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	<title>साहित्य Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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	<description>साहित्य, विचार और जन आंदोलन</description>
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	<title>साहित्य Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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		<title>क्या रामायण के राम-रावण युद्ध के पीछे था ब्राह्मण और बौद्ध धम्म का संघर्ष ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Roshni Rawat]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Oct 2026 13:54:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;ऐसे में वे क्या कारण थे कि बाद की कथाओं में रावण का वीभत्स चित्रण किया गया ? क्या इसका कारण राम को दैवीय आलोक से आवृत्त कर रावण को एक निकृष्ट व्यक्ति के रूप में चित्रित कर आम-जनमानस में उसके प्रति घृणा भरना था ?&#8217; पढ़ें पूरा आलेख&#8230; लेखक क्या रावण बौद्ध धर्मानुयायी था &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;ऐसे में वे क्या कारण थे कि बाद की कथाओं में रावण का वीभत्स चित्रण किया गया ? क्या इसका कारण राम को दैवीय आलोक से आवृत्त कर रावण को एक निकृष्ट व्यक्ति के रूप में चित्रित कर आम-जनमानस में उसके प्रति घृणा भरना था ?&#8217; पढ़ें पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="412" height="551" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-19-at-12.28.29-PM-edited.jpeg" alt="लेखक" class="wp-image-719" style="aspect-ratio:0.782130490868355;width:96px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-19-at-12.28.29-PM-edited.jpeg 412w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-19-at-12.28.29-PM-edited-224x300.jpeg 224w" sizes="(max-width: 412px) 100vw, 412px" /><figcaption class="wp-element-caption">लेखक</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">क्या रावण बौद्ध धर्मानुयायी था ? क्या रामायण के राम और रावण का युद्ध देव-दानवों का धर्मयुद्ध नहीं अपितु ब्राह्मण धर्म और बौद्ध धम्म का संघर्ष था ? क्या राम ब्राह्मण धर्म की रक्षा करने वाले एक क्षत्रिय राजा थे और रावण एक अनार्य राजा? क्या पुष्यमित्र शुंग द्वारा किये गये बौद्धों के नरसंहार के ट्रेसेज़ रामायण कथा में खोजे जा सकते हैं ? भारत के पौराणिक साहित्य में उपस्थित ऐसे तमाम मिथकों/कथाओं को आज दलित विमर्श ने एक बिल्कुल अलग, नया और क्रांतिकारी दृष्टिकोण दिया है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">हिंदी दलित विमर्श में रामायण कथा को इस दृष्टिकोण से पहलेपहल प्रस्तुत करने वाले विचारक सी.पी. जिज्ञासु थे. 1959 में प्रकाशित अपनी पुस्तक &#8216; रावण और उसकी लंका &#8216; में वे बताते हैं कि वाल्मीकि रामायण में ऐसा कहीं जिक्र नहीं है कि रावण के दस शीश थे , या उसके सिर पर पशुओं जैसे सींग थे या वह हिंसक था. बल्कि उसमें रावण को कुशल नीतिज्ञ, परम विद्वान और सभ्य बताया गया है.तो ऐसे में वे क्या कारण थे कि  बाद की कथाओं में रावण का वीभत्स चित्रण किया गया ? क्या इसका कारण राम को दैवीय आलोक से आवृत्त कर रावण को एक निकृष्ट व्यक्ति के रूप में चित्रित कर आम-जनमानस में उसके प्रति घृणा भरना था ?</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large is-resized"><img decoding="async" width="1024" height="559" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM-1024x559.jpeg" alt="" class="wp-image-717" style="aspect-ratio:1.8318737860769414;width:443px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM-1024x559.jpeg 1024w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM-300x164.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM-766x418.jpeg 766w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM.jpeg 1408w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">रामायण कथा और अन्य मिथकों में बार-बार ऐसे प्रसंग आते हैं कि राक्षस ब्राह्मणों के यज्ञ में बाधा पहुंचाते थे.प्राचीन इतिहास के अध्ययनों से पता चलता है कि उस काल‌ में यज्ञों में बलि चढ़ाई जाती थी, आज भी बंगाल‌ सहित कई राज्यों‌ में आराध्य देव के सामने बलि चढ़ाने की परंपरा है.वहीं दूसरी तरफ बौद्ध धर्म में हिंसा वर्जित है. बौद्ध धर्मानुयायी सम्राट अशोक ने अपने शिलालेख में पशुबलि का निषेध किया था. क्या यही कारण था कि उस समय बौद्ध प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा ब्राह्मणों के यज्ञ-हवनों को रोका जाता रहा हो , जिसके प्रतिशोध में ब्राह्मण-वर्ग ने उन्हें अपने मिथकों में राक्षसों की संज्ञा दी ? पेरियार रामास्वामी अपनी प्रसिद्ध‌ किताब &#8216; ट्रू रीडिंग ऑफ रामायणा&#8217; में इस संदर्भ में विस्तार में बात करते हैं. आचार्य नरेंद्र देव के &#8216; बौद्ध धर्म दर्शन&#8217; में भी &#8216;लंकावतार सूत्र&#8217; का उल्लेख मिलता है , जिसके अनुसार लंकापति रावण ने बुद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण की थी.</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large is-resized"><img decoding="async" width="1024" height="559" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1-1024x559.jpeg" alt="" class="wp-image-718" style="aspect-ratio:1.8318737860769414;width:451px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1-1024x559.jpeg 1024w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1-300x164.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1-766x418.jpeg 766w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1.jpeg 1408w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">एक थ्योरी यह भी है जिसके अनुसार रावण शिव‌ का परम उपासक था. और क्योंकि शिव‌ अनार्यों के देवता थे ऐसे में रावण अनार्यों का राजा था या स्वयं भी अनार्य था. ब्राह्मण धर्म के इतिहास में आर्य-अनार्य संघर्ष भी बहुत प्रचलित रहा है. कुल मिलाकर ऐसा प्रतीत होता है कि रावण का धर्म ब्राह्मण-धर्म नहीं था. यही कारण है ब्राह्मण धर्म के प्रतिनिधि राम उसे चुनौती देते हैं और उसे मार डालते हैं.</p>



<p class="wp-block-paragraph">इन तमाम कथाओं से एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट होती है कि हर कथा , हर मिथक के पीछे इतिहास में घटित घटनाएं होती हैं. ये घटनाएं एक-दूसरे से यथार्थ और कल्पना के मेल से संबद्ध होती हैं. इसी यथार्थ और कल्पना के मेल से मिथकों की रचनाएं होती हैं जिसके पीछे उसे रचने वाले वर्ग का एक खास दृष्टिकोण होता है. इस दृष्टिकोण में रचयिता के अपने विचार और तर्क ऐसे घुले-मिले होते हैं कि वे आम पाठक पर अपनी दृष्टि का प्रभाव तो पूरा डालते हैं पर पाठक उसकी मूल दृष्टि को समझ ही नहीं पाता. अभी तक हम रावण को उसी दृष्टि से देखने के आदी रहे हैं जो सदियों से &#8216;सवर्ण शिक्षा-पद्धति&#8217; के अनुकूल रही है. आज के समय में दलित चिंतकों ने भारतीय पौराणिक कथाओं और मिथकों को साक्ष्यों सहित नये दृष्टिकोण से प्रस्तुत करके धर्म, साहित्य और इतिहास दर्शन में एक नई क्रान्ति का आगाज़ कर दिया है.</p>



<ul class="wp-block-list">
<li><strong>रोशनी रावत</strong></li>
</ul>
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			</item>
		<item>
		<title>रमेश जोशी &#8211; (तोता) राम की शक्ति पूजा</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/ramesh-joshi-tota-ram-ki-shakti-puja-a-satirical-story-on-the-delhi-movement/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 13 Oct 2026 13:22:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;मुझे रात को बड़ा अजीब सपना आया । देखा कि मैं जंतर मंतर पर बैठा हूँ और पुलिस मुझे घसीटकर बस में पटक रही है । सो मैंने सोचा, कहीं यह दुःस्वप्न सच न हो जाए सो नवरात्र करने का निश्चय कर लिया ।&#8217; पढ़ें व्यंग्यकार रमेश जोशी की पूरी कहानी&#8230; लेखक- रमेश जोशी नवरात्र &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;मुझे रात को बड़ा अजीब सपना आया । देखा कि मैं जंतर मंतर पर बैठा हूँ और पुलिस मुझे घसीटकर बस में पटक रही है । सो मैंने सोचा, कहीं यह दुःस्वप्न सच न हो जाए सो नवरात्र करने का निश्चय कर लिया ।&#8217; पढ़ें व्यंग्यकार रमेश जोशी की पूरी कहानी&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="लेखक- रमेश जोशी" class="wp-image-461"/><figcaption class="wp-element-caption">लेखक- रमेश जोशी</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph"> नवरात्र चल रहे हैं । शक्ति की आराधना का आठ-नौ दिन अनुष्ठान । उस बंगाल की संस्कृति का समुच्चय जिस बंगाल ने विभिन्न रूपों में देश का अद्भुत बौद्धिक नेतृत्व किया । हम और तोताराम न पूरे आस्तिक बन सके और न ही नास्तिक । सुखों में सुमिरन नहीं किया तो फिर दुख तो आने ही थे । क्या बताएं पेट पालने से ही फुरसत नहीं मिली तो कैसे सरकारी खर्च से तीर्थयात्रा करते या केदारनाथ की गुफा में ध्यान लगाते । हाँ, जब-जब दुखों के ईडी के छापे का संकट आया हमने किसी न किसी देवता की वाशिंग मशीन में छलांग लगा दी और बच गए ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हम तो सदैव की तरह बासी मुँह बरामदे में आकर बैठ गए लेकिन तोताराम नहीं आया । सो हमने उसी तरह उसके हिस्से की चाय भी पी ली जैसे मन न होते हुए भी एक्स्ट्रा पैसे देकर बनवाई गई दाल-फ्राई ग्राहक गले के नीचे उतार ही लेता है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हम नहाने का मन बना ही रहे थे कि तोताराम हाजिर । हमने पूछा- क्या बात है ? हमने तो सोचा कहीं जंतर-मंतर तो नहीं चला गया ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- किसी फ्री की बस और खाने-पीने का इंतजाम होता और सुरक्षित वापिस घर छोड़ने का इंतजाम होता तो हिम्मत कर भी लेता लेकिन कल से कोई बस, ट्रेन कुछ भी दिल्ली की तरफ नहीं जा रही । सुना है सरकार ने हजारों पुलिस, अर्द्ध सैनिक बल लगाकर दिल्ली को पूरी तरह से बंद कर दिया है । जब-जब सरकारें डरती हैं तो ऐसा ही करती हैं ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- सरकार तो बहुत लोकप्रिय है । जनता उस पर जान छिड़कती है । एक इशारे पर ताली-थाली बजाने लगती है , दीये जलाने लगती है । डरने की तो कोई बात नहीं । सरकार तो लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए चिंतित है । कहीं कोई कॉकरोच उसे कुतरकर भ्रष्ट न कर डाले इसीलिए लोकतंत्र की सुरक्षा का इंतजाम तो कारण ही पड़ता है । और अधिक खतरा हुआ तो कहीं ताले में बंद न करना पड़े ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लेकिन यह बता कि तू इतनी देर क्यों आया ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- मुझे रात को बड़ा अजीब सपना आया । देखा कि मैं जंतर मंतर पर बैठा हूँ और पुलिस मुझे घसीटकर बस में पटक रही है । सो मैंने सोचा, कहीं यह दुःस्वप्न सच न हो जाए सो नवरात्र करने का निश्चय कर लिया । बस, दुर्गसप्तशाती का एक पाठ करके आ रहा हूँ । उसी में देर हो गई ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- सपनों का क्या है ? आडवाणी जी को बहुत बार प्रधानमंत्री बनने के सपने आते रहे लेकिन सच हुए क्या ?इसलिए सपनों से डरने या खुश होने की जरूरत नहीं है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- लेकिन जब मैं आ रहा था तो एक पुलिस वाला मेरी तरफ बहुत संदेहास्पद नज़रों से देख रहा था ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- अंधभक्तों को डरने की कोई जरूरत नहीं है । पुलिस वाले तो केवल दिमागी नक्सलियों को रोकते हैं ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- लेकिन उन्हें कैसे पता चलेगा कि मैं दिमागी नक्सली नहीं हूँ ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- जिस प्रकार घड़े को ठोले से बजाकर देखा जाता है । उसी तरह बरतन की आवाज से पता चल जाता है कि फूटा हुआ है, खाली है या भरा हुआ है । तेरा तो नवरात्र के बिना भी काम चल जाएगा ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- जिस प्रकार सीता ने रावण का वरण नहीं किया था । रावण के उसका अपहरण किया था । वैसे ही मुझे लगता है लोकतंत्र का अपहरण हो गया है । ऐसे में शक्ति की आराधना तो करनी ही पड़ेगी । ये बच्चे भी जंतर मंतर पर यही तो कर रहे हैं । ये बंदर भालू की रावण की लंका फूंकेंगे ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">समझ ले मेरे ये नवरात्र इन बच्चों के लिए ही हैं ।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>रमेश जोशी का व्यंग्य- &#8217;56 इंच का छोटा बंदर&#8217;</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/ramesh-joshi-ka-vyangya-56-inch-ka-chhota-bandar/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 Oct 2026 14:08:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यंग्य]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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		<category><![CDATA[#satire]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लेखक- रमेश जोशी तोताराम ने आज बड़ा अजीब प्रश्न पूछा- मास्टर, बड़े से बड़ा बंदर कितना बड़ा होता है ? हमने कहा- भई बड़े से बड़े की कोई सीमा नहीं होती । वह तो बड़े से भी बड़ा होता है जैसे मोदी जी नेहरू से भी बड़े हो चुके हैं कार्यकाल के हिसाब से । &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="लेखक- रमेश जोशी" class="wp-image-461"/><figcaption class="wp-element-caption">लेखक- रमेश जोशी</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">तोताराम ने आज बड़ा अजीब प्रश्न पूछा- मास्टर, बड़े से बड़ा बंदर कितना बड़ा होता है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- भई बड़े से बड़े की कोई सीमा नहीं होती । वह तो बड़े से भी बड़ा होता है जैसे मोदी जी नेहरू से भी बड़े हो चुके हैं कार्यकाल के हिसाब से । हो सकता है कल को कोई उनसे भी आगे निकल जाए । वैसे अब तक का रिकार्ड तो फ्रांस के लुई 14 वें के नाम है जो 72 साल तक गद्दी पर काबिज रहा , जब तक कि मर नहीं गया । अब मोदी जी तो मोदी जी है विष्णु के अवतार या फिर साक्षात विष्णु । जब तक उनका मन करे रहें । और फिर उनका विकल्प भी तो नहीं है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- हर बात को बिना बात खींच खींचकर इतना बड़ा कर देता है कि बात का मज़ा ही खराब हो जाता है । बात मोदी जी की नहीं, बंदर की हो रही थी कि बड़े से बड़ा बंदर कितना बड़ा होता होगा ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा-सामान्य रूप से बंदर चारों पैरों पर चले तो ज्यादा से ज्यादा डेढ़ फुट ऊँचाई का होता होगा और अगर दो पाँवों पर खड़ा हो जाए तो पूँछ समेत अधिक से अधिक तीन फुट का होता होगा ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- तो फिर जंतर मन्तर पर ये कॉकरोच क्या गा रहे थे- 56 इंच का छोटा बंदर । पेपर लीक कर गया बंदर ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- या तो यह इन बच्चों का अज्ञान है या फिर बड़बोलापन । इन्हें बंदर की क्षमता और खुराफ़ातों का कुछ ज्ञान नहीं है । बंदर मनुष्य का पूर्वज है और फिर शैतान भी । वह कुछ भी हो, कितना भी छोटा-बड़ा हो सकता है । जैसे लंका में घुसते समय बंदर हनुमान मशक अर्थात मच्छर के समान आकार का हो गया और फिर जब सीता जी ने उनके आकार को देखकर शंका की-</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8220;हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना । जातुधान अति भट बलवाना’</p>



