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	<title>राजनीति Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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	<title>राजनीति Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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		<title>पीयूष बबेले का लेख- राहुल गांधी के शब्द देश की जनता में आशा जगाते हैं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 18 Oct 2026 14:19:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;राहुल ने उन सब चीजों को फिर से जिंदा कर दिया है, जो संविधान की किताब में लिखी तो थीं, लेकिन उनके ऊपर तानाशाही की धूल जम गई थी। लोग सच जानते थे, लेकिन बोलने से डरने लगे थे। लोगों को लगता था कि ये सच के खुदा हो गए हैं, इन्‍हें हटाएंगे कैसे। राहुल &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;राहुल ने उन सब चीजों को फिर से जिंदा कर दिया है, जो संविधान की किताब में लिखी तो थीं, लेकिन उनके ऊपर तानाशाही की धूल जम गई थी। लोग सच जानते थे, लेकिन बोलने से डरने लगे थे। लोगों को लगता था कि ये सच के खुदा हो गए हैं, इन्&#x200d;हें हटाएंगे कैसे। राहुल ने दिखा दिया है कि यह गांधी  भी तानाशाही को वैसे ही हटाएगा, जैसे उस गांधी ने हटाया था।&#8217; पढ़ें जाने-माने लेखक पीयूष बबेले का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="518" height="441" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-18-at-7.18.40-PM.jpeg" alt="पीयूष बबेले" class="wp-image-494" style="width:177px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-18-at-7.18.40-PM.jpeg 518w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-18-at-7.18.40-PM-300x255.jpeg 300w" sizes="(max-width: 518px) 100vw, 518px" /><figcaption class="wp-element-caption">पीयूष बबेले</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">दिल्&#x200d;ली शहर में एक दिन पहले तक परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। आंदोलनकारियों को इस वितृष्&#x200d;णा के साथ गिरफ्तार कर बसों में ठूंसा जा रहा था, जैसे नगर निगम की गाड़ी आवारा कुत्&#x200d;तों को पकड़ रही हो। सिपाहियों के चेहरों पर सत्&#x200d;ता की क्रूर मुस्&#x200d;कान नाच रही थी। सत्&#x200d;ता पोषित संघी गुंडे पुलिस की सुरक्षा में बेखौफ होकर लड़कियों के कपड़े फाड़ रहे थे और पालतू मीडिया बढ़-चढ़कर बता रहा था कि कोकरोचों की हवा निकल गई। सरकार जीत गई और जनता हार गई। (मेरे कानों में आवाज आ रही थी- दुशासन जीत गया, द्रोपदी हार गयी।) तानाशाही के इस नंगे नाच को देखकर एकबारगी तो ऐसा लगा कि भारत का लोकतंत्र वर्दी वाले बूटों के नीचे रौंद दिया गया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लेकिन, एक दिन बाद ही नजारा बदल गया। राहुल गांधी आए। बड़े इत्&#x200d;मीनान से प्रेस कांन्&#x200d;फ्रेंस की। लोकतंत्र के हत्&#x200d;यारों को खुली चुनौती दी। पूरे देश से दिल्&#x200d;ली आने का आग्रह किया। और शान से सुप्रीम कोर्ट की ओर चल दिए। उनके पीछे भारतीय प्रजातंत्र का समुद्र उमड़ने लगा। जो दिल्&#x200d;ली कल तक बूटों की धमक से कांप रही थी, वही दिल्&#x200d;ली जनता की पदचाप से गूंज उठी। वोट चोर गद्दी छोड़ के नारों पर लाखों लोग झूमने लगे। करोड़ों लोग इस नजारे को अपनी मोबाइल स्&#x200d;क्रीन पर देख रहे थे। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट तक राहुल की बस नहीं जाने दी गई। वे अपनी बहनों प्रियंका गांधी और नेहा वोरा को सुरक्षा घेरे में साथ लिए पैदल बढ़ चले। शंकर जी की इस बारात में नेता, युवा, महिला, पुरुष , वकील, पत्रकार और न जाने कौन-कौन शामिल थे। तंत्र के खिलाफ लोक इस कदर उमड़ रहा था कि लगता था कि राहुल खुद ही अपनी लोकप्रियता के बोझ से दब न जाएं। लेकिन वे सतर्क थे। और अंतत: गोधूलि वेला में नभ में उड़ती धूल से पटे राहुल याचिका फाइल करके बाहर आ गए। भारत माता ने राहत की सांस ली। उसे संजीवनी मिल गई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल को भी पता है और देश को भी पता है कि वे सुप्रीम कोर्ट से जिस मर्ज का इलाज करने की गुजारिश कर रहे हैं, वह इलाज उसके पास नहीं है। और हो भी तो वह शायद ही करे। लेकिन राहुल पूरी दुनिया को यह दिखा देना चाहते हैं कि उन्&#x200d;होंन न्&#x200d;याय का कोई दरवाजा नहीं छोड़ा। उन्&#x200d;होंने मीडिया को सब बताया, आयोग से सरकारी गवाह बनने को कहा, राष्&#x200d;ट्रपति को बताया और अब सुप्रीम कोर्ट से भी फरियाद कर चुके हैं। अगर न्&#x200d;याय की हर चौखट पर उनकी आवाज बहरे कानों से टकराकर हवा में विलीन हो जाएगी, तो आखिरी रास्&#x200d;ता ही बचेगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बिलकुल महाभारत के कृष्&#x200d;ण की तरह, जिन्होंने हर स्&#x200d;तर पर युद्ध को टालने की कोशिश की। भीष्&#x200d;म और द्रोण को समझाया। कर्ण से भी सत्&#x200d;य के साथ आने की प्रार्थना की। धृतराष्&#x200d;ट्र से बारंबार कहा कि महाराज आप प्रजा के प्रति जवाबदेह हैं, पुत्र के प्रति नहीं। और अंत में उस नराधम दुर्योधन को भी समझाया कि मान जा। लेकिन दुर्योधन का सत्&#x200d;ता का अहंकार, धृतराष्&#x200d;ट्र की अंधी न्&#x200d;याय बुद्धि, भीष्&#x200d;म और द्रोण का राजवित्&#x200d;त पर जीवन गुजारना और कर्ण का अहसानों के तले दबे होना, कृष्&#x200d;ण की न्&#x200d;याय की पुकार को नहीं सुन सका। कौरवों की भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण होने बावजूद कृष्&#x200d;ण न्&#x200d;याय का ही पंथ खोज रहे थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एसआईआर के जरिए भारतीय लोकतंत्र का चीरहरण होने के बाद भी राहुल शांति का रास्&#x200d;ता खोज रहे हैं। लेकिन इस खोज की प्रक्रिया में उन्&#x200d;होंने करोड़ों दिलों को जीत लिया है। उनके समर्थक अब उनके अनुयायी बनने लगे हैं तो वहीं उनके विरोधी, अब उनके प्रति उदार हो रहे हैं। जिस विपक्ष को वे अब तक एकजुट करने के लिए प्रयासरत थे, वह खुद अब उनके साथ आने को लालायित है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल ने उन सब चीजों को फिर से जिंदा कर दिया है, जो संविधान की किताब में लिखी तो थीं, लेकिन उनके ऊपर तानाशाही की धूल जम गई थी। लोग सच जानते थे, लेकिन बोलने से डरने लगे थे। लोगों को लगता था कि ये सच के खुदा हो गए हैं, इन्&#x200d;हें हटाएंगे कैसे। राहुल ने दिखा दिया है कि यह गांधी भी तानाशाही को वैसे ही हटाएगा, जैसे उस गांधी ने हटाया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस सबके बीच यह सवाल बार-बार मन में आता है कि आखिर यह सब हुआ कैसे? 40 हजार पुलिसवालों से जनता को धमकाने वाली सरकार आखिर राहुल की हुंकार के सामने क्&#x200d;यों दुबक गई? संभवत: इसका एक कारण यह है कि राहुल गांधी अब देश की भावनाओं के सच्&#x200d;चे प्रतिनिधि बन गए हैं। सरकार जानती है कि अगर वह राहुल की कलाई पकड़ेगी तो जनता उसकी बांह मरोड़ देगी। राहुल की छवि झूठ के उस दायरे को पार कर चुकी है कि जहां गोदी मीडिया उसे कलंकित कर सके। हाथ में संविधान की किताब लिए राहुल से टकराने के मतलब है, देश की लोकतांत्रिक चेतना को चुनौती देना। पिछले 12 साल के संघर्ष में राहुल गांधी ने उनके खिलाफ पिछले 22 साल से चलाए जा रहे दुष्&#x200d;प्रचार को खत्&#x200d;म कर दिया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अब राहुल गांधी ने देश की चेतना में प्रवेश कर लिया है। उनके शब्&#x200d;द लोगों में आशा जगाते हैं, उनके बढ़ते कदम करोड़ों को कदमताल करने को ललचाते हैं, उनकी गर्जना में जनता अपना खोया हुआ गौरव प्राप्&#x200d;त करती है और उनके लक्ष्&#x200d;य में करोड़ों लोगों को अपना लक्ष्&#x200d;य दिखाई देता है। यही तो एक नेता की पहचान होती है, जो गांधी में थी, नेहरू में थी, इंदिरा में थी और उससे बहुत पहले महावीर और बुद्ध में थी।</p>
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		<title>‘अपराधी’ सिर्फ़ पाँच नहीं, लाखों में हैं ! राहुल जानते हैं ! -श्रवण गर्ग</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/the-culprits-are-not-just-five-they-are-in-lakhs-rahul-knows-shravan-garg/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 14 Oct 2026 14:39:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;दिल्ली में मनमोहन सिंह और गांधीनगर में मोदी के शासनकालों के बीच समानांतर गुजरी एक दशक की अवधि(2004 से 2014) का अध्ययन करें तो यह प्रभाव पड़ता है कि गुजरात के ‘सांप्रदायिक विकास’ के प्रति या तो केंद्र की मौन सहमति रही अथवा कांग्रेस के भीतर सक्रिय बीजेपी के स्लीपर सेल्स मनमोहन सिंह के मुक़ाबले &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;दिल्ली में मनमोहन सिंह और गांधीनगर में मोदी के शासनकालों के बीच समानांतर गुजरी एक दशक की अवधि(2004 से 2014) का अध्ययन करें तो यह प्रभाव पड़ता है कि गुजरात के ‘सांप्रदायिक विकास’ के प्रति या तो केंद्र की मौन सहमति रही अथवा कांग्रेस के भीतर सक्रिय बीजेपी के स्लीपर सेल्स मनमोहन सिंह के मुक़ाबले इतने ज़्यादा शक्तिशाली थे कि उन्होंने मोदी-शाह के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होने दी।&#8217; पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का विश्लेषण&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img decoding="async" width="450" height="450" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg" alt="पत्रकार श्रवण गर्ग" class="wp-image-413" style="width:134px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg 450w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-300x300.jpg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-150x150.jpg 150w" sizes="(max-width: 450px) 100vw, 450px" /><figcaption class="wp-element-caption">पत्रकार श्रवण गर्ग</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">राहुल गांधी आत्मविश्वास के साथ बार-बार दोहरा रहे हैं कि उनकी लड़ाई सिर्फ़ पाँच ‘अपराधियों’ के ख़िलाफ़ उनकी जवाबदेही तय कर उन्हें दंडित करवाने (या करने) की है। चार लोगों के वे नाम भी बताते हैं। जनता को नाम रट भी गए हैं।हक़ीक़त में भी क्या सारी लड़ाई इन चार-पाँच हस्तियों तक ही सीमित है ? शायद नहीं !</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल अतीत में स्वीकार चुके हैं कि वे कभी सत्ता में आ गए तो भी शासन इसलिए नहीं चला पाएँगे कि पिछले बारह सालों के दौरान संघ-बीजेपी ने व्यवस्था के हरेक क्षेत्र में अपने लोगों की घुसपैठ करवाकर जो जाल बिछा दिया है कि वह उन्हें सफल नहीं होने देगा। हक़ीक़त यही है !</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह दावा ऊपरी तौर पर ही सही माना जा सकता है कि दो-चार लोगों को हटा देने से सबकुछ ठीक हो जाएगा यानी लोकतंत्र भी बच जाएगा और संविधान की रक्षा भी हो जाएगी।गुजरात की एक पार्टी बैठक में राहुल स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि कांग्रेस में बीजेपी के स्लीपर सेल्स काम कर रहे हैं। उनका पहला काम उन्हें ख़त्म करने का होगा। कारण जो भी रहे हों राहुल वह काम नहीं कर पाए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अमित शाह ने अभी एक दिन पहले ही राहुल का ध्यान इस ओर आकर्षित किया था कि कांग्रेस पिछले इकतालीस सालों से गुजरात में सत्ता से बाहर है जबकि SIR का काम तो दो साल पहले ही शुरू हुआ है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ताज़ा खबर यह है कि हाल ही तक देश के ‘चीफ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ’ (CDS) रहे अनिल चौहान ‘विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन’(VIF) के नए निदेशक नियुक्त किए गए हैं। इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) से सेवानिवृत्त होने के बाद, NSA अजीत डोभाल ने दिसंबर 2009 में फाउंडेशन की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई थी और इसके पहले निदेशक बने थे। फाउंडेशन की संबद्धता किन संगठनों और व्यक्तियों से है उसके कामकाज से समझा जा सकता है। चौहान ने दायित्व सब कुछ जानते हुए ही स्वीकार किया होगा ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच सुप्रीम कोर्ट-हाई कोर्ट के 42 सेवानिवृत जजों और 124 सेवानिवृत आईएएस/आईएफ़एस अफ़सरों ने खुले पत्रों के ज़रिए चुनाव आयोग के प्रति समर्थन व्यक्त किया है। मोदी सरकार तो 2014 में ही सत्ता में आई है जब कि ये तमाम लोग तो काफ़ी पहले से न्यायपालिका और कार्यपालिका में कार्यरत रहे होंगे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्या कहा जा सकता है कि अपने पूरे सेवा काल के दौरान ये सभी लोग और वे अन्य भी जो अब धीरे-धीरे बाहर आएँगे एक विचारधारा विशेष से प्रभावित होकर ही काम कर रहे होंगे ? इनके सेवा काल के दौरान ही नरसिंह राव और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे होंगे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दिल्ली में मनमोहन सिंह और गांधीनगर में मोदी के शासनकालों के बीच समानांतर गुजरी एक दशक की अवधि(2004 से 2014) का अध्ययन करें तो यह प्रभाव पड़ता है कि गुजरात के ‘सांप्रदायिक विकास’ के प्रति या तो केंद्र की मौन सहमति रही अथवा कांग्रेस के भीतर सक्रिय बीजेपी के स्लीपर सेल्स मनमोहन सिंह के मुक़ाबले इतने ज़्यादा शक्तिशाली थे कि उन्होंने मोदी-शाह के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होने दी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरा यह कि राहुल अगर 2004 में ही राजनीति में आ गए थे(जैसा कि वे कहते हैं )तो क्या वे भी सबकुछ चुपचाप देखते रहे ? अगर मनमोहन सिंह सरकार तभी कुछ कर देती तो क्या उन्हें आज यह लड़ाई लड़नी पड़ती?</p>



