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	<title>सिनेमा Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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	<description>साहित्य, विचार और जन आंदोलन</description>
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	<title>सिनेमा Archives - Adahan Patrika | अदहन पत्रिका</title>
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		<title>श्रवण गर्ग का लेख &#8211; क्या &#8216;मैं वापस आऊंगा&#8217; एक चालाक एजेण्डा फिल्म है ?</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/shravan-gargs-article-but-partition-will-not-go-back-i-will-come-back-imtiaz-ali-film-read-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 22 Jun 2026 06:36:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सिनेमा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;सत्तारूढ़ दल का समूचा तंत्र भी तो बार-बार ‘विभाजन की विभीषिका’ के क्षणों और लाशों से पटी ट्रेनों के सीमा पार से अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पहुँचने की याद दिलाता रहता है। अधूरी प्रेम कहानी के बहाने क्या इम्तियाज़ की फ़िल्म भी जाने-अनजाने उसी एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम नहीं करती ?&#8217; पढ़ें सुपरिचित &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;सत्तारूढ़ दल का समूचा तंत्र भी तो बार-बार ‘विभाजन की विभीषिका’ के क्षणों और लाशों से पटी ट्रेनों के सीमा पार से अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पहुँचने की याद दिलाता रहता है। अधूरी प्रेम कहानी के बहाने क्या इम्तियाज़ की फ़िल्म भी जाने-अनजाने उसी एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम नहीं करती ?&#8217; पढ़ें सुपरिचित वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का पूरा आलेख&#8230;</strong></p>



<p>प्रसिद्ध पाकिस्तानी फ़िल्ममेकर उमर नासिर अली ने इम्तियाज़ अली की बहुचर्चित फ़िल्म ‘ मैं वापस आऊँगा‘ को अत्यंत भावनात्मक और मास्टरक्लास करार देते हुए कहा है कि फ़िल्म ख़त्म हो जाने के भी काफ़ी समय तक दर्शकों के साथ बनी रहती है ! ‘</p>



<p>‘नायाब’ जैसी फीचर फ़िल्म के लिए पहचान रखने वाले उमर नासिर से क्या पूछा जा सकता है कि पार्टीशन को लेकर ऐसी ही कोई फ़िल्म क्या वे पाकिस्तान में बना सकते हैं ? ऐसी फ़िल्म जिसमें लोकेशन सरगोधा की ही हो पर इम्तियाज़ की फ़िल्म के 95 साल के सिख मुख्य नायक (ईशर सिंह ग्रेवाल ) की जगह कोई मुस्लिम हो जिसके अधूरे प्यार की नायिका कोई सिख युवती पार्टीशन के बाद भारत के हिस्से वाले पंजाब के किसी शहर में बस गई हो और जिसे तलाशने उसका पोता सीमा पार करके भारत आता हो ? क्या फ़िल्म पाकिस्तान में बनाने दी जाएगी ? क्या ऐसी कोई फ़िल्म भारत में रिलीज़ होने दी जाएगी ?</p>



<p>ईशर सिंह ग्रेवाल उर्फ़ कीनू की 78 साल पुरानी प्रेम कहानी हक़ीक़त में उन ज़ख्मों को ही हरा करती है जिन्हें वे सत्तर लाख से ज़्यादा लोग जो पार्टीशन के बाद गठरियों में बांधकर भारत पहुँचे थे अब भूल जाना चाहते हैं। तो फिर क्या बहस फ़िल्म को एक अधूरे प्यार की कहानी की क़ैद से आज़ाद कर उसकी स्क्रिप्ट में डाले गए ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ की तरह के हिंसक दृश्यों या शरणार्थियों से भरी ट्रेनों के अमृतसर पहुँचने के स्टॉक फूटेज के इस्तेमाल की ज़रूरत या निर्माताओं के इरादों पर भी नहीं की जानी चाहिये ?</p>