<p class="wp-block-paragraph">तो उन्होंने विराट रूप धारण किया-</p>



<p class="wp-block-paragraph">“कनक भूधराकार सरीरा, समर भयंकर अतिबल बीरा॥”</p>



<p class="wp-block-paragraph">बंदर कुछ भी कर सकता है और अगर 56 इंच का हो तो कहना ही क्या ? चाहे तो इतिहास तक को बदल सकता है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- कैसे ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- जयपुर में बंदर आज भी कम नहीं हैं । हम तो तुझे 1964 की बात बता रहे हैं जब हम परीक्षा देने जयपुर गए थे । चांदपोल में भाई साहब के एक मित्र के यहाँ ठहरे थे । खुली छत पर बैठे पढ़ रहे थे । बीच में पाँच सात मिनट के लिए गन्ने का ज्यूस पीने के लिए बाहर गली में गए । आए तो देखा कि एक बंदर हमारा हिन्दी साहित्य का इतिहास लेकर नीम पर बैठा हुआ उसके पन्ने फाड़ फाड़कर फेंक रहा है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सारा इतिहास उलट पुलट दिया । सो बंदर छोटा हो या बड़ा, 56 इंच का या 26 का सावधान रहो ।</p>
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		<item>
		<title>रमेश जोशी का व्यंग्य- &#8216;मोदी मंदिर&#8217;</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/ramesh-joshis-satire-modi-temple/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 04 Oct 2026 13:45:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यंग्य]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लेखक- रमेश जोशी &#8216;मोदी जी के मंदिर की क्या जरूरत है । वे वैसे ही कण कण में व्याप्त हैं लाल किले से लेकर सुलभ शौचालय तक में , 5 किलो अनाज के बोरे से लेकर कोरोना के टीके के प्रमाण पत्र और रेल टिकट तक पर ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230; आज &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="लेखक- रमेश जोशी" class="wp-image-461"/><figcaption class="wp-element-caption">लेखक- रमेश जोशी</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;मोदी जी के मंदिर की क्या जरूरत है । वे वैसे ही कण कण में व्याप्त हैं लाल किले से लेकर सुलभ शौचालय तक में , 5 किलो अनाज के बोरे से लेकर कोरोना के टीके के प्रमाण पत्र और रेल टिकट तक पर ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">आज तोताराम बहुत प्रसन्न था, बोला- अब तो मान ले लोहा, कर ले चमत्कार को नमस्कार ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- क्या चमत्कार हो गया ? क्या मोदी जी नोटबंदी और किसान आंदोलन में मृत लोगों, नीट पेपर आउट के मृत विद्यार्थियों, जंतर मंतर आंदोलन में अपमानित किए बच्चों या मणिपुर के पीड़ित लोगों के बारे में कुछ बोले, उनसे माफ़ी मांगी ? उनका दुख-दर्द पूछने चले गए ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- ये कोई चमत्कार थोड़े हैं । ये तो राहुल जैसे निठल्ले लोगों के काम हैं । मोदी जी का तो मंदिर बन रहा है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- इस देश में मंदिर बनना-बनाना कोई मुश्किल काम है ? कोई भी कहीं भी दो पत्थर रखकर, अगरबत्ती जला देगा तो बन गया मंदिर, हो गई मज़ार । मुश्किल तो है स्कूल बनाना, उन्हें सुविधा सम्पन्न बनाना । जहां स्कूलों से ज्यादा मंदिर-मस्जिद हों उस देश के अच्छे दिन कभी नहीं आने । फिर वे मंदिर चाहे किसी ईश्वर के हों, बुद्ध के हों या अंबेडकर के या फिर दयानंद सरस्वती के । मूर्तियाँ विचार और तर्क की बहुत बड़ी दुश्मन होती हैं । इस देश में तो पशु-पक्षियों के भी अनेक मंदिर हैं जैसे </p>



<p class="wp-block-paragraph">करणी माता मंदिर (चूहों का मंदिर): राजस्थान के बीकानेर के पास देशनोक में स्थित इस मंदिर में 25,000 से अधिक चूहे खुलेआम घूमते हैं। इन्हें यहाँ पवित्र माना जाता है और &#8216;काबा&#8217; कहा जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुक्कुरदेव मंदिर (कुत्ते का मंदिर): छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के खापरी गाँव में स्थित यह मंदिर कुत्ते को समर्पित है। माना जाता है कि यहाँ दर्शन करने से कुत्ते के काटने का भय नहीं रहता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुतिया महारानी मंदिर: उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के मौरानीपुर में स्थित इस छोटे से मंदिर में एक कुतिया की मूर्ति स्थापित कर उसकी पूजा की जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मन्नारसला श्री नागराज मंदिर (सांपों का मंदिर): केरल के हरिपाड (मन्नारसला) में स्थित इस प्राचीन मंदिर में सांपों की मूर्तियों और चित्रों की भरमार है, जहाँ नाग देवता की पूजा होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बुल टेम्पल (नंदी मंदिर): कर्नाटक के बेंगलुरु में स्थित इस मंदिर में भगवान शिव के वाहन नंदी (सांड) की एक विशाल 15 फीट लंबी प्रतिमा है, जिसकी पूजा की जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">और तो और फिल्म वालों के भी मंदिर हैं जैसे</p>



<p class="wp-block-paragraph">अमिताभ बच्चन (कोलकाता): जैसा कि आपने ज़िक्र किया, कोलकाता के बालीगंज (आनंद नगरी) इलाके में फैंस ने उनका एक मंदिर बनाया है, जिसे बच्चन धाम कहा जाता है। यहाँ उनकी एक मूर्ति है और उनकी फिल्म &#8216;अक्स&#8217; से प्रेरित कुर्सी व &#8216;अग्निपथ&#8217; के जूते रखे गए हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">रजनीकांत (कर्नाटक): दक्षिण भारत के सुपरस्टार रजनीकांत के लिए फैंस ने कर्नाटक के कोलार जिले में स्थित कोटिलिंगेश्वर मंदिर में एक विशेष &#8216;सहस्र लिंगम&#8217; स्थापित किया है, जहाँ उनकी सेहत के लिए पूजा की जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सोनू सूद (तेलंगाना): कोरोना महामारी के दौरान लोगों की मदद करने वाले अभिनेता सोनू सूद को फैंस ने &#8216;मसीहा&#8217; माना। तेलंगाना के डुब्बा टांडा गांव में फैंस ने सोनू सूद की मूर्ति लगाकर उनका मंदिर बनाया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सामंथा रुथ प्रभु (आंध्र प्रदेश): साउथ की मशहूर अभिनेत्री सामंथा के एक प्रशंसक ने आंध्र प्रदेश के बापटला जिले में अपने घर के अहाते में ही उनका मंदिर बना दिया और वहाँ उनकी मूर्ति स्थापित की।</p>



<p class="wp-block-paragraph">निधि अग्रवाल (चेन्नई): फिल्म &#8216;इस्मार्ट शंकर&#8217; से मशहूर हुईं अभिनेत्री निधि अग्रवाल के फैंस ने चेन्नई में उनका मंदिर बनाया और उनकी मूर्ति पर दूध से अभिषेक भी किया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हंसिका मोटवानी (मदुरै): अभिनेत्री हंसिका मोटवानी की लोकप्रियता जब चरम पर थी, तब तमिलनाडु के मदुरै में उनके फैंस ने उनके नाम पर एक मंदिर बनाया था, जिसमें उनकी मूर्ति लगाई गई थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सचिन तेंदुलकर (बिहार): क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर का मंदिर बिहार के कैमूर (भभुआ) जिले के अतरवलिया गांव में बनाया गया है। यहाँ सचिन की आदमकद (लाइफ-साइज) मूर्ति लगाई गई है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नेताओं में</p>