<p class="wp-block-paragraph">अगर इतने सारे लोग साहसपूर्वक चुनाव आयोग के पक्ष में खड़े हो रहे हैं तो निश्चित ही वे भविष्य के परिणामों की परवाह नहीं करते हुए ऐसा कर रहे हैं। इन लोगों के पीछे भी एक बड़ी भीड़ ऐसे चेहरों की होगी जो न सिर्फ़ वर्तमान व्यवस्था को क़ायम रखने में जुटी है सत्ता परिवर्तन की दशा में नये शासकों के ख़िलाफ़ विद्रोह करने में भी सक्षम सिद्ध हो सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल अपनी यात्राओं और सार्वजनिक संबोधनों में कहते रहे हैं कि मोदी तो सिर्फ़ मुखौटा हैं। असली ताक़त तो अंबानी, अदाणी की है। इसका मतलब यह है कि राहुल का मुक़ाबला सिर्फ़ संघ द्वारा व्यवस्था में घुसपैठ कराए गए तत्वों से ही नहीं है उन पूँजीपतियों से भी है जिन्होंने मीडिया ही नहीं मुल्क के समूचे संरचनात्मक ढाँचे (रेलवे, हवाई सेवा, संचार माध्यम,बंदरगाह, रक्षा उत्पादन,ऊर्जा, स्टॉक और कैपिटल मार्केट,आदि ) पर क़ब्ज़ा कर रखा है।वे विपक्षी दल जो राहुल के साथ दिखते हैं उनके भी इन पूंजीपतियों के साथ सम्बन्धों को लेकर समय-समय पर संदेह उत्पन्न होते रहते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल जब कहते हैं कि लड़ाई लंबी चलने वाली है।इसमें कई महीने और साल भी लग सकते हैं तो मानकर चलना चाहिए कि वे जानते हैं कि जिन चार-पाँच लोगों को वे हटाना चाहते हैं उन्हें बचाने के लिए हज़ारों-लाखों की संख्या में निहित स्वार्थों का एक बड़ा समूह पीछे खड़ा है। उन्हीं के चेहरे खुले पत्रों के ज़रिए सत्ता के दबाव में प्रकट हो रहे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हकीकत में यह समूह इस समय राहुल से ज़्यादा उस जनता से भयभीत हो रहा है जो मोदी-शाह के ख़ौफ़ को सड़कों पर ललकार रहा है। राहुल की स्ट्रेटेजी की दाद दी जानी चाहिए कि उनका हाथ अब उन लोगों/बच्चों की पीठ पर है जो उनके लिए अपनी जान देने को तैयार है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">राहुल का इससे बड़ा रणनीतिक कदम और क्या हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट तक उमड़े सैलाब को देख लेने के बाद CJP भी अब साथ जुड़ने की तैयारी दिखा रही है। CJP के दो नेताओं की सिर्फ पाँच दिन की न्यायिक रिमांड ने ही दीपके को इतना हिला दिया कि वे चार दिन में ही महाराष्ट्र से दिल्ली वापस लौट आए। दूसरी ओर, राहुल आर या पार की तैयारी के साथ हुकूमत से लड़ रहे हैं।</p>
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		<item>
		<title>डाॅ. राम पुनियानी का लेख: भारत की भोजन संस्कृति पर हो रही राजनीति से जनता त्रस्त</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-public-distressed-due-to-politics-over-indias-food-culture/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 20 Sep 2026 13:44:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;ऐसा ही परामर्श आरएसएस की सहयोगी संस्था व्हीएचपी द्वारा कुछ दिन पहले दिया जा चुका था। इससे बंगाली हिन्दू नाराज हो गए। इनमें वे हिन्दू भी शामिल थे जो स्वयं को &#8220;हिन्दू राष्ट्रवादी&#8221; कहते हैं। कई प्रमुख बंगालियों ने अपना विरोध प्रदर्शित किया और वक्तव्य जारी कर कहा कि शास्त्री को हमें यह सिखाने की &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong> &#8216;ऐसा ही परामर्श आरएसएस की सहयोगी संस्था व्हीएचपी द्वारा कुछ दिन पहले दिया जा चुका था। इससे बंगाली हिन्दू नाराज हो गए। इनमें वे हिन्दू भी शामिल थे जो स्वयं को &#8220;हिन्दू राष्ट्रवादी&#8221; कहते हैं। कई प्रमुख बंगालियों ने अपना विरोध प्रदर्शित किया और वक्तव्य जारी कर कहा कि शास्त्री को हमें यह सिखाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि हम दुर्गापूजा कैसे मनाएं और क्या खाएं और क्या न खाएं।&#8217; पढ़ें सुपरिचित इतिहासकार एवं लेखक डाॅ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230; </strong></p>


