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	<title>Roshni Rawat, Author at Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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	<description>साहित्य, विचार और जन आंदोलन</description>
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	<title>Roshni Rawat, Author at Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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		<title>क्या रामायण के राम-रावण युद्ध के पीछे था ब्राह्मण और बौद्ध धम्म का संघर्ष ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Roshni Rawat]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Oct 2026 13:54:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;ऐसे में वे क्या कारण थे कि बाद की कथाओं में रावण का वीभत्स चित्रण किया गया ? क्या इसका कारण राम को दैवीय आलोक से आवृत्त कर रावण को एक निकृष्ट व्यक्ति के रूप में चित्रित कर आम-जनमानस में उसके प्रति घृणा भरना था ?&#8217; पढ़ें पूरा आलेख&#8230; लेखक क्या रावण बौद्ध धर्मानुयायी था &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;ऐसे में वे क्या कारण थे कि बाद की कथाओं में रावण का वीभत्स चित्रण किया गया ? क्या इसका कारण राम को दैवीय आलोक से आवृत्त कर रावण को एक निकृष्ट व्यक्ति के रूप में चित्रित कर आम-जनमानस में उसके प्रति घृणा भरना था ?&#8217; पढ़ें पूरा आलेख&#8230;</strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignleft size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="412" height="551" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-19-at-12.28.29-PM-edited.jpeg" alt="लेखक" class="wp-image-719" style="aspect-ratio:0.782130490868355;width:96px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-19-at-12.28.29-PM-edited.jpeg 412w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-19-at-12.28.29-PM-edited-224x300.jpeg 224w" sizes="(max-width: 412px) 100vw, 412px" /><figcaption class="wp-element-caption">लेखक</figcaption></figure>
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<p class="wp-block-paragraph">क्या रावण बौद्ध धर्मानुयायी था ? क्या रामायण के राम और रावण का युद्ध देव-दानवों का धर्मयुद्ध नहीं अपितु ब्राह्मण धर्म और बौद्ध धम्म का संघर्ष था ? क्या राम ब्राह्मण धर्म की रक्षा करने वाले एक क्षत्रिय राजा थे और रावण एक अनार्य राजा? क्या पुष्यमित्र शुंग द्वारा किये गये बौद्धों के नरसंहार के ट्रेसेज़ रामायण कथा में खोजे जा सकते हैं ? भारत के पौराणिक साहित्य में उपस्थित ऐसे तमाम मिथकों/कथाओं को आज दलित विमर्श ने एक बिल्कुल अलग, नया और क्रांतिकारी दृष्टिकोण दिया है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">हिंदी दलित विमर्श में रामायण कथा को इस दृष्टिकोण से पहलेपहल प्रस्तुत करने वाले विचारक सी.पी. जिज्ञासु थे. 1959 में प्रकाशित अपनी पुस्तक &#8216; रावण और उसकी लंका &#8216; में वे बताते हैं कि वाल्मीकि रामायण में ऐसा कहीं जिक्र नहीं है कि रावण के दस शीश थे , या उसके सिर पर पशुओं जैसे सींग थे या वह हिंसक था. बल्कि उसमें रावण को कुशल नीतिज्ञ, परम विद्वान और सभ्य बताया गया है.तो ऐसे में वे क्या कारण थे कि  बाद की कथाओं में रावण का वीभत्स चित्रण किया गया ? क्या इसका कारण राम को दैवीय आलोक से आवृत्त कर रावण को एक निकृष्ट व्यक्ति के रूप में चित्रित कर आम-जनमानस में उसके प्रति घृणा भरना था ?</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large is-resized"><img decoding="async" width="1024" height="559" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM-1024x559.jpeg" alt="" class="wp-image-717" style="aspect-ratio:1.8318737860769414;width:443px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM-1024x559.jpeg 1024w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM-300x164.