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	<title>आलोचना Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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	<description>साहित्य, विचार और जन आंदोलन</description>
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	<title>आलोचना Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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		<title>रविकांत का लेख- शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:48:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलोचना]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[#adahan magzine]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया।&#8217; पढ़ें रविकांत का &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-ravikants-article-in-adahan-magazine-om-prakash-valmikis-poems-are-a-call-for-struggle-against-exploitation/">रविकांत का लेख- शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएं</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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<p><strong>&#8216;दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया।&#8217; पढ़ें  रविकांत का पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>डॉ अम्बेडकर के विचारों और सपनों को साकार करने वाला साहित्य सबसे पहले 1960 के दशक में मराठी में शुरू हुआ। इसके बाद तेलुगु, हिन्दी, गुजराती, तमिल और कन्नड में दलित साहित्य लेखन का आंदोलन खड़ा हुआ। 1970 के दशक में हिन्दी दलित साहित्यकारों की पहली पीढ़ी सक्रिय हुई। इसमें सबसे उल्लेखनीय नाम ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून 1950-17 नवंबर 2013) का है। सदियों से पढ़ने-लिखने से वंचित रहे दलित समाज को पहली बार अभिव्यक्ति का अवसर मिला। लेकिन उनके लिए यह कितना आसान था? हिन्दू समाज के सबसे निचले पायदान पर स्थित जाति में जन्मे ओमप्रकाश वाल्मीकि के लिए लिखना किसी यातना से कम नहीं था। उन्होंने अपनी किताब &#8216;दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष और यथार्थ&#8217; में लिखा है ,&#8221;मुद्रित शब्द की आग में मैंने अपने आपको हमेशा झुलसते पाया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर , गांव बरला के बेसिक प्राइमरी स्कूल में मेरे दाखिले के वक्त गिड़गिड़ाते पिता का चेहरा आज भी मेरी आंखों में किरकिराता है। और यातना भरे सफर और संघर्ष में यही मेरी ताकत भी बनता है। यह वह दौर था, जब भारत नया-नया स्वतंत्र हुआ था, लेकिन स्कूल- कॉलेजों में किसी दलित के लिए प्रवेश पाना आसमान से तारे तोड़ लेने के समान था, किसी दलित के लिए स्कूल के दरवाजे बंद थे। नई-नई आजादी मिली थी, नया संविधान बना था। जिसमें सबको समान अधिकार देने की बात कही गई थी। लेकिन हिंदुत्व की सनातनी मान्यताओं के सामने संविधान की धाराएँ बौनी थीं। पिताजी के उस जज्बे को समझने की उस वक्त मेरी उम्र नहीं थी, लेकिन एक बार जब स्कूल की टाट-पट्टी के सबसे किनारे पर, जो मेरे बैठने से पहले ही खत्म हो जाती थी, बैठकर अक्षर पहचानने का जो सिलसिला शुरू हुआ, तो वह चिंगारी बनाकर अंधेरे में जुगनू की तरह चमकने लगा था। और वही चमक मेरे भीतर आग में तब्दील हो गई थी। जिसकी तपिश ने मेरे वजूद को ही बदल दिया तो उस वक्त पिताजी का वह जज्बा ठीक से समझ में आने लगा था।&#8221;</p>