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<figure class="alignleft size-full is-resized"><img decoding="async" width="349" height="408" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM.jpeg" alt="डा. राम पुनियानी" class="wp-image-652" style="width:134px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM.jpeg 349w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM-257x300.jpeg 257w" sizes="(max-width: 349px) 100vw, 349px" /><figcaption class="wp-element-caption">डा. राम पुनियानी</figcaption></figure>
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<p class="wp-block-paragraph">आज के दौर में राजनीतिक प्रोपेगेंडा से समाज के नजरिए को प्रभावित करने के बहुत से उदाहरण हमारे सामने हैं। खानपान की आदतें भी विभाजनकारी राजनैतिक प्रवृत्तियों के हाथ में एक औजार बन गईं हैं। यह तर्क दिया जाता है कि मुसलमान इसलिए अधिक हिंसक होते हैं क्योंकि वे मांसाहारी होते हैं। पवित्र गाय और गौमांस के सेवन को भी इससे जोड़ दिया गया और नतीजे में हम भारत में लिंचिंग की शुरूआत के साक्षी बने जिसके मुख्य शिकार मुस्लिम होते हैं किंतु साथ ही बड़ी संख्या में दलितों को भी इसका सामना करना पड़ता है। हाउसिंग सोसायटियों में किसे रहने की इजाजत दी जाए और किसे नहीं, यह भी खानपान की आदतों के आधार पर तय होने लगा है। हाउसिंग सोसायटियां फ्लैट बेचने की अनुमति देने के पहले खरीदार की खानपान की आदतों के बारे में पूछताछ करती हैं। यह मुद्दा अधिक जटिल स्वरूप में हाल में बंगाल में सामने आया जहां पूजा-पंडालों के आसपास मांसाहारी खाद्य सामग्री न रखने की सलाह दी गई। साथ ही, समाज का एक तबका यह मांग कर रहा है कि जैन धर्म के पर्यूषण पर्व के दौरान मांसाहारी खाद्य पदार्थों पर प्रतिबंध लगना चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री (पर्चीवाले बाबा, जिन्हें प्रधानमंत्री अपना छोटा भाई कहते हैं) की दुर्गापूजा में मांसाहार पर निषेध की सलाह की मिलीजुली प्रतिक्रिया हुई। कुछ ही दिनों में बंगाल का सबसे बड़ा उत्सव, दुर्गा पूजा प्रारंभ होने वाला है। भाजपा हाल ही में पश्चिम बंगाल में सत्ता पर काबिज हुई है। बंगाल में भाजपा की राजनैतिक शक्ति में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ वहां भगवान राम को बढ़ावा देने का सिलसिला शुरू हो गया है। भाजपा और उसके समर्थकों द्वारा भगवान राम पर केन्द्रित उत्सवों को बढ़ावा दिया जा रहा है। राम का सहारा लेने से भाजपा को उत्तर भारत में जबरदस्त चुनावी लाभ हुआ, जिसका प्रभाव पूरे देश के चुनावी परिदृश्य पर पड़ा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भाजपा ने बंगाल में सत्ता संभालने के बाद बागेश्वर धाम के धीरेन्द्र शास्त्री को बंगाल आने का न्यौता दिया। वे हावड़ा के लिलुआह में हनुमान कथा सुनाने के लिए आए थे। उन्होंने लोगों को सलाह दी कि पूजा के दौरान मांसाहारी खाद्य पदार्थों को दुर्गा प्रतिमा से दूर रखा जाए। ऐसा ही परामर्श आरएसएस की सहयोगी संस्था व्हीएचपी द्वारा कुछ दिन पहले दिया जा चुका था। इससे बंगाली हिन्दू नाराज हो गए। इनमें वे हिन्दू भी शामिल थे जो स्वयं को &#8220;हिन्दू राष्ट्रवादी&#8221; कहते हैं। कई प्रमुख बंगालियों ने अपना विरोध प्रदर्शित किया और वक्तव्य जारी कर कहा कि शास्त्री को हमें यह सिखाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि हम दुर्गापूजा कैसे मनाएं और क्या खाएं और क्या न खाएं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस प्रतिक्रिया की वजह यह तथ्य है कि मछली और बकरे के मांस से बनने वाले व्यंजन दुर्गा उत्सव का लगभग अनिवार्य हिस्सा हैं। कई लोगों ने इस ओर ध्यान दिलाया कि मछली का बंगाली संस्कृति में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है और मांसाहारी खाद्य पदार्थ हिंदू धर्म के कई धार्मिक संस्कारों का हिस्सा हैं। त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय से लेकर कई पत्रकारों, कंटेट क्रियेटरों, समाज के विभिन्न वर्गों के व्यक्तियों, जिनमें स्वयं को &#8220;बंगाली हिन्दू राष्ट्रवादी&#8221; कहने वाले भी शामिल हैं, ने इसके प्रति विरोध प्रदर्शित किया। &#8220;बंगालियों को यह न बताया जाए कि वे दुर्गा पूजा कैसे मनाएं&#8221; कोलकाता की कंटेट क्रियेटर श्रेयसी विश्वास बैनर्जी ने फेसबुक पर लिखा। उन्होंने एक वीडियो भी अटैच किया जिसमें उन्होंने कहा कि एक &#8216;बाहरी व्यक्ति&#8217; विशिष्ट बंगाली धार्मिक और पाक परंपराओं के कायदे निर्धारित कर रहा है। कई लोगों ने शास्त्री के पोस्टरों को फाड़ा और विकृत किया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शुभेन्दु अधिकारी, जिन्होंने शास्त्री का बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया था, कोलकता के कालीघाट मंदिर में एक समारोह में शामिल हुए और प्रसाद के रूप में तली हुई मछली का सेवन किया। कई लोगों ने कहा कि मछली बंगाली संस्कृति का केन्द्रीय तत्व है। भारत सभी दृष्टियों से अत्यंत विविधतापूर्ण है चाहे वह खानपान हो, वेशभूषा हो, भाषा हो या धर्म। हिन्दुओं के कई पंथ हैं और कई तरह की खानपान की आदतें और परंपराएं हैं। मटन के व्यंजन कश्मीरी ब्राम्हणों की संस्कृति का अपरिहार्य भाग है। खानपान की आदतें कई कारकों से निर्धारित होती हैं। भौगोलिक स्थिति उसका एक महत्वपूर्ण आधार होता है। तटीय क्षेत्रों में समुद्री भोजन आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हाल में संपन्न हुए ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए रात्रिभोज में केवल शाकाहारी भोजन परोसा गया। संयोगवश शी जिनपिंग इस भोज में शामिल नहीं हुए, इसकी वजह चाहे जो भी रही हो। जहां विपक्ष ने अंतर्राष्ट्रीय अतिथियों के लिए केवल शाकाहारी भोजन उपलब्ध कराने की आलोचना की वहीं किरन रिजुजू ने इसका बचाव करते हुए कहा कि अतिथियों ने मेनू की तारीफ की। इससे सरकार का यह नजरिया भी जाहिर होता है कि भारत केवल शाकाहारी व्यंजनों वाला देश है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल में राज्य के सभी जिलों के मुख्य व्यंजनों का एक मानचित्र प्रकाशित करवाया। इसमें लखनऊ के टुंडे कबाब का जिक्र नहीं था और केवल शाकाहारी व्यंजनों को सम्मिलित किया गया था, मानो उत्तरप्रदेश पूरी तरह शाकाहारी हो।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक अन्य घटनाक्रम में 14 मुसलमानों को केवल इसलिए नजरबंद कर दिया गया क्योंकि वे गंगा नदी में नौका विहार करते हुए रोजा अफ्तार के दौरान चिकन बिरयानी खा रहे थे। इस घटना का एक दिलचस्प पहलू यह है कि उसी समय वहां नौका विहार कर रहे उन हिन्दुओं के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई जो शराब पी रहे थे। यह है भाजपा सरकारों के हाल।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह जानते हुए भी कि लगभग 70 प्रतिशत भारतीय मांसाहारी हैं, भाजपा सरकारों द्वारा शाकाहार को बढावा दिया जा रहा है। यह अभियान कई स्थानों पर सफल भी हुआ है। गुजरात में, जहां पिछले तीन दशकों से भाजपा की सरकार है, मांसाहारी व्यंजन बेचने वाली दुकानें और रेस्टोरेंट लगभग गायब हो गए हैं। कई लोग गुजरात की सीमा के बाहर के निकटवर्ती स्थानों पर जाकर मांसाहार की अपनी इच्छा पूरी करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भाजपा की दुविधा यह है कि वह भारतीयों की प्रचलित खानपान की आदतों और अपने शाकाहार लादने के एजेंडे के बीच संतुलन कैसे कायम करे। हर संभव अवसर पर वह और उसके सहयोगी संगठन शाकाहार को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं। किसी वजह से भाजपा मांसाहार को मुसलमानों से जोड़ती है। जबकि मांसाहार धर्म की सीमाओं के परे भारतीयों की खानपान की आदतों का अभिन्न अंग है। गुजरात जैसी जगहों पर तो उसका यह आक्रामक शाकाहारवाद चल जाता है, लेकिन पश्चिम बंगाल में उसे कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। शास्त्री और उनके जैसे अन्य बाबा, जो पिछले कुछ दशकों में बड़ी संख्या में ऊग आए हैं, भी आरएसएस-भाजपा की इस राजनीति के झंडाबरदार बने हुए हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शास्त्री इसी दिशा में प्रयासरत थे और उनकी कोशिश एक विशिष्ट प्रकार की खानपान की आदतों को बढ़ावा देने की थी। मानव समाज विभिन्न चरणों में विकसित हुआ है और खानपान की आदतें अत्यंत विविधतापूर्ण रही हैं। भाजपा-आरएसएस और उनके राजनैतिक-सांस्कृतिक समर्थकों का शाकाहार का महिमामंडन करना विचाधारात्मक वजहों से है। वीगनवाद या शाकाहार को बढ़ावा देने की अन्य वजहें भी हो सकती हैं, किंतु लोगों की खानपान की आदतों का सम्मान करना एक लोकतांत्रिक समाज का अभिन्न अंग होना चाहिए। इस बाबा को मांसाहार पर प्रतिबंध लगाने की वकालत करने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। हो सकता है कि भाजपा कुछ अन्य तरीके अपनाकर अपने शाकाहारवाद पर टिके रहने की कोशिश करे जो &#8216;मुसलमानों से नफरत&#8217; के उसके एजेंडे को आगे बढ़ाने में मददगार हो!</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong> (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया )</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-article-public-distressed-due-to-politics-over-indias-food-culture/">डाॅ. राम पुनियानी का लेख: भारत की भोजन संस्कृति पर हो रही राजनीति से जनता त्रस्त</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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		<title>डॉ. राम पुनियानी का लेख &#8211; RSS के भाईचारे के मुखौटे के पीछे का क्या है सच?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 08 Sep 2026 09:37:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[विदेश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;आरएसएस का आचरण हमेशा से विविधता का सम्मान करने के उसके दावे के एकदम खिलाफ रहा है। लेकिन भागवत बहुत चतुराई से अपनी संस्था की हकीकत छिपा गए। विविधता का सम्मान करने का मुखौटा सिर्फ दुनिया को भ्रमित करने का प्रयास, एक झांसा है। लेकिन क्या इंटरनेट के इस युग में और मानवाधिकारों को गंभीरता &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;आरएसएस का आचरण हमेशा से विविधता का सम्मान करने के उसके दावे के एकदम खिलाफ रहा है। लेकिन भागवत बहुत चतुराई से अपनी संस्था की हकीकत छिपा गए। विविधता का सम्मान करने का मुखौटा सिर्फ दुनिया को भ्रमित करने का प्रयास, एक झांसा है। लेकिन क्या इंटरनेट के इस युग में और मानवाधिकारों को गंभीरता से लेने वाले इस दौर में दुनिया से हकीकत छिपाकर रखना संभव हो सकेगा?&#8217; पढ़ें डॉ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">आरएसएस के मुखिया, सरसंघचालक मोहन भागवत इन दिनों तीन देशों की यात्रा पर हैं। प्रथम चरण में वे अमरीका पहुंचे जहां उनका मुख्य कार्यक्रम न्यूयार्क के मेडिसन स्क्वायर में भाषण था। इस कार्यक्रम में करीब 5,000 लोगों के आने की उम्मीद थी। इस यात्रा का घोषित उद्धेश्य था आरएसएस के बारे में व्याप्त गलत धारणाओं को दूर करना, लोगों से संवाद करना और सारी दुनिया एक है का संदेश देना। इस कार्यक्रम का कड़ा विरोध हुआ था। विरोध करने वालों में लगभग 61 मानवाधिकार संगठन शामिल थे, जिन्होंने संघ परिवार की नफरत की राजनीति पर रोशनी डाली। विरोध करने वालों ने आरएसएस से जुड़े लोगों के लेखन का हवाला दिया जिसमें यहूदियों का कत्लेआम करने के लिए हिटलर की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई थी और हिन्दू राष्ट्रवादियों को राष्ट्रनिर्माण के हिटलर के तरीके का अनुसरण करने के लिए कहा गया था। विरोध प्रदर्शन कर रहे लोग बैनर लिए हुए थे जिन पर लिखा था कि आरएसएस ने महात्मा गांधी की हत्या की थी। यहां तक कि न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी, जो भारतीय मूल के हैं, ने भी आरएसएस की निंदा की और आरएसएस के आयोजन के प्रति अपनी नाराजगी दर्ज कराई। मगर उन्होंने कहा कि वे इसे रूकवाने में असमर्थ हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जिस भारत में वे बड़े हुए (वे भारतीय फिल्म निर्माता मीरा नायर के पुत्र हैं) उसमें विविधता का सम्मान था, वहीं आज का भारत एक असहिष्णु राष्ट्र बन गया है। कई हिन्दू संगठनों और अन्य मानवाधिकार संगठनों ने भी भागवत विरोधी प्रदर्शनों में भाग लिया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भागवत का कार्यक्रम 200 से अधिक संगठनों ने आयोजित किया था जो मुख्यतः पहचान से जुड़े मुद्दों पर केन्द्रित रहे हैं। कार्यक्रम में भागवत ने बहिष्करण की अपनी राजनीति को छिपाने का प्रयास करते हुए स्वयं को एक उदार व्यक्ति के रूप में दिखाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि विविधता हमारी जन्मजात एकता का गहना है और मुस्लिम-मुक्त भारत चाहने वाला हिन्दू, हिन्दू नहीं रहेगा! बहुत अच्छी बात है! हम एक व्यक्ति और एक संस्था के बारे में अपनी राय किस आधार पर बनाते हैं? उसकी बातों के आधार पर या उसकी कारगुजारियों के आधार पर? अनेकता में एकता, सद्भाव और धर्मों की सीमाओं के परे लोगों में एकता, भारत के अतीत का हिस्सा रहे हैं। आजादी के संघर्ष के दौरान भगतसिंह के आदर्शों, अम्बेडकर के मूल्यों और गांधी के बंधुत्व के साथ लोगों ने अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने की लड़ाई लड़ी। आरएसएस-हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग लोगों को जोड़ने की इस प्रक्रिया से दूर बने रहे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस दौरान आरएसएस न केवल भारतीय राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया के प्रति उदासीन रहा, बल्कि उसने मुसलमानों के प्रति नफरत फैलाने (और बाद में ईसाईयों के खिलाफ भी) में कोई कसर नहीं छोड़ी और कई तरह से ब्रिटिश शासकों की सहायता की। आरएसएस द्वारा अपनी शाखाओं, स्कूलों, मीडिया और बाद में सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाई गई नफरत की वजह से बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा हुई जिसके मुख्य शिकार मुसलमान हुए। जहां ब्रिटिश राज के दौरान हिन्दू और मुसलमान साम्प्रदायिक तत्वों के बीच लगभग बराबरी का मुकाबला था, वहीं आजादी के बाद आरएसएस की साम्प्रदायिकता का बोलबाला हो गया, जिससे इन दो प्रमुख समुदायों के बीच गहरी खाई बन गई। इसी नफरत के चलते हमने 1993 में मुंबई में, 2002 में गुजरात में, 2013 में मुजफ्फरनगर और 2019 में दिल्ली में मुसलमानों के व्यापक नरसंहार की घटनाएं देखीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आरएसएस की राजनीति का असली चेहरा गुजरात के बिलकीस बानो मामले से पूरी तरह साफ है। एक गर्भवती मुस्लिम महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म होता है, और इसके दोषियों को थोड़ा समय जेल में गुजारने के बाद रिहा कर दिया जाता है! यही है उसका महिलाओं के प्रति सम्मान भाव! उसने पवित्र गाय का मामला भी जोरशोर से उठाया जिसके नतीजे में कई मुसलमानों की लिंचिंग हुई। अखलाक, रकबर खान आदि के साथ ही कई दलित भी लिंचिंग का शिकार बने। ऊना में लाठियों और लोहे की छड़ों से दलितों की पिटाई से आरएसएस के दलितों के प्रति रवैये की पोल खुल गई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">1980 के दशक से ईसाई भी आरएसएस के निशाने पर आ गए। जहां पास्टर स्टेन्स और उनके दो मासूम लड़कों को जिंदा जलाए जाने की घटना को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. केआर नारायणन ने ठीक ही मानव जाति के सबसे कलुषित कार्यों में से एक कहा था, वहीं कंधमाल की घटना ने दुबारा यह दिखाया कि ‘ईसाई धर्म विदेशी है‘ का नारा आरएसएस का ही है। उसका ईसाईयों और मुसलमानों के खिलाफ रवैया पिछले करीब एक दशक से और कटु होता गया है। संघ की राजनैतिक शाखा लगभग 12 सालों से केन्द्र की सत्ता पर काबिज है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हाल में ईसाईयों की प्रार्थनासभाओं पर हमले की घटनाओं में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। मुसलमानों का किस हद तक हाशियाकरण हो चुका है, यह इस बात से जाहिर है कि आरएसएस की राजनैतिक संतान भाजपा के कुल मिलाकर 1000 से अधिक सांसद एवं विधायक हैं मगर उनमें से एक भी मुसलमान नहीं है। यह है मुसलमानों के प्रति समानता का भाव रखने के भागवत के दावे की हकीकत। सन् 2025 में यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ), जो एक स्वतंत्र आयोग है जिसे अमरीकी कांग्रेस ने दूसरे देशों में धार्मिक स्वतंत्रता पर निगरानी रखने और अमरीकी सरकार को अनुसंशाएं करने के लिए स्थापित किया था, ने सिफारिश की थी कि अमरीकी सरकार भारत को ‘‘विशेष रूप से चिंता करने योग्य‘‘ राष्ट्र का दर्जा दे। यूएससीआईआरएफ ने यह सिफारिश भी की थी कि कुछ व्यक्तियों एवं आरएसएस सहित कुछ संस्थाओं पर लक्षित प्रतिबंध लगाए जाएं जिनमें उनकी संपत्तियों को फ्रीज़ करना और अमरीका में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना शामिल हो। सबसे हालिया घटनाक्रम में यूएससीआईआरएफ ने भागवत और आरएसएस के अन्य नेताओं के साथ उच्चाधिकारियों की मुलाकातों और उन्हें राजनयिक शिष्टाचार उपलब्ध कराए जाने के खिलाफ आगाह किया। कई मानवाधिकार संगठनों ने भी अमरीका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो से मांग की कि भागवत का अमरीका का वीजा निरस्त कर दिया जाए या उसे देने से इंकार कर दिया जाए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आरएसएस का आचरण हमेशा से विविधता का सम्मान करने के उसके दावे के एकदम खिलाफ रहा है। लेकिन भागवत बहुत चतुराई से अपनी संस्था की हकीकत छिपा गए। विविधता का सम्मान करने का मुखौटा सिर्फ दुनिया को भ्रमित करने का प्रयास, एक झांसा है। लेकिन क्या इंटरनेट के इस युग में और मानवाधिकारों को गंभीरता से लेने वाले इस दौर में दुनिया से हकीकत छिपाकर रखना संभव हो सकेगा? जहां आरएसएस से संबद्ध 2,500 से अधिक संस्थाएं दुनिया भर में हैं वहीं केरेवान पत्रिका के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत से ऐसे अध्येता और कार्यकर्ता हैं जो मुसलमानों, ईसाईयों, दलितों, महिलाओं और आदिवासियों की भारत में वास्तविक स्थिति से दुनिया को अवगत करा रहे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऐसा लगता है कि भागवत का मुख्य लक्ष्य विश्वव्यापी एकता को बढ़ावा देना नहीं बल्कि भारत में उसके द्वारा किए गए भयावह कार्यों पर पर्दा डालना है। धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, स्वतंत्र प्रेस, भूख और प्रसन्नता संबंधी वैश्विक सूचकांकों पर भारत की स्थिति में गिरावट और आरएसएस-भाजपा का उदय एक-दूसरे के समांतर हुआ है। भागवत नफरत की राजनीति को छिपाने की अपनी ‘चतुराई‘ के लिए प्रशंसा के पात्र हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह भी हो सकता है कि उनका लक्ष्य विविधता का मुखौटा लगाकर, अमरीका और दुनिया के अन्य देषों में हिन्दू लॉबी को सशक्त करना हो। भारत में शांति कायम रखने के लिए जरूरी है कि हम भारतीय संविधान का पालन करें, जिसका विरोध संघ परिवार करता है। वैश्विक एकता स्थापित करने का सर्वोत्तम माध्यम है संयुक्त राष्ट्र संघ का मानवाधिकार घोषणापत्र। इस दौर में, जब सारी दुनिया एक गांव बन गई है, हिन्दू धर्मग्रंथों को उद्धृत करना एकदम गलत है। इससे हिन्दू श्रेष्ठतावादियों का असली इरादा बेनकाब होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"> (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया )</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>क्यों उठता है बार-बार एससी कोटे के भीतर कोटा का सवाल?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/why-does-the-question-of-quota-within-sc-quota-arise-again-and-again/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 04 Sep 2026 10:34:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;2008 में धोबी और पासी इस समूह में शामिल कर दिए गए. 2009 में रविदास जाति भी आ गई. 2018 में दुसाधों को भी महादलित का दर्जा मिल गया. यानी जिस श्रेणी को सबसे वंचित दलितों के लिए बनाया गया था, कुछ वर्षों में बिहार की सभी दलित जातियां उसमें आ गईं. 2007 का प्रयोग, &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;2008 में धोबी और पासी इस समूह में शामिल कर दिए गए. 2009 में रविदास जाति भी आ गई. 2018 में दुसाधों को भी महादलित का दर्जा मिल गया. यानी जिस श्रेणी को सबसे वंचित दलितों के लिए बनाया गया था, कुछ वर्षों में बिहार की सभी दलित जातियां उसमें आ गईं. 2007 का प्रयोग, व्यावहारिक रूप से, खत्म हो गया.&#8217; पढ़ें पुष्य मित्र की  पूरी रिपोर्ट&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">साल 2024 की बात है. अगस्त महीने में सुप्रीम कोर्ट ने एससी आरक्षण में उपवर्गीकरण का सुझाव दिया था. हर साल की तरह उस साल भी 15 अगस्त बिहार के तत्कालीन सीएम नीतीश कुमार राज्य के एक महादलित टोले लखन बिगहा में झंडा फहराने पहुंचे थे. क्योंकि उन्होंने ही बिहार में सबसे पहले पहचाना था कि राज्य में दलित जातियों में भी कुछ जातियां ज्यादा वंचित हैं, उनके लिए अलग कार्यक्रम की जरूरत है. उधर जीतन राम मांझी गरमाये हुए थे, कहते थे, “डी-4 के लोग तो 76 साल से गुलछर्रे उड़ा रहे हैं और हमारे लोग थूक से सतुआ सान कर खा रहे हैं. हमारी मांग यही है कि हमको अलग कर दीजिये.”</p>