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM-766x418.jpeg 766w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.12.24-PM.jpeg 1408w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">रामायण कथा और अन्य मिथकों में बार-बार ऐसे प्रसंग आते हैं कि राक्षस ब्राह्मणों के यज्ञ में बाधा पहुंचाते थे.प्राचीन इतिहास के अध्ययनों से पता चलता है कि उस काल‌ में यज्ञों में बलि चढ़ाई जाती थी, आज भी बंगाल‌ सहित कई राज्यों‌ में आराध्य देव के सामने बलि चढ़ाने की परंपरा है.वहीं दूसरी तरफ बौद्ध धर्म में हिंसा वर्जित है. बौद्ध धर्मानुयायी सम्राट अशोक ने अपने शिलालेख में पशुबलि का निषेध किया था. क्या यही कारण था कि उस समय बौद्ध प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा ब्राह्मणों के यज्ञ-हवनों को रोका जाता रहा हो , जिसके प्रतिशोध में ब्राह्मण-वर्ग ने उन्हें अपने मिथकों में राक्षसों की संज्ञा दी ? पेरियार रामास्वामी अपनी प्रसिद्ध‌ किताब &#8216; ट्रू रीडिंग ऑफ रामायणा&#8217; में इस संदर्भ में विस्तार में बात करते हैं. आचार्य नरेंद्र देव के &#8216; बौद्ध धर्म दर्शन&#8217; में भी &#8216;लंकावतार सूत्र&#8217; का उल्लेख मिलता है , जिसके अनुसार लंकापति रावण ने बुद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण की थी.</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large is-resized"><img decoding="async" width="1024" height="559" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1-1024x559.jpeg" alt="" class="wp-image-718" style="aspect-ratio:1.8318737860769414;width:451px;height:auto" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1-1024x559.jpeg 1024w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1-300x164.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1-766x418.jpeg 766w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/10/WhatsApp-Image-2026-10-20-at-7.13.06-PM-1.jpeg 1408w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>
</div>


<p class="wp-block-paragraph">एक थ्योरी यह भी है जिसके अनुसार रावण शिव‌ का परम उपासक था. और क्योंकि शिव‌ अनार्यों के देवता थे ऐसे में रावण अनार्यों का राजा था या स्वयं भी अनार्य था. ब्राह्मण धर्म के इतिहास में आर्य-अनार्य संघर्ष भी बहुत प्रचलित रहा है. कुल मिलाकर ऐसा प्रतीत होता है कि रावण का धर्म ब्राह्मण-धर्म नहीं था. यही कारण है ब्राह्मण धर्म के प्रतिनिधि राम उसे चुनौती देते हैं और उसे मार डालते हैं.</p>



<p class="wp-block-paragraph">इन तमाम कथाओं से एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट होती है कि हर कथा , हर मिथक के पीछे इतिहास में घटित घटनाएं होती हैं. ये घटनाएं एक-दूसरे से यथार्थ और कल्पना के मेल से संबद्ध होती हैं. इसी यथार्थ और कल्पना के मेल से मिथकों की रचनाएं होती हैं जिसके पीछे उसे रचने वाले वर्ग का एक खास दृष्टिकोण होता है. इस दृष्टिकोण में रचयिता के अपने विचार और तर्क ऐसे घुले-मिले होते हैं कि वे आम पाठक पर अपनी दृष्टि का प्रभाव तो पूरा डालते हैं पर पाठक उसकी मूल दृष्टि को समझ ही नहीं पाता. अभी तक हम रावण को उसी दृष्टि से देखने के आदी रहे हैं जो सदियों से &#8216;सवर्ण शिक्षा-पद्धति&#8217; के अनुकूल रही है. आज के समय में दलित चिंतकों ने भारतीय पौराणिक कथाओं और मिथकों को साक्ष्यों सहित नये दृष्टिकोण से प्रस्तुत करके धर्म, साहित्य और इतिहास दर्शन में एक नई क्रान्ति का आगाज़ कर दिया है.</p>



<ul class="wp-block-list">
<li><strong>रोशनी रावत</strong></li>
</ul>