<p>ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदू समाज की बेड़ियों को ही नहीं तोड़ा बल्कि हिंदी साहित्य को भी शुचिता और कुलीनता से मुक्त कराया। जयप्रकाश कर्दम के शब्दों में, &#8220;ओमप्रकाश वाल्मीकि एक ऐसा नाम है, जिसने अपनी रचनाओं के माध्यम से कुलीनता और आभिजात्य संस्कृति के मूल्यों में रचे-बसे हिंदी साहित्य की सदियों पुरानी जड़ता को तोड़ा और समाज की भांति साहित्य की चौखट से बाहर उपेक्षित पड़े दलितों को साहित्य के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि का लेखन साहित्य विमर्श में एक अनिवार्य हस्तक्षेप है।&#8221;<br>ओमप्रकाश वाल्मीकि ने साहित्य को नए ढंग से परिभाषित किया। उनके अनुसार, साहित्य मनुष्यता की अभिव्यक्ति है। पराधीनता से मुक्ति का आख्यान है। शोषण के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान है। समता और स्वतंत्रता की चेतना है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने पूर्ववर्ती हिन्दी साहित्य को कठघरे में खड़ा किया। उनके अनुसार अधिकांश हिन्दी साहित्य ब्राह्मणवादी परंपराओं और मूल्यों से पोषित है। इसमें दलितों-वंचितों की पराधीनता और पीड़ा की अभिव्यक्ति नहीं है। दलित समाज की पराधीनता और उसके मुक्ति के सवालों को केंद्र में रखकर उन्होंने कविता, कहानी, आत्मकथा और आलोचना जैसी महत्वपूर्ण विधाओं में रचनाएं लिखीं। उनका रचना संसार बहुत व्यापक है। उनके चार कहानी संग्रह &#8211; सलाम (2000), घुसपैठिए (2003), छतरी, अम्मा एंड अदर स्टोरी। आत्मकथा- जूठन (1997) दूसरा भाग (2015) आलोचना- दलित साहित्य का सौंदर्य शास्त्र (2001), मुख्य धारा और दलित साहित्य, दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ (2013) विचारपरक लेखन &#8211; सफाई देवता (2008) नाटक- दो चेहरे, उसे वीर चक्र मिला था, अनुवाद- मैं हिंदू क्यों नहीं? (कांचा इलैया की अंग्रेजी किताब का हिंदी अनुवाद), सायरन का शहर (अरुण काले के मराठी कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद)।<br>बृहत साहित्य के लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि बुनियादी तौर पर कवि हैं। उनके लेखन की शुरुआत कविता से हुई और कविता उनके जीवन-संघर्ष में अनवरत संबल बनी रही। अपनी किताब &#8216;दलित साहित्य: अनुभव, संघर्ष एवं यथार्थ&#8217; में उन्होंने लिखा है कि, &#8220;प्रारंभिक दौर में ही मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम कविता ही रही है। एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहने के साथ-साथ कविताओं की ओर मेरा झुकाव लगातार बढ़ता गया। बल्कि हताशा और निराशा के समय कविता मुझे संबल देती रही है।&#8221; कविता जीवन नहीं बल्कि उनकी पूरी दुनिया है। उसका सच दिल से क्या, अस्थि-मज्जा से निकला हुआ यथार्थ है! उनका पहला कविता संग्रह &#8216;सदियों का संताप&#8217; 1989 में फिलहाल प्रकाशन, देहरादून से प्रकाशित हुआ। दूसरा काव्य संग्रह &#8216;बस्स बहुत हो चुका&#8217; 1997 में वाणी प्रकाशन से आया। इसके बाद 2009 में उनका तीसरा काव्य संग्रह &#8216;अब और नहीं&#8217; राधाकृष्ण प्रकाशन से छपा। अंतिम और चौथा काव्य संग्रह &#8216;शब्द झूठ नहीं बोलते&#8217; 2012 में अनामिका प्रकाशन से प्रकाशित हुआ।</p>