<p class="wp-block-paragraph">सोनिया गांधी (तेलंगाना): कांग्रेस पार्टी की नेता सोनिया गांधी के प्रति सम्मान दिखाने के लिए तेलंगाना के एक नेता ने उनका मंदिर बनवाया था, जहाँ उनकी 9 फीट ऊंची कांसे की मूर्ति लगाई गई थी ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">और मोदी जी का भी एक मंदिर ग्वालियर में पहले से ही है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह देश विश्व गुरु है यहाँ एक दलित नेता ने अंग्रेजी का मंदिर बनवाया था ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- अगर तेरा यह मूर्ति महापुराण बंद हो तो कोई काम की बात करूँ ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- करो, करो । आज के दिन मोदी जी से बढ़कर और किसकी बात काम की बात हो सकती है ? लेकिन हमारा मानना है कि किसी भी जीवित व्यक्ति की मूर्ति या मंदिर बनाना अशुभ माना जाता है । तुझे याद है अपने गाँव में विद्या भवन नाम की युवाओं की एक संस्था थी जिसने 1962 में स्टेशन के सामने नेहरू जी की एक मूर्ति बनवाना शुरू किया था । 1963 में मूर्ति बनी और 1964 में नेहरू जी की मृत्यु । बाद में 1965 में जब इंदिरा जी अपने गाँव में आई थीं तो उन्होंने उसका अनावरण किया था । मायावती ने अपनी जीते जी मूर्तियाँ लगवा दीं । उसके बाद से घर बैठी हैं ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- लेकिन मोदी जी का यह मंदिर काई मायनों में अनोखा है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- कैसे ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- इसे ट्रांसजेंडर बोर्ड की तरफ से बनवाया जा रहा है जिसका अध्यक्ष एक ट्रांसजेंडर ही है । 5 एकड़ में सौ सवा सौ करोड़ में बनेगा मंदिर ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- जिस तरह से मंदिरों, कुम्भ मेलों, दीये जलाने के रिकार्ड बनाने में धन खर्च किया जा रहा है उसे देखते हुए यह धन कुछ भी नहीं है । फिर भी जिस देश में स्कूलों में कमरे, फर्नीचर, शौचालय, पीने का पानी नहीं है वहाँ यह एक नैतिक अपराध है । मोदी जी के मंदिर की क्या जरूरत है । वे वैसे ही कण कण में व्याप्त हैं लाल किले से लेकर सुलभ शौचालय तक में , 5 किलो अनाज के बोरे से लेकर कोरोना के टीके के प्रमाण पत्र और रेल टिकट तक पर ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोल- मंदिर की बात कुछ और होती है । सुबह शाम आरती, भजन कीर्तन, मन्नत मनौती आदि ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- लेकिन मंदिर के लिए जिस मूर्ति का पोस्टर ट्रांसजेंडर बोर्ड का अध्यक्ष ट्रांसजेंडर राजन सिंह उर्फ रंजन सिंह दिखा रहा है वह राम स्टाइल में दाढ़ी वाले मोदी जी का है । इसमें ये परशुराम, द्रोणाचार्य अधिक लगते हैं राम कम । और अगर दाढ़ी हटा दी जाए तो पता ही नहीं लगेगा कि यह है कौन । मोदी जी तो बिल्कुल नहीं लगेंगे । और दाढ़ी के साथ ट्रांसजेंडर कोई संबंध स्थापित नहीं कर पाएंगे । कोई दाढ़ी वाला हिजड़ा देखा है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- यह तो हिजड़ों का अपना निर्णय है वे चाहें जिस विग्रह में मोदी को स्थापित करें ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- हिजड़े कन्फ्यूज तो हो जाएँगे क्योंकि मोदी जी के लाखों रूप हैं नित नये। भक्त भगवान को अपने मन के अनुसार बनाना चाहता है जैसे मांसाहारी मांस का भोग लगाएगा और शराबी अपने आराध्य को हम पियाला बनाना चाहता है । ऐसे में अगर ट्रांसजेंडरों ने मोदी जी की दाढ़ी साफ करके घाघरा चुन्नी पहनाकर ‘जियो जियो रे लला’&#8217; करवा दिया तो छप्पन इंची सीने, लाल आँख और पठान का बच्चा वाली इमेज का सत्यानाश हो जाएगा ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके साथ एक चक्कर और है । मोदी जी कहते हैं हम तो फकीर हैं, जब चाहे झोला उठाकर चल देंगे । अगर ट्रांसजेंडरों ने दाढ़ी साफ करवा दी और मोदी का मन अचानक झोला उठाने का हो गया तो खाएंगे क्या । क्योंकि दाढ़ी के बिना कोई फकीर नहीं मानता और फकीर माने बिना भीख नहीं । और दुबारा दाढ़ी बढ़ने में भी एक महिना तो लगेगा । और नकली दाढ़ी का क्या भरोसा; कब, कहाँ धोखा दे जाए । </p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>सतीश झा की कहानी- पुरुषोत्तम मिश्रा का आईना</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/satish-jhas-story-purushottam-mishras-mirror/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 27 Sep 2026 13:35:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi kahani]]></category>
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		<category><![CDATA[#sahitya]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सावन का सत्रहवाँ दिन था, सन् १८७१। उस दिन पुरुषोत्तम मिश्रा ने वह किया जिसे वे न उस समय समझ पाए, न फिर कभी। वाराणसी की संकरी गलियों में, दशाश्वमेध घाट से कुछ दूर, अपने पुराने घर की ऊपरी कोठरी में वे अकेले खड़े थे। नीचे उनकी पत्नी सो रही थी। सातवाँ महीना था। नींद &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="923" height="977" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/09/WhatsApp-Image-2026-09-14-at-9.34.19-AM.jpeg" alt="लेखक- सतीश झा" class="wp-image-681" style="aspect-ratio:0.9447490510333193;width:128px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/09/WhatsApp-Image-2026-09-14-at-9.34.19-AM.jpeg 923w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/09/WhatsApp-Image-2026-09-14-at-9.34.19-AM-283x300.jpeg 283w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/09/WhatsApp-Image-2026-09-14-at-9.34.19-AM-767x812.jpeg 767w" sizes="(max-width: 923px) 100vw, 923px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">सावन का सत्रहवाँ दिन था, सन् १८७१।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उस दिन पुरुषोत्तम मिश्रा ने वह किया जिसे वे न उस समय समझ पाए, न फिर कभी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वाराणसी की संकरी गलियों में, दशाश्वमेध घाट से कुछ दूर, अपने पुराने घर की ऊपरी कोठरी में वे अकेले खड़े थे। नीचे उनकी पत्नी सो रही थी। सातवाँ महीना था। नींद भारी थी—मानो किसी और के सपनों से भरी हो।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दो बार वे नीचे जाकर उनका चेहरा देख आए थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">चेहरे पर ऐसी शांति थी जैसे किसी पात्र में रखा जल, जिसे छूने भर से कुछ टूट जाएगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वे फिर ऊपर लौट आए। शायद उस शांति को बचाने के लिए। शायद इसलिए कि जो होने वाला था, उसे नीचे नहीं होना चाहिए था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उन्होंने दादा का पुराना आईना सामने रखा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">काठ पर समय से घिसे हुए आकार थे—अधखिले कमल, उलटी दिशा में तैरती मछलियाँ और बीच में एक आँख।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उसे देखते हुए पहली बार उन्हें लगा कि देखना और देखे जाना दो अलग बातें नहीं हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उन्होंने शीशे पर हथेली रखी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">काँच पानी की तरह काँपा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ठंडक थी—नदी की नहीं; उस जल की, जो धरती के बहुत नीचे, बिना आवाज़ किए बहता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">उस प्रकाशहीन जगह में पाँच पुस्तकें खुलीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">न दीवार थी, न द्वार। प्रत्येक पुस्तक पर एक हथेली का निशान था—हर बार वही, हर बार थोड़ा बदला हुआ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">किसी पर कोई नाम नहीं था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">पहला जीवन</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक बच्चा राजा बना।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वह आईनों के महल में रहा और वहीं मरा—जहाँ प्रत्येक प्रतिबिंब अपने बाद एक और प्रतिबिंब को जन्म देता था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अंत तक उसे मालूम नहीं हुआ कि उनमें असली कौन था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हाशिये पर लिखा था:</p>



<p class="wp-block-paragraph">“खंड १७ देखें।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">खंड १७ में वही मनुष्य कमला नदी के किनारे बैठा था। सत्तर वर्षों से एक ही श्लोक की टीका लिख रहा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हर व्याख्या से तीन व्याख्याएँ निकलतीं। उनसे नौ। नौ से सत्ताईस।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मृत्यु के दिन भी उसकी कलम चल रही थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अंतिम वाक्य था:</p>



<p class="wp-block-paragraph">“यह श्लोक अभी समझ में नहीं आया।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने पुस्तक बंद कर दी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भीतर कहीं एक और पृष्ठ खुला।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरा जीवन</p>



<p class="wp-block-paragraph">जूट और पीतल का बड़ा कारोबार था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हर संबंध का एक खाता था। हर स्पर्श की एक कीमत।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इकतालीस वर्ष की आयु में हिसाब में एक आना कम निकला।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शेष जीवन उसी एक आने की तलाश में बीत गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अंतिम पृष्ठ पर लिखा था:</p>



<p class="wp-block-paragraph">“बाकी: एक अज्ञात पुत्र।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने वह पंक्ति दो बार पढ़ी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">तीसरा जीवन</p>



<p class="wp-block-paragraph">भोर से पहले का समय था—न रात, न दिन।</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक युवक खाई में पड़ा था। चारों ओर गीली मिट्टी की गंध थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वह अपनी माँ के हाथों की गंध याद कर रहा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">रोटी की नहीं। मेहंदी की नहीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बस हाथों की।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सूर्योदय से पहले वह मर गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नीचे लिखा था:</p>



<p class="wp-block-paragraph">“लापता।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">पीछे के पृष्ठ पर, किसी दूसरी लिखावट में:</p>



<p class="wp-block-paragraph">“माँ ने तीन वर्ष तक दरवाज़ा खुला रखा।”</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने पुस्तक बंद कर दी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वाक्य खुला रहा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">चौथा जीवन</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह सबसे मोटी पुस्तक थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उसमें वही कोठरी थी। वही आईना। वही सावन का दिन।</p>



<p class="wp-block-paragraph">और एक आदमी था, जो यह कथा लिख रहा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने अंतिम अनुच्छेद पढ़ा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उसमें लिखा था कि पुरुषोत्तम अंतिम अनुच्छेद पढ़ रहे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अगली पंक्ति खाली थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वे पीछे हटे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">आईने का जल गाढ़ा हो गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">पाँचवाँ जीवन</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस पुस्तक पर हथेली का निशान नहीं था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भीतर एक आदमी था। वह हर सुबह उठता, खिड़की खोलता और नदी को देखता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">फिर धीरे-धीरे गुनगुनाता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दिन भर कुछ नहीं करता।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उस जीवन में न पत्नी थी, न पुत्र। न कोई खाता, न युद्ध, न श्लोक, न आईना।</p>



<p class="wp-block-paragraph">केवल वह था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वह बहुत वृद्ध हुआ। एक सुबह खिड़की खोलते हुए मर गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उसके बाद कोई दरवाज़ा खुला नहीं रहा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम बहुत देर तक उस पृष्ठ को देखते रहे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तभी उन्हें नीचे सो रही स्त्री की साँस सुनाई दी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">किसी ने पूछा:</p>



<p class="wp-block-paragraph">“इनमें से किसे आप जीने देंगे?”</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने हथेली हटानी चाही।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पर अब यह स्पष्ट नहीं था कि हथेली उनकी ओर थी या आईने की ओर।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नीचे लकड़ी हिली।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शायद उनकी पत्नी ने करवट बदली थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शायद वह बच्चा, जो अभी किसी पुस्तक में दर्ज नहीं था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पहली पुस्तक खुली। जहाँ राजा का चेहरा होना चाहिए था, वहाँ कोरा शीशा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरी में एक आना चमक रहा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तीसरी में दरवाज़ा अब भी खुला था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">चौथी की खाली पंक्ति पर स्याही फैलने लगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पाँचवीं बंद रही।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने कोई उत्तर नहीं दिया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">फिर भी एक पुस्तक चुन ली गई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">❧</p>



<p class="wp-block-paragraph">बहुत दूर—जहाँ समय नहीं था और नाम अभी दिए नहीं गए थे—असंख्य जीवन चुप खड़े थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उन्हें जन्म लेने की कोई जल्दी नहीं थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुरुषोत्तम ने शीशे से हथेली हटा ली।</p>



<p class="wp-block-paragraph">उस पर कोई निशान नहीं था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नीचे पत्नी की साँस सुनाई दे रही थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पुराने काठ में, अधखिले कमलों और उलटी तैरती मछलियों के बीच, वह आँख अब भी खुली थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वह न पिता को देख रही थी, न पुत्र को।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वह उसे देख रही थी जो अभी जन्मा नहीं था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">और उसे—</p>



<p class="wp-block-paragraph">जो यह पढ़ रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<ul class="wp-block-list">
<li><strong>सतीश झा</strong>, <strong>लेखक जाने-माने भारतीय-अमरीकी पत्रकार एवं जनसत्ता तथा दिनमान के संपादक रहे हैं.</strong></li>
</ul>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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]]></content:encoded>
					
		
		