<p class="wp-block-paragraph">लखन बिगहा में झंडात्तोलन के बाद नीतीश कुमार के हाथों 164 महादलितों को आवास योजना से लेकर आयुष्मान भारत तक सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने का प्रमाणपत्र दिया. मैं भी वहां दलित-महादलित के मसले को समझने गया था. वहां पता चला कि इन 164 लोगों में एक भी मुसहर-भुइयां नहीं था. लगभग सभी लाभार्थी रविदास जाति के थे, जिन्हें जीतनराम मांझी डी-4 का हिस्सा बताते हैं.</p>



<p class="wp-block-paragraph">टोले के दूसरे सिरे पर 27 घरों वाली मांझी बस्ती थी. जामुन मांझी तब 20-22 साल के थे. उन्होंने अपना टूटा हुआ घर दिखाते हुए कहा था, “मांझी-मुसहर को कौन पूछता है?” छत इतनी जर्जर थी कि डर लगा रहता था कि कब पत्थर गिर पड़े. वहां एक भी इंदिरा आवास नहीं बना था. लगा कि जीतनराम मांझी का गुस्सा जायज है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">दो साल बाद बिहार में सवाल फिर वहीं खड़ा है. जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष कुमार सुमन फिर से कह रहे हैं कि अनुसूचित जातियों के भीतर भी जो समुदाय सबसे पीछे रह गए हैं, उनके लिए आरक्षण में अलग हिस्सेदारी होनी चाहिए. दूसरी तरफ चिराग पासवान इसका विरोध कर रहे हैं. सवाल यह है कि क्या आरक्षण का लाभ सभी दलित जातियों तक समान रूप से पहुंचा है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">जैसा कि सबको मालूम है, 2007 में नीतीश कुमार सरकार ने दलितों के भीतर एक अलग श्रेणी बनाई थी- महादलित. उस समय बिहार की 22 अनुसूचित जातियों में से चार अपेक्षाकृत मजबूत मानी जाने वाली जातियों-चमार/रविदास, दुसाध, धोबी और पासी (जिन्हें मांझी अब डी-4, यानी डेवलप्ड फोर कहते हैं.) को छोड़कर बाकी 18 जातियों को महादलित समूह में रखा गया. महादलित आयोग ने एक अध्ययन कराया और उसके आधार पर कहा गया कि दलितों के भीतर चमार, दुसाध, धोबी और पासी जैसी जातियों में शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन मुसहर, भुइयां, मेहतर, डोम और नट जैसी जातियां अब भी सरकारी योजनाओं का ठीक से लाभ नहीं उठा पा रही हैं. इसलिए इन जातियों को अलग करके विशेष योजनाएं चलाने की जरूरत है.<br>सरकार ने ऐसा किया भी&#8230;</p>



<p class="wp-block-paragraph">महादलित विकास मिशन बना. विकास मित्र नियुक्त हुए. टोला सेवक रखे गए. भूमिहीन परिवारों के लिए जमीन और आवास की योजनाएं बनीं. कौशल विकास के लिए दशरथ मांझी कौशल विकास योजना चली. हर महादलित बस्ती में रेडियो बांटने तक की योजना बनी, ताकि सरकारी योजनाओं और अधिकारों की जानकारी उन तक पहुंच सके.</p>



<p class="wp-block-paragraph">लेकिन महादलित की कहानी ज्यादा लंबी नहीं चली.</p>



<p class="wp-block-paragraph">2008 में धोबी और पासी इस समूह में शामिल कर दिए गए. 2009 में रविदास जाति भी आ गई. 2018 में दुसाधों को भी महादलित का दर्जा मिल गया. यानी जिस श्रेणी को सबसे वंचित दलितों के लिए बनाया गया था, कुछ वर्षों में बिहार की सभी दलित जातियां उसमें आ गईं. 2007 का प्रयोग, व्यावहारिक रूप से, खत्म हो गया.</p>



<p class="wp-block-paragraph">बिहार सरकार की जाति आधारित गणना के आंकड़ों में भी दलित समाज के भीतर बड़ा अंतर सामने आया है. रिपोर्ट के मुताबिक चार प्रमुख दलित जातियों-दुसाध, चमार, पासी हिस्से में 2,42,246 नौकरियां थीं, जबकि बाकी 18 जातियों के पास सिर्फ 48,758. हालांकि जीतनराम मांझी के डी-4 आबादी में भी अधिक हैं, 63 फीसदी हैं, शेष जातियां सिर्फ 37 फीसदी, फिर भी यह फर्क वाजिब नहीं है. और यही विवाद का मुद्दा भी है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">सच यही है कि बिहार की राजनीति में भी पासवान, रविदास, धोबी, पासी और मुशहर को छोड़कर किसी दलित जाति की पूछ नहीं है. पासवान, रविदास और मुशहर आबादी के कारण और धोबी-पासी इसलिए कि वे अपेक्षाकृत संपन्न हैं. मगर डोम, बांसफोड़, मेहतर, चौपाल, बांतर, नट, भोगता वगैरह जातियों का न के बराबर प्रतिनिधित्व है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">राज्य में नौकरियों के मामले में धोबी जाति के लोग इस श्रेणी में सबसे आगे हैं, उनकी आबादी का 3.14 फीसदी हिस्सा सरकारी नौकरी वाला है. उसके बाद पासी का 2 फीसदी, पासवान का 1.44 फीसदी और रविदास का 1.20 फीसदी. इस तुलना में मुसहर की कुल आबादी का सिर्फ 0.26 फीसदी ही सरकारी नौकरी में है. इसके बाद ज्यादातर जातियों के आंकड़े ऐसे ही हैं.</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>डॉ. राम पुनियानी का लेख- जंतर मंतर के बाद का भारत: किस दिशा की ओर बढ़ रहा हमारा लोकतंत्र?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 23 Aug 2026 09:57:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;इस आंदोलन के बाद सरकार का विरोध करने में हिचकिचाहट में कमी आई है. कई जगहों पर जनरेशन अल्फा आंदोलन और विरोध कर रहा है. गोदी मीडिया का रुख जस का तस बना हुआ है. ऐसा महसूस हो रहा है कि अब सोशल मीडिया जैसे इंस्टाग्राम, यूटयूब और ट्विटर-फेसबुक समाज के हालातों को ज्यादा अच्छे &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;इस आंदोलन के बाद सरकार का विरोध करने में हिचकिचाहट में कमी आई है. कई जगहों पर जनरेशन अल्फा आंदोलन और विरोध कर रहा है. गोदी मीडिया का रुख जस का तस बना हुआ है. ऐसा महसूस हो रहा है कि अब सोशल मीडिया जैसे इंस्टाग्राम, यूटयूब और ट्विटर-फेसबुक समाज के हालातों को ज्यादा अच्छे से प्रतिबिंबित कर रहे हैं.&#8217; पढ़ें सुपरिचित इतिहासकार डॉ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">जंतर मंतर पर हुए आंदोलनों ने हमारे देश की राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला है. कॉकरोच जनता पार्टी ने कई आंदोलन किए और सरकार द्वारा विरोध के दमन से समाज के कई वर्गों को पीड़ा झेलनी पड़ी. वैसे घोषित तौर पर यह आंदोलन परीक्षाओं के पर्चे लीक होने पर केन्द्रित था लेकिन इसके यह स्वरुप अख्तियार करने की वजह सामाजिक-आर्थिक तंत्र में व्याप्त गड़बड़ियां थीं. पैलेट गन और बंदूकों के इस्तेमाल के मामले सामने आने के बाद तो लोगों के गुस्से ने जुगुप्सा का रूप ले लिया. यह मुद्दा इतना बड़ा था कि साकार के प्रमुख नेता &#8211; प्रधानमंत्री और गृहमंत्री &#8211; संसद के सत्र में भाग लेने तक की हिम्मत नहीं जुटा सके. वे देश को यह यकीन दिलाने की कोशिश करते रहे कि विपक्ष के हंगामे के चलते संसद में चर्चा नहीं हो पा रही है, इसलिए वहां जाने का कोई औचित्य नहीं है.</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="349" height="408" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM.jpeg" alt="डा. राम पुनियानी" class="wp-image-652" style="aspect-ratio:0.8554991539763114;width:143px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM.jpeg 349w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-16-at-12.22.29-PM-257x300.jpeg 257w" sizes="(max-width: 349px) 100vw, 349px" /><figcaption class="wp-element-caption">डा. राम पुनियानी</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">इन आंदोलनों के मोटे तौर पर तीन केंद्र थे &#8211; कॉकरोच, वामपंथी रूझान वाले युवा और कांग्रेस के नेतृत्व वाला प्रतिरोध. आंदोलन का चमत्कारी नतीजा हुआ क्योंकि सरकार, जिसे ‘निर्वाचित तानाशाही‘ कहा जा रहा है, ने भय का माहौल कायम कर रखा था. वह सरकार की आलोचना और उसके खिलाफ आंदोलनों को राष्ट्रद्रोह कहकर खारिज करती आ रही थी और जब भी मुमकिन होता था, वह सत्ता की ताकत का इस्तेमाल कर मानवाधिकारों के पक्ष में उठने वाली आवाजों को कुचलने का हर संभव प्रयास करती थी. उमर खालिद और शरजिल इमाम छः साल से भी अधिक से जेल में हैं. अभी तक उनके मुकदमों की सुनवाई तक शुरू नहीं हुई है. इस मामले से मानवाधिकारों के मामले में भारत की दयनीय स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है. भीमा कोरेगांव मामले से जुड़े बुद्धिजीवी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी भी इसी स्थिति को रेखांकित करती है. फॉदर स्टेन स्वामी की संस्थागत हत्या दर्शाती है कि शासन तंत्र कितना जालिम है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस आंदोलन के बाद सरकार का विरोध करने में हिचकिचाहट में कमी आई है. कई जगहों पर जनरेशन अल्फा आंदोलन और विरोध कर रहा है. गोदी मीडिया का रुख जस का तस बना हुआ है. ऐसा महसूस हो रहा है कि अब सोशल मीडिया जैसे इंस्टाग्राम, यूटयूब और ट्विटर-फेसबुक समाज के हालातों को ज्यादा अच्छे से प्रतिबिंबित कर रहे हैं. सरकार शुरू में इस आंदोलन को राष्ट्रविरोधियों और आतंकियों द्वारा प्रायोजित बता रही थी और उसके खिलाफ अपने कई अन्य पसंदीदा अपशब्दों का इस्तेमाल कर रही थी, जैसा कि तानाशाह अक्सर करते हैं. लेकिन आंदोलन की आंधी इतनी तेज थी कि भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस और बंजरग दल आदि सभी ने अपने सुर बदल लिए और बढ़-चढ़कर अपने आपको आंदोलन का समर्थक साबित करने में जुट गए. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत तो इस हद तक आगे बढ़ गए कि उन्होंने जेन ज़ी के 2000 लोगों की बैठक आयोजित की और उन्हें लोकतंत्र की खूबियों के बारे में बताया.<br>एक दिलचस्प घटना यह हुई कि इस बैठक में किसी ने उनसे पूछ लिया कि आरएसएस ने स्वतंत्रता के बाद 52 सालों तक तिरंग क्यों नहीं फहराया. उन्होंने इस सवाल को टालते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में तिरंगे से जुड़ा एक किस्सा सुनकर स्वयं को इस परेशानी भरी स्थिति से उबारा. उनकी खुशकिस्मती से वहां कोई ऐसा व्यक्ति मौजूद नहीं था जो पूछता कि उनके संगठन से जुड़े लोगों ने अंबेडकर का पुतला क्यों जलाया था. भागवत के समर्थक इसे लोकतान्त्रिक प्रणाली की एक गौरवशाली नजीर बताते हुए जश्न मना रहे हैं. उनके समर्थक यह भी कह रहे हैं कि जहां भी आंदोलनों का दमन किया गया वहां ‘अराजकता‘ के हालात बन गए. हम यह अच्छे से जानते हैं कि अब तक सरकार की नीतियों के खिलाफ हुए सभी बड़े आंदोलनों को संघ परिवार ने या तो नजरअंदाज किया है या उनका दमन किया है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">किसानों के आंदोलन की पूरी तरह उपेक्षा की गई. सरकार ने जब चुनावी बाध्यताओं के चलते कृषि संबंधी तीन कानून वापिस लिए तब तक लगभग 600 किसान अपनी जान खो चुके थे. शाहीनबाग आंदोलन का मामला तो और अधिक दुःखद है. इस आंदोलन को नजरअंदाज किया गया, उसका दानवीकरण किया गया और आंदोलन खत्म करवाने के लिए हिंसा करवाई गई. हमें जेएनयू में हुआ आन्दोलन भी याद है जिसका दमन और दानवीकरण किया गया (टुकड़े-टुकड़े गेंग), विश्वविद्यालय की प्रकृति बदलने का प्रयास किया गया और उसे दक्षिणपंथियों का अड्डा बना दिया गया.</p>