<p>उनकी कविताओं में सामन्तों- ब्राह्मणवादियों का शोषण तंत्र तथा दलितों की यातना, संघर्ष और आक्रोश की अभिव्यक्ति हुई है। दलित जीवन के भोगे हुए यथार्थ को प्रस्तुत करने वाली उनकी कविताएं काव्यरसिकों के गले नहीं उतरतीं। उनकी कविताओं में ना शास्त्रीय संस्कार है और ना सात स्वरों का साज। उनकी कविताओं में वेदना की अनुभूति है। मैनेजर पांडेय के शब्दों में &#8216;वेदना की कोई लय नहीं होती।&#8217; अभिजात साहित्य की तरह उनकी कविताएं मनोरंजन के लिए नहीं हैं। आधुनिकतावादियों की तरह विकारों के उत्सर्जन की संवाहक भी उनकी कविताएं नहीं हैं। उनके लिए कविता संवेदना और सरोकारों का संधान है। सच कहने का साहस और संघर्ष की गवाही है, कविता। &#8216;शब्द झूठ नहीं बोलते&#8217; संग्रह की भूमिका में ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं, &#8220;मेरे लिए कविता आनंद या रसास्वादन की चीज नहीं है। बल्कि कविता के माध्यम से मानवीय पक्षों को उजागर करते हुए मनुष्यता के सरोकारों और मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना है।&#8221; अन्यत्र भी उन्होंने लिखा है कि, &#8220;मेरे लिए कविता कला से ज्यादा जीवन की अदम्य लालसा, गतिशीलता की संवाहक है, जो हमारी पीड़ा, हमारे सुख-दुख की अभिव्यक्ति है, जिसमें हम अपने वर्तमान का प्रतिबिंब शिद्दत के साथ देख सकें, जो जीवन की विद्रूपताओं से जूझने का हौसला दे…सच्ची और सही कविता है, जो सच को सच और झूठ को झूठ कहने का हौसला रखती है।&#8221;<br>भारतीय समाज में व्यक्ति की बुनियादी पहचान जाति है। जाति से द्विजों को जन्मना श्रेष्ठता हासिल है और शूद्रों-दलितों को जन्मना हीनता। जाति के कारण ही दलितों को रोज अपमान, अन्याय और अत्याचार का सामना करना पड़ता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जाति कहीं उनका पीछा नहीं छोड़ती। दलितों के लिए जाति एक अभिशाप है। जीते जी नरक! जाति की नारकीय यातनाओं को दलित कवियों ने रचा। उनके शब्दों में एक वेदना भरी चीख है। &#8216;ठाकुर का कुआं&#8217; कविता में बेहद सरल शब्दों में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने जातिवादी परतों को उघाड़कर शोषणकारी तंत्र और वंचितों की बेबसी को बहुत मार्मिक ढंग से पेश किया है-<br>&#8220;चूल्हा मिट्टी का/ मिट्टी तालाब की/ तालाब ठाकुर का।<br>भूख रोटी की/ रोटी बाजरे की/ बाजरा खेत का/ खेत ठाकुर का।<br>बैल ठाकुर का/ हल ठाकुर का/ हल की मूठ पर हथेली अपनी/ फसल ठाकुर की।<br>कुआं ठाकुर का/ पानी ठाकुर का/ खेत खलिहान ठाकुर के/ गली मुहल्ले ठाकुर के फिर अपना क्या?<br>गांव?<br>शहर?<br>देश?&#8221;<br>56 शब्दों की यह कविता 56 इंची सत्ता के दौर में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली कविता बन गई है। साहित्यिक महफिलों से लेकर संसद भवन तक इस कविता की गूंज है। एक सांसद द्वारा उद्धृत किए जाने के बाद सामन्तों द्वारा हुई प्रतिक्रिया इस बात को दर्शाती है कि आज भी ब्राह्मणवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं।<br>दलित समाज पीढ़ी दर पीढ़ी जाति दंश से पीड़ित है। सदियों से मूक बधिर रहा, यह समाज आज अपनी पीड़ा और वेदना को व्यक्त कर रहा है। वह हंसते हुए प्रेम के गीत नहीं लिख सकता। उसका एक-एक शब्द ज्वालामुखी है, आह है, कराह है, धिक्कार है। बकौल ओमप्रकाश वाल्मीकि, &#8220;किसी एक जाति में जन्म लेने के कारण, जो कि उस व्यक्ति विशेष के हाथ में नहीं था, के लिए उसे इतनी बड़ी सजा कि उससे उसके मनुष्य होने तक के तमाम अधिकार छीन लिए जाएं। ऐसे में जब उस अपमानित व्यक्ति के हाथ में कलम आएगी, तब वह कैसी कविता लिखेगा? क्या उसे प्रेम कविता लिखनी चाहिए या विद्रोही? यह सवाल एक दलित कवि के भीतर गर्म-गर्म लावा दहकाता रहा है।&#8221; अगर यह गुलामी तुम्हारे ऊपर थोप दी जाए? &#8216;तब तुम क्या करोगे&#8217; कविता में वाल्मीकि जी पूछते हैं, &#8220;यदि तुम्हें धकेलकर गांव से बाहर कर दिया जाए/ पानी तक न लेने दिया जाए कुएं से/ दुत्कारा फटकारा जाए/ चिलचिलाती दोपहर में कहा जाए/ तोड़ने को पत्थर/ काम के बदले दिया जाए/ खाने को जूठन/ तब तुम क्या करोगे/ यदि तुम्हें मरे जानवर को/ खींचकर ले जाने के लिए कहा जाए/ और कहा जाए ढोने को पूरे परिवार का मैला /पहनने को दी जाए उतरन/ तब तुम क्या करोगे?&#8221;<br>वेदना से उपजे इन सवालों के बावजूद, कवि समर्पण के बदले सौहार्द और अपनापन चाहता है। वह बदलाव चाहता है, बदला नहीं। &#8216;भय&#8217; कविता में एक उम्मीद है कि काश!-<br>&#8220;तुम्हारे हाथ बढ़े होते/ मेरी ओर/ प्रेम गंध का स्पर्श लेकर/ सच कहता हूं/ मैं सीने से नहीं/ लिपट जाता तुम्हारे कदमों से/ बिछ जाता/ धूल बनकर जमीन पर।<br>बिछा तो अब भी हूँ-<br>प्रेम की आसक्ति पर नहीं/ तुम्हारे खूनी पंजों से डरकर।&#8221;<br>इसीलिए दलित कविता में जाति के प्रति गहरी वितृष्णा है।-<br>&#8220;स्वीकार्य नहीं मुझे जाना / मृत्यु के बाद/ तुम्हारे स्वर्ग में/ वहां भी तुम/ पहचानोगे मुझे/ मेरी जाति से ही।&#8221;<br>&#8216;शब्द झूठ नहीं बोलते&#8217; की भूमिका में ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं कि, &#8220;सभ्यता, संस्कृति के घिनौने षड्यंत्र लुभावने शब्दों से भरमाने का काम करते हैं। जहां नैतिकता, अनैतिकता और जीवन मूल्यों के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है।&#8221;10 पुनः वे हिन्दू सहिष्णुता के सच को तंज भरे लहजे में बेनकाब करते हैं-<br>&#8221; हां, सचमुच तुम सहिष्णु हो/ जब दंगों में मारे जाते हैं/ अब्दुल और कासिम/ कल्लू और बिरजू/ तब तुम सत्यनारायण की कथा सुनते हुए/ भूल जाते हो अखबार पढ़ना।<br>पूजते हो गांधी की हत्यारे को<br>तोड़ते हो इबादतगाह झुंड बनाकर।&#8221;<br>महात्मा गांधी के हत्यारे को पूजने वाले और बाबरी मस्जिद तोड़ने वाले हिंदुत्ववादी आज सत्तानशीं हैं। हिंसा की यह संस्कृति आज मोब लिंचिंग जैसे भयावह कुकृत्य में तब्दील हो चुकी है।</p>