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		<title>स्त्रीद्वेषी समाज का अंतिम हथियार है चरित्र-हनन!</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/character-assassination-is-the-last-weapon-of-a-misogynistic-society-article-by-roshni-rawat/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Roshni Rawat]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Oct 2026 07:18:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>‘नेहा सिंह राठौर के साथ जो हुआ वह न‌ सिर्फ हमारे समाज की गंदी मानसिकता को उजागर करता है बल्कि इस समय पतनोन्मुख मुख्यधारा की पत्रकारिता के स्त्री-विरोधी चरित्र का भी पर्दाफाश करता है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी स्त्री के साथ ऐसा हुआ है.’ पढ़ें पूरा आलेख… पितृसत्तावादी समाज को जब &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>‘नेहा सिंह राठौर के साथ जो हुआ वह न‌ सिर्फ हमारे समाज की गंदी मानसिकता को उजागर करता है बल्कि इस समय पतनोन्मुख मुख्यधारा की पत्रकारिता के स्त्री-विरोधी चरित्र का भी पर्दाफाश करता है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी स्त्री के साथ ऐसा हुआ है.’ पढ़ें पूरा आलेख…</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">पितृसत्तावादी समाज को जब एक बेखौफ स्त्री चुनौती देती है , तब उसे चुप कराने की हर संभव कोशिशों के बाद समाज का अंतिम हथियार उस स्त्री का चरित्र-हनन होता है. हालही में प्रसिद्ध लोक गायिका और राजनीतिक व्यंग्यकार नेहा‌ सिंह राठौर के साथ भी यही हुआ जब देश के एक बड़े मीडिया चैनल ने नीचता की सारी हदें पार करते हुए उनके विषय में सेक्स रैकेट चलाने जैसी भ्रामक खबर चलाई. नेहा सिंह राठौर की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद सोशल मीडिया पर दो-तीन दिन जमकर हंगामा मचा. और भले उस मीडिया चैनल ने अब नेहा से माफी मांग ली हो पर एक प्रश्न ज्यों का त्यों है कि आखिर कब तक समाज में स्त्रियों को अपनी हक की आवाज़ उठाने के बदले ऐसे चरित्र-हनन सहने पड़ेंगे? इस प्रश्न की जटिलता इसी से समझी जा सकती है कि जब नेहा जैसी जानी-मानी सोशल मीडिया इंफ्ल्यूएंसर का ऐसा चरित्र-हनन हो सकता है,‌ तब उन स्त्रियों की क्या स्थिति होगी जो सिर्फ अपने परिवार-गली-मुहल्ले और गांव-शहर तक सीमित है ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">समय बदला , समाज बदला , विचार बदले और तकनीकी बदली पर एक चीज़ कॉन्स्टेंट रही &#8211; स्त्रियों का चरित्र हनन! कभी उन्नीसवीं शताब्दी में स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखने के लिए अफ़वाहें उड़ाई जातीं थीं कि पढ़ी-लिखी स्त्रियां अपने पति को पशु बना कर अपना गुलाम बना लेती हैं. आज एक स्वतंत्र महिला को कभी वेश्या तो कभी इससे मिलती-जुलती ही कोई उपमा या विशेषण देकर चरित्र-हनन किया जाता है.</p>



<p class="wp-block-paragraph">वैसे भी हमारे देश में स्त्रियों का चरित्र-हनन कोई नयी बात नहीं है. सीता से लेकर मीरा तक कोई स्त्री इससे बच नहीं सकी. आधुनिक युग में भी अस्सी के दशक के बाद शुरु हुए स्त्री-विमर्श को &#8216; देह-विमर्श&#8217; का नाम दे डाला गया और इन लेखिकाओं को भी कभी &#8216;कुलटा&#8217; तो कभी &#8216;बदचलन&#8217; तो कभी ऐसे ही कुछ और शब्दों से नवाज़ा गया. कुल मिलाकार हमारा समाज कभी स्त्रियों का अंतर्मन समझ ही नहीं पाया, न उसने समझने की कोशिश की, उसे सिर्फ देह से मतलब था , उसे वही दिखी , उसी पर छींटाकशी भी की गई, उसी से प्रेम भी किया गया.</p>



<p class="wp-block-paragraph">बहरहाल , नेहा सिंह राठौर के साथ जो हुआ वह न‌ सिर्फ हमारे समाज की गंदी मानसिकता को उजागर करता है बल्कि इस समय पतनोन्मुख मुख्यधारा की पत्रकारिता के स्त्री-विरोधी चरित्र का भी पर्दाफाश करता है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी स्त्री के साथ ऐसा हुआ है. इससे पहले जबसे आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा अपनी राजनीतिक छवि के साथ लाइमलाइट में आई हैं , उनके ऊपर पर अश्लील कमेंट करने वालों की सोशल मीडिया पर बाढ़ आ गई है. बस फर्क इतना है कि नेहा राठौर के साथ यह घटिया हरकत करने वाला एक मीडिया संस्थान है जबकि नेहा बोरा पर व्यक्तिगत रूप से लोग कीचड़ उछालते रहते है. दरअसल हमारे समाज में यह इतना नॉर्मलाइज हो गया कि शायद लोगों की कॉन्शियसनेस को यह हिट ही नहीं करता है. इसका सीधा कारण यह है कि इस देश का पितृसत्तावादी समाज हमेशा से स्त्री-द्वेषी रहा है. इसलिए ऐसी कोई घटना उसे भीतर से झकझोर नहीं पाती.</p>



