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	<title>साहित्य Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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	<description>साहित्य, विचार और जन आंदोलन</description>
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		<title>रमेश जोशी का व्यंग्य- हनुमान जी का दल-बदल</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/ramesh-joshis-satire-hanuman-jis-party-switch-read-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Jul 2026 13:42:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यंग्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लेखक- रमेश जोशी &#8216;यह हमारा आंतरिक मामला है जैसे राम मंदिर की चोरी । हमारे राम, हमारा मंदिर, हम कुछ भी करें । कांग्रेस, राम मंदिर में दर्शन के लिए अभी तक नहीं गए लोग और जिन्होंने राम मंदिर के लिए कोई चंदा नहीं दिया उन्हें कुछ भी बोलने का कोई अधिकार नहीं है । &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full"><img decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="लेखक- रमेश जोशी" class="wp-image-461"/><figcaption class="wp-element-caption">लेखक- रमेश जोशी</figcaption></figure>
</div>


<p><strong>&#8216;यह हमारा आंतरिक मामला है जैसे राम मंदिर की चोरी । हमारे राम, हमारा मंदिर, हम कुछ भी करें । कांग्रेस, राम मंदिर में दर्शन के लिए अभी तक नहीं गए लोग और जिन्होंने राम मंदिर के लिए कोई चंदा नहीं दिया उन्हें कुछ भी बोलने का कोई अधिकार नहीं है । हम हनुमान को नचाएं या राम को स्कूल जाने की उम्र में गर्भगृह में बैठा दें हमारी मर्जी ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230;</strong></p>



<p>जैसे कोई ट्रेवलिंग सेल्समैन छह दिन घूमघाम कर एक दिन के लिए घर आता है और फिर सूटकेस जमाकर निकल लेता है या जैसे मोदी जी 27 से 29 जून तक सशेल्स की ‘सम्मान समेट यात्रा’ से लौटे, सम्मान को सुरक्षित काँच की अलमारी में सजाया और फिर 6 जुलाई को केश सज्जा करवाकर, नए कपड़े लेकर, सम्मान समेटने के लिए इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया की यात्रा पर निकल गए वैसे ही तोताराम सुबह चाय पीकर गया था और लांच खाकर, दोपहर थोड़ा आराम करके फिर चार बजे आ धमका ।</p>



<p>हमने कहा- मोदी जी ने तो सेवा के लिए घर परिवार छोड़ दिया । 20-20 घंटे रोज देश की सेवा के साथ साथ विश्वगुरु की जिम्मेदारी संभालने के लिए भागे फिरते हैं लेकिन तू घर पर क्यों नहीं टिकता ?</p>



<p>बोला- मैं चाय पीने नहीं आया हूँ । आज मंगलवार है । देश दुनिया में भूतपिशाच बहुत उपद्रव मचा रहे हैं सो चल जयपुर रोड़ तक चलते हैं । घूमना भी हो जाएगा और हनुमान जी के दर्शन भी ।</p>



<p>हमने कहा- तो क्या लौट आये ?</p>



<p>बोला- कौन ? मोदी जी तो 11-12 जुलाई को लौटेंगे । फिर कहाँ का कार्यक्रम है मुझे पता नहीं । और हनुमान जी के कहीं जाने का सवाल नहीं उठता ।</p>



<p>हमने कहा- क्या पता, हमने तो कल एक वीडियो देखा था जिसमें हनुमान जी लखनऊ में भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के रोड शो में नाच रहे थे लेकिन अभी तक न तो किसी संस्कारी हिन्दू की भावना आहत हुई और न ही कहीं कोई एफ आई आर हुई ।</p>



<p>बोला- यह हमारा आंतरिक मामला है जैसे राम मंदिर की चोरी । हमारे राम, हमारा मंदिर, हम कुछ भी करें । कांग्रेस, राम मंदिर में दर्शन के लिए अभी तक नहीं गए लोग और जिन्होंने राम मंदिर के लिए कोई चंदा नहीं दिया उन्हें कुछ भी बोलने का कोई अधिकार नहीं है । हम हनुमान को नचाएं या राम को स्कूल जाने की उम्र में गर्भगृह में बैठा दें हमारी मर्जी । हाँ, अगर कोई अन्य पार्टी या धर्म का व्यक्ति ऐसा कुकर्म करता तो दिखाते कि धर्म, भावना और सत्ता की ताकत क्या होती है ।</p>



<p>हमने कहा- ठीक है । लेकिन जब हनुमान जी आउट ऑफ स्टेशन हैं तो चल कर क्या करेंगे ।</p>



<p>बोला- वे हनुमान जी थोड़े थे । उनके हाथ में राम का ध्वज थोड़े था । उनके हाथ में भाजपा का झण्डा था जिस पर कमल का निशान साफ दिखाई दे रहा था । हो सकता है कोई संस्कारी और धार्मिक कार्यकर्ता हो जो यूपी के अगले चुनाव में टिकट पाने के लिए यह नाटक कर रहा हो ।</p>



<p>हमने कहा- भले ही हम किसी संस्कारी संस्था के स्वयंसेवक नहीं हैं लेकिन राम के निस्वार्थ सेवक, पराक्रमी और सामान्य लोगों के लिए सहज सुलभ रहने वाले हनुमान जी का बहुत आदर करते हैं । अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए उनका वेश धारण करना हमें बहुत बुरा लगता है । अगर पार्टी में स्थान बनाना हो तो हनुमान बनने की जगह गाँधी नेहरू परिवार को गाली निकाल सकता था, किसी मस्जिद पर भगवा झंडा फहरा सकता था, किसी मुसलमान के फ्रिज में गौ मांस ढूंढ सकता था, किसी मस्जिद के आगे सुंदरकांड का पाठ कर सकता था, किसी तृणमूल वाले सांसद पर अंडे फेंक सकता था ।</p>



<p>बोला- चल, मंदिर तो चलते हैं । पक्का मान अपने जयपुर रोड़ वाले हनुमान जी यथास्थान मिलेंगे । यह होगा कोई लखनऊ कानपुर का कार्यकर्ता ।</p>



<p>हमने कहा- तोताराम, यह भी हो सकता है कि ये असली हनुमान जी ही हों । अयोध्या में अपनी चौकीदारी के बावजूद ट्रस्ट के चंदा गिनती करने वाले अनट्रस्टवर्दी लोगों के कुकर्मों से दुखी होकर हमेशा के कहीं हिमालय में जा रहे हों । या उन्हें डर हो कि बचने का कोई रास्ता न देखकर ट्रस्ट वाले कहीं इन्हें ही न फँसा दें कि हनुमान जी से पूछो । यहाँ की सुरक्षा की जिम्मेदारी इन्हीं की है । या यह डर रहा हो कि कहीं कोई उनकी गदा ही न गायब कर दे । दुष्टता पर उतरे आदमी का कोई ठिकाना नहीं । गदा के बिना उनसे कौन डरेगा जैसे यूएपीए, कोर्ट और ईडी के बिना सरकार से ।</p>



<p></p>
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		<title>रमेश जोशी का व्यंग्य- हड़बड़ी में गड़बड़ी</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-ramesh-joshis-complete-political-satire-hurry-creates-mess-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Jul 2026 15:03:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यंग्य]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लेखक- रमेश जोशी &#8216;शेक्सपीयर कहते हैं नाम में क्या रखा है । सम्मान तो सम्मान है । मोदी जी ट्रम्प को ‘डोलांड’ कहते हैं और वह इन्हें ‘मोडी’ कहता है जो कि सही नहीं है लेकिन प्रेम में कोई कमी हो तो बता ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230; हमने कहा- तोताराम, जल्दी का &#8230;</p>
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<p></p>


<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full"><img decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="लेखक- रमेश जोशी" class="wp-image-461"/><figcaption class="wp-element-caption">लेखक- रमेश जोशी</figcaption></figure>
</div>


<p><strong>&#8216;शेक्सपीयर कहते हैं नाम में क्या रखा है । सम्मान तो सम्मान है । मोदी जी ट्रम्प को ‘डोलांड’ कहते हैं और वह इन्हें ‘मोडी’ कहता है जो कि सही नहीं है लेकिन प्रेम में कोई कमी हो तो बता ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230;</strong></p>



<p>हमने कहा- तोताराम, जल्दी का काम शैतान का ।</p>



<p>बोला- मतलब ?</p>



<p>हमने कहा- झूठ नहीं कहा है कि सहज पके सो मीठा होय लेकिन जिसे अपने कर्मों पर विश्वास नहीं होता और जो ईवेंट मनेजमेंट के सहारे अपनी इमेज बनाता है वह जल्दी करता है और उसी चक्कर में  भद्द पिटवाता है ।</p>



<p>बोला- यह, वह, जो, उस आदि में लपेट कर बात मत कर । साफ साफ बता ।</p>



<p>हमने कहा- जैसे चुनावी लाभ लेने के लिए शिखर के बिना ही प्राणप्रतिष्ठा कर दी गई तो राम मंदिर का गर्भगृह टपकने लगा कि नहीं ? 400 पार वाले 240 पर अटक गए और जिस राम के राज में-</p>



<p>बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।</p>



<p>मांगें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥</p>



<p>इस दोहे अर्थ है कि राम जी के राज में चंद्रदेव अपनी अमृतमयी किरणों से पृथ्वी को परिपूर्ण रखते हैं। सूर्य देव केवल उतनी ही गर्मी देते हैं, जितनी वर्षा या अन्य कार्यों के लिए आवश्यक होती है। बादल भी ऐसे हैं जो केवल मांगने पर और आवश्यकता के अनुसार ही जल बरसाते हैं, अर्थात वहां अतिवृष्टि या अनावृष्टि जैसी कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है।</p>



