ा एवं स्पष्ट है. इसमें लड़कियों के अरमानों को अत्यंत बेबाकी से बयां किया गया. ‘राजनैतिक‘ शब्द के सामान्य मायनों से अलग रहते हुए, राहुल गांधी ने गहन सामाजिक स्तर पर अपना पक्ष रखा और उस सामाजिक ढांचे के बारे में बात की जिसे महिलाओं की समानता की खातिर संघर्ष के जरिए बदला जाना होगा. लड़कियों ने यह विचार भी व्यक्त किया कि वे आजादी, गरिमा और समानता से रह सकें, इसके लिए लड़कों को भी बदलना होगा. वे मानव जाति का आधा हिस्सा हैं, आधा भारत हैं, जिसे हिन्दू राष्ट्रवादी मानसिकता ने जकड़ा हुआ है. इसमें बदलाव लाना और भारतीय संविधान के मूल्यों को सशक्त करना जरूरी है. यह एक और वजह है कि जिसके कारण संघ परिवार के बढ़ते प्रभुत्व को चुनौती दी जानी चाहिए. </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>(अंग्रेजी से रूपांतरण-अमरीश हरदेनिया )</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-is-religious-domination-at-the-root-of-patriarchy-in-indian-society/">डॉ. राम पुनियानी का लेख- भारतीय समाज की पितृसत्ता के मूल में है धर्म‌सत्ता?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>डॉ. राम पुनियानी का लेख- जंतर मंतर के बाद का भारत: किस दिशा की ओर बढ़ रहा हमारा लोकतंत्र?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyanis-article-india-after-jantar-mantar-which-direction-is-our-democracy-moving-towards/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 23 Aug 2026 09:57:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#cjp]]></category>
		<category><![CDATA[#democracy]]></category>
		<category><![CDATA[#dr ram puniyani]]></category>
		<category><![CDATA[#india]]></category>
		<category><![CDATA[#jantar mantar]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=657</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;इस आंदोलन के बाद सरकार का विरोध करने में हिचकिचाहट में कमी आई है. कई जगहों पर जनरेशन अल्फा आंदोलन और विरोध कर रहा है. गोदी मीडिया का रुख जस का तस बना हुआ है. ऐसा महसूस हो रहा है कि अब सोशल मीडिया जैसे इंस्टाग्राम, यूटयूब और ट्विटर-फेसबुक समाज के हालातों को ज्यादा अच्छे &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyanis-article-india-after-jantar-mantar-which-direction-is-our-democracy-moving-towards/">डॉ. राम पुनियानी का लेख- जंतर मंतर के बाद का भारत: किस दिशा की ओर बढ़ रहा हमारा लोकतंत्र?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;इस आंदोलन के बाद सरकार का विरोध करने में हिचकिचाहट में कमी आई है. कई जगहों पर जनरेशन अल्फा आंदोलन और विरोध कर रहा है. गोदी मीडिया का रुख जस का तस बना हुआ है. ऐसा महसूस हो रहा है कि अब सोशल मीडिया जैसे इंस्टाग्राम, यूटयूब और ट्विटर-फेसबुक समाज के हालातों को ज्यादा अच्छे से प्रतिबिंबित कर रहे हैं.&#8217; पढ़ें सुपरिचित इतिहासकार डॉ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">जंतर मंतर पर हुए आंदोलनों ने हमारे देश की राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला है. कॉकरोच जनता पार्टी ने कई आंदोलन किए और सरकार द्वारा विरोध के दमन से समाज के कई वर्गों को पीड़ा झेलनी पड़ी. वैसे घोषित तौर पर यह आंदोलन परीक्षाओं के पर्चे लीक होने पर केन्द्रित था लेकिन इसके यह स्वरुप अख्तियार करने की वजह सामाजिक-आर्थिक तंत्र में व्याप्त गड़बड़ियां थीं. पैलेट गन और बंदूकों के इस्तेमाल के मामले सामने आने के बाद तो लोगों के गुस्से ने जुगुप्सा का रूप ले लिया. यह मुद्दा इतना बड़ा था कि साकार के प्रमुख नेता &#8211; प्रधानमंत्री और गृहमंत्री &#8211; संसद के सत्र में भाग लेने तक की हिम्मत नहीं जुटा सके. वे देश को यह यकीन दिलाने की कोशिश करते रहे कि विपक्ष के हंगामे के चलते संसद में चर्चा नहीं हो पा रही है, इसलिए वहां जाने का कोई औचित्य नहीं है.</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="349" height="408" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM.jpeg" alt="डा. राम पुनियानी" class="wp-image-652" style="aspect-ratio:0.8554991539763114;width:143px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM.jpeg 349w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM-257x300.jpeg 257w" sizes="(max-width: 349px) 100vw, 349px" /><figcaption class="wp-element-caption">डा. राम पुनियानी</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">इन आंदोलनों के मोटे तौर पर तीन केंद्र थे &#8211; कॉकरोच, वामपंथी रूझान वाले युवा और कांग्रेस के नेतृत्व वाला प्रतिरोध. आंदोलन का चमत्कारी नतीजा हुआ क्योंकि सरकार, जिसे ‘निर्वाचित तानाशाही‘ कहा जा रहा है, ने भय का माहौल कायम कर रखा था. वह सरकार की आलोचना और उसके खिलाफ आंदोलनों को राष्ट्रद्रोह कहकर खारिज करती आ रही थी और जब भी मुमकिन होता था, वह सत्ता की ताकत का इस्तेमाल कर मानवाधिकारों के पक्ष में उठने वाली आवाजों को कुचलने का हर संभव प्रयास करती थी. उमर खालिद और शरजिल इमाम छः साल से भी अधिक से जेल में हैं. अभी तक उनके मुकदमों की सुनवाई तक शुरू नहीं हुई है. इस मामले से मानवाधिकारों के मामले में भारत की दयनीय स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है. भीमा कोरेगांव मामले से जुड़े बुद्धिजीवी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी भी इसी स्थिति को रेखांकित करती है. फॉदर स्टेन स्वामी की संस्थागत हत्या दर्शाती है कि शासन तंत्र कितना जालिम है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस आंदोलन के बाद सरकार का विरोध करने में हिचकिचाहट में कमी आई है. कई जगहों पर जनरेशन अल्फा आंदोलन और विरोध कर रहा है. गोदी मीडिया का रुख जस का तस बना हुआ है. ऐसा महसूस हो रहा है कि अब सोशल मीडिया जैसे इंस्टाग्राम, यूटयूब और ट्विटर-फेसबुक समाज के हालातों को ज्यादा अच्छे से प्रतिबिंबित कर रहे हैं. सरकार शुरू में इस आंदोलन को राष्ट्रविरोधियों और आतंकियों द्वारा प्रायोजित बता रही थी और उसके खिलाफ अपने कई अन्य पसंदीदा अपशब्दों का इस्तेमाल कर रही थी, जैसा कि तानाशाह अक्सर करते हैं. लेकिन आंदोलन की आंधी इतनी तेज थी कि भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस और बंजरग दल आदि सभी ने अपने सुर बदल लिए और बढ़-चढ़कर अपने आपको आंदोलन का समर्थक साबित करने में जुट गए. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत तो इस हद तक आगे बढ़ गए कि उन्होंने जेन ज़ी के 2000 लोगों की बैठक आयोजित की और उन्हें लोकतंत्र की खूबियों के बारे में बताया.<br>एक दिलचस्प घटना यह हुई कि इस बैठक में किसी ने उनसे पूछ लिया कि आरएसएस ने स्वतंत्रता के बाद 52 सालों तक तिरंग क्यों नहीं फहराया. उन्होंने इस सवाल को टालते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में तिरंगे से जुड़ा एक किस्सा सुनकर स्वयं को इस परेशानी भरी स्थिति से उबारा. उनकी खुशकिस्मती से वहां कोई ऐसा व्यक्ति मौजूद नहीं था जो पूछता कि उनके संगठन से जुड़े लोगों ने अंबेडकर का पुतला क्यों जलाया था. भागवत के समर्थक इसे लोकतान्त्रिक प्रणाली की एक गौरवशाली नजीर बताते हुए जश्न मना रहे हैं. उनके समर्थक यह भी कह रहे हैं कि जहां भी आंदोलनों का दमन किया गया वहां ‘अराजकता‘ के हालात बन गए. हम यह अच्छे से जानते हैं कि अब तक सरकार की नीतियों के खिलाफ हुए सभी बड़े आंदोलनों को संघ परिवार ने या तो नजरअंदाज किया है या उनका दमन किया है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">किसानों के आंदोलन की पूरी तरह उपेक्षा की गई. सरकार ने जब चुनावी बाध्यताओं के चलते कृषि संबंधी तीन कानून वापिस लिए तब तक लगभग 600 किसान अपनी जान खो चुके थे. शाहीनबाग आंदोलन का मामला तो और अधिक दुःखद है. इस आंदोलन को नजरअंदाज किया गया, उसका दानवीकरण किया गया और आंदोलन खत्म करवाने के लिए हिंसा करवाई गई. हमें जेएनयू में हुआ आन्दोलन भी याद है जिसका दमन और दानवीकरण किया गया (टुकड़े-टुकड़े गेंग), विश्वविद्यालय की प्रकृति बदलने का प्रयास किया गया और उसे दक्षिणपंथियों का अड्डा बना दिया गया.</p>



<p class="wp-block-paragraph">सच तो यह है कि आरएसएस की हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा में लोकतान्त्रिक नीतियों के लिए कोई स्थान नहीं है. लोकतंत्र में विरोधियों से चर्चा एक सामान्य बात है, ना कि मजबूरी में, कोई अन्य विकल्प न होने पर, अपनाया जाने वाला रास्ता, जैसा इस बार भागवत का रवैया था.</p>