<p class="wp-block-paragraph">जब-जब समाज  में कोई सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक या वैज्ञानिक परिवर्तन हुआ है , हम पाते हैं कि इसके दुष्प्रभावों में सबसे ज्यादा वल्नरेबल स्त्रियां ही रही हैं. इंटरनेट की लॉन्चिंग के बाद सोशल-मीडिया पर सबसे ज्यादा महिलाएं ही हिंसा की शिकार रही हैं. चाहे पिछले कुछ वर्षों में फेक आईडी बनाना हो या अब डीपफेक के इस्तेमाल‌ से फेक वीडियो वायरल करना. कहना ही‌ होगा कि इस‌ समय स्त्रियों के सामने दोहरी‌ चुनौती है. एक तरफ जहां हमारी जेन-जी लड़कियां सत्ता से लेकर साहित्य और समाज तक हर मोर्चे पर  खड़ी स्त्री-विरोधी ताकतों को डट कर चुनौती दे रहीं हैं वहीं दूसरी तरफ निजी जिंदगी के साथ-साथ सोशल मीडिया पर होने वाले ऐसे चरित्र-हनन को लेकर भी सशंकित, सतर्क और चिंतित हैं.</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>-रोशनी रावत</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>अनुशासन या सरकारी शिकंजा ? क्यों यूपी के विश्वविद्यालयों में ड्रेस कोड लागू करना चाहती है बीजेपी सरकार ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/discipline-or-government-clampdown-why-does-the-bjp-government-want-to-implement-dress-code-in-up-universities-read-roshni-rawats-full-article-on-adahan-patriya/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Roshni Rawat]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 04 Jun 2026 08:43:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विचार-विमर्श]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;मंत्री योगेंद्र उपाध्याय जिस &#8221; सकारात्मकता , समरसता , अनुशासन और संस्कारित माहौल&#8221; की बात कर रहें हैं आखिर उसका क्या अर्थ है ? क्या यह सकारात्मकता और समरसता सबसे पहले उन राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखनी चाहिए जहाँ से &#8221; गोली मारो सालों को &#8221; जैसे हिंसक और सांप्रदायिक नारे लगाये जाते हैं ?&#8217; &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>&#8216;मंत्री योगेंद्र उपाध्याय जिस &#8221; सकारात्मकता , समरसता , अनुशासन और संस्कारित माहौल&#8221; की बात कर रहें हैं आखिर उसका क्या अर्थ है ? क्या यह सकारात्मकता और समरसता सबसे पहले उन राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखनी चाहिए जहाँ से &#8221; गोली मारो सालों को &#8221; जैसे हिंसक और सांप्रदायिक नारे लगाये जाते हैं ?&#8217; पढ़ें रोशनी रावत का पूरा आलेख…</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">बीते दिनों उत्तर प्रदेश शासन‌ की ओर से एक कठोर और मनमाना आदेश जारी किया गया। 20 मई को एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अनिवार्य रूप से ड्रेस कोड लागू करने की बात कही। जिसके तुरंत बाद उ०प्र० उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने &#8221; गुणवत्तापरक शिक्षा, सकारात्मक, अनुशासित और संस्कारित माहौल &#8221; का हवाला देते हुए अनिवार्य ड्रेस कोड लागू करने का फरमान जारी कर दिया । बीजेपी सरकार के इस आदेश के बाद विपक्षी पार्टियों की तीखी प्रतिक्रिया देखनी मिली । हालांकि प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों पर जितनी चालाकी से सरकार शिकंजा कसने की कोशिश कर रही है, उसके विरोध में न तो विपक्षी पार्टियां ही उतरीं या न छात्र &#8211; संगठन । गौरतलब है कि यह आदेश ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने में एक साल से भी कम समय बचा है ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दरअसल उच्च शिक्षण संस्थानों में अनिवार्य रूप से ड्रेस कोड लागू कर देना जितना सरल दिखता है उतना है नहीं। यह स्पष्ट रूप से  संस्थानों को नियंत्रित करने, युवाओं की अभिव्यक्ति की आजादी छीनने और सांस्कृतिक विवधता को खत्म करने की साजिश है। यूनिवर्सिटीज़ और कॉलेज हमेशा‌ से देश के सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के गढ़ रहे हैं। औपनिवेशिक काल से लेकर स्वातंत्र्योत्तर भारत की राजनीति में उच्च शिक्षण संस्थानों के युवाओं का शासन-प्रशासन की नीतियों के समर्थन और विरोध-प्रदर्शनों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप रहा‌ है। देश के सभी वर्तमान राजनीतिक दलों में एक हिस्सा‌ उन नेताओं का भी है जो इन्हीं कॉलेजों से पॉलिटिक्स करते हुए मंत्रालयों की गद्दी तक पहुंचे हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अनिवार्य ड्रेस कोड सामाजिक- राजनीतिक चेतना से युक्त युवाओं को गुड-बॉय/गुड गर्ल बनाकर उन्हें बौद्धिक रूप से कमजोर करने की साजिश है? मंत्री योगेंद्र उपाध्याय जिस &#8221; सकारात्मकता , समरसता , अनुशासन और संस्कारित माहौल&#8221; की बात कर रहें हैं आखिर उसका क्या अर्थ है ? क्या यह सकारात्मकता और समरसता सबसे पहले उन राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखनी चाहिए जहाँ से &#8221; गोली मारो सालों को &#8221; जैसे हिंसक और सांप्रदायिक नारे लगाये जाते हैं ? और इस &#8220;अनुशासन&#8221; शब्द की क्या परिभाषा होगी? यह &#8221; संस्कारित माहौल &#8221; क्या हो सकता है ? क्या अब युवाओं की शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ बच्चों की तरह पढ़ना और डिग्री लेकर कहीं नौकरी पाना रह जाएगा ? क्या उनके आलोचनात्मक विचारों को क्षीण कर उन्हें &#8220;अनुशासित छात्र&#8221; भर बना दिया जाएगा , जिनके पास न तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी ,‌न प्रशासनिक नीतियों की आलोचना की आजादी । क्योंकि &#8220;सकरात्मकता&#8221; और &#8220;अनुशासन&#8221; जैसे सब्जेक्टिव शब्दों की कोई सर्वमान्य और सर्वव्यापक परिभाषा तो‌ है‌ नहीं। ऐसे में यह कैसे तय होगा कि छात्रों के लिए क्या अनुशासन है क्या नहीं? क्या प्रशासनिक नीतियों का विरोध अनुशासनहीनता में आयेगा कि‌ नहीं? इन प्रश्नों का‌ उत्तर कौन देगा?</p>



<p class="wp-block-paragraph">तार्किक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो उच्च शिक्षण संस्थानों में  संरचनात्मक सुधारों, प्राध्यापकों के रिक्त पदों की भर्ती, कॉलेजों में लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का उद्देश्य पूरा हो‌ सकता है। इसके लिए ड्रेस कोड लागू कर यूनिवर्सिटीज और कॉलेज-विशेष के छात्रों को अलग से चिह्नित करने की आवश्यकता नहीं थी। देश-विदेश में कुछ गिने-चुने प्रोफेशनल कोर्सेज को छोड़कर कहीं भी इस तरह का ड्रेस कोड लागू नहीं है । ऐसे में जब  बीजेपी के शीर्ष नेता भारत के विश्वविद्यालयों की तुलना अमेरिका और ब्रिटेन के आधुनिक , लोकतांत्रिक, स्वतंत्र,  चेतनायुक्त और प्रगतिशील विश्वविद्यालयों से करते‌ हैं और देश‌ के विश्वविद्यालयों को उन जैसा‌ बनाने का वादा‌ करते हैं , तो यह सिर्फ एक झूठ और भ्रामक प्रचार भर लगता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>-रोशनी रावत</strong>,</p>



<p class="wp-block-paragraph">लेखिका लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं। </p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>जिस राजघराने में हुआ जाति के कारण अपमान, वर्षों बाद उसी महल में हुआ राजसी ठाठ के साथ सम्मान…कौन थे जोधपुर के &#8220;भंगी जाति के उपकुलपति&#8221; ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/in-the-royal-family-where-insult-happened-due-to-caste-years-later-respect-was-given-with-royal-splendor-in-the-same-palace-who-was-jodhpur-s-vice-chancellor-from-the-bhangi-caste-read-roshni-rawat-s/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Roshni Rawat]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 May 2026 15:49:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>राजस्थान की जोधपुर रियासत में कभी एक दलित बच्चे की माँ को उसकी जाति के कारण अपमान सहना पड़ा था। वक्त ने करवट ली और वर्षों बाद उसी रियासत की धरती पर उस बच्चे का राजसी सम्मान के साथ स्वागत