<p>सत्तारूढ़ दल का समूचा तंत्र भी तो बार-बार ‘विभाजन की विभीषिका’ के क्षणों और लाशों से पटी ट्रेनों के सीमा पार से अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पहुँचने की याद दिलाता रहता है। अधूरी प्रेम कहानी के बहाने क्या इम्तियाज़ की फ़िल्म भी जाने-अनजाने उसी एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम नहीं करती ?</p>



<p>दर्शकों की तरफ़ से हम यह मानकर चलना चाहते हैं कि अगर फ़िल्म में यह सब शामिल नहीं किया जाता तो फिर पूरी कहानी युवा ईशर के सरगोधा में इश्क़ के शॉट्स, पोते निर्वेर (दिलजीत दोसांझ) के इंग्लैंड से लौटकर भारत आने और सीमा पर करके सरगोधा जाने के दृश्यों और ईशर (नसीरूद्दीन) के घर और अस्पताल के बिस्तरों पर व्यक्त हुई अधूरे प्रेम की स्मृतियों तक बंध कर रह जाती ! यानी असली फ़िल्म इंटरवल के बाद शुरू होती ! पर पार्टीशन की व्यथा को कमर्शियली बेचने के लिए तीन घंटे तक खींचा जाना ज़रूरी था।</p>



<p>हक़ीक़त यह है कि पार्टीशन की हिंसक स्मृतियों को अगर इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया जाए तो फिर न तो सत्ता की सांप्रदायिक राजनीति को चुनावी बारूद मिलेगा और न मुंबइया फ़िल्मों के लिए कहानियाँ।फ़िल्म के शुरुआती हिस्से में जब पार्टीशन की खबर सरगोधा पहुँचती है तो युवा ईशर पहले यह डायलॉग बोलता है: मैं बटवारे को नहीं मानता’ ! जब उसे ज़बरदस्ती ट्रेन पर चढ़ाकर सीमापार धकेला जाने लगता है तो अपने प्यार से वह वादा करता है :’ मैं वापस आऊँगा’ !</p>



<p>ईशर( नसीरूद्दीन) के 78 साल तक प्यार में डूबे रहने और किए गए वायदे के मुताबिक़ वापस नहीं पहुँच पाने की कहानी का अदृश्य भाग यह है कि पार्टीशन को न सिर्फ़ स्वीकार कर लिया गया है उसके ज़ख्मों को बार-बार कुरेदकर गहरा करते रहना भी वक्त की ज़रूरत बन गया है।</p>



<p>पार्टीशन को लेकर बनाने वाली फ़िल्में अधूरे प्रेम की पीड़ा और बेबसी को जिस अन्दाज़ में उजागर करती हैं अपनी स्क्रिप्ट्स में एक मुल्क के तौर पर पाकिस्तान के लिए नफ़रत की गुंजाइशें भी छोड़ती जाती हैं। इम्तियाज़ भी अगर उस गुंजाइश को नहीं छोड़ते तो फिर फ़िल्म में ग्लोरिफ़िकेशन सिर्फ़ दो कोमों के युवा प्रेमियों के बीच पनपे निश्चल प्रेम का ही होता उससे इतर कुछ नहीं। वैसी स्थिति में फ़िल्म दिलजीत दोसांझ की सरगोधा यात्रा के शॉट्स के बाद नसीरूद्दीन शाह के चेहरे पर छाने वाली शांति के अंतिम दृश्य पर ख़त्म कर दी जाती ! वैसा नहीं किया गया ! नसीरुद्धीन की शानदार भूमिका को ओवरशैडो करते दोसांझ के गाने ‘कमाल है ‘ के साथ फ़िल्म का अंत दिखाया गया। एक मार्मिक प्रेम कहानी पर ग़ज़ा के विज़ुअल्स की ग़ैरज़रूरी बमबारी के बारे में किसी भी समीक्षक ने सवाल नहीं किया !</p>