<p class="wp-block-paragraph">सच तो यह है कि आरएसएस की हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा में लोकतान्त्रिक नीतियों के लिए कोई स्थान नहीं है. लोकतंत्र में विरोधियों से चर्चा एक सामान्य बात है, ना कि मजबूरी में, कोई अन्य विकल्प न होने पर, अपनाया जाने वाला रास्ता, जैसा इस बार भागवत का रवैया था.</p>



<p class="wp-block-paragraph">धर्म-आधारित राष्ट्रवाद का विचार ही लोकतंत्र के एकदम खिलाफ है. आरएसएस, जो सामंतवाद और उपनिवेशवाद के बचे-खुचे तत्वों से उभरा था, ने लोकतांत्रिक संविधान का विरोध किया. जहां हमें जाति और लिंग आधारित गैर-बराबरी साफ नजर आती रही है, वहीं आर्थिक असमानता, खासतौर से पिछले 12 सालों में क्रोनी केपेटिलिज्म और समाज के ऊंचे तबकों को प्राथमिकता दिए जाने के कारण, और ज्यादा साफ दिखने लगी है. ऐसी विचारधारा वालों से लोकतांत्रिक नीतियों की उम्मीद करना एकदम बेकार है,</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्या हम लोकतांत्रिक प्रतिरोध के रास्ते एक तानाशाह सरकार का स्थान एक लोकतांत्रिक सरकार द्वारा लिए जाने की उम्मीद कर सकते हैं – एक ऐसी सरकार जो भारतीय संविधान, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों और समावेशी राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्ध हो? ऐसा लगता है कि वर्तमान में लोकतांत्रिक मूल्यों का अवमूल्यन जिस सीमा तक हो चुका है, उसके चलते समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना एक बड़ी चुनौती है, जिस पर हमें विजय हासिल करनी होगी. जंतर मंतर से शुरू हुए आंदोलन ने सारे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है क्योंकि साधारण लोगों की मूलभूत समस्याओं की उपेक्षा की जा रही है. हालांकि ताजगी भरी हवा बह रही है लेकिन हिन्दू राष्ट्रवादियों द्वारा पैदा की गई सड़ांध ज्यादा गहरी है. मुसलमानों और ईसाईयों के प्रति नफरत गहरी जड़ें पकड़ चुकी है. आरएसएस के प्रचारकों की जबरदस्त घुसपैठ विभिन्न संस्थानों जैसे निर्वाचन आयोग, ईडी, सीबीआई, नौकरशाही, पुलिस और विश्वविद्यालयों व शिक्षण संस्थाओं में हो चुकी है. इसके असर को भारतीय संस्कृति की जड़ें मजबूत करके ही कम किया जा सकता है, जो परत दर परत विकसित हुई (नेहरू के अनुसार इन विभिन्न परतों का शांतिपूर्ण सहअस्तित्व है और वे शांतिपूर्वक एक-दूसरे से संवाद करती हैं), जो भारत की आजादी के आंदोलन के दौरान अपने शिखर पर पहुंची और जिसे आरएसएस की पिछले 100 सालों की कारगुजारियों ने क्षत-विक्षत कर दिया है.<br>यह बहुत राहत की बात है कि इन आंदोलनों से भय का माहौल काफी हद तक कम हुआ है. यह निश्चित ही भारतीयों के रूप में हमें उसी तरह एकताबद्व करेगा जैसा कि आजादी के आंदोलन की वजह से हुआ था. हमारे सामने सवाल यह है कि भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध राजनैतिक दलों को दुबारा कैसे सशक्त किया जाए. जहां मौजूदा माहौल, जिसमें हम खुलकर सांस लेने की उम्मीद कर सकते हैं, स्वागतयोग्य है, वहीं राज्यसत्ता को साम्प्रदायिक तत्वों से मुक्त कराने की चुनौती हमारे सामने है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">अगला कदम काफी कठिन और चुनौतीपूर्ण है, लेकिन ‘भारत के विचार‘ की पुनर्स्थापना के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, जो आजादी के आंदोलन के दौरान उभरा था. हमें उन युवकों को सलाम करना चाहिए जिन्होंने दमनकारी माहौल को तोड़़ा और और चुनावी मोर्चे पर क्या किया जाना है, इस पर विचार करना चाहिए.</p>