हुआ। यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी प्रतीत होती है, लेकिन यह एक जीवंत सच &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph">राजस्थान की जोधपुर रियासत में कभी एक दलित बच्चे की माँ को उसकी जाति के कारण अपमान सहना पड़ा था। वक्त ने करवट ली और वर्षों बाद उसी रियासत की धरती पर उस बच्चे का राजसी सम्मान के साथ स्वागत हुआ। यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी प्रतीत होती है, लेकिन यह एक जीवंत सच है—उस दलित लेखक के जीवन का, जिसने अभाव, भेदभाव और संघर्षों के बावजूद हार नहीं मानी। अपने साहस, प्रतिभा, जिजीविषा और संकल्प-शक्ति के बल पर उन्होंने न केवल समाज में अलग पहचान बनाई, बल्कि उन कठोरतम परिस्थितियों को भी बदलकर रख दिया, जिन्होंने कभी उन्हें और उनके परिवार को अपमानित किया था.<br>वह दलित लेखक थे -श्याम लाल जैदिया! जिन्होंने अपनी आत्मकथा <strong>&#8216;एक भंगी कुलपति की अनकही कहानी&#8217;</strong> में अपने नाटकीय जीवन के इस अद्भुत प्रसंग का बेहद मार्मिकता से उल्लेख किया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><br>अपनी आत्मकथा में श्याम लाल जैदिया बताते हैं कि राजसी रियासतों में भंगी जाति के लोगों की स्थिति बहुत दुःखद थी। हर भंगी को जोधपुर की गलियों से गुजरते समय &#8216;पाइस&#8217; शब्द चिल्लाना पड़ता था. &#8216;पाइस&#8217; का अर्थ है दूरी रखना । वे यह भी बताते हैं कि उस दौर में अछूत समझे जाने वाले व्यक्तियों को गलियों में स्वतंत्र घूमने की आजादी तक नहीं थी। भंगी जाति के व्यक्ति अपने राजा को देख भी नहीं सकते थे क्योंकि वे नीच जाति के माने जाते थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><br>अपने जीवन के एक अपमानजनक प्रसंग को याद करते हुए वे बताते हैं कि &#8216; एक बार मेरी मां को सफाई कार्य हेतु किले में बुलाया गया। चूंकि वे नगरपालिका की कर्मचारी थीं, उन्हें इस कार्य हेतु वहां जाना था। मैं भी अपनी मां के साथ किले पर गया। कार्य पूरा करने के पश्चात जब हम किले से वापस लौट रहे थे तो एक घटना घटी जिससे मुझे एक सबक मिला। अचानक कुछ लोगों के साथ महाराजा वहां आ गए। कुछ कट्टरपंथी लोगों ने मेरी मां को पहचान लिया तथा वे हमें देख कर क्रोधित हो गए। वे जोर से चिल्लाने लगे, &#8216;पीछे हटो&#8217;, &#8216;यहां से तुरंत भाग जाओ&#8217;।मेरी मां आश्चर्य चकित रह गई। वे रास्ते से हटकर एक एकांत स्थान की ओर चली गईं।&#8217;</p>



<p class="wp-block-paragraph">ऐसी अपमानजनक और भेदभावपूर्ण परिस्थितियों के बाद‌ भी श्याम जैदिया जी ने हार नहीं मानी और अपने में जीवन‌ में बड़ा मुकाम हासिल किया । अपनी आत्मकथा में वे बताते हैं कि सन् 1996 में वह जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के उपकुलपति बने। इस अवसर पर जोधपुर के महाराजा गजसिंह ने उन्हें शुभकामना संदेश भेजा था।<br>इस वर्ष महाराजा जोधपुर के जन्मदिन के शुभ अवसर पर उन्होंने जैदिया जी को उम्मेद भवन में रात्रि भोजन में सम्मिलित होने का आमंत्रण‌ भी भेजा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><br>वे कहते हैं कि &#8216;मैं महाराजा साहब के जन्मदिन समारोह में सम्मिलित होने में हिचकिचा रहा था क्योंकि मैंने सोचा कि चूंकि मैं एक अछूत भंगी जाति का व्यक्ति हूं, अतः लोग मेरे साथ किस प्रकार का व्यवहार करेंगे। इस बात की शंका मेरे मस्तिष्क में थी क्योंकि पार्टी में राजपरिवारों के बड़े-बड़े लोग शामिल होंगे।&#8217;<br>अपने जीवन‌ के इस अद्भुत अनुभव का वर्णन करते हुए वे बताते हैं कि जब वे उम्मेद भवन महाराजा से मिलने पहुंचे तो &#8216;मैंने महाराजा साहब को बधाई दी तथा उनके दीर्घायु होने एवं सुखी जीवन की कामना की। महाराजा गजसिंह ने मुस्कराते हुए मेरा स्वागत किया तथा मेरे साथ हाथ मिलाया। प्रथम बार मैं महाराजा साहब से मिला था। वे देखने में सुंदर, आकर्षक, उदार एवं विनम्र थे और जन साधारण में बहुत लोकप्रिय थे।