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		<item>
		<title>प्रियदर्शन का लेख : कुंवर नारायण को पढ़ना अपने समय को  पढ़ना है</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/priyadarshans-article-to-read-kunwar-narayan-is-to-read-ones-own-time/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Sep 2026 12:18:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi kavi]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi kavita]]></category>
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		<category><![CDATA[#kunwar narayan]]></category>
		<category><![CDATA[#lucknow]]></category>
		<category><![CDATA[#sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#कुंवर नारायण]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;वे बताते हैं कि इन दिनों वे एक अजीब सी मुश्किल में हैं, नफ़रत करने की उनकी ताक़त घटती जा रही है। अंग्रेज़ी से नफ़रत करने की कोशिश में शेक्सपियर आड़े आ जाते हैं, मुसलमानों से नफ़रत की कोशिश में ग़ालिब रास्ता रोक लेते हैं, सिखों से नफ़रत की राह में गुरु नानक मिल जाते &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;वे बताते हैं कि इन दिनों वे एक अजीब सी मुश्किल में हैं, नफ़रत करने की उनकी ताक़त घटती जा रही है। अंग्रेज़ी से नफ़रत करने की कोशिश में शेक्सपियर आड़े आ जाते हैं, मुसलमानों से नफ़रत की कोशिश में ग़ालिब रास्ता रोक लेते हैं, सिखों से नफ़रत की राह में गुरु नानक मिल जाते हैं। पहला धोखा देने वाली अपनी प्रेमिका के चेहरे पर मां, बहन और पत्नी का चेहरा दिख जाता है और कवि प्रेम के घूंट पीकर रह जाता है।&#8217; पढ़ें सुपरिचित लेखक प्रियदर्शन का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image is-style-default">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="421" height="488" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-05-at-11.42.21-AM.jpeg" alt="लेखक प्रियदर्शन" class="wp-image-577" style="aspect-ratio:0.8627635394623403;width:133px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-05-at-11.42.21-AM.jpeg 421w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/08/WhatsApp-Image-2026-08-05-at-11.42.21-AM-259x300.jpeg 259w" sizes="(max-width: 421px) 100vw, 421px" /><figcaption class="wp-element-caption">लेखक प्रियदर्शन</figcaption></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">कुंवर नारायण को पढ़ना क्यों ज़रूरी है? क्योंकि वे हमें परंपरा से भी जोड़ते हैं और आधुनिकता से भी। वे परंपरा और आधुनिकता दोनों को जस का तस नहीं ग्रहण कर लेते। परंपरा में भी जो छोड़े जाने लायक है, उसे छोड़ देते हैं और आधुनिकता में भी जो त्याज्य है, उसे त्याज्य बताते हैं।<br>कुंवर नारायण बहुत सरल कवि हैं। कई बार तो वे सूक्तियों में बात करते हैं। निश्चय ही सूक्तियां कविता नहीं होतीं। लेकिन काव्य तत्व को सूक्तियों में बदलने के लिए जो मानवीय सरलता और भाषिक गहनता चाहिए, वह कुंवर नारायण में भरपूर है। उन जैसा कवि ही लिख सकता है- &#8216;कोई दुख मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं / हारा वही जो लड़ा नहीं।&#8217;</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुंवर नारायण के यहां ऐसी बेशुमार पंक्तियां हैं। वे मनुष्य के साहस और संघर्ष को सर्वोपरि मानते हैं- लेकिन गर्व, अहंकार और मिथ्या अभिमान के खोखलेपन को भी पहचानते हैं। उनकी एक छोटी सी कविता है जिसमें वह बहुत गरिमापूर्ण ढंग से लिखते हैं- &#8216;अबकी बार लौटा तो / बृहत्तर लौटूंगा / चेहरे पर लगाए नोकदार मूंछें नहीं / कमर में बांधे लोहे की पूंछें नहीं / जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को / तरेर कर न देखूंगा उन्हें / भूखी शेर-आँखों से /अबकी बार लौटा तो / मनुष्यतर लौटूंगा / घर से निकलते / सड़कों पर चलते / बसों पर चढ़ते / ट्रेनें पकड़ते / जगह बेजगह कुचला पड़ा / पिद्दी-सा जानवर नहीं / अगर बचा रहा तो / कृतज्ञतर लौटूंगा / अबकी बार लौटा तो / हताहत नहीं सबके हिताहित को सोचता / पूर्णतर लौटूंगा।’</p>



<p class="wp-block-paragraph">बहुत जटिल बातों को बहुत सरलता से कह देना कुंवर नारायण की एक अन्य विशेषता है। उनके समूचे काव्य-तत्व में पौराणिक प्रसंगों की प्रचुरता है। ‘वाजश्रवा के बहाने’ या ‘आत्मजयी’ जैसी उनकी कृतियां परंपरा से संवाद करती हैं। ‘आत्मजयी’ में नचिकेता यमराज से बहस करता है। लेकिन परंपरा कुंवर नारायण के लिए आत्मीय विरासत तो है, श्रद्धा या पूजा की वस्तु नहीं। दूसरी बात यह कि वे तमाम परंपराओं को देखते हैं और उनका सम्मान करते हैं। मौजूदा समय में घृणा की जो राजनीति है, उस पर प्रहार करने में भी उनकी कविता नहीं चूकती। उनकी एक कविता है- ‘एक अजीब सी मुश्किल’। वे बताते हैं कि इन दिनों वे एक अजीब सी मुश्किल में हैं, नफ़रत करने की उनकी ताक़त घटती जा रही है। अंग्रेज़ी से नफ़रत करने की कोशिश में शेक्सपियर आड़े आ जाते हैं, मुसलमानों से नफ़रत की कोशिश में ग़ालिब रास्ता रोक लेते हैं, सिखों से नफ़रत की राह में गुरु नानक मिल जाते हैं। पहला धोखा देने वाली अपनी प्रेमिका के चेहरे पर मां, बहन और पत्नी का चेहरा दिख जाता है और कवि प्रेम के घूंट पीकर रह जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह कुंवर नारायण की अपनी उलटबांसी है। एक बदहवास, घृणा से बजबजाती दुनिया का जैसे वे मुस्कुराते हुए कंधा थपथपाते हें। लेकिन आततायियों के प्रति उनमें कोई ममत्व नहीं है। यहां उनका सहज अंदाज़ अचानक व्यंग्य-विदग्ध हो उठता है। बाबरी मस्जिद गिराए जाने से व्यथिक वे ‘अयोध्या 1992’ जैसी कविता लिख सकते हैं- ‘हे राम, / जीवन एक कटु यथार्थ है / और तुम एक महाकाव्य ! / तुम्हारे बस की नहीं / उस अविवेक पर विजय / जिसके दस बीस नहीं / अब लाखों सर- लाखों हाथ हैं, / और विभीषण भी अब / न जाने किसके साथ है / इससे बड़ा क्या हो सकता है / हमारा दुर्भाग्य / एक विवादित स्थल में सिमट कर / रह गया तुम्हारा साम्राज्य / अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं / योद्धाओं की लंका है, / &#8216;मानस&#8217; तुम्हारा &#8216;चरित&#8217; नहीं / चुनाव का डंका है! / हे राम, कहां यह समय<br>कहां तुम्हारा त्रेता युग / कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम<br>कहां यह नेता-युग! / सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ य किसी पुराण &#8211; किसी धर्मग्रन्थ में /<br>सकुशल सपत्नीक / अबके जंगल वो जंगल नहीं /<br>जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक!’<br>तो यह भी कुंवर नारायण हैं। पूरी तरह समकालीन और अकाव्यात्मक होने का ख़तरा उठाते हुए भी तीखी बात कह सकने का साहस रखने वाले कवि। उनको पढ़ना इसलिए ज़रूरी है कि उनको पढ़ते हुए मनुष्य होने के नए अर्थ खुलते हैं, सभ्य होने के नए मानी मिलते हैं। वे बहुत चुपचाप हमें भीतर से कुछ बदल डालते हैं। उनका एक दार्शनिक आयाम है जो उनकी छोटी-बड़ी कविताओं में बहुत मुखर होकर सामने आता है। यह मुखरता भी अलग तरह की है- इसमें कोई ऊंची आवाज़ नहीं, बस बहुत स्पष्ट चिंतन की कौंध है। दर्शन को भी निरी दार्शनिकता से मुक्त कर कविता में कैसे ढाल दिया जाए- यह उन्हें ख़ूब मालूम है। उन जैसा कवि ही ‘दीवारें’ जैसी कविता लिख सकता है- &#8216;अब मैं एक छोटे-से घर /<br>और बहुत बड़ी दुनिया में रहता हूँ / कभी मैं एक बहुत बड़े घर / और छोटी-सी दुनिया में रहता था /<br>कम दीवारों से / बड़ा फ़र्क पड़ता है / दीवारें न हों /<br>तो दुनिया से भी बड़ा हो जाता है घर।&#8217;</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुंवर नारायण ने हिंदी के बहुत सारे लेखकों की तरह आर्थिक संघर्ष नहीं झेले, बल्कि वे एक समृद्ध-संपन्न और कुलीन परिवार से आते थे। मगर समकालीन साहित्य संसार में इस बात ने उनकी चुनौती कुछ बड़ी कर दी। उनको मान्यता मिलने में समय लगा। उनके मुक़ाबले हिंदी समाज उम्र में उनसे कुछ वरिष्ठ नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन जैसे जनकवियों को ज़्यादा महत्व देता रहा। वे रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के भी समकालीन रहे। उस दौर में केदारनाथ सिंह की ग्राम-संवेदना को भी हाथों-हाथ लिया गया। यह सच है कि वह दौर हिंदी कविता की बहुत समृद्ध आवाज़ों से भरा था। धीरे-धीरे लोगों ने कुंवर नारायण की कुछ मद्धिम आवाज़ भी सुननी शुरू की। यह शिकायत की गई कि वे ऊष्मा से भरे इस दौर में कुछ ‘ठंडे’ कवि हैं। लेकिन उनकी कविताओं का जो आंतरिक ताप था, वह भी इन वर्षों में मुखर होता रहा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सत्तर और अस्सी के दशकों में हिंदी कविता नक्सलवाद की क्रांतिकारी धारा से ऊर्जा पाती रही। मंगलेश डबराल, आलोकधन्वा, वीरेन डंगवाल जैसे कई बड़े कवि इसी दौर में उभरे। इस दौर पर नागार्जुन-त्रिलोचन की छाया भी बड़ी होती रही। यह सच है कि इससे पहले इनकी कविताओं को भी वह मान्यता नहीं मिली थी जो इन वर्षों में मिली। लेकिन एक समय ऐसा लगता था कि हिंदी कविता की मुख्यधारा के रूप में जनवाद और उसके आग्रहों के बीच कुछ कवि विस्मृत न कर दिए जाएं।<br>लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कविता की अपनी शक्ति ने कवियों को बचाया। आज की तारीख में हिंदी कविता जिन कवियों की परंपरा से कुछ ग्रहण करती है, उनमें कुंवर नारायण भी एक हैं और प्रमुख हैं। कभी जाने-माने विष्णु खरे ने लिखा था कि हिंदी कविता वैश्विक कविता से कहीं कमतर नहीं है। हिंदी के जो कवि इस वक्तव्य के प्रामाणिक स्वर की तरह प्रस्तुत किए जा सकते हैं, उनमें कुंवर नारायण भी एक हैं। बेशक, उनकी आवाज कई बार मद्धिम जान पड़ती है, वे कहीं-कहीं पोलिश कवियों मिस्लाव मिवोश और शिंबोर्स्का की याद दिलाते हैं, चिली के महान कवि निकानौर पार्रा की एक कविता युवा कवियों के नाम है- &#8216;जैसा चाहो वैसा लिखो / जिस भी शैली में जो तुम्हें पसंद आए / पुल के नीचे बहुत सारा खून बह चुका है / यह मानते रहने में / कि एक ही रास्ता सही है / कविता में सबकुछ स्वीकार्य है / बेशक, इस एक शर्त के साथ / कि तुम्हें यह कोरा पन्ना सुधारना है।&#8217; इसमें संदेह नहीं कि कुंवर नारायण ने कोरे पन्नों को बार-बार नए अर्थ दिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुंवर नारायण ने विपुल मात्रा में लिखा है- कविता के अलावा कहानियां भी, फिल्मों पर भी और विचार से जुड़े आलेख भी। ‘कोई दूसरा नहीं’, ‘परिवेश हम तुम’, ‘आमने-सामने’, ‘इन दिनों’ जैसे कविता संग्रह सहज याद आते हैं। उनकी एक कहानी में दो देशों के बीच की सीमाएं खो जाती हैं। अब सब सीमाओं की तलाश में लगे हैं, सीमाएं न हों तो लोग कैसे पहचाने जाएं, सेनाएं क्या करें। लेकिन खोई हुई सीमाओं के बीच सबसे निश्चिंत होकर बच्चे खेल रहे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सादगी के सौंदर्य और दर्शन की गरिमा के बीच कहीं बनता है कुंवर नारायण का साहित्य। वे समकालीन भी हैं और सार्वकालिक भी, बिल्कुल स्थानीय भी हैं और वैश्विक भी। उनको पढ़ना अपनी दुनिया को नए सिरे से पहचानना है। सार्वकालिक और समकालीन के बीच का सेतु वे बस चंद शब्दों में बांध देते हैं- &#8216;जिस समय में / सब कुछ / इतनी तेजी से बदल रहा है / वही समय / मेरी प्रतीक्षा में / न जाने कब से / ठहरा हुआ है! / उसकी इस विनम्रता से / काल के प्रति मेरा सम्मान-भाव / कुछ अधिक / गहरा हुआ है ।&#8217;<br>कुंवरनारायण को पढ़ना अपने समय को भी पढ़ना है और समयातीत को भी।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>रविकान्त का लेख- शिवरानी देवी के साथ प्रेमचन्द के सम्बन्ध</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/ravikant-s-article-premchand-s-relationship-with-shivarani-devi/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 31 Jul 2026 11:35:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;हमारे समाज में या दुनिया के किसी भी समाज में किसी स्त्री द्वारा पति के परायी स्त्री के साथ सम्बन्ध को सहन करना लगभग नामुमकिन है। वे कौन से कारण थे, जिनकी बदौलत शिवरानी ने प्रेमचन्द को कभी भनक भी नहीं लगने दी कि वे उस सम्बन्ध को जानती हैं? दूसरा सवाल यह भी है &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">&#8216;<strong>हमारे समाज में या दुनिया के किसी भी समाज में किसी स्त्री द्वारा पति के परायी स्त्री के साथ सम्बन्ध को सहन करना लगभग नामुमकिन है। वे कौन से कारण थे, जिनकी बदौलत शिवरानी ने प्रेमचन्द को कभी भनक भी नहीं लगने दी कि वे उस सम्बन्ध को जानती हैं? दूसरा सवाल यह भी है कि वह दूसरी स्त्री कौन थी ? अब तक हिन्दी के खोजी साहित्यकार इसकी पड़ताल कर पाए हैं या नहीं, इसकी कोई जानकारी अभी तक नहीं है।&#8217; पढ़ें पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">बीसवीं सदी के विश्व साहित्य में प्रेमचन्द की मानीखेज भूमिका है। दुनिया की तमाम भाषाओं के उल्लेखनीय साहित्य में प्रेमचन्द का कथा साहित्य सम्मान के साथ पहली पंक्ति में शामिल करने योग्य है। हालाँकि औपनिवेशिक देशों के साहित्य, साहित्यकारों को इस रूप में देखने-परखने और सम्मान देने में आलोचक हिचकते हैं। अक्सर, प्रेमचन्द की तुलना गोर्की से होती है। कभी यह तुलना टालस्टाय और चेखव से होती है। वास्तव में, औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि के कारण आज भी इसी तरह देखने-परखने और मूल्यांकन करने की रबायत है। क्यों नहीं गोर्की की तुलना प्रेमचन्द से की जाती है ? ये वही दृष्टि है जिसमें समुद्रगुप्त की तुलना नेपोलियन से की जाती है, बिना यह जाने-समझे कि समुद्रगुप्त का इतिहास नेपोलियन से सैकड़ों वर्ष पुराना है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सवाल यह है कि किसी साहित्यकार को परखने की कसौटी क्या होनी चाहिए। क्या सिर्फ साहित्य और रचनात्मक मूल्यों के आधार पर किसी साहित्यकार का मूल्यांकन होना चाहिए ? रचनाकार के व्यक्तिगत जीवन को जाँचना-परखना जरूरी है या नहीं? किसी रचनाकार के व्यक्तिगत जीवन और रचनात्मक अवदान में कोई सम्बन्ध होता है या नहीं ? लेखक के जीवन और साहित्य के सम्बन्धों और अन्तर्विरोधों को रेखांकित किया जाना चाहिए या नहीं? ये प्रश्न प्रेमचन्द जैसे साहित्यकार का मूल्यांकन करते समय और भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। प्रेमचन्द का निजी जीवन बेहद दिलचस्प है। रचनात्मक मूल्यों के निकष पर उनकी जिन्दगी कहीं सच्ची, नैतिक और निर्द्वन्द्व है तो कहीं उतनी ही जटिल और अन्तर्विरोधों से भरी हुई है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रेमचन्द स्वाधीनता आन्दोलन के लेखक हैं। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान तमाम धार्मिक-सामाजिक सुधार आन्दोलन चल रहे थे। हिन्दुस्तान के अलग-अलग भागों में ये आन्दोलन सक्रिय थे। पंजाब और संयुक्त प्रान्त में दयानन्द सरस्वती के आर्य समाज का अधिक प्रभाव था। प्रेमचन्द ने 1911 में आर्य समाजी शिवरानी देवी से आर्य समाज के रीति-रिवाज से विवाह किया। शिवरानी देवी प्रेमचन्द की दूसरी पत्नी थीं। बाल विधवा शिवरानी का भी यह दूसरा विवाह था। प्रेमचन्द ने स्वेच्छा से प्रयत्नपूर्वक शिवरानी देवी से विवाह किया था। शिवरानी पढ़ी-लिखी साहित्यिक महिला थीं। प्रेमचन्द के साथ अपने रिश्तों को उन्होंने &#8216;प्रेमचन्द घर में&#8217; नामक पुस्तक में दर्ज किया है। अमृतराय की किताब &#8216;कलम का सिपाही&#8217; में उद्धृत प्रेमचन्द-शिवरानी के सम्बन्धों की अधिकांश जानकारी इसी किताब से ली गयी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रेमचन्द और शिवरानी देवी के स्वभाव में बहुत अन्तर था। अमृतराय ने अपनी माँ (शिवरानी) के सम्बन्ध में लिखा है कि वे &#8220;लकड़ी की तरह सीधी-सपाट, सच्ची, निडर, अक्खड़ और हठीली थीं।&#8221; जबकि प्रेमचन्द शान्त, विनम्र और मिलनसार थे। दोनों के स्वभाव में इतना फर्क होने के बावजूद घर-गृहस्थी से लेकर पढ़ने-लिखने तक कहीं कोई विशेष तनाव नहीं होता था। दरअसल, दोनों के स्वभाव ने एक-दूसरे का पूरक बना दिया था। यों तो प्रेमचन्द और शिवरानी के रिश्तों की बुनियाद भुरभुरी और झूठ पर आधारित थी। मसलन, प्रेमचन्द ने शिवरानी को बताया था कि उनकी पहली पत्नी जीवित नहीं हैं। विवाह के आठ साल बाद जब शिवरानी देवी को पता चला कि उनकी पहली पत्नी जीवित हैं तो प्रेमचन्द से उन्होंने उसे घर लाने के लिए कहा। हालाँकि प्रेमचन्द इसके लिए तैयार न हुए। यह भी सच है कि प्रेमचन्द और शिवरानी के विवाह के शुरुआती आठ-दस बरस बड़े तनाव भरे रहे। कारण प्रेमचन्द की विमाता थीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बचपन में ही माँ के गुजर जाने के बाद प्रेमचन्द की परवरिशविमाता यानी चाची ने की थी। इसीलिए प्रेमचन्द चाची के स्वभाव से परिचित होने के बावजूद, उनसे कभी कुछ न कहते थे। चाची और शिवरानी में आपस में मनमुटाव रहता था। इसीलिए अक्सर गृहकलह होता रहता था। शिवरानी ने अपनी किताब में एक ऐसे ही वाकयात का जिक्र करते हुए लिखा है कि &#8220;उसपर उन्होंने मुझे दो चपत लगाए और बाहर चले गये।&#8221; लेकिन धीरे-धीरे पति-पत्नी के रिश्तों में मिठास आने लगी। वात्सल्य और प्रेम के अभाव के कारण प्रेमचन्द के स्वभाव में कठोरता आ गयी थी। धीरे-धीरे शिवरानी ने इस कमी को दूर कर दिया। प्रेमचन्द को शिवरानी से प्रेम और वात्सल्य दोनों प्राप्त होने लगे। समय के साथ प्रेमचन्द उनपर आसक्त और निर्भर होते चले गये। एक पत्र में प्रेमचन्द ने शिवरानी को लिखा, &#8220;सच मानो मैंने अपने को तुम्हें सौंप दिया है।&#8221; और तब शिवरानी &#8220;वाकई उनपर शासन करने लगीं।&#8221; प्रेमचन्द ने शिवरानी के इस शासन को मानो स्वीकार कर लिया था। स्वयं शिवरानी ने प्रेमचन्द पर अपने स्नेह और प्रभाव तथा पति के स्वीकार भाव को इन शब्दों में व्यक्त किया है, &#8220;खाने-पीने के बारे में तो बच्चों की तरह जो भी पाएँ चुपके से खा लें और कुछ न बोलें। अगर अपने मन की कोई चीज वे खाना चाहें और मेरी इच्छा न हो तो वे उसे किसी तरह भी न खाते थे।&#8221; वस्तुतः यह शिवरानी देवी के प्रेम और वात्सल्य का शासन था। इस शासन में प्रेमचन्द अधिक स्वतन्त्र होकर लेखन में व्यस्त हो गये।</p>