<p>मानीखेज है कि दलित साहित्यकारों में, खासकर ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदुत्व और उसकी संस्कृति की तीखी आलोचना की है। हिंदुत्ववादियों ने भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कृति को गड्डमड्ड कर दिया। उनके दावे पर ओमप्रकाश वाल्मीकि व्यंग करते हैं- &#8220;कैद कर रखा है तुमने तहखानों में/ संस्कृति को/ मैं पूछता हूँ-/ संस्कृति क्या तुम्हारी रखैल है?&#8221;<br>&#8216;शास्त्रीय भाषा का शब्द वसुधैव कुटुम्बकम कितना खोखला&#8217; है? वाल्मीकि जी पूछते हैं, &#8216;उपेक्षा, उत्पीड़न और अछूत जाति किस सभ्यता और संस्कृति की देन है?&#8217;</p>



<p>90 के दशक में पिछड़ों के आरक्षण वाली मण्डल राजनीति के बरक्स कमण्डल की राजनीति तेज हुई। साम्प्रदायिक राजनीति दंगों में बदल गई। विस्फोटक की जगह मूर्तियों ने ले ली। धार्मिक जुलूस भय पैदा करने लगे। &#8216;आईना&#8217; कविता में वाल्मीकि जी ने भयावहता को इन शब्दों में दर्ज किया है-<br>&#8220;खड़ा हूं चौराहे पर/ जहां से गुजरा है अभी-अभी/ एक जुलूस/ जिसमें शामिल थे/ बिन चेहरों के लोग/ जिनके हाथों में चमक रही थीं/ तलवारें, त्रिशूल और तमंचे<br>…..<br>इस खूंखार समय में/ आरडीएक्स की जगह/ हो सकती हैं मूर्तियां/ जो आस्था के प्रश्न पर/ कर दी जाएंगी फिट/ अवैध जगहों पर/ खून खराबे के लिए किसी तर्क की/ आवश्यकता नहीं होती है।&#8221;<br>ओमप्रकाश वाल्मीकि हिन्दू संस्कृति के मुखौटे में छिपे हिंसक, अश्लील और सत्तालोलुप चेहरे को बेनकाब करते हैं। यह राजनीति और संस्कृति अब और भी भयानक और खूनी हो चुकी है। आज दलित साहित्य विमर्श और अम्बेडकरवाद क्रूर और आतताई हिंदुत्ववादी सत्ता और संस्कृति का डटकर मुकाबला कर रहा है।</p>



<p>दरअसल, ओमप्रकाश वाल्मीकि आधुनिक कबीर हैं। उतने ही फक्कड़, निर्भीक और निर्द्वन्द्व। अपनी रचनाओं के माध्यम से सामन्तों और ब्राह्मणवादियों से दो-दो हाथ करने वाले। सत्ता- संस्कृति के बरक्स खड़ा एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कविता आग उगलती है, जिसकी आत्मकथा ने हिंदू धर्म और जातिवाद की जड़ों को हिला कर रख दिया। दलित जीवन के बदरंग प्रसंगों को रचकर ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदू धर्म के पाखंड को बेपर्दा किया। उनकी कहानियों ने पौराणिक कथाओं की अश्लीलता को नंगा कर दिया। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने उस सामाजिक व्यवस्था का पर्दाफाश किया, जिसमें सदियों से यातनाओं का शिकार दलित पशुओं से भी बदतर जीवन जी रहा था। दलितों के शोषण और दमन पर पलने वाला रक्तपिपासु ब्राह्मणवाद आज ओमप्रकाश वाल्मीकि के साहित्यिक कटघरे में है। उससे हजारों सालों की यातनाओं का हिसाब मांगा जा रहा है।</p>
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		<title>प्रो. रविकांत का लेख- दलित साहित्य के पचास साल</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-prof-ravikants-article-on-fifty-years-of-dalit-literature-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravikant]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 12 Jun 2026 14:30:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलोचना]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>  &#8216;दलितों द्वारा दलितों के लिए लिखा जाने वाला दलित साहित्य दलितों के संघर्ष और चेतना का विमर्श है। दलित विमर्श सिर्फ एक साहित्यिक शैली नहीं है बल्कि यह अखिल भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन है।&#8217; पढ़ें पूरा लेख&#8230; दलित साहित्य मुक्ति का साहित्य है। सदियों से जारी शोषण और अन्याय के खिलाफ खड़े होकर दलित &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-prof-ravikants-article-on-fifty-years-of-dalit-literature-on-adahan-patrika/">प्रो. रविकांत का लेख- दलित साहित्य के पचास साल</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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<h1 class="wp-block-heading"> </h1>



<p><strong>&#8216;दलितों द्वारा दलितों के लिए लिखा जाने वाला दलित साहित्य दलितों के संघर्ष और चेतना का विमर्श है। दलित विमर्श सिर्फ एक साहित्यिक शैली नहीं है बल्कि यह अखिल भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन है।&#8217; पढ़ें पूरा लेख&#8230;</strong></p>