<p></p>
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		<title>फिल्म समीक्षा: अमर सिंह चमकीला : जर्रे से सितारा बनने की संगीतमय कहानी</title>
		<link>https://adahanpatrika.com/film-review-amar-singh-chamkila-the-musical-story-of-becoming-a-star-from-dust-imtiaz-ali-parineeti-chopra-diljit-dosanjh-netflix-film-read-on-adahan-patrika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Adahan Patrika]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 May 2026 05:05:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8216;यह दलित मजदूर धन्नी राम के पंजाब का एल्विश कहा जाना वाला मकबूल पंजाबी गायक अमर सिंह चमकीला बनने की कहानी है। पर यह इतना सरल नहीं था-उसका जीवन और असमय निधन रहस्य और विवादों से भरा हुआ है। शायद इसी नाटकीयता ने पंजाबी और हिंदी फ़िल्मकारों को इस विषय पर फिल्म बनाने के लिए &#8230;</p>
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<p><strong>&#8216;यह दलित मजदूर धन्नी राम के पंजाब का एल्विश कहा जाना वाला मकबूल पंजाबी गायक अमर सिंह चमकीला बनने की कहानी है। पर यह इतना सरल नहीं था-उसका जीवन और असमय निधन रहस्य और विवादों से भरा हुआ है। शायद इसी नाटकीयता ने पंजाबी और हिंदी फ़िल्मकारों को इस विषय पर फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया है | &#8216; पढ़ें युवा आलोचक सूरज कुमार की पूरी समीक्षा&#8230;</strong></p>



<p>इम्तियाज़ अली, जो हृदय को छू लेने वाली कहानियों और गहन चरित्र चित्रण के लिए जाने जाते हैं, इस फिल्म के जरिए अमर सिंह चमकीला के जीवन में गहराई से उतरते हैं। यह दलित मजदूर धन्नी राम के पंजाब का एल्विश कहा जाना वाला मकबूल पंजाबी गायक अमर सिंह चमकीला बनने की कहानी है। पर यह इतना सरल नहीं था-उसका जीवन और असमय निधन रहस्य और विवादों से भरा हुआ है। शायद इसी नाटकीयता ने पंजाबी और हिंदी फ़िल्मकारों को इस विषय पर फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया है जबकि गुरदास मान, कुलदीप मानक और आज के समय में हनी सिंह और दिलजीत दोसांझ जैसे पंजाबी गायक मौजूद हैं । इस विषय पर इम्तियाज़ की फिल्म के पहले पंजाबी में 22 चमकीला फॉर एवर(2022) और जोड़ी (2023) जैसी फिल्में बन चुकी हैं । IMDB के अनुसार इस विषय पर अनुराग कश्यप ने 2012 में ही फिल्म बनाने की योजना बनाई थी जो किन्हीं कारणों से बन नहीं पाई थी। 2018 में कबीर सिंह चौधरी(देव डी&#8217;, &#8216;आएशा&#8217;, &#8216;वेक अप सिड&#8217; में AD) ने मेहसामपुर शीर्षक डॉक्यूड्रामा बनाई जो डॉक्यूमेंट्री और फीचर फिल्म का मिला-जुला रूप है – चमकीले के जीवन और उसकी हत्या को स्याह-हास्य(मॉक्यूड्रामा) के अद्भुत तरीके से अन्वेषित करने का प्रयास है।<br>अब वापस इम्तियाज़ अली और उनके अमर सिंह चमकीले की तरफ आते हैं । इम्तियाज़ का सिनेमा अक्सर मानवीय संबंधों की जटिलताओं, पहचान की खोज, और सामाजिक मानदंडों के खिलाफ संघर्ष का अन्वेषण करता है। अमर सिंह चमकीला के माध्यम से वे न केवल कलाकार के जीवन को बल्कि उस व्यक्ति और कलाकार को भी चित्रित करते हैं जो इस किंवदंती के पीछे था।</p>