<p>लेकिन आज कट्टरता की राजनीति तथा मूर्खता और स्वार्थपूर्ण विकास के कारण स्थिति यह हो गई है कि गरमी भयंकर और दूर दूर तक बरसात नहीं । अल्पवृष्टि का खतरा मंडरा रहा है । जहाँ तहाँ सड़कें और पुल टूट रहे हैं । इतनी सुरक्षा और संस्कारी लोगों के ट्रस्ट, व्यवस्था में होते हुए राम लला की पादुकाएं चोरी हो गईं । और बुलडोज़र चलेगा 100 मीटर का प्लॉट खरीदने वाले लवकुश पर । हो सकता है कल को यह सिद्ध कर दिया जाए कि चोरी-वोरी कुछ नहीं हुई है बल्कि राम लला के बेटों लव कुश ने सुरक्षा की दृष्टि से सामान एक बैंक लाकर में रखवा दिया था ।</p>



<p>हड़बड़ी का एक और ताज़ा उदाहरण देख ले । 1400 करोड़ की सहायता के बदले एक सम्मान लिया उसमें भी तीन गलतियाँ ।</p>



<p>बोला- तू यहाँ बरामदे में बैठा नितंबों से सुपारी फोड़ता रहता है । देश दुनिया को संभालना पड़े तो पता चले । जहाँ 240 पर अटकने की बात है तो राम के चढ़ावे और चंदे के बल पर पंजाब, बंगाल और महाराष्ट्र में खरीद-फरोख्त करके 400 पार भी हो जाएंगे ।</p>



<p>हमने कहा- तो फिर पीयूष गोयल को नंबर बढ़वाने के लिए सम्मान का ड्राफ्ट फाइनल होने से पहले ही इसे अपने ट्विटर पर डालने की क्या जरूरत थी ? चल, एक और उदाहरण देते हैं । 2018 में पटेल की मूर्ति के उद्घाटन के विज्ञापन में 8-10 गलतियाँ थीं । और नया उदाहरण ओडिशा की स्कूली पाठ्य पुस्तकों का जिनमें कई हजार गलतियाँ है ।</p>



<p>बोला- ये छोटी-मोटी बातें हैं । शेक्सपीयर कहते हैं नाम में क्या रखा है । सम्मान तो सम्मान है । मोदी जी ट्रम्प को ‘डोलांड’ कहते हैं और वह इन्हें ‘मोडी’ कहता है जो कि सही नहीं है लेकिन प्रेम में कोई कमी हो तो बता ।विदुर की पत्नी कृष्ण को देखकर इतनी भावविह्वल हो गई कि केलों की गिरी नीचे गिराकर कृष्ण को केले के छिलके खिलाती रही । रीतिकाल के कवि बिहारीलाल ने नायिका की अत्यधिक उत्सुकता बड़ा ही मनोवैज्ञानिक और सुंदर चित्रण किया है जो नायक के आने का समाचार सुनकर इतनी हड़बड़ी में होती है कि पैरों में लगाने वाला महावर आँखों में और आँखों में लगाने वाला काजल पैरों में लगा लेती है।</p>



<p>बिहारी का वह दोहा इस प्रकार है:</p>



<p>काजरु दै अँखियान में, रह्यो महावरु भाल।</p>



<p>तिय-उतावली आँगने, करी अनूपम चाल॥</p>



<p></p>
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		<item>
		<title>लघु कथा- भक्त की हवाई चप्पलें</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-author-ramesh-joshis-short-story-bhakt-ki-hawai-chappalein-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Jul 2026 07:04:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;किसी तरह राम की कृपा से भक्त का जीवन कट ही रहा था क्योंकि उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी । उसे न तो सोना खरीदना था, गाड़ी नहीं थी सो पेट्रोल डलवाने का चक्कर भी नहीं। विदेश यात्रा भी नहीं क्योंकि किसी देश का सर्वोच्च पुरस्कार भी नहीं मिलना था ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी की &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-author-ramesh-joshis-short-story-bhakt-ki-hawai-chappalein-on-adahan-patrika/">लघु कथा- भक्त की हवाई चप्पलें</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="wp-block-image is-style-rounded">
<figure class="alignleft size-full"><img decoding="async" width="117" height="154" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/07/WhatsApp-Image-2026-05-08-at-11.06.03-AM-1.jpeg" alt="" class="wp-image-461"/></figure>
</div>


<p><strong>&#8216;किसी तरह राम की कृपा से भक्त का जीवन कट ही रहा था क्योंकि उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी । उसे न तो सोना खरीदना था, गाड़ी नहीं थी सो पेट्रोल डलवाने का चक्कर भी नहीं। विदेश यात्रा भी नहीं क्योंकि किसी देश का सर्वोच्च पुरस्कार भी नहीं मिलना था ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी की पूरी लघु कथा&#8230;</strong></p>



<p>एक भक्त था । बहुत परेशान था । इतना परेशान कि कोई नीट का परीक्षार्थी भी पेपर लीक होने से नहीं हुआ होगा । 15 लाख और अच्छे दिन के जुमले पर आँख मींचकर वोट देने वाला भी इतना निराश नहीं हुआ होगा । उसे तो एक ही भरोसा, एक ही आस और एक ही विश्वास था । केवल राम का । जैसे अंधभक्तों को हर तीर्थ पर जाकर फ़ोटो शूट करवाने वाले अपने अजैविक नेता पर ।</p>



<p>भक्त रोज रामचरित का मास पारायण करता था । मंगलवार को एक टाइम खाना खाता था । हर बार भय लगने पर हनुमान चालीसा बाँचता था । उसे भूत पिशाच भगाने के लिए पुलिस से अधिक प्रभु पर विश्वास था । वह अपने मन की बात भी रेडियो पर नहीं बल्कि एकांत में प्रभु के साथ ही करता था । उसे विश्वास था कि भले ही अंतिम समय में ही सही लेकिन गजराज को मगरमच्छ से बचाने वाले भगवान विष्णु की तरह उसके आराध्य राम जरूर आएंगे ।</p>



<p>किसी तरह राम की कृपा से भक्त का जीवन कट ही रहा था क्योंकि उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी । उसे न तो सोना खरीदना था, गाड़ी नहीं थी सो पेट्रोल डलवाने का चक्कर भी नहीं। विदेश यात्रा भी नहीं क्योंकि किसी देश का सर्वोच्च पुरस्कार भी नहीं मिलना था । लेकिन आज उसका धैर्य चुक गया क्योंकि बड़ा बेटा बी ए करके पिछले दस वर्षों से प्रतियोगी परीक्षा देते देते ओवर एज हो गया ।इंसान से कॉकरोच बन गया । कल तो परीक्षा केंसिल होने के कारण एक विरोध प्रदर्शन में गया और पुलिस द्वारा अभिनंदित होकर टांग तुड़वाकर घर लौटा ।</p>



<p>भक्त तीर्थयात्रियों की भगदड़ में मरकर मोक्ष को प्राप्त करके ऊपर पहुँचा तो जाते ही अपने आराध्य पर बिफर पड़ा । बोला- प्रभु, मैं ही मूर्ख था जो आप पर विश्वास करके उल्लू बनता रहा । सब झूठ है कि आप अंत समय में ही सही भक्तों का उद्धार करने जरूर पहुंचते हैं । अजामिल को तो अपने बेटे नारायण का नाम लेने मात्र से ही कन्फ्यूज होकर आपके दूतों ने उसका उद्धार कर दिया । मैं आपको जाने कितनी बार पुकारता रहा लेकिन आप मणिपुर, युद्ध विराम, गाजा और ईरान में बच्चों के संहार की तरह चुप रहे । पुलिस भी चोरों के भाग जाने और अग्निशमन वाले सब कुछ राख हो जाने के बाद ही सही आ तो जाती है लेकिन आप …..?</p>



<p>राम भक्त की पीड़ा से द्रवित हुए और बोले- भक्त, मेरी मजबूरी समझो । मैं अब पहले की तरह स्वतंत्र नहीं हूँ । मुझे कुछ दुष्टों ने एक मंदिर में कैद कर रखा है । जनता के बीच तक नहीं जाने देते हैं । मैं तुम्हारी पुकार सुनकर आना चाहता था लेकिन क्या बताऊँ दुष्टों ने मेरी पादुकाएं ही चुरा लीं । और इतनी तेज धूप में नंगे पैर मेरे पैर जलने लगे थे । मुझे माफ करना भक्त ।</p>



<p>भक्त ने कहा- प्रभु, हवाई चप्पल वालों को हवाई यात्रा करवाने के वादे पर विश्वास करके खरीदी थी लेकिन वह भी अन्य वादों की तरह झूठा ही निकला । इन्हें पहन लें । घिसी हुई सही लेकिन पैरों को जलने से तो बचाएंगी ही ।</p>