<p>दलित साहित्य मुक्ति का साहित्य है। सदियों से जारी शोषण और अन्याय के खिलाफ खड़े होकर दलित साहित्यकारों ने नकार, प्रतिरोध और आक्रोश को अभिव्यक्त किया। दलित साहित्य में फूलों की कोमलता नहीं, आग की तपिश है। उसमें दैहिक सौंदर्य नहीं भौतिक कुरूपता है, कामुकता नहीं जीवन का उजाड़ और ठूंठपन है। दलित साहित्य में कल्पित स्वर्गलोक की जगह दक्खिन टोले की बजबजाती सच्चाइयां हैं। दलित साहित्य में जीवन का संघर्ष, जाति का दंश, अपमान की यातना और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह है। इस विद्रोह की ज्वाला में दर्जनों हाथ वाले देवता और अवतारवादी ईश्वर जलकर भस्म हो गए। आखिर यह कैसा ईश्वर है जो हीराडोम के शब्दों में, &#8216;हमनी के दुःख भगवनओ न देखताजे, हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।&#8217;1जो ईश्वर ब्राह्मणवादी शोषण और उत्पीड़न को देखकर भी एक अछूत की शिकायत को अनसुनी करता है, उस ईश्वररूपी पाखंड और अंधविश्वास को दलित साहित्यकारों ने उखाड़ फेंका। उसने विवेक, विज्ञान और विकास का मार्ग चुना। संविधान के रास्ते शिक्षा के जरिए सम्मान, स्वाभिमान और संपत्ति हासिल करने के सपने देखे। उसने तोड़ डाली परंपरा और परतंत्रता की बेड़ियां, उजाड़ डाले मंदिर और मठ, खंडित कर डाली मूर्तियां, मिटा दिए पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक के मिथक। समस्त ब्राह्मणवादी बाधाओं को मिटाकर दलित साहित्य ने मनुष्यता का विमर्श खड़ा किया।</p>



<p>मनुवादी व्यवस्था में दलितों को शिक्षा, संपत्ति और शस्त्र से विहीन करके अछूत बना दिया गया। वर्ण व्यवस्था को हिंदू धर्मशास्त्रों- स्मृतियों द्वारा ईश्वरीय बना दिया गया। इस व्यवस्था के कुचक्र को तोड़ने के लिए धर्मशास्त्रों को खारिज करना आवश्यक था। डॉ अंबेडकर ने महाड़ चाबदार तालाब से पानी पीने के आंदोलन के दौरान 25 दिसंबर 1927 को मनुस्मृति का दहन किया। दलित साहित्यकारों ने बाबा साहब के विचारों और संघर्षों को साहित्य में अभिव्यक्ति दी। इंग्लैंड और अमेरिका स्थित दुनिया के दो सबसे मशहूर विश्वविद्यालयों से तालीम हासिल करके भारत लौटे डॉ. अम्बेडकर ने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान दलितों-वंचितों की सामाजिक आज़ादी के लिए लड़ाई छेड़ी। इसके बाद संविधान निर्माता और स्वतंत्र भारत के बतौर कानून मंत्री बाबा साहब ने दलितों, पिछड़ों और महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित किए। वंचितों के मसीहा डॉ. अंबेडकर ने दलितों को शिक्षा की रोशनी दी। दलित साहित्यकारों ने बाबा साहब के सपनों के किरदारों को रचा। गरीबी और अभाव में जीते, पल-पल अपमानित होते ऐसे दलित साहित्य के नायक बनते हैं, जो सवर्ण सामंतवाद और सत्तातंत्र से जूझते हुए तालीम हासिल करते हैं तथा सरकारी नौकरियों में बड़े औहदों पर पहुंचकर अपने समाज के लिए मिसाल बनते हैं। दलित साहित्यकारों के लिए बाबासाहब प्रेरणा ही नहीं पथप्रदर्शक भी हैं। डॉ अम्बेडकर ने साहित्यकारों को संबोधित करते हुए कहा था, &#8220;हमारे जीवन कर्तव्य और संस्कृति की ओर हमारा ध्यान नहीं है। अंतर्मुख होकर विचार करने से हमारे सामने वह भयावह स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कि हमारे जीवन मूल्य और सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने के लिए दलित साहित्यकारों को जागरूक और प्रयत्नशील हो जाना चाहिए। तुम्हारे उपन्यास, कथाओं की सीता, लक्ष्मण रेखा पार करके आगे जा चुकी है। दुर्योधन के दरबार में द्रौपदी का वस्त्रहरण हो रहा है। शकुंतला को दुष्यंत अपना सही परिचय नहीं दे रहा है। इसलिए शकुंतला को वनवास हो रहा है। ऐसी स्थिति में साहित्यकारों का मैं आह्वान करता हूं कि वे विभिन्न साहित्यिक विधाओं के द्वारा उदात्त जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक मूल्यों को रेखांकित करें। अपने लक्ष्य को मर्यादा में मत बांधो, उसे और अधिक विशाल बनने दो। वाणी का विस्तार करो। अपनी लेखनी को केवल अपने प्रश्नों तक सीमित मत रखो। उसे तेजस्वी बनाओ जिससे गांव में फैला अंधकार दूर हो सके। यह मत भूलो कि इस भारत देश में उपेक्षित दलितों का बहुत बड़ा विश्व है। अपनी रचनाओं द्वारा उनकी वेदना को समझकर उनके जीवन को उज्ज्वल बनाने की कोशिश करो। यही मानवता की सच्चाई है।&#8221;</p>