<p class="wp-block-paragraph">खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने के आर्थिक प्रबन्धन और घर-गृहस्थी का बोझ अपने ऊपर लेकर शिवरानी देवी ने प्रेमचन्द को जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया। लेकिन शिवरानी ने अपने प्रेम और स्नेह के बन्धन में प्रेमचन्द को इस कदर बान्धा कि प्रेमचन्द पत्नी की इजाजत और सहमति के बगैर कोई काम नहीं करते थे। मसलन, 1920 में शिवरानी की रजामन्दी लेकर ही उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दिया था। कलकत्ते में भाई ने साझे में प्रेस लगाने की बात की। प्रेमचन्द बिना शर्त रुपये भेज रहे थे लेकिन शिवरानी के कहने पर उन्होंने शर्त लगाई। प्रेमचन्द बम्बई तभी गये जब &#8216;रानी&#8217; की रजामन्दी हुई। फिल्म कम्पनी से इग्लैण्ड जाने का प्रस्ताव मिला लेकिन शिवरानी के इनकार करने पर प्रेमचन्द ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। वास्तव में, शिवरानी गृहस्वामिनी ही नहीं प्रेमचन्द की हृदयस्वामिनी भी बन गयी थीं। इस सम्बन्ध में उन्होंने स्वयं लिखा है, &#8220;मेरी बातों को वे बहुत महत्त्व देते थे। अपने जीवन में कोई भी काम उन्होंने मेरी सलाह के बगैर नहीं किया।&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रेमचन्द और शिवरानी के आत्मीय सम्बन्ध भारत जैसे पुरुष प्रधान समाज में किसी भी दम्पत्ति के लिए आदर्श हो सकते हैं। आजकल, एक जुमला चलता है कि अगर प्रेम विश्वास पर टिका होता है तो विवाह अन्धविश्वास पर। लेकिन वैवाहिक जीवन में विश्वास और समर्पण हो तो दाम्पत्य सम्बन्ध निरे प्रेम सम्बन्ध से ज्यादा प्रेरक और सार्थक बन जाता है। प्रेमचन्द पत्नी को हमेशा &#8216;रानी&#8217; कहकर सम्बोधित करते थे। शुरुआती आठ वर्ष के बमचख के बाद प्रेमचन्द अपनी &#8216;रानी&#8217; को इतना चाहने लगे थे कि कुछ दिनों की जुदाई ही उन्हें असह्य लगने लगती थी। एक बार शिवरानी इलाहाबाद क्या रूक गयीं, बनारस में प्रेमचन्द को सुना घर काटकर खाने लगा। तब एक रोज उकताकर और बहुत खिन्न होकर प्रेमचन्द ने उन्हें उलाहना देते हुए लिखा, &#8220;प्रिय रानी, मैं तुम्हें छोड़कर काशी आया। मगर यहाँ तुम्हारे बिना सूना सूना लग रहा है। क्या कहूँ? तुम्हारी बहन की बात कैसे न मानता ? न मानने पर तुम्हें भी बुरा लगता। तुम तो वहाँ अपनी बहन के साथ खुश होंगी, मगर मैं यहाँ परीशान हूँ, जैसे एक घोंसले में दो पक्षी रह रहे हों और उनमें से एक के न रहने पर दूसरा परेशान हो। तुम्हारा यही न्याय है कि तुम वहाँ मौज करो और मैं तुम्हारे नाम की माला फेरूँ ? तुम मेरे पास रहती हो तो मैं भरसक कहीं जाने का नाम नहीं लेता, तुम आने का नाम नहीं लेती… घर मुझे खाये जा रहा है। कभी-कभी मैं यह सोचता हूँ कि क्या सभी की तबीयत इसी तरह चिन्तित हो जाती है या मेरी ही?… कहीं ऐसा न हो कि इस पत्र के साथ मैं भी पहुँचूँ।&#8221;</p>


