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	<title>Roshni Rawat, Author at Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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	<description>साहित्य, विचार और जन आंदोलन</description>
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	<title>Roshni Rawat, Author at Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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		<title>अनुशासन या सरकारी शिकंजा ? क्यों यूपी के विश्वविद्यालयों में ड्रेस कोड लागू करना चाहती है बीजेपी सरकार ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Roshni Rawat]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 04 Jun 2026 08:43:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;मंत्री योगेंद्र उपाध्याय जिस &#8221; सकारात्मकता , समरसता , अनुशासन और संस्कारित माहौल&#8221; की बात कर रहें हैं आखिर उसका क्या अर्थ है ? क्या यह सकारात्मकता और समरसता सबसे पहले उन राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखनी चाहिए जहाँ से &#8221; गोली मारो सालों को &#8221; जैसे हिंसक और सांप्रदायिक नारे लगाये जाते हैं ?&#8217; &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;मंत्री योगेंद्र उपाध्याय जिस &#8221; सकारात्मकता , समरसता , अनुशासन और संस्कारित माहौल&#8221; की बात कर रहें हैं आखिर उसका क्या अर्थ है ? क्या यह सकारात्मकता और समरसता सबसे पहले उन राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखनी चाहिए जहाँ से &#8221; गोली मारो सालों को &#8221; जैसे हिंसक और सांप्रदायिक नारे लगाये जाते हैं ?&#8217; पढ़ें रोशनी रावत का पूरा आलेख…</strong></p>



<p>बीते दिनों उत्तर प्रदेश शासन‌ की ओर से एक कठोर और मनमाना आदेश जारी किया गया। 20 मई को एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अनिवार्य रूप से ड्रेस कोड लागू करने की बात कही। जिसके तुरंत बाद उ०प्र० उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने &#8221; गुणवत्तापरक शिक्षा, सकारात्मक, अनुशासित और संस्कारित माहौल &#8221; का हवाला देते हुए अनिवार्य ड्रेस कोड लागू करने का फरमान जारी कर दिया । बीजेपी सरकार के इस आदेश के बाद विपक्षी पार्टियों की तीखी प्रतिक्रिया देखनी मिली । हालांकि प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों पर जितनी चालाकी से सरकार शिकंजा कसने की कोशिश कर रही है, उसके विरोध में न तो विपक्षी पार्टियां ही उतरीं या न छात्र &#8211; संगठन । गौरतलब है कि यह आदेश ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने में एक साल से भी कम समय बचा है ।</p>



<p>दरअसल उच्च शिक्षण संस्थानों में अनिवार्य रूप से ड्रेस कोड लागू कर देना जितना सरल दिखता है उतना है नहीं। यह स्पष्ट रूप से  संस्थानों को नियंत्रित करने, युवाओं की अभिव्यक्ति की आजादी छीनने और सांस्कृतिक विवधता को खत्म करने की साजिश है। यूनिवर्सिटीज़ और कॉलेज हमेशा‌ से देश के सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के गढ़ रहे हैं। औपनिवेशिक काल से लेकर स्वातंत्र्योत्तर भारत की राजनीति में उच्च शिक्षण संस्थानों के युवाओं का शासन-प्रशासन की नीतियों के समर्थन और विरोध-प्रदर्शनों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप रहा‌ है। देश के सभी वर्तमान राजनीतिक दलों में एक हिस्सा‌ उन नेताओं का भी है जो इन्हीं कॉलेजों से पॉलिटिक्स करते हुए मंत्रालयों की गद्दी तक पहुंचे हैं।</p>