<p>दलितों द्वारा दलितों के लिए लिखा जाने वाला दलित साहित्य दलितों के संघर्ष और चेतना का विमर्श है। दलित विमर्श सिर्फ एक साहित्यिक शैली नहीं है बल्कि यह अखिल भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन है। इसका आरम्भ सर्वप्रथम मराठी में हुआ। ओमप्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में, &#8220;दलित साहित्य का सर्वप्रथम आगाज मराठी में हुआ। डॉ आंबेडकर के मुक्ति आंदोलन ने दलितों में एक नई चेतना पैदा की, जिसके फलस्वरुप दलित साहित्य की रचनात्मकता का उदय हुआ; जो मानवीय सरोकारों की अभिव्यक्ति बना। ऐसा साहित्य जिसमें दलितों की वाणी जो हजारों साल से मूक बनी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षणिक विद्वेष और नारकीय जीवन की दग्धताओं को वहन कर रही थी, मुखर होकर स्वाभिमान और अस्मिता की लड़ाई लड़ने के लिए सामने आकर खड़ी हो गई।&#8221; मराठी में दलित साहित्य के उद्भव पर टिप्पणी करते हुए चर्चित दलित लेखिका विमल थोराट ने लिखा है कि, &#8220;दलित साहित्य का उद्भव मराठी साहित्य में एक साहित्यिक, सामाजिक विद्रोह के रूप में हुआ है। जिसके माध्यम से दलित शोषित समाज का विद्रोह मुखरित हुआ है। जिसे अछूत कहकर सदियों तक मनुष्य जीवन की सभी आवश्यकताओं और सुविधाओं से वंचित रखा गया और जिसे केवल दुख, वेदना, गुलामी, अपमान आंसुओं से भरी जिंदगी बिताने के लिए विवश किया गया। हिंदू धर्म वर्ण-व्यवस्था ने जातियों के लिए कटघरे से निर्मित इस समाज व्यवस्था में उसे वह स्थान दिया, जो गांवों, नगरों के अहातों से दूर था और जहां केवल अंधकार ही अंधकार था। उसे अंधकार जीवन से निकालकर उनके जीवन में रोशनी लाने का कार्य डॉ. अंबेडकर ने किया।&#8221;</p>



<p>&nbsp;मराठी, तमिल, मलयालम, कन्नड़, पंजाबी, बांग्ला से लेकर हिंदी आदि भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य का उत्थान हुआ। पिछले 50 सालों में दलित साहित्य ने अपनी विशिष्ट पहचान ही नहीं बनाई बल्कि आज यह मुख्य धारा का साहित्य है।</p>



<p>1970 के दशक में हिंदी में दलित लेखन की शुरुआत हुई। यह वो दौर था जब हिन्दू मिथकों का वामपंथीकरण हो रहा था। प्रगतिशीलता के नाम पर किसान मजदूर की तो बात हो रही थी, लेकिन जाति के प्रश्न पर सामूहिक चुप्पी थी। दलित साहित्य ने अपनी चीख से इस खामोशी को बेधा। फिर भी शुरुआती दौर में दलित साहित्य को कोई तवज्जो ही नहीं दी गई। तब दलित साहित्यकारों ने प्रगतिशीलों के प्रेरक तुलसीदास और प्रेमचंद पर हमले शुरू किए। उन्हें ब्राह्मणवादी मूल्यों का पोषक और सर्जक बताया। इसके बाद दलित साहित्य की तीखी आलोचना शुरू हुई। दलित साहित्य को घृणा और विद्वेष का साहित्य कहा गया। जबकि सच्चाई यह है कि दलित साहित्य हिंदू वर्णव्यवस्था में निहित नफरत और ऊंच नीच की भावना के नकार का साहित्य है। यह प्रेम और मनुष्यता का साहित्य है।&nbsp;</p>