<p>और भक्त ने अपनी हवाई चप्पलें रामजी के सामने रख दीं ।</p>



<p></p>
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		<title>रविकांत का लेख- शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएं</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-ravikants-article-in-adahan-magazine-om-prakash-valmikis-poems-are-a-call-for-struggle-against-exploitation/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:48:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलोचना]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#dalit kavita]]></category>
		<category><![CDATA[#dalit lekhak]]></category>
		<category><![CDATA[#dalit literature]]></category>
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		<category><![CDATA[#hindi sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#omprakash valmiki]]></category>
		<category><![CDATA[#ravikant]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया।&#8217; पढ़ें रविकांत का &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-ravikants-article-in-adahan-magazine-om-prakash-valmikis-poems-are-a-call-for-struggle-against-exploitation/">रविकांत का लेख- शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएं</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>&#8216;दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया।&#8217; पढ़ें  रविकांत का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>डॉ अम्बेडकर के विचारों और सपनों को साकार करने वाला साहित्य सबसे पहले 1960 के दशक में मराठी में शुरू हुआ। इसके बाद तेलुगु, हिन्दी, गुजराती, तमिल और कन्नड में दलित साहित्य लेखन का आंदोलन खड़ा हुआ। 1970 के दशक में हिन्दी दलित साहित्यकारों की पहली पीढ़ी सक्रिय हुई। इसमें सबसे उल्लेखनीय नाम ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून 1950-17 नवंबर 2013) का है। सदियों से पढ़ने-लिखने से वंचित रहे दलित समाज को पहली बार अभिव्यक्ति का अवसर मिला। लेकिन उनके लिए यह कितना आसान था? हिन्दू समाज के सबसे निचले पायदान पर स्थित जाति में जन्मे ओमप्रकाश वाल्मीकि के लिए लिखना किसी यातना से कम नहीं था। उन्होंने अपनी किताब &#8216;दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष और यथार्थ&#8217; में लिखा है ,&#8221;मुद्रित शब्द की आग में मैंने अपने आपको हमेशा झुलसते पाया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर , गांव बरला के बेसिक प्राइमरी स्कूल में मेरे दाखिले के वक्त गिड़गिड़ाते पिता का चेहरा आज भी मेरी आंखों में किरकिराता है। और यातना भरे सफर और संघर्ष में यही मेरी ताकत भी बनता है। यह वह दौर था, जब भारत नया-नया स्वतंत्र हुआ था, लेकिन स्कूल- कॉलेजों में किसी दलित के लिए प्रवेश पाना आसमान से तारे तोड़ लेने के समान था, किसी दलित के लिए स्कूल के दरवाजे बंद थे। नई-नई आजादी मिली थी, नया संविधान बना था। जिसमें सबको समान अधिकार देने की बात कही गई थी। लेकिन हिंदुत्व की सनातनी मान्यताओं के सामने संविधान की धाराएँ बौनी थीं। पिताजी के उस जज्बे को समझने की उस वक्त मेरी उम्र नहीं थी, लेकिन एक बार जब स्कूल की टाट-पट्टी के सबसे किनारे पर, जो मेरे बैठने से पहले ही खत्म हो जाती थी, बैठकर अक्षर पहचानने का जो सिलसिला शुरू हुआ, तो वह चिंगारी बनाकर अंधेरे में जुगनू की तरह चमकने लगा था। और वही चमक मेरे भीतर आग में तब्दील हो गई थी। जिसकी तपिश ने मेरे वजूद को ही बदल दिया तो उस वक्त पिताजी का वह जज्बा ठीक से समझ में आने लगा था।&#8221;</p>



<p>ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदू समाज की बेड़ियों को ही नहीं तोड़ा बल्कि हिंदी साहित्य को भी शुचिता और कुलीनता से मुक्त कराया। जयप्रकाश कर्दम के शब्दों में, &#8220;ओमप्रकाश वाल्मीकि एक ऐसा नाम है, जिसने अपनी रचनाओं के माध्यम से कुलीनता और आभिजात्य संस्कृति के मूल्यों में रचे-बसे हिंदी साहित्य की सदियों पुरानी जड़ता को तोड़ा और समाज की भांति साहित्य की चौखट से बाहर उपेक्षित पड़े दलितों को साहित्य के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि का लेखन साहित्य विमर्श में एक अनिवार्य हस्तक्षेप है।&#8221;<br>ओमप्रकाश वाल्मीकि ने साहित्य को नए ढंग से परिभाषित किया। उनके अनुसार, साहित्य मनुष्यता की अभिव्यक्ति है। पराधीनता से मुक्ति का आख्यान है। शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है। समता और स्वतंत्रता की चेतना है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने पूर्ववर्ती हिन्दी साहित्य को कठघरे में खड़ा किया। उनके अनुसार अधिकांश हिन्दी साहित्य ब्राह्मणवादी परंपराओं और मूल्यों से पोषित है। इसमें दलितों-वंचितों की पराधीनता और पीड़ा की अभिव्यक्ति नहीं है। दलित समाज की पराधीनता और उसके मुक्ति के सवालों को केंद्र में रखकर उन्होंने कविता, कहानी, आत्मकथा और आलोचना जैसी महत्वपूर्ण विधाओं में रचनाएं लिखीं। उनका रचना संसार बहुत व्यापक है। उनके चार कहानी संग्रह &#8211; सलाम (2000), घुसपैठिए (2003), छतरी, अम्मा एंड अदर स्टोरी। आत्मकथा- जूठन (1997) दूसरा भाग (2015) आलोचना- दलित साहित्य का सौंदर्य शास्त्र (2001), मुख्य धारा और दलित साहित्य, दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ (2013) विचारपरक लेखन &#8211; सफाई देवता (2008) नाटक- दो चेहरे, उसे वीर चक्र मिला था, अनुवाद- मैं हिंदू क्यों नहीं? (कांचा इलैया की अंग्रेजी किताब का हिंदी अनुवाद), सायरन का शहर (अरुण काले के मराठी कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद)।<br>बृहत साहित्य के लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि बुनियादी तौर पर कवि हैं। उनके लेखन की शुरुआत कविता से हुई और कविता उनके जीवन-संघर्ष में अनवरत संबल बनी रही। अपनी किताब &#8216;दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ&#8217; में उन्होंने लिखा है कि, &#8220;प्रारंभिक दौर में ही मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम कविता ही रही है। एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहने के साथ-साथ कविताओं की ओर मेरा झुकाव लगातार बढ़ता गया। बल्कि हताशा और निराशा के समय कविता मुझे संबल देती रही है।&#8221; कविता जीवन नहीं बल्कि उनकी पूरी दुनिया है। उसका सच दिल से क्या, अस्थि-मज्जा से निकला हुआ यथार्थ है! उनका पहला कविता संग्रह &#8216;सदियों का संताप&#8217; 1989 में फिलहाल प्रकाशन, देहरादून से प्रकाशित हुआ। दूसरा काव्य संग्रह &#8216;बस्स बहुत हो चुका&#8217; 1997 में वाणी प्रकाशन से आया। इसके बाद 2009 में उनका तीसरा काव्य संग्रह &#8216;अब और नहीं&#8217; राधाकृष्ण प्रकाशन से छपा। अंतिम और चौथा काव्य संग्रह &#8216;शब्द झूठ नहीं बोलते&#8217; 2012 में अनामिका प्रकाशन से प्रकाशित हुआ।</p>



<p>उनकी कविताओं में सामन्तों- ब्राह्मणवादियों का शोषण तंत्र तथा दलितों की यातना, संघर्ष और आक्रोश की अभिव्यक्ति हुई है। दलित जीवन के भोगे हुए यथार्थ को प्रस्तुत करने वाली उनकी कविताएं काव्यरसिकों के गले नहीं उतरतीं। उनकी कविताओं में ना शास्त्रीय संस्कार है और ना सात स्वरों का साज। उनकी कविताओं में वेदना की अनुभूति है। मैनेजर पांडेय के शब्दों में &#8216;वेदना की कोई लय नहीं होती।&#8217; अभिजात साहित्य की तरह उनकी कविताएं मनोरंजन के लिए नहीं हैं। आधुनिकतावादियों की तरह विकारों के उत्सर्जन की संवाहक भी उनकी कविताएं नहीं हैं। उनके लिए कविता संवेदना और सरोकारों का संधान है। सच कहने का साहस और संघर्ष की गवाही है, कविता। &#8216;शब्द झूठ नहीं बोलते&#8217; संग्रह की भूमिका में ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं, &#8220;मेरे लिए कविता आनंद या रसास्वादन की चीज नहीं है। बल्कि कविता के माध्यम से मानवीय पक्षों को उजागर करते हुए मनुष्यता के सरोकारों और मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना है।&#8221; अन्यत्र भी उन्होंने लिखा है कि, &#8220;मेरे लिए कविता कला से ज्यादा जीवन की अदम्य लालसा, गतिशीलता की संवाहक है, जो हमारी पीड़ा, हमारे सुख-दुख की अभिव्यक्ति है, जिसमें हम अपने वर्तमान का प्रतिबिंब शिद्दत के साथ देख सकें, जो जीवन की विद्रूपताओं से जूझने का हौसला दे…सच्ची और सही कविता है, जो सच को सच और झूठ को झूठ कहने का हौसला रखती है।&#8221;<br>भारतीय समाज में व्यक्ति की बुनियादी पहचान जाति है। जाति से द्विजों को जन्मना श्रेष्ठता हासिल है और शूद्रों-दलितों को जन्मना हीनता। जाति के कारण ही दलितों को रोज अपमान, अन्याय और अत्याचार का सामना करना पड़ता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जाति कहीं उनका पीछा नहीं छोड़ती। दलितों के लिए जाति एक अभिशाप है। जीते जी नरक! जाति की नारकीय यातनाओं को दलित कवियों ने रचा। उनके शब्दों में एक वेदना भरी चीख है। &#8216;ठाकुर का कुआं&#8217; कविता में बेहद सरल शब्दों में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने जातिवादी परतों को उघाड़कर शोषणकारी तंत्र और वंचितों की बेबसी को बहुत मार्मिक ढंग से पेश किया है-<br>&#8220;चूल्हा मिट्टी का/ मिट्टी तालाब की/ तालाब ठाकुर का।<br>भूख रोटी की/ रोटी बाजरे की/ बाजरा खेत का/ खेत ठाकुर का।<br>बैल ठाकुर का/ हल ठाकुर का/ हल की मूठ पर हथेली अपनी/ फसल ठाकुर की।<br>कुआं ठाकुर का/ पानी ठाकुर का/ खेत खलिहान ठाकुर के/ गली मुहल्ले ठाकुर के फिर अपना क्या?<br>गांव?<br>शहर?<br>देश?&#8221;<br>56 शब्दों की यह कविता 56 इंची सत्ता के दौर में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली कविता बन गई है। साहित्यिक महफिलों से लेकर संसद भवन तक इस कविता की गूंज है। एक सांसद द्वारा उद्धृत किए जाने के बाद सामन्तों द्वारा हुई प्रतिक्रिया इस बात को दर्शाती है कि आज भी ब्राह्मणवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं।<br>दलित समाज पीढ़ी दर पीढ़ी जाति दंश से पीड़ित है। सदियों से मूक बधिर रहा, यह समाज आज अपनी पीड़ा और वेदना को व्यक्त कर रहा है। वह हंसते हुए प्रेम के गीत नहीं लिख सकता। उसका एक-एक शब्द ज्वालामुखी है, आह है, कराह है, धिक्कार है। बकौल ओमप्रकाश वाल्मीकि, &#8220;किसी एक जाति में जन्म लेने के कारण, जो कि उस व्यक्ति विशेष के हाथ में नहीं था, के लिए उसे इतनी बड़ी सजा कि उससे उसके मनुष्य होने तक के तमाम अधिकार छीन लिए जाएं। ऐसे में जब उस अपमानित व्यक्ति के हाथ में कलम आएगी, तब वह कैसी कविता लिखेगा? क्या उसे प्रेम कविता लिखनी चाहिए या विद्रोही? यह सवाल एक दलित कवि के भीतर गर्म-गर्म लावा दहकाता रहा है।&#8221; अगर यह गुलामी तुम्हारे ऊपर थोप दी जाए? &#8216;तब तुम क्या करोगे&#8217; कविता में वाल्मीकि जी पूछते हैं, &#8220;यदि तुम्हें धकेलकर गांव से बाहर कर दिया जाए/ पानी तक न लेने दिया जाए कुएं से/ दुत्कारा फटकारा जाए/ चिलचिलाती दोपहर में कहा जाए/ तोड़ने को पत्थर/ काम के बदले दिया जाए/ खाने को जूठन/ तब तुम क्या करोगे/ यदि तुम्हें मरे जानवर को/ खींचकर ले जाने के लिए कहा जाए/ और कहा जाए ढोने को पूरे परिवार का मैला /पहनने को दी जाए उतरन/ तब तुम क्या करोगे?&#8221;<br>वेदना से उपजे इन सवालों के बावजूद, कवि समर्पण के बदले सौहार्द और अपनापन चाहता है। वह बदलाव चाहता है, बदला नहीं। &#8216;भय&#8217; कविता में एक उम्मीद है कि काश!-<br>&#8220;तुम्हारे हाथ बढ़े होते/ मेरी ओर/ प्रेम गंध का स्पर्श लेकर/ सच कहता हूं/ मैं सीने से नहीं/ लिपट जाता तुम्हारे कदमों से/ बिछ जाता/ धूल बनकर जमीन पर।<br>बिछा तो अब भी हूँ-<br>प्रेम की आसक्ति पर नहीं/ तुम्हारे खूनी पंजों से डरकर।&#8221;<br>इसीलिए दलित कविता में जाति के प्रति गहरी वितृष्णा है।-<br>&#8220;स्वीकार्य नहीं मुझे जाना / मृत्यु के बाद/ तुम्हारे स्वर्ग में/ वहां भी तुम/ पहचानोगे मुझे/ मेरी जाति से ही।&#8221;<br>&#8216;शब्द झूठ नहीं बोलते&#8217; की भूमिका में ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं कि, &#8220;सभ्यता, संस्कृति के घिनौने षड्यंत्र लुभावने शब्दों से भरमाने का काम करते हैं। जहां नैतिकता, अनैतिकता और जीवन मूल्यों के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है।&#8221;10 पुनः वे हिन्दू सहिष्णुता के सच को तंज भरे लहजे में बेनकाब करते हैं-<br>&#8221; हां, सचमुच तुम सहिष्णु हो/ जब दंगों में मारे जाते हैं/ अब्दुल और कासिम/ कल्लू और बिरजू/ तब तुम सत्यनारायण की कथा सुनते हुए/ भूल जाते हो अखबार पढ़ना।<br>पूजते हो गांधी की हत्यारे को<br>तोड़ते हो इबादतगाह झुंड बनाकर।&#8221;<br>महात्मा गांधी के हत्यारे को पूजने वाले और बाबरी मस्जिद तोड़ने वाले हिंदुत्ववादी आज सत्तानशीं हैं। हिंसा की यह संस्कृति आज मोब लिंचिंग जैसे भयावह कुकृत्य में तब्दील हो चुकी है।</p>