<p>ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अनिवार्य ड्रेस कोड सामाजिक- राजनीतिक चेतना से युक्त युवाओं को गुड-बॉय/गुड गर्ल बनाकर उन्हें बौद्धिक रूप से कमजोर करने की साजिश है? मंत्री योगेंद्र उपाध्याय जिस &#8221; सकारात्मकता , समरसता , अनुशासन और संस्कारित माहौल&#8221; की बात कर रहें हैं आखिर उसका क्या अर्थ है ? क्या यह सकारात्मकता और समरसता सबसे पहले उन राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखनी चाहिए जहाँ से &#8221; गोली मारो सालों को &#8221; जैसे हिंसक और सांप्रदायिक नारे लगाये जाते हैं ? और इस &#8220;अनुशासन&#8221; शब्द की क्या परिभाषा होगी? यह &#8221; संस्कारित माहौल &#8221; क्या हो सकता है ? क्या अब युवाओं की शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ बच्चों की तरह पढ़ना और डिग्री लेकर कहीं नौकरी पाना रह जाएगा ? क्या उनके आलोचनात्मक विचारों को क्षीण कर उन्हें &#8220;अनुशासित छात्र&#8221; भर बना दिया जाएगा , जिनके पास न तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी ,‌न प्रशासनिक नीतियों की आलोचना की आजादी । क्योंकि &#8220;सकरात्मकता&#8221; और &#8220;अनुशासन&#8221; जैसे सब्जेक्टिव शब्दों की कोई सर्वमान्य और सर्वव्यापक परिभाषा तो‌ है‌ नहीं। ऐसे में यह कैसे तय होगा कि छात्रों के लिए क्या अनुशासन है क्या नहीं? क्या प्रशासनिक नीतियों का विरोध अनुशासनहीनता में आयेगा कि‌ नहीं? इन प्रश्नों का‌ उत्तर कौन देगा?</p>



<p>तार्किक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो उच्च शिक्षण संस्थानों में  संरचनात्मक सुधारों, प्राध्यापकों के रिक्त पदों की भर्ती, कॉलेजों में लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का उद्देश्य पूरा हो‌ सकता है। इसके लिए ड्रेस कोड लागू कर यूनिवर्सिटीज और कॉलेज-विशेष के छात्रों को अलग से चिह्नित करने की आवश्यकता नहीं थी। देश-विदेश में कुछ गिने-चुने प्रोफेशनल कोर्सेज को छोड़कर कहीं भी इस तरह का ड्रेस कोड लागू नहीं है । ऐसे में जब  बीजेपी के शीर्ष नेता भारत के विश्वविद्यालयों की तुलना अमेरिका और ब्रिटेन के आधुनिक , लोकतांत्रिक, स्वतंत्र,  चेतनायुक्त और प्रगतिशील विश्वविद्यालयों से करते‌ हैं और देश‌ के विश्वविद्यालयों को उन जैसा‌ बनाने का वादा‌ करते हैं , तो यह सिर्फ एक झूठ और भ्रामक प्रचार भर लगता है।</p>



<p><strong>-रोशनी रावत</strong>,</p>



<p>लेखिका लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं। </p>



<p></p>
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		<title>जिस राजघराने में हुआ जाति के कारण अपमान, वर्षों बाद उसी महल में हुआ राजसी ठाठ के साथ सम्मान…कौन थे जोधपुर के &#8220;भंगी जाति के उपकुलपति&#8221; ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/in-the-royal-family-where-insult-happened-due-to-caste-years-later-respect-was-given-with-royal-splendor-in-the-same-palace-who-was-jodhpur-s-vice-chancellor-from-the-bhangi-caste-read-roshni-rawat-s/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Roshni Rawat]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 May 2026 15:49:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>राजस्थान की जोधपुर रियासत में कभी एक दलित बच्चे की माँ को उसकी जाति के कारण अपमान सहना पड़ा था। वक्त ने करवट ली और वर्षों बाद उसी रियासत की धरती पर उस बच्चे का राजसी सम्मान के साथ स्वागत हुआ। यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी प्रतीत होती है, लेकिन यह एक जीवंत सच &#8230;</p>
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<p>राजस्थान की जोधपुर रियासत में कभी एक दलित बच्चे की माँ को उसकी जाति के कारण अपमान सहना पड़ा था। वक्त ने करवट ली और वर्षों बाद उसी रियासत की धरती पर उस बच्चे का राजसी सम्मान के साथ स्वागत हुआ। यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी प्रतीत होती है, लेकिन यह एक जीवंत सच है—उस दलित लेखक के जीवन का, जिसने अभाव, भेदभाव और संघर्षों के बावजूद हार नहीं मानी। अपने साहस, प्रतिभा, जिजीविषा और संकल्प-शक्ति के बल पर उन्होंने न केवल समाज में अलग पहचान बनाई, बल्कि उन कठोरतम परिस्थितियों को भी बदलकर रख दिया, जिन्होंने कभी उन्हें और उनके परिवार को अपमानित किया था.<br>वह दलित लेखक थे -श्याम लाल जैदिया! जिन्होंने अपनी आत्मकथा <strong>&#8216;एक भंगी कुलपति की अनकही कहानी&#8217;</strong> में अपने नाटकीय जीवन के इस अद्भुत प्रसंग का बेहद मार्मिकता से उल्लेख किया है।</p>