<p class="wp-block-paragraph"><br>(अंग्रेजी से रूपांतरण- अमरीश हरदेनिया )</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>क्या राहुल अपनी तीसरी और निर्णायक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर निकलने वाले हैं ? -श्रवण गर्ग</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Aug 2026 07:33:51 +0000</pubDate>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="450" height="450" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg" alt="पत्रकार श्रवण गर्ग" class="wp-image-413" style="width:182px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited.jpg 450w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-300x300.jpg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/06/Shravan-Shravan-1-edited-150x150.jpg 150w" sizes="(max-width: 450px) 100vw, 450px" /><figcaption class="wp-element-caption">पत्रकार श्रवण गर्ग</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">मान लिया जाना चाहिए कि अमित शाह मानसून सत्र के बचे दो दिनों में भी लोकसभा का रुख़ नहीं करेंगे ! हक़ीक़त में तो उनके सदन में आने की कोई ज़रूरत भी नहीं बची है।उनके द्वारा पेश किए जाने वाले विधेयक जूनियर मंत्रियों द्वारा प्रस्तुत करवाये ही जा चुके हैं। गृहमंत्री अगर सदन में आ जाते तब भी अपनी सफ़ाई या दावों में इससे ज़्यादा क्या कुछ नया बोलते जो उनके एक मंत्री जितेंद्र सिंह सदन के भीतर और दूसरे मंत्री जे पी नड्डा बाहर बोल चुके हैं ? नड्डा के कहे हुए को गृहमंत्री का आधिकारिक स्टेटमेंट भी माना जा सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">जितेंद्र सिंह ने ऑन रिकॉर्ड संसद में बोल दिया था कि बीस जुलाई को छात्रों पर कोई शूटिंग नहीं हुई। नड्डा ने तो उनसे भी चार कदम आगे बढ़कर यह कह दिया कि राहुल गांधी झूठ बोल रहे हैं। वे अराजकता फैलाना चाहते हैं। जंतर मंतर पर न तो कोई गोलियाँ चलाई गईं और न गोली चलाने के कोई ऑर्डर दिये गए। तृणमूल सांसद साकेत गोखले को आरटीआई के जवाब में मिली आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ दिल्ली के सिर्फ़ दो अस्पतालों में ही पैलेट गन के शिकार दस घायलों का इलाज किया गया है।बाक़ी दोअस्पतालों, जिनमें एक AIIMS भी शामिल है, की जानकारी प्राप्त होना अभी बाक़ी है। पैलेट गन से घायल हुए लोगों का आँकड़ा अभी तक तीन-चार तक ही सीमित था। क्या जवाब दे पाएँगे अमित शाह ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">अनुमान लगाया जा सकता है कि विपक्ष की माँगों पर सरकार के मंत्रियों द्वारा दिये जा रहे जवाबों और किए जा रहे हमलों से राहुल गांधी पूरी तरह उखड़ चुके हैं ! शायद इसीलिए अमित शाह के बयान की विपक्षी माँग को लेकर किरण रिजुजू के मार्फ़त सरकार द्वारा करवाई गई पेशकश पर राहुल गांधी ने ग़ुस्से से दो टूक जवाब दे दिया कि उन्हें गृहमंत्री की स्पीच नहीं सुननी है। उन्हें सिर्फ़ एक सवाल का जवाब चाहिए कि जंतर मंतर की बर्बरता के लिये कौन दोषी है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">अमित शाह बोलना नहीं चाहते और मोदीजी मौन हैं। प्रधानमंत्री शायद आश्चर्य में हों कि बारह सालों में पहली बार ऐसा हो रहा है कि राहुल गांधी के निशाने पर पर उनका सबसे प्रिय और निकटस्थ व्यक्ति है जो उनके लिए विपक्ष से लड़ता रहा है। क्या मोदीजी अपना मौन पंद्रह अगस्त को लालक़िले पर ही तोड़ेंगे ? बिना राहुल का नाम लिए ‘अराजकता’ फैलाने के लिए विपक्ष को धिक्कारेंगे ? युवाओं को उनकी ‘गलती’ के लिए माफ़ करने और उन्हें गले लगाने की स्क्रिप्ट एक बार फिर दोहराएँगे ? क्या विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी भीड़ में बैठे मोदीजी को सुनते नज़र आएँगे ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">लोग जानना चाहते हैं : पिक्चर अगर अभी बाक़ी है तो आगे का सीन क्या बनने वाला है ? क्या ‘जंतर मंतर’ से प्रारंभ हुई लड़ाई पंद्रह अगस्त के बाद सरकार के लिए अपने अस्तित्व की रक्षा करने और विपक्ष के लिए देश की दूसरी आज़ादी के संघर्ष में बदल सकती है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">भय व्यक्त किया जाना चाहिए कि देश के संसदीय इतिहास में जो नजारा संसद-परिसर में पहली बार (11 अगस्त को) प्रकट हुआ, जिसमें एनडीए और विपक्ष के सांसद अपने-अपने प्रदर्शनों के दौरान एक दूसरे के सामने आ गए और सुरक्षाकर्मियों को दीवार बनकर उनके बीच खड़ा होना पड़ा, क्या देश की सड़कों पर रिपीट हो सकता है ? ऐसा हुआ तो क्या सत्तारूढ़ दल के समर्थक लोकतांत्रिक औज़ारों और संवैधानिक संसाधनों की ही मदद लेंगे अथवा ‘जंतर मंतर’ का प्रयोग ही हर जगह दोहराया जाएगा ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्या राहुल को अपनी तीसरी और निर्णायक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर निकलना पड़ सकता है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>-श्रवण गर्ग, वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>
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		<title>डाॅ. राम पुनियानी का लेख- आरएसएस की विचारधारा का असली चेहरा हैं टी. मोहनदास</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Aug 2026 04:36:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;धरने में भाग लेने वाली लड़कियों और महिलाओं के बारे में मोहनदास की टिप्पणियां सीधे स्त्री-द्वेषी अपशब्दों और टिप्पणियों के शब्दकोश से उठाई गई हैं। मोहनदास जिस संस्था (आरएसएस) से जुड़े हुए हैं, उसमें सामंती और पितृसत्तात्मक मूल्यों का बोलबाला है, जिसमें महिलाओं को, सिद्धांततः पुरूषों की संपत्ति माना गया है।&#8217; पढ़ें सुप्रतिष्ठित इतिहासकार एवं &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;धरने में भाग लेने वाली लड़कियों और महिलाओं के बारे में मोहनदास की टिप्पणियां सीधे स्त्री-द्वेषी अपशब्दों और टिप्पणियों के शब्दकोश से उठाई गई हैं। मोहनदास जिस संस्था (आरएसएस) से जुड़े हुए हैं, उसमें सामंती और पितृसत्तात्मक मूल्यों का बोलबाला है, जिसमें महिलाओं को, सिद्धांततः पुरूषों की संपत्ति माना गया है।&#8217; पढ़ें सुप्रतिष्ठित इतिहासकार एवं लेखक डाॅ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="768" height="768" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png" alt="डा. राम पुनियानी" class="wp-image-468" style="width:165px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png 768w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-300x300.png 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-150x150.png 150w" sizes="(max-width: 768px) 100vw, 768px" /><figcaption class="wp-element-caption">डा. राम पुनियानी </figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">सरकार द्वारा जंतरमंतर पर धरना दे रहे आंदोलनकारियों की मांगें स्वीकार करने के बाद भी मामला पूरी तरह से सुलझा नहीं है। गिरफ्तारियां जारी हैं, और कई जगहों पर गिरफ्तार किए गए लोगों को रिहा नहीं किया गया है। ऐसी खबर है कि प्रदर्शनों की वजह से गिरफ्तार किए गए लोगों में मुसलमानों की संख्या अन्य वर्गों के लोगों की तुलना में अधिक है। जुनैद (जुनैद भाई) का मामला काफी परेशान करने वाला है। उन्होंने एक दल बनाया जो आंदोलनकारियों को पानी और खाना उपलब्ध करवाता था। अभिजीत दिपके ने उनके चरण स्पर्श कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। पुलिस ने उन्हें और उनके परिवार को उत्पीड़ित करने में अति सक्रियता और अति तत्परता दिखाई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उनके पास खाना बांटने के लिए पैसा कहां से आया? उन्होंने शुरू में केवल पानी उपलब्ध करवाया और बाद में अपने कुछ रिश्तेदारों के सहयोग से खाना बांटना शुरू किया। इसके बाद उन्हें कई दानदाताओं ने खाने-पीने का सामान उपलब्ध करवाया और उनका समूह एक तरह से आंदोलन स्थल पर मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का सबसे प्रमुख स्त्रोत बन गया। एक सराहनीय बात यह थी कि आंदोलनकारियों ने केन्द्र सरकार की साम्प्रदायिक राजनीति के खिलाफ भी नारेबाजी की। यह अच्छा है कि युवाओं को इस बात का ध्यान है कि सरकार लिखित समझौते में किए गए वायदे पूरे करने में अब तक असफल रही है। इस आंदोलन का सारे देश में यह सुखद प्रभाव हुआ है कि जो लोग दबा हुआ महसूस कर रहे थे अब वे कुछ हद तक अपने मुद्दों को खुलकर व्यक्त कर रहे हैं और ऐसा महसूस कर रहे हैं कि वे अब खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं। यह विरोध अभी अधबीच में है और युवाओें का उत्साह काबिले तारीफ है। वे दमनकारी तंत्र की जकड़ को ढीला करने के लिए भूरि-भूरि प्रशंसा के अधिकारी हैं। सवाल यह है, कि क्या यह जारी रह पाएगा, सवाल आम जनता के व्यापक असंतोष को सही दिशा देने का है, सवाल यह है कि क्या बड़े राजनैतिक गठबंधन इसे आगे बढ़ाएंगे और सुनिश्चित करेंगे कि कुछ हद तक लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना हो।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस आंदोलन का एक परिणाम यह भी हुआ कि कंगना रनौत जैसे कई लोगों, जिनके अनुसार देश ‘‘2014 में स्वतंत्र हुआ’’ ने जेन ज़ी को गटर जनरेशन बताया! शर्मनाक है ऐसे लोगों का नजरिया जिन्हें जंतर मंतर में व्याप्त सकारात्मकता और रचनात्मकता नजर नहीं आई। इसके साथ ही भाजपा के बौद्धिक प्रकोष्ठ के पूर्व प्रमुख टी. मोहनदास जैसे लोग भी हैं, जो भाजपा-आरएसएस में कई जिम्मेदार पदों पर रह चुके हैं, और जिनके कथनों से इन संस्थाओं की वास्तविक राजनैतिक विचारधारा और असली रंग सामने आता है। वे फरमाते हैं ‘‘अगर सत्ता पर मेरा नियंत्रण होता तो जंतर मंतर पर मौजूद आंदोलकारियों को बंदूक की गोलियों से मौत के घाट उतार दिया गया होता‘‘। उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘आंदोलन में शामिल महिलाएं चाहती हैं कि उनके साथ दुष्कर्म हो और अगर ऐसा होगा तो वे शिकायत तक नहीं करेंगीं‘‘।<br>हालांकि रणनीतिक कारणों से उनके वक्तव्य को खारिज कर दिया गया है, लेकिन सच्चाई यह है कि यदि आरएसएस का कोई सदस्य कोई वीभत्स या भयावह कार्य करता है या ऐसी कोई बात कहता है तो वह यह दावा करने लगता है कि उस व्यक्ति से उसका कोई संबंध नहीं है। ऐसा ही नाथूराम गोडसे के मामले में किया गया था जिसके बारे में आरएसएस ने दावा किया था कि उसका संघ से कोई लेनादेना नहीं था। यह इस तथ्य के बावजूद कि नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे ने अपनी पुस्तक ‘मे इट प्लीज योर ऑनर‘‘ में लिखा है कि नाथूराम सहित सभी भाईयों ने आरएसएस की शाखाओं में प्रशिक्षण प्राप्त किया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाले मोहनदास लोकतांत्रिक मानदंडों और महिलाओं की समानता दोनों को अवांछनीय बताते हैं और दोनों के प्रति तिरस्कार भाव रखते हैं। जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन को काबू में करने के लिए वे जो कदम उठाते वे उनका क्रम भी बताते हैं। सबसे पहले वे उस क्षेत्र में कर्फ्यू लागू करते, फिर भीड़ को तितर-बितर होने की चेतावनी देते, अगर इस आदेश का पालन नहीं होता तो गोलियां चलाने का आदेश दिया जाता और इसके नतीजे में जान गंवाने वाले और घायल हुए लोगों को अस्पताल पहुंचा दिया जाता। लोकतांत्रिक मानदंडों के प्रति जो तिरस्कार का भाव वे दिखा रहे हैं, वह भाजपा के नेतृत्व में पिछले 12-13 सालों से चल रही एनडीए सरकार के क्रियाकलापों में साफ नजर आ रहा है। वैश्विक सूचकांकों को देखने पर पता लगता है कि लोकतांत्रिक मानदंडों पर हमारा स्थान हर साल गिरते हुए निर्वाचित तानाशाही की श्रेणी तक पहुंच चुका है। सरकार जिस रास्ते पर चल रही है उससे भाजपा का मार्गदर्शक मंडल तक विक्षुब्ध है। पहले लालकृष्ण आडवानी ने कहा था कि यह अघोषित आपातकाल है और अब मुरली मनोहर जोशी ने आंदोलनकारियों से निपटने के लिए पुलिस द्वारा अपनाए गए तौर-तरीकों की आलोचना की है। फ्रीडम हाउस (आजादी का वैश्विक सूचकांक) पर भारत का स्थान 100 देशों में से 62वें स्थान पर है और भारत को राजनैतिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की बुरी स्थिति के मद्देनजर ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र‘ की श्रेणी में रखा गया है। इकोनोमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू) लोकतंत्र सूचकांक ने भारत को ‘दोशपूर्ण लोकतंत्र‘ की श्रेणी में रखा है। व्ही-डीम इंस्टीट्यूट (डेमोक्रेसी रिपोर्ट्स) ने भारत के शासन तंत्र को नागरिक एवं न्यायिक स्वतंत्रताओं की स्थिति में आई भारी गिरावट का हवाला देते हुए करीब-करीब ‘लोकतांत्रिक तानाशाही‘ के वर्ग में रखा है। रिपोटर्स विदाउट बाडर्स (विश्व में प्रेस स्वतंत्रता का सूचकांक) ने देश में मीडिया की आजादी पर बढ़ते प्रतिबंधों और पत्रकारों की सुरक्षा की बिगड़ती स्थिति के चलते 180 देशों में भारत को 157वें स्थान पर रखा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">धरने में भाग लेने वाली लड़कियों और महिलाओं के बारे में मोहनदास की टिप्पणियां सीधे स्त्री-द्वेषी अपशब्दों और टिप्पणियों के शब्दकोश से उठाई गई हैं। मोहनदास जिस संस्था (आरएसएस) से जुड़े हुए हैं, उसमें सामंती और पितृसत्तात्मक मूल्यों का बोलबाला है, जिसमें महिलाओं को, सिद्धांततः पुरूषों की संपत्ति माना गया है। साम्प्रदायिक राजनीति महिलाओं के शरीरों पर आधारित होती है। आरएसएस केवल पुरूषों की संस्था है जिसके सदस्य स्वयंसेवक कहलाते हैं। उसके अधीनस्थ महिलाओं की संस्था का नाम राष्ट्र सेविका समिति है। यहां महिलाएं मात्र सेविका (नौकरानी) हो सकती हैं। सेवी पत्रिका (अप्रैल 1994) में भाजपा की नेत्री मृदुला सिन्हा ने अपना नजरिया बताते हुए कहा था कि ‘दहेज लेने और देने में कुछ भी अनुचित नहीं है, पत्नियों के साथ मारपीट करना ठीक है और जब तक जबरदस्त आर्थिक संकट न हो तब तक महिलाओं को घर से बाहर निकलकर कामकाज नहीं करना चाहिए।’ यह हिटलर के महिलाओं के लिए जारी किए गए आदेशों जैसा ही है कि महिलाओं का जीवन रसोईघर, बच्चों और चर्च के इर्दगिर्द घूमना चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हिन्दुत्व के प्रमुख विचारक सावरकर ने महान राजा शिवाजी की इस बात के लिए निंदा की थी कि उन्होंने बसेन के राजा की बहू को ससम्मान वापिस भिजवा दिया था जिसे एक तोहफे के रूप में शिवाजी की सेना ले आई थी। उनके अनुसार प्रतिशोध के लिए मुस्लिम महिलाओं पर जुल्म ढ़ाना जरूरी था।<br>आरएसएस अपनी वास्तविक विचारधारा को छिपाने के लिए भ्रामक बातें करता है लेकिन सच बार-बार सामने आ ही जाता है। पिछली बार अन्ना एवं केजरीवाल के नेतृत्व में हुए आंदोलन को आरएसएस ने सहारा दिया था ताकि उसके जरिए कांग्रेस को बदनाम किया जा सके। इसलिए इस बार हमें सावधान रहने की जरूरत है। यह जरूरी है कि हम धीरे-धीरे लोकतंत्र के रास्ते पर वापिस लौटें, लोकतांत्रिक ताकतों को कंधे से कंधा मिलाकर जोर लगाना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि टी. मोहनदास और उनके विचारधारात्मक गुरू इस सुंदर प्रतिरोध पर काबिज होकर हिन्दू राष्ट्रवाद के विभाजनकारी एजेंडे को सशक्त बनाने में कामयाब न हो पाएं। देश के ज्यादातर लोग वर्तमान शासकों से तंग आ चुके हैं और अगर चुनाव ईमानदारी से करवाए गए (यह एक बड़ा अगर है) तो धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र में इन्हें कोई जगह नहीं मिल पाएगी। मोहनदास का वक्तव्य एक अन्य मोहनदास की राजनीति का धुर विरोधी है जिन्हें नेताजी बोस का अनुसरण करते हुए हम ‘राष्ट्रपिता‘ कहते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><br>(अंग्रेजी से रूपांतरण &#8211; अमरीश हरदेनिया )</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/dr-ram-puniyani-s-article-t-mohandas-is-the-real-face-of-rss-ideology/">डाॅ. राम पुनियानी का लेख- आरएसएस की विचारधारा का असली चेहरा हैं टी. मोहनदास</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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		<title>क्या है ज़ुकरबर्ग की &#8220;माफ़ी&#8221; के पीछे का सच ? -शीतल पी. सिंह</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/what-is-the-truth-behind-zuckerberg-s-apology-sheetal-p-singh/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 07 Aug 2026 05:10:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[विदेश]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;ज़ुकरबर्ग ने किसी सार्वजनिक मंच पर आकर भारतीय नागरिकों या संसद के सामने विस्तृत माफी नहीं मांगी। कोई विस्तृत सार्वजनिक पत्र भी सामने नहीं आया, जिसमें साफ लिखा हो कि कंपनी कौन-सी जिम्मेदारी स्वीकार कर रही है और भविष्य में क्या बदलाव करेगी। यही वह जगह है जहां भारत और दूसरे देशों में मेटा की &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;ज़ुकरबर्ग ने किसी सार्वजनिक मंच पर आकर भारतीय नागरिकों या संसद के सामने विस्तृत माफी नहीं मांगी। कोई विस्तृत सार्वजनिक पत्र भी सामने नहीं आया, जिसमें साफ लिखा हो कि कंपनी कौन-सी जिम्मेदारी स्वीकार कर रही है और भविष्य में क्या बदलाव करेगी। यही वह जगह है जहां भारत और दूसरे देशों में मेटा की जवाबदेही का अंतर दिखाई देता है।&#8217; पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की पूरी टिप्पणी&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="715" height="715" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1.jpeg" alt="पत्रकार शीतल पी सिंह" class="wp-image-457" style="width:151px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1.jpeg 715w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1-300x300.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-02-at-8.13.16-PM-1-150x150.jpeg 150w" sizes="(max-width: 715px) 100vw, 715px" /><figcaption class="wp-element-caption">पत्रकार शीतल पी सिंह</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">कल परसों से प्रचारित किया गया है कि फेसबुक के मालिक मार्क ज़ुकरबर्ग ने भारत सरकार से माफी मांगी है। हर मामले की तरह प्रचारक इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महाबली होने की इमेज में जोड़ रहे हैं जिसमें इधर काकरोचों ने काफ़ी गहरी ख़रोंच मार दी है। घटना पूरी तरह काल्पनिक नहीं है, लेकिन जिस तरह इसे पेश किया जा रहा है, उसमें कथा कहानी बहुत अधिक और सच्चाई बहुत कम है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत मेटा के लिए कितना महत्वपूर्ण है? फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप चलाने वाली मेटा दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में है। उसकी कमाई विज्ञापनों से होती है। वर्ष 2025 में मेटा की वैश्विक आय लगभग 201 अरब डॉलर थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत में फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप के उपयोगकर्ताओं की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है जिसके अलग-अलग ऐप्स के संयुक्त मासिक उपयोगकर्ताओं की संख्या एक अरब से अधिक बताई जाती है। इसका अर्थ एक अरब अलग-अलग लोग नहीं है, क्योंकि एक ही व्यक्ति फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप तीनों इस्तेमाल कर सकता है। फिर भी भारत का आकार असाधारण है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वित्तीय वर्ष 2024-25 में मेटा इंडिया का शुद्ध लाभ लगभग 648 करोड़ रुपये और परिचालन आय लगभग 3,793 करोड़ रुपये रही। लेकिन भारत में उसके प्लेटफॉर्मों से जुड़ा सकल विज्ञापन कारोबार लगभग 29 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था। ये दोनों आंकड़े अलग हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की आय, विज्ञापन बिक्री और समूह कंपनियों के बीच भुगतान अलग-अलग खातों में दर्ज होते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत से मेटा को प्रति उपयोगकर्ता अमेरिका या यूरोप जितनी कमाई नहीं होती। लेकिन यहां करोड़ों नए इंटरनेट उपयोगकर्ता, छोटे व्यापारी, राजनीतिक दल, मीडिया संस्थान, फिल्म उद्योग, धार्मिक संगठन और सरकारी विभाग उसके प्लेटफॉर्मों पर निर्भर हैं। विकसित देशों में बाजार काफी हद तक भर चुका है, जबकि भारत में डिजिटल विज्ञापन और इंटरनेट कारोबार अभी बढ़ रहा है। इसीलिए भारत मेटा की आज की कमाई से अधिक उसके भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऐसे विशाल बाजार में सरकार से टकराना किसी भी कंपनी के लिए आसान नहीं है। सरकार नोटिस भेज सकती है, सामग्री हटाने को कह सकती है, अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर सकती है और कंपनी की कानूनी सुरक्षा पर सवाल उठा सकती है। इसलिए मेटा भारत सरकार की नाराजगी को हल्के में नहीं ले सकता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अब हाल की माफी का मामला समझिए। जुलाई 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो फेसबुक पर कुछ समय के लिए सीमित हो गया था। मेटा ने इसे अपनी प्रक्रिया से जुड़ी गलती बताया। इस पर भाजपा सांसद और इलेक्ट्रॉनिक मामलों की संसदीय समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने मांग की कि मेटा के भारतीय अधिकारियों की ओर से दिया गया स्पष्टीकरण पर्याप्त नहीं है और मार्क ज़ुकरबर्ग स्वयं माफी मांगें। उन्होंने मेटा की कानूनी सुरक्षा वापस लेने की चेतावनी दे दी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके बाद भारत सरकार और मेटा के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बैठक हुई। चर्चा केवल प्रधानमंत्री के वीडियो तक सीमित नहीं थी। बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री, डीपफेक, आपत्तिजनक विज्ञापन, बॉट्स और सत्यापित खातों की सुरक्षा जैसे प्रश्न भी उठे। सरकारी सूत्रों के अनुसार मेटा अधिकारियों ने प्रधानमंत्री का वीडियो हटाए जाने पर खेद व्यक्त किया और ज़ुकरबर्ग की ओर से भी माफी का संदेश दिया गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसलिए यह कहना गलत नहीं है कि मेटा या ज़ुकरबर्ग की ओर से भारत सरकार के सामने खेद प्रकट किया गया। लेकिन यह भी सच है कि ज़ुकरबर्ग ने किसी सार्वजनिक मंच पर आकर भारतीय नागरिकों या संसद के सामने विस्तृत माफी नहीं मांगी। कोई विस्तृत सार्वजनिक पत्र भी सामने नहीं आया, जिसमें साफ लिखा हो कि कंपनी कौन-सी जिम्मेदारी स्वीकार कर रही है और भविष्य में क्या बदलाव करेगी। यही वह जगह है जहां भारत और दूसरे देशों में मेटा की जवाबदेही का अंतर दिखाई देता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अमेरिका में कैम्ब्रिज एनालिटिका मामले के सामने आने के बाद ज़ुकरबर्ग को संसद के सामने घंटों बैठकर सवालों का जवाब देना पड़ा था। करोड़ों लोगों का डेटा बिना उचित सहमति के राजनीतिक प्रचार में इस्तेमाल किए जाने का मामला सामने आया था। अमेरिकी नियामक ने फेसबुक पर पांच अरब डॉलर का जुर्माना लगाया। कंपनी को अपनी निजता और निगरानी व्यवस्था बदलनी पड़ी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अमेरिका में ज़ुकरबर्ग से चुनावों में हस्तक्षेप, डेटा चोरी, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप के अधिग्रहण, बाजार पर एकाधिकार और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य जैसे सवालों पर भी पूछताछ हुई। वर्ष 2024 में सोशल मीडिया से नुकसान झेलने वाले बच्चों के माता-पिता के सामने भी ज़ुकरबर्ग ने खेद व्यक्त किया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यूरोपीय संघ ने मेटा पर डेटा सुरक्षा उल्लंघनों के लिए अरबों यूरो के जुर्माने लगाए हैं। यूरोपीय नागरिकों का डेटा अमेरिका भेजने के मामले में अकेले 1.2 अरब यूरो का जुर्माना लगाया गया। पासवर्ड असुरक्षित तरीके से रखने, लोगों की निजी जानकारी का गलत उपयोग करने और डेटा उल्लंघनों पर भी अलग-अलग दंड दिए गए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ब्रिटेन में मेटा को Giphy नाम की कंपनी का अधिग्रहण वापस करने का आदेश दिया गया, क्योंकि उससे बाजार में प्रतिस्पर्धा कमजोर होने का खतरा था। ऑस्ट्रेलिया में समाचार संस्थानों को उनकी सामग्री के लिए भुगतान करने के मुद्दे पर सरकार और फेसबुक के बीच तीखा टकराव हुआ। म्यांमार में फेसबुक पर रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ नफरत और हिंसा फैलाने वाली सामग्री को बढ़ाने के गंभीर आरोप लगे। संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों ने कहा कि फेसबुक के एल्गोरिदम और कमजोर स्थानीय मॉडरेशन ने हिंसा के वातावरण को बढ़ाया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अर्थात दुनिया के कई देशों में मेटा को केवल माफी नहीं, बल्कि संसद में गवाही, लिखित जांच, अरबों के जुर्माने, कंपनी बेचने के आदेश और मानवाधिकार उल्लंघनों की जवाबदेही का सामना करना पड़ा है। भारत में फिलहाल मामला बंद कमरे की बैठक, सरकारी बयान और खेद तक सीमित दिखाई देता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मेटा के भारत में नियुक्त अधिकारियों के भाजपा / आरएसएस से संबंधों का प्रश्न भी उठता रहा है। सबसे अधिक विवाद मेटा की पूर्व सार्वजनिक नीति प्रमुख अंखी दास को लेकर हुआ था। वर्ष 2020 में अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में आरोप लगाया गया कि फेसबुक ने भाजपा के कुछ नेताओं की भड़काऊ पोस्ट पर अपने नियम लागू करने में नरमी दिखाई। यह भी आरोप लगा कि अंखी दास ने कंपनी के भीतर कहा था कि सत्तारूढ़ दल के नेताओं पर कार्रवाई करने से भारत में फेसबुक के व्यावसायिक हितों को नुकसान हो सकता है।उनकी कुछ पुरानी टिप्पणियों और पोस्टों को भी भाजपा तथा नरेंद्र मोदी के समर्थन के रूप में देखा गया। विवाद बढ़ने के बाद उन्होंने कंपनी छोड़ दी। दूसरा नाम शिवनाथ ठुकराल का है, जो मेटा इंडिया में सार्वजनिक नीति से जुड़े महत्वपूर्ण पद पर रहे। उनके बारे में भाजपा और नरेंद्र मोदी के राजनीतिक संचार से जुड़ी एक कंपनी के साथ पेशेवर संबंधों की रिपोर्टें सामने आईं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वर्तमान मेटा इंडिया प्रमुख अरुण श्रीनिवास के भाजपा या आरएसएस की औपचारिक सदस्यता का कोई विश्वसनीय प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। लेकिन कुछ सामग्री संबंधी फैसलों में भाजपा नेताओं के प्रति नरमी के आरोप जरूर लगे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पक्षपात का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि ज़ुकरबर्ग खुद किसी पार्टी को जिताने का आदेश देते हैं। मेटा का पक्षपात उसके एल्गोरिदम, विज्ञापन प्रणाली, कर्मचारियों के फैसलों और सरकारी दबाव से पैदा हो सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">फेसबुक और इंस्टाग्राम ऐसी सामग्री को आगे बढ़ाते हैं जिस पर ज्यादा प्रतिक्रिया आती है। गुस्सा, डर, नफरत, धार्मिक तनाव और व्यक्तिगत अपमान अक्सर तथ्यपूर्ण और शांत सामग्री से ज्यादा प्रतिक्रिया पैदा करते हैं। एल्गोरिदम भले किसी राजनीतिक दल का नाम न जानता हो, लेकिन वह उस राजनीति को लाभ पहुंचाता है जो समाज में सबसे अधिक उत्तेजना और ध्रुवीकरण पैदा करती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरा बड़ा रास्ता राजनीतिक विज्ञापन है। जिसके पास ज्यादा पैसा, बेहतर डेटा और मजबूत डिजिटल टीम है, वह अपने संदेश को विशेष आयु, जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा और रुचि वाले लोगों तक पहुंचा सकता है। इस व्यवस्था में आर्थिक और राजनीतिक रूप से शक्तिशाली दल को स्वाभाविक लाभ मिलता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तीसरा कारण भारत की भाषाई विविधता है। अंग्रेजी के लिए तैयार तकनीक हिंदी, बांग्ला, तमिल, मराठी, तेलुगू या स्थानीय बोलियों के सांप्रदायिक संकेत, जातिगत गालियां और व्यंग्य ठीक से नहीं समझ पाती। इसलिए कई बार असली नफरत बच जाती है और राजनीतिक आलोचना या व्यंग्य हटा दिया जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">चौथा कारण सरकारी दबाव है। जिस सरकार के पास कंपनी के अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज करने, कानूनी सुरक्षा छीनने और प्लेटफॉर्म पर रोक लगाने की शक्ति हो, उसकी नाराजगी को कंपनी साधारण नागरिक की शिकायत से ज्यादा गंभीरता से ले सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सबसे बड़ा सवाल यही है। प्रधानमंत्री का वीडियो गलती से हटे तो संसद, मंत्रालय और मेटा का शीर्ष नेतृत्व तुरंत सक्रिय हो जाता है। लेकिन किसी दलित, अल्पसंख्यक, पत्रकार, महिला या सामान्य नागरिक को हजारों गालियां, बलात्कार की धमकी और जान से मारने की धमकी मिले तो क्या मेटा उतनी ही तेजी से कार्रवाई करता है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">भारत सरकार का मेटा से बाल यौन शोषण सामग्री, डीपफेक, हिंसा और फर्जी विज्ञापनों पर जवाब मांगना बिल्कुल सही है। मेटा भारत से कमाता है तो उसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठानी होगी। लेकिन जवाबदेही केवल प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल की प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं हो सकती।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सवाल यह होना चाहिए कि क्या एक निजी विदेशी कंपनी को हमारी राजनीति, सामाजिक बहस और सूचना व्यवस्था पर इतना बड़ा, अदृश्य और लगभग अनियंत्रित प्रभाव रखने दिया जा सकता है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">लोकतंत्र में नियम प्रधानमंत्री के वीडियो से शुरू होकर प्रधानमंत्री के वीडियो पर समाप्त नहीं हो सकते।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<ul class="wp-block-list">
<li>फेसबुक से साभार</li>
</ul>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/what-is-the-truth-behind-zuckerberg-s-apology-sheetal-p-singh/">क्या है ज़ुकरबर्ग की &#8220;माफ़ी&#8221; के पीछे का सच ? -शीतल पी. सिंह</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
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		<title>डाॅ. राम पुनियानी का लेख-&#8216;निर्वाचित तानाशाही&#8217; के खिलाफ एकजुट हुए देश के युवा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 02 Aug 2026 15:11:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;इस आंदोलन ने उस प्रोपेगेंडा के प्रभाव को भी कुछ कम किया जो गोदी मीडिया और संघ परिवार द्वारा अपनी शाखाओं, हजारों स्कूलों और अन्य अनुषांगिक संगठनों के माध्यम से किया जाता है. सरकार के खिलाफ हिम्मत से बोलने का साहस धीरे-धीरे लोगों में वापिस लौटेगा, ऐसी संभावना है.&#8217; पढ़ें सुप्रतिष्ठित इतिहासकार एवं लेखक डाॅ. &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong> &#8216;इस आंदोलन ने उस प्रोपेगेंडा के प्रभाव को भी कुछ कम किया जो गोदी मीडिया और संघ परिवार द्वारा अपनी शाखाओं, हजारों स्कूलों और अन्य अनुषांगिक संगठनों के माध्यम से किया जाता है. सरकार के खिलाफ हिम्मत से बोलने का साहस धीरे-धीरे लोगों में वापिस लौटेगा, ऐसी संभावना है.&#8217; पढ़ें सुप्रतिष्ठित इतिहासकार एवं लेखक डाॅ. राम पुनियानी का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