<p class="wp-block-paragraph">धर्म-आधारित राष्ट्रवाद का विचार ही लोकतंत्र के एकदम खिलाफ है. आरएसएस, जो सामंतवाद और उपनिवेशवाद के बचे-खुचे तत्वों से उभरा था, ने लोकतांत्रिक संविधान का विरोध किया. जहां हमें जाति और लिंग आधारित गैर-बराबरी साफ नजर आती रही है, वहीं आर्थिक असमानता, खासतौर से पिछले 12 सालों में क्रोनी केपेटिलिज्म और समाज के ऊंचे तबकों को प्राथमिकता दिए जाने के कारण, और ज्यादा साफ दिखने लगी है. ऐसी विचारधारा वालों से लोकतांत्रिक नीतियों की उम्मीद करना एकदम बेकार है,</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्या हम लोकतांत्रिक प्रतिरोध के रास्ते एक तानाशाह सरकार का स्थान एक लोकतांत्रिक सरकार द्वारा लिए जाने की उम्मीद कर सकते हैं – एक ऐसी सरकार जो भारतीय संविधान, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों और समावेशी राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्ध हो? ऐसा लगता है कि वर्तमान में लोकतांत्रिक मूल्यों का अवमूल्यन जिस सीमा तक हो चुका है, उसके चलते समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना एक बड़ी चुनौती है, जिस पर हमें विजय हासिल करनी होगी. जंतर मंतर से शुरू हुए आंदोलन ने सारे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है क्योंकि साधारण लोगों की मूलभूत समस्याओं की उपेक्षा की जा रही है. हालांकि ताजगी भरी हवा बह रही है लेकिन हिन्दू राष्ट्रवादियों द्वारा पैदा की गई सड़ांध ज्यादा गहरी है. मुसलमानों और ईसाईयों के प्रति नफरत गहरी जड़ें पकड़ चुकी है. आरएसएस के प्रचारकों की जबरदस्त घुसपैठ विभिन्न संस्थानों जैसे निर्वाचन आयोग, ईडी, सीबीआई, नौकरशाही, पुलिस और विश्वविद्यालयों व शिक्षण संस्थाओं में हो चुकी है. इसके असर को भारतीय संस्कृति की जड़ें मजबूत करके ही कम किया जा सकता है, जो परत दर परत विकसित हुई (नेहरू के अनुसार इन विभिन्न परतों का शांतिपूर्ण सहअस्तित्व है और वे शांतिपूर्वक एक-दूसरे से संवाद करती हैं), जो भारत की आजादी के आंदोलन के दौरान अपने शिखर पर पहुंची और जिसे आरएसएस की पिछले 100 सालों की कारगुजारियों ने क्षत-विक्षत कर दिया है.<br>यह बहुत राहत की बात है कि इन आंदोलनों से भय का माहौल काफी हद तक कम हुआ है. यह निश्चित ही भारतीयों के रूप में हमें उसी तरह एकताबद्व करेगा जैसा कि आजादी के आंदोलन की वजह से हुआ था. हमारे सामने सवाल यह है कि भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध राजनैतिक दलों को दुबारा कैसे सशक्त किया जाए. जहां मौजूदा माहौल, जिसमें हम खुलकर सांस लेने की उम्मीद कर सकते हैं, स्वागतयोग्य है, वहीं राज्यसत्ता को साम्प्रदायिक तत्वों से मुक्त कराने की चुनौती हमारे सामने है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">अगला कदम काफी कठिन और चुनौतीपूर्ण है, लेकिन ‘भारत के विचार‘ की पुनर्स्थापना के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, जो आजादी के आंदोलन के दौरान उभरा था. हमें उन युवकों को सलाम करना चाहिए जिन्होंने दमनकारी माहौल को तोड़़ा और और चुनावी मोर्चे पर क्या किया जाना है, इस पर विचार करना चाहिए.</p>



<p class="wp-block-paragraph"><br>(अंग्रेजी से रूपांतरण- अमरीश हरदेनिया )</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyanis-article-india-after-jantar-mantar-which-direction-is-our-democracy-moving-towards/">डॉ. राम पुनियानी का लेख- जंतर मंतर के बाद का भारत: किस दिशा की ओर बढ़ रहा हमारा लोकतंत्र?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>80वां स्वतंत्रता दिवसः किस दिशा में जा रहा है हमारा लोकतंत्र?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/80th-independence-day-which-direction-is-our-democracy-heading/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 Aug 2026 07:08:36 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#democracy]]></category>
		<category><![CDATA[#dr ram puniyani]]></category>
		<category><![CDATA[#freedom struggle]]></category>
		<category><![CDATA[#independence day]]></category>
		<category><![CDATA[#indian history]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=650</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;पिछले कुछ दशकों में भारतीय दक्षिणपंथ के उदय के साथ आरएसएस और उसके कुनबे ने राष्ट्र की दिशा और उसके लक्ष्यों को बदल दिया है। हिन्दू धर्म के नाम पर मनमाने ढंग से राजनीति की जा रही है जिससे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उभरा &#8220;आईडिया ऑफ इंडिया&#8221; कमजोर हुआ है।&#8217; पढ़ें सुप्रसिद्ध इतिहासकार डाॅ. राम &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/80th-independence-day-which-direction-is-our-democracy-heading/">80वां स्वतंत्रता दिवसः किस दिशा में जा रहा है हमारा लोकतंत्र?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;पिछले कुछ दशकों में भारतीय दक्षिणपंथ के उदय के साथ आरएसएस और उसके कुनबे ने राष्ट्र की दिशा और उसके लक्ष्यों को बदल दिया है। हिन्दू धर्म के नाम पर मनमाने ढंग से राजनीति की जा रही है जिससे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उभरा &#8220;आईडिया ऑफ इंडिया&#8221; कमजोर हुआ है।&#8217; पढ़ें सुप्रसिद्ध इतिहासकार डाॅ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img decoding="async" width="349" height="408" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM.jpeg" alt="डाॅ. राम पुनियानी" class="wp-image-652" style="width:155px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM.jpeg 349w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM-257x300.jpeg 257w" sizes="(max-width: 349px) 100vw, 349px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">भारत की स्वतंत्रता हमारे लोगों के ब्रिटिश-विरोधी जनसंघर्ष की बहुत बड़ी सफलता थी। आजादी की लड़ाई में सभी धर्मों, जातियों और लिंगों के लोगों और विभिन्न भाषा-भाषियों ने भाग लिया। इस संघर्ष में स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय के मूल्य हमारे मार्गदर्शक थे। भगत सिंह जैसे लोगों ने जाति और वर्ग की सीमाओं के परे सभी लोगों के अधिकारों और आजादियों पर जोर दिया। अम्बेडकर ने जाति और वर्ण की दीवारें तोड़ने और सभी लोगों की समानता (सामाजिक न्याय) को सर्वाधिक महत्व दिया। और गांधी, जो संघर्ष के सबसे महत्वपूर्ण नेता थे, का जोर बंधुत्व पर था। नए उभरते वर्गों &#8211; उद्योगपति, व्यापारी, कामगार, महिलाओं और आदिवासियों &#8211; ने इन नेताओं का साथ दिया। ये तीन महानायक आधुनिक राज्य के तीन मुख्य स्तंभों का प्रतिनिधित्व करते थे और उन्होंने स्वाधीन भारत को गहरे तक प्रभावित किया। स्वतंत्रता आंदोलन के यही मूल्य भारतीय संविधान का आधार हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">औद्योगिकरण, संचार साधनों के विकास और आधुनिक शिक्षा के चलते सशक्त हुए नए उभरते वर्गों ने एक ऐसे देश का सपना देखा जिसमें समावेशी राष्ट्रवाद के रास्ते शांति एवं उन्नति सुनिश्चित होगी। मौटे तौर पर देश का वर्गीय विभाजन यही था, हालांकि इसके कुछ अपवाद भी थे। आधुनिक भारत की पक्षधर इन ताकतों के विरोध में खड़े थे समाज के अस्त होते वर्ग, जिनमें शामिल थे पुराने राजा, नवाब और जागीरदार और समाज का प्रभुत्वशाली तबका जो जाति एवं लिंग पर आधारित ऊंच-नीच के सामंती मूल्यों में आस्था रखता था। इन वर्गों में पितृसत्तात्मकता जड़ें जमाए हुए थी और वे राजशाही और सामंतशाही के मूल्यों के बोलबाले वाले दौर का यशोगान करते थे। इन वर्गों के ज्यादातर लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध किया और भारत के प्राचीन &#8220;गौरवशाली अतीत&#8221; का महिमामंडन करते रहे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उन्होंने आगे बढ़ते हुए भी पीछे जाने की तरकीबें निकाली। ये तरकीबें जमींदारों, राजाओं आदि के जरिए आईं। वे कामगारों, दलितों, महिलाओं और आदिवासियों को आवाज मिलने से भयभीत थे। वे अपने-अपने धर्मों के शासकों और उनके काल के सामाजिक मूल्यों को सर्वश्रेष्ठ बताते थे। मुस्लिम लीग को मुख्यतः नवाबों और जमींदारों का साथ हासिल था जबकि हिन्दू महासभा-आरएसएस को राजाओं, जमींदारों और पुरोहित वर्गों का समर्थन मिल रहा था। ये दोनों वर्ग लोकतांत्रिक समाज के उभरते हुए मूल्यों, सभी की आधुनिक शिक्षा तक पहुंच और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के विरोधी थे। ये वर्ग धर्म को राष्ट्र का आधार मानते थे, जिसे सावरकर ने अपनी पुस्तक &#8220;हिन्दुत्व ऑर हू इज अ हिन्दू&#8221; में स्पष्ट शब्दों में अभिव्यक्त किया है। ये दोनों प्रवृत्तियां राष्ट्रीय आंदोलन के ब्रिटिश-विरोधी संघर्ष के खिलाफ थीं, जो बहुत दुखद था। धर्म के आधार पर देश का बंटवारा भारतीय राष्ट्रवाद पर सबसे बड़ा आघात था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">संविधानसभा देश की विविधता का प्रतिनिधित्व करती थी। मनुस्मृति का दहन करने वाले अम्बेडकर को संविधान का मसौदा तैयार करने वाली महत्वपूर्ण समिति का अध्यक्ष बनाया गया। संविधान के तैयार होने के कुछ ही समय बाद आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर’ ने इस आधार पर संविधान की तीखी आलोचना की कि उसमें मनुस्मृति के प्राचीन मूल्यों को कोई जगह नहीं दी गई है। इन तत्वों ने आंबेडकर और नेहरू की तस्वीरों को जलाया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">स्वतंत्र भारत को गांधीजी के दो पक्के चेलों &#8211; नेहरू और पटेल &#8211; का नेतृत्व मिला। जहां पटेल ने अधिकांश राजे-रजवाड़ों का भारत में सफलतापूर्वक विलय करवाया वहीं नेहरू ने संविधान के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करते हुए आधुनिक भारत के स्वप्न को साकार करने हेतु बनाई गई योजनाओं को अमली जामा पहनाया। &#8216;एक व्यक्ति एक मत&#8217; के सिद्धांत पर सफलतापूर्वक अमल किया गया और नेहरू की लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता, जो एक तरह से जुड़वां हैं, के प्रति गहन आस्था के चलते देश में लोकतंत्र की जड़ें गहराई तक जम गईं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नेहरू के आधुनिक शिक्षा (आईआईटी, आईआईएम, एम्स आदि), सार्वजनिक क्षेत्र और सिंचाई के साधनों के निर्माण पर जोर और आरक्षण की नीति पर अमल से एक हद तक समानता कायम