<p>मानीखेज है कि दलित साहित्यकारों में, खासकर ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदुत्व और उसकी संस्कृति की तीखी आलोचना की है। हिंदुत्ववादियों ने भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कृति को गड्डमड्ड कर दिया। उनके दावे पर ओमप्रकाश वाल्मीकि व्यंग करते हैं- &#8220;कैद कर रखा है तुमने तहखानों में/ संस्कृति को/ मैं पूछता हूँ-/ संस्कृति क्या तुम्हारी रखैल है?&#8221;<br>&#8216;शास्त्रीय भाषा का शब्द वसुधैव कुटुम्बकम कितना खोखला&#8217; है? वाल्मीकि जी पूछते हैं, &#8216;उपेक्षा, उत्पीड़न और अछूत जाति किस सभ्यता और संस्कृति की देन है?&#8217;</p>



<p>90 के दशक में पिछड़ों के आरक्षण वाली मण्डल राजनीति के बरक्स कमण्डल की राजनीति तेज हुई। साम्प्रदायिक राजनीति दंगों में बदल गई। विस्फोटक की जगह मूर्तियों ने ले ली। धार्मिक जुलूस भय पैदा करने लगे। &#8216;आईना&#8217; कविता में वाल्मीकि जी ने भयावहता को इन शब्दों में दर्ज किया है-<br>&#8220;खड़ा हूं चौराहे पर/ जहां से गुजरा है अभी-अभी/ एक जुलूस/ जिसमें शामिल थे/ बिन चेहरों के लोग/ जिनके हाथों में चमक रही थीं/ तलवारें, त्रिशूल और तमंचे<br>…..<br>इस खूंखार समय में/ आरडीएक्स की जगह/ हो सकती हैं मूर्तियां/ जो आस्था के प्रश्न पर/ कर दी जाएंगी फिट/ अवैध जगहों पर/ खून खराबे के लिए किसी तर्क की/ आवश्यकता नहीं होती है।&#8221;<br>ओमप्रकाश वाल्मीकि हिन्दू संस्कृति के मुखौटे में छिपे हिंसक, अश्लील और सत्तालोलुप चेहरे को बेनकाब करते हैं। यह राजनीति और संस्कृति अब और भी भयानक और खूनी हो चुकी है। आज दलित साहित्य विमर्श और अम्बेडकरवाद क्रूर और आतताई हिंदुत्ववादी सत्ता और संस्कृति का डटकर मुकाबला कर रहा है।</p>



<p>दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया। दलित जीवन के बदरंग प्रसंगों को रचकर ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदू धर्म के पाखंड को बेपर्दा किया। उनकी कहानियों ने पौराणिक कथाओं की अश्लीलता को नंगा कर दिया। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने उस सामाजिक व्यवस्था का पर्दाफाश किया, जिसमें सदियों से यातनाओं का शिकार दलित पशुओं से भी बदतर जीवन जी रहा था। दलितों के शोषण और दमन पर पलने वाला रक्तपिपासु ब्राह्मणवाद आज ओमप्रकाश वाल्मीकि के साहित्यिक कटघरे में है। उससे हजारों सालों की यातनाओं का हिसाब मांगा जा रहा है।</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-ravikants-article-in-adahan-magazine-om-prakash-valmikis-poems-are-a-call-for-struggle-against-exploitation/">रविकांत का लेख- शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएं</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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		<title>रमेश जोशी का व्यंग्य -कॉकरोचों का धरना</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 27 Jun 2026 14:15:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216; मदर ऑफ डेमोक्रेसी का मतलब यह भी नहीं है कि कॉकरोच भी धरना देने लगें । कल को मक्खी, मच्छर, दीमक भी धरना देने लगेंगे । लगता है अब इनका मुकाबला करने के लिए एक नई सी जे पी मतलब ‘चप्पल जनता पार्टी’ बनानी पड़ेगी जो इन्हें देखते ही चप्पल फटकारकर ठिकाने लगा देगी &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216; मदर ऑफ डेमोक्रेसी का मतलब यह भी नहीं है कि कॉकरोच भी धरना देने लगें । कल को मक्खी, मच्छर, दीमक भी धरना देने लगेंगे । लगता है अब इनका मुकाबला करने के लिए एक नई सी जे पी मतलब ‘चप्पल जनता पार्टी’ बनानी पड़ेगी जो इन्हें देखते ही चप्पल फटकारकर ठिकाने लगा देगी ।&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230;</strong></p>