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<figure class="aligncenter size-full is-resized"><img loading="lazy" decoding="async" width="628" height="414" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-31-at-4.56.17-PM.jpeg" alt="" class="wp-image-564" style="width:438px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-31-at-4.56.17-PM.jpeg 628w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-07-31-at-4.56.17-PM-300x198.jpeg 300w" sizes="(max-width: 628px) 100vw, 628px" /></figure>
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<p class="wp-block-paragraph">सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में बा और बापू के रिश्तों पर बहुत-कुछ कहा-लिखा गया। इन दिनों पुनः दिल्ली के एक मन्त्री के कुकर्मों का वीडियो मीडिया में आने पर एक पुराने पत्रकार और नये राजनेता ने ट्वीट कर लिखा कि परायी स्त्री से सहमति से बनाया गया शारीरिक सम्बन्ध जाएज है। उन लाल बुझक्कड़ ने फिर एक लम्बी अविश्वसनीय फेहरिस्त ऐसे रिश्तों की ट्विटर पर टांग दी। इस फेहरिस्त में गांधी जी का भी नाम था कि बापू ने उर्मिला देवी को आध्यात्मिक पत्नी माना था। इस जिरह को बीच में लाने का औचित्य यह है कि भारतीय समाज में पति-पत्नी के रिश्तों को खासी तवज्जो मिली है। यहाँ दाम्पत्य प्रेम की डोर विश्वास और समर्पण में बन्धी होती है। हम इतने संकीर्ण हैं कि इन रिश्तों पर कोई बहस-विमर्श नहीं करना चाहते। गोया, बात करने से यह रिश्ता नापाक हो जाएगा। मेरा इसरार सिर्फ इतना है कि बेहद बारीक और सघन बुने इस रिश्ते की समाजशास्त्रीय और आलोचनात्मक ढंग से जाँच-पड़ताल होनी चाहिए। ताकि इसके स्वरूप और ऐतिहासिक विकास-क्रम को समझा जा सके। यह जरूरी इसलिए भी है क्योंकि आज महानगरीय जीवन-पद्धति में सहजीवन (लिवइन) का अस्तित्व अंगड़ाई ले रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">समकालीन अस्मितावादी विमर्शकारों ने प्रेमचन्द के साहित्य को प्रश्नांकित किया है। दलित रचनाकारों ने जाति के सवाल उठाए। हालाँकि अपने अन्तिम उपन्यास &#8216;गोदान&#8217; और &#8216;गुल्ली-डण्डा&#8217; जैसी कहानियों में प्रेमचन्द ने दलित चेतना और संघर्ष की अभिव्यक्ति दी है। अलबत्ता, स्त्री नजरिए से &#8216;गोदान&#8217; में मालती और आनन्दी को आमने-सामने खड़ा करके प्रो. मेहता के व्याख्यानों को कटघरे में खड़ा किया जाता है। माना जाता है कि प्रेमचन्द आदर्श भारतीय नारी के कायल हैं। वे उस दर्शन को मानते हैं जिसमें स्त्री या तो देवी है अथवा दासी। देखने वाली बात यह है कि प्रेमचन्द अपने निजी जीवन में स्त्री के प्रति कैसा व्यवहार रखते हैं। शिवरानी ने तफ्सील से वर्णन किया है कि प्रेमचन्द उनकी सुख-सुविधाओं का बहुत खयाल रखते थे। वे शिवरानी के घरेलू कामों में भी मदद करते थे, जैसे-बच्चों को सम्भालना, बर्तन धोना, रोटी सेंकना, पत्नी और बच्चों के बीमार पड़ने पर उनकी सेवा करना आदि। उन्होंने शिवरानी से &#8216;दासी&#8217; की तरह<br>कभी व्यवहार नहीं किया। शिवरानी कभी उनके पैर दबाने जातीं तो प्रेमचन्द मना कर देते। शिवरानी ने भी प्रेमचन्द का पूर्ण मनोयोग से जीवन के हर पड़ाव पर साथ दिया। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान प्रेमचन्द को जेल न जाना पड़े, इसलिए वे स्वयं जेल गयीं। प्रेमचन्द इतने लिक्खाड़ थे कि बीमार होने के बावजूद, वे लिखते रहते। ऐसी स्थिति में जब कभी प्रेमचन्द नहीं माने तो शिवरानी ने उनका कलम तोड़कर फेंक दिया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रेमचन्द और शिवरानी का रिश्ता महज भावनात्मक ही नहीं था। इस जुड़ाव का बौद्धिक पक्ष भी है। शिवरानी जितनी निडर, साहसी और जिम्मेदार थीं, उतनी ही बौद्धिक भी थीं। प्रेमचन्द और शिवरानी में अक्सर बौद्धिक बहस भी होती थी। शिवरानी ने इन बहस-मुबाहिसों का सिलसिलेवार ब्योरा दिया है। इन बहसों में अधिकतर समकालीन मुद्दे होते थे। जैसे- स्त्री समस्याओं में नारी पराधीनता और वैश्यावृत्ति, साहित्य, देश की पराधीनता और आर्थिक शोषण, भाषा-समस्या, रूसी समाजवादी क्रान्ति और शासन व्यवस्था, धर्म, आस्था और आस्तिकता। ऐसे तमाम गम्भीर विषयों-समस्याओं पर प्रेमचन्द-शिवरानी में बहस-विमर्श होता था। इन मसलों पर दोनों की राय हमेशा एक नहीं होती थी। स्त्री समस्याओं पर दोनों के विचारों में अन्तर था। प्रेमचन्द शिवरानी के स्वतन्त्र विचारों का सम्मान करते थे। शिवरानी के सामाजिक कार्यों में भी प्रेमचन्द सहयोग करते थे। महिला आश्रम जाने और स्वाधीनता आन्दोलन में भागीदारी को प्रेमचन्द ने प्रोत्साहित किया। प्रेमचन्द की वजह से शिवरानी का साहित्य की तरफ झुकाव हुआ। उनसे प्रेरित होकर शिवरानी कहानी लिखने लगीं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">प्रेमचन्द और शिवरानी के इतने आत्मीय और सघन रिश्तों में एक गहरी फाँस भी थी। यह फाँस थी, प्रेमचन्द के अन्यत्र सम्बन्ध। अपने अन्तिम समय में प्रेमचन्द ने शिवरानी के समक्ष स्वयं इस सच्चाई को कुबूल किया है। पहली पत्नी के रहते हुए अन्य स्त्री के साथ प्रेमचन्द के सम्बन्ध थे। शिवरानी से विवाह करने के बाद भी यह सम्बन्ध चलता रहा। आश्चर्य तो यह है कि शिवरानी को इस सम्बन्ध की<br>जानकारी भी थी। हमारे समाज में या दुनिया के किसी भी समाज में किसी स्त्री द्वारा पति के परायी स्त्री के साथ सम्बन्ध को सहन करना लगभग नामुमकिन है। वे कौन से कारण थे, जिनकी बदौलत शिवरानी ने प्रेमचन्द को कभी भनक भी नहीं लगने दी कि वे उस सम्बन्ध को जानती हैं? दूसरा सवाल यह भी है कि वह दूसरी स्त्री कौन थी ? अब तक हिन्दी के खोजी साहित्यकार इसकी पड़ताल कर पाए हैं या नहीं, इसकी कोई जानकारी अभी तक नहीं है। एक सवाल यह भी प्रेमचन्द आखिरी वक्त में सच को कुबूल करके क्या अपराध मुक्त या पाप मुक्त होना चाहते थे। प्रेमचन्द के व्यक्तिगत जीवन का यह जटिल अन्तर्विरोध है।</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/ravikant-s-article-premchand-s-relationship-with-shivarani-devi/">रविकान्त का लेख- शिवरानी देवी के साथ प्रेमचन्द के सम्बन्ध</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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		<title>रविकान्त का लेख- किसान समस्या, प्रेमचंद और जादुई यथार्थवाद</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/article-by-ravikant-farmer-problem-premchand-and-magical-realism-read-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Jul 2026 07:04:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलोचना]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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		<category><![CDATA[#मुंशी प्रेमचंद]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>भारत की सड़सठ प्रतिशत आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है। इतनी बड़ी आबादी आज घोर संकट में है। अतिवृष्टि और ओलावृष्टि के कारण फसल चैपट हो गई है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। किसानों की बेबसी का जमकर राजनीतिकरण हुआ है। कोई किसान की आत्महत्या का तमाशा बना रहा है। कोई इसे कायरता कह रहा है। &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph">भारत की सड़सठ प्रतिशत आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है। इतनी बड़ी आबादी आज घोर संकट में है। अतिवृष्टि और ओलावृष्टि के कारण फसल चैपट हो गई है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। किसानों की बेबसी का जमकर राजनीतिकरण हुआ है। कोई किसान की आत्महत्या का तमाशा बना रहा है। कोई इसे कायरता कह रहा है। इन हालातों में कथाकार प्रेमचन्द की याद आना स्वाभाविक है। प्रेमचन्द केवल हिन्दी के ही नहीं बल्कि सभी भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्त किसान-जीवन के सबसे बड़े लेखक हैं। अपने दर्जन भर उपन्यासों और तीन सौ से अधिक कहानियों में उन्होंने किसानों का बहुत मार्मिक चित्रण किया है। परिमाण के हिसाब से यद्यपि प्रेमचन्द ने किसानों पर अपेक्षाकृत कम कहानियाँ और उपन्यास लिखे हैं। प्रेमचन्द के यहाँ गांव के साथ-साथ शहर का जीवन भी बखूबी चित्रित है। उनके यहाँ शहरी जीवन का यथार्थ अपनी तमाम खूबियों-विसंगतियों के साथ मौजूद है। पूँजीपति, दलाल, रईस, वकील, संपादक, अध्यापक से लेकर राजनीतिक कार्यकर्ता, संघर्षशील पढ़े-लिखे युवा और मजदूर आदि विभिन्न चरित्र उनके कथा साहित्य में उपस्थित हैं। प्रेमचन्द के गांवों में भी किसान के साथ-साथ जमींदार महाजन, पण्डे पुरोहित, मुस्लिम, स्त्री, दलित आदि पात्र विद्यमान हैं। इसी वैविध्य को ध्यान में रखते हुए हंसराज रहबर ने प्रेमचन्द को स्वाधीनता आंदोलन का लेखक कहा है। अलबत्ता, उनके लेखन के केन्द्र में किसान और उसका जीवन ही है। प्रेमचन्द ने बेहद तल्लीनता और रागात्मकता के साथ गांवों के किसान और उसके परिवार को चित्रित किया है। यह चित्रात्मक शैली अन्य प्रसंगों में उतनी जीवन्त नहीं दिखाई देती। इसीलिए ज्यादातर आलोचक प्रेमचन्द को गांवों और किसानों का लेखक मानते हैं।<br>किसान जीवन के सबसे बड़े रचनाकार के रूप में प्रेमचन्द हमें बार-बार याद आते हैं। इसका एक कारण और भी है। उनके कथा-सहित्य के अन्य पात्र और समुदाय आज पहले से बेहतर स्थिति में हैं। स्त्री और दलित समुदाय आज स्वयं साहित्यिक रूप से अपना प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श आज साहित्य के केन्द्र में है। स्वाधीनता प्राप्ति और संविधान लागू होने के बाद इन समुदायों को विभिन्न अवसर प्राप्त हुए। इनका आर्थिक उत्थान हुआ। इनमें राजनीतिक सजगता और चेतना पैदा हुई। राजनैतिक चेतना और नेतृत्व प्राप्त होने के कारण इन समुदायों की आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति पहले से बेहतर हुई। दुर्भाग्य से स्वाधीन भारत में किसानों की कोई नुमाइन्दगी नहीं रही। लगातार किसानों को हाशिए पर धकेला जाता रहा। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी उनके हालात बद से बदतर होते गए। औपनिवेशिक भारत से भी कठिन परिस्थितियों का सामना आज भारतीय किसान कर रहा है। औपनिवेशिक भारत का किसान प्राणपण से किसानी की रक्षा करता था। फिर भी वह मजदूर बनने के लिए अभिशप्त था। आज किसान स्वेच्छा से खेती छोड़ना चाहता है, लेकिन उसके पास मजदूरी का विकल्प भी नहीं। वह ऋण लेकर खेती करता है। मोटे ब्याज पर साहूकार- महाजन से लिए गए ऋण को चुकाने में खुद को असमर्थ पाता है तो मजबूरन वह आत्महत्या कर लेता है।<br>प्रेमचन्द के कथा साहित्य के दो जीवन्त पात्रों हल्कू (पूस की रात) और होरी (गोदान) के माध्यम से औपनिवेशिक भारत की कृषि व्यवस्था और कृषक जीवन को समझा जा सकता है। खेती, किसान के जीविका का साधन तो है ही उसकी मरजाद भी है। लेकिन जब मरजाद (मर्यादा) बिखर जाए तो ऐसी खेती से क्या हासिल। जानवरों द्वारा बर्बाद की गई खेती को देखकर हल्कू हौले से मुस्कुराता है और सोचता है कि अब यहाँ ठंड में सोना तो न पड़ेगा। वह मजदूरी करके गुजारा कर लेगा। इसी कहानी को प्रेमचंद बड़े फलक पर ‘गोदान’ (1935) में प्रस्तुत करते हैं। गोदान में प्रेमचंद किसान जीवन और उसकी समस्या को सम्पूर्णता में चित्रित करते हैं। उसके वर्तमान की बारीक सच्चाईयों के साथ-साथ प्रेमचंद किसान और उसके परिवार के जीवन के भविष्य का भी संकेत करते हैं। गोदान के होरी की समस्या केवल ऋणग्रस्तता नहीं है, जैसा कि ‘प्रेमचंद और उनका युग’ में रामविलास शर्मा मानते हंै। वास्तव में भारतीय समाज की ब्राह्मणवादी-कर्मकाण्डी व्यवस्था और जमींदार- साहूकार तथा नये उभरते हुए पूँजीपति वर्ग का गठजोड़, किसान जीवन की त्रासदी के लिए उत्तरदायी हंै। यह समूचा तंत्र जौंक की तरह किसान के जीवन को चूसता है। हल्कू खेती छोड़ने के बारे में सोचकर हौले से मुस्कुराता है किन्तु खेती की बेदखली के बाद या चले जाने के बाद होरी के चेहरे पर स्थायी विषाद का भाव चस्पा हो जाता है। वह मजदूरी के लिए विवश है। अंततः भूखे पेट सड़क पर गिट्टी ढोते हुए होरी दर्दनाक मौत मरता है। वास्तव में यह होरी की मौत नहीं बल्कि हत्या है। ऐसी हत्या है जिसके गुनहगार रात-दिन तरक्की कर रहे हैं। खूब फल-फूल रहे हैं। अस्सी वर्षों के बाद भी किसानों के हालात नहीं बदले। उनके जीवन की त्रासदी बदस्तूर जारी है। आज हजारों होरी आत्महत्या कर रहे हैं। जनाब! ये आत्महत्याएँ नहीं, हत्याएँ हैं। मर्डर और सौ फीसदी मर्डर! यराना पूँजीवादी सत्तातंत्र इन हत्याओं का गुनहगार है।<br>आज के हालातों में हल्कू और होरी से ज्यादा ‘बलिदान’ कहानी के गिरधारी की याद आती है। ‘बलिदान’ कहानी का यथार्थ ‘पूस की रात’ और ‘गोदान’ के यथार्थ से एकदम अलग है। यह जितना मार्मिक है, उतना ही कलात्मक भी। ‘बलिदान’ का यथार्थ अधिक लोकधर्मी और सारगर्भी है। किसान जीवन से सम्बन्धित ‘बलिदान’ प्रेमचंद की कम चर्चित कहानी है। आज इस कहानी पर व्यापक चर्चा करने की आवश्यकता है। साथ ही इस बात की खोजबीन करना भी जरूरी है कि आलोचकों ने इस कहानी की अनदेखी क्यों की है। दरअसल ‘बलिदान’ कहानी आलोचना के मान्य सिद्धान्तों और विचारधारात्मक मानदण्डों पर खरी नहीं उतरती।<br>कहानी में अलौकिक या अतिप्राकृतिक तत्वों का समावेश है। सम्भवतः यही कारण है कि खासकर माक्र्सवादी आलोचकों ने इस कहानी को तवज्जो नहीं दी है। कहानी ‘गिरधारी’ नाम के एक किसान की है। पिता ‘हरखू’ की मौत के बाद जब वह जमींदार ‘ओंकारनाथ’ को पेशगी और नजराना नहीं दे पाता तो उसके पांच बीघा खेत नीलाम हो जाते हैं। उसके ऊपर महाजन का तीस रूपया कर्जा था। मजबूरन उसे कम दामों पर अपने बैल बेचकर कर्जा चुकाना पड़ा। गिरधारी इस सदमे से उबर नहीं पाता और खेत की मेड़ पर स्थित कुँए में कूदकर आत्महत्या कर लेता है। अब कोई भी उसके खेत को जोत-बो नहीं पाता क्योंकि रोज रात को गिरधारी कुँए से निकलकर खेत के चक्कर लगाता है और रोता है। गिरधारी के भूत के डर से कालिकादीन ने जमींदार को खेत वापस कर दिए हैं। ओंकारनाथ खेत उठाना चाहते हैं लेकिन कोई किसान खेत लेने के लिए तैयार नहीं होता।<br>गिरधारी के मरने के बाद उसका बड़ा लड़का शहर में ईंट के भट्टे पर काम करता है। प्रतिमाह बीस रूपये घर लाता है। जौ की जगह गेहूँ खाया जाता है। फिर भी गिरधारी की पत्नी गांव में दुबकी-छिपती फिरती है। अब उसकी कोई इज्जत-मर्यादा नहीं है। उसके पास खेत नहीं हैं। उसका बेटा मजदूरी करता है छोटे किसानों के लिए खेती न तब पुसाने लायक थी और न अब है।<br>गिरधारी का भूत रोज रात में खेत की मेड़ के चक्कर लगाता है। अब कोई उसके खेत में हल नहीं जोत पाता। कहानी की इस अलौकिकता की कैसे व्याख्या की जाए? क्या प्रेमचंद अंधविश्वासी थे? क्या प्रेमचंद नये तरह से गांधीवाद को प्रस्तुत कर रहे थे? गिरधारी के खेत पर चक्कर लगाने को क्या एक किसान के सत्याग्रह के रूप में देखना चाहिए? लेकिन भला कोई भूत के सत्याग्रह पर कैसे विश्वास करे। एक सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि भूत-प्रेत की कहानी लिखकर कहीं प्रेमचंद समाज में अंधविश्वास तो नहीं पोषित कर रहे थे। अगर ऐसा है तो प्रेमचंद को बड़ा लेखक कैसे माना जा सकता है? एक बात और, ‘बलिदान’ कोई अकेली कहानी नहीं है जिसमें प्रेमचंद भूत-प्रेत जैसी अलौकिक शक्तियों को चित्रित कर रहे हैं। ‘विध्वंस’ और ‘भूत’ कहानियों में भी चमत्कारपूर्ण दैवीय घटनाएँ होती हैं।<br>प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के सामाजिक यथार्थवादी लेखक हैं। उनके कथासाहित्य में संवेदना और शिल्प दोनों स्तरों पर यथार्थवाद को देखा जा सकता है। उपरोक्त कहानियों में प्रेमचंद ने भूत-प्रेत आदि अलौकिक शक्तियों का वर्णन किया है। यह किस किस्म का यथार्थवाद है? क्या उन्होंने यथार्थवाद को छोड़ दिया था? इसका सटीक उत्तर तभी दिया जा सकता है, जब हम प्रेमचंद की कहानियों का विश्लेषण बहुत सजग और सचेत होकर करें। दरअसल इन कहानियों में एक अलग किस्म का यथार्थवाद है। यह, वह यथार्थवाद हैं जिसे उन्नीस सौ पचास (1950) के बाद द0 अमेरिकी उपन्यासों के संदर्भ में ’जादुई यथार्थवाद’ कहा गया। प्रेमचंद, जादुई यथार्थवाद के माध्यम से भारतीय समाज के उस सच को व्यक्त करना चाहते थे जिसे सीधे प्रस्तुत करना मुश्किल था।<br>‘जादुई यथार्थवाद’ शब्द सबसे पहले लैटिन अमेरिकी उपन्यासों के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है। ‘सौ सालों का एकान्त’ नामक माक्र्वेज के उपन्यास के सन्दर्भ में जादुई यथार्थवाद पर गम्भीरता पूर्वक विचार किया गया। माक्र्वेज, लूशुन, कारपेंतियर, जार्ज अमादो, जोस मेरिया, अर्गूदस, जुआन रूफो, कार्लोस फुएत, रावबस्तोस आदि लेखकों-विचारकों के साहित्य में जादुई यथार्थवाद प्रस्तुत हुआ है। जादुई यथार्थवाद का सम्बन्ध सामान्य जीवन से है। माक्र्वेज लिखते हैं कि ‘निजन्धरी कथाएँ, मिथकीय चरित्र तथा भूत-प्रेतादि दैवीय शक्तियों के चमत्कारों के किस्से हमारे जीवन के हिस्से हैं। हमने अपनी दादी से सुने हैं। दरअसल जब जीवन में वास्तविकता और भ्रम का अंतर समाप्त हो जाता है तो ऐसे प्रसंगों का चित्रण होना स्वाभाविक है।’ लैटिन अमेरिकी देशों में उपनिवेशवाद के बाद तानाशाहों का जो शासन रहा उसमें भ्रम और वास्तविकता का अंतर खत्म हो गया। ऐसी विसंगत परिस्थितियों को बेपर्दा करने के लिए इन लेखकों ने जादुई यथार्थवाद की शैली का सहारा लिया।<br>जब सच कहना असम्भव किन्तु अनिवार्य हो तो वहाँ जादुई यथार्थवाद शैली का प्रयोग सबसे सार्थक होता हैं। हिन्दी साहित्य में इसका प्रयोग हुआ है। लेकिन आलोचना में जादुई यथार्थवाद को लगभग अछूत मान लिया गया हैं। माक्र्सवादी लेखकों में केवल मैनेजर पाण्डेय हैं जिन्होंने जादुई यथार्थवाद पर एक लम्बा लेख लिखा है। उन्होंने मुक्तिबोध के फैण्टसी शिल्प में अभिव्यक्त जादुई यथार्थवाद की ओर संकेत किया है। राजस्थान के प्रसिद्ध कहानीकार विजयदान देथा और हिन्दी कथाकार उदय प्रकाश के सन्दर्भ में भी जादुई यथार्थवाद की चर्चा होती है।<br>गिरीराज किराडू ने देथा की कहानियों में प्रस्तुत जादुई यथार्थवाद की खोज की है। उदय प्रकाश, लूशुन और माक्र्वेज के जादुई यथार्थवाद को हजारी प्रसाद द्विवेदी की गल्प शैली में पाते हैं। उनका मानना है कि इस शैली की प्रेरणा उन्हें द्विवेदी जी से मिली।<br>जादुई यथार्थवाद, यथार्थवाद का ही एक प्रकार है। एक विशेष शैली है। इसमें इतिहास, मिथक, फैण्टसी, यूटोपिया, जादू-टोना, परिकथाएँ, दैवीय शक्तियों, शगुन-अशगुन, शाप-वरदान, निजन्धारी कथाएँ, अद्भुत घटनाओं और पूर्वाभास आदि तत्वों-प्रसंगों का प्रयोग होता है। यह अद्भुत और यथार्थ का मेल है। यह यथार्थ को मिथकीय दृष्टि से प्रस्तुत करने की एक शैली है। यह कला और यथार्थ के समन्वय की महत्वपूर्ण शैली है। दूसरे शब्दों में, जादुई यथार्थवाद, यथार्थवाद का सर्वाधिक कलात्मक रूप है। औपनिवेशिक भारत में ऐसी राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ उपस्थिति थीं जिनसे जादुई यथार्थवाद की प्रस्तुति सम्भव हुई। मैनेजर पाण्डेय मानते हैं कि भारत के आदिवासियों और किसानों के जीवन में वे अधिकांश बातें मौजूद हैं जिनसे जादुई यथार्थवाद जुड़ा हुआ है। प्रेमचंद औपनिवेशिक भारत में किसान जीवन के यथार्थ को इस शैली में प्रस्तुत करते हैं। ‘बलिदान’ कहानी में गिरधारी के अपने खेतों से अत्यधिक लगाव, किसानी की मर्यादा और उसकी जीविका के परस्पर जुड़ाव के घनीभूत यथार्थ को प्रेमचंद प्रस्तुत करते हैं। इसीलिए गिरधारी का भूत खेतों का चक्कर लगाता है। ऐसे अलौकिक और अतिप्राकृतिक संदर्भ प्रेमचंद को जादुई यथार्थवाद का लेखक बनाते हैं। चुनांचे, प्रेमचंद हिन्दी के ही नहीं बल्कि किसी भी भाषा के पहले जादुई यथार्थवादी लेखक हैं।</p>
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		<title>रमेश जोशी का व्यंग्य &#8211; तोताराम की जेड प्लस सुरक्षा</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/satire-by-ramesh-joshi-totaram-s-z-plus-security-read-on-adahan-magazine/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 12 Jul 2026 15:02:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यंग्य]]></category>
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		<guid isPermaLink="false">https://adahanpatrika.com/?p=487</guid>