<p><strong>चमकीला : रील बनाम रियल</strong><br>दुगरी 21 जुलाई,1960 से मेहसामपुर, 8 मार्च 1988<br>महज 27 वर्ष की आयु पाने वाले चमकीले की फिल्मी कहानी मेहसामपुर में उसकी हत्या से शुरू होती है और वहीं से शुरू होता है फ्लैशबैक, फ्लैशफोरवर्ड और उसके जक्स्ट्रापोज़िशन का सिलसिला । इम्तियाज़ एक तरह से ‘मेंकिंग ऑफ अमर सिंह चमकीला’ की कहानी कहते हैं। कहते हैं एक बालक के मानसिक विकास के पीछे जीवन के पहले छह वर्ष महत्वपूर्ण होते हैं। फ्लैशबैक में बालक धन्नीराम है जिसके गीले मिट्टी सरीखे मानस पर वह हर कुछ दर्ज होता है, जो वह अपने आस-पास में देखता है- पड़ोसियों के झगड़े, ताक-झांक, सामाजिक मान्यता के विरुद्ध प्रचलित अनैतिक संबंध, शादी के गीत और गालियां आदि । उसे इस बात पर हैरत है कि जिन शब्दों को उसके मुंह से सुनकर उसकी माँ तमाचे जड़ती है, वहीं शादी के गीतों में वैसे ही बोलों को सुनकर तालियाँ भी बजाती है। बालक धन्नी राम में एक प्रतिभा है: देखी-सुनी बातों को गीत में ढालने की – ‘देख जट्ट की थाट ,खड़ा हो गया …’। जाहिर है गणित की कक्षा में ऐसे गीत लिखने पर उसकी पिटाई होती है। कट टू जुराबों की फैक्ट्री – “मेरे दिमाग में संगीत चल रहा होता है और मैं जुराबे बना रहा होता हूँ ।” अपने बोल और धुन के बल पर केसर टिक्की से होते हुए जत्तिनदर जिंदा और फिर अखाड़े (स्टेज परफॉरमेंस)तक के सफर में संदिला के चमकीला बनने का सफर चलता ही जाता है। अपने आसपास की कहानियों के बोलों को गीत में ढालना और अपनी तुंबी के साथ जादुई गले से गीतों को गाना- सुनने वालों को थिरकने पर मजबूर कर देता था। अमरजोत के साथ जोड़ी बनने पर अखाड़ा और जमता है और चमकीला पंजाब के संगीत पटल पर धूमकेतु सा छा जाता है। उसके बोल उसे विवादस्पद बनाते हैं -आरोप द्विअर्थी और अश्लील होने के लगते हैं । वह एक साथ कई लोगों के निशाने पर आता है और मेहसामपुर में एक अखाड़े में पहुँचने के समय 8 मार्च 1988 को इस जोड़ी की हत्या हो जाती है।</p>



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<p><strong>बायोपिक और म्यूज़िकल के बीच का जॉनर</strong></p>



<p>फिल्म की शुरुआत में disclaimer आता है- This film is loosely inspired by true event….the film does not claim of authenticity or correctness of any events, incidents depicted in the film. फिल्म चमकीले पर है लेकिन फिल्मकार ने इसे अपना भाष्य बना दिया है। और यह भाष्य इस फिल्म में चमकीले के मानवीय और संगीत पक्ष को लेकर अधिक मुखर है। अमर सिंह के दिमाग में हर समय या तो गीत के बोल चल रहे होते हैं या कोई धुन। फिल्म में ‘म्यूज़िकल’ की तरह ही चमकीले की जोड़ी के अखाड़े में गाए गाने निरंतर दर्शकों के समक्ष आते रहते हैं। हालांकि कुछ गाने अनावश्यक रूप से दुहराए भी गए हैं । इस फिल्म के सभी छह गाने फिल्म की कहानी के हिस्से हैं जिसे अनावश्यक रूप से जोड़ा नहीं गया है।ये गाने फिल्म को गति प्रदान करते हैं। इरशाद कामिल के बोल और ए आर रहमान के संगीत की जुगलबंदी में ‘तू क्या जाने मेरे यार’ और ‘इश्क मिटाए हाय-हाय’ जैसे मधुर गाने तो काफी सुने जा रहे हैं। अखाड़े के गीत पंजाबी के हैं इसलिए दर्शकों को धुन समझ आती है, उसके बोल अंग्रेजी में स्क्रीन पर आते हैं ।यह तरकीब तो अच्छी है लेकिन देवनागरी में उन बोलों का न होना अखरता भी है। नेटफलिक्स पर होने से पंजाबी बोल और संवाद के अर्थ सबटाइटल्स के माध्यम से आसानी से दर्शकों तक पहुँच जाते हैं।</p>