<p>दलित साहित्य निजी अनुभूति का साहित्य है। सदियों से पीड़ित दलितों की वेदना की अभिव्यक्ति दलित साहित्य में हुई है। गैर दलित इस यातना को कभी नहीं महसूस कर सकते।इसीलिए ज्योतिबा फुले ने कहा था कि &#8216;राख ही जानती है, जलने की पीड़ा। जो सहता है सो कहता है।&#8217; दलित साहित्य में यातना से उपजे दर्द और वेदना की अभिव्यक्ति ही नहीं बल्कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था के प्रति आक्रोश भी है। दलित चेतना इस शोषणकारी व्यवस्था को जलाकर नष्ट करने को उद्धत है। जब जातिगत शोषण के खिलाफ दलित साहित्यकारों ने सवर्ण सामंती जातियों के वर्चस्व के हथकंडों और षड्यंत्रों को उजागर किया तो दलित साहित्य पर जातिवादी होने के आरोप लगाए जाने लगे। असल में, दलितों के शोषण का कारण जाति व्यवस्था है, तब दलित साहित्यकार जाति का समर्थन कैसे कर सकते हैं? दलित साहित्यकार और चिंतक डॉ. एन. सिंह ने ठीक लिखा है कि, &#8220;दलित साहित्य जातिवादी व्यवस्था का घोर विरोधी है, जबकि कुछ साहित्यकार और आलोचक उस पर जातीय वैमनस्य भड़काने और जातिवादी होने के आरोप लगाते हैं। लेकिन समझा जा सकता है कि जिस व्यक्ति ने जाति के कारण शताब्दियों तक अपमान की यातना को झेला हो वह जातिवादी कैसे हो सकता है? जातिवादी वह होगा जिसे अपनी संपूर्ण मूर्खता और अज्ञान के बावजूद जाति के कारण ही सम्मान मिला हो। अतः दलित साहित्य जातिवाद के उच्छेद के लिए सर्वात्मना प्रयत्नशील दृष्टिगोचर होता है।&#8221; वास्तव में, दलित साहित्य स्वतंत्रता, समानता और बंधुता का पक्षधर है। दलित साहित्य लोकतांत्रिक मूल्यों का पोषक और अंततः मानवतावादी है।</p>



<p><strong>&#8211; रविकांत</strong></p>
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		<title>देश बंटवारे का ज़हर चित्रित करता निर्मला भुराड़िया का उपन्यास &#8216;ज़हरखुरानी&#8217;</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-well-known-writer-priyadarshans-full-review-on-adahan-patrika-of-nirmala-bhuradiyas-novel-zaharkhurani-depicting-the-poison-of-partition-of-the-country/</link>
		
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		<pubDate>Sun, 24 May 2026 15:15:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;लेकिन इतनी बड़ी और भयावह घटना पर जो विराट हूक दिखनी चाहिए थी, वह‌ हिंदी के संसार में अदृश्य और अनुपस्थित है। यह कुछ शर्म की बात लगती है कि जब मानव-इतिहास की सबसे त्रासद घटना घट रही थी तो हिंदी के बड़े लेखक उसे दर्ज करना तो दूर, उसे ठीक से देख पाने में &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;लेकिन इतनी बड़ी और भयावह घटना पर जो विराट हूक दिखनी चाहिए थी, वह‌ हिंदी के संसार में अदृश्य और अनुपस्थित है। यह कुछ शर्म की बात लगती है कि जब मानव-इतिहास की सबसे त्रासद घटना घट रही थी तो हिंदी के बड़े लेखक उसे दर्ज करना तो दूर, उसे ठीक से देख पाने में भी असमर्थ थे।&#8217; पढ़ें सुपरिचित लेखक प्रियदर्शन की पूरी समीक्षा&#8230;</strong></p>