					<description><![CDATA[<p>लेखक- रमेश जोशी &#8216; वे राष्ट्रवादी, संस्कारी, स्वयंसेवी संस्था के सर्वेसर्वा हैं । उनके प्रचारक सरकार में हैं । उनसे कौन कुछ माँग सकता है ? ये तो 40-50 लाख रुपये महिने की बात है उनका तो हजारों करोड़ का आधारभूत ढांचा है, अरबों का बजट है फिर भी किसी को कोई हिसाब किताब नहीं &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/satire-by-ramesh-joshi-totaram-s-z-plus-security-read-on-adahan-magazine/">रमेश जोशी का व्यंग्य &#8211; तोताराम की जेड प्लस सुरक्षा</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="लेखक- रमेश जोशी" class="wp-image-461"/><figcaption class="wp-element-caption">लेखक- रमेश जोशी</figcaption></figure>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216; वे राष्ट्रवादी, संस्कारी, स्वयंसेवी संस्था के सर्वेसर्वा हैं । उनके प्रचारक सरकार में हैं । उनसे कौन कुछ माँग सकता है ? ये तो 40-50 लाख रुपये महिने की बात है उनका तो हजारों करोड़ का आधारभूत ढांचा है, अरबों का बजट है फिर भी किसी को कोई हिसाब किताब नहीं देते जबकि एक छोटी सी गौशाला और दुकान चलाने वाला तक अपना हिसाब देता है ।&#8217; पढें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">आज तोताराम बहुत विचलित था । इतना परेशान तो मोदी जी ट्रम्प द्वारा रूस से तेल खरीदने की मनाही या 100% टेरिफ़ की धमकी से भी नहीं हुए होंगे ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने पूछा- वत्स, इतना परेशान क्यों है ? तू तो ईडी के भयभीत तृणमूल कॉंग्रेस के सांसदों और विधायकों की तरह डरा हुआ लग रहा है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- मास्टर, ईडी का क्या है । बड़ा सरल उपाय है । भाजपा में शामिल हो जाओ । तत्काल पवित्र, ईमानदार और संस्कारी । मैं तो एक सामान्य नागरिक के नाते अपनी जान की सुरक्षा चाहता हूँ ।जहाँ तक माल का प्रश्न है तो वह तो मेरे पास है नहीं । अपने नागरिकों की सुरक्षा करना सरकार का दायित्व होता है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- दायित्व तो सरकार के और भी बहुत से होते हैं लेकिन हर बस में लिखी सूचना से सरकार का उत्तर समझा जा सकता है- ‘यात्री अपने जान माल की रक्षा स्वयं करें’ । वैसे तेरी जान को खतरा किससे है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- जब सुबह तेरे यहाँ आता हूँ तो तीन चार कुत्ते नियमित रूप से भोंक भोंककर मुझे डराते हैं जैसे कि कुछ उत्साही राष्ट्रवादी युवक मस्जिद के पास हनुमान चालीसा का पाठ करके या जय श्रीराम के नारे लगाकर मुसलमानों को डराते हैं ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- कल ध्यान से देखकर, पहचानकर बताना कहीं वे कुत्ते मुसलमान तो नहीं ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- कैसे पहचान सकता हूँ । वे कोई कपड़े थोड़े पहनते हैं । वैसे जब से भागवत जी ने कहा है कि हिन्दू और मुसलमानों का डीएनए एक है तो कन्फ्यूजन और बढ़ गया है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- ऐसे मामलों में तू भागवत जी को नहीं, हिमन्ता बिस्वा सरमा, धामी, सुवेन्दु अधिकारी, प्रवेश वर्मा, अनुराग ठाकुर, योगी जी आदि को सुनाकर ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- मुझे इन बातों से कोई मतलब नहीं । बस, मुझे तो सुरक्षा चाहिए । जेड प्लस सुरक्षा जिससे तीन चार क्या हजार कुत्ते भी मेरा कुछ न बिगाड़ सकें ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- फावड़े का एक टूटा हुआ डंडा पड़ा है जाते समय ले जाना और जब भी कुत्ते भोंकें एक दो बार फटकार देना, भाग जाएंगे ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- भागवत जी तो बहुत बढ़िया लाठी चलाते हैं । मैंने एक बार स्वयंसेवकों को लट्ठ संचालन सिखाते हुए उनका वीडियो भी देखा था । अब भी क्या लट्ठ भाँजते हैं । सुना है कोई अच्छा लाठी चलाने वाला हो तो तीव्र घुमावदार संचालन से बंदूक की गोली से भी बचाव के सकता है । वैसे भी उनके अंडर में तो करोड़ों स्वयंसेवकों की सेना आती है । फिर उन्हें जेड प्लस सुरक्षा क्यों मिली हुई है ? वे न तो आयकर देते हैं, न उनकी कोई नौकरी और वेतन है । फिर जेड प्लस सुरक्षा का 40-50 लाख रुपया महिना कहाँ से देते हैं ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- वे राष्ट्रवादी, संस्कारी, स्वयंसेवी संस्था के सर्वेसर्वा हैं । उनके प्रचारक सरकार में हैं । उनसे कौन कुछ माँग सकता है ? ये तो 40-50 लाख रुपये महिने की बात है उनका तो हजारों करोड़ का आधारभूत ढांचा है, अरबों का बजट है फिर भी किसी को कोई हिसाब किताब नहीं देते जबकि एक छोटी सी गौशाला और दुकान चलाने वाला तक अपना हिसाब देता है । तूने तो सारी ज़िंदगी में 40-50 लाख नहीं कमाए होंगे । इसलिए जेड प्लस सुरक्षा की बात छोड़ । इन कुत्तों का तुष्टीकरण कर दिया कर ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- कैसे ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- जैसे राष्ट्रवादी सरकारें अपने अवैतनिक सैनिकों और भक्तों को कभी गौशाला के नाम से तो कभी काँवड़ियों के लिए भंडारे लगाने आदि के बहाने लाखों रुपया अनुदान देकर लाभान्वित करती रहती हैं</p>