<p><strong>इम्तियाज़ का जादुई केलाईडोस्कोप</strong></p>



<p>इम्तियाज़ अली &#8220;अमर सिंह चमकीला&#8221; में कहानी कहने के लिए अनेक अभिनव दृश्य तकनीकों का उपयोग करते हैं।<br>वे पारंपरिक सिनेमैटोग्राफी के साथ आधुनिक ग्राफिक्स के तत्वों को मिश्रित करते हैं । एक ही फ्रेम में वे दो हिस्सों में अतीत और वर्तमान को दर्ज करते हैं। जोड़ी की असली तस्वीर और फुटेज को फिल्म के दृश्यों के साथ संयोजित करते हैं मानो याद दिला रहे हों कि असली चमकीला कौन है । संगीत के अंतरों के दौरान एनीमेशन का उपयोग एक स्तर का अतियथार्थवाद जोड़ता है, जो चमकीला के गीतों की शानदार प्रकृति को प्रतिध्वनित करता है।उदाहरणार्थ एक दृश्य में कैसे गाँव कस्बों की पार्टियों में चमकीले के ग्रामोफोन रिकार्ड एक समूह से दूसरे समूह तक जाते हैं उसके लिए एनिमेशन का सहारा लेते हुए उसे उड़नतश्तरी की तरह एक जगह से दूसरी जगह परिक्रमा करते हुए दिखाया गया है।<br>चमकीले का संवाद कि ‘उसके दिमाग में संगीत चल रहा होता है’-इसे निर्देशक ने दृश्यों के संयोजन में संभव कर दिखाया है। कहानी के साथ-साथ चमकीला हर वक्त-बेवक्त धुन और गीत के बोलों में किस कदर डूबा रहता है इसे इम्तियाज़ ने परदे पर बखूबी साकार किया है। कुएं के पास चमकीले के गाने के रियाज़ के दो दृश्य देशज अकूस्‌टिक्‌ (acoustic) के प्रयोग का अद्भुत नमूना है।<br>इम्तियाज़ इस फिल्म में कहानी के समय के अनुकूल 1980 के दशक के पंजाबी संगीतमय सामाजिक-भूदृश्य का एक जीवंत चित्र सृजित करते हैं। सिनेमा में दृश्यों के माध्यम से तत्कालीन समय जीवंत करना होता है। इम्तियाज़ अपने फ्रेम में उस काल को दर्ज करने में सफल रहे हैं। फ्रेम में आने वाली हर वस्तु उस समय के अनुकूल है। यही नहीं दृश्यों में डेप्थ ऑफ फील्ड भी है जिसे वे अपने लॉंग शॉट में बखूबी संयोजित करते हैं । उदाहरण के लिए कोठा धौ कलाकार (रुफ ब्रैकर आर्टिस्ट ) वाले दृश्य में अखाड़े में उपस्थित पूरे जनसैलाब को दुबारा रचने में सफल होते हैं।</p>