<p><br>अपनी आत्मकथा में श्याम लाल जैदिया बताते हैं कि राजसी रियासतों में भंगी जाति के लोगों की स्थिति बहुत दुःखद थी। हर भंगी को जोधपुर की गलियों से गुजरते समय &#8216;पाइस&#8217; शब्द चिल्लाना पड़ता था. &#8216;पाइस&#8217; का अर्थ है दूरी रखना । वे यह भी बताते हैं कि उस दौर में अछूत समझे जाने वाले व्यक्तियों को गलियों में स्वतंत्र घूमने की आजादी तक नहीं थी। भंगी जाति के व्यक्ति अपने राजा को देख भी नहीं सकते थे क्योंकि वे नीच जाति के माने जाते थे।</p>



<p><br>अपने जीवन के एक अपमानजनक प्रसंग को याद करते हुए वे बताते हैं कि &#8216; एक बार मेरी मां को सफाई कार्य हेतु किले में बुलाया गया। चूंकि वे नगरपालिका की कर्मचारी थीं, उन्हें इस कार्य हेतु वहां जाना था। मैं भी अपनी मां के साथ किले पर गया। कार्य पूरा करने के पश्चात जब हम किले से वापस लौट रहे थे तो एक घटना घटी जिससे मुझे एक सबक मिला। अचानक कुछ लोगों के साथ महाराजा वहां आ गए। कुछ कट्टरपंथी लोगों ने मेरी मां को पहचान लिया तथा वे हमें देख कर क्रोधित हो गए। वे जोर से चिल्लाने लगे, &#8216;पीछे हटो&#8217;, &#8216;यहां से तुरंत भाग जाओ&#8217;।मेरी मां आश्चर्य चकित रह गई। वे रास्ते से हटकर एक एकांत स्थान की ओर चली गईं।&#8217;</p>



<p>ऐसी अपमानजनक और भेदभावपूर्ण परिस्थितियों के बाद‌ भी श्याम जैदिया जी ने हार नहीं मानी और अपने में जीवन‌ में बड़ा मुकाम हासिल किया । अपनी आत्मकथा में वे बताते हैं कि सन् 1996 में वह जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के उपकुलपति बने। इस अवसर पर जोधपुर के महाराजा गजसिंह ने उन्हें शुभकामना संदेश भेजा था।<br>इस वर्ष महाराजा जोधपुर के जन्मदिन के शुभ अवसर पर उन्होंने जैदिया जी को उम्मेद भवन में रात्रि भोजन में सम्मिलित होने का आमंत्रण‌ भी भेजा था।</p>



<p><br>वे कहते हैं कि &#8216;मैं महाराजा साहब के जन्मदिन समारोह में सम्मिलित होने में हिचकिचा रहा था क्योंकि मैंने सोचा कि चूंकि मैं एक अछूत भंगी जाति का व्यक्ति हूं, अतः लोग मेरे साथ किस प्रकार का व्यवहार करेंगे। इस बात की शंका मेरे मस्तिष्क में थी क्योंकि पार्टी में राजपरिवारों के बड़े-बड़े लोग शामिल होंगे।&#8217;<br>अपने जीवन‌ के इस अद्भुत अनुभव का वर्णन करते हुए वे बताते हैं कि जब वे उम्मेद भवन महाराजा से मिलने पहुंचे तो &#8216;मैंने महाराजा साहब को बधाई दी तथा उनके दीर्घायु होने एवं सुखी जीवन की कामना की। महाराजा गजसिंह ने मुस्कराते हुए मेरा स्वागत किया तथा मेरे साथ हाथ मिलाया। प्रथम बार मैं महाराजा साहब से मिला था। वे देखने में सुंदर, आकर्षक, उदार एवं विनम्र थे और जन साधारण में बहुत लोकप्रिय थे।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="1024" height="819" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-1-1024x819.jpeg" alt="" class="wp-image-357" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-1-1024x819.jpeg 1024w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-1-300x240.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-1-768x615.jpeg 768w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-1.jpeg 1402w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p><br>मेरी उत्सुकता तब अधिक जागृत हुई जब वे स्वयं केंद्रीय कक्ष (सेंट्रल हॉल) तक मेरे साथ-साथ आए और जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के एक कुलपति के रूप में मेरा परिचय राजपरिवार के सदस्यों से करवाया।&#8217;<br>श्याम जैदिया जी आगे लिखते हैं कि &#8216; पर्याप्त उत्साह के साथ समारोह आरंभ हुआ।शाही दम्पत्ति की शुभकामना हेतु अनेक लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए। समारोह में सरकारी अधिकारी, जोधपुर तथा जयपुर के अभिजन समाज के सदस्य उपस्थित थे। महाराजा साहब ने स्वयं अपने लोगों को निर्देश दिया कि वे मेरा विशेष रूप से ख्याल रखें तथा वे स्वयं मेरे आवभगत का पूरा ख्याल रख रहे थे। मेहमानों को विभिन्न प्रकार के पेय एवं मदिरा प्रस्तुत की जा रही थीं। मैंने मात्र साधारण पेय स्वीकार किया।विभिन्न प्रकार के मांसाहारी भोजन जैसे मछली, मटन, चिकन आदि इतने अच्छे थे कि मुझे पर्याप्त पसंद आए। मैं महाराजा साहब के अपने प्रति व्यवहार एवं स्नेह से पर्याप्त आश्चर्यचकित था।&#8217;</p>