<p class="wp-block-paragraph">वैसे ही तू भी इन्हें कभी कभी टुकड़ा फेंक दिया कर । ये कौनसे सिद्धांतवादी हैं, है तो कुत्ते ही भले ही किसी भी धर्म, जाति और देश के हों ।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/satire-by-ramesh-joshi-totaram-s-z-plus-security-read-on-adahan-magazine/">रमेश जोशी का व्यंग्य &#8211; तोताराम की जेड प्लस सुरक्षा</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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		<title>रमेश जोशी का व्यंग्य- हनुमान जी का दल-बदल</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/ramesh-joshis-satire-hanuman-jis-party-switch-read-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Jul 2026 13:42:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यंग्य]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लेखक- रमेश जोशी &#8216;यह हमारा आंतरिक मामला है जैसे राम मंदिर की चोरी । हमारे राम, हमारा मंदिर, हम कुछ भी करें । कांग्रेस, राम मंदिर में दर्शन के लिए अभी तक नहीं गए लोग और जिन्होंने राम मंदिर के लिए कोई चंदा नहीं दिया उन्हें कुछ भी बोलने का कोई अधिकार नहीं है । &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="लेखक- रमेश जोशी" class="wp-image-461"/><figcaption class="wp-element-caption">लेखक- रमेश जोशी</figcaption></figure>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;यह हमारा आंतरिक मामला है जैसे राम मंदिर की चोरी । हमारे राम, हमारा मंदिर, हम कुछ भी करें । कांग्रेस, राम मंदिर में दर्शन के लिए अभी तक नहीं गए लोग और जिन्होंने राम मंदिर के लिए कोई चंदा नहीं दिया उन्हें कुछ भी बोलने का कोई अधिकार नहीं है । हम हनुमान को नचाएं या राम को स्कूल जाने की उम्र में गर्भगृह में बैठा दें हमारी मर्जी ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230;</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">जैसे कोई ट्रेवलिंग सेल्समैन छह दिन घूमघाम कर एक दिन के लिए घर आता है और फिर सूटकेस जमाकर निकल लेता है या जैसे मोदी जी 27 से 29 जून तक सशेल्स की ‘सम्मान समेट यात्रा’ से लौटे, सम्मान को सुरक्षित काँच की अलमारी में सजाया और फिर 6 जुलाई को केश सज्जा करवाकर, नए कपड़े लेकर, सम्मान समेटने के लिए इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया की यात्रा पर निकल गए वैसे ही तोताराम सुबह चाय पीकर गया था और लांच खाकर, दोपहर थोड़ा आराम करके फिर चार बजे आ धमका ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- मोदी जी ने तो सेवा के लिए घर परिवार छोड़ दिया । 20-20 घंटे रोज देश की सेवा के साथ साथ विश्वगुरु की जिम्मेदारी संभालने के लिए भागे फिरते हैं लेकिन तू घर पर क्यों नहीं टिकता ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- मैं चाय पीने नहीं आया हूँ । आज मंगलवार है । देश दुनिया में भूतपिशाच बहुत उपद्रव मचा रहे हैं सो चल जयपुर रोड़ तक चलते हैं । घूमना भी हो जाएगा और हनुमान जी के दर्शन भी ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- तो क्या लौट आये ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- कौन ? मोदी जी तो 11-12 जुलाई को लौटेंगे । फिर कहाँ का कार्यक्रम है मुझे पता नहीं । और हनुमान जी के कहीं जाने का सवाल नहीं उठता ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- क्या पता, हमने तो कल एक वीडियो देखा था जिसमें हनुमान जी लखनऊ में भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के रोड शो में नाच रहे थे लेकिन अभी तक न तो किसी संस्कारी हिन्दू की भावना आहत हुई और न ही कहीं कोई एफ आई आर हुई ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- यह हमारा आंतरिक मामला है जैसे राम मंदिर की चोरी । हमारे राम, हमारा मंदिर, हम कुछ भी करें । कांग्रेस, राम मंदिर में दर्शन के लिए अभी तक नहीं गए लोग और जिन्होंने राम मंदिर के लिए कोई चंदा नहीं दिया उन्हें कुछ भी बोलने का कोई अधिकार नहीं है । हम हनुमान को नचाएं या राम को स्कूल जाने की उम्र में गर्भगृह में बैठा दें हमारी मर्जी । हाँ, अगर कोई अन्य पार्टी या धर्म का व्यक्ति ऐसा कुकर्म करता तो दिखाते कि धर्म, भावना और सत्ता की ताकत क्या होती है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- ठीक है । लेकिन जब हनुमान जी आउट ऑफ स्टेशन हैं तो चल कर क्या करेंगे ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- वे हनुमान जी थोड़े थे । उनके हाथ में राम का ध्वज थोड़े था । उनके हाथ में भाजपा का झण्डा था जिस पर कमल का निशान साफ दिखाई दे रहा था । हो सकता है कोई संस्कारी और धार्मिक कार्यकर्ता हो जो यूपी के अगले चुनाव में टिकट पाने के लिए यह नाटक कर रहा हो ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- भले ही हम किसी संस्कारी संस्था के स्वयंसेवक नहीं हैं लेकिन राम के निस्वार्थ सेवक, पराक्रमी और सामान्य लोगों के लिए सहज सुलभ रहने वाले हनुमान जी का बहुत आदर करते हैं । अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए उनका वेश धारण करना हमें बहुत बुरा लगता है । अगर पार्टी में स्थान बनाना हो तो हनुमान बनने की जगह गाँधी नेहरू परिवार को गाली निकाल सकता था, किसी मस्जिद पर भगवा झंडा फहरा सकता था, किसी मुसलमान के फ्रिज में गौ मांस ढूंढ सकता था, किसी मस्जिद के आगे सुंदरकांड का पाठ कर सकता था, किसी तृणमूल वाले सांसद पर अंडे फेंक सकता था ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बोला- चल, मंदिर तो चलते हैं । पक्का मान अपने जयपुर रोड़ वाले हनुमान जी यथास्थान मिलेंगे । यह होगा कोई लखनऊ कानपुर का कार्यकर्ता ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हमने कहा- तोताराम, यह भी हो सकता है कि ये असली हनुमान जी ही हों । अयोध्या में अपनी चौकीदारी के बावजूद ट्रस्ट के चंदा गिनती करने वाले अनट्रस्टवर्दी लोगों के कुकर्मों से दुखी होकर हमेशा के कहीं हिमालय में जा रहे हों । या उन्हें डर हो कि बचने का कोई रास्ता न देखकर ट्रस्ट वाले कहीं इन्हें ही न फँसा दें कि हनुमान जी से पूछो । यहाँ की सुरक्षा की जिम्मेदारी इन्हीं की है । या यह डर रहा हो कि कहीं कोई उनकी गदा ही न गायब कर दे । दुष्टता पर उतरे आदमी का कोई ठिकाना नहीं । गदा के बिना उनसे कौन डरेगा जैसे यूएपीए, कोर्ट और ईडी के बिना सरकार से ।</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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