<p><strong>द्विअर्थी गीतों की परंपरा और चमकीला की विरासत</strong></p>



<p>लोक जीवन और कला माध्यमों में श्लील और अश्लील का मसला हमेशा से रहा है। पंजाबी के अलावा हरियाणवी और उत्तर भारत की लोकभाषाओं के गीतों में अश्लीलता प्रचुरता में पाई जाती है। इसके अलावा शादी ब्याह में और फिल्मों के गीतों में भी द्विअर्थी गाने प्रचलित हैं। ये द्विअर्थी गाने दरअसल चमकीले को अपनी विरासत से मिले थे। यही गाने उसके यश का कारण बना और साथ ही पराभव का भी। बजता जा बाजा गाने में जो एक तरफ उसकी प्रसिद्धि है वही उसकी मौत की वजह भी :<br>लचर लचर गानों में /ठरक ठरक तानों में /सेक्सी गीत गाता था/ दंड घोल जाता वो /जिस वजह से चमका वो /उस वजह से टपका चमकीला/ सेक्सीला ठरकीला वो गंदा बंदा<br>जो समाज में छुपा था उसे चमकीले ने उभारने का काम किया । यह एक तरह से सामूहिक सामाजिक अवचेतन का उद्गार है। एक दृश्य में बूढ़ी महिला दूसरी महिलाओं के कह रही हैं पुरुषों का स्वभाव ही ऐसा है जो वो कहते नहीं ,फ़र्क बस इतना है कि चमकीला अपने गीतों में यह सब कह रहा है। और वैसे भी अपने पारंपरिक गीतों में तो अश्लीलता होती ही है।<br>इम्तियाज़ ने विषय चमकीले को चुना पर उनका उद्देश्य चमकीले के द्विअर्थी गीतों को महिमा मंडित करने का बिल्कुल नहीं है। फिल्म में ऐसा कोई प्रसंग नहीं है जहां पर स्त्री की गरिमा को चोट पहुंचाई गई हो। वो तो बस उसी हिस्से पर ध्यान केंद्रित करते हैं जहां अवसर के न रहने पर भी एक जर्रा कैसे लोक का सितारा बन जाता है।</p>



<p><strong>सामाजिक स्थिति का चित्रण और चमकीले के गाने का समाजशास्त्र</strong></p>