<p>भारत-पाक बंटवारा मानवता के इतिहास के सबसे स्याह पन्नों में एक है- सबसे रक्तरंजित- जिसकी कहानी पता नहीं क्यों- हिंदी साहित्य में ढंग से दर्ज नहीं हुई।‌ ले-देकर यशपाल का &#8216;झूठा सच&#8217; इकलौती कृति है जिसमें इस बंटवारे की भयावहता को हम कुछ पढ़‌‌ पाते हैं। इसके अलावा &#8216;तमस&#8217; उस अंधेरे दौर के राजनीतिक छल-कपट को, सांप्रदायिकता के उभार को और उसके आगे पिसती-पिटती कातर मनुष्यता का मार्मिक बयान है। कुछ अन्य कहानियों-उपन्यासों‌ में बंटवारा एक ज़िक्र या संदर्भ की तरह आया है। कृष्णा सोबती के &#8216;गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान तक&#8217; में भी इसकी कुछ तस्वीरें हैं। लेकिन इतनी बड़ी और भयावह घटना पर जो विराट हूक दिखनी चाहिए थी, वह‌ हिंदी के संसार में अदृश्य और अनुपस्थित है। यह कुछ शर्म की बात लगती है कि जब मानव-इतिहास की सबसे त्रासद घटना घट रही थी तो हिंदी के बड़े लेखक उसे दर्ज करना तो दूर, उसे ठीक से देख पाने में भी असमर्थ थे।<br>लेकिन इतिहास शायद स्मृति का पीछा करता रहता है। या स्मृति इतिहास को अपनी जली हुई पीठ पर संभाले रहती है। बीते दिनों निर्मला भुराड़िया का उपन्यास &#8216;ज़हरखुरानी&#8217; पढ़ते हुए उस सिहरन और भयावहता को महसूस करता रहा जो बंटवारे का असली अर्थ समझाने वाली कोई कहानी पैदा कर सकती है। निर्मला भुराड़िया ने बहुत विस्तार से विभाजन के दौर की हिंसा के असली मायने दर्ज किए हैं- अपने पुश्तैनी घर को न छोड़ने की ज़िद, अपनी ज़मीन बचाने के लिए जान देने का जज़्बा, भारत के लगभग नामुमकिन लगते बंटवारे से लेकर पाकिस्तान बनने की हक़ीक़त और इंसान के हिंदू मुसलमान सिख में बदल जाने की वहशत, सियासत और मज़हब के घोल से पैदा जुनून, एक हिंसा से ताक़त और वैधता पाती दूसरी हिंसा, एक नफ़रत से पैदा होती दूसरी नफरत, कटे हुए सिर, बिखरी हुई लाशें,‌औरतों के साथ होने वाली बर्बरता, हिंदू-सिख लाशों से भरी भारत आती ट्रेनें, मुस्लिम लाशों से भरी पाकिस्तान जाती ट्रेनें, जानवरों से भी बदतर जीवन जीने को मजबूर शरणार्थी, उनके कैंपों की नरक जैसी हालत, लगभग असंभव सी समाज-सेवा की कोशिश, पहचान छुपाने और बदलन के लिए कुछ भी कर गुज़रने की मजबूरी, परायों द्वारा लूटी जाती और अपनों द्वारा ठुकराई जाती औरतें, लाशों से पटे कुएं, खेतों में छुपे हत्यारे, लूटपाट का भयावह मंजर, इन सबके बीच और बावजूद एक-दूसरे को संभालने की कोशिश- उपन्यास जैसे पाठक को जकड़े रहता है, अवसन्न छोड़ जाता है।<br>निर्मला भुराड़िया इस बात को बहुत साफ़ ढंग से दर्ज करती हैं कि मज़हब के नाम पर की जाने वाली सियासत किस तरह इंसान को बांटती और तोड़ती चलती है। टकराव बस हिंदू मुसलमान का नहीं है, शिया-सुन्नी का भी है, अहमदिया का भी है, अगड़ी और पिछ़डी जातियों का भी है। वे यह भी देखती हैं कि बुरी तरह टूटने-बिखरने या बिल्कुल बर्बाद हो जाने के बावजूद मनुष्य खड़ा होने की कोशिश करता है, घर बनाता है, दुकान खोलता है और अंततः कहीं बसना चाहता है।<br>उपन्यास शुरू दरअसल बसने की कहानी से ही होता है। मंगल भवन नाम की एक इमारत से जिसमें एक संयुक्त परिवार रहता है। निर्मला बड़ी सूक्ष्मता से इस परिवार के अंतर्विरोधों की कथा भी दर्ज करती हैं- सबकी नज़र में सीधा, सुशील और आकर्षक बना मनोहर अपनी रिश्ते की बहनों के ही यौन शोषण की कोशिश करता है और लड़कियों की मांएं उनसे चुप रहने को ही कहती हैं। ठीक बगल के घर में पहले एक मुस्लिम परिवार और फिर एक सिख परिवार आ बसता है। ये सब बसने की कोशिश में हैं। सबकी पुरानी कथाएं हैं- कहीं से लुट कर, पिट कर, अपनों को गंवा कर एक ठिकाना खोजने की। उपन्यास में इतने सारे किरदार हैं कि कई बार उन्हें भूल‌ जाने का ख़तरा लगता है, लेकिन त्रासदी का एक बड़ा कोलाज इनसे बनता है- भारत-पाक बंटवारे का एक &#8216;गुएर्निका&#8217;, जिसमें फिर भी व्यक्तिगत कहानियां अलग से खुलती चलती हैं। मसलन सिंधी पोहेलाल और उनके परिवार की कहानी, गुरुबख्श और उसके खानदान की कहानी, चांद कौर की कहानी और बच्चे बंता सिंह की बेहद तकलीफ़देह कहानी, मिन्नी और उसके सवालों और उसकी सखियों की कहानी।<br>मिन्नी और उसकी सखियों की कहानी का धागा पकड़ कर निर्मला भुराड़िया उपन्यास को बिल्कुल मौजूदा समय तक ले आई हैं। इनमें आज का पाकिस्तान भी है और हिंदुस्तान भी। लंदन में बसा पाकिस्तानी परिवार हिंदुस्तानियों से रश्क करता है कि भारत में आधुनिकता और उदारता ज़्यादा है।‌ लेकिन बदलता भारत खुद को जिस मज़हबी अनुदारता की नई गर्त की ओर बढ़ता चला आ रहा है, उसकी ओर संकेत करने में लेखिका ने कोई गुरेज किया है। पशुरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा, टीवी चैनलों पर चल रही उन्मादी बहसें, फिर से राजनीति में धर्म के इतिहास का कुत्सित खेल- निर्मला भुराड़िया का यह उपन्यास एक तरह से हमें सावधान करता है कि हम किस राह पर जा रहे हैं।<br>यह सच है कि उपन्यास के इस आख़िरी हिस्से में पत्रकारिता वाली कुछ हड़बड़ी है,‌ लेकिन इस शिकायत के बावजूद यह हमारे समय का बेहद ज़रूरी उपन्यास है। क़ायदे से इसे जितनी चर्चा मिलनी चाहिए थी, मिल नहीं पाई है।</p>



<p><strong>&#8211; प्रियदर्शन</strong></p>



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