<p>जैसे ही तोताराम बैठने को हुआ हमने उसे आज की ब्रेकिंग न्यूज दी- कॉकरोचों का धरना अवैध घोषित कर दिया गया है ।<br>बोला- यह क्या कोई समाचार है ? कुछ कॉमन सेंस से काम लिया कर । कॉकरोच इस सृष्टि के सबसे पुराने जीवित प्राणी हैं । उनके इस सनातन का सम्मान करते हुए घर की दीवारों की दरारों, गटर, रसोई के सीलन भरे कोनों में उनके आवास और सब प्रकार का बचा-खुचा खाना खा सकने की निःशुल्क उपलब्ध करवाया जाता है । अब कॉकरोच भी धरना देने लगे । इसीलिए नीति आयोग के अमिताभ कान्त ने कहा था कि भारत में कुछ ज्यादा ही लोकतंत्र है । मदर ऑफ डेमोक्रेसी का मतलब यह भी नहीं है कि कॉकरोच भी धरना देने लगें । कल को मक्खी, मच्छर, दीमक भी धरना देने लगेंगे । लगता है अब इनका मुकाबला करने के लिए एक नई सी जे पी मतलब ‘चप्पल जनता पार्टी’ बनानी पड़ेगी जो इन्हें देखते ही चप्पल फटकारकर ठिकाने लगा देगी ।<br>हमने कहा- हम वास्तविक कॉकरोचों की बात नहीं कर रहे हैं । हम तो परीक्षा व्यवस्था से दुखी और बेकार छात्रों की बात कर रहे हैं जिन्हें मुख्य न्यायाधीश ने कॉकरोच बताया था, और जिन्होंने अब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ बनाई है । वे जंतर मंतर पर थाली और चम्मच बजाय कर प्रदर्शन कर रहे थे ।<br>बोला- वैसे तो जिस तरह से ये अन्याय को मूर्खतापूर्ण और कायराना तरीके से बर्दाश्त करते हैं उससे तो ये कॉकरोच से ज्यादा कुछ लगते भी नहीं । फिर भी मदर ऑफ डेमोक्रेसी में सब बातों की आजादी है लेकिन उसका एक शिष्टाचार होता है । कोरोना के समय ताली थाली बजवाई थी कि नहीं । तब बजा लेते । अब आगे भी ऐसे मौके आएंगे तब बजा लेना और पोस्ट कर देना ताली थाली बजाते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द की तरह अपना फ़ोटो । अगर कुछ और हल्ला मचाने का मन है तो बना लें ‘डी जे पी’ मतलब डिस्क जॉकी पार्टी और मस्जिदों के सामने गाएं बजायें हनुमान चालीसा । कोई कुछ नहीं कहेगा बल्कि प्रोमोजिंग युवा नेता बनने का रास्ता भी साफ हो सकता है जैसे जयपुर में दिपके को थप्पड़ मारने वाला चर्चित हो गया और तत्काल जमानत भी मिल गई ।<br>हमने कहा- जंतर मंतर तो वैसे भी प्रायः प्रदर्शन करने का स्थान रहा है जैसे रामलीला मैदान या लंदन का हाइड पार्क । भाजपा और रामदेव ने भी तो अन्ना हजारे की आड़ में रामलीला मैदान पर कब्जा जमा लिया था । और अब देखा नहीं संस्कारी और राष्ट्रवादी लोगों का शासन आने के बाद कोलकाता का रेड रोड सात दिन के लिए योग के चक्कर में बंद कर दिया कि नहीं । जबकि कुछ दिन पहले नमाज के लिए दो घंटे के लिए भी मना कर दिया गया था ।<br>बोला- अन्ना का आंदोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध था और योग एक अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रम है । नमाज तो एक कट्टर धार्मिक कार्यक्रम है जिससे आम जनता को परेशानी होती है ।<br>हमने कहा- यह भी अजीब बात है कि मुसलमानों और ईसाइयों के कार्यक्रम तो धार्मिक होते हैं और कोई न कोई जिहाद होते हैं । इसलिए इन्हें अपने घरों में मनाने में भी सोचना पड़ता है और हिंदुओं के होली, दिवाली, दुर्गा पूजा और पथ संचलन और भगवा रैली आदि सब कार्यक्रम सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं । इसलिए इन्हें स्कूलों में भी मनाया जाना चाहिए । क्या मुसलमानों और ईसाइयों की कोई संस्कृति नहीं होती ?<br>हमें तो याद है कि हम स्कूलों में बच्चों के साथ सभी धर्मों के त्योहार बड़े सद्भाव और उत्साह से मनाते थे ।<br>बोला- तभी तो भारत में हिन्दू धर्म खतरे में पड़ गया । अब देखो मोदी जी, योगी जी, धामी जी आदि लगे तो हुए हैं सब काम छोड़कर । जब धर्म बचेगा तभी तो देश बचेगा ।<br>हमने कहा- लेकिन यह कैसा धर्म है जहाँ बिना किसी महमूद ग़ज़नवी के बिना ही राम मंदिर में करोड़ों का गबन हो गया ।<br>बोला- चुप, जो राम को बदनाम करने की कोशिश की तो । योगी जी ने कहा है कि जब तक फैसला न हो जाए तब तक इस बारे में कोई बात करके राम को बदनाम न किया जाए ।<br>हमने कहा- अजीब तमाशा और तर्क है । बदनामी चोर की होती है या जिसके घर चोरी हुई है उसकी ? कहीं इस तरह चोरों को बचाने का इरादा तो नहीं है ? सोमनाथ पर डाके से शिव बदनाम होते हैं या महमूद ग़जनवी ? हाँ, उस समय के देश-समाज के रक्षकों की कायरता जरूर रेखांकित होती है ।</p>



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		<title>रमेश जोशी का व्यंग्य- योग किया ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-writer-and-satirist-ramesh-joshis-satire-did-yoga-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 23 Jun 2026 05:54:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यंग्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;जब कोई समस्या या जिम्मेदारी लेने की बात आये तो शवासन लगा लो । सभी प्रभावित लोग धीरे धीरे सिर फोड़ कर चुप हो जाएंगे और इस तरह से सभी तनाव, समस्याएं और विवाद धीरे धीरे स्वतः शांत हो जाएंगे जैसे मणिपुर विवाद, महिला पहलवान शोषण, नीट पेपर लीक&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230; &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>&#8216;जब कोई समस्या या जिम्मेदारी लेने की बात आये तो शवासन लगा लो । सभी प्रभावित लोग धीरे धीरे सिर फोड़ कर चुप हो जाएंगे और इस तरह से सभी तनाव, समस्याएं और विवाद धीरे धीरे स्वतः शांत हो जाएंगे जैसे मणिपुर विवाद, महिला पहलवान शोषण, नीट पेपर लीक&#8217; पढ़ें रमेश जोशी का पूरा व्यंग्य&#8230;</strong></p>



<p>आते ही तोताराम ने पूछा- योग किया ? ठीक वैसे ही जैसे कोई मेट या मुंशी मिस्त्री से पूछता है- कितना प्लास्टर हुआ ?<br>हमने कहा- क्या योग करना कोई मजदूरी है जो तू हमारे काम की रिपोर्ट ले रहा है ? यह हमारा व्यक्तिगत मामला है । हम योग करें या भोग। तू क्यों बिना बात की अफ़सरी झाड़ रहा है । और फिर योग, भोग, तप, तंत्र-मंत्र या अन्य कोई युक्ति सब हाईवे वाले ‘धाकड़’ की तरह थोड़े किये जाते हैं । तुलसी मानस के बालकाण्ड में कहते हैं-<br>जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ॥<br>योग, युक्ति, तप, मंत्र सब छुपाकर किये जाते हैं तभी उनका पूरा फल मिलता है ।<br>बोला- तुझे पता होना चाहिए अब योग राष्ट्रीय कार्यक्रम हो गया है । कल छुट्टी थी लेकिन मास्टर स्कूलों में गए, और भी सरकार से लाभान्वित होने वाले या मोदी जी से लाभ पाने की उम्मीद रखने वाले सभी ने योग किया और फ़ोटो नेट पर डाले जिससे मोदी सरकार उन्हें देखकर उनकी कर्तव्यपरायणता और देशभक्ति का हिसाब-किताब रख सके । खुद मोदी जी ने कोलकाता में रेड रोड जैसी व्यस्त सड़क को सात दिन से बंद करवाकर कर मंच, कैमरे लगवाकर सभी देशभक्तों को योग सिखाया । इससे पता चलता है कि मोदी जी देशवासियों के स्वास्थ्य को लेकर कितने सजग और सक्रिय हैं ।<br>हमने कहा- दूसरों को उपदेश देना बहुत सरल होता है । तभी कबीर कहते हैं-<br>करनी मीठी खाँड सी करनी बिस की लोय<br>कथनी तज करनी करे तो बिस अमरित होय ।<br>मन वचन और कर्म की एकता ही सच्चा योग है । नहीं तो रामदेव वाला धंधा है । देशवासियों के स्वास्थ्य के लिए केवल योग से काम नहीं चलता । सबसे पहले उन्हें स्वास्थ्यवर्द्धक और पूरा भोजन चाहिए, फिर भी अगर बीमार हो जाएँ तो असली दवाइयाँ, डॉक्टर और अस्पताल चाहिएं । योग स्वस्थ रहने के लिए पथ्य-परहेज, आहार-विहार की एक भारतीय पद्धति है । वह दवा और भोजन का विकल्प नहीं है । जब राजनीतिक पार्टियां नकली दवा बनाने वाली कंपनियों से चंदा लेंगी तो स्वास्थ्य का भगवान भी मालिक नहीं हो सकता । योग का ढोंग करने, योग करो स्वस्थ रहो का नारा लगाना जिम्मेदारी से बचने का बहाना है । जैसे कि जगह जगह बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा लिखवा देने से काम नहीं होता । उसके लिए विज्ञापन की बजाय शिक्षा का बजट बढ़ाना पड़ता है और बेटियों को भ्रष्ट संतों और बाहुबली नेताओं से बचाना होता है ।<br>हाँ, योग से एक फायदा तो होता है ।<br>बोला- चल तूने कुछ तो माना । बता किसी आसन का कोई फायदा ।<br>हमने कहा- तीन आसन है एक शवासन, दूसरा कूर्मासन और तीसरा मार्जर्यासन ।<br>जब कोई समस्या या जिम्मेदारी लेने की बात आये तो शवासन लगा लो । सभी प्रभावित लोग धीरे धीरे सिर फोड़ कर चुप हो जाएंगे और इस तरह से सभी तनाव, समस्याएं और विवाद धीरे धीरे स्वतः शांत हो जाएंगे जैसे मणिपुर विवाद, महिला पहलवान शोषण, नीट पेपर लीक आदि । दूसरा है कूर्मासन । जब कोई संकट आये तो कछुए की तरह अपने हाथ पैर अपने खोल में समेट कर पड़े रहो । जब संकट टल जाए तब फिर देश के विकास में लग जाओ जैसे आजादी के आंदोलन में जब देश अंग्रेजों से लड़-भिड़ रहा था तब तथाकथित देशभक्तों ने ऐसे ही कूर्मासन लगा रखा था। और अब जब संकट नहीं है तब बिना कुछ किये खुद देशप्रेमी बनकर सबको हड़काते फिर रहे हैं । तीसरा है मार्जर्यासन । मार्जरी बिल्ली को कहते हैं । कभी उसे अंगड़ाई तोड़ते देखा है ? इस आसान से रीढ़ की हड्डी लचीली हो जाती है । जिससे आप ट्रम्प जैसे किसी भी कैरियर खराब कर सकने वाले दुष्ट या फायदा पहुँचाने वाले सेठ के आगे सरलता से झुककर अपना कैरियर बचा सकते हैं और धन जुटा सकते हैं ।<br>देश का सम्मान जाए भाड़ में ।</p>