<p>इम्तियाज़ सावधानीपूर्वक चमकीले की यात्रा को कठोर सामाजिक पदानुक्रम की पृष्ठभूमि के खिलाफ चित्रित करते हैं, यह दिखाते हुए कि उनके गीत और व्यक्तित्व ने स्थापित व्यवस्था को कैसे चुनौती दी। फिल्म उनकी सामाजिक स्थिति को सिर्फ एक जीवनी विवरण के रूप में नहीं, बल्कि उनके संगीत और लोकप्रियता को ईंधन देने वाले एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में दर्शाती है। यह सूक्ष्म चित्रण इम्तियाज़ की व्यक्तिगत और सामाजिक कथाओं को सहजता से अंतर्भुक्त करने की क्षमता का प्रमाण है।<br>इस फिल्म में चमकीले और उसके पिता के पारस्परिक संबंधों को भी रेखांकित करने की आवश्यकता है । एक गरीब परिवार का लड़का जब नौकरी छोड़ता है तब उसका पिता पीटने को दौड़ता है। मिट्टी का घर है जिसमें रौशनी एक छोटे रौशनदान से आ रही होती है। जब चमकीला अपने पिता के हाथ में नोट का बंडल पकड़ाता है तब वह एकाएक चुप हो जाता है। रौशनी उसके पिता के विस्मय भरे चेहरे पर पड़ती है । चमकीला कहता है -अभी और लाकर दूंगा। पंचायत के दृश्य में सामाजिक दबाव पैसे और रसूख के आगे कैसे बदल जाता है उसे भी इम्तियाज़ चुटीले तरीके से दर्शाते हैं। चमकीला के बढ़ते सितारे के बीच उसके पिता का पीना कम नहीं होता लेकिन उसे समाज में अपने बेटे के बढ़ते कद और रुतबे का एहसास है ,इसलिए कुछ नया होने पर वह गाँव के तथाकथित ऊंचे लोगों के दरवाजे पर जाकर अपनी उपलब्धि गिना कर आ जाता है। पार्श्व में चमकीले फ्लैशबैक में अपने पिता की दुर्गति को याद करता है और आज की स्थिति पर संतुष्ट दिखता है। चमकीले की सफलता ने समाज में उसकी फौरी हैसियत तो बढ़ा ही दी थी ।<br>चमकीला अपने उत्तेजक द्विअर्थी गीतों के लिए कुख्यात था, जो अक्सर ग्रामीण पंजाबी समाज की पाखंड और अंतर्निहित इच्छाओं को उजागर करता था । उसके गाने उस समाज की कथा है जिसमें नैतिक रूप से निषिद्ध विषय को अनुभूत तो आमतौर पर लगभग सभी करते हैं पर उस पर खुलेआम चर्चा निषिद्ध है। धारणा तो यह थी कि चमकीले के गाने निम्न वर्ग के लोग ही पसंद करते हैं जबकि असल में ऐसा नहीं था। एक दृश्य में पुलिस का सिपाही अपने अफसर के बारे में कहता है -साहब ऐसे गीत थोड़े न सुनते हैं। जबकि आगे की दृश्य में संकेत है कि उस अफसर के पास भी चमकीले के कैसेट हैं और उसका बेटा भी उसे छुप कर सुनता है। नरम कलिजा गाने में किशोरियाँ और महिलाएं उसके गाने छुप-छुप कर सुनती हैं। चमकीले के अखाड़े में इतनी संख्या में भीड़ जुटती थी कि कई बार छत टूट जाती थी। यह फिल्म इस पहलू को बखूबी दर्शाती है, यह दिखाती है कि उसके गीत जनता में कैसे गूंजते थे, जबकि रूढ़िवादी गुटों के लिए ये छिछले और अश्लील गाने थे जिससे सामाजिक ताना-बाना तार-तार हो रहा था। उनके कहने पर चमकीले ने भक्ति के गीत भी लिखे और जो खासे लोकप्रिय हुए। इम्तियाज़ चमकीला के काम की द्वैधता को पकड़ते हैं, यह दिखाते हुए कि उसके संगीत ने सामाजिक मानदंडों और वर्जनाओं को कैसे प्रतिबिंबित किया, जिससे गायक एक प्रिय और विवादास्पद व्यक्ति दोनों बन गया ।</p>



<p><strong>पेशेवर प्रतिद्वंद्विता और सामूहिक दबाव</strong></p>



<p>कहानी चमकीला के दुखद अंत की ओर ले जाने वाली पेशेवर प्रतिद्वंद्विताओं और सामाजिक-राजनीतिक दबावों में गहराई से उतरती है। इम्तियाज़ पंजाबी संगीत उद्योग के भीतर की तीव्र प्रतिस्पर्धा और बाहरी दबावों को दर्शाते हैं, जिन्होंने चमकीला के संगीत को अपने सांस्कृतिक प्रभुत्व के लिए खतरा माना। फिल्म में इसका साफ संकेत है कि ये पेशेवर प्रतिद्वंद्विता अंततः उनकी हत्या का कारण हो सकता है । इम्तियाज़ का चित्रण सहानुभूतिपूर्ण और आलोचनात्मक दोनों है, चमकीला को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में चित्रित करता है जो अपनी कलात्मक ईमानदारी और उनके चारों ओर की दमनकारी शक्तियों के बीच फंसा था ।</p>



<p><strong>80 के दशक का आतंकवाद और चमकीला</strong></p>



<p>आतंकवाद और उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में आम जनता दो पाटों के बीच पिसती रहती है। गुलजार की माचिस और गुरविंदर सिंह की चौथी कूट में इस स्थिति को बखूबी दिखाया गया है। चमकीला भी उस दुश्चक्र में फंसा हुआ दिखता है। एक तरफ आतंकवादी उसे लोकप्रिय गाने छोड़ कर धार्मिक गाना गाने का दबाव बनाते हैं और धार्मिक गाने बनाने पर उसे पुलिस की धमकी मिलती है। 1984 के पंजाब दंगों के बीच तनावग्रस्त स्थिति में भी चमकीले की जोड़ी के लिए अखाड़े की मांग और बढ़ जाती है। चमकीले प्रवाह में मना नहीं कर पाता और अपने गीत गाता जाता है। फिल्म चमकीले के जीवन के अंधेरे पहलुओं को चित्रित करने से भी नहीं कतराती, जिसमें उनकी लत के साथ संघर्ष और लगातार मिलने वाली धमकियाँ शामिल हैं। उसकी हत्या के पीछे यह भी संभावना दिखती है कि खालिस्तानी उग्रवादियों ने ही इस कृत्य को अंजाम दिया हो।</p>