<p>वे कहते हैं‌ कि कुछ दिनों के बाद उन्होंने अपनी वृद्ध मां को जब सारी घटना सुनाई कि मैं महाराजा गजसिंह जी से उम्मेद भवन में मिलने गया था. (जहां मेरी मां ने भवन के निर्माण कार्य में, श्रमिक के रूप में कार्य किया था) तथा जोधपुर के अभिजात लोगों के साथ रात्रिभोज किया था। चिंता एवं उत्सुकतावश उन्होंने तुरंत मुझसे यह प्रश्न पूछा कि क्या मैं महाराजा साहब से मिला? उनसे हाथ मिलाया? तथा उनके साथ भोजन किया? मेरा उत्तर हां में था। तो भी उनको विश्वास नहीं हुआ। चूंकि उनको समाज के निम्न अछूतों में निम्नतम सोपान पर होने का कटु अनुभव स्वयं प्राप्त है, अतः वे इतिहास एवं समाज का जड़ से आकलन करने की बेहतर स्थिति में हैं।</p>



<p>श्याम जैदिया जी के महाराजा साहब से मिलने पर उनकी मां इतनी अधिक प्रसन्न हुई कि उन्होंने अपने हाथों को उनके चेहरे तथा सर पर रखा. उनकी मां ने उन्हें सुखी, संपन्न एवं दीर्घायु होने की प्रार्थना की। उनके लिए यह एक महान उपलब्धि थी क्योंकि उनका पुत्र मारवाड़ राज्य में प्रथम अछूत भंगी था जिसे दरबार साहब के हाथों इस प्रकार का सम्मान प्राप्त हुआ था।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="1024" height="819" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-2-1024x819.jpeg" alt="" class="wp-image-358" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-2-1024x819.jpeg 1024w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-2-300x240.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-2-768x615.jpeg 768w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-2.jpeg 1402w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p>श्याम लाल जैदिया अपने जीवन के इस अविस्मरणीय पल के विषय में कहते हैं कि &#8216;मैं अपने अतीत को याद कर रहा था, जब मैं तथा मेरी मां मेहरानगढ़ किले से निकाले गए थे। अनेक कठिनाइयां सही थीं तथा अछूत होने के नाते लोगों की गालियां बर्दाश्त की थीं। उसी अछूत भंगी युवक का एक कुलपति के रूप में उसी किले में, उसी राजघराने के द्वारा सम्मान किया जा रहा था।यह मेरे जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि थी जो दीर्घकाल तक सुखद रूप में मेरे स्मरण पटल पर रहेगी।&#8217;</p>



<p><strong>-रोशनी रावत, लेखिका लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं.</strong></p>