<p></p>
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		<title>श्रवण गर्ग का लेख &#8211; क्या &#8216;मैं वापस आऊंगा&#8217; एक चालाक एजेण्डा फिल्म है ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/shravan-gargs-article-but-partition-will-not-go-back-i-will-come-back-imtiaz-ali-film-read-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 22 Jun 2026 06:36:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;सत्तारूढ़ दल का समूचा तंत्र भी तो बार-बार ‘विभाजन की विभीषिका’ के क्षणों और लाशों से पटी ट्रेनों के सीमा पार से अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पहुँचने की याद दिलाता रहता है। अधूरी प्रेम कहानी के बहाने क्या इम्तियाज़ की फ़िल्म भी जाने-अनजाने उसी एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम नहीं करती ?&#8217; पढ़ें सुपरिचित &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;सत्तारूढ़ दल का समूचा तंत्र भी तो बार-बार ‘विभाजन की विभीषिका’ के क्षणों और लाशों से पटी ट्रेनों के सीमा पार से अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पहुँचने की याद दिलाता रहता है। अधूरी प्रेम कहानी के बहाने क्या इम्तियाज़ की फ़िल्म भी जाने-अनजाने उसी एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम नहीं करती ?&#8217; पढ़ें सुपरिचित वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p>प्रसिद्ध पाकिस्तानी फ़िल्ममेकर उमर नासिर अली ने इम्तियाज़ अली की बहुचर्चित फ़िल्म ‘ मैं वापस आऊँगा‘ को अत्यंत भावनात्मक और मास्टरक्लास करार देते हुए कहा है कि फ़िल्म ख़त्म हो जाने के भी काफ़ी समय तक दर्शकों के साथ बनी रहती है ! ‘</p>



<p>‘नायाब’ जैसी फीचर फ़िल्म के लिए पहचान रखने वाले उमर नासिर से क्या पूछा जा सकता है कि पार्टीशन को लेकर ऐसी ही कोई फ़िल्म क्या वे पाकिस्तान में बना सकते हैं ? ऐसी फ़िल्म जिसमें लोकेशन सरगोधा की ही हो पर इम्तियाज़ की फ़िल्म के 95 साल के सिख मुख्य नायक (ईशर सिंह ग्रेवाल ) की जगह कोई मुस्लिम हो जिसके अधूरे प्यार की नायिका कोई सिख युवती पार्टीशन के बाद भारत के हिस्से वाले पंजाब के किसी शहर में बस गई हो और जिसे तलाशने उसका पोता सीमा पार करके भारत आता हो ? क्या फ़िल्म पाकिस्तान में बनाने दी जाएगी ? क्या ऐसी कोई फ़िल्म भारत में रिलीज़ होने दी जाएगी ?</p>



<p>ईशर सिंह ग्रेवाल उर्फ़ कीनू की 78 साल पुरानी प्रेम कहानी हक़ीक़त में उन ज़ख्मों को ही हरा करती है जिन्हें वे सत्तर लाख से ज़्यादा लोग जो पार्टीशन के बाद गठरियों में बांधकर भारत पहुँचे थे अब भूल जाना चाहते हैं। तो फिर क्या बहस फ़िल्म को एक अधूरे प्यार की कहानी की क़ैद से आज़ाद कर उसकी स्क्रिप्ट में डाले गए ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ की तरह के हिंसक दृश्यों या शरणार्थियों से भरी ट्रेनों के अमृतसर पहुँचने के स्टॉक फूटेज के इस्तेमाल की ज़रूरत या निर्माताओं के इरादों पर भी नहीं की जानी चाहिये ?</p>



<p>सत्तारूढ़ दल का समूचा तंत्र भी तो बार-बार ‘विभाजन की विभीषिका’ के क्षणों और लाशों से पटी ट्रेनों के सीमा पार से अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पहुँचने की याद दिलाता रहता है। अधूरी प्रेम कहानी के बहाने क्या इम्तियाज़ की फ़िल्म भी जाने-अनजाने उसी एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम नहीं करती ?</p>



<p>दर्शकों की तरफ़ से हम यह मानकर चलना चाहते हैं कि अगर फ़िल्म में यह सब शामिल नहीं किया जाता तो फिर पूरी कहानी युवा ईशर के सरगोधा में इश्क़ के शॉट्स, पोते निर्वेर (दिलजीत दोसांझ) के इंग्लैंड से लौटकर भारत आने और सीमा पर करके सरगोधा जाने के दृश्यों और ईशर (नसीरूद्दीन) के घर और अस्पताल के बिस्तरों पर व्यक्त हुई अधूरे प्रेम की स्मृतियों तक बंध कर रह जाती ! यानी असली फ़िल्म इंटरवल के बाद शुरू होती ! पर पार्टीशन की व्यथा को कमर्शियली बेचने के लिए तीन घंटे तक खींचा जाना ज़रूरी था।</p>



<p>हक़ीक़त यह है कि पार्टीशन की हिंसक स्मृतियों को अगर इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया जाए तो फिर न तो सत्ता की सांप्रदायिक राजनीति को चुनावी बारूद मिलेगा और न मुंबइया फ़िल्मों के लिए कहानियाँ।फ़िल्म के शुरुआती हिस्से में जब पार्टीशन की खबर सरगोधा पहुँचती है तो युवा ईशर पहले यह डायलॉग बोलता है: मैं बटवारे को नहीं मानता’ ! जब उसे ज़बरदस्ती ट्रेन पर चढ़ाकर सीमापार धकेला जाने लगता है तो अपने प्यार से वह वादा करता है :’ मैं वापस आऊँगा’ !</p>



<p>ईशर( नसीरूद्दीन) के 78 साल तक प्यार में डूबे रहने और किए गए वायदे के मुताबिक़ वापस नहीं पहुँच पाने की कहानी का अदृश्य भाग यह है कि पार्टीशन को न सिर्फ़ स्वीकार कर लिया गया है उसके ज़ख्मों को बार-बार कुरेदकर गहरा करते रहना भी वक्त की ज़रूरत बन गया है।</p>



<p>पार्टीशन को लेकर बनाने वाली फ़िल्में अधूरे प्रेम की पीड़ा और बेबसी को जिस अन्दाज़ में उजागर करती हैं अपनी स्क्रिप्ट्स में एक मुल्क के तौर पर पाकिस्तान के लिए नफ़रत की गुंजाइशें भी छोड़ती जाती हैं। इम्तियाज़ भी अगर उस गुंजाइश को नहीं छोड़ते तो फिर फ़िल्म में ग्लोरिफ़िकेशन सिर्फ़ दो कोमों के युवा प्रेमियों के बीच पनपे निश्चल प्रेम का ही होता उससे इतर कुछ नहीं। वैसी स्थिति में फ़िल्म दिलजीत दोसांझ की सरगोधा यात्रा के शॉट्स के बाद नसीरूद्दीन शाह के चेहरे पर छाने वाली शांति के अंतिम दृश्य पर ख़त्म कर दी जाती ! वैसा नहीं किया गया ! नसीरुद्धीन की शानदार भूमिका को ओवरशैडो करते दोसांझ के गाने ‘कमाल है ‘ के साथ फ़िल्म का अंत दिखाया गया। एक मार्मिक प्रेम कहानी पर ग़ज़ा के विज़ुअल्स की ग़ैरज़रूरी बमबारी के बारे में किसी भी समीक्षक ने सवाल नहीं किया !</p>



<p></p>
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		<title>शंकरानंद की चार कविताएं</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-poet-shankaranands-four-poems-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 21 Jun 2026 06:43:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi kavita]]></category>
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		<category><![CDATA[#love and war]]></category>
		<category><![CDATA[#poetry]]></category>
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		<category><![CDATA[#हिंदी कविता]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>1. चमकती दोपहर में जिन सड़कों से गुजरता हूंउसके पास के घरों की आवाजेंछन कर बाहर आती हैंजबकि उनके बाहर आने पर पाबंदी है हवा के साथ आती हैएक मामूली सी चीखजो किसी स्त्री की है उंगलियों का कटना औरखून का बहनायह रोज की बात है आग में जलते हुए तवे परहाथ की छाप सेरोटी &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p>1. <strong>चमकती दोपहर में</strong></p>



<p>जिन सड़कों से गुजरता हूं<br>उसके पास के घरों की आवाजें<br>छन कर बाहर आती हैं<br>जबकि उनके बाहर आने पर पाबंदी है</p>



<p>हवा के साथ आती है<br>एक मामूली सी चीख<br>जो किसी स्त्री की है</p>



<p>उंगलियों का कटना और<br>खून का बहना<br>यह रोज की बात है</p>



<p>आग में जलते हुए तवे पर<br>हाथ की छाप से<br>रोटी के स्वाद पर<br>कोई फर्क नहीं पड़ता<br>फटे को सिलने की<br>एक कोशिश में<br>बीत जाते हैं दिन<br>सूई की नोंक चुभती है तो<br>आह तक नहीं निकलती</p>



<p>कितना कुछ है जो<br>सिर्फ इसलिए बाकी है कि<br>इसे एक स्त्री को ही पूरा करना है<br>जब तक वह पूरा नहीं कर लेगी<br>कुछ नया काम निकल आएगा और<br>बढ़ जाएगी उसकी बेचैनी थोड़ी और</p>



<p>चमकती दोपहर में एक स्त्री की चीख<br>स्थाई भाव की तरह है<br>जिसका होना रोज के धूप जितनी<br>मामूली बात है</p>



<p>इसपर कोई बहस नहीं होती!</p>



<p><strong>2. एक कलम</strong></p>



<p>पिता की कलम को देखता हूं तो<br>वह मुझसे<br>पिता के होने का पता पूछती है</p>



<p>वह खाली पड़ी है<br>पिछले कई सालों से<br>मुझमें इतनी हिम्मत नहीं कि<br>उसे थाम सकूं अपनी उंगलियों से</p>