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<p><strong>जाति है कि जाती नहीं</strong></p>



<p>सन् 1972 में प्रकाशित जगदीश चंद्र का उपन्यास धरती धन न अपना पंजाब के दोआबा इलाके में स्थित काली की कहानी है । काली एक दलित युवक है जिसकी एक छोटी सी ख्वाहिश है कि उसके घर की छत पक्की हो । वह शहर रह कर दो पैसे कमा कर लौटा है इसलिए उसमें अपनी जाति या खुद को लेकर कोई हीन भावना नहीं है। अंततः गाँव की ऊंची जाति वालों के आगे काली परास्त हो जाता है। उसी तरह अमर सिंह जिस जाति में जन्म लेता है उसमें पैसा और प्रतिष्ठा अर्जित करना टेढ़ी खीर है। अपनी प्रतिभा के बल पर वह दोनों अर्जित कर लेता है। उसके बाद जो वो करता है वह तो सामाजिक रूप से निषिद्ध है। चमकीला अपनी जोड़ीदार अमरजोत से विवाह रचाता है जबकि वह पहले से शादीशुदा था । अमरजोत एक जट्ट सिक्ख परिवार से थी । जाहिर है इस जोड़ी के लिए जातिगत समीकरण खासे प्रतिकूल थे । चमकीले और अमरजोत की हत्या नागराज मंजूले कृत सैराट के अंत की याद दिलाता है ,जो उनकी हत्या का एक संभावित कारण हो सकता है। हिंदी सिनेमा के निर्माताओं में अभी तक उस साहस का अभाव है जो मराठी या तमिल सिनेमा के पास है। तभी सैराट के रीमेक धड़क में प्रेम प्रसंग से जाति के प्रश्न को जान बुझ कर गौण कर दिया गया है। इम्तियाज़ भी अपनी फिल्म में चमकीले की जाति के प्रश्न को बड़े सतही तौर पर उठाते हैं, लेकिन इसके मूल में जाने का जोखिम नहीं उठाते ।</p>



<p><br><strong>अंत में</strong></p>



<p>अमर सिंह चमकीला एक जादुई बायोपिक है जो एक गायक-कलाकार के जीवन की गहराई में जाकर उन सांस्कृतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत कारकों का अन्वेषण करती है जिसने उसके जीवन को आकार दिया। इम्तियाज़ अली का निर्देशन, दिलजीत दोसांझ और परिणीति चोपड़ा के उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ, एक ऐसे व्यक्ति की कहानी को जीवंत कर देता है जिसका संगीत दिलों को छूने वाला और विवादास्पद दोनों था। इम्तियाज़ अपने काव्यमय दृश्यांकन और अनूठी किस्सागोई के माध्यम से चमकीले की सामाजिक स्थितियों और पेशेवर प्रतिद्वंद्विताओं का सूक्ष्म चित्रण करते हैं । चमकीला असल में कैसा था यह तो उसके साथ जीने वाले लोग ही बात सकते हैं लेकिन इम्तियाज़ ने परदे पर दिलजीत दोसांझ के माध्यम से संगीत के मर्मज्ञ चमकीले को रचा जो दर्शकों के मानसपटल पर हमेशा के लिए दर्ज हो गया ।</p>



<p><strong>-सूरज कुमार , लेखक इग्नू में हिंदी के प्रोफेसर हैं |</strong></p>
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