हुई। कुछ दशकों पहले भारत और पाकिस्तान की स्थिति की तुलना करने वाले कुछ टिप्पणीकारों का कहना था कि शिक्षा, औद्योगिकरण आदि के क्षेत्रों में भारत की सफलताओं और पाकिस्तान की असफलता के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन इसकी एक मुख्य वजह यह थी कि भारत को जवाहरलाल नेहरू का नेतृत्व हासिल था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पिछले कुछ दशकों में भारतीय दक्षिणपंथ के उदय के साथ आरएसएस और उसके कुनबे ने राष्ट्र की दिशा और उसके लक्ष्यों को बदल दिया है। हिन्दू धर्म के नाम पर मनमाने ढंग से राजनीति की जा रही है जिससे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उभरा &#8220;आईडिया ऑफ इंडिया&#8221; कमजोर हुआ है। जो लोग स्वाधीनता आंदोलन में अपने घरों से बाहर नहीं निकले और आजादी की लड़ाई और समावेशिता और समानता के उसके मूल्य का विरोध करते रहे, वे अब देश पर काबिज हैं। नतीजे में देश का विकास अवरूद्ध हो गया है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाई जा रही है जिससे हमारे समाज से बंधुत्व का भाव गायब हो रहा है। हाल में परीक्षा प्रणाली की असफलता के मुद्दे पर चलाए गए आंदोलन की सफलता ने निश्चित तौर पर वर्तमान सरकार के अहंकार को कुछ हद तक तोड़ा है मगर हिन्दुत्व राष्ट्रवादियों की दिशा और उनके लक्ष्य अब भी वही हैं। हमारे देश की प्रजातांत्रिक आत्मा और भारतीय संविधान के मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए एक कठिन और लंबे संघर्ष की जरूरत है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">संघ परिवार ने समाज में नफरत के बीज बो दिए हैं। उसने राज्यतंत्र के सभी हिस्सों में घुसपैठ कर ली है। संघ परिवार की सरकारों की नीतियों के कारण जो असंतोश पैदा हो रहा था उसने हाल में कॉकरोच आंदोलन का स्वरूप ले लिया। इस आंदोलन से यह सुनिश्चित हुआ कि ‘‘निर्वाचित तानाशाह’’ सरकार का डर कुछ समय के लिए ही सही मगर कम हुआ। मगर आरएसएस के कुनबे ने देश को जो गहरे घाव दिए हैं उन्हें भरने में वक्त लगेगा। उन्होंने देश की राजनीति को गहरे तक प्रभावित किया है। हमें हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्ध इस सरकार की जगह भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध और समर्पित सरकार चाहिए। नफरत फैलाने वाले झूठे नैरेटिव ने हमारी सामूहिक सोच पर कब्जा जमा लिया है। उनका मुकाबला उन नैरेटिव से किया जाना चाहिए जो भारतीयों के बीच सदियों से व्याप्त प्रेम, भाईचारे और दोस्ताना संबंधों पर आधारित हों, उन नैरेटिव से जिन्हें सुभाषचन्द्र बोस, महात्मा गांधी, सरदार पटेल और पंडित नेहरू ने भारतीयों के मानस में बिठाने का प्रयास किया था। जंतर मंतर में पिछले दिनों जो हुआ वह भारत की सदियों पुरानी सभ्यता को पुनर्जीवित करने की दिशा में पहला कदम था। इसी पुनर्जीवन से हमें दुनिया के देशों में अपना उचित स्थान हासिल होगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अल्पसंख्यकों के साथ ‘समान नागरिक’ के रूप में व्यवहार किया जाना चाहिए। सरकार की तानाशाही खत्म होनी चाहिए और हमें तार्किक और वैज्ञानिक आधारों पर राष्ट्र निर्माण का काम फिर से शुरू करना चाहिए। जंतर मंतर एक शुरूआत भर है। गांधी और आंबेडकर, भगत सिंह और सुभाष बोस, मौलाना आजाद और सरदार पटेल के सपनों को पूरा करने के लिए हमें अभी एक लंबा रास्ता तय करना है। आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/80th-independence-day-which-direction-is-our-democracy-heading/">80वां स्वतंत्रता दिवसः किस दिशा में जा रहा है हमारा लोकतंत्र?</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>क्या राहुल अपनी तीसरी और निर्णायक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर निकलने वाले हैं ? -श्रवण गर्ग</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/is-rahul-going-to-embark-on-his-third-and-decisive-bharat-jodo-yatra-shrawan-garg/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Aug 2026 07:33:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#rahulgandhi]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=639</guid>

					<description><![CDATA[<p>पत्रकार श्रवण गर्ग मान लिया जाना चाहिए कि अमित शाह मानसून सत्र के बचे दो दिनों में भी लोकसभा का रुख़ नहीं करेंगे ! हक़ीक़त में तो उनके सदन में आने की कोई ज़रूरत भी नहीं बची है।उनके द्वारा पेश किए जाने वाले विधेयक जूनियर मंत्रियों द्वारा प्रस्तुत करवाये ही जा चुके हैं। गृहमंत्री अगर &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/is-rahul-going-to-embark-on-his-third-and-decisive-bharat-jodo-yatra-shrawan-garg/">क्या राहुल अपनी तीसरी और निर्णायक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर निकलने वाले हैं ? -श्रवण गर्ग</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img decoding="async" width="450" height="450" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg" alt="पत्रकार श्रवण गर्ग" class="wp-image-413" style="width:182px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg 450w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-300x300.jpg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-150x150.jpg 150w" sizes="(max-width: 450px) 100vw, 450px" /><figcaption class="wp-element-caption">पत्रकार श्रवण गर्ग</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">मान लिया जाना चाहिए कि अमित शाह मानसून सत्र के बचे दो दिनों में भी लोकसभा का रुख़ नहीं करेंगे ! हक़ीक़त में तो उनके सदन में आने की कोई ज़रूरत भी नहीं बची है।उनके द्वारा पेश किए जाने वाले विधेयक जूनियर मंत्रियों द्वारा प्रस्तुत करवाये ही जा चुके हैं। गृहमंत्री अगर सदन में आ जाते तब भी अपनी सफ़ाई या दावों में इससे ज़्यादा क्या कुछ नया बोलते जो उनके एक मंत्री जितेंद्र सिंह सदन के भीतर और दूसरे मंत्री जे पी नड्डा बाहर बोल चुके हैं ? नड्डा के कहे हुए को गृहमंत्री का आधिकारिक स्टेटमेंट भी माना जा सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">जितेंद्र सिंह ने ऑन रिकॉर्ड संसद में बोल दिया था कि बीस जुलाई को छात्रों पर कोई शूटिंग नहीं हुई। नड्डा ने तो उनसे भी चार कदम आगे बढ़कर यह कह दिया कि राहुल गांधी झूठ बोल रहे हैं। वे अराजकता फैलाना चाहते हैं। जंतर मंतर पर न तो कोई गोलियाँ चलाई गईं और न गोली चलाने के कोई ऑर्डर दिये गए। तृणमूल सांसद साकेत गोखले को आरटीआई के जवाब में मिली आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ दिल्ली के सिर्फ़ दो अस्पतालों में ही पैलेट गन के शिकार दस घायलों का इलाज किया गया है।बाक़ी दोअस्पतालों, जिनमें एक AIIMS भी शामिल है, की जानकारी प्राप्त होना अभी बाक़ी है। पैलेट गन से घायल हुए लोगों का आँकड़ा अभी तक तीन-चार तक ही सीमित था। क्या जवाब दे पाएँगे अमित शाह ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">अनुमान लगाया जा सकता है कि विपक्ष की माँगों पर सरकार के मंत्रियों द्वारा दिये जा रहे जवाबों और किए जा रहे हमलों से राहुल गांधी पूरी तरह उखड़ चुके हैं ! शायद इसीलिए अमित शाह के बयान की विपक्षी माँग को लेकर किरण रिजुजू के मार्फ़त सरकार द्वारा करवाई गई पेशकश पर राहुल गांधी ने ग़ुस्से से दो टूक जवाब दे दिया कि उन्हें गृहमंत्री की स्पीच नहीं सुननी है। उन्हें सिर्फ़ एक सवाल का जवाब चाहिए कि जंतर मंतर की बर्बरता के लिये कौन दोषी है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">अमित शाह बोलना नहीं चाहते और मोदीजी मौन हैं। प्रधानमंत्री शायद आश्चर्य में हों कि बारह सालों में पहली बार ऐसा हो रहा है कि राहुल गांधी के निशाने पर पर उनका सबसे प्रिय और निकटस्थ व्यक्ति है जो उनके लिए विपक्ष से लड़ता रहा है। क्या मोदीजी अपना मौन पंद्रह अगस्त को लालक़िले पर ही तोड़ेंगे ? बिना राहुल का नाम लिए ‘अराजकता’ फैलाने के लिए विपक्ष को धिक्कारेंगे ? युवाओं को उनकी ‘गलती’ के लिए माफ़ करने और उन्हें गले लगाने की स्क्रिप्ट एक बार फिर दोहराएँगे ? क्या विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी भीड़ में बैठे मोदीजी को सुनते नज़र आएँगे ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">लोग जानना चाहते हैं : पिक्चर अगर अभी बाक़ी है तो आगे का सीन क्या बनने वाला है ? क्या ‘जंतर मंतर’ से प्रारंभ हुई लड़ाई पंद्रह अगस्त के बाद सरकार के लिए अपने अस्तित्व की रक्षा करने और विपक्ष के लिए देश की दूसरी आज़ादी के संघर्ष में बदल सकती है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">भय व्यक्त किया जाना चाहिए कि देश के संसदीय इतिहास में जो नजारा संसद-परिसर में पहली बार (11 अगस्त को) प्रकट हुआ, जिसमें एनडीए और विपक्ष के सांसद अपने-अपने प्रदर्शनों के दौरान एक दूसरे के सामने आ गए और सुरक्षाकर्मियों को दीवार बनकर उनके बीच खड़ा होना पड़ा, क्या देश की सड़कों पर रिपीट हो सकता है ? ऐसा हुआ तो क्या सत्तारूढ़ दल के समर्थक लोकतांत्रिक औज़ारों और संवैधानिक संसाधनों की ही मदद लेंगे अथवा ‘जंतर मंतर’ का प्रयोग ही हर जगह दोहराया जाएगा ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्या राहुल को अपनी तीसरी और निर्णायक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर निकलना पड़ सकता है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>-श्रवण गर्ग, वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/is-rahul-going-to-embark-on-his-third-and-decisive-bharat-jodo-yatra-shrawan-garg/">क्या राहुल अपनी तीसरी और निर्णायक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर निकलने वाले हैं ? -श्रवण गर्ग</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>डाॅ. राम पुनियानी का लेख- आरएसएस की विचारधारा का असली चेहरा हैं टी. मोहनदास</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-s-article-t-mohandas-is-the-real-face-of-rss-ideology/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Aug 2026 04:36:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#cjp protest]]></category>