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<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="768" height="768" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png" alt="डा. राम पुनियानी" class="wp-image-468" style="width:166px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited.png 768w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-300x300.png 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/rp-edited-150x150.png 150w" sizes="(max-width: 768px) 100vw, 768px" /><figcaption class="wp-element-caption">डा. राम पुनियानी </figcaption></figure>
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<p class="wp-block-paragraph">कॉकरोच जनता पार्टी की स्थापना और जंतर मंतर पर उसके हालिया जबरदस्त विरोध प्रदर्शन के बारे में हम सब जानते हैं. वर्दीधारी पुलिस और गैर-वर्दीधारी शंकास्पद व्यक्तियों ने दिल्ली और अन्य स्थानों पर युवाओं पर लाठीचार्ज किया और उनके खिलाफ पैलेट गन और यहां तक कि एके-47 राइफल तक का इस्तेमाल किया गया. यह सब लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रजातान्त्रिक तौर-तरीकों के एकदम खिलाफ था. विरोध प्रदर्शन का दूसरा पहलू था नाचते-गाते युवा, एक साथ मिलकर पोस्टर बनाते युवा, हँसते-गाते युवा जो हमें कार्ल मार्क्स के प्रसिद्ध कथन की याद दिलाते हैं कि &#8220;क्रांति आमजनों का उत्सव होती है&#8221;. हालांकि जंतर मंतर और देश के अन्य भागों में हुए विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि और आकार-प्रकार किसी क्रांति से पूरी तरह अलग था.</p>