<p>मुझे नहीं लगता कि<br>वह कलम मेरा साथ देगी<br>वह लिखेगी या<br>लिखने से इंकार कर देगी<br>नहीं कह सकता मैं<br>लेकिन देखती है वह अपलक<br>जैसे स्त्री राह देखती है<br>दरवाजा खोल कर<br>जो गया उसके लौटने की आशा में</p>



<p>अक्सर यही होता है कि<br>चीजें तक पहचानती हैं<br>मनुष्य के होने की छाप<br>वह छाप नहीं मिलती तो<br>शोक में वे चीजें<br>धीरे धीरे टूट जाती हैं</p>



<p>जैसे अपने पक्षी के<br>लौटने की चाह में ही<br>कोई घोंसला जिंदा रहता है<br>कई महीनों तक और<br>नहीं लौटने के शोक में<br>वह धीरे-धीरे उजड़ जाता है।</p>



<p><strong>3. तानाशाह</strong></p>



<p>उसके बोलने में आवाज नहीं होती<br>इतना कम बोलता है कि<br>कुछ नहीं बोलता<br>इसके बावजूद सबकुछ हो जाता है</p>



<p>अगले ही पल विरोध में उठने वाली<br>टूट जाती है गर्दन<br>और गिर जाती हैं एक के बाद एक<br>देह की श्रृंखलाएं</p>



<p>उसके आदेश लिखित नहीं होते<br>उसकी आंखों में क्रोध नहीं दिखता<br>उसकी बातों में छल नहीं दिखता<br>दिखता कुछ नहीं<br>जबकि भीतर सबकुछ गहरा है<br>समुद्र जितना फैला हुआ अथाह</p>



<p>सबकुछ उसी समुद्र में डूबता है<br>उबरता है<br>फिर डूब जाता है।</p>



<p><strong>4. युद्ध की तस्वीर</strong></p>



<p>जहां युद्ध चल रहा है<br>अभी वहां शांति नहीं<br>वह अपनी जान बचा रही फिलहाल<br>किसी खोह या गुफा में छिपकर</p>



<p>युद्ध चल रहा है और<br>युद्ध की तस्वीरें सामने आ रही हैं</p>



<p>उन तस्वीरों में जले हुए मकान तो<br>दिखाई देते हैं<br>मगर जले हुए स्वप्न और लालसा की राख<br>कहीं नजर नहीं आती</p>



<p>जो दिखता है वह तो सिर्फ<br>सतह की राख है</p>



<p>न जाने कितने बीज<br>न जाने कितने स्वप्न<br>न जाने कितनी लालसा<br>राख होती है युद्ध के बीच<br>युद्ध की तस्वीर खींचने वाला<br>इसकी तस्वीर नहीं ले पाता</p>



<p>राख हुए भविष्य की तस्वीर<br>कोई नहीं ले सकता।</p>



<p></p>
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		<item>
		<title>चंदन कुमार की कविता- धरती की जीवटता हमारे हिस्से आई</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-chandan-kumars-poem-the-earths-resilience-came-to-our-share-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 14 Jun 2026 14:37:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi kavita]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi literature]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#kavita]]></category>
		<category><![CDATA[#poetry]]></category>
		<category><![CDATA[#हिंदी कविता]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सदियों से संघर्ष करने से हम नहीं डरेहम नहीं डरे किसी पहाड़, खदान से पार निकलने मेंहम आजीवन लड़ते रहेऔर धरती की जीवटता हमारे हिस्से आई जिनका नाता संघर्षों से कभी नहीं रहावे भाषा में गपोड़ी कहे जाते हैंऔर वे बताते हैंश्रम को दुनिया की सबसे कमतर चीज अमानवीय क्रियाओं से सरोकार रखने वालेगढ़ते हैं &#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p>सदियों से संघर्ष करने से हम नहीं डरे<br>हम नहीं डरे किसी पहाड़, खदान से पार निकलने में<br>हम आजीवन लड़ते रहे<br>और धरती की जीवटता हमारे हिस्से आई</p>



<p>जिनका नाता संघर्षों से कभी नहीं रहा<br>वे भाषा में गपोड़ी कहे जाते हैं<br>और वे बताते हैं<br>श्रम को दुनिया की सबसे कमतर चीज</p>



<p>अमानवीय क्रियाओं से सरोकार रखने वाले<br>गढ़ते हैं दुनिया के लिए मर्यादा के शब्द<br>जहां उनकी पहुंच तनिक भी नहीं होती<br>वे नैतिक होने का खेल खेलते रहते हैं<br>और बताते हैं अपने आपको<br>दुनिया का सर्वश्रेष्ठ जीव</p>



<p>जिसने फसलें उगाईं, महल बनाए<br>वे तरसते रहे दो जून की रोटी के लिए<br>जो इस धरती को सुंदर बनाने की चाह<br>लिए चले गए<br>उनकी पीढ़ियां भूखमरी &#8211; बेरोजगारी की आग में झुलस रही हैं</p>



<p>तुमने अपनी भाषा बनाई<br>और उस भाषा में दूसरों के लिए<br>सबसे निकृष्टम शब्द गढ़े<br>जिससे तुम्हारे हिंसक होने का परिचय अनायास हो जाता है</p>



<p>अब तो पूछा जायेगा<br>भाषा में किसने कहा &#8216;चोरी चमारी&#8217;<br>भाषिक आवाजाही बताते हैं<br>बड़ी चालाकी से चमारी चकारी में<br>तब्दील कर दिया गया है<br>लगता है; चकारी कहने से सब सही हो जायेगा</p>



<p>भाषा पर डकैती डालने वाले<br>चोरी और चकारी में साम्य बतलाने की कोशिश में<br>श्रेष्ठता बोध को नहीं भूलते</p>



<p>अब उनसे कौन कहने जाय<br>&#8216; चमारी &#8216; एक समुदाय के लिए गाली है<br>चकारी का चोरी से साम्य<br>एक वृहत्तर समुदाय को<br>कमतर दिखाना है</p>



<p>आज जब दुनिया करवट बदल रही है<br>पूंजी के नए औज़ार<br>और अधिक खूंखार होते जा रहे हैं<br>उसके बाद भी हम इस दुनिया को बचाने के लिए<br>जल &#8211; जंगल &#8211; जमीन की लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं<br>यह जानते हुए कि यह सब करने के बाद भी<br>आने वाली पीढ़ियों के लिए शायद ही मुकम्मल जहां मिले।</p>



<p>हमें इंतिज़ार है उस दिन का<br>जहां दो प्रेमी युगल किसी जातीय हिंसा के शिकार न होने पाएं<br>कोई भूख से तड़प न जाए<br>बेरोजगारी की आग में कोई दम न तोड़े<br>कोई किसी की याद में<br>सदियों तक इंतिज़ार न करे<br>इस तरह<br>जबरिया श्रम की लूट से मुक्ति मिल जाय<br>निजी संपत्ति का का विनाश हो जाय।</p>



<p>&#8211;<strong>चन्दन कुमार ( सहायक आचार्य &#8211; हिंदी )<br>गांधी शताब्दी स्मारक पी. जी. कॉलेज कोयलसा, आजमगढ़।</strong></p>



<p></p>
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]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>प्रो. रविकांत का लेख- दलित साहित्य के पचास साल</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-prof-ravikants-article-on-fifty-years-of-dalit-literature-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 12 Jun 2026 14:30:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलोचना]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan patrika]]></category>
		<category><![CDATA[#dalit kavita]]></category>
		<category><![CDATA[#dalit lekhak]]></category>
		<category><![CDATA[#dalit literature]]></category>
		<category><![CDATA[#dalit sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#hindi sahitya]]></category>
		<category><![CDATA[#omprakash valmiki]]></category>
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		<category><![CDATA[#social justice]]></category>
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		<category><![CDATA[#दलित विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[#दलित साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>  &#8216;दलितों द्वारा दलितों के लिए लिखा जाने वाला दलित साहित्य दलितों के संघर्ष और चेतना का विमर्श है। दलित विमर्श सिर्फ एक साहित्यिक शैली नहीं है बल्कि यह अखिल भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन है।&#8217; पढ़ें पूरा लेख&#8230; दलित साहित्य मुक्ति का साहित्य है। सदियों से जारी शोषण और अन्याय के खिलाफ खड़े होकर दलित &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;दलितों द्वारा दलितों के लिए लिखा जाने वाला दलित साहित्य दलितों के संघर्ष और चेतना का विमर्श है। दलित विमर्श सिर्फ एक साहित्यिक शैली नहीं है बल्कि यह अखिल भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन है।&#8217; पढ़ें पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>दलित साहित्य मुक्ति का साहित्य है। सदियों से जारी शोषण और अन्याय के खिलाफ खड़े होकर दलित साहित्यकारों ने नकार, प्रतिरोध और आक्रोश को अभिव्यक्त किया। दलित साहित्य में फूलों की कोमलता नहीं, आग की तपिश है। उसमें दैहिक सौंदर्य नहीं भौतिक कुरूपता है, कामुकता नहीं जीवन का उजाड़ और ठूंठपन है। दलित साहित्य में कल्पित स्वर्गलोक की जगह दक्खिन टोले की बजबजाती सच्चाइयां हैं। दलित साहित्य में जीवन का संघर्ष, जाति का दंश, अपमान की यातना और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह है। इस विद्रोह की ज्वाला में दर्जनों हाथ वाले देवता और अवतारवादी ईश्वर जलकर भस्म हो गए। आखिर यह कैसा ईश्वर है जो हीराडोम के शब्दों में, &#8216;हमनी के दुःख भगवनओ न देखताजे, हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।&#8217;1जो ईश्वर ब्राह्मणवादी शोषण और उत्पीड़न को देखकर भी एक अछूत की शिकायत को अनसुनी करता है, उस ईश्वररूपी पाखंड और अंधविश्वास को दलित साहित्यकारों ने उखाड़ फेंका। उसने विवेक, विज्ञान और विकास का मार्ग चुना। संविधान के रास्ते शिक्षा के जरिए सम्मान, स्वाभिमान और संपत्ति हासिल करने के सपने देखे। उसने तोड़ डाली परंपरा और परतंत्रता की बेड़ियां, उजाड़ डाले मंदिर और मठ, खंडित कर डाली मूर्तियां, मिटा दिए पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक के मिथक। समस्त ब्राह्मणवादी बाधाओं को मिटाकर दलित साहित्य ने मनुष्यता का विमर्श खड़ा किया।</p>