		<category><![CDATA[#dr ram puniyani]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#mohan bhagwat]]></category>
		<category><![CDATA[#mohandas]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=604</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;धरने में भाग लेने वाली लड़कियों और महिलाओं के बारे में मोहनदास की टिप्पणियां सीधे स्त्री-द्वेषी अपशब्दों और टिप्पणियों के शब्दकोश से उठाई गई हैं। मोहनदास जिस संस्था (आरएसएस) से जुड़े हुए हैं, उसमें सामंती और पितृसत्तात्मक मूल्यों का बोलबाला है, जिसमें महिलाओं को, सिद्धांततः पुरूषों की संपत्ति माना गया है।&#8217; पढ़ें सुप्रतिष्ठित इतिहासकार एवं &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-s-article-t-mohandas-is-the-real-face-of-rss-ideology/">डाॅ. राम पुनियानी का लेख- आरएसएस की विचारधारा का असली चेहरा हैं टी. मोहनदास</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;धरने में भाग लेने वाली लड़कियों और महिलाओं के बारे में मोहनदास की टिप्पणियां सीधे स्त्री-द्वेषी अपशब्दों और टिप्पणियों के शब्दकोश से उठाई गई हैं। मोहनदास जिस संस्था (आरएसएस) से जुड़े हुए हैं, उसमें सामंती और पितृसत्तात्मक मूल्यों का बोलबाला है, जिसमें महिलाओं को, सिद्धांततः पुरूषों की संपत्ति माना गया है।&#8217; पढ़ें सुप्रतिष्ठित इतिहासकार एवं लेखक डाॅ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="768" height="768" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png" alt="डा. राम पुनियानी" class="wp-image-468" style="width:165px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png 768w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-300x300.png 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-150x150.png 150w" sizes="(max-width: 768px) 100vw, 768px" /><figcaption class="wp-element-caption">डा. राम पुनियानी </figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">सरकार द्वारा जंतरमंतर पर धरना दे रहे आंदोलनकारियों की मांगें स्वीकार करने के बाद भी मामला पूरी तरह से सुलझा नहीं है। गिरफ्तारियां जारी हैं, और कई जगहों पर गिरफ्तार किए गए लोगों को रिहा नहीं किया गया है। ऐसी खबर है कि प्रदर्शनों की वजह से गिरफ्तार किए गए लोगों में मुसलमानों की संख्या अन्य वर्गों के लोगों की तुलना में अधिक है। जुनैद (जुनैद भाई) का मामला काफी परेशान करने वाला है। उन्होंने एक दल बनाया जो आंदोलनकारियों को पानी और खाना उपलब्ध करवाता था। अभिजीत दिपके ने उनके चरण स्पर्श कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। पुलिस ने उन्हें और उनके परिवार को उत्पीड़ित करने में अति सक्रियता और अति तत्परता दिखाई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उनके पास खाना बांटने के लिए पैसा कहां से आया? उन्होंने शुरू में केवल पानी उपलब्ध करवाया और बाद में अपने कुछ रिश्तेदारों के सहयोग से खाना बांटना शुरू किया। इसके बाद उन्हें कई दानदाताओं ने खाने-पीने का सामान उपलब्ध करवाया और उनका समूह एक तरह से आंदोलन स्थल पर मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का सबसे प्रमुख स्त्रोत बन गया। एक सराहनीय बात यह थी कि आंदोलनकारियों ने केन्द्र सरकार की साम्प्रदायिक राजनीति के खिलाफ भी नारेबाजी की। यह अच्छा है कि युवाओं को इस बात का ध्यान है कि सरकार लिखित समझौते में किए गए वायदे पूरे करने में अब तक असफल रही है। इस आंदोलन का सारे देश में यह सुखद प्रभाव हुआ है कि जो लोग दबा हुआ महसूस कर रहे थे अब वे कुछ हद तक अपने मुद्दों को खुलकर व्यक्त कर रहे हैं और ऐसा महसूस कर रहे हैं कि वे अब खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं। यह विरोध अभी अधबीच में है और युवाओें का उत्साह काबिले तारीफ है। वे दमनकारी तंत्र की जकड़ को ढीला करने के लिए भूरि-भूरि प्रशंसा के अधिकारी हैं। सवाल यह है, कि क्या यह जारी रह पाएगा, सवाल आम जनता के व्यापक असंतोष को सही दिशा देने का है, सवाल यह है कि क्या बड़े राजनैतिक गठबंधन इसे आगे बढ़ाएंगे और सुनिश्चित करेंगे कि कुछ हद तक लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना हो।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस आंदोलन का एक परिणाम यह भी हुआ कि कंगना रनौत जैसे कई लोगों, जिनके अनुसार देश ‘‘2014 में स्वतंत्र हुआ’’ ने जेन ज़ी को गटर जनरेशन बताया! शर्मनाक है ऐसे लोगों का नजरिया जिन्हें जंतर मंतर में व्याप्त सकारात्मकता और रचनात्मकता नजर नहीं आई। इसके साथ ही भाजपा के बौद्धिक प्रकोष्ठ के पूर्व प्रमुख टी. मोहनदास जैसे लोग भी हैं, जो भाजपा-आरएसएस में कई जिम्मेदार पदों पर रह चुके हैं, और जिनके कथनों से इन संस्थाओं की वास्तविक राजनैतिक विचारधारा और असली रंग सामने आता है। वे फरमाते हैं ‘‘अगर सत्ता पर मेरा नियंत्रण होता तो जंतर मंतर पर मौजूद आंदोलकारियों को बंदूक की गोलियों से मौत के घाट उतार दिया गया होता‘‘। उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘आंदोलन में शामिल महिलाएं चाहती हैं कि उनके साथ दुष्कर्म हो और अगर ऐसा होगा तो वे शिकायत तक नहीं करेंगीं‘‘।<br>हालांकि रणनीतिक कारणों से उनके वक्तव्य को खारिज कर दिया गया है, लेकिन सच्चाई यह है कि यदि आरएसएस का कोई सदस्य कोई वीभत्स या भयावह कार्य करता है या ऐसी कोई बात कहता है तो वह यह दावा करने लगता है कि उस व्यक्ति से उसका कोई संबंध नहीं है। ऐसा ही नाथूराम गोडसे के मामले में किया गया था जिसके बारे में आरएसएस ने दावा किया था कि उसका संघ से कोई लेनादेना नहीं था। यह इस तथ्य के बावजूद कि नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे ने अपनी पुस्तक ‘मे इट प्लीज योर ऑनर‘‘ में लिखा है कि नाथूराम सहित सभी भाईयों ने आरएसएस की शाखाओं में प्रशिक्षण प्राप्त किया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाले मोहनदास लोकतांत्रिक मानदंडों और महिलाओं की समानता दोनों को अवांछनीय बताते हैं और दोनों के प्रति तिरस्कार भाव रखते हैं। जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन को काबू में करने के लिए वे जो कदम उठाते वे उनका क्रम भी बताते हैं। सबसे पहले वे उस क्षेत्र में कर्फ्यू लागू करते, फिर भीड़ को तितर-बितर होने की चेतावनी देते, अगर इस आदेश का पालन नहीं होता तो गोलियां चलाने का आदेश दिया जाता और इसके नतीजे में जान गंवाने वाले और घायल हुए लोगों को अस्पताल पहुंचा दिया जाता। लोकतांत्रिक मानदंडों के प्रति जो तिरस्कार का भाव वे दिखा रहे हैं, वह भाजपा के नेतृत्व में पिछले 12-13 सालों से चल रही एनडीए सरकार के क्रियाकलापों में साफ नजर आ रहा है। वैश्विक सूचकांकों को देखने पर पता लगता है कि लोकतांत्रिक मानदंडों पर हमारा स्थान हर साल गिरते हुए निर्वाचित तानाशाही की श्रेणी तक पहुंच चुका है। सरकार जिस रास्ते पर चल रही है उससे भाजपा का मार्गदर्शक मंडल तक विक्षुब्ध है। पहले लालकृष्ण आडवानी ने कहा था कि यह अघोषित आपातकाल है और अब मुरली मनोहर जोशी ने आंदोलनकारियों से निपटने के लिए पुलिस द्वारा अपनाए गए तौर-तरीकों की आलोचना की है। फ्रीडम हाउस (आजादी का वैश्विक सूचकांक) पर भारत का स्थान 100 देशों में से 62वें स्थान पर है और भारत को राजनैतिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की बुरी स्थिति के मद्देनजर ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र‘ की श्रेणी में रखा गया है। इकोनोमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू) लोकतंत्र सूचकांक ने भारत को ‘दोशपूर्ण लोकतंत्र‘ की श्रेणी में रखा है। व्ही-डीम इंस्टीट्यूट (डेमोक्रेसी रिपोर्ट्स) ने भारत के शासन तंत्र को नागरिक एवं न्यायिक स्वतंत्रताओं की स्थिति में आई भारी गिरावट का हवाला देते हुए करीब-करीब ‘लोकतांत्रिक तानाशाही‘ के वर्ग में रखा है। रिपोटर्स विदाउट बाडर्स (विश्व में प्रेस स्वतंत्रता का सूचकांक) ने देश में मीडिया की आजादी पर बढ़ते प्रतिबंधों और पत्रकारों की सुरक्षा की बिगड़ती स्थिति के चलते 180 देशों में भारत को 157वें स्थान पर रखा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">धरने में भाग लेने वाली लड़कियों और महिलाओं के बारे में मोहनदास की टिप्पणियां सीधे स्त्री-द्वेषी अपशब्दों और टिप्पणियों के शब्दकोश से उठाई गई हैं। मोहनदास जिस संस्था (आरएसएस) से जुड़े हुए हैं, उसमें सामंती और पितृसत्तात्मक मूल्यों का बोलबाला है, जिसमें महिलाओं को, सिद्धांततः पुरूषों की संपत्ति माना गया है। साम्प्रदायिक राजनीति महिलाओं के शरीरों पर आधारित होती है। आरएसएस केवल पुरूषों की संस्था है जिसके सदस्य स्वयंसेवक कहलाते हैं। उसके अधीनस्थ महिलाओं की संस्था का नाम राष्ट्र सेविका समिति है। यहां महिलाएं मात्र सेविका (नौकरानी) हो सकती हैं। सेवी पत्रिका (अप्रैल 1994) में भाजपा की नेत्री मृदुला सिन्हा ने अपना नजरिया बताते हुए कहा था कि ‘दहेज लेने और देने में कुछ भी अनुचित नहीं है, पत्नियों के साथ मारपीट करना ठीक है और जब तक जबरदस्त आर्थिक संकट न हो तब तक महिलाओं को घर से बाहर निकलकर कामकाज नहीं करना चाहिए।’ यह हिटलर के महिलाओं के लिए जारी किए गए आदेशों जैसा ही है कि महिलाओं का जीवन रसोईघर, बच्चों और चर्च के इर्दगिर्द घूमना चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हिन्दुत्व के प्रमुख विचारक सावरकर ने महान राजा शिवाजी की इस बात के लिए निंदा की थी कि उन्होंने बसेन के राजा की बहू को ससम्मान वापिस भिजवा दिया था जिसे एक तोहफे के रूप में शिवाजी की सेना ले आई थी। उनके अनुसार प्रतिशोध के लिए मुस्लिम महिलाओं पर जुल्म ढ़ाना जरूरी था।<br>आरएसएस अपनी वास्तविक विचारधारा को छिपाने के लिए भ्रामक बातें करता है लेकिन सच बार-बार सामने आ ही जाता है। पिछली बार अन्ना एवं केजरीवाल के नेतृत्व में हुए आंदोलन को आरएसएस ने सहारा दिया था ताकि उसके जरिए कांग्रेस को बदनाम किया जा सके। इसलिए इस बार हमें सावधान रहने की जरूरत है। यह जरूरी है कि हम धीरे-धीरे लोकतंत्र के रास्ते पर वापिस लौटें, लोकतांत्रिक ताकतों को कंधे से कंधा मिलाकर जोर लगाना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि टी. मोहनदास और उनके विचारधारात्मक गुरू इस सुंदर प्रतिरोध पर काबिज होकर हिन्दू राष्ट्रवाद के विभाजनकारी एजेंडे को सशक्त बनाने में कामयाब न हो पाएं। देश के ज्यादातर लोग वर्तमान शासकों से तंग आ चुके हैं और अगर चुनाव ईमानदारी से करवाए गए (यह एक बड़ा अगर है) तो धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र में इन्हें कोई जगह नहीं मिल पाएगी। मोहनदास का वक्तव्य एक अन्य मोहनदास की राजनीति का धुर विरोधी है जिन्हें नेताजी बोस का अनुसरण करते हुए हम ‘राष्ट्रपिता‘ कहते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><br>(अंग्रेजी से रूपांतरण &#8211; अमरीश हरदेनिया )</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-s-article-t-mohandas-is-the-real-face-of-rss-ideology/">डाॅ. राम पुनियानी का लेख- आरएसएस की विचारधारा का असली चेहरा हैं टी. मोहनदास</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>क्या है ज़ुकरबर्ग की &#8220;माफ़ी&#8221; के पीछे का सच ? -शीतल पी. सिंह</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/what-is-the-truth-behind-zuckerberg-s-apology-sheetal-p-singh/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 07 Aug 2026 05:10:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[विदेश]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#facebook]]></category>
		<category><![CDATA[#meta]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<category><![CDATA[#sheetal p singh]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=586</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;ज़ुकरबर्ग ने किसी सार्वजनिक मंच पर आकर भारतीय नागरिकों या संसद के सामने विस्तृत माफी नहीं मांगी। कोई विस्तृत सार्वजनिक पत्र भी सामने नहीं आया, जिसमें साफ लिखा हो कि कंपनी कौन-सी जिम्मेदारी स्वीकार कर रही है और भविष्य में क्या बदलाव करेगी। यही वह जगह है जहां भारत और दूसरे देशों में मेटा की &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/what-is-the-truth-behind-zuckerberg-s-apology-sheetal-p-singh/">क्या है ज़ुकरबर्ग की &#8220;माफ़ी&#8221; के पीछे का सच ? -शीतल पी. सिंह</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;ज़ुकरबर्ग ने किसी सार्वजनिक मंच पर आकर भारतीय नागरिकों या संसद के सामने विस्तृत माफी नहीं मांगी। कोई विस्तृत सार्वजनिक पत्र भी सामने नहीं आया, जिसमें साफ लिखा हो कि कंपनी कौन-सी जिम्मेदारी स्वीकार कर रही है और भविष्य में क्या बदलाव करेगी। यही वह जगह है जहां भारत और दूसरे देशों में मेटा की जवाबदेही का अंतर दिखाई देता है।&#8217; पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की पूरी टिप्पणी&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="715" height="715" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1.jpeg" alt="पत्रकार शीतल पी सिंह" class="wp-image-457" style="width:151px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1.jpeg 715w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1-300x300.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1-150x150.jpeg 150w" sizes="(max-width: 715px) 100vw, 715px" /><figcaption class="wp-element-caption">पत्रकार शीतल पी सिंह</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">कल परसों से प्रचारित किया गया है कि फेसबुक के मालिक मार्क ज़ुकरबर्ग ने भारत सरकार से माफी मांगी है। हर मामले की तरह प्रचारक इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महाबली होने की इमेज में जोड़ रहे हैं जिसमें इधर काकरोचों ने काफ़ी गहरी ख़रोंच मार दी है। घटना पूरी तरह काल्पनिक नहीं है, लेकिन जिस तरह इसे पेश किया जा रहा है, उसमें कथा कहानी बहुत अधिक और सच्चाई बहुत कम है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत मेटा के लिए कितना महत्वपूर्ण है? फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप चलाने वाली मेटा दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में है। उसकी कमाई विज्ञापनों से होती है। वर्ष 2025 में मेटा की वैश्विक आय लगभग 201 अरब डॉलर थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत में फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप के उपयोगकर्ताओं की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है जिसके अलग-अलग ऐप्स के संयुक्त मासिक उपयोगकर्ताओं की संख्या एक अरब से अधिक बताई जाती है। इसका अर्थ एक अरब अलग-अलग लोग नहीं है, क्योंकि एक ही व्यक्ति फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप तीनों इस्तेमाल कर सकता है। फिर भी भारत का आकार असाधारण है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वित्तीय वर्ष 2024-25 में मेटा इंडिया का शुद्ध लाभ लगभग 648 करोड़ रुपये और परिचालन आय लगभग 3,793 करोड़ रुपये रही। लेकिन भारत में उसके प्लेटफॉर्मों से जुड़ा सकल विज्ञापन कारोबार लगभग 29 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था। ये दोनों आंकड़े अलग हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की आय, विज्ञापन बिक्री और समूह कंपनियों के बीच भुगतान अलग-अलग खातों में दर्ज होते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत से मेटा को प्रति उपयोगकर्ता अमेरिका या यूरोप जितनी कमाई नहीं होती। लेकिन यहां करोड़ों नए इंटरनेट उपयोगकर्ता, छोटे व्यापारी, राजनीतिक दल, मीडिया संस्थान, फिल्म उद्योग, धार्मिक संगठन और सरकारी विभाग उसके प्लेटफॉर्मों पर निर्भर हैं। विकसित देशों में बाजार काफी हद तक भर चुका है, जबकि भारत में डिजिटल विज्ञापन और इंटरनेट कारोबार अभी बढ़ रहा है। इसीलिए भारत मेटा की आज की कमाई से अधिक उसके भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऐसे विशाल बाजार में सरकार से टकराना किसी भी कंपनी के लिए आसान नहीं है। सरकार नोटिस भेज सकती है, सामग्री हटाने को कह सकती है, अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर सकती है और कंपनी की कानूनी सुरक्षा पर सवाल उठा सकती है। इसलिए मेटा भारत सरकार की नाराजगी को हल्के में नहीं ले सकता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अब हाल की माफी का मामला समझिए। जुलाई 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो फेसबुक पर कुछ समय के लिए सीमित हो गया था। मेटा ने इसे अपनी प्रक्रिया से जुड़ी गलती बताया। इस पर भाजपा सांसद और इलेक्ट्रॉनिक मामलों की संसदीय समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने मांग की कि मेटा के भारतीय अधिकारियों की ओर से दिया गया स्पष्टीकरण पर्याप्त नहीं है और मार्क ज़ुकरबर्ग स्वयं माफी मांगें। उन्होंने मेटा की कानूनी सुरक्षा वापस लेने की चेतावनी दे दी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके बाद भारत सरकार और मेटा के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बैठक हुई। चर्चा केवल प्रधानमंत्री के वीडियो तक सीमित नहीं थी। बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री, डीपफेक, आपत्तिजनक विज्ञापन, बॉट्स और सत्यापित खातों की सुरक्षा जैसे प्रश्न भी उठे। सरकारी सूत्रों के अनुसार मेटा अधिकारियों ने प्रधानमंत्री का वीडियो हटाए जाने पर खेद व्यक्त किया और ज़ुकरबर्ग की ओर से भी माफी का संदेश दिया गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसलिए यह कहना गलत नहीं है कि मेटा या ज़ुकरबर्ग की ओर से भारत सरकार के सामने खेद प्रकट किया गया। लेकिन यह भी सच है कि ज़ुकरबर्ग ने किसी सार्वजनिक मंच पर आकर भारतीय नागरिकों या संसद के सामने विस्तृत माफी नहीं मांगी। कोई विस्तृत सार्वजनिक पत्र भी सामने नहीं आया, जिसमें साफ लिखा हो कि कंपनी कौन-सी जिम्मेदारी स्वीकार कर रही है और भविष्य में क्या बदलाव करेगी। यही वह जगह है जहां भारत और दूसरे देशों में मेटा की जवाबदेही का अंतर दिखाई देता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अमेरिका में कैम्ब्रिज एनालिटिका मामले के सामने आने के बाद ज़ुकरबर्ग