<p class="wp-block-paragraph">तानाशाही प्रवृत्ति की सरकार, जो जनता की जायज़ मांगों की ओर जरा सा भी ध्यान नहीं देती थी, बहुत लंबे समय के बाद झुकी. कारण यह कि विरोध नए-नए शहरों में फैलता जा रहा था और तानाशाह सरकार का डर पिघलता जा रहा था. हमने पहले देखा है कि किसानों के 12 महीने तक चले आंदोलन के दौरान सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगीं और चुनाव नजदीक आने पर ही उसने तीन कृषि कानून वापिस लिए. सरकार ने शाहीन बाग में चल रहे विरोध प्रदर्शन में बाधा डालने के लिए असामाजिक तत्वों को प्रोत्साहन दिया. पेपर लीक के खिलाफ समय-समय पर उठाई गई आवाजों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया.</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस बार स्थिति अलग थी. सरकार ने आंदोलन की उपेक्षा करने की कोशिश की लेकिन आखिरकार उसे मांगे मानने पर मजबूर होना पड़ा. इसमें सबसे प्रमुख मांग थी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा. उनकी जगह प्रहलाद जोशी को शिक्षा मंत्री बनाया गया. जोशी भी संघी पृष्ठभूमि के हैं. उनके व्यक्तित्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने बिलकीस बानो के साथ दुष्कर्म करने वालों को रिहा किए जाने का समर्थन किया था.</p>



<p class="wp-block-paragraph">पेपर लीक के मसले पर विचार करने और इसे रोकने के लिए उठाए जाने वाले कदमों के बारे में सुझाव देने के लिए एक समिति का गठन किया गया है. यहां यह बताना दिलचस्प होगा कि प्रियंका गांधी के अनुसार इस समिति में एक ऐसे सज्जन को भी शामिल किया गया है जो गौमूत्र विशेषज्ञ हैं और कई ऐसे लोगों को भी जो शिक्षा प्रणाली का क, ख ग भी नहीं जानते.</p>



<p class="wp-block-paragraph">अभी जहां छात्र नेता यह सुनिश्चित करने में जुटे हैं कि सरकार अपने लिखित आश्वासनों को पूरा करे, वहीं यह जरूरी है कि हम इस छात्र आंदोलन की &#8216;कामयाबी‘ को समझें. यह आंदोलन कहीं से भी फ्रांस में 1968 में हुए छात्र आंदोलन, या हमारे पड़ोसी देशों श्रीलंका, बांग्लादेश या नेपाल में हुई छात्र विद्रोहों जैसा नहीं था. लेकिन फिर भी यह भाजपा के आईटी मीडिया सेल द्वारा निर्मित धारणाओं में काफी कुछ बदलाव लाने में कामयाब रहा. इसने उस प्रोपेगेंडा के प्रभाव को भी कुछ कम किया जो गोदी मीडिया और संघ परिवार द्वारा अपनी शाखाओं, हजारों स्कूलों और अन्य अनुषांगिक संगठनों के माध्यम से किया जाता है. सरकार के खिलाफ हिम्मत से बोलने का साहस धीरे-धीरे लोगों में वापिस लौटेगा, ऐसी संभावना है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">जहां कॉकरोच जनता पार्टी और उसके नेता अभिजीत दीपके इस प्रदर्शन के केन्द्र में थे वहीं इसकी नींव पिछले कई सालों से तैयार हो रही थी. बढ़ती बेरोजगारी, जीवनयापन का लगातार महंगा होते जाना और बढ़ते अभावों के कारण यह आंदोलन खड़ा हुआ. अभिव्यक्ति की आजादी, धार्मिक स्वतंत्रता, भूख और आनंद के सूचकांकों पर भारत के लगातार नीचे गिरते जाने को भले ही सरकार खारिज करती रही हो मगर यह समाज के बिगड़ते हालातों को प्रतिबिंबित करता था.</p>



<p class="wp-block-paragraph">मुख्यधारा के मीडिया ने अपनी भूमिका सत्ताधारियों के स्तुतिगान और प्रतिपक्ष की आलोचना करने तक सीमित कर ली है. इस चौथे स्तंभ का किस कदर अधःपतन हुआ है और उसकी छवि कैसी बन गई है, यह इससे साफ़ है कि लोगों ने गोदी मीडिया के पत्रकारों को हूट किया. हालांकि यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं था, लेकिन इससे पता लगता है कि आम लोगों में गोदी मीडिया की कितनी बुरी छवि बन गई है. यह इसलिए क्योंकि वह अपनी सही भूमिका त्यागकर सत्ताधारियों की सेवक बन गई है. ऐसे वातावरण में लोकतांत्रिक आजादियों पर पाबंदियों के खिलाफ लड़ने में युवाओं का जोश बहुत ख़ुशी का सबब है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्या इस आन्दोलन ने अपना लक्ष्य पूरी तरह हासिल कर लिया है? इसका उत्तर इस बात पर निर्भर है कि &#8220;पूरी तरह&#8221; की परिभाषा क्या है. हालांकि शिक्षा मंत्री को बदले जाने से ‘नॉन बायोलॉजिकल&#8217; का अहं काफी हद तक चकनाचूर हुआ, लेकिन इससे कोई बड़ा बदलाव आने वाला नहीं है क्योंकि नागनाथ को हटाकर सांपनाथ को बिठा दिया गया है. पेपर लीक होने की मुख्य वजह &#8211; समाज में फैले भ्रष्टाचार – का बाल बांका भी नहीं हुआ है. भ्रष्टाचार में कमी केवल अधिक पारदर्शी और समाज द्वारा जांची-परखी जा सकने वाली व्यवस्था लागू करने पर ही आ सकती है. हालांकि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आरएसएस ने अन्ना आंदोलन की रूपरेखा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसके चलते बाद में कांग्रेस को चुनौती देने के लिए आम आदमी पार्टी का गठन हुआ. मगर एनडीए सरकारों ने भ्रष्टाचर उन्मूलन के लिए कोई कदम नहीं उठाया. ना ही सत्ताधारियों को इसकी चिंता थीं. सड़कों और पुलों के निर्माण पर खर्च की गई भारी भरकम रकम बारिश और बाढ़ में इनके बह जाने से बर्बाद हो गई क्योंकि संभवतः भाजपा सरकार के दौरान हुए इन निर्माणों में जमकर भ्रष्टाचार हुआ था.</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह तो मानना ही पड़ेगा कि जो भी कामयाबी हासिल हुई, उसके लिए जमीन तैयार करने में राहुल गांधी की महत्वपूर्ण भूमिका थी. उन्होंने सामाजिक मुद्दों के प्रति सकरार के उपेक्षापूर्ण रवैये की कलई खोलकर रख दी. यह कहना मुश्किल है कि क्या आरएसएस-भाजपा द्वारा किया गया धर्म-आधारित ध्रुवीकरण जंतर मंतर पर हुए आन्दोलन से कम हुआ है. हमारे तंत्र में क्या खराबी है इसे एक व्यापक समझ के ज़रिये ही जाना जा सकता है. क्या यह आंदोलन लंबे समय तक चुनावी राजनीति से दूर रहा पाएगा और क्या वह यह मूल मुद्दा उठा पायेगा कि किस तरह साम्प्रदायिक शक्तियों ने देश को शांति और उन्नति की राह से दूर कर दिया है. आजादी की लड़ाई के दौरान और हमारे संविधान में जिस भारत का सपना देखा गया था उसे अत्यंत कुटिलता से पीछे कर देश को हिन्दू राष्ट्र के विचार की ओर धकेल दिया गया है. राष्ट्र निर्माण के मुद्दे की जगह मस्जिदों और विश्वविद्यालयों को ढहाए जाने के मुद्दे को केन्द्र में ला दिया गया है. राज्य सत्ता में धीरे-धीरे उन लोगों की घुसपैठ बढ़ती जा रही है जिन्होंने आरएसएस शाखाओं में विभाजकनारी प्रशिक्षण लिया है या जो गोदी मीडिया और सोशल मीडिया की मदद से फल-फूल रहे हैं और जिन्हें व्हाटस एप् यूनिवर्सिटी कहा जाता है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह विरोध प्रदर्शन ताजी हवा के एक झोंके की तरह था. जरूरत इस बात की है कि उसकी यह यात्रा जारी रहे और दुबारा हमारी पहचान हिंदू या मुस्लिम की होने के बजाए भारतीय नागरिक की बने. यह देश उसमें रहने वालों का है, उसमें रहने वाले सभी लोगों का. जबकि साम्प्रदायिक राजनीति मनुस्मृति पर आधारित हिन्दू राष्ट्र के निर्माण पर जोर देती हैं. उनका पूरा एजेंडा ब्राम्हणवादी मूल्यों को लादने का है जिसमें मुसलमान, ईसाई, आदिवासी, दलित, श्रमिक और महिलाएं दूसरे दर्जे के नागरिक होंगें</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस समय तो विरोध आन्दोलन की सफलता की वजह से उत्साह एवं प्रसन्नता का माहौल है. यह मानना भूल होगी कि उसने अपने सारे लक्ष्य हासिल कर लिए हैं. हम जब तक साम्प्रदायिक शक्तियों को पूरी तरह परास्त नहीं कर देते, या कम से उनली ताकत को बहुत हद तक क्षीण नहीं कर देते, तब तक मौजूदा सत्ताधारी हमारे साथ एक के बाद एक तरह-तरह के अन्याय करते रहेंगे. हम युवाओं/छात्रों की सराहना करते हैं और उन्हें सलाम करते हैं और उम्मीद करते हैं कि भविष्य में भी वे संविधान पर अपरोक्ष आक्रमण की चुनौती का अच्छे से मुकाबला करेंगे. </p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>(अंग्रेजी से रूपांतरण &#8211; अमरीश हरदेनिया)</strong></p>
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