<p>मनुवादी व्यवस्था में दलितों को शिक्षा, संपत्ति और शस्त्र से विहीन करके अछूत बना दिया गया। वर्ण व्यवस्था को हिंदू धर्मशास्त्रों- स्मृतियों द्वारा ईश्वरीय बना दिया गया। इस व्यवस्था के कुचक्र को तोड़ने के लिए धर्मशास्त्रों को खारिज करना आवश्यक था। डॉ अंबेडकर ने महाड़ चाबदार तालाब से पानी पीने के आंदोलन के दौरान 25 दिसंबर 1927 को मनुस्मृति का दहन किया। दलित साहित्यकारों ने बाबा साहब के विचारों और संघर्षों को साहित्य में अभिव्यक्ति दी। इंग्लैंड और अमेरिका स्थित दुनिया के दो सबसे मशहूर विश्वविद्यालयों से तालीम हासिल करके भारत लौटे डॉ. अम्बेडकर ने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान दलितों-वंचितों की सामाजिक आज़ादी के लिए लड़ाई छेड़ी। इसके बाद संविधान निर्माता और स्वतंत्र भारत के बतौर कानून मंत्री बाबा साहब ने दलितों, पिछड़ों और महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित किए। वंचितों के मसीहा डॉ. अंबेडकर ने दलितों को शिक्षा की रोशनी दी। दलित साहित्यकारों ने बाबा साहब के सपनों के किरदारों को रचा। गरीबी और अभाव में जीते, पल-पल अपमानित होते ऐसे दलित साहित्य के नायक बनते हैं, जो सवर्ण सामंतवाद और सत्तातंत्र से जूझते हुए तालीम हासिल करते हैं तथा सरकारी नौकरियों में बड़े औहदों पर पहुंचकर अपने समाज के लिए मिसाल बनते हैं। दलित साहित्यकारों के लिए बाबासाहब प्रेरणा ही नहीं पथप्रदर्शक भी हैं। डॉ अम्बेडकर ने साहित्यकारों को संबोधित करते हुए कहा था, &#8220;हमारे जीवन कर्तव्य और संस्कृति की ओर हमारा ध्यान नहीं है। अंतर्मुख होकर विचार करने से हमारे सामने वह भयावह स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कि हमारे जीवन मूल्य और सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने के लिए दलित साहित्यकारों को जागरूक और प्रयत्नशील हो जाना चाहिए। तुम्हारे उपन्यास, कथाओं की सीता, लक्ष्मण रेखा पार करके आगे जा चुकी है। दुर्योधन के दरबार में द्रौपदी का वस्त्रहरण हो रहा है। शकुंतला को दुष्यंत अपना सही परिचय नहीं दे रहा है। इसलिए शकुंतला को वनवास हो रहा है। ऐसी स्थिति में साहित्यकारों का मैं आह्वान करता हूं कि वे विभिन्न साहित्यिक विधाओं के द्वारा उदात्त जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक मूल्यों को रेखांकित करें। अपने लक्ष्य को मर्यादा में मत बांधो, उसे और अधिक विशाल बनने दो। वाणी का विस्तार करो। अपनी लेखनी को केवल अपने प्रश्नों तक सीमित मत रखो। उसे तेजस्वी बनाओ जिससे गांव में फैला अंधकार दूर हो सके। यह मत भूलो कि इस भारत देश में उपेक्षित दलितों का बहुत बड़ा विश्व है। अपनी रचनाओं द्वारा उनकी वेदना को समझकर उनके जीवन को उज्ज्वल बनाने की कोशिश करो। यही मानवता की सच्चाई है।&#8221;</p>



<p>दलितों द्वारा दलितों के लिए लिखा जाने वाला दलित साहित्य दलितों के संघर्ष और चेतना का विमर्श है। दलित विमर्श सिर्फ एक साहित्यिक शैली नहीं है बल्कि यह अखिल भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन है। इसका आरम्भ सर्वप्रथम मराठी में हुआ। ओमप्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में, &#8220;दलित साहित्य का सर्वप्रथम आगाज मराठी में हुआ। डॉ आंबेडकर के मुक्ति आंदोलन ने दलितों में एक नई चेतना पैदा की, जिसके फलस्वरुप दलित साहित्य की रचनात्मकता का उदय हुआ; जो मानवीय सरोकारों की अभिव्यक्ति बना। ऐसा साहित्य जिसमें दलितों की वाणी जो हजारों साल से मूक बनी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षणिक विद्वेष और नारकीय जीवन की दग्धताओं को वहन कर रही थी, मुखर होकर स्वाभिमान और अस्मिता की लड़ाई लड़ने के लिए सामने आकर खड़ी हो गई।&#8221; मराठी में दलित साहित्य के उद्भव पर टिप्पणी करते हुए चर्चित दलित लेखिका विमल थोराट ने लिखा है कि, &#8220;दलित साहित्य का उद्भव मराठी साहित्य में एक साहित्यिक, सामाजिक विद्रोह के रूप में हुआ है। जिसके माध्यम से दलित शोषित समाज का विद्रोह मुखरित हुआ है। जिसे अछूत कहकर सदियों तक मनुष्य जीवन की सभी आवश्यकताओं और सुविधाओं से वंचित रखा गया और जिसे केवल दुख, वेदना, गुलामी, अपमान आंसुओं से भरी जिंदगी बिताने के लिए विवश किया गया। हिंदू धर्म वर्ण-व्यवस्था ने जातियों के लिए कटघरे से निर्मित इस समाज व्यवस्था में उसे वह स्थान दिया, जो गांवों, नगरों के अहातों से दूर था और जहां केवल अंधकार ही अंधकार था। उसे अंधकार जीवन से निकालकर उनके जीवन में रोशनी लाने का कार्य डॉ. अंबेडकर ने किया।&#8221;</p>



<p>&nbsp;मराठी, तमिल, मलयालम, कन्नड़, पंजाबी, बांग्ला से लेकर हिंदी आदि भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य का उत्थान हुआ। पिछले 50 सालों में दलित साहित्य ने अपनी विशिष्ट पहचान ही नहीं बनाई बल्कि आज यह मुख्य धारा का साहित्य है।</p>



<p>1970 के दशक में हिंदी में दलित लेखन की शुरुआत हुई। यह वो दौर था जब हिन्दू मिथकों का वामपंथीकरण हो रहा था। प्रगतिशीलता के नाम पर किसान मजदूर की तो बात हो रही थी, लेकिन जाति के प्रश्न पर सामूहिक चुप्पी थी। दलित साहित्य ने अपनी चीख से इस खामोशी को बेधा। फिर भी शुरुआती दौर में दलित साहित्य को कोई तवज्जो ही नहीं दी गई। तब दलित साहित्यकारों ने प्रगतिशीलों के प्रेरक तुलसीदास और प्रेमचंद पर हमले शुरू किए। उन्हें ब्राह्मणवादी मूल्यों का पोषक और सर्जक बताया। इसके बाद दलित साहित्य की तीखी आलोचना शुरू हुई। दलित साहित्य को घृणा और विद्वेष का साहित्य कहा गया। जबकि सच्चाई यह है कि दलित साहित्य हिंदू वर्णव्यवस्था में निहित नफरत और ऊंच नीच की भावना के नकार का साहित्य है। यह प्रेम और मनुष्यता का साहित्य है।&nbsp;</p>



<p>दलित साहित्य निजी अनुभूति का साहित्य है। सदियों से पीड़ित दलितों की वेदना की अभिव्यक्ति दलित साहित्य में हुई है। गैर दलित इस यातना को कभी नहीं महसूस कर सकते।इसीलिए ज्योतिबा फुले ने कहा था कि &#8216;राख ही जानती है, जलने की पीड़ा। जो सहता है सो कहता है।&#8217; दलित साहित्य में यातना से उपजे दर्द और वेदना की अभिव्यक्ति ही नहीं बल्कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था के प्रति आक्रोश भी है। दलित चेतना इस शोषणकारी व्यवस्था को जलाकर नष्ट करने को उद्धत है। जब जातिगत शोषण के खिलाफ दलित साहित्यकारों ने सवर्ण सामंती जातियों के वर्चस्व के हथकंडों और षड्यंत्रों को उजागर किया तो दलित साहित्य पर जातिवादी होने के आरोप लगाए जाने लगे। असल में, दलितों के शोषण का कारण जाति व्यवस्था है, तब दलित साहित्यकार जाति का समर्थन कैसे कर सकते हैं? दलित साहित्यकार और चिंतक डॉ. एन. सिंह ने ठीक लिखा है कि, &#8220;दलित साहित्य जातिवादी व्यवस्था का घोर विरोधी है, जबकि कुछ साहित्यकार और आलोचक उस पर जातीय वैमनस्य भड़काने और जातिवादी होने के आरोप लगाते हैं। लेकिन समझा जा सकता है कि जिस व्यक्ति ने जाति के कारण शताब्दियों तक अपमान की यातना को झेला हो वह जातिवादी कैसे हो सकता है? जातिवादी वह होगा जिसे अपनी संपूर्ण मूर्खता और अज्ञान के बावजूद जाति के कारण ही सम्मान मिला हो। अतः दलित साहित्य जातिवाद के उच्छेद के लिए सर्वात्मना प्रयत्नशील दृष्टिगोचर होता है।&#8221; वास्तव में, दलित साहित्य स्वतंत्रता, समानता और बंधुता का पक्षधर है। दलित साहित्य लोकतांत्रिक मूल्यों का पोषक और अंततः मानवतावादी है।</p>



<p><strong>&#8211; रविकांत</strong></p>
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