को संसद के सामने घंटों बैठकर सवालों का जवाब देना पड़ा था। करोड़ों लोगों का डेटा बिना उचित सहमति के राजनीतिक प्रचार में इस्तेमाल किए जाने का मामला सामने आया था। अमेरिकी नियामक ने फेसबुक पर पांच अरब डॉलर का जुर्माना लगाया। कंपनी को अपनी निजता और निगरानी व्यवस्था बदलनी पड़ी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अमेरिका में ज़ुकरबर्ग से चुनावों में हस्तक्षेप, डेटा चोरी, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप के अधिग्रहण, बाजार पर एकाधिकार और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य जैसे सवालों पर भी पूछताछ हुई। वर्ष 2024 में सोशल मीडिया से नुकसान झेलने वाले बच्चों के माता-पिता के सामने भी ज़ुकरबर्ग ने खेद व्यक्त किया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यूरोपीय संघ ने मेटा पर डेटा सुरक्षा उल्लंघनों के लिए अरबों यूरो के जुर्माने लगाए हैं। यूरोपीय नागरिकों का डेटा अमेरिका भेजने के मामले में अकेले 1.2 अरब यूरो का जुर्माना लगाया गया। पासवर्ड असुरक्षित तरीके से रखने, लोगों की निजी जानकारी का गलत उपयोग करने और डेटा उल्लंघनों पर भी अलग-अलग दंड दिए गए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ब्रिटेन में मेटा को Giphy नाम की कंपनी का अधिग्रहण वापस करने का आदेश दिया गया, क्योंकि उससे बाजार में प्रतिस्पर्धा कमजोर होने का खतरा था। ऑस्ट्रेलिया में समाचार संस्थानों को उनकी सामग्री के लिए भुगतान करने के मुद्दे पर सरकार और फेसबुक के बीच तीखा टकराव हुआ। म्यांमार में फेसबुक पर रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ नफरत और हिंसा फैलाने वाली सामग्री को बढ़ाने के गंभीर आरोप लगे। संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों ने कहा कि फेसबुक के एल्गोरिदम और कमजोर स्थानीय मॉडरेशन ने हिंसा के वातावरण को बढ़ाया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अर्थात दुनिया के कई देशों में मेटा को केवल माफी नहीं, बल्कि संसद में गवाही, लिखित जांच, अरबों के जुर्माने, कंपनी बेचने के आदेश और मानवाधिकार उल्लंघनों की जवाबदेही का सामना करना पड़ा है। भारत में फिलहाल मामला बंद कमरे की बैठक, सरकारी बयान और खेद तक सीमित दिखाई देता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मेटा के भारत में नियुक्त अधिकारियों के भाजपा / आरएसएस से संबंधों का प्रश्न भी उठता रहा है। सबसे अधिक विवाद मेटा की पूर्व सार्वजनिक नीति प्रमुख अंखी दास को लेकर हुआ था। वर्ष 2020 में अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में आरोप लगाया गया कि फेसबुक ने भाजपा के कुछ नेताओं की भड़काऊ पोस्ट पर अपने नियम लागू करने में नरमी दिखाई। यह भी आरोप लगा कि अंखी दास ने कंपनी के भीतर कहा था कि सत्तारूढ़ दल के नेताओं पर कार्रवाई करने से भारत में फेसबुक के व्यावसायिक हितों को नुकसान हो सकता है।उनकी कुछ पुरानी टिप्पणियों और पोस्टों को भी भाजपा तथा नरेंद्र मोदी के समर्थन के रूप में देखा गया। विवाद बढ़ने के बाद उन्होंने कंपनी छोड़ दी। दूसरा नाम शिवनाथ ठुकराल का है, जो मेटा इंडिया में सार्वजनिक नीति से जुड़े महत्वपूर्ण पद पर रहे। उनके बारे में भाजपा और नरेंद्र मोदी के राजनीतिक संचार से जुड़ी एक कंपनी के साथ पेशेवर संबंधों की रिपोर्टें सामने आईं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वर्तमान मेटा इंडिया प्रमुख अरुण श्रीनिवास के भाजपा या आरएसएस की औपचारिक सदस्यता का कोई विश्वसनीय प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। लेकिन कुछ सामग्री संबंधी फैसलों में भाजपा नेताओं के प्रति नरमी के आरोप जरूर लगे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पक्षपात का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि ज़ुकरबर्ग खुद किसी पार्टी को जिताने का आदेश देते हैं। मेटा का पक्षपात उसके एल्गोरिदम, विज्ञापन प्रणाली, कर्मचारियों के फैसलों और सरकारी दबाव से पैदा हो सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">फेसबुक और इंस्टाग्राम ऐसी सामग्री को आगे बढ़ाते हैं जिस पर ज्यादा प्रतिक्रिया आती है। गुस्सा, डर, नफरत, धार्मिक तनाव और व्यक्तिगत अपमान अक्सर तथ्यपूर्ण और शांत सामग्री से ज्यादा प्रतिक्रिया पैदा करते हैं। एल्गोरिदम भले किसी राजनीतिक दल का नाम न जानता हो, लेकिन वह उस राजनीति को लाभ पहुंचाता है जो समाज में सबसे अधिक उत्तेजना और ध्रुवीकरण पैदा करती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरा बड़ा रास्ता राजनीतिक विज्ञापन है। जिसके पास ज्यादा पैसा, बेहतर डेटा और मजबूत डिजिटल टीम है, वह अपने संदेश को विशेष आयु, जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा और रुचि वाले लोगों तक पहुंचा सकता है। इस व्यवस्था में आर्थिक और राजनीतिक रूप से शक्तिशाली दल को स्वाभाविक लाभ मिलता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तीसरा कारण भारत की भाषाई विविधता है। अंग्रेजी के लिए तैयार तकनीक हिंदी, बांग्ला, तमिल, मराठी, तेलुगू या स्थानीय बोलियों के सांप्रदायिक संकेत, जातिगत गालियां और व्यंग्य ठीक से नहीं समझ पाती। इसलिए कई बार असली नफरत बच जाती है और राजनीतिक आलोचना या व्यंग्य हटा दिया जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">चौथा कारण सरकारी दबाव है। जिस सरकार के पास कंपनी के अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज करने, कानूनी सुरक्षा छीनने और प्लेटफॉर्म पर रोक लगाने की शक्ति हो, उसकी नाराजगी को कंपनी साधारण नागरिक की शिकायत से ज्यादा गंभीरता से ले सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सबसे बड़ा सवाल यही है। प्रधानमंत्री का वीडियो गलती से हटे तो संसद, मंत्रालय और मेटा का शीर्ष नेतृत्व तुरंत सक्रिय हो जाता है। लेकिन किसी दलित, अल्पसंख्यक, पत्रकार, महिला या सामान्य नागरिक को हजारों गालियां, बलात्कार की धमकी और जान से मारने की धमकी मिले तो क्या मेटा उतनी ही तेजी से कार्रवाई करता है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत सरकार का मेटा से बाल यौन शोषण सामग्री, डीपफेक, हिंसा और फर्जी विज्ञापनों पर जवाब मांगना बिल्कुल सही है। मेटा भारत से कमाता है तो उसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठानी होगी। लेकिन जवाबदेही केवल प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल की प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं हो सकती।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सवाल यह होना चाहिए कि क्या एक निजी विदेशी कंपनी को हमारी राजनीति, सामाजिक बहस और सूचना व्यवस्था पर इतना बड़ा, अदृश्य और लगभग अनियंत्रित प्रभाव रखने दिया जा सकता है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">लोकतंत्र में नियम प्रधानमंत्री के वीडियो से शुरू होकर प्रधानमंत्री के वीडियो पर समाप्त नहीं हो सकते।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<ul class="wp-block-list">
<li>फेसबुक से साभार</li>
</ul>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/what-is-the-truth-behind-zuckerberg-s-apology-sheetal-p-singh/">क्या है ज़ुकरबर्ग की &#8220;माफ़ी&#8221; के पीछे का सच ? -शीतल पी. सिंह</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>गालियों का भी अपना समाजशास्त्र रहा है- प्रियदर्शन</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/even-abuses-have-had-their-own-sociology-priyadarshan/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Aug 2026 06:21:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#civilisation]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#priyadarshan]]></category>
		<category><![CDATA[#protest]]></category>
		<category><![CDATA[#society]]></category>
		<category><![CDATA[#writer]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=575</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;सभ्यता और भाषा का रिश्ता बहुत अन्योन्याश्रित है- एक-दूसरे पर निर्भर। भाषा ने सभ्यता बनाई, सभ्यता ने भाषा बनाई। लेकिन सभ्यता की बसावट में सिर्फ़ सुंदर घर नहीं होते, नालियां भी होती हैं, गटर भी होते हैं जिनसे गंदगी बाहर निकलती है। ये नालियां न हों तो पूरा घर गटर में बदल जाए। गालियां शायद &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/even-abuses-have-had-their-own-sociology-priyadarshan/">गालियों का भी अपना समाजशास्त्र रहा है- प्रियदर्शन</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;सभ्यता और भाषा का रिश्ता बहुत अन्योन्याश्रित है- एक-दूसरे पर निर्भर। भाषा ने सभ्यता बनाई, सभ्यता ने भाषा बनाई। लेकिन सभ्यता की बसावट में सिर्फ़ सुंदर घर नहीं होते, नालियां भी होती हैं, गटर भी होते हैं जिनसे गंदगी बाहर निकलती है। ये नालियां न हों तो पूरा घर गटर में बदल जाए। गालियां शायद ऐसी ही नालियों का काम करती हैं- उनसे कई बार हमारे भीतर की घृणा निकल आती है, हम कुछ स्वस्थ हो जाते हैं। गालियों की तुक नालियों से यों ही नहीं मिलती।