<p></p>
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		<title>हम! युद्ध से बचे हुए लोग</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/read-young-writer-roshni-rawats-full-poem-on-adahan-patrika-we-the-people-who-survived-the-war/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Roshni Rawat]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 May 2026 07:34:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>युद्ध में मारे गये लोगअब कभी वापस नहीं आयेंगे,न ही जीवित हो पायेंगे वे बच्चेजो दफ़्न हो चुके हैंइमारतों के ध्वंसावशेषों के नीचे। अभी तो देखनी शुरू की थी उन्होंने यह रंग-बिरंगी दुनियाअपनी चमकीली आंखों से,बस अभी ही तो सीखा था उन्होंने चलनाफिर धीरे-धीरे दौड़ना,फूलों, तितलियों, गलियों में घूमते कुत्तेछतों पर फुदकती चिड़ियों से खेलना,वे &#8230;</p>
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<p>युद्ध में मारे गये लोग<br>अब कभी वापस नहीं आयेंगे,<br>न ही जीवित हो पायेंगे वे बच्चे<br>जो दफ़्न हो चुके हैं<br>इमारतों के ध्वंसावशेषों के नीचे।</p>



<p>अभी तो देखनी शुरू की थी उन्होंने यह रंग-बिरंगी दुनिया<br>अपनी चमकीली आंखों से,<br>बस अभी ही तो सीखा था उन्होंने चलना<br>फिर धीरे-धीरे दौड़ना,<br>फूलों, तितलियों, गलियों में घूमते कुत्ते<br>छतों पर फुदकती चिड़ियों से खेलना,<br>वे अपने नन्हें पैरों से नाप देना चाहते थे<br>यह पूरी धरती<br>और छोटी-सी मुट्ठी में भर लेना चाहते थे<br>यह पूरा आकाश ।<br>नहीं! वे अभी ना-वाकिफ़ थे<br>तुम्हारी स्याह दुनिया से,<br>जिसमें है सिर्फ युद्ध, सीजफायर, कन्वेंशन और &#8220;पीस ऑर्गनाइजेशन&#8221;<br>नहीं ! वे बच्चे अभी नहीं जानते थे क्या होते हैं परमाणु बम, मिसाइलें, फाइटर जेट और ऑयल रिज़र्व,<br>नहीं! उन्होंने अभी नहीं जानी थी धर्म, नस्ल और राष्ट्रीयता की तुम्हारी खोखली और मनुष्यता-विरोधी अवधारणाएं,<br>वे तो जानते थे सिर्फ<br>यह धरती, यह आकाश और<br>अपनी मां का आंचल !</p>



<p>युद्धोन्मत सत्ताधीशों के ऐलान पर<br>वे लोग जो भेजे गये थे युद्धों पर<br>धर्म और राष्ट्र बचाने के नाम पर<br>दूसरी धरती पर बम बरसाने के लिए,<br>वे तो करना चाहते थे प्रेम<br>धर्म, नस्ल और राष्ट्र की सीमाओं से जाकर परे,<br>वे तो बरसाना चाहते थे फूल हर धरती पर ।<br>और वे जो वापस लौटे हैं<br>भीषण युद्ध के बाद,<br>अपनी देह के चीथड़े लिए<br>देखकर स्तब्ध हैं<br>लहूलुहान धरती पर सड़ती-गंधाती हजारों लाशों पर<br>क्रूर हंसी हंसते हुए<br>अपने-अपने हुक्मरानों का एक मंच पर आकर हाथ मिलाना<br>और मुस्कुराते हुए जारी करना<br>&#8220;शांति का संयुक्त वक्तव्य &#8220;।</p>



<p>इसलिए हम<br>युद्ध में बचे हुए,<br>युद्ध से बचे हुए लोग<br>दुनिया के सभी हुक्मरानों से<br>विद्रोह करते हैं ,<br>हम विरोध करते हैं<br>तुम्हारी युद्ध-उ‌द्घोषणाओं का, जिसने पाटी धरती मनुष्यों की लाशों से<br>रक्त-रंजित की नदियां और रौंद डाली सभ्यताएं !<br>हम विरोध करते हैं<br>तुम्हारे साम्राज्यवादी, कट्टरपंथी, अंध-राष्ट्रवादी जुलूसों का,<br>जिसमें नंगी की गई औरतें<br>शत्रु देशों की,<br>और बच्चियों से हुए बलात्कार !<br>हम विद्रोह करते हैं क़ातिल हुक्मरानों !<br>तुम्हारी बनाई दुनिया से,<br>तुम्हारी बनाई व्यवस्था से,<br>तुम्हारी हिंसक नीतियों से,<br>तुम्हारी झूठी शांति-वार्ताओं से<br>हम विद्रोह करते हैं !<br>हम विद्रोह करते हैं !</p>



<p>&#8211;<strong>रोशनी रावत</strong></p>



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