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="819" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-1-1024x819.jpeg" alt="" class="wp-image-357" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-1-1024x819.jpeg 1024w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-1-300x240.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-1-768x615.jpeg 768w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-1.jpeg 1402w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph"><br>मेरी उत्सुकता तब अधिक जागृत हुई जब वे स्वयं केंद्रीय कक्ष (सेंट्रल हॉल) तक मेरे साथ-साथ आए और जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के एक कुलपति के रूप में मेरा परिचय राजपरिवार के सदस्यों से करवाया।&#8217;<br>श्याम जैदिया जी आगे लिखते हैं कि &#8216; पर्याप्त उत्साह के साथ समारोह आरंभ हुआ।शाही दम्पत्ति की शुभकामना हेतु अनेक लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए। समारोह में सरकारी अधिकारी, जोधपुर तथा जयपुर के अभिजन समाज के सदस्य उपस्थित थे। महाराजा साहब ने स्वयं अपने लोगों को निर्देश दिया कि वे मेरा विशेष रूप से ख्याल रखें तथा वे स्वयं मेरे आवभगत का पूरा ख्याल रख रहे थे। मेहमानों को विभिन्न प्रकार के पेय एवं मदिरा प्रस्तुत की जा रही थीं। मैंने मात्र साधारण पेय स्वीकार किया।विभिन्न प्रकार के मांसाहारी भोजन जैसे मछली, मटन, चिकन आदि इतने अच्छे थे कि मुझे पर्याप्त पसंद आए। मैं महाराजा साहब के अपने प्रति व्यवहार एवं स्नेह से पर्याप्त आश्चर्यचकित था।&#8217;</p>



<p class="wp-block-paragraph">वे कहते हैं‌ कि कुछ दिनों के बाद उन्होंने अपनी वृद्ध मां को जब सारी घटना सुनाई कि मैं महाराजा गजसिंह जी से उम्मेद भवन में मिलने गया था. (जहां मेरी मां ने भवन के निर्माण कार्य में, श्रमिक के रूप में कार्य किया था) तथा जोधपुर के अभिजात लोगों के साथ रात्रिभोज किया था। चिंता एवं उत्सुकतावश उन्होंने तुरंत मुझसे यह प्रश्न पूछा कि क्या मैं महाराजा साहब से मिला? उनसे हाथ मिलाया? तथा उनके साथ भोजन किया? मेरा उत्तर हां में था। तो भी उनको विश्वास नहीं हुआ। चूंकि उनको समाज के निम्न अछूतों में निम्नतम सोपान पर होने का कटु अनुभव स्वयं प्राप्त है, अतः वे इतिहास एवं समाज का जड़ से आकलन करने की बेहतर स्थिति में हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">श्याम जैदिया जी के महाराजा साहब से मिलने पर उनकी मां इतनी अधिक प्रसन्न हुई कि उन्होंने अपने हाथों को उनके चेहरे तथा सर पर रखा. उनकी मां ने उन्हें सुखी, संपन्न एवं दीर्घायु होने की प्रार्थना की। उनके लिए यह एक महान उपलब्धि थी क्योंकि उनका पुत्र मारवाड़ राज्य में प्रथम अछूत भंगी था जिसे दरबार साहब के हाथों इस प्रकार का सम्मान प्राप्त हुआ था।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="819" src="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-2-1024x819.jpeg" alt="" class="wp-image-358" srcset="https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-2-1024x819.jpeg 1024w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-2-300x240.jpeg 300w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-2-768x615.jpeg 768w, https://adahanpatrika.com/wp-content/uploads/2026/05/WhatsApp-Image-2026-05-31-at-8.51.22-PM-2.jpeg 1402w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p class="wp-block-paragraph">श्याम लाल जैदिया अपने जीवन के इस अविस्मरणीय पल के विषय में कहते हैं कि &#8216;मैं अपने अतीत को याद कर रहा था, जब मैं तथा मेरी मां मेहरानगढ़ किले से निकाले गए थे। अनेक कठिनाइयां सही थीं तथा अछूत होने के नाते लोगों की गालियां बर्दाश्त की थीं। उसी अछूत भंगी युवक का एक कुलपति के रूप में उसी किले में, उसी राजघराने के द्वारा सम्मान किया जा रहा था।यह मेरे जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि थी जो दीर्घकाल तक सुखद रूप में मेरे स्मरण पटल पर रहेगी।&#8217;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>-रोशनी रावत, लेखिका लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं.</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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		<title>हम! युद्ध से बचे हुए लोग</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Roshni Rawat]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 May 2026 07:34:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>युद्ध में मारे गये लोगअब कभी वापस नहीं आयेंगे,न ही जीवित हो पायेंगे वे बच्चेजो दफ़्न हो चुके हैंइमारतों के ध्वंसावशेषों के नीचे। अभी तो देखनी शुरू की थी उन्होंने यह रंग-बिरंगी दुनियाअपनी चमकीली आंखों से,बस अभी ही तो सीखा था उन्होंने चलनाफिर धीरे-धीरे दौड़ना,फूलों, तितलियों, गलियों में घूमते कुत्तेछतों पर फुदकती चिड़ियों से खेलना,वे &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://adahanpatrika.com/read-young-writer-roshni-rawats-full-poem-on-adahan-patrika-we-the-people-who-survived-the-war/">हम! युद्ध से बचे हुए लोग</a> appeared first on <a href="https://adahanpatrika.com">Adahan Patrika |  अदहन पत्रिका</a>.</p>
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<p class="wp-block-paragraph">युद्ध में मारे गये लोग<br>अब कभी वापस नहीं आयेंगे,<br>न ही जीवित हो पायेंगे वे बच्चे<br>जो दफ़्न हो चुके हैं<br>इमारतों के ध्वंसावशेषों के नीचे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अभी तो देखनी शुरू की थी उन्होंने यह रंग-बिरंगी दुनिया<br>अपनी चमकीली आंखों से,<br>बस अभी ही तो सीखा था उन्होंने चलना<br>फिर धीरे-धीरे दौड़ना,<br>फूलों, तितलियों, गलियों में घूमते कुत्ते<br>छतों पर फुदकती चिड़ियों से खेलना,<br>वे अपने नन्हें पैरों से नाप देना चाहते थे<br>यह पूरी धरती<br>और छोटी-सी मुट्ठी में भर लेना चाहते थे<br>यह पूरा आकाश ।<br>नहीं! वे अभी ना-वाकिफ़ थे<br>तुम्हारी स्याह दुनिया से,<br>जिसमें है सिर्फ युद्ध, सीजफायर, कन्वेंशन और &#8220;पीस ऑर्गनाइजेशन&#8221;<br>नहीं ! वे बच्चे अभी नहीं जानते थे क्या होते हैं परमाणु बम, मिसाइलें, फाइटर जेट और ऑयल रिज़र्व,<br>नहीं! उन्होंने अभी नहीं जानी थी धर्म, नस्ल और राष्ट्रीयता की तुम्हारी खोखली और मनुष्यता-विरोधी अवधारणाएं,<br>वे तो जानते थे सिर्फ<br>यह धरती, यह आकाश और<br>अपनी मां का आंचल !</p>



<p class="wp-block-paragraph">युद्धोन्मत सत्ताधीशों के ऐलान पर<br>वे लोग जो भेजे गये थे युद्धों पर<br>धर्म और राष्ट्र बचाने के नाम पर<br>दूसरी धरती पर बम बरसाने के लिए,<br>वे तो करना चाहते थे प्रेम<br>धर्म, नस्ल और राष्ट्र की सीमाओं से जाकर परे,<br>वे तो बरसाना चाहते थे फूल हर धरती पर ।<br>और वे जो वापस लौटे हैं<br>भीषण युद्ध के बाद,<br>अपनी देह के चीथड़े लिए<br>देखकर स्तब्ध हैं<br>लहूलुहान धरती पर सड़ती-गंधाती हजारों लाशों पर<br>क्रूर हंसी हंसते हुए<br>अपने-अपने हुक्मरानों का एक मंच पर आकर हाथ मिलाना<br>और मुस्कुराते हुए जारी करना<br>&#8220;शांति का संयुक्त वक्तव्य &#8220;।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसलिए हम<br>युद्ध में बचे हुए,<br>युद्ध से बचे हुए लोग<br>दुनिया के सभी हुक्मरानों से<br>विद्रोह करते हैं ,<br>हम विरोध करते हैं<br>तुम्हारी युद्ध-उ‌द्घोषणाओं का, जिसने पाटी धरती मनुष्यों की लाशों से<br>रक्त-रंजित की नदियां और रौंद डाली सभ्यताएं !<br>हम विरोध करते हैं<br>तुम्हारे साम्राज्यवादी, कट्टरपंथी, अंध-राष्ट्रवादी जुलूसों का,<br>जिसमें नंगी की गई औरतें<br>शत्रु देशों की,<br>और बच्चियों से हुए बलात्कार !<br>हम विद्रोह करते हैं क़ातिल हुक्मरानों !<br>तुम्हारी बनाई दुनिया से,<br>तुम्हारी बनाई व्यवस्था से,<br>तुम्हारी हिंसक नीतियों से,<br>तुम्हारी झूठी शांति-वार्ताओं से<br>हम विद्रोह करते हैं !<br>हम विद्रोह करते हैं !</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8211;<strong>रोशनी रावत</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
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