&#8217; पढ़ें सुपरिचित लेखक प्रियदर्शन का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image is-style-default">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="421" height="488" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-05-at-11.42.21-AM.jpeg" alt="लेखक प्रियदर्शन" class="wp-image-577" style="aspect-ratio:0.8627557241566184;width:147px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-05-at-11.42.21-AM.jpeg 421w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-05-at-11.42.21-AM-259x300.jpeg 259w" sizes="(max-width: 421px) 100vw, 421px" /><figcaption class="wp-element-caption">लेखक प्रियदर्शन</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">गालियां नहीं देनी चाहिए- यह हम सब जानते हैं। लेकिन कभी न कभी हम सब गाली देते रहे हैं और सुनते भी रहे हैं। गालियां भी भाषा से ही निकली हैं। जिस भाषा ने हंसने, रोने, उदास होने, प्रेम करने, चोट खाने, मरहम लगा का ने के लिए हमें अनगिनत शब्द दिए, उसी भाषा ने हमें हमारी घृणा, हमारी जुगुप्सा, किसी के प्रति हमारी चिढ़ प्रगट करने के लिए गालियां भी विकसित कीं। इन गालियों के केंद्र में स्त्रियां क्यों हैं, मांएं-बहनें क्यों हैं? क्योंकि जिस समाज ने ये गालियां विकसित कीं, उसे यह एहसास था कि मां-बहन के नाम पर की जाने वाली चोट सबसे मर्मांतक चोट होती है। यानी इनमें इरादा जितना मां-बहन के अपमान का नहीं, उससे ज़्यादा उस व्यक्ति को आहत करने का होता है जिसे गालियां दी जाती हैं।<br>सभ्यता और भाषा का रिश्ता बहुत अन्योन्याश्रित है- एक-दूसरे पर निर्भर। भाषा ने सभ्यता बनाई, सभ्यता ने भाषा बनाई। लेकिन सभ्यता की बसावट में सिर्फ़ सुंदर घर नहीं होते, नालियां भी होती हैं, गटर भी होते हैं जिनसे गंदगी बाहर निकलती है। ये नालियां न हों तो पूरा घर गटर में बदल जाए। गालियां शायद ऐसी ही नालियों का काम करती हैं- उनसे कई बार हमारे भीतर की घृणा निकल आती है, हम कुछ स्वस्थ हो जाते हैं। गालियों की तुक नालियों से यों ही नहीं मिलती।<br>गालियों का भी अपना समाजशास्त्र रहा है। गालियां एक ही होती हैं, लेकिन उनके अर्थ बोलने वाले की हैसियत के हिसाब से बदलते रहते हैं। कई बार गालियां दबंग लोगों के विशेषाधिकार की सूचक होती हैं। ताकतवर आदमी कमज़ोर आदमी को गाली देता है- ज़मींदार अपने कारकून को, बॉस अपने कर्मचारी को। कई बार ये गालियां अपनी विफलता, अपनी अयोग्यता, अपने अन्याय को छुपाने के लिए भी जा जाती हैं और कई बार दूसरों को दिखाने के लिए कि उनके वर्चस्व को कोई चुनौती देगा तो वह गाली खाएगा। फिर गालियां तो बिल्कुल इस संघर्ष का पहला रूप होती हैं, अगले रूप ज़्यादा हिंसक और विध्वंसक होते हैं।<br>गालियां कमज़ोर भी देते हैं- अपने गुस्से में, अपनी हताशा में, अपनी बेबसी में- ज़्यादातर वे पीठ पीछे देते हैं। इन गालियों में लाचारी बोलती है- गाली देने के अलावा कुछ न कर सकने की टीस। कई बार लोग गाली देकर पिटने का जोखिम भी उठाते हैं- यह उनका प्रतिरोध होता है। वे जो सबसे मर्मांतक चोट पहुंचा सकते हैं, वह इन्हीं गालियों से संभव होती है। इसी के बाद किसी महाप्रतापी को भी इंस्टाग्राम की रील बनाने की ज़रूरत महसूस होने लगती है।<br>गालियों का एक खेल और होता है। वह खेल सभ्यता ने भाषा के साथ किया है या भाषा ने सभ्यता के साथ किया है। इस सभ्यता ने सिखाया है कि भाषा कोई जड़ चीज़ नहीं होती। शब्दों के भी अर्थ बिल्कुल वही स्थिर नहीं होते जो शब्दकोश बताते हैं। हमारे रिश्तों के हिसाब से शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। तो गालियां दोस्तों के बीच भी चलती हैं। ये अचानक मीठी गालियां हो जाती हैं। बिल्कुल वही गालियां- लेकिन उनकी लैंगिक चुभन वहां गायब हो जाती है, गाली देने-सुनने वालों में एक भाईचारा सा बन जाता है। बेशक, दोस्तों के बीच चुहल में दी जाने वाली गालियां कई बार मुझे मर्दवाद के दोस्ताने जैसी लगती है- मूंछों पर ताव देते लोगों की आपसी आश्वस्ति कि इन गालियों से हमारा रिश्ता और प्रगाढ़ हो रहा है।<br>लेकिन जब गालियां इतनी आम हैं तो हम उनसे बचते क्यों हैं? हम क्यों चाहते हैं कि हमारे बच्चे गालियां न दें। हम क्यों इन गालियों को संस्कारों से जोड़ लेते हैं?<br>क्योंकि गालियों की दुनिया है तो नालियों की दुनिया ही। इस नाली में पांव न रखने पड़ें तो अच्छा। हम जैसे अपने घर साफ़-सुथरे रखना चाहते हैं, वैसे ही अपना या अपने बच्चों का मन भी साफ़ रखना चाहते हैं। लेकिन हमारे घरों में जैसे बाहर की धूल चली आती है, वैसे ही मन पर भी चली आती है। जैसे हम रोज़ घर बुहारते हैं, वैसे नैतिकता की झाड़ू लेकर रोज़ बच्चों का मन बुहारते हैं।<br>मुश्किल यह है कि घर की झाड़ू पुरानी होने पर तो हम बदल लेते हैं। नैतिकता की झाड़ू झड़ चुकी है या उसकी सींकें ख़त्म हो चुकी हैं- यह हमें पता नहीं चलता। हम इस सड़ी-गली झाड़ू से मन का घर साफ़ करने निकलते हैं- यह समझे बिना कि उसके लिए नई सींकें, नई झाड़ू चाहिए जो नए पर्यावरण की धूल को ठीक से बुहार सके। हम एक खोखली नैतिकता के व्यूह में घिरे रहते हैं और हमारी दुनिया गालियों से भरी रहती है।<br>यह सच है कि हमारी दुनिया बहुत बदल चुकी है। जब नहीं बदली थी तब भी समाज की पहचान करने वाले साहित्य में कई बार गालियां चली आती थीं। काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ बनारस नाम की उस सनातन नगरी का गाली-वृत्तांत ही है जो सभ्यता के हर दौर में बनी रही है- हमारी धार्मिक आस्थाओं का केंद्र रही है। राही मासूम रज़ा ने जब ‘आधा गांव’ लिखा तो उसमें भी कुछ गालियां चली आईं। उसे जोधपुर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से इसीलिए निकाल दिया गया कि उसमें गालियां थीं। लेकिन इन उपन्यासों से किसी शुद्धतावादी अभियान के तहत गालियां निकाल दी जातीं तो क्या उनमें जीवन बचा रहता? सच्चाई बची रहती?<br>एक तर्क यह हो सकता है कि इतनी सच्चाई क्यों देखना? यथार्थ का यह स्थूल रूप है। हम किसी के अंतरंग कक्षों में नहीं झांकते। लेकिन इंसानी तहज़ीब की फ़ितरत है कि सारे तर्क बेमानी हो जाते हैं। उसके भीतर का मनोविज्ञान कुछ ऐसा है कि वह जितना रोशनी की पहचान करना चाहता है, उससे ज़्यादा अंधेरों को जानना चाहता है।<br>हम गालियों से चाहे जितना भागें, वे हमारा पीछा करती रही हैं- अवचेतन में बसे कई अन्य प्रेतों की तरह। इस फ़र्क के साथ कि हमारे कई प्रेत अदृश्य होते हैं, गालियां सार्वजनिक होती हैं, वे हमारा भेद खोल देती हैं।<br>बीसवीं सदी में विकसित हुआ सिनेमा आज अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा माध्यम है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के रूप में वह घर-घर पहुंचा हुआ है। इनकी मार्फ़त गालियां भी हमारे ड्राइंग रूम में पहुंच गई हैं। वे हमारे मनोरंजन का हिस्सा हो गई हैं। जब आप इस पर बहुत एतराज़ नहीं करते तो उस नई पीढ़ी पर क्यों करते हैं जो इसी समाज से, इसी नए ड्राइंग रूम से ये गालियां सीख कर निकली है और अकुंठ भाव से दे रही है? ठीक है कि हमें गालियों पर तालियां नहीं बजानी चाहिए, लेकिन गाली बकने वालों को बिल्कुल चरित्रहीन, संस्कारहीन घोषित कर ट्रोल करना, उन्हें ज़्यादा कुत्सित गालियां देना कहीं से उचित नहीं है। समझने की कोशिश यह करनी चाहिए कि इन गालियों से जो निकल रहा है, वह कैसा गुस्सा है, कैसा प्रतिरोध है या कैसी हताशा है और वह कौन सी कार्रवाई हो सकती है जिससे हम गाली देने वालों को ताली बजाने वालों में बदल सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph">(साभार &#8211; प्रभात खबर)</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/even-abuses-have-had-their-own-sociology-priyadarshan/">गालियों का भी अपना समाजशास्त्र रहा है- प्रियदर्शन</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>डाॅ. राम पुनियानी का लेख-&#8216;निर्वाचित तानाशाही&#8217; के खिलाफ एकजुट हुए देश के युवा</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-s-article-the-country-s-youth-united-against-elected-dictatorship/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 02 Aug 2026 15:11:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[#abhijeetdipke]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#bjp]]></category>
		<category><![CDATA[#cjp protest]]></category>
		<category><![CDATA[#dr ram puniyani]]></category>
		<category><![CDATA[#modi]]></category>
		<category><![CDATA[#politics]]></category>
		<category><![CDATA[#rss]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=569</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8216;इस आंदोलन ने उस प्रोपेगेंडा के प्रभाव को भी कुछ कम किया जो गोदी मीडिया और संघ परिवार द्वारा अपनी शाखाओं, हजारों स्कूलों और अन्य अनुषांगिक संगठनों के माध्यम से किया जाता है. सरकार के खिलाफ हिम्मत से बोलने का साहस धीरे-धीरे लोगों में वापिस लौटेगा, ऐसी संभावना है.&#8217; पढ़ें सुप्रतिष्ठित इतिहासकार एवं लेखक डाॅ. &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-s-article-the-country-s-youth-united-against-elected-dictatorship/">डाॅ. राम पुनियानी का लेख-&#8216;निर्वाचित तानाशाही&#8217; के खिलाफ एकजुट हुए देश के युवा</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong> &#8216;इस आंदोलन ने उस प्रोपेगेंडा के प्रभाव को भी कुछ कम किया जो गोदी मीडिया और संघ परिवार द्वारा अपनी शाखाओं, हजारों स्कूलों और अन्य अनुषांगिक संगठनों के माध्यम से किया जाता है. सरकार के खिलाफ हिम्मत से बोलने का साहस धीरे-धीरे लोगों में वापिस लौटेगा, ऐसी संभावना है.&#8217; पढ़ें सुप्रतिष्ठित इतिहासकार एवं लेखक डाॅ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="768" height="768" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png" alt="डा. राम पुनियानी" class="wp-image-468" style="width:166px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png 768w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-300x300.png 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-150x150.png 150w" sizes="(max-width: 768px) 100vw, 768px" /><figcaption class="wp-element-caption">डा. राम पुनियानी </figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">कॉकरोच जनता पार्टी की स्थापना और जंतर मंतर पर उसके हालिया जबरदस्त विरोध प्रदर्शन के बारे में हम सब जानते हैं. वर्दीधारी पुलिस और गैर-वर्दीधारी शंकास्पद व्यक्तियों ने दिल्ली और अन्य स्थानों पर युवाओं पर लाठीचार्ज किया और उनके खिलाफ पैलेट गन और यहां तक कि एके-47 राइफल तक का इस्तेमाल किया गया. यह सब लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रजातान्त्रिक तौर-तरीकों के एकदम खिलाफ था. विरोध प्रदर्शन का दूसरा पहलू था नाचते-गाते युवा, एक साथ मिलकर पोस्टर बनाते युवा, हँसते-गाते युवा जो हमें कार्ल मार्क्स के प्रसिद्ध कथन की याद दिलाते हैं कि &#8220;क्रांति आमजनों का उत्सव होती है&#8221;. हालांकि जंतर मंतर और देश के अन्य भागों में हुए विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि और आकार-प्रकार किसी क्रांति से पूरी तरह अलग था.</p>



<p class="wp-block-paragraph">तानाशाही प्रवृत्ति की सरकार, जो जनता की जायज़ मांगों की ओर जरा सा भी ध्यान नहीं देती थी, बहुत लंबे समय के बाद झुकी. कारण यह कि विरोध नए-नए शहरों में फैलता जा रहा था और तानाशाह सरकार का डर पिघलता जा रहा था. हमने पहले देखा है कि किसानों के 12 महीने तक चले आंदोलन के दौरान सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगीं और चुनाव नजदीक आने पर ही उसने तीन कृषि कानून वापिस लिए. सरकार ने शाहीन बाग में चल रहे विरोध प्रदर्शन में बाधा डालने के लिए असामाजिक तत्वों को प्रोत्साहन दिया. पेपर लीक के खिलाफ समय-समय पर उठाई गई आवाजों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया.</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस बार स्थिति अलग थी. सरकार ने आंदोलन की उपेक्षा करने की कोशिश की लेकिन आखिरकार उसे मांगे मानने पर मजबूर होना पड़ा. इसमें सबसे प्रमुख मांग थी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा. उनकी जगह प्रहलाद जोशी को शिक्षा मंत्री बनाया गया. जोशी भी संघी पृष्ठभूमि के हैं. उनके व्यक्तित्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने बिलकीस बानो के साथ दुष्कर्म करने वालों को रिहा किए जाने का समर्थन किया था.</p>



<p class="wp-block-paragraph">पेपर लीक के मसले पर विचार करने और इसे रोकने के लिए उठाए जाने वाले कदमों के बारे में सुझाव देने के लिए एक समिति का गठन किया गया है. यहां यह बताना दिलचस्प होगा कि प्रियंका गांधी के अनुसार इस समिति में एक ऐसे सज्जन को भी शामिल किया गया है जो गौमूत्र विशेषज्ञ हैं और कई ऐसे लोगों को भी जो शिक्षा प्रणाली का क, ख ग भी नहीं जानते.</p>



<p class="wp-block-paragraph">अभी जहां छात्र नेता यह सुनिश्चित करने में जुटे हैं कि सरकार अपने लिखित आश्वासनों को पूरा करे, वहीं यह जरूरी है कि हम इस छात्र आंदोलन की &#8216;कामयाबी‘ को समझें. यह आंदोलन कहीं से भी फ्रांस में 1968 में हुए छात्र आंदोलन, या हमारे पड़ोसी देशों श्रीलंका, बांग्लादेश या नेपाल में हुई छात्र विद्रोहों जैसा नहीं था. लेकिन फिर भी यह भाजपा के आईटी मीडिया सेल द्वारा निर्मित धारणाओं में काफी कुछ बदलाव लाने में कामयाब रहा. इसने उस प्रोपेगेंडा के प्रभाव को भी कुछ कम किया जो गोदी मीडिया और संघ परिवार द्वारा अपनी शाखाओं, हजारों स्कूलों और अन्य अनुषांगिक संगठनों के माध्यम से किया जाता है. सरकार के खिलाफ हिम्मत से बोलने का साहस धीरे-धीरे लोगों में वापिस लौटेगा, ऐसी संभावना है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">जहां कॉकरोच जनता पार्टी और उसके नेता अभिजीत दीपके इस प्रदर्शन के केन्द्र में थे वहीं इसकी नींव पिछले कई सालों से तैयार हो रही थी. बढ़ती बेरोजगारी, जीवनयापन का लगातार महंगा होते जाना और बढ़ते अभावों के कारण यह आंदोलन खड़ा हुआ. अभिव्यक्ति की आजादी, धार्मिक स्वतंत्रता, भूख और आनंद के सूचकांकों पर भारत के लगातार नीचे गिरते जाने को भले ही सरकार खारिज करती रही हो मगर यह समाज के बिगड़ते हालातों को प्रतिबिंबित करता था.</p>



<p class="wp-block-paragraph">मुख्यधारा के मीडिया ने अपनी भूमिका सत्ताधारियों के स्तुतिगान और प्रतिपक्ष की आलोचना करने तक सीमित कर ली है. इस चौथे स्तंभ का किस कदर अधःपतन हुआ है और उसकी छवि कैसी बन गई है, यह इससे साफ़ है कि लोगों ने गोदी मीडिया के पत्रकारों को हूट किया. हालांकि यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं था, लेकिन इससे पता लगता है कि आम लोगों में गोदी मीडिया की कितनी बुरी छवि बन गई है. यह इसलिए क्योंकि वह अपनी सही भूमिका त्यागकर सत्ताधारियों की सेवक बन गई है. ऐसे वातावरण में लोकतांत्रिक आजादियों पर पाबंदियों के खिलाफ लड़ने में युवाओं का जोश बहुत ख़ुशी का सबब है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्या इस आन्दोलन ने अपना लक्ष्य पूरी तरह हासिल कर लिया है? इसका उत्तर इस बात पर निर्भर है कि &#8220;पूरी तरह&#8221; की परिभाषा क्या है. हालांकि शिक्षा मंत्री को बदले जाने से ‘नॉन बायोलॉजिकल&#8217; का अहं काफी हद तक चकनाचूर हुआ, लेकिन इससे कोई बड़ा बदलाव आने वाला नहीं है क्योंकि नागनाथ को हटाकर सांपनाथ को बिठा दिया गया है. पेपर लीक होने की मुख्य वजह &#8211; समाज में फैले भ्रष्टाचार – का बाल बांका भी नहीं हुआ है. भ्रष्टाचार में कमी केवल अधिक पारदर्शी और समाज द्वारा जांची-परखी जा सकने वाली व्यवस्था लागू करने पर ही आ सकती है. हालांकि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आरएसएस ने अन्ना आंदोलन की रूपरेखा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसके चलते बाद में कांग्रेस को चुनौती देने के लिए आम आदमी पार्टी का गठन हुआ. मगर एनडीए सरकारों ने भ्रष्टाचर उन्मूलन के लिए कोई कदम नहीं उठाया. ना ही सत्ताधारियों को इसकी चिंता थीं. सड़कों और पुलों के निर्माण पर खर्च की गई भारी भरकम रकम बारिश और बाढ़ में इनके बह जाने से बर्बाद हो गई क्योंकि संभवतः भाजपा सरकार के दौरान हुए इन निर्माणों में जमकर भ्रष्टाचार हुआ था.</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह तो मानना ही पड़ेगा कि जो भी कामयाबी हासिल हुई, उसके लिए जमीन तैयार करने में राहुल गांधी की महत्वपूर्ण भूमिका थी. उन्होंने सामाजिक मुद्दों के प्रति सकरार के उपेक्षापूर्ण रवैये की कलई खोलकर रख दी. यह कहना मुश्किल है कि क्या आरएसएस-भाजपा द्वारा किया गया धर्म-आधारित ध्रुवीकरण जंतर मंतर पर हुए आन्दोलन से कम हुआ है. हमारे तंत्र में क्या खराबी है इसे एक व्यापक समझ के ज़रिये ही जाना जा सकता है. क्या यह आंदोलन लंबे समय तक चुनावी राजनीति से दूर रहा पाएगा और क्या वह यह मूल मुद्दा उठा पायेगा कि किस तरह साम्प्रदायिक शक्तियों ने देश को शांति और उन्नति की राह से दूर कर दिया है. आजादी की लड़ाई के दौरान और हमारे संविधान में जिस भारत का सपना देखा गया था उसे अत्यंत कुटिलता से पीछे कर देश को हिन्दू राष्ट्र के विचार की ओर धकेल दिया गया है. राष्ट्र निर्माण के मुद्दे की जगह मस्जिदों और विश्वविद्यालयों को ढहाए जाने के मुद्दे को केन्द्र में ला दिया गया है. राज्य सत्ता में धीरे-धीरे उन लोगों की घुसपैठ बढ़ती जा रही है जिन्होंने आरएसएस शाखाओं में विभाजकनारी प्रशिक्षण लिया है या जो गोदी मीडिया और सोशल मीडिया की मदद से फल-फूल रहे हैं और जिन्हें व्हाटस एप् यूनिवर्सिटी कहा जाता है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह विरोध प्रदर्शन ताजी हवा के एक झोंके की तरह था. जरूरत इस बात की है कि उसकी यह यात्रा जारी रहे और दुबारा हमारी पहचान हिंदू या मुस्लिम की होने के बजाए भारतीय नागरिक की बने. यह देश उसमें रहने वालों का है, उसमें रहने वाले सभी लोगों का. जबकि साम्प्रदायिक राजनीति मनुस्मृति पर आधारित हिन्दू राष्ट्र के निर्माण पर जोर देती हैं. उनका पूरा एजेंडा ब्राम्हणवादी मूल्यों को लादने का है जिसमें मुसलमान, ईसाई, आदिवासी, दलित, श्रमिक और महिलाएं दूसरे दर्जे के नागरिक होंगें</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस समय तो विरोध आन्दोलन की सफलता की वजह से उत्साह एवं प्रसन्नता का माहौल है. यह मानना भूल होगी कि उसने अपने सारे लक्ष्य हासिल कर लिए हैं. हम जब तक साम्प्रदायिक शक्तियों को पूरी तरह परास्त नहीं कर देते, या कम से उनली ताकत को बहुत हद तक क्षीण नहीं कर देते, तब तक मौजूदा सत्ताधारी हमारे साथ एक के बाद एक तरह-तरह के अन्याय करते रहेंगे. हम युवाओं/छात्रों की सराहना करते हैं और उन्हें सलाम करते हैं और उम्मीद करते हैं कि भविष्य में भी वे संविधान पर अपरोक्ष आक्रमण की चुनौती का अच्छे से मुकाबला करेंगे. </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>(अंग्रेजी से रूपांतरण &#8211; अमरीश हरदेनिया)</strong></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-s-article-the-country-s-youth-united-against-elected-dictatorship/">डाॅ. राम पुनियानी का लेख-&#8216;निर्वाचित तानाशाही&#8217; के खिलाफ एकजुट